मंगलवार, 7 अप्रैल 2009

हमारी छत एक तरह की वेधशाला ही थी ....

मेरे जीवन में भले ही ग्रह नक्षत्रों ने जन्‍म से ही प्रभाव डालना आरंभ कर दिया हो , पर ग्रह नक्षत्रों में खुद के ध्‍यान देने की कहानी कब से शुरू हुई , पूरा याद नहीं। शायद यह सिलसिला उस दिन से आरंभ हुआ हो , जिस दिन की एक घटना मुझे अक्‍सर याद आ जाती है। मेरे छत के उपर की मंजिल तैयार ही हुई थी और हमलोगों को छत के दो कमरे मिल गए थे। संयुक्‍त परिवार होने से मम्‍मी नीचे रसोई में बहुत व्‍यस्‍त रहा करती और मुश्किल से 12 या 13 वर्ष की उम्र में ही बडी बहन होने के नाते छोटे सभी भाई बहनों की जिम्‍मेदारी मुझपर ही आ गयी थी , जिन्‍हें मैं अक्‍सर छत पर ही संभाला करती थी। एक दिन अपने साथ ही साथ सब भाई बहनों को कमरे के आगे के चौडे बरामदे पर होमवर्क देकर पढने बैठाया तो मेरी नजर चांद पर पडी। पूर्णिमा का चांद पूरी छटा बिखेरता ठीक सामने पूर्वी क्षितिज पर उदित हो रहा था। दूसरे दिन पापाजी ने अभी तक पढाई शुरू न करने का कारण पूछा तो मैने उन्‍हें जानकारी दी कि मै कल के टाइम यानि चांद निकलने के बाद ही पढाई शुरू करूंगी। तब पापाजी ने समझाया कि चांद हर दिन पहले दिन की तुलना में 48 मिनट बाद निकलता है। इसका कारण पूछने पर उन्‍होने प्रतिदिन सूर्य और चंद्रमा के मध्‍य बढते अंतर और इसके कारण सूर्यास्‍त के बाद चंद्रमा के देर से होते जाने वाले उदय का अंतर स्‍पष्‍टत: समझाया। उसी दिन संभवत: मैने सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण के घटने के बारे में भी जानकारी प्राप्‍त कर ली थी , जो किताबों और स्‍कूलों में पढाए जाने के के बाद भी उतनी स्‍पष्‍ट नहीं हो सकी थी।


हमलोग पापाजी को रातभर आसमान को निहारते हुए देखता पाते। वे ग्रहों को देखते , एक ग्रह से दूसरे की कोणिक दूरी और ग्रहों की गति में अंतर ही उनके अध्‍ययन का मुख्‍य विषय था । उसके आधार पर ही वे मुहल्‍ले के एक एक परिवार में और अपने परिवार के एक एक लोगों और अपने साथ हो रही घटनाओं का तालमेल बैठाते , ग्रहों की मुख्‍य स्थितियों की मौसम ,बाजार , देश और विश्‍व की राजनीति से तुलना करते और फिर ये सब करते हुए किसी एक नियम का सत्‍यापन हो जाता। जाडे और बरसात में तो हमें इन सब के बारे में बातें करने की कोई गुंजाइश नहीं थी , क्‍योंकि हम कमरे में और वे छत पर होते थे। पापाजी से इन सब बातों के बारे में चर्चा करने का मौका हमें तब मिलता , जब गर्मियों में हमलोग सभी खुले छत के नीचे सोया करते। सामने खुला आसमान और उसमें डूबे हुए पापाजी , हमलोगों के द्वारा भी प्रश्‍नों की बौछार होती। पापाजी हम बच्‍चों की ग्रह नक्षत्रों में रूचि नहीं देखना चाहते थे , उनका कहना था कि इसने मेरा कैरियर चौपट किया ही है , अब तुमलोग अपना कैरियर बचाओ। पर दिन रात जो बात दिमाग में चल रही हो , उसका मुंह से निकलना बिल्‍कुल स्‍वाभाविक होता और इस तरह हमलोगों के समक्ष ग्रहों के किसी न किसी रहस्‍य का पर्दाफाश हो ही जाता।


आप पाठको को अभी तक इस बात की जानकारी हो ही गयी होगी कि गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष के सिद्धांत पापाजी के अपने मौलिक सोच के आधार पर विकसित किए गए हैं और इसके आधार पर भविष्‍यवाणी करने के लिए हमें प्राचीन फलित ज्‍योतिष की गणनाओं का बहुत कम सहारा लेना पडता है। आज किसी ग्रह की जो खास स्थिति बन रही है , वह फिर कब आएगी और उसका मोहल्‍ले के किस घर में, अपने घर के सारे सदस्‍यों में कैसा प्रभाव पडेगा , मौसम पर कैसा प्रभाव पडेगा , बाजार पर कैसा प्रभाव पडेगा, ये सब समझकर और फिर देखकर प्रकृति के नियमों के प्रति मन में श्रद्धा जन्‍म लेती। लोगों पर क्‍या प्रभाव पडेगा , इसके लिए जन्‍मकुडली देखने की आवश्‍यकता थी , जिसकी मुझे तब बिल्‍कुल भी जानकारी नहीं थी। इसलिए छोटी छोटी अन्‍य बातों को देखकर खुशी होती। सौरमंडल के अंदर की ही, पर धीरे धीरे मैं हर ग्रह को पहचानने लगी थी। हर ग्रह की गति को जानने लगी थी और उसके महत्‍व को समझने लगी थी। फिर पापाजी के न चाहने के बावजूद मेरा मन इसी में रमने लगा , उन्‍हीं की तरह किसी नौकरी में समय जाया करने की अपेक्षा ज्‍योतिष को विकसित करने के लिए ही समय देना जरूरी समझते हुए मैने अपना जीवन भी झोंक ही दिया । मेरी रूचि को देखने के बाद पापाजी ने मुझे कुंडली बनाना तो बहुत बाद में सिखाया। गणित में बहुत अधिक रूचि होने के कारण मैने कुंडली बनाना , लोगों का जीवनग्राफ खींचना भी बहुत जल्‍द सीख लिया और फिर भविष्‍यवाणियां करने लगी। जैसे जैसे पापाजी के सिद्धांत की सत्‍यता को प्रमाण मिलता गया , मैं दि ब दिन इसकी गहराइयों में डूबती चली गयी। आज सोचती हूं तो महसूस होता है, शायद यह सबकुछ न होता यदि हमारा छत न होता। सचमुच हमारी छत एक तरह की वेधशाला ही थी।
एक टिप्पणी भेजें