बुधवार, 18 अप्रैल 2018

मुहूर्त्त का सच


कई प्रकार की व्‍यस्‍तता के कारण कुछ दिनों से अपने ब्‍लोग पर नियमित रूप से ध्‍यान नहीं दे पा रही हूं। इसी दौरान पिताजी की भी एक डायरी पढने का मौका मिला , उसमें से भी कुछ उपयोगी आलेखों को इस पुस्‍तक में सम्मिलित करने की भी इच्‍छा है। उन्‍हीं चुने हुए आलेखों में से एक आज आपके लिए प्रस्‍तुत है .....

आज के अनिश्चित और अनियमित युग में हर व्यक्ति स्वयं को असुरक्षित महसूस करता है। अपने कर्मों और कार्यक्रमों पर भरोसेवाली कोई बात नहीं रह जाती है। जैसे जैसे आत्मविश्वास में कमी होती जा रही है मुहूर्त यात्रा आदि संदर्भों की ओर लोगों का झुकाव बढ़ता जा रहा है। पत्र-पत्रिकाओं में अक्सर फिल्म-निर्माण प्रारंभ करने और उसके प्रदर्शन की शुरुआत के लिए मुहूर्त की चर्चा देखने को मिलती है। फिल्म-निर्माण करने में अधिक से अधिक खर्च-शक्ति और पूंजी की लागत होती है कामयाबी मिलने पर लागत-पूंजी न केवल सार्थक होती है वरन् प्रतिदान के रुप में कई गुणा बढ़ भी जाती है। दूसरी ओर फिल्म फलॉप होने पर फिल्म निर्माता दर-दर भटकाव की स्थिति को प्राप्त करते हैं। सचमुच फिल्म निर्माण बहुत बड़ा रिस्क होता है इसलिए फिल्मनिर्माता एक अच्छे मुहूर्त की तलाश में होते हैं ताकि काम अबाध गति से चलता रहे और प्रदर्शन के बाद भी फिल्म काफी लाभदायक सिद्ध हो। किन्तु वस्तुतः होता क्या है आज का फिल्म उद्योग काफी लाभप्रद नहीं रह गया है कुछ सफल है तो अधिकांश की स्थिति बिगड़ी हुई है। क्या सचमुच मुहूर्त काम करता है ?

पूरे देश में प्रवेशिका परीक्षा देनेवालों की संख्या करोड़ों में होती है। इस वैज्ञानिक युग में जैसे-जैसे मनोरंजन के साधन बढ़ते चले गए पढ़ाई का वातावरण धीरे-धीरे कमजोर पड़ता चला गया। आज जैसे ही परीक्षा के लिए कार्यक्रम की घोषणा होती है अधिकांश विद्यार्थी परेशान नजर आते हैं क्योंकि उनकी तैयारी संतोषजनक नहीं होती है इसलिए उनका आत्मविश्वास काम नहीं करता रहता है। प्रायः सभी विद्यार्थी और उनके अभिभावक अपने आवास से परीक्षा-स्थल पर पहुंचने के लिए मुहूर्त्‍त की तलाश में पंडितों के पास पहुंच जाते हैं। पंडितजी के पास ग्रहों नक्षत्रों के आधार पर शोध किए गए कुछ विशिष्ट शुभ समय-अंतराल की तालिका होती है।

कभी महेन्द्र योग कभी अमृत योग तो कभी सिद्धियोग से संबंधित इस प्रकार के शुभफलदायी लघुकालावधि की सूचना बारी-बारी से सभी विद्यार्थियों और अभिभावकों को दी जाती है या फिर एक ही विद्यार्थी पंडितजी से यह मुहूर्त्‍त प्राप्त कर कई विद्यार्थियों को जानकारी देते हैं। विद्यार्थी झुंड बनाकर एक ही साथ उसी शुभ मुहूर्त्‍त में अपने गांव कस्बे या क्षेत्र से परीक्षास्थल के लिए निकलते हैं। पर सोंचने की बात है कि क्या सबका परिणाम एक सा होता है नहीं विद्यार्थियों को उनकी प्रतिभा के अनुरुप ही फल प्राप्त होता है। उत्तीर्ण होने लायक विद्यार्थी सचमुच उत्तीर्ण होते हैं और जिन विद्यार्थियों के अनुत्तीर्ण होने की संभावना पहले से ही रहती है वैसे ही विद्यार्थी अनुत्तीर्ण देखे जाते हैं। विरले ही ऐसे विद्यार्थी होते हैं जिनका परीक्षा परिणाम प्रत्याशा के विरुद्ध होता है उन विद्यार्थियों ने शुभ मुहूर्त्‍त में यात्रा नहीं की इसलिए ही ऐसा हुआ यह तो कदापि नहीं कहा जा सकता। 

यहां तो मैं केवल यात्रा की बात कर रहा हूं किन्तु कल्पना करें किसी समय अमृत योग सिद्धि योग या महेन्द्र योग चल रहा हो और उसी समय किसी विषय की परीक्षा चल रही हो तो क्या लाखों की संख्या में परीक्षा दे रहे विद्यार्थी उस विषय में उत्तीर्ण हो जाएंगे कदापि नहीं सभी विद्यार्थियों को उनकी योग्यता के अनुरुप ही  परीक्षाफल की प्राप्ति होगी। अमृतयोग या सिद्धियोग कुछ काम नहीं कर पाएगा।

हर विषय की परीक्षा का समय निर्धारित होता है और लाखों की संख्या में परीक्षार्थी परीक्षा में सम्मिलित होकर भिन्न-भिन्न परीणामों को प्राप्त करते हैं। समय के छोटे से टुकड़े को ही मुहूत्र्त कहा जाता है। इस दृष्टिकोण से परीक्षा की कुल अवधि जिसमें सभी विद्यार्थी परीक्षा दे रहे हैं एक प्रकार का मुहूत्र्त ही हुआ। वह मुहूर्त्‍त अच्छा है या बुरा सभी विद्यार्थियों के लिए एक जैसा ही होना चाहिए परंतु क्या वैसा हो पाता है स्पष्ट है ऐसा कभी नहीं हो सकता ।

बहुत बार समय का एक छोटा सा अंतराल आम लोगों को प्रभावित करता है। हवाई जहाज या रेल के दुर्घटनाग्रस्त होने पर सैकड़ो लोग एक साथ मरते हैं। इसी तरह युद्ध भूकम्प या तूफान के समय मरनेवालों की संख्या हजारो में होती है। उक्त कालावधि को हम बहुत ही बुरे समय से अभिहित कर सकते हैं क्योकि इस प्रकार की घटनाएं जनमानस पर बहुत ही बुरा प्रभाव डालती है किन्तु इस प्रकार की घटनाओं को अच्छे योगों में भी घटते हुए मैंने पाया है। इसी प्रकार शुभ विवाह के लिए शुभ मुहूर्तों की एक लम्बी तालिका होती है जिन तिथियों में ही शादी-विवाह की व्यवस्था की जाती है। परंतु बहुत बार हम ऐसा सुनते हैं कि आकस्मिक दुर्घटना के कारण बरातियों की मौत हो गयी ऐसी हालत में इन योगों की कौन सी प्रासंगिकता रह जाती है क्या यह बात दावे से कही जा सकती है कि जो हवाई जहाज दुर्घटनाग्रस्त हुई उसमें हवाई यात्रा करने से पूर्व सभी यात्रियों में से किसी ने मुहूर्त्‍त नहीं देखा होगा उसमें स्थित कोई आम आदमी जो भाग्यवादी दृष्टिकोण भी रखता होगा यात्रा के विषय में अवश्य ही पंडितों से सलाह ले चुका होगा फिर भी सभी यात्रियो का परिणाम एक सा ही देखा जाता है।

जहां एक ओर  सामूहिक उत्सव एक ही मेले में लाखो लोगों का एक साथ उपस्थित होना सामूहिक विवाह सौंदर्य प्रतियोगिता आदि सुखद अहसास खास समय अंतराल के विषय वस्तु हो सकते हैं वहीं दूसरी ओर भूकम्प तूफान युद्ध और दुर्घटनाओं से लाखों लोगों का प्रभावित होना भी सच हो सकता है। इस प्रकार से अच्छे या बुरे समय को स्वीकार करना हमारी बाध्यता तो हो सकती है किन्तु इन दोनों प्रकार के समयों को अलग-अलग कर दिखाने के सूत्रों की पकड़ जब अच्छी तरह हो जाएगी तो फलित ज्योतिष के द्वारा समय और तिथियुक्त भविष्यवाणियां भी आसानी से की जा सकेगी।

अमुक दिन अमुक समय पर भूकम्प आनेवाला है तूफान आनेवाला है कहकर लोगों को सतर्क किया जा सकेगा। अगर ऐसा हो पाया तो बुरे समय का बोध स्वतः हो जाएगा। किन्तु अभी फलित ज्योतिष इतना ही विकसित है कि वह ग्रह की स्थिति अंश कला और विकला तक कर सकता है परंतु उसके फलाफल की प्राप्ति किस वर्ष होगी इसकी भी चर्चा नहीं कर पाता । दूसरी ओर फलित ज्योतिष के ज्ञाता किसी खास घंटा और मिनट को भी शुभ और अशुभ कहने में नहीं चूकते हैं। फलित कथन की यह दोहरी नीति फलित ज्योतिष में भ्रम उत्पन्न करती है।

कभी-कभी एक ही समय में एक घटना घटित होती है और उस घटना का प्रभाव दो भिन्न-भिन्न व्यक्ति और समुदाय के लिए अलग-अलग यानि एक के लिए शुभ और दूसरे के लिए अशुभ फलदायक होता है। इस प्रकार की घटनाएं अक्सर होती हैं एक हारता है तो दूसरा जीतता है। एक को हानि होती है तो दूसरा लाभान्वित होता है। वर्षों तक मुकदमा लड़ने के बाद दोनों पक्ष के मुकदमेबाज ज्योतिषी से सलाह लेने पहुंच जाते हैं। फैसले के लिए कौन सी तिथि का चुनाव किया जाए। पंचांग में एक बहुत ही शुभ समय का उल्लेख है। दोनो पक्ष भिन्न-भिन्न ज्योतिषियों से सलाह लेकर उस शुभ दिन को फैसले की सुनवाई के लिए तैयार होकर जाते हैं। पर परिणाम क्या होगा एक को जीत तो दूसरे को हार मिलनी ही है। निर्धारित शुभ समय एक के लिए शुभफलदायक तो दूसरे के लिए अशुभ फलदायक होगा।

दो देशों के मध्य क्रिकेट मैच हो रहा है।  दोनो देशों के निवासी बड़ी तल्लीनता के साथ मैच देख रहे होते हैं। कई घंटे बाद निर्णायक क्षण आता है। जीतनेवाला देश कुछ ही मिनटों में खुशी का इजहार करते हुए करोड़ो रुपए की आतिशबाजी कर लेता है किन्तु प्रतिद्वंदी देश गम में डूबा शोकाकुल मातम मनाता रहता है। ऐसे निर्णायक क्षण को बुरा कहा जाए या अच्छा निर्णय करना आसान नहीं है। इसी तरह बंगला देश के आविर्भाव के समय 1971 में दिसम्बर के पूर्वार्द्ध में एक पखवारे तक दोनो देशों के बीच युद्ध होता रहा जान-माल की हानि होती रही। बंगला देश अस्तित्व में आया। सिद्धांततः भारत की जीत हुई पाकिस्तान की पराजय। किन्तु दोनो ही देशों को भरपूर आर्थिक नुकसान हुआ। इन पंद्रह दिनों की अवघि को किस देश के लिए किस रुप में चिन्हित किया जाए। 15 दिनों के अंदर उल्लिखित अमृत महेन्द्र और सिद्धियोग का भारत और पाकिस्तान के सैनिकों के लिए और बंगला देश के नागरिकों के लिए क्या उपयोगिता रही ?

इस अवधि में बंगला देश निवासी स्त्री-पुरुषों के साथ पाकिस्तानी सैनिकों का अत्याचार अपनी पराकाष्ठा पर था। क्या फलित ज्योतिष के दैनिक मुहूर्तों का इनपर कोई प्रभाव पड़ सका मुहूर्त के रुप मे छोटे-छोटे अंतराल की चर्चा न कर स्थूल रुप से ही इस लम्बी अवधि तक की युद्ध की विभीषिका को क्या फलित ज्योतिष में एक अनिष्टकर योग के रुप में  चित्रित किया जा सकता है नहीं क्योकि इस घटना का प्रभाव सारे विश्व के लिए एक जैसा नहीं था । न्यूटन के तीसरे नियम के अनुसार प्रत्येक क्रिया के बराबर और विपरीत एक प्रतिक्रिया होती है। यदि यह प्रकृति का नियम है तो समय के छोटे से अंतराल में भी जिसे हम बुरा या अशुभ फल प्रदान करनेवाला कहते हैं किसी न किसी का कल्याण हो रहा होता है।

अतः किसी भी समय को किसी व्यक्ति विशेष के लिए अच्छा या बुरा समय कहना ज्यादा सटीक होगा। अमृत योग में भी किसी को फांसी पर लटकाया जा सकता है विषयोग में भी कल्याणकारी कार्य हो सकते हैं । किसी वर्ष मक्का-मदीना में गए हजयात्रियों की संख्या 20 लाख थी। गैस-रिसाव से अग्नि प्रज्वलित हुई तथा तेज हवा के झोकों के कारण आग की लपटे हजारो पंडालों तक फैल गयी। इससे 400 तीर्थयात्री मारे गए। शेष हजयात्रा पूरी करके सकुशल वापस आ गए। जो मारे गए वे सीधे जन्नत सिधार गए। उनका संपूर्ण परिवार पीडि़त हुआ। जो घायल हुए वे स्वयं पीडि़त हुए। शेष हादसे से प्रभावित नहीं होने के कारण हजयात्रा की सफलता को उपलब्धि के रुप में लेंगे। सभी अपने अपने दशाकाल के अनुसार फल की प्राप्ति कर रहे थे मुहूर्त के अनुसार उनका फल प्रभावित नहीं हुआ।

किसी धनाढ्य व्यक्ति के यहां लक्ष्मीपूजन किस समय किया जाए इसके लिए पंडित शुभ मुहूर्त निकाल देते हैं पूजा भी हो जाती है धन की वर्षा भी होने लगती है किन्तु एक पंडित अपने लिए वह शुभ मुहूर्त कभी नहीं निकाल पाता है । यदि पक्के विश्वास की बात होती तो पंडित उस शुभ घड़ी में स्वयं अपने यहां लक्ष्मी-पूजन करता और धन की वर्षा उसी के यहां होती उसे केवल दक्षिणा से संतुष्ट रहने की बात नहीं होती।

निष्कर्ष यह है कि हर समय का महत्व हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग होता है। पंचांग में यदि एक समय को शुभ लिख दिया जाए तो कोई समय शुभ नहीं हो जाएगा। एक समय एक व्यक्ति हॅसता है तो दूसरा रोता है। यात्रा या मुहूर्त के बल पर बुरे समय को अच्छे समय में बदलना कठिन ही नहीं असंभव कार्य है। अपने कर्मफल को भोगने के लिए हम सभी विवश हैं। किसी की यात्रा या मुहूर्त उसी दिन शुरु हो जाता है जिस दिन उसका जन्म पृथ्वी पर होता है। जबतक यह जीवन है हर व्यक्ति अपने यात्रा-पथ में है।

जन्म के अनुसार संस्कार विचारधारा कर्तब्य सुखदुख सब निर्धारित है। जन्मकालीन ग्रहों द्वारा निर्मित वातावरण इन सबके लिए काफी हद तक जिम्मेवार है। जन्म से मृत्यु तक के यात्रापथ में उसके समस्त कार्यक्रम उसकी सफलता और असफलता तक के क्षणों का निर्धारण लगभग हो चुका होता है। इस बीच यदि कोई बार-बार मुहूर्त की तलाश करता है तो क्या सचमुच अपनी प्रकृति विचारधारा कार्यप्रणाली और मंजिल को बदलने की क्षमता रखता है यदि ये सारे संदर्भ हर समय बदल दिए जाए तो व्यक्ति कहां पहुंचेगा ?

पंचांगों में शुभ विवाह के लिए बहुत सारे मुहूर्तों का उल्लेख होता है। वैवाहिक बंधनों में बॅघनेवालों के लिए शुभ तिथियां कुल मिलाकर 40 से 50 के बीच होती हैं। उनमें भी कई प्रकार के दोषों का उल्लेख रहता है। लोग भ्रमजाल में उलझे उनमें से किसी अच्छी तिथि के लिए पंडितों के पास पहुंचते हैं। अभिभावकों के पास पंचांगों में लिखी बातों को मानने के अलावा और कोई उपाय नहीं होता। वैवाहिक संस्कार जीवन का एक बहुत ही महत्वपूर्ण संस्कार है इसका बंधन बहुत ही नाजुक होता है संपूर्ण जीवन पर गहरा प्रभाव डालनेवाला।

इसलिए लोग शुभलग्न या शुभ तिथियों में ही विवाह निश्चित करते हैं। सीमित तिथियां होने से कभी-कभी एक ही तिथि में शादी की इतनी भीड़ हो जाती है कि हर प्रकार की व्यवस्था में अभिभावकों को काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उत्सवी वातावरण बोझिल बन जाता है। जिस कार्यक्रम की शुरुआत में ही कष्ट या तनाव हो जाए उसका मनोवैज्ञानिक बुरा प्रभाव भविष्य में भी देखने को मिलता है। शुभ तिथि के चयन में इस बात का सर्वाधिक महत्व होना चाहिए कि वांछित कार्यक्रम का किस प्रकार से समापन हो पर इसका सहारा न लेकर ऊबाऊ मुहूर्त की चर्चा करना समाज में व्यर्थ का बोझ देना है। 

पंचांग में शुक्र के अस्‍त होने पर शादी के लिए कोई शुभ लग्न पंचांगों में दर्ज नहीं किया जाता है। पर ज्योतिषियों को यह मालूम होना चाहिए कि शुक्र का अस्त होना हर स्थिति में कष्टकर नहीं होता। सूर्य के साथ अंतर्युति करते हुए जब शुक्र अस्त होता है तो वह आम लोगों के लिए कष्टकर हो सकता है किन्तु वही शुक्र सूर्य से बहिर्युति करते हुए जब अस्त हो तो बहुत ही अच्छा फल प्रदान करता है। जब शुक्रास्त सूर्य के साथ बहिर्युति करते होता है तो शुक्र की कमजोरी को दृष्टिकोण में रखकर वैवाहिक शुभ लग्न का उल्लेख नहीं करना अनजाने में बहुत बड़ी भूल होती है। पंचांग निर्माता या फलित ज्योतिष के विशेषज्ञ विभिन्न कारणों से शादी के लिए किसी वर्ष शुभ लग्न की कितनी भी कमी दर्ज क्यों न करें विवाह की कुछ संख्या घट सकती है परंतु होगी तो अवश्य ही और यदि वे लागातार कुछ वर्षों तक शुभ लग्न की कमी दिखलाते रहें तो विवाह बिना लग्न के ही होते देखे जाएंगे।

कहने का अभिप्राय यह है कि विधि-निषेध ओर कर्मकाण्ड से संबंधित ज्योतिषीय चर्चा जब भी हो उसका ठोस वैज्ञानिक आधार होना आवश्यक होगा अन्यथा उन नियमों की अवहेलना स्वतः युग के साथ होनी स्वाभाविक है। जब आजतक ग्रह-शक्ति निर्धारण और उनके प्रतिफलन काल से संबंधित ठोस सूत्र ज्योतिषियों को मालूम नहीं है तो मुहूर्त को लेकर तनाव में पड़ने की कोई आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। जबतक फलित ज्योतिष को विकसित स्वरुप न प्रदान कर दी जाए यानि ग्रह की इस स्थिति का यह परिणाम होगा यह बात दावे से न कही जा सके तबतक ज्योतिषियों के अधूरे ज्ञान या संशय का लाभ जनता को मिलना चाहिए। अनावश्यक विधि निषेध से संबंधित नियमावलि से आमलोगों को कदापि परेशान नहीं किया जाना चाहिए।

शादी के लिए कन्या पक्ष और वरपक्ष तैयार है सांसारिक दृष्टि से उसे अंजाम देने में सप्ताह भर का समय काफी है परंतु फिर भी विवाह नहीं हो पा रहा है इसका कारण यह है कि पंचांग में शुभ लगन का अभाव है। इस तरह सिर्फ वैवाहिक लग्न के संदर्भ में ही नहीं अपितु हर प्रकार के कार्यों में पंचांगों में दर्ज मुहूर्तों का अभाव आम जीवन में कई प्रकार की असुविधाओं को जन्म देता है जबकि विश्वासपूर्वक मुहूर्तों की उपयोगिता और प्रभाव को अभी कदापि सिद्ध नहीं किया जा सका है।

स्मरण रहे हर शुभ मुहूर्त का आधार तिथि नक्षत्र चंद्रमा की स्थिति योगिनी दिशा और ग्रहस्थिति के आधार पर किया गया है किन्तु ग्रह-शक्ति के सबसे बड़े आधार ग्रह की विभिन्न प्रकार की गतियों के आधार पर मुहूर्तों का चयन नहीं हुआ है। अतः अभी तक के मुहूर्त पूर्ण विश्वसनीय नहीं हैं। अभी यह भी अनुसंधान बाकी ही है कि एक व्यक्ति के लिए सभी शुभ मुहूर्त शुभफल ही प्रदान करते हैं अतः कर्मकाण्ड से डरने की कोई आवश्यकता नहीं। विकसित विज्ञान का काम सभी व्यक्तियों के मन से भय को दूर कर मनुष्य को निडर बनाना है। .. और हमें उसी प्रयास में बने रहना चाहिए।

न तो एक व्यस्त डॉक्टर मुहूर्त देखकर रोगी का ऑपरेशन करता है और न ही एक व्यस्त वकील मुहूर्त देखकर अपने मुकदमें की पैरवी करता है न ही एक कुशल वैज्ञानिक मुहूर्त देखकर उपग्रह या मिसाइल का प्रक्षेपण करते हैं। जो अधिक फुर्सत में होते है वे ही मुहूर्त की तलाश में होते हैं या फिर जिनके आत्मविश्वास में थोड़ी कमी होती है वे ही मुहूर्त की चर्चा करते हैं। योजनाओं के अनुरुप हर प्रकार के संसाधन उपस्थित हो तो किसी भी व्यक्ति को यह समझ लेना चाहिए कि मुहूर्त स्वयं आकर हमारे सामने खड़ा है उसे ढूंढ़ने के लिए पंडित के पास जाने की आवश्यकता नहीं। ऐसी परिस्थिति उत्पन्न होने पर किसी भी व्यक्ति को अपने काम में विलम्ब नहीं करना चाहिए। यह अलग बात हे कि जब योजना को स्वरुप देने में संसाधन की कमी हो रही हो कई तरह की बाधाएं उपस्थित हो रही हो तो ऐसी परिस्थिति में ज्योतिषी से यह सलाह लेने की बात हो सकती है कि निकट भविष्य में कोई शुभ मुहूर्त उसके जीवन में है या नहीं ?   

रविवार, 8 अक्तूबर 2017

करवाचौथ : क्या कहते हैं ग्रह ???


हिंदू पंचाग के अनुसार करवाचौथ कार्तिक माह के चौथे दिन होता है। इस दिन जिनकी शादी होने वाली हैं या जो शादीशुदा हैं, वो अपने पति की लंबी आयु के लिए व्रत करती हैं। ये व्रत सुबह सूरज उगने से पहले से लेकर और रात्रि में चंद्रमा निकलने तक रहता है। उत्तर भारत के लगभग सभी राज्यों , हिमाचल प्रदेश, मध्यप्रदेश, पंजाब, राज्यस्थान और उत्तर प्रदेश में धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन सिर्फ पति की लंबी आयु की ही नहीं उसके काम-धंधे, धन आदि इच्छाओं की पूर्ति की प्रार्थना करती हैं। करवाचौथ की शुरुआत होने के बारे में कई कथाएं हैं, पर करवा नाम की पतिव्रता स्त्री की कहानी सर्वाधिक प्रसिद्द है।

‘करवाचौथ’ को लाइमलाइट में लाने में हिंदी सिनेमा का योगदान बड़ा है। 80 के दशक से ही फिल्मों में करवाचौथ का चलन लोकप्रिय होने लगा था। आज यह फिल्मों का प्रभाव ही है कि करवाचौथ का व्रत सबसे कठिन व्रत माना जाता है, यह कहकर कि इसमें बिना पानी और अन्न का एक भी दाना ग्रहण नहीं किया जाता है, जबकि भारतवर्ष में तीज और जियुतिया जैसे २४ घंटे बिना अन्न जल ग्रहण किये जाने वाले व्रत महिलाएं सदियों से करती आ रही हैं। खबर है कि पिछले साल की तुलना में इस वर्ष चाँद १५ मिनट पहले निकलेगा, इसलिए व्रत में कुछ राहत ही समझा जाये। 

भारत में मनाये जाने वाले सभी त्योहारों के कोई न कोई सन्देश होते हैं, इस दिन का भी कोई सन्देश निकलकर आये तो अच्छा है। सुहागन महिलाओं के लिए इस त्यौहार के महत्व को देखते हुए यूपी की ट्रैफिक पुलिस ने शानदार पहल करते हुए महिलाओं के लिए संदेश जारी किया है कि इस करवा चौथ महिलाएं अपने पति को हेलमेट पहनाएं।इतना ही नहीं इस पोस्टर में एक तस्वीर भी लगाई गई है। तस्वीर में महिला ने एक हाथ से छलनी पकड़ी हुई है तो उसके दूसरे हाथ में हेल्मेट है और आखिर में लिखा है- 'हेलमेट पहने, सुरक्षित रहें'। पुरुष भी अपनी पत्नियों और परिवार के हित में घर में सुरक्षा मामलों को अहमियत दे तो अच्छा रहेगा।

ग्रहों की स्थिति देखें तो आज सूर्य और बुध अच्छा और शनि  गड़बड़ प्रभाव डालने वाला है। इसलिए स्वस्थ्य की दृष्टि से सूर्य और बुध लग्नेश वाले अच्छा महसूस करेंगे , जबकि शनि लग्नेश वालों के समक्ष कुछ दिक्कतें आएँगी यानि  मिथुन, सिंह और कन्या लग्न वाली महिलाओं पर व्रत का शरीर पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा, जबकि मकर और कुम्भ लग्न वाले स्वस्थ्य की समस्या से जूझेंगे। यह त्यौहार दांपत्य प्रेम का है , इसमें भी सप्तमेश का प्रभाव पड़ेगा।  जिनका सप्तमेश सूर्य या बुध होंगे , आज उनके प्रेम में ऊष्मा रहेगी। जिनका सप्तमेश शनि होंगे, वे कुछ दिक्कत प्राप्त करेंगे। इस दृष्टि से धनु, कुम्भ और मीन लग्न वालों पर गृह का शुभ प्रभाव तथा कर्क और सिंह लग्न वालों पर अशुभ प्रभाव पड़ेगा।  कृपया सावधानी बरतें। 

अंत में सबों के लिए करवा चौथ की शुभकामनायें .... अपने हाथों में चूड़ियाँ सजाये , माथे पर अपने सिन्दूर लगाए , निकली हर सुहागन चाँद के इंतज़ार में , ईश्वर  उनकी हर मनोकामना पूरी करें !!

बुधवार, 13 सितंबर 2017

हिंदी दिवस पर विशेष

जब साल 1947 में देश आजाद हुआ तो देश के सामने भाषा का सवाल एक बड़ा सवाल था। भारत जैसे विशाल देश में सैकड़ों भाषाएं और हजारों बोलियां थीं। 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में लिखी हिन्दी को अंग्रेजी के साथ राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के तौर पर स्वीकार किया था। कहा जाता है कि जब अंग्रेजी को आधिकारिक भाषा के तौर पर हटने का वक्त आया तो देश के कुछ हिस्सों खासकर दक्षिण भारतीय राज्यों में हिंसक प्रदर्शन हुए।  उसके बाद केंद्र सरकार ने संविधान संशोधन करके अंग्रेजी को हिन्दी के साथ भारत की आधिकारिक भाषा बनाए रखने का प्रस्ताव पारित किया।1953 में जवाहरलाल नेहरू सरकार ने इस ऐतिहासिक दिन के महत्व को देखते हुए 14 सितंबर को हिन्दी दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया। 

पर आज के आधुनिक युग में भी हिंदी 'हिंदी दिवस' का मोहताज नहीं है। देश की बड़ी आबादी हिंदी बोलने और समझनेवाली है, इसलिए हर क्षेत्र में हिंदी का महत्व है।  पढाई में हिंदी का महत्व इलसिए है क्योंकि इसमें जिस शब्‍द को जिस प्रकार से उच्‍चारित किया जाता है, उसे लिपि में लिखा भी उसी प्रकार जाता है।  रोचक बात यह है कि अंग्रेजी की रोमन लिपि में शामिल कुछ वर्णों की संख्‍या 26 है, जबकि हिंदी की देवनागरी लिपि के वर्णों की संख्‍या ठीक इससे दोगुनी यानी 52 है।  हमारे संसद भले ही अंग्रेजी में संसद में बोलेन, पर चुनाव प्रचार हिंदी में ही करना होता है।  हमारे अभिनेता भी भले ही बात-चित अंग्रेजी में करते हैं, पर उनको कमाई हिंदी फिल्मों में काम  मिलती है।

भारत अलावा  फिजी में भी हिंदी का काफी महत्व है। यहां रेडियो पर आने वाले ज्यादातर कार्यक्रम हिंदी में होते हैं। शिक्षा विभाग द्वारा संचालित सभी बाह्य परीक्षाओं में हिंदी एक विषय के रूप में पढ़ाई जाती है। फिजी का भारतीय समुदाय ने हिंदी समिति तथा हिंदी केंद्र बनाए हैं  औपचारिक एवं मानक हिंदी का प्रयोग पाठशाला के अलावा शादी, पूजन, सभा आदि के अवसरों पर होता है। कोई भी व्यक्ति सरकारी कामकाज, अदालत तथा संसद में भी हिंदी भाषा का प्रयोग कर सकता है। चुनाव सभाओं के पोस्टर व प्रचार सामग्री भी हिंदी भाषा के प्रयोग के बिना अधूरी समझी जाती है।

समय के साथ हुए बदलाव ने डिजिटल वर्ल्ड पर अपनी मौजूदगी साबित किया। हिंदी टाइपिंग की मजबूती ने आज हिंदी ब्लॉग्गिंग, हिंदी टयुब चैनल , हिंदी समाचार या हिंदी खोज इंजन को महत्वपूर्ण बनाया है।  आज गूगल किसी भी हिंदी कीवर्ड के हज़ारो परिणाम सामने लाता है।  सौभाग्यशाली हूँ कि शुरुआती कुछ ब्लोग्गेर्स के साथ ही मैंने भी हिंदी ब्लॉग जगत के माध्यम से हिंदी में उपयोगी पोस्ट लिखी और इंटरनेट के इस अथाह समुद्र में कुछ लेख मेरे भी मौजूद हैं। 

ग्रहों के प्रभाव का प्रमाण: गतांक से आगे……

अगर मैं कहूँ कि 2017 में जून से सितम्बर के बीच जितने भी बच्चों का जन्म हुआ है इनमे से लगभग सभी 30 वर्ष की उम्र में निडर, आक्रामक, मस्त, लापरवाह, बहुमुखी, जोशीले, असहिष्णु, सुविधावादी, इनमे से कई दबंग और शोषक भी हो सकते हैं तो अधिकांश बुद्धिजीवी इसे महज़ ज्योतिषीय बकवास ही समझेंगे लेकिन चूँकि मैंने हमेशा यह सुनिश्चित किया है कि कोई भी विचार गंभीर चिंतन के पश्चात् ही रखा जाना चाहिए, अतः परीक्षण के बाद ही किसी सत्य का उल्लेख करता हूँ। मेरे उपरोक्त कथन की पुष्टि के लिए विद्वान पाठकों को 30 वर्षों का इंतज़ार नहीं करना पड़े इसलिए मैं आप को 30 वर्ष पीछे ले जा कर उल्लिखित सत्य को सिद्ध करने की कोशिश करता हूँ। जिनका जन्म सन 1987 में 15 जून से 15 अक्टूबर के बीच हुआ है वे निश्चित रूप से इस समय 30 वर्ष की अवस्था के नवयुवक या नवयुवती होंगे, के स्वाभाव का निरीक्षण और परीक्षण करें तो इनमे उल्लिखित सारी विशेषताएँ दिखाई पड़ेंगी।
लेकिन इसके ठीक विपरीत जिनका जन्म 11 जून से 12 अगस्त 1986 एवं 29 अगस्त से 28 अक्टूबर सन 1988 में हुआ, ऐसे सभी जातक स्वाभाव से संकोची, नियम से चलनेवाले, उत्तरदायित्व को समझने वाले, अंतर्मुखी, सहिष्णु, गंभीर, शांतिप्रिय, समन्वयवादी, स्वाभाव के होंगे और इस समय जीवन की विपरीत परिस्थियों से गुजर रहे होंगे क्यूँकि ये सभी उस समय पृथ्वी पर आये जब पूर्वी क्षैतिज में सूर्य का उदय हो रहा था और पृथ्वी के सापेक्ष मंगल वक्र गति में पश्चिम क्षैतिज पर अस्त हो रहा था।
ग्रह करोडो मील दूर रहकर किस तरह जड़-चेतन, जल-थल, जीव-जंतु मौसम, बाजार और मानव जीवन को प्रभावित करते हैं यह भले ही कल तक अबूझ पहेली बनी हुई थी लेकिन आज इस पहेली को सुलझाने की दिशा में बहुत हद तक कार्य किया जा चुका है। ग्रह अपनी गतिज ऊर्जा से ही हर जगह अपने प्रभाव का छाप छोड़ते हैं। अगर हम भौतिक विज्ञान के कुछ आधारभूत सिद्धांतों पर गौर करें तो पाएंगे कि अपरिमित गतिज ऊर्जा को ऊर्जा के अन्य स्वरूपों में परिवर्तित कर इलेक्ट्रान को हस्तांतरित करके मीलों दूर स्थित पदार्थों को आवेशित किया जा सकता है। दरअसल, पदार्थ के साथ शक्ति का अटूट सम्बन्ध होता है और किन्ही दो आकाशीय पिंडो के बीच आकर्षण बल उन दोनों के बीच की दूरी के वर्ग (स्क्वायर) का व्युत्क्रमानुपाती होता है। इसका मतलब दूरी का घटना और बढ़ना ऊर्जा के घटने और बढ़ने का कारण बन जाता है। 'गत्यात्मक ज्योतिष' में गतिज ऊर्जा की परिवर्तनशीलता पृथ्वी के सापेक्ष उन ग्रहों की घटती-बढ़ती दूरियों पर ही आधारित है।
अपने ज्योतिषीय अनुसन्धान के क्रम में ग्रहों की दो अलग-अलग स्थितियों पर बहुत चिंतन किया गया। सूर्य के साथ-साथ मंगल ग्रह पूर्वी क्षैतिज पर उदय हो रहा था, वह पहली स्थिति थी। दूसरी स्थिति सूर्य के उदय के समय मंगल180 डिग्री की दूरी पर रहकर पश्चिम क्षैतिज में अस्त हो रहा था। दोनों ही स्थितियों में मंगल और पृथ्वी के बीच की दूरी का अनुपात 4:1 था। सूर्य के साथ मंगल के उदय होनेवाले सभी जातकों का जन्म 2017 और 1987 के उल्लिखित अवधि के दौरान हुआ था जो पहले ग्रुप में रखे गए और दूसरे ग्रुप में 1986 और 1988 के उल्लिखित अवधि में पृथ्वी पर आये। दोनों ग्रुप के व्यक्तियों के स्वाभाव में जमीन आसमान का अंतर महसूस किया जा सकता है। उपरोक्त दोनों अवधियों के बीच जन्म लिए किसी जातक आपके परिवार के सदस्य या आपके कोई परिचित हैं तो इनकी वर्तमान स्थिति पर गौर करें, आपको कहीं भी कोई अपवाद नहीं मिलेगा।
मंगल युवावस्था का प्रतीक ग्रह है और शरीर में इसकी ग्रंथि की सक्रियता 24 से 36 वर्ष की उम्र में होती है। गत्यात्मक शक्ति जितनी अधिक होगी, 30 वर्ष की उम्र में उन युवक-युवतियों में सारी विशेषताएँ उतनी ही अधिक दिखाई पड़ेगी। स्मरण रहे जो ब्रम्हांड में है वही पिंड में है और प्रत्येक ग्रह के प्रतिनिधित्व के लिए मानव शरीर में इससे सम्बंधित ग्रंथि भी जीवन के अलग-अलग भाग में सक्रीय होती है| क्रमश:……
विद्या सागर महथा
निदेशक- गत्यात्मक ज्योतिष अनुसन्धान संसथान
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