सोमवार, 23 मार्च 2009

क्‍या प्रश्‍नकुंडली से सही भविष्‍यवाणी की जा सकती है ? ( Astrology )

बहुत सारे ज्योतिषी मूल कुंडली के अभाव में प्रश्नकुंडली से ही यजमानों की समस्याओं को समझने की चेष्‍टा करते हैं और उनकी समस्याओं का समाधान भी करते हैं। मूल कुंडली के अभाव में प्रश्नकुंडली की विवेचना भलमनसाहत के साथ ही साथ एक सद्प्रयास की बात हो सकती है , किन्तु इसके माध्यम से वस्तुत: उद्देश्य-पूर्ति में कामयाबी भी मिलती होगी , इसपर मुझे संदेह है। इस प्रकार की प्रक्रिया अपनाकर ज्योतिशी किसी न किसी प्रकार की उलझन में ही फंसते चले जाते हैं। जब हजारों वर्षों के प्रयास से आजतक फलित ज्योतिष का जितना विकास हुआ है , उससे मूल कुंडली की ही सही व्याख्या और घटनेवाले घटनाओं के सही समय की जानकारी नहीं दी जा सकती है , तो प्रश्नकुंडली से क्या सही कहा जा सकता है , यह सोंचनेवाली बात हो सकती है ?


मूल कुंडली किसी भी व्यक्ति के समग्र चरित्र , विचारधाराओं , मूल प्रवृत्तियो , संस्कार , कार्यक्षमता , मंजिल , संसाधन और सुख-दुख का परिचायक होती है। जन्मकालीन ग्रहों की स्थिति और गति सर्वदा प्रकृति के भिन्न और अनोखे स्वरुप का ही प्रतिनिधित्व करती है। प्रकृति या शिव का स्वरुप प्रतिक्षण बदलता है। प्रकृति का स्वरुप शाश्वत होते हुए भी अनंतस्वरुपा है। एक बार जो दिखाई पड़ा , उसे पुन: देख पाना काफी कठिन है। अत: प्रश्नकुंडली के द्वारा व्यक्ति की मूल कुंडली की व्याख्या या मौलिक विशेषताओं का एक अंश भी सही चित्रण कर पाना काफी कठिन होगा। प्रश्नकुंडली बनाकर ज्योतिशी निश्चित रुप से अपने उद्देश्य पूर्ति में 12 लग्नों के बीच के एक लग्न का चयन कर लेते हैं और उसे ही उस जातक की नियति समझ बैठते हैं , फिर वही संभावना और लॉटरी की चर्चा हो गयी , जिससे आजतक फलित ज्योतिश गुमराह होते हुए कश्टकर परिस्थितियों से गुजर रहा है। लॉटरी से संबंधित भाग्यफल जैसा कि मैने पहले ही कहा है , आहत और व्याकुल मन की शांति के लिए अस्थायी राहत प्रदान करने वाला हो सकता है , किन्तु किसी भी हालत में पक्की और स्थायी भविष्‍यवाणी का सशक्त आधार नहीं हो सकता।

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