सोमवार, 6 अप्रैल 2009

भविष्‍य को अनिश्चित और रोमांचक ही रहने दिया जाए ?

फलित ज्‍योतिष की विवादास्‍पदता के लिए जो मुख्‍य बात जिम्‍मेदार है , वह यह कि यदि भाग्‍य से ही हमें सबकुछ प्राप्‍त होना या न होना लिखा है तो फिर कर्म करने का क्‍या फायदा ? हमने हमेशा ही लोगों को समझाया है कि हमें जन्‍म के बाद और जीवनपर्यंत जिन परिस्थितियों का सामना करना पडता है , वह हमारा प्रारब्‍ध है , पर हम अपने सोंच , अपनी मेहनत और अपने क्रियाकलापों के द्वारा जो प्राप्‍त करते हैं , वह परिणाम होता है। जन्‍म के पूर्व और तुरंत पश्‍चात् सभी बच्‍चों के स्‍वास्‍थ्‍य , व्‍यवहार या माहौल में असमानता प्रारब्‍ध को सिद्ध करने के लिए काफी है। पर यह भी सच है कि हम पिछले जन्‍म के कर्म से अपने भाग्‍य में जो कुछ भी लेकर आते हैं और जन्‍मकुंडली के द्वारा उसे जानने का प्रयास करते हैं , उसे मेहनत से बढाया या घटाया जा सकता है और इसे हर स्‍तर तक ले जाया जा सकता है। इसमें प्रारब्‍ध का कोई वश नहीं , यह सिर्फ हालात पैदा करने भर के लिए उत्‍तरदायी है।

मान लिया कोई व्‍यक्ति अपने भाग्‍य में काफी मजबूत शरीर लेकर आया है , पर वह उसपर और अधिक ध्‍यान दे , तो शरीर की मजबूती बढते हुए उसे किसी भी स्‍तर तक ले जाकर उसे इनाम पाने का हकदार बना सकती है। इसी प्रकार यदि वह भाग्‍य से कमजोर शरीर लेकर आया है , तो जहां सावधान रहने से उसकी कमजोरी उसे कम परेशान करेगी , वहीं सावधान न होने से यह अधिक तकलीफदेह हो जाएगी , उससे संबंधित महत्‍वाकांक्षा तो वह रख ही नहीं सकता है , क्‍योंकि महत्‍वाकांक्षा भी अपने शरीर की मजबूती को देखकर ही की जा सकती है। इसी प्रकार धन और संपत्ति का मामला है , भाग्‍य से धन और हर प्रकार की संपत्ति की प्राप्ति की एक निश्चित सीमा होती है , पर कर्म से उसे अनिश्चित की ओर ले जाया जा सकता है।


किसी किशोर में प्रकृति प्रदत्‍त प्रतिभा है , हर बात को सीखने समझने की प्रवृत्ति है , पर सामाजिक माहौल न मिल पाने से उसका बौद्धिक विकास ढंग से नहीं हो सकता है। आखिर पाकिस्‍तान के सभी बच्‍चों का जन्‍म तो भारत में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चों से अलग समय पर नहीं होता होगा ? उनकी जन्‍मकुंडली तो भारत के बच्‍चों से अलग नहीं होती होगी , पर क्‍या कारण हो सकता है कि बच्‍चे की प्रतिभा का या तो उपयोग ही नहीं हो रहा या फिर उपयोग गलत क्षेत्र में हो रहा है। यह उस देश की परिस्थितियों का दोष है , इसे कर्म से सुधारा जा सकता है। भारत के युवा अगर प्रतिभा में वैश्विक स्‍तर के हैं , तो वह यहां की शिक्षा प्रणाली के कारण हैं , सिर्फ भाग्‍य के कारण नहीं। इसी प्रकार जीवन जीने का अलग अलग ढंग पर भी विशेष क्षेत्र या युग का प्रभाव देखा जा सकता है। इसलिए कर्म करने से इंकार तो नहीं किया जा सकता।

लोगों का यह भी मानना है कि भविष्‍य सिर्फ आनंददायक ही नहीं होता , इसमें उलझनें भी होती है , कठिनाइयां भी होती हैं , तो क्‍यों न इसे अनिश्चित और रोमांचक ही रहने दिया जाए। इसे भी सही माना जा सकता है , पर फिर भी भविष्‍य की परिस्थितियों को जानना सबके लिए आवश्‍यक है , क्‍योंकि भविष्‍य में उपस्थित होनेवाली सफलताओं की जानकारी जहां वर्तमान कठिनाइयों से लडने की शक्ति देती है , वहीं भविष्‍य में उपस्थित होनेवाली कठिनाइयों की जानकारी अति आशावाद को कम कर , निश्चिंति को कम कर कर्तब्‍यों के प्रति जागरूक बनाती है। भविष्‍य इतना भी दृढ और निश्चित नहीं होता कि आपका रोमांच नहीं बने रहने दे , क्‍योंकि भविष्‍य को प्रभावित करने छोटा अंश ही सही , पर सामाजिक , राजनीतिक , आर्थिक , पारिवारिक परिवेश भी होता है और मनुष्‍य का खुद कर्म भी , इसलिए सबकुछ ईश्‍वर और ज्‍योतिषी पर न छोडकर कर्म करना मनुष्‍य का पहला कर्तब्‍य होना चाहिए।
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