गुरुवार, 7 मई 2009

भविष्‍यवाणी करना इतना आसान भी नहीं होता ...

'वाह मनी' के 28 अक्‍तूबर को प्रकाशित एक आलेख सेंसेक्‍स का सुपर शोमें मेरी टिप्‍प्‍णी को पढकर एक पाठक की ये प्रतिक्रिया मेरे इन्‍बाक्‍स तक पहुंची

’’वैसे तो कई बार सोचा कि आपको एक मेल लिखूं. लेकिन शायद आलस्य की वजह से ये हो न सका. मेल लिखने का कारण ये भी है कि मैं ज्योतिष को बड़ी उत्सुकता के साथ देखता हूँ. किसी के जीवन के बारे में बता देना, या फिर किसी के भविष्य के बारे में बता देना. ये एक ज्योतिषी के लिए जितना सरल काम होता है, एक आम इंसान के लिए उतना ही उत्सुक करने वाला भी होता है.


आज कमल शर्मा जी के ब्लॉग पर आपका कमेन्ट देख रहा था. शेयर बाज़ार के बारे में आपकी टिप्पणी थी कि दिसम्बर के महीने में कुछ ठीक-ठाक रहेगा. उस टिप्पणी को पढ़ते हुए मुझे लगा कि आपको आज एक मेल लिख ही लें.
मैं कभी किसी ज्योतिषी के सीधे संपर्क में तो नहीं आया लेकिन ज्योतिष को लेकर उत्सुकता बनी रहती है. किसी भी घटना के बारे में गणना करना कितना मुश्किल या फिर कितना आसान होता है? या फिर मनुष्य के कर्मों का ज्योतिष विद्या में कितना महत्व है? इन सभी बातों को लेकर उत्सुकता बनी रहती है. ।।‘’


वास्‍तव में , बिल्‍कुल अनिश्चित भविष्‍य को देखने की जिज्ञासा ने ही भविष्‍यवाणी करने की अन्‍य विधाओं के साथ ही साथ ज्‍योतिष को भी जन्‍म दिया होगा। सामान्‍य लोगों को भविष्‍य की थोडी बहुत भी जानकारी बहुत ही आकर्षित करती है और यदि एक ज्‍योतिषी किसी भी रूप में भविष्‍य पर थोडा भी प्रकाश डाल दे , तो उसके प्रति लोगों की श्रद्धा का बढना स्‍वाभाविक होता है। पर लोगों को इसके नियम न समझाकर ज्‍योतिषी(चाहे उन्‍होने ज्‍योतिष का ज्ञान प्राप्‍त किया हो या किसी प्रकार की सिद्धि) अपने को भगवान साबित करके खुद की प्रतिष्‍ठा में अभी तक चाहे जितनी भी बढोत्‍तरी करते आए हों , पर इससे ज्‍योतिष जैसे वैदिककालीन विषय के हिस्‍से प्रतिष्‍ठा का नुकसान ही आया है और उसका फल अभी तक ज्‍योतिष के क्षेत्र में समर्पित लोगों को झेलना पड रहा है। यह नहीं माना जा सकता कि सिर्फ ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ ही ज्‍योतिष के क्षेत्र में निस्‍वार्थ भाव से समर्पित है , हो सकता है कि समय समय पर और लोगों ने भी कोशिश की होगी , पर उन्‍हें भी किसी ने गंभीरता से नहीं लिया होगा। हमने अपने जीवनभर के अनुभवों में यही पाया है कि लोग एक ज्‍योतिषी से सिर्फ अपने प्रश्‍नों के उत्‍तर जानना चाहते हैं , अन्‍य बातों से उनको कोई मतलब नहीं होता।


व्‍यक्तिगत भविष्‍यवाणी के लिए परंपरागत ज्‍योतिष में कुछ फार्मूले तो हैं , जिन्‍हें परंपरागत ज्‍योतिष की पुस्‍तकों में पढा जा सकता है और किसी व्‍यक्ति के सापेक्ष भविष्‍यवाणी की जा सकती है , अब उसमें कितने प्रतिशत की सत्‍यता होती है , यह परंपरागत ज्‍योतिष के आधार पर भविष्‍यवाणी करनेवाले ज्‍योतिषी ही बतला सकते हें , क्‍यूंकि मैने भविष्‍यवाणी करने के लिए आरंभ से ही ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के सूत्रों का प्रयोग किया है । पर मैं नहीं समझती कि अन्‍य किसी क्षेत्र की भविष्‍यवाणी के लिए ज्‍योतिष की प्राचीन पुस्‍तको में कोई खास सूत्र की चर्चा की गयी हो , ताकि भविष्‍यवाणी करना आसान हो सके। जहां एक परंपरागत ज्‍योतिषी के पास मात्र ग्रहों की स्थिति की जानकारी ही होती है , वहीं एक गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिषी के पास ग्रहों की स्थिति के साथ ही साथ उसके गत्‍यात्‍मक और स्‍थैतिक शक्ति की जानकारी भी। लग्‍नकुंडली सापेक्ष व्‍यक्तिगत भविष्‍यवाणी करने के लिए ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ में अनेक सूत्र प्रतिपादित किए जा चुके हैं , जिनके आधार पर 90 प्रतिशत तक सटीक भविष्‍यवाणियां की जाती रही हैं , पर दूसरे किसी क्षेत्र की भविष्‍यवाणी करने से पहले उस खास क्षेत्र के आंकडों का विश्‍लेषण करना पडता है , ग्रहों के सापेक्ष उसकी स्थिति से तालमेल बिठाना पडता है , और तब ही संभावनाओं की चर्चा की जाती है। यदि बिना नागा संभावनाएं कई बार सही होने लगती है तो उसे सिद्धांत बना दिया जाता है , उस सिद्धांत पर आधारित भविष्‍यवाणियां 90 प्रतिशत तक सही होती हैं।


व्‍यक्तिगत भविष्‍यवाणियों के तुरंत बाद ही हमने सटीक ढंग से मौसम की भविष्‍यवाणी कर पाने के लिए अध्‍ययन आरंभ किया था। समूद्री तूफान या मैदानी चक्रवात के होने से पूरे भारतवर्ष के मौसम में अचानक परिवर्तन ला देने वाली घटना हर वर्ष छह आठ बार हुआ करती हैं। इन समयांतरालों का ग्रह सापेक्ष अध्‍ययन आरंभ किया गया और कुछ ही दिनों में इन दिनों में दो ग्रहों की खास स्थिति को देखकर अगली तिथि की भविष्‍यवाणी की जाने लगी । दो चार बार सही होने पर इसे सिद्धांत बना दिया गया। सिद्धांत बन जाने के बाद भविष्‍यवाणी करना बहुत आसान बन जाता है। इसलिए व्‍यक्तिगत के साथ ही साथ मौसम की भविष्‍यवाणी मैं बिल्‍कुल आराम से कर लेती हूं।


अभी मई के पहले सप्‍ताह में ही यह दावे से कहा जा सकता है कि 14-15जून को इस बार मानसून का आरंभ बडे ही जोरदार तरीके से होगा , यानि भयंकर गर्जन और चमक के साथ आंधी , पानी , तूफान सब एक साथ आएंगे। इसका असर दो चार दिन पहले से भी देखा जा सकता है।


इसके अलावे 2007 से ही हमने शेयर बाजार का आंकडा इकट्ठा किया है और ग्रह सापेक्ष अध्‍ययन जारी है , पर अभी तक इसे सिद्धांत नहीं माना जा सका है , क्‍योंकि भविष्‍यवाणियां कभी कभी बहुत सटीक हो जाती हैं , तो कहीं कहीं उल्‍टी भी पड जाती हैं। लेकिन फिर भी नवम्‍बर के पहले सप्‍ताह से मैं मोलतोल डाट काम में साप्‍ताहिक कालम लिख रही हूं , अबतक बहुत ही मामूली एरर दिखाई पडा है । पर इसमें एक दो ग्रहों का नहीं , शेयर बाजार के विभिन्‍न क्षेत्रों के लिए अलग अलग ग्रहों का प्रभाव देखा जा रहा है , इसलिए मौसम की तरह इसके नियम शाश्‍वत नहीं भी हो सकते तथा सिद्धांत को स्‍थापित करने के लिए काफी समय भी लग सकता है। पर दुनियाभर में आए बडे बडे भूकम्‍पों के खास तिथियों में कोई भी ग्रह अपनी स्थिति , गत्‍यात्‍मक या स्‍थैतिक शक्ति के लिहाज से समानतावाले नहीं दिखाई पडे। अभी तक भूकम्‍प से संबंधित एक छोटी सी बात पकडी गयी है , जिसे लेकर दावे के साथ भविष्‍यवाणी नहीं की जा सकती । इसी प्रकार अन्‍य क्षेत्र भी हैं , जिनमें आज तक अध्‍ययन ही नहीं किया गया , तो उस क्षेत्र में भविष्‍यवाणी नहीं की जा सकती है। लाख दिक्‍कतों के बावजूद हर क्षेत्र में हमलोगों से भविष्‍यवाणी की उम्‍मीद की जाती है , न करो तो उलाहने सुनने पडते हैं , गलत हुए तो ताने भी और सही हुए तो उसे संयोग मान लिया जाता है। समाज के इस व्‍यवहार से कष्‍ट तो बहुत होता है , पर मेरे पोस्‍ट पर हाल में दी हुई लवली जी की टिप्‍पणी से बहुत हिम्‍मत मिलती है ‘जब आपने लहरों से विपरीत तैरने का सोंच ही लिया है तो फिर घबराना कैसा ?’। बहुत बहुत शु्क्रिया लवली जी। आपलोगों का साथ यूं ही बन रहा तो मैं समाज में ज्‍योतिष के महत्‍व को सिद्ध करके अपने लक्ष्‍य को अवश्‍य प्राप्‍त कर लूंगी ।
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