रविवार, 12 अप्रैल 2009

एक सीमा होती है भई ... आखिर कितना बर्दाश्‍त करूं ????????

कल मुझे फिर से एक ई-पत्र मिला -----------

‘’ संगीता जी,
मैं हूं कपिलदेव। साहित्य में थोड़ी रूचि है। कुछ लिखता भी रहता हं। सिर्फ ब्लाग पर नहीं। पत्र-पत्रिकाओं में भी। किताब भी प्रकाशित है। आप ने ब्लाग पर मेरी प्रोफाइल देखी ही होगी। ब्लाग मेरा असली माध्यम नहीं। मनोरंजन का एक पड़ाव है। लिखे पर प्रतिक्रिया कौन नहीं चाहेगा। मगर प्रतिक्रिया वही, जिसे पढ़ कर लगे कि किसी सहृदय-सचेत और साहित्य-विवेक सम्पन्न पाठक ने टप्पणी की है। टिप्पणी-लेखक ने जो कहा है वह हमारे काम का हो सकता है। विचारणीय। मेरे लिखे पर आप की यह दूसरी प्रतिक्रिया है। पहले जैसी ही-‘‘वाह! बहुत अच्छा !!’’वाले अंदाज में! क्या मतलब है इसका? क्या कहना चाहती हैं आप ?


आप ज्योतिर्विद हैं। ब्लागों को पर घूमते घामते यत्र तत्र ऐसी प्रतिक्रियाएं दर्ज करते रहने का मतलब मैं समझ सकता हूं। आ जिस व्यवसाय में हैं, और इस व्यवसाय नें हाईटेक माध्यमों को जिस खूबसूरती से अपना माघ्यम बनाया है, उस लिहाज से विज्ञापन का यह बुरा भी नहीं है। वुद्धिजीवी समाज में प्रवेश का सीधा और कारगर तरीका। मगर मुझे नहीं लगता कि साहित्यकारों का समाज इतना पुराणमुखी और मूर्ख होगा कि त्योतिष के झमेले में फंसेगा। दुनिया बहुत बड़ी है। दुख भी बहुत है दुनिया में। एक ऐसा समाज, जो अपनी व्यस्थागत असंगतियों के कारण श्रम का उचित मूल्य देने पाने में नाकाम हाता है, उसमें संयोगों और अनदेखे अनजाने रास्तों से धन कमाने की संभावना तलाशने की प्रवृत्ति फलती फूलती है। ज्योतिष ऐसे ही समाजो में अपना जाल फैलाता है। वैश्वीकरण नें धन कमाने के तमाम शार्ट-कट्स पैदा किए हैं। सट्टा और शेयर मारकेट तथा अन्य तरीकों से धनी होने की संभावनाओं से भरे वातावरण की रचना की है। लोभ और लालच को नए सिरे से बढ़ावा मिल रहा है। यह पूरा का पूरा वातावरण भाग्यवाद और ज्योतिष के लिए बाजार तैयार करता है। आप कितनी समझदार कि मेहनत का रास्ता छोड़ लोगों का भाग्य बांचने का रास्ता अपना लिया है। आप जो कर रही हैं, करें। लेकिन,कृप्या वाह वाह वाली दो शब्दीय टिप्पणी के बहाने से हमें अपने ज्योंतिष के भाग्यवादी जंजाल में फंसाने का प्रयास न करें। आप को कविता कितनी समझ में आती होगी,इसका अनुमान करना कतई कठिन नहीं।


कपिलदेव’’



पत्र को पढने के बाद मैने उन्‍हे इतना ही जवाब दिया ‘’काश !!आपने मेरे ब्‍लाग को अच्‍छी तरह पढा होता !!’’ क्‍योंकि मेरे पाठक कहा करते हें कि लोगों के कहे का मैं बिल्‍कुल बुरा न मानूं , चुप बैठ जाउं , पर आखिर कबतक ? मैं समझ नहीं पा रही कि मेरी गलती क्‍या है ? सिर्फ यही कि मैं ज्‍योतिष जैसे विवादास्‍पद विषय की गलतफहमी को दूर करने का बीडा उठाया है ? क्‍या लीक से हटकर काम करना एक गुनाह है ? तनाव बढता जा रहा था , अपने को पुन: सहज बनाने के लिए मुझे कुछ लिखना आवश्‍यक था , जो मैने अपने इस ब्‍लाग पर लिख ही डाला, अब यह गलत है या सही, मैं नहीं कह सकती।


‘’किसी भी विषय या विधा पर लिखूं , पर कपिलदेव जीकी तरह लिखने में रूचि मेरी भी है , सिर्फ ब्‍लाग पर ही नहीं , पत्र पत्रिकाओं में मैं भी लिखा करती हूं। पुस्‍तक मेरी भी प्रकाशित हो चुकी है , मेरी पुस्‍तक की लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि दो वर्षों के अंदर इसका दूसरा संस्‍करण प्रकाशित करवाना पडा। पर कपिलदेव जी की तरह ब्‍लाग मेरे लिए मनोरंजन का पडाव नहीं , मै इसे समाज से धार्मिक और ज्‍योतिषीय भ्रांतियों को दूर करने के अपने लक्ष्‍य के लिए बहुत बडा मंच मानती आयी हूं । कपिलदेव जी की तरह ही लिखे पर प्रतिक्रिया की आवश्‍यकता मुझे भी होती है , पर उनकी धारणा के विपरीत मैं मानती हूं कि प्रतिक्रिया देने का सबका अपना अपना अंदाज होता है। साहित्‍य शिल्‍पी पर मेरी दो कहानियां प्रकाशित हुई हैं। जहां साहित्‍य के जानकार ने इसके शिल्‍प की कमजोरियों पर प्रतिक्रिया दी , वही अन्‍य पाठको ने इसकी विषयवस्‍तु पर और अन्‍य ने रोचकता पर। आवश्‍यक नहीं कि सभी पाठक साहित्‍य की गहरी समझ ही रखें।


मैं ज्‍योतिर्विद हूं , यह तो उन्‍होने मेरे प्रोफाइल में देख लिया , पर मैं इस व्‍यवसाय में हूं , यह कैसे जान गए , मैने तो सिर्फ अपनी रूचि और अध्‍ययन मनन का ही जिक्र किया था। वे समझते हैं कि मैने अपने विज्ञापन के लिए उन जैसे साहित्‍यकारों की पोस्‍ट पर टिप्‍पणियां करती हूं , हो सकता है सही हो , आखिर अपने नाम का प्रचार प्रसार कौन नहीं चाहता ? मैं अवश्‍य चाहूंगी कि मैं जिन ब्‍लोगों पर जा रही हूं , उन ब्‍लोगों के संचालक भी मेरे चिट्ठे पर आएं ताकि मैं जीनवभर के ज्‍योतिषीय अनुभवों को उनसे साझा कर सकूं , पर वे मानते हैं कि साहित्‍यकारों का समाज इतना पुराणमुखी और मूर्ख नहीं है तो इस ज्ञान को न प्राप्‍त करने का नुकसान उन्‍हें ही होगा , मुझे कोई नुकसान नहीं हो रहा।


जहां तक धन कमाने का सवाल है , नवम्‍बर के पहले सप्‍ताह से ही शेयर बाजार की साप्‍ताहिक स्थिति के बारे में मेरी भविष्‍यवाणियों का कालम 90 प्रतिशत की सत्‍यता के साथ मोलतोल डाट इन में प्रकाशित होता आ रहा है , ऐसी हालत में धन कमाना हमारे लिए बहुत मुश्किल नहीं। पर बचपन से ही पापाजी के समक्ष बडी बडी गाडियों में आते हुए लोगों को इस कदर परेशान देखा है कि यह बात साफ हो गयी है कि धन को सिर्फ साधन होना चाहिए साध्‍य नहीं और इस मामले में खुशकिस्‍मत हूं कि जरूरत भर धन मेरे पास मौजूद है।


मेरे ख्‍याल से ब्‍लाग लिखने , सबका ब्‍लाग पढने और सबमें टिप्‍पणी कर प्रसिद्ध होने का रास्‍ता उतना आसान भी नहीं , जितना कपिलदेव जी समझते हैं। इस रास्‍ते से प्रसिद्ध होने के लिए प्रतिदिन सात आठ घंटे देने के बावजूद मुझे कम से कम छह वर्ष इंतजार करना पडेगा , जबकि इससे और छोटे बहुत से रास्‍ते हैं , जिनपर चलकर बहुत मजबूत हुआ जा सकता है , पर मेरे बचपन के संस्‍कार इसकी इजाजत नहीं देते। खैर अब तो उन्‍हें अपने ब्‍लाग में मेरे द्वारा दी जानेवाली दो शब्‍दीय टिप्‍पणी ‘वाह !! बहुत अच्‍छा !!’ वाले अंदाज में नहीं मिलेगी , कोई और ब्‍लागर ऐसी टिप्‍पणियां न चाहें , तो मुझे सूचित करें , मैं उनके ब्‍लाग में भी टिप्‍पणियां करना छोड दूंगी।


मेरे पिताजी का बहुआयामी व्‍यक्तित्‍व था , अब तो दार्शनिक हो गए हैं। गणित और विज्ञान में रूचि के कारण 1963 में बी एस सी कर रहे थे , पर उस समय भी वे कविताएं लिखा करते थे। फिर अपने साहित्‍य प्रेम के कारण उन्‍होने इंटर और बी ए का हिन्‍दी का पेपर क्ल्यिर कर फिर हिन्‍दी में एम ए किया। उनकी लिखी कविताएं अभी भी गांव में सुरक्षित ही होंगी , कभी मौका मिला तो नेट पर अवश्‍य प्रकाशित करूंगी। विज्ञान और गणित में मेरी रूचि के बावजूद विज्ञान में अपनी पढाई कायम न रख पाने से मेरे समक्ष आनर्स के लिए कला के किसी विषय को चुनने की बाध्‍यता आई तो अर्थशास्‍त्र के दो पेपर में गणित को देखकर इसे चुना , पर जब अतिरिक्‍त विषय की बारी आयी तो कला के किसी विषय को अपने लिए रूचिकर न समझते हुए मैने साहित्‍य यानि हिन्‍दी और अंग्रेजी दोनो को ही लेना उचित समझा। इतने साहित्यिक पारिवारिक माहौल मिलने और स्‍नातक स्‍तर तक हिन्‍दी की पढाई करने के बावजूद यदि मुझे कपिलदेव जी की कविता का भाव तक समझ में नहीं आ रहा होगा , जैसा कि वो समझते हैं , तो उन्‍हें अपने लिखें का दंभ नही करना चाहिए, क्‍योंकि भले ही हिन्‍दी में स्‍नातकोत्‍तर के विद्यार्थी या शोध कार्य में लगे छात्र उनकी रचना का उपयोग कर लें , पर जहां तक मैं समझती हूं , यह हमारे समाज के लिए तो कम से कम किसी काम का नहीं।‘’
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