बुधवार, 25 मार्च 2009

क्या भारतीय नेता अंधविश्वासी होते जा रहे हैं ? ( Astrology )

पत्रिकाओं में पढ़ने को मिला कि भारत के अधिकांश नेता अंधविश्वासी होते जा रहे हैं , जिन्हें देखकर वैज्ञानिकों को बहुत चिंता हो रही है। वैज्ञानिकों के अनुसार वे समाज को जो संदेश दे रहे हैं , उससे समाज के अन्य लोगों के भी अंधविश्वासी बन जाने की संभावना है। मैनें पढ़ा , तो अचंभा हुआ , नेता और अंधविश्वासी ? अरे अंधविश्वास तो गरीबों , निरीहों और असहायों का विश्वास है , जो उन्हें जीने की शक्ति देता है। अधिकांश रिक्शाचालक मौका मिलने पर भी यात्री का सामान लेकर चंपत नहीं होते। अधिकांश नौकर मालिक की एक अठन्नी का भी स्पर्श नहीं करते। अधिकांश नौकरानियॉ अपने अय्याश मालिक के द्वारा दिए गए लालच को ठुकरा देती हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि उनका दिमाग अंधविश्वासी है और वे अगले जन्म में मिलनेवाले फल के भय से उपरोक्त पापों को अंजाम न देने को कृतसंकल्प हैं। वे न सिर्फ अपने हक की कमाई से ही जीने की सामर्थ्‍य रखते हैं , वरन् अपनी छोटी-मोटी उपलिब्घयों से ही खुश होकर अपने सामर्थ्‍यानुसार ढाई , पॉच या ग्यारह रुपए का चढावा लेकर निर्मल मन से मंदिर में पहुंच जाते हैं। इनकी तुलना भला नेताओं से की जा सकती है ?

नेताओं को न तो अपने क्षेत्र की जनता के लिए कुछ काम करने की चिंता है और न ही उनके पैसों का घोटाला करने पर भय। लूट-मार-हत्या तो इनकी आगे बढ़ने की सीढ़ी ही हैं। इनका दामन थामें बिना वे तो वे तरक्की ही नहीं कर सकते। इन पापों को करते वक्त वे अगले जन्म की क्या ,अगले चुनाव तक की चिंता नहीं करते। अनुचित ढंग से हासिल किए गए असीमित पैसों की बदौलत वे पुन: भगवान का आशीर्वाद , जनता की मुहब्बत और अपनी गद्दी --- सबकुछ प्राप्त कर लेने का दुस्साहस रखते हैं। वैज्ञानिक भले ही चिंतित हों कि नेताओं के ज्योतिश , धर्म और अन्य अंधविश्वासों के प्रति रुचि के उपस्थित होने से जनसामान्य पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है , पर मै आश्वस्त हूं , इन नेताओं के कर्मों से समाज की सोंच का क्षेत्र व्यापक हो रहा है।

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