बुधवार, 2 सितंबर 2009

कुछ निश्चित होने के बाद भी कुछ और तो हमारे हाथों में रह ही जाता है !!

पिछली पोस्‍ट पर मिली टिप्‍पणियों को देखते हुए महसूस हुआ कि अभी भी भृगुसंहिता से संबंधित संदर्भों में आगे बढने के लिए कुछ बातें स्‍पष्‍ट करना आवश्‍यक है। सबसे पहले सिद्धार्थ जोशी जी की टिप्‍पणी पर गौर करें ....

अच्‍छा लॉजिक है लेकिन इसमें कुछ कमी दिखाई देती है। पहली तो यही कि पेड़ पौधे गति नहीं कर सकते। और मनुष्‍य कर्म करके प्रकृति की उन बाधाओं को पार पा जाता है जिन्‍हें खुले में पेड़ पौधों को अपनी जड़ अवस्‍था में ही सहना पड़ता है।
ऐसे में किसी का भाग्‍य कर्म से कितना प्रभावित होता है
और कर्म भाग्‍य से कितना प्रभावित होता है
दोनों गणनाएं करना क्‍या टेढी खीर नहीं है। हो सकता है दस पेड़ों में से हरेक का भाग्‍य स्‍पष्‍ट बताया जा सके लेकिन दस बच्‍चों का भाग्‍य कैसे बताएंगे। और हाल में पैदा हुए फराह खान के तीन बच्‍चों का ? :)

‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ मानता है कि पेड पौधे गति नहीं कर सकते और मनुष्‍य गति कर सकता है , यह इन दोनो का स्‍वभाव है , अपने जड से सारी शक्ति लेते हुए अचल रहकर भी पेड विकास का क्रम बनाए होता है , जिसे प्राप्‍त करने के लिए मनुष्‍य को चलना फिरना आवश्‍यक है। इसके साथ ही प्रकृति ने इसी हिसाब से सहनशक्ति की भिन्‍नता भी तो विभिन्‍न जीवों को प्रदान की है। वहां पर मनुष्‍य को सारे जीवों से अलग माना जा सकता है । पर मैने पहले ही लिखा कि इस दृष्टि से एक समान होते हुए भी सारे मनुष्‍य अलग अलग प्रकार के बीज हैं और तद्नुसार ही जीवन में अलग अलग गुणों और विशेषताओं के साथ सफलता या असफलता प्राप्‍त करते हैं।

अब सवाल है दस पेड़ों में से हरेक का भाग्‍य स्‍पष्‍ट बताने में सरलता की , जबकि दस बच्‍चों का भाग्‍य बताने में कठिनता की , वह दिक्‍कत इसलिए आती है , क्‍यूंकि बीजों की भविष्‍यवाणी करते समय एक किसान सिर्फ उसके गुणात्‍मक पहलू और प्रतिफलन कालको बतलाने की कोशिश करते हैं , जबकि बच्‍चे के भविष्‍य को बतलाने में हम ज्‍योतिषी परिमाणात्‍मक स्‍तर तकपहुंच जाते हैं। यदि किसान अपने को विद्वान समझते हुए बीजों को देखकर भी परिमाणात्‍मक (कितना) की चर्चा करने लग जाएं , तो उस भविष्‍यवाणी में भूल होना निश्चित है , क्‍यूंकि विकास को निश्चित बतलाने में सिर्फ बीज ही नहीं उसका देख रेख भी मायने रखता है। एक बीज की तरह ही ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ बच्‍चे के गुणात्‍मक पहलू और उसके प्रतिफलन कालकी ही भविष्‍यवाणी करना उचित मानता है। फराह खान के तीनो बच्‍चों ने यदि एक ही लग्‍न में जन्‍म लिया होगा , तो उनमें एक जैसी प्रवृत्ति दिखाई पडेंगी , पर यदि उन्‍होने अलग अलग लग्‍न में जन्‍म लिया हो , तो अलग अलग होनी निश्चित है , पर लक्ष्‍य के बारे में आप पक्‍का दावा नहीं कर सकते , यह व्‍यक्ति के अपने हाथ में भी हो सकता है।
इसी संदर्भ में एक दूसरी टिप्‍पणी स्‍वदेश जैन जी की मेरे ईमेल तक पहुंची है ....
आपने लिखा कि "इसी प्रकार कर्म करने से हमारी भविष्‍यवाणियों के सटीक होने की संभावना बलवती होती जाती है।" इसका मतलब यह क्यों ना मान लिया जाय कि जो कर्म हम कर है वह भी पूर्वनिर्धारित ही हुए ना, यदि यह सोच सही है तब पाप करना या पुण्य अर्जित करना अपने हाथ मे नही है ना।


आपके उत्तर का इन्‍तजार रहेगा कृपया मार्गदर्शन कीजिये !

जब किसी बच्‍चे के जन्‍म के समय के ग्रहों के आधार पर बननेवाली जन्‍मकुंडली के आधार पर हमलोग बच्‍चे की जीवनभर के शारीरिक , मानसिक और अन्‍य प्रकार के सुखों , दुखों की सटीक चर्चा करने का दावा कर रहे हैं , तो यह तो निश्चित है कि मनुष्‍य की प्रकृति , सोंच , पवृत्तियां और उसकी व्‍यक्तिगत परिस्थितियां पूर्वनिर्धारित मानी जा सकती है , पर कर्म करने से पहले वह अपने आसपास की दुनिया यानि सामाजिक , राष्‍ट्रीय और अंतर्राष्‍ट्रीय माहौल से प्रभावित होता है। यानि माहौल अच्‍छा मिले तो वे बुरी प्रवृत्तियां समाप्‍त होने की और अच्‍छी प्रवृत्तियां विकसित होने की संभावना रहती है , जबकि माहौल गडबड हो तो इसके विपरीत होता है। इसलिए बहुत कुछ निश्चित होने के बाद भी बहुत कुछ और तो हमारे हाथों में रह ही जाता है।
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