सोमवार, 30 मार्च 2020

चन्द्रमा और बचपन

moon child astrology

चंद्रमा पृथ्‍वी का निकटतम ग्रह है और इस कारण इसका प्रभाव पृथ्‍वी पर सर्वाधिक पडता है। समुद्र में ज्‍वार भाटे का आना इसका सबसे बडा उदाहरण है। मनुष्‍य के जीवन को भी यह बहुत अधिक प्रभावित करता है। य‍ह मानव मन का प्रतीक ग्रह है , इसलिए यह जिस भाव का स्‍वामी होता है या जिस भाव में स्थित होता है , वहीं जातक का सर्वाधिक ध्‍यान होता है। 


12 वर्ष तक का उम्र बाल्‍यावस्‍था का होता है। बच्‍चे मन से बहुत कोमल और भावुक होते हैं। उनके अंतर्मन में कोई बात गहराई तक छू जाती है। इसलिए बच्‍चों के मनोवैज्ञानिक विकास में चंद्रमा का अधिक प्रभाव देखा जाता है। जिन बच्‍चों का चंद्रमा मजबूत होता है वे 12 वर्ष की उम्र तक बहुत चंचल और तेज दिखाई पडते हैं। उनका बचपन स्‍वस्‍थ वातावरण में गुजरता है। वे मस्‍त स्‍वभाव के होते हैं। इसके विपरीत जिनका चंद्रमा कमजोर होता है , वे इस उम्र तक बहुत ही सुस्‍त और चिडचिडे नजर आते हें और बचपन में ही अपने वातावरण में घुटन महसूस करते हैं। उनको किसी शारीरिक कष्‍ट की संभावना भी बचपन में बनी होती है।

गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष के द्वारा चंद्रमा की शक्ति का निर्णय उसके आकार के आधार पर किया जाता है। पूर्णिमा के दिन चांद अपने पूरे आकार में होता है। इसलिए उस दिन वह पूर्ण शक्ति में होता है। यही कारण है कि पूर्णिमा के दिन जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे अपने माता पिता और परिवारजनों का विशेष प्‍यार प्राप्‍त करते हैं , यही नहीं वे अपने पूरे वातावरण से भी पूणत: संतुष्‍ट होते हैं। अष्‍टमी के दिन तक चांद सामान्‍य शक्ति का ही रहता है , पर उसके बाद धीरे धीरे उसका आकार छोटा होता जाता है और अमावस्‍या के दिन चंद्रमा लुप्‍त हो जाता है। इस समय चंद्रमा अपनी पूरी ताकत खो देता है। इस कारण अमावस्‍या के आसपास जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे शरीर से कमजोर होते हैं , माता पिता ओर परिवार जनों के प्‍यार में कमी प्राप्‍त करते हैं या अपने आसपास के किसी बच्‍चे को सुख सुविधायुक्‍त देखकर आहें भरते हैं।

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यदि मजबूत चंद्रमा लग्‍नेश , षष्‍ठेश , लग्‍नस्‍थ या षष्‍ठस्‍थ हो , तो वैसे बच्‍चे शरीर से बहुत मजबूत होते हैं , विलोमत: स्थिति में यानि कमजोर चंद्रमा लग्‍नेश , षष्‍ठेश , लग्‍नस्‍थ या षष्‍ठस्‍थ हो , तो वैसे बच्‍चे शरीर से बहुत कमजोर होते हैं। विभिन्‍न लग्‍नवाले बच्‍चों के लिए कमजोर और मजबूत चंद्रमा का फल भिन्‍न भिन्‍न होता है।

मेष लग्‍न में कमजोर चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे अंतर्मन में माता से अपने को असंतुष्‍ट हसूस करते हैं। यदि चंद्रमा आठवें हो तो बच्‍चा बचपन में ही मां से दूर हो जाता है। जबकि मजबूत चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे मां का भरपूर सुख और प्‍यार पाते हैं। वे या तो बडे या इकलौते होते हैं , जिनपर मां का पूरा ध्‍यान होता है।

वृष लग्‍न के कमजोर चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे भाई बहन से संबंधित कष्‍ट या बुरा अनुभव बचपन में ही प्राप्‍त करते हैं। यदि चंद्रमा षष्‍ठस्‍थ हो , तो उनका भाई बहन से बहुत झगडा होता है। इस लग्‍न में मजबूत चांद में बच्‍चे का जन्‍म हो , तो बच्‍चों का भाई बहन के साथ अच्‍छा संबंध होता है।

मिथुन लग्‍न में कमजोर चांद में जन्‍मलेनेवाले बच्‍चे बाल्‍यावस्‍था में अपने को साधनहीन समझते हैं , जबकि मजबूत चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे अपने को साधन संपन्‍न और सुखी।

कर्क लग्‍न में कमजोर चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे बाल्‍यावस्‍था में शरीर से कमजोर होते हैं , जबकि मजबूत चांद में जन्‍म हो तो वे शरीर से काफी मजबूत होंगे।

सिह लग्‍न के बच्‍चे , जिनका चंद्रमा कमजोर हो , बचपन में अभाव महसूस करते हें , किन्‍तु मजबूत चांद वाले बच्‍चों के उपर बहुत खर्च किया जाता है । पर यदि इनके लग्‍न में सूर्य हो , तो कभी कभी इन्‍हें भी गंभीर शरीरिक कष्‍ट का सामना करना पडता है।

कन्‍या लग्‍न में कमजोर चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे स्‍वयं को किसी प्रकार की लाभप्राप्ति के लिए कमजोर पाते हैं , जबकि मजबूत चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे को किसी प्रकार का लाभ आसानी से मिल जाता है।

तुला लग्‍न में कमजोर चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चों को उपेक्षित दृष्टि से देखा जाता है , जबकि इसी लग्‍न में मजबूत चांद में जन्‍म लेनेवालों को बहुत ही महत्‍वपूर्ण समझा जाता है और उनका पूरा ख्‍याल भी रखा जाता है।

वृश्चिक लग्‍न में कमजोर चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे अपने को अभागा और कमजोर महसूस करते हैं , जबकि मजबूत चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे अपने को भाग्‍यशाली और हिम्‍मतवर समझते हैं।

धनु लग्‍न में कमजोर चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे अपने जीवन को बंधा बंधा सा पाते हैं , जबकि मजबूत चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चों का जीवन बहुत ही सुखमय होता है।

मकर लग्‍न में कमजोर चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे दोस्‍तों का अभाव महसूस करते हैं , पारिवारिक माहौल भी अच्‍छा नहीं पाते हें वे , पर मजबूत चांद में जन्‍म लेनेवालो की पारिवारिक स्थिति संतुष्टि देनेवाली होती है , दोस्‍ती करने में भी वे माहिर होते हैं।

कुंभ लग्‍न में कमजोर चंद्रमा में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चों को बाल्‍यावस्‍था में गंभीर शरीरिक कष्‍ट होता है। ये बहुत ही अधिक बीमार पडते हैं। मजबूत चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चों में रोगप्रतिरोधक क्षमता होती है और उनका बचपन अच्‍छी तरह व्‍यतीत होता है।

मीन जल्ग्‍न में कमजोर चांद में जन्‍मलेनेवाले बच्‍चे प्रारंभ में मंदबुद्धि के होते हें1 किन्‍तु यही चांद मजबूत हो तो बच्‍चे अपनी तेज बुद्धि के कारण परिवार के सदस्‍यो के विशेष प्‍यार को प्राप्‍त करते हैं।

इस प्रकार 12 वर्ष तक के बच्‍चे की सफलता , असफलता , मानसिक स्थिति और अन्‍य प्रकार के व्‍यवहार का मुख्‍य कारण चंद्रमा ही होता है। आज के युग में चूंकि अभिभावक बच्‍चों के क्रियाकलापों के प्रति अधिक जागरूक और बच्‍चों के चहुंमुखी विकास के लिए प्रयत्‍नशील हैं , अमावस्‍या के आसपास जन्‍म लेनेवाले बच्‍चों के व्‍यवहार से क्षुब्‍ध हो जाते हैं , पर ऐसा नहीं होना चाहिए। ‘होनहार वीरवान के होत चिकने पात’ को गलत साबित करते हुए छोटे चांद में जन्‍म लेनेवाले बहुत सारे बच्‍चों को बाद में असाधारण कार्य करते हुए देखा गया है , जिसके बारे में अगले लेख में चर्चा की जाएगी।


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बडा ढैया और छोटा ढैया

ज्‍योतिष में विश्‍वास रखनेवाले सभी लोगों को एक बडे ढैया की जानकारी अवश्‍य होगी , जो ढाई वर्षों तक अपना प्रभाव न सिर्फ बनाए रहता है , वरन बहुत ही बुरी हालत में लोगों को जीने को विवश भी कर देता है। हालांकि इसकी सही गणना कर पाने में परंपरागत ज्‍योतिषी अभी तक सक्षम नहीं हो सके हैं कि वास्‍तव में किसी जातक पर ढैया का प्रभाव कब से कब तक पडेगा , फिर भी इस ढैया को लेकर जनमानस में बडा भय देखने को मिलता है। 
ज्‍योतिषीय द़ृष्टि से भी ढाई वर्षों के इस महत्‍व का कारण बिल्‍कुल वैज्ञानिक है। शनि को आसमान के चारो ओर के 360 डिग्री को पार करने में 30 वर्ष लगते हैं और इस हिसाब से 30 डिग्री की एक राशि को पार करने में ढाई वर्ष। इन ढाई वर्षों में शनि बिल्‍कुल एक सा स्‍वभाव रखता है , शनि भी सारे संसार पर एक सा प्रभाव नहीं डालता है , वरन यह कि इन ढाई वर्षों मे वह किसी का भला , तो किसी का बुरा भी कर सकता है। आकाशीय पथ के अंडाकार होने के कारण ये ढैया कभी कभी मात्र दो ही वर्ष और कभी कभी तीन वर्ष तक अपना प्रभाव जनसामान्‍य पर दिखाते हैं। सबसे बडी बात यह है कि इस ढैया का प्रभाव सभी लोगों पर एक सा नहीं पडता है। किसी किसी व्‍यक्ति पर छोटी और बडी असफलता देने में इसकी बडी भूमिका बनी रहती है , पर कभी कभी तो यह बडा अनर्थ भी कर डालता है।
shani ki dhaiya kya hai
shani ki dhaiya kya hai


अपने व्‍यतीत किए गए जीवन पर गौर करें। यदि लगातार तीन वर्षों तक किसी प्रकार का सुख या दुख आपके जीवन में आया था , तो समझ जाएं , वह शनि ग्रह के ढैया का ही प्रभाव था। मोटा मोटी रूप में देखा जाए तो बुरे तौर पर इसका प्रभाव मानव जीवन में एक बार 17 वर्ष से 19 वर्ष की उम्र में तथा दूसरी बार 46 वर्ष से 48 वर्ष की उम्र में दिखाई पडता है। तो यदि आप उम्र के इन्‍हीं पडावों पर हैं , तो सावधान रहें , शनिदेव आपपर कभी भी प्रभावी हो सकते है। आपके जीवन का हर पक्ष गडबड नहीं होगा , केवल उसी पक्ष की गडबडी आएगी , जिसका स्‍वामी आपकी कुंडली में शनि है।

जब किसी की जन्म कुंडली और गोचर में लगातार तीन राशियों में चलने वाला शनि के मध्य का तालमेल बिगड़ता है तो साढ़ेसाती की संभावना बनती है। जिसका दशाकाल चल रहा हो ग्रह पॉजिटिव हो उससे सम्बंधित अच्छा फल भी मिलता है और शनि जिस भाव का स्वामी है उसका बुरा फल मिलता है। जिसका दशाकाल चल रहा हो ग्रह नेगेटिव हो उससे सम्बंधित बुरा फल भी मिलता है और शनि जिस भाव का स्वामी है उसका बुरा फल मिलता है। 

हो सकता है , आपमें से अधिकांश लोगों का ध्‍यान इस बात पर नहीं गया हो कि छोटी छोटी कई प्रकार की समस्‍याओं से हमें लगातार ढाई दिनों तक रू ब रू होना पडता है। चाहे हमारे शरीर के किसी भी अंग में इंफेक्‍शन हो या किसी तरह की चोट का दर्द , बूढे बुजुर्गो को हमेशा ही कहते सुना है ढाई दिनों में ठीक हो जाएगा । सचमुच ही ढाई दिनों में ये समस्‍याएं समाप्‍त हो जाती हैं , चाहे इसके लिए एलोपैथी , होम्‍योपैथी , आयुर्वेदिक या घरेलू किसी भी तरह की दवाओं का उपयोग किया जाए , दवा का प्रयोग नहीं करने पर भी ये समस्‍याएं अपने शरीर के रोग प्रतिरोधक क्षमता से ही ठीक हो जाती है। यदि कोई लम्‍बी बीमारी हो , तो भी ढाई दिनों के उपरांत उसकी तीव्रता में कमी देखने को मिलती है। सिर्फ शारीरिक ही नहीं , मानसिक , बौद्धिक , घरेलू एवं अन्‍य प्रकार की समस्‍याएं भी ढाई दिनों अधिक विकट रूप में दिखाई पडती है। पूर्व की घटनाओं पर ध्‍यान दें , तो आपने भी आम जीवन में अनेको बार ढाई दिनों के अंतराल को एक सा पाया होगा। 

जिस तरह बडे ढैया के लिए शनि ग्रह को जिम्‍मेदार माना जाता है उसी तरह छोटे ढैया के लिए चंद्रमा जिम्‍मेदार है । इन ढाई दिनों को छोटा ढैया कहा जा सकता है। नाम के अनुरूप ही इसका प्रभाव भी छोटा ही होता है। ज्‍योतिषीय द़ृष्टि से भी बडे ढैया की ही तरह ढाई दिनों के इस महत्‍व का कारण बिल्‍कुल वैज्ञानिक है। पूरे आसमान के 360 डिग्री को जब 12 भागों में विभक्‍त किया जाता है , तो 30 डिग्री की एक राशि निकलती है। चूंकि चंद्रमा को पूरे 360 डिग्री का चक्‍कर लगाने में 28 दिन लगते हैं ,इस हिसाब से इस 30 डिग्री की एक राशि को पार करने में ढाई दिन ही लगने चाहिए। इन ढाई दिनों में चंद्रमा का एक सा स्‍वभाव रहता है , इसका मतलब यह नहीं कि वह सारे संसार पर एक सा प्रभाव डालता है , वरन यह कि इन ढाई दिनों मे वह किसी का भला , तो किसी का बुरा भी कर सकता है। आकाशीय पथ के अंडाकार होने के कारण ये ढैया कभी कभी मात्र दो ही दिन और कभी कभी तीन दिन तक अपना प्रभाव जनसामान्‍य पर दिखाते हैं। कभी कभी ये ढाई दिन बिल्‍कुल सामान्‍य भी होते हैं।

अपने.अपने जन्मकुंडली के हिसाब से हर व्यक्ति इस योग की तीव्रता में भिन्नता महसूस करेंगे , किसी को बड़े , तो किसी को छोटे रूप में उपलब्धि या संकट मिलते हैं , यह निर्णायक दिन होता है।



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कोरोना पर विजय प्राप्त करने हेतु जन जागरूकता ही एकमात्र विकल्प।

how to prevent coronavirus 


मैंने पिछले पोस्ट में कोरोना के संदर्भ में 22 मार्च की तिथि का उल्लेख किया था क्योंकि इसी दिन बुध ग्रह गति साम्य हो रहा था जिससे इस बात की सूचना मिल रही थी कि पिछले साल नवंबर के अंत में शुरू होनेवाली किसी भी तरह की व्यक्तिगत या सामूहिक समस्या, 22 मार्च के पश्चात समाधान की दिशा में आगे बढ़ेगी। प्रधानमंत्री जी ने कोरोना के गंभीर संक्रामक स्वभाव को भलीभांति समझा और ठीक 22 मार्च को ही 'जनता कर्फ्यू' के अलावा एक के बाद एक बहुत सारे कड़े और ऐतिहासिक फैसले लिए। अगर इस वायरस के संक्रमण के मूल स्वभाव को हमारे देश की जनसंख्या की दृष्टि से देखा जाए तो ये सभी फैसले बहुत जरूरी थे। 22 मार्च को बढ़ने जो की रफ्तार थी, आज 6 दिनों के बाद भी लगभग प्रतिदिन वही है। अगर आप गौर करेंगे तो पाएंगे कि 14 मार्च के मेरे आर्टिकल पढ़नेवाले सभी पाठक 22 मार्च का इंतजार कर रहे थे और इसी तिथि के बाद से सम्पूर्ण लॉकडॉउन की स्थिति नजर आई जो इसके पहले बिल्कुल सामान्य थी। ज्ञात हो कि ज्योतिष विषय पर आधारित कोई भी भविष्यवाणी आंकड़ों के बजाय लोगो की मानसिक अवस्था को दर्शाता है। सम्पूर्ण देश ने प्रधानमंत्री जी के फैसले का स्वागत किया और इसके अपार समर्थन की झलक हमे जनता कर्फ्यू के दिन देखने को मिला।

how to prevent coronavirus
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इतने बड़े देश में मरीजों की इतनी संख्या का बढना बिल्कुल स्वभाविक खासकर तब जबकि रोग इतना संक्रामक हो और पूरा विश्व इससे जूझ रहा हो। फिर भी ऐसे सभी मरीजों और इनके साथ रहने वालों की पहचान और क्वारंटाइन किया जाना बेहद जरूरी है। ऐसे संकट के दौर में अभूतपूर्व फैसलों के लिए प्रधानमंत्री की जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है, बढ़ने की रफ्तार को स्टैगनेंट कर पाने में सफल रहे हैं लेकिन अब भारत के हर नागरिक का भी कर्तव्य है कि वे भी अलग-थलग रहकर इस बीमारी को कम करने में अपना सहयोग देते रहें। फासला रखकर अन्य लोगों को भी जागरूक बनाएं। इसके अलावा प्रतिदिन बढ़ने वाली संख्या पर गौर करते रहें, जैसे ही प्रतिदिन नए केस की संख्या सौ से अधिक होने लगे तो अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत पड़ेगी, इसे रोकने के लिए हर नागरिक लापरवाही बरतने वालों को समझाए या इन्हे रोकने में प्रशासन की मदद ले। लॉकडाउन की स्थिति में बड़ी तादाद में लोगों के पलायन की भी खबरें आ रही हैं, जो जहां तक पहुंचे हैं, स्थानीय प्रशासन/राजनेताओं को उनके स्वास्थ्य एवं संसाधन की अस्थाई व्यवस्था की जिम्मेवारी लेनी चाहिए।


मैं 'गत्यात्मक ज्योतिष' का जन्मदाता और समय विशेषज्ञ हूँ तथा पिछले 50 वर्षों से अधिक समय से ज्योतिष मेरा कार्यक्षेत्र रहा है। परम्परागत ज्योतिष के प्राचीनतम सभी प्रतिपादित नियमों एवं सिद्धांतो के अध्ययन के पश्चात इनके गैर जरूरी पक्ष को दरकिनार करते हुए ज्योतिष के एक नए वैज्ञानिक स्वरूप 'गत्यात्मक ज्योतिष' को स्थापित किया है। 1971 में ज्योतिष से सम्बंधित मेरा पहला लेख शक्ति नगर, दिल्ली से प्रकाशित हुआ था और फिर लेखन का सिलसिला अनवरत जारी रहा है। 'गत्यात्मक ज्योतिष' ही फलित ज्योतिष की एकमात्र ऐसी विधा है जो विश्वास पूर्वक तिथि संयुक्त भविष्यवाणी कर पाने में सक्षम है और इसका प्रमाण कई बार आपको मिल चुका है।


यूं तो चीन के कोरोना वायरस की चर्चा बहुत दिनों से हो रही थी। विश्व के विभिन्न भागों में इसकी विभीषिका का तांडव सुनता और समझता आ रहा था। जनवरी के अंत में केरल में इक्के दुक्के केस से इसकी शुरुआत एवं मार्च के प्रारम्भ से ही यह भारत के अन्य भागों में भी दस्तक देना शुरू कर दिया था। प्रतिदिन धीमी गति से कोरोना अपना पैर पसार रहा था। जब मैं 14 मार्च को कोरोना से सम्बन्धित पहला आर्टिकल पोस्ट कर रहा था उस समय भारत में मरीजों की संख्या 96 थी। किसी ने पूछा, भारत में इसकी रोकथाम कब से हो सकेगी? मैंने सहज भाव से कहा - 22 मार्च से इसकी रोकथाम के लिए आवश्यक कदम उठा लिए जायेंगे और मरीजों की बढ़ने वाली संख्या में कमी होने लगेगी। तब मुझे मालूम नहीं था कि कोरोना का विस्तार अलग-अलग चरणों में अलग-अलग तरह से होता है।


विदेशों में भी जहां आज लाखों की तादाद में इसके शिकार हुए हैं इसका प्रारम्भ एक-दो से ही हुआ था और तीसरे-चौथे चरणों में ये लाखों की संख्या में पहुंच गए। दरअसल पहले और दूसरे चरण में इसका प्रसार एरिथमेटिक प्रोग्रेसन की तरह होता है जैसे 1, 2, 3, 4 की तरह या 1, 11, 21, 31, 41 आदि की तरह, ऐसा होने पर मरीजों की संख्या लाखों तक नहीं पहुंचती। मैं भी इसी रफ्तार की बात सोच रहा था। यह मुझे पक्का विश्वास था कि इस खतरनाक बीमारी को रोकने के लिए सरकार की तरफ से कोई न कोई कदम अवश्य उठाया जायेगा जिससे मरीजों की संख्या 22 मार्च के बाद कम होने लगेगी। लेकिन जब मुझे मालूम हुआ कि कोरोना का असली प्रसार तीसरे-चौथे चरण में बहुत तेजी से होता है तो उसे जानकर किसी की भी रूह कांप जाए। उदाहरण के लिए अगर पहले सप्ताह मरीजों की संख्या लगभग 100 के आसपास दूसरे सप्ताह 1000 तीसरे सप्ताह 10000 चौथे सप्ताह 1 लाख हो जाता तो इस प्रकार से बढ़ने के रफ्तार को ज्योमेट्रिकल प्रोग्रेसन से बढ़ने की प्रक्रिया कहते हैं। अगर भारत में इस रफ्तार से मरीजों के बढ़ने की बात होती तो यहां की जनसंख्या और मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर को देखते हुए भारतवासियों के लिए बहुत दुर्भाग्य की बात होती।


22 मार्च के पश्चात पुनः 1 या 2 अप्रैल भी एक ऐसी तिथि है जहां इस संदर्भ में कुछ और स्पष्टता और वर्तमान पैटर्न में कुछ परिवर्तन की उम्मीद की जा सकती है, जो हम सभी की आगे की दशा और दिशा तय करेगी। इस वायरस के संक्रामक प्रसार और सरकार द्वारा किए जा रहे सघन प्रयास के बीच रस्साकस्सी में मानवता की जीत सुनिश्चित करने के लिए हम सभी को कुछ दिनों तक काफी संयमित रहने की जरूरत है क्योंकि थोड़ी भी लापरवाही बहुत ही भयावह दृश्य उत्पन्न कर सकती है। जन जागरूकता ही एकमात्र ऐसा विकल्प है जिससे इस मुसीबत पर काबू पाया जा सकता है। कोरोना के सम्पूर्ण स्वभाव को समझते हुए इसकी समाप्ति पर कोई भविष्यवाणी करना कठिन है लेकिन ऐसा लगता है, जनजीवन की जीवन शैली में अकस्मात कोई सुधार की अपेक्षा नहीं करते हुए देश के एक-एक नागरिक को जागरूक होकर कम से कम एक महीने तक काम करना होगा। क्रमिक सुधार स्वयं होता चला जायगा।

कोरोना लॉक डाउन में आसानी से बनाये खाये ------

रविवार, 29 मार्च 2020

online jyotish

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online jyotish - Assuming the earth in the centre the 360 degrees of whole universe is divided into 12 equal parts by which all rashis become of 30 degree each. All these rashis are called Aries, Taurus, Gemini, Cancer, Leo, Virgo, Libra, Scorpio, Sagittarius, Capricorn, Acquarius and Pisces. Three rashis are importantly considered in any horoscope. Firstly the rashi in which the sun of the native situated is considered as sun rashi. Next rashi in which the moon of the native situated is considered as moon rashi. The rashi which is rising in the eastern horizon at the time of the birth of the native is importantly considered as Lagna rashi. All those people getting birth in the duration of one month fall under the one sun rashi while all those people getting birth in the duration of around two and a half day fall under the one moon rashi.


We often see rashiphal in almost all the news papers and magazines these days. In some magazines predictions are described as per sun rashi while in some other magazines these are described as per moon rashi but these are all unscientific while millions of people get in trap of it in vain. If lagna rashiphals are got to be started instead of sun rashiphal and moon rashiphal, then readers will be benefitted very much because if the difference is there of merely two hours in the births of two natives, then the one difference is sure to be there of change of ascendant while in moon rashi that difference takes place around after two and a half day (the natives being born during this period falls under the same moon rashi) and in sun rashi such a change takes place after a month (the natives being born during this period falls under the same sun rashi). But since the readers are unaware of their own ascendants, astrologers manage to get the rashiphal published in the magazines and newspapers for the public to avail it easily but it puts a question mark in the scientificness of astrology.


Any type of time bound accurate prediction can be done on the basis of ascendant of a person but there might be difference in the intensity for several persons. The lagnaphal written for some particular month will be the same for billions of people of that particular lagna although there might be some difference in level, environment, circumstances and some difference relative to their birth time planets. For instance, in some particular time for some ascendant the profit of a labourer can be rupees 25 to 50 while for a businessman such profit can be in millions of rupees. Such type of prediction can be made on the basis of ‘Gatyatmak Gochar Pranali’.
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