सोमवार, 27 अक्तूबर 2008

आइए , हम भी इस पावन त्‍यौहार दीपावलि पर एक संकल्‍प लें ( Astrology )



अभी त्‍यौहारों का मौसम चल रहा है। सप्‍ताह दस दिन इनकी प्रतीक्षा में गुजरते हैं , अच्‍छी खासी व्‍यस्‍तता के मध्‍य ही त्‍यौहार दस्‍तक देता है और कब खिसक जाता है , यह पता भी नहीं चलता। त्‍यौहार तो हम सभी मना लेते हैं , नए कपडे पहनकर , मिठाइयां खरीदकर , भगवान की पूजा कर ,पकवान बनाकर खाकर , पर क्‍या हमें यह अहसास है कि भारतवर्ष में मनाए जानेवाले लगभग सभी त्‍यौहारों के पीछे हमारे पूर्वजों की बडी सोंच समझ रही है ? कार्तिक की घनी अंधेरी रात को दीए की रोशनी की जगह रंगीन बल्‍वों की रोशनी का प्रयोग कर संसार को जगमगाते देखना आज मात्र परंपरा बन गया हो , पर अंधकार पर प्रकाश की विजय के इस त्‍यौहार को मनाने के पीछे भी बडा लक्ष्‍य था उनका। अपनी सम्मिलित शक्ति से अंधकार को प्रकाश में बदल देना उनमें एक हिम्‍मत जगाता , जो प्रकृति की या अन्‍य प्रकार की चुनौतियों से लडने में उनकी मदद करता था। आइए , हम भी इस पावन त्‍यौहार दीपावलि पर एक संकल्‍प लें कि हम चुनौतियों से नहीं घबडाएंगे और किसी भी प्रकार के अंधकार को प्रकाश में बदलने के लिए इसी तरह एकजुट हो जाएंगे , जैसा कि हम इस रात्रि को प्रकाशमान करने के लिए करते हैं ।

हिन्‍दी ब्‍लाग जगत के प्रबुद्ध लेखकों , पाठकों एवं उनके परिवारों और मित्रगणों को परम मंगलमय त्‍यौहार दीपावलि की बहुत बहुत शुभकामनाएं।
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