रविवार, 24 मई 2009

ज्‍योतिषीय ज्ञान से धनोपार्जन करना क्‍यों अनुचित है ??????

मेरे पिताजी संपन्‍न परिवार के लडके थे , रोजी रोटी की कोई समस्‍या नहीं थी , अपनी पहचान बनाने के लिए शायद ज्‍योतिष को ही चुन लिया था और इसमें गयी उत्‍सुकता के कारण उन्‍होने अपनी सरकारी नौकरी से त्‍याग पत्र भी दे दिया था। विवाह होना ही था , सो हुआ , धीरे धीरे परिवार भी बडा होने लगा , खैर पूंजी की मजबूती की बदौलत वे खेती बारी के अलावे साइड में कुछ व्‍यावसायिक उठापटक कर अपने खर्चे निकालते रहें। दिन रात ज्‍योतिषीय अध्‍ययन मनन , विभिन्‍न पत्र पत्रिकाओं में लेखन और संपर्कों के बढते जाने के कारण झारखंड के विभिन्‍न शहरों में अपने सर्किल के बन जाने के बावजूद अपने ज्‍योतिषीय सलाहों के बदले उन्‍हें कुछ ‘लेना’ स्‍वीकार्य नहीं हुआ। जहां तक मुझे बचपन की बातें याद है , दूर दूर से अनजान लोग भी ज्‍योतिषीय सलाह लेने को आते , फी लेने का तो कोई सवाल ही न था , हमलोग चाय , नाश्‍ता के बाद ही उन्‍हें विदा करते थे।

1988 में मेरी शादी तक तो सब ठीक ठाक रहा ही , उसके बाद के दो तीन वर्ष भी सामान्‍य खर्चो निकाल पाने में विशेष दिक्‍कत न हुई , पर दूसरी बहन की शादी के लिए घर में मुद्रा की कमी से उनपर पारिवारिक दवाब पडना शुरू हुआ। तब उन्‍होने अपने ज्‍योतिषीय क्रियाकलापों को छोडकर कुछ दूसरा काम कर विवाह के लिए धन इकट्ठा करना चाहा। पर उनके धनबाद के अभिन्‍न मित्रों , खासकर ‘धनबाद जिला चैम्‍बर्स आफ कामर्स एंड इंडस्‍ट्रीज’ के अध्‍यक्ष श्री बी एन सिंह जी को यह बात बिल्‍कुल अच्‍छी नहीं लगी कि इतने ज्‍योतिषीय अनुभव रखने के बाद वे अपनी आर्थिक जरूरत के लिए कहीं और भटकें। उन्‍होने ही स्‍पेशल बुकलेट्स छपवाकर अपने पूरे सर्किल के लोगों और उनके परिवारों की जन्‍मकुंडलियां बनाने का काम पापाजी को सौंपा और फी के नाम पर 500 रू प्रति कुंडली तय किया। यह 1991 की बात है , जन्‍म विवरण के अनुसार कुंडली बनाने , ग्राफ खींचने और उसके अनुसार भविष्‍यवाणियां करने के क्रम में उस बुकलेट्स के सभी खानों को भरने में उन्‍हें छह से सात घंटे लग जाते थे , पापाजी की मेहनत को देखते हुए 1994 में ही यह फी बढाकर 1000 रू कर दी गयी। आज यह देखकर बी एन सिंह जी को ताज्‍जुब होता है कि 1991 से 1996 के मध्‍य महथाजी के द्वारा बनायी गयी जिन जन्‍मकुंडलियों में जिस तरह का ग्राफ और जिस तरह की जीवनयात्रा लिखी गयी थी , आज 12 से 15 वर्षों के बाद 80 प्रतिशत से अधिक लोगों के साथ बिल्‍कुल वैसी ही परिस्थितियां हैं।

पर उनका मन बंधे बंधाए कामों में नहीं लग पाया , 1996 में सबसे छोटी बहन की शादी के बाद आर्थिक आवश्‍यकता के समाप्‍त होते ही उन्‍होने यह काम बंद कर दिया , पर सलाह के बदले छोटी मोटी फी मिलनी शुरू हुई , जो अभी तक जारी ही है। 1999 में वे अपनी लिखी पुस्‍तकों को प्रकाशित कराने और अपने शोध को पहचान दिलाने दिल्‍ली चले गए , पर सोंचना जितना आसान था , वह न हो पाया। बैंक अकाउंट में रखे पैसे कितने दिन चलते ? वहां से लौटने की भी इच्‍छा न थी , इस कारण तुरंत वहां विज्ञापन देना शुरू किया और 60 वर्ष की उम्र के बाद ज्‍योतिषीय परामर्श के द्वारा वहां का किराया और रहने का खर्चा निकालने लगे। कहीं भी विज्ञापन का हमारा फार्मूला ‘NO SATISFACTION , NO FEE’ का होता है , इसलिए नई जगह में भी लोग हमपर अविश्‍वास नहीं कर पाते । सिर्फ फी ही लेते हैं हमलोग , क्‍योंकि हमलोग न तो रत्‍न धारण पर विश्‍वास करते हैं और न ही पूजा पाठ पर कि उस बहाने कुछ लिया जाए । पर कुछ ही दिनों में मेरे एक भाई का तबादला दिल्‍ली हुआ , फिर परिवार के सभी लोग वहीं पहुंच गए , रहने के लिए एक छोटा सा मकान भी बना लिया । 2004 से ही बेटों के द्वारा घर संभाले जाते ही वे फिर धनोपार्जन छोडकर अध्‍ययन मनन में लग गए। वैसे उनके पास कुछ लोग अभी भी आते रहते है , पर उनका ध्‍यान कभी भी कमाई की ओर नहीं होता।

इस तरह मेरे पिताजी ने 1991 से 1996 और 1999 से 2003 तक अपनी आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए ज्‍योतिष का अध्‍ययन मनन छोडकर ज्‍योतिष को प्रोफेशन के तौर पर अपनाया। आजतक यही कहा जाता आ रहा है कि ज्‍योतिष दैवी‍ विद्या है , इसका ज्ञान सबों को नहीं मिल पाता , ईश्‍वर के आशीर्वाद से ही इस ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है , इसलिए इस ज्ञान को मानव समाज की सेवा और उत्‍थान में लगाया जाना चाहिए , न कि धनोपार्जन में। आखिर ये सब भ्रांतियां है या हकीकत ? पिताजी के जीवन में मैने देखा कि जब जब आर्थिक जरूरतें आयी , उन्‍होने ज्‍योतिष के द्वारा हल कर लिया। क्‍या आप पाठकों को भी यह गलत लगता है ? यह कहां का न्‍याय है कि हम दिन रात ज्‍योतिष में माथापच्‍ची करें और पैसे की आवश्‍यकता हो तो किसी और क्षेत्र में जाएं ? आखिर हर क्षेत्र के विशेषज्ञों को धनोपार्जन की आजादी है तो ज्‍योतिषियों को क्‍यों नहीं ? हां , लोगों को गुमराह करते हुए पैसे कमाना सबके लिए गलत हो सकता है , चाहे वह डाक्‍टर , इंजीनियर , वकील , ज्‍योतिषी या व्‍यवसायी जो भी हों।
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