सोमवार, 31 अगस्त 2009

जब सब कुछ पूर्व निर्धारित है तो कर्म का क्या योगदान रहा ??

मैने कल भृगुसंहिता के बारे में एक आलेख पोस्‍ट किया था , इसकी दूसरी कडी मैं आज पोस्‍ट करनेवाली थी , पर पहले पहली कडी के पाठकों की जिज्ञासा को शांत करना आवश्‍यक है। क्षितिज जी के अनुसार उस पोस्‍ट में जानकारी तो अच्‍छी थी , लेकिन मेरा आलेख उन्‍हें तकनीकी अधिक लगा। उनका मानना है कि अगर कुछ उदाहरणों के साथ मैं इसे सरल रुप में लिखती तो शायद आम लोग भी इसका लाभ उठा पाते , पर मुझे नहीं लगता कि ऐसी कोई कठिन बात मैने लिखा है , आप जब भी नए विषय को पढेंगे , आपको पुराने विषयों की अपेक्षा अधिक ध्‍यान संकेन्‍द्रण की जरूरत होती है। हमें ज्‍योतिष के हिसाब से कुछ शब्‍दों को प्रयोग करना होता है , आप हमारेपुराने आलेखमें इन शब्‍दों ( राशि , लग्‍न आदि ) के बारे में जान सकते हैं।

श्यामल सुमन जी ने भृगु संहिता का नाम भी सुना है और किताब भी देखने का अवसर मिला, लेकिन वे पढ नहीं सके , क्‍यूंकि वह पुस्‍तक संस्‍कृत में थी और उन्‍हें संस्कृत भाषा की उतनी जानकारी नहीं है। उन्‍हें जानकारी दे दूं कि विभिन्‍न प्रकाशकों ने कई लेखकों के हिन्‍दी की भृगुसंहिता का प्रकाशन भी किया है। पर उसे समझने के लिए ज्‍योतिष की थोडी जानकारी आवश्‍यक है। उडनतश्‍तरी जी और डा महेश सिन्‍हा जी कहते हैं पंजाब के किसी गांव में या पूरी या कई गांवों में टुकडो टुकडों में ओरिजनल भृगु संहिता रखी है। सुना बस है कि लोग वहाँ अपना भाग्य पढ़वाने जाते हैं। सुनने में तो हमें भी अवश्‍य आया है , पर जबतक दावों की पुष्टि नहीं हो जाती , वास्‍तव में ओरिजिनल भृगुसंहिता के बारे में कह पाना बहुत ही मुश्किल है।

ज्ञानदत्त पाण्डेय जी कहते हैं कि श्री कन्हैयालाल माणिक लाल मुंशी को पढ़ा था कि भृगु संहिता से लोग भूतकाल तो सही सही बता पा रहे थे , पर भविष्य के बारे में उतने सही नहीं थे। पर मेरे विचार से भृगुसंहिता में व्‍यक्ति की चारित्रिक विशेषताएं और भाग्‍य की ओर से मिलनेवाले सुख दुख का ही वर्णन है , समय की इसमें कोई चर्चा नहीं होती । ज्‍योतिषियों के बारे में नहीं , सिर्फ तांत्रिको के बारे में सुना है कि वे भूत की जानकारी सही सही दे पाते हैं , भविष्‍य की नहीं। हो सकता है , वे तांत्रिक हों और भृगुसंहिता के आधार पर भविष्‍य पढने का झूठा दावा कर रहे हों। डा महेश सिन्‍हा जी कहते हैं कि उत्तर में जैसे भृगु संहिता का नाम है वैसे ही दक्षिण में नाडी ज्योतिष का । नाडी ज्‍योतिष के साथ ही साथ सुधीर कुमार जी रावण-संहिता, लाल किताब और नीलकंठी पुस्तकों/विद्याओं का भी भविष्यवाणियों के लिए उपयोग की चर्चा करते हैं , उनकी चर्चा बाद में कभी की जाएगी।

सबसे मुख्‍य टिप्‍पणी आयी प्रवीण शाह जी की , जिन्‍होने कहा कि विश्वास तो नहीं होता इस तरह की संहिताओं में क्योंकि जब हर काल में जन्म लेने वालों का भविष्य पहले ही से लिखा है, जब सब कुछ पूर्व निर्धारित है तो कर्म का क्या योगदान रहा? बिल्‍कुल सही कहना है आपका , मुझे खुद भी विश्‍वास नहीं था , पर यह अविश्‍वास वहीं से शुरू होता है , जहां हमलोग अधिक विश्‍वास कर लेते हैं , यदि विश्‍वास एक सीमा तक किया जाए तो अविश्‍वास की कोई गुजाइश नहीं होती।

यदि आपके पास अलग अलग दस बीस प्रकार के बीज हों और आप उन्‍हे न पहचानते हों , तो आप अनिश्चितता की स्थिति में ही उन बीजों को जमीन में बो देंगे , उसे सींचकर और अन्‍य देखभाल कर उसे पौधे बनने देंगे , उसके बाद उन बीजों की गतिविधियों को गौर करेंगे , उनका कौन सा पार्ट किस काम में लाया जा सकता है , उसका प्रयोग कर देखेंगे , पर एक किसान किसी बीज को देखते ही आपको उसका पूरा भविष्‍य बतला देगा। आप उसे बो दें , कितने दिन में उसका अंकुरण निकलेगा , कितने दिन में वह पेड , पौधा या लता बनेगा , कितने दिनों में वह फल देने लायक होगा , उसके विभिन्‍न अंगों यानि जड , तना , फल , फूल और पत्‍तों में से किस किस को किस तरह उपयोग में लाया जा सकता है। इसी प्रकार हम सारे मनुष्‍य देखने में एक समान होते हुए भी अलग अलग प्रकार के बीज हैं , मनुष्‍य की कुंडली के ग्रहों को देखकर हम उसकी प्रकृति के बारे में , उसके विकास के बारे में वैसी ही भविष्‍यवाणी कर पाते हैं ।

पर जिस तरह एक बीज के विकास में देखरेख की भूमिका अहम् होती है , उसी प्रकार एक मनुष्‍य के विकास में भी माहौल बहुत बडा अंतर दे सकता है। एक किसान ने हर प्रकार के बीज का पूरा भविष्‍य आपको दिखा दिया , बीजों का जितना अधिक देखभाल किया जाए , किसान की भविष्‍यवाणी उतनी ही सटीक होगी। पर उसे बोया ही नहीं जाए या बोने के बाद देखभाल नहीं की जाए , तो क्‍या होगा ? उसका नष्‍ट होना तो निश्चित है , पर इससे एक किसान ने बीज के बारे में जो भविष्‍यवाणी की थी , वह गलत तो नहीं होगी न। इसी प्रकार कर्म करने से हमारी भविष्‍यवाणियों के सटीक होने की संभावना बलवती होती जाती है। मनुष्‍य के भाग्‍य को लंबाई मान लिया जाए और कर्म को चौडाई , तो किसी भूखंड के क्षेत्रफल की तरह ही इन दोनो का गुणनफल ही किसी व्‍यक्ति की उपलब्धि होगी। इसलिए मेहनत से इंकार तो किया ही नहीं जा सकता , पर भविष्‍य की जानकारी से हम सही दिशा में मेहनत करने को प्रवृत्‍त अवश्‍य होते हैं।
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