मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

आखिरकार मैने एक नया ब्‍लॉग 'गत्‍यात्‍मक चिंतन' के नाम से बना ही लिया !!

यूं तो अपने 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' ब्‍लॉग को मैने ज्‍योतिष के क्षेत्र में पिताजी के द्वारा किए गए रिसर्च और अपने अध्‍ययन को लोगों तक पहुंचाने के लिए किया था , पर कई ब्‍लॉगों को संभाल पाने की जबाबदेही से बचने के लिए अपने मस्तिष्‍क में उपजे अन्‍य विचारों को भी इसी में पोस्‍ट कर दिया करती थी। चूंकि 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' का प्रचार प्रसार मैं समाज से अंधविश्‍वास और भ्रांतियों को दूर करने के लिए ही कर रही हूं , इसलिए अंधविश्‍वास को दूर करने वाली कई कथा कहानियों को भी इसमें पोस्‍ट कर दिया था , जिससे मेरे मित्रों को आपत्ति थी। बाद में मुझे भी ऐसा महसूस होने लगा कि जहां एक ओर ज्‍योतिष में रूचि न रखनेवाले मेरे द्वारा लिखे गए ज्‍योतिष से इतर बालेखों को भी नहीं पढ पाते थे , वहीं अन्‍य आलेखों में व्‍यस्‍त रहने से ज्‍योतिष पर आस्‍था रखनेवालों को समय पर मैं ज्‍योतिष से संबंधित आलेख भी नहीं दे पाती थी। इसलिए कुछ दिनों से एक नए ब्‍लॉग की आवश्‍यकता महसूस हो रही थी
यूं तो 1975 से पहले ही मेरे पिताजी को महसूस हो चुका था कि विंशोत्‍तरी दशा पद्धति या परंपरागत अन्‍य दशा पद्धतियों के अनुसार ग्रह मनुष्‍य पर प्रभाव नहीं डालते हैं , अपने स्‍वभाव के अनुसार ही चंद्रमा बचपन में , बुध किशोरावस्‍था में , मंगल युवावस्‍था में , शुक्र पूर्व प्रौढावस्‍था में , सूर्य उत्‍तर प्रौढावस्‍था में , बृहस्‍पति पूर्व वृद्धावस्‍था में और शनि उत्‍तर वृद्धावस्‍था में मनुष्‍य के जीवन पर अपनी शक्ति के अनुसार अच्‍छा या बुरा प्रभाव डालते है। 1975 के एक ज्‍योतिषीय पत्रिका में इसकी चर्चा कर चुके थे, पर ग्रहों की शक्ति को निकाल पाने की अनिश्चितता के कारण जातक के बारे में भविष्‍यवाणी करना कठिन हो रहा था। हजारों कुंडलियों का विस्‍तृत अध्‍ययन करने के बाद आखिरकार 1981 के जून में ज्‍योतिष में विज्ञान की गहरी समझ रखने वाले पिताजी ने ग्रहों की गति , जो कि घटती बढती रहती है , में ग्रहों की शक्ति को ढूंढ निकाला , तो इस विषय में अपने जीवन को समर्पित कर देने का एक आधार मिल ही गया। इसी समय इन्‍होने भविष्‍यवाणी करने की इस नई विधा का  'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के रूप में नामकरण किया।

'गत्‍यात्‍मक' शब्‍द में गति है , यह पूर्ण तौर पर हमें स्‍वतंत्रता देता है कि हम लीक पर ही न चलें , कितनी भी दौड लगा सकते हैं , उड सकते हैं , पर इसका 'आत्‍मक' शब्‍द इसे जड से जोडे रखता है। 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के द्वारा विकसित किए गए सिद्धांत हर युग काल और स्‍तर में उसके अनुरूप भविष्‍यवाणी करने के लिए हमें भरपूर छूट प्रदान करता है , क्‍यूकि यह इस अंधविश्‍वास को दूर करता है कि ग्रहों का पूर्ण तौर पर प्रभाव है , जो निश्चित हो , इसका बिल्‍कुल सांकेतिक प्रभाव है । आज के युग में सिर्फ ज्‍योतिष ही नहीं हर क्षेत्र में 'गत्‍यात्‍मक' का महत्‍व है , चाहे वो शिक्षा का क्षेत्र हो , राजनीति का अर्थव्‍यवस्‍था का या रिश्‍तों का। पर लोग सिर्फ गति को महत्‍व दे रहे हैं 'आत्‍मक' को नहीं , यही कारण है कि हमारी दौड अंधकार की दिशा में जा रही है। 'गत्‍यात्‍मक' मानता है कि हम जमीन क्‍या , पूरे आसमान का प्रयोग उडने के लिए कर सकते हैं , पर उससे पहले न सिर्फ हमारी डोर मजबूत होनी चाहिए , वरन् हमारी कमान भी किसी के हाथों में होनी चाहिए । भले ही यह हमारी स्‍वतंत्रता को कम करता है , पर हमें भटकाव से भी बचाता है। 


यही कारण है कि हमारा सारा चिंतन 'गत्‍यात्‍मक' होता है और इसलिए मैने इस ब्‍लॉग का नाम 'गत्‍यात्‍मक चिंतन' रखा है। आप सभी पाठकों से निवेदन है कि उस ब्‍लॉग के अनुसरणकर्ता बनकर मेरा हौसला बढाएं।




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