मंगलवार, 18 अगस्त 2009

हिन्‍दी ब्‍लाग जगत में किसी मुद्दे पर सार्थक बहस क्‍यूं नहीं हो पाती है ??

ब्‍लाग साहित्‍य है या नहीं ? कुछ दिनों तक ब्‍लोगरों के मध्‍य इस बात पर लंबी बहस चली , पर कुछ नतीजा न तो निकलना था और न ही निकला। इसी कडी के एक आलेख को पढकर मेरे दिमाग मे ये आया कि ‘यदि कुछ लोग पुस्‍तक में लिखी बातों को ही साहित्‍य मानते हैं, तो छोड दिया जाए इस बहस को। ब्‍लाग में साहित्‍य के स्‍तर की रचना होगी , तो प्रकाशक स्‍वयं उसे पुस्‍तक का रूप दे देंगे। जो पुस्‍तक बन गयी वो साहित्‍य और जो न बनी , वह ब्‍लाग , बात खत्‍म’ । लेकिन टिप्‍पणी में कह गयी ‘ब्‍लाग साहित्‍य है या नहीं यह विवाद का विषय होना ही नहीं चाहिए’ । अब क्‍यूं , यह न कह सकी तो बाद में पढनेवाले क्‍या जवाब दें। वहीं बहस को समाप्‍त होना ही है। लेकिन किसी विषय पर बहस बुरी बात तो नहीं। कोई भी दृष्टिकोण , कोई भी सोंच बुरा नहीं होता। सबके पक्ष और विपक्ष में तर्क दिए जा सकते हैं , पर देश , काल और परिस्थिति के अनुसार एक पक्ष का तर्क कमजोर और एक पक्ष का तर्क मजबूत हो जाता है। और जो मजबूत होती है , वही उस देश काल में सर्वमान्‍य हो जाती है।

पर पता नहीं , इतने बुद्धिजीवी वर्ग के होने के बावजूद हिन्‍दी ब्‍लाग जगत में जब भी कोई बहस होती है , वह तर्कसंगत नहीं होती , बस दूसरों को नीचा दिखाने के प्रयास में बेमतलब के बहस किए जाते हैं। इतनी बात तो मेरी समझ में भी आ गयी है कि प्रवीण जाखड जी को हिन्‍दी ब्‍लाग जगत के एक बडे मुद्दे पर बात करनी थी , पर इस मुद्दे को प्रस्‍तुत करने का ये कोई ढंग था। फिर भी मैने पढा , अपनी सफाई दी और उन्‍हें जन्‍माष्‍टमी की शुभकामनाएं देती हुई सो गयी। पर सुबह से शाम तक आयी टिप्‍पणियो ने मेरा मूड और खराब कर दिया। अब यदि मैं सफाई भी न दूं तो फिर मेरा ब्‍लाग लिखने का क्‍या फायदा ? कुछ दिन पूर्व अपने व्‍यक्तिगत कष्‍ट को भी आप पाठकों से बांटकर कम करने का प्रयास किया था , तो यह तकलीफ तो फिर भी आप सबसे जुडी हुई थी , न लिखने का कोई सवाल ही न था। आप सबों ने बहुत हिम्‍मत दी , आपकी टिप्‍पणियों से हौसला मिला कि आप सब साथ हैं , वरना मैं तो घबडा ही गयी थी कि मैने कोई बडी गलती कर डाली है।

बहुत सारे लोगों ने मेरे टिप्‍पणी देने के पक्ष में विचार रखें , तो टिप्‍पणी देने के विपक्ष वाले लोगों को भी अपने तर्क देने चाहिए थे , यदि उनका तर्क हमसे वजनदार होता , तो आगे मैं टिप्‍पणियां करना बंद कर देती। पर किसी ने ऐसा कोई तर्क नहीं दिया , उल्‍टा हमपर दोषारोपण करने लगें। यह कहकर कि मेरा तो विवादों में रहने का पुराना इतिहास है। उन्‍हें मैं इतनी सफाई अवश्‍य देना चाहूंगी कि मेरा इतिहास उलटकर देख लें , कभी भी मैने विवाद की शरूआत की हो। मैं तो विवादित मामलों में कभी एक टिप्‍पणी तक नहीं करती , पर क्‍या करूं , जब प्रकृति ने मुझे विवादास्‍पद विषय के अध्‍ययन को ही मजबूर कर दिया है । अब कोई मेरे बारे में अपने ब्‍लाग पर कुछ लिखेंगे , तो मुझे तो जवाब देना ही होगा । एक पाठक कहते हैं कि सत्‍य बहुत कडवा होता है , मेरे विचार से वे गलत हैं , सत्‍य बहुत मीठा होता है , यदि उसे अच्‍छे ढंग से प्रस्‍तुत किया जाए। याद है मुझे , जब कपिलदेवजी के ईमेल से व्‍यथित होकर मैने अपने ब्‍लाग पर एक पोस्‍ट डाला था। सभी टिप्‍पणीकर्ताओं ने कपिलदेव जी के विपक्ष में और मेरे पक्ष में टिप्‍पणी की थी , पर उससे अधिक प्रभाव मुझपर विष्‍णु वैरागी जी की टिप्‍पणी का पडा था , जिन्‍होने मुझे लिखा कि मुझे ईमेल की बातें सार्वजनिक नहीं करनी चाहिए थी । मैने उनको ईमेल पर ही जवाब दिया कि मैं अब से आपके कहे अनुसार ही करूंगी और उसके बाद मिलनेवाले वैसे सारे ईमेल मै नष्‍ट कर दिया करती हूं ।

सही तर्क दो तभी तो सब सुनेंगे न , अब आप तर्क देते हो कि मैं महिला हूं , इसलिए मेरे पक्ष में इतनी सारी टिप्‍पणियां मिलती है , तो आप एकदम गलत हो। विश्‍व की सर्वश्रेष्‍ठ सी ई ओ चुने जाने के बाद अपने इंटरव्‍यू में इंदिरा नूई ने कहा कि ईमानदारी से पुरूषों के समकक्ष आने में एक महिला को उनसे दसगुणा काम करना पडता है। मैंने जब से ब्‍लाग लिखना शुरू किया तब भी महिला थी , आज अचानक नहीं हो गयी हूं। पर पहले मेरे आलेखों को लोग बहुत कम पढते थे , मैने एक एक सीढी चढते हुए आज यह मुकाम हासिल किया है , वरना कौन जानता था मुझे। ब्‍लाग जगत में कदम रखे कुछ ही दिन हुए थे कि क्रिकेट मैच होने लगे । दरअसल मैच की भविष्‍यवाणियां करना हमारे लिए आसान नहीं , पर एक सिद्धांत की पकड हुई है ,जिससे किसी दिन किसी समय भारत के अधिकांश लोग खुशी या कष्‍ट में होंगे , इसका अंनुमान लग जाता है। इस आधार पर ही मैने मुंबई वाली घटना के दिन एक आलेख में भारतवर्ष के लोगों के परेशान बने रहने का जिक्र किया था। इस प्रकार से की जानेवाली मैच की भविष्‍यवाणी काफी हद तक सही होती है। लगभग तीन चार दिन मेरे बताए अनुरूप ही मैच की स्थिति रही , चौथे दिन की तो खासकर याद है , जब पूर्वोत्‍तर के किसी शहर में मैच हो रहा था , मैं भारत की खुशीवाले समय में आधे घंटे के अंतर को देखते हुए थोडी शंकित होकर आलेख लिख ही रही थी कि समाचार में बताया गया कि उस शहर में अंधेरा जल्‍दी हो जाता है , इस कारण मैच आधे घंटे पहले शुरू होगा। मैने उस आलेख के अंत में जोड दिया कि अभी अभी मिले समाचार के अनुसार मैच के आधे घंटे पहले शुरू होने की बात है , इस स्थिति में तय है कि मैच भारत के पक्ष में ही होगा और सचमुच वैसा ही हुआ । पर पांचवे दिन मेरी भविष्‍यवाणी उल्‍टी हो गयी। इसका कारण तो मुझे बाद में पापाजी से डिस्‍कशन करने पर मालूम हो ही गया कि जिस उत्‍सवी माहौल को देखकर हम भारत की जीत की उम्‍मीद करते थे , वह तो जीत न होने के बाद भी था , क्‍यूंकि उस दिन विजयादशमी के पहले की नवमी थी। इस तरह से हमारी भविष्‍यवाणियों में अपवाद हो जाया करता है , पर मेरी सही हुई भविष्‍यवाणी पर न ध्‍यान देकर गलत हुई भविष्‍यवाणी को चिट्ठा चर्चा में उछाला गया था। चिट्ठा चर्चा में मेरा मजाक उडाए जाने के बाद मैने तो उन्‍हें अपने ब्‍लोग से हटा ही दिया , वरन् गुस्‍से में मैच की भविष्‍यवाणियां करनी बंद भी कर दी। मेरे वर्डप्रेस के ब्‍लाग के प्रारंभिक पाठकों के राइटर में वो आलेख सुरक्षित हो सकते हैं । यहां प्रश्‍न यह उठता है कि क्‍या मैं उस दिन महिला नहीं थी ?

मैने एक एक सीढी आगे बढते हुए यहां तक की यात्रा तय की है और मुझे आगे भी जाना है। मेरी पाठक संख्‍या और टिप्‍पणियां इस दौरान लगातार बढी हैं , मै सबों को आगे बढने के लिए स‍हयोग भी करना चाहती हूं। यदि मैं कहीं पर गलत हूं , तो सही तर्क देकर मुझे समझाया जाए। पर जहां तक मैं समझती हूं कि जमाने के साथ हर बात का ढंग बदलता है । पुराने जमाने में अभिभावको द्वारा ही न सिर्फ बच्‍चों को काफी डांट फटकार लगायी जाती थी , शिक्षकों द्वारा भी। कालेज में प्रवेश के वक्‍त रैगिंग की जाती थी , यहां तक कि घर की बहू को हर वक्‍त काम के लिए ताने मारे जाते थे , बडे हो जाने पर भी हर निर्णय के लिए बुजुर्गों पर निर्भर रहना पडता था , पर आज इन सबकी जरूरत नहीं । मालूम है , क्‍यों ? आज के जीवन में किसी भी क्षेत्र में सफल होने के लिए आत्‍मविश्‍वास का अधिक महत्‍व रह गया है । किसी के पास गुण ज्ञान कितना भी हो , आत्‍मविश्‍वास न हो , तो फेल हो जाता है , जीवन की परीक्षा में तो अवश्‍य । इसलिए न शिक्षक , न अभिभावक और न ही दुनिया उसे अधिक टोकना पसंद करती है । मुझे याद भी नहीं कि मैने अपने बच्‍चों को कभी एक चपत भी लगायी हो। इतनी कम उम्र में भी अपना निर्णय वे स्‍वयं लेते हैं , मैं गलत रहूं , तो मुझे भी टोक देते हैं , उनका यह आत्‍मविश्‍वास मुझे अच्‍छा लगता है और अच्‍छे विद्यार्थियों में उनका नाम शुमार है। आज के युग को देखते हुए मेरा मानना है कि बस नए ब्‍लोगरों का हौसला बढाते जाओ , वे खुद अच्‍छा लिख लेंगे , उनमें इतना शौक है , इतनी प्रतिभा है , तभी तो उन्‍होने हिम्‍मत जुटायी है । यहां जो एक कदम चलेंगे , उनके लिए भी ‘वाह , वाह ’ , जो दो कदम चलेंगे , उनके लिए भी ‘वाह , वाह ’ और जो दौडेंगे , उनके लिए भी ‘वाह , वाह ’ , यह रेस थोडे ही है न कि इसमें एक सेकण्‍ड के सौंवे अंतराल से भी हार हो जाएगी। जितनी प्रैक्टिस होगी , उतनी निखरेंगे वे खुद , कुछ सिखाने की जरूरत नहीं , कुछ समझाने की जरूरत नहीं , सूरदास , कबीरदास को किसने लिखना पढना सिखाया था , यह अपनी प्रतिभा होती है , बस हम तो यही कहेंगे कि हौसला बढाते चलो , जबतक उसके विचारों से आपत्ति न हो या उसकी बातें किसी को आहत करने वाली न हो !!
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