शनिवार, 14 मार्च 2009

आखिर अभी तक ज्‍योतिष विवादास्‍पद क्‍यों है ?

किसी भी प्रदेश की संस्‍कृति के विकास के साथ ही साथ भाषा , साहित्‍य , कला या जीवनशैली का विकास और इन सबके विकास के क्रम में अनुभव के आधार पर हर प्रदेश के अनुरूप विभिन्‍न प्रकार के शास्‍त्रों का उदय होना बिल्‍कुल स्‍वाभाविक प्रक्रिया है। इन सबका हमारे दिल , दिमाग और अनुभव से सीधा संबंध होता है और प्रदेश में रहनेवाले लोग इसे किसी न किसी प्रकार सीख ही लेते हैं। युग के साथ ही साथ बढते जा रहे ज्ञान, विज्ञान और कला के विभिन्‍न क्षेत्रों में पूरी जनसंख्‍या को उलझाए रखने में कुछ व्‍यावहारिक कठिनाइयों को देखते हुए पहले श्रमविभाजन और फिर श्रम विभाजन के फलस्‍वरूप विभिन्‍न प्रकार के कार्यों को काफी दिनों तक करनेवाले लोगों की विशेष दक्षता को देखते हुए ही भारतवर्ष में विभिन्‍न विज्ञानों और कलाओं को उनके विशेषज्ञों को सौंपते हुए जाति व्‍यवस्‍था की नींव डाली गयी थी।


जातिवादी प्रथा में कला को पीढी दर पीढी चलने में बहुत सुविधा हुई , क्‍योंकि कला का सीधा संबंध अभ्‍यास से होता है और जाति विशेष में जन्‍म लेनेवालों को उनके लिए तय किए गए कार्यों को करना अनिवार्य होता था , चाहे उसमें उसकी रूचि हो या न हो। बालक का सारा परिवेश वही , दिन रात घर पर चलनेवाला काम वही , रोजी रोटी का साधन भी वही , उस कार्य में दक्ष हो जाना बहुत कठिन नहीं होता था । यह अलग बात है कि किसी की प्रतिभा और मेहनत के अधिक होने से वह अधिक निष्‍णात हो और कम प्रतिभावान और कम मेहनती अपेक्षाकृत कम। यही कारण है कि प्राचीन कलाएं दिन ब दिन किसी न किसी रूप में विकसित होती ही रहीं।


पर हमारे वैदिक युग ने जो भी वैज्ञानिक उपलब्धियां हासिल की , उसे इस जातिवादी प्रथा में बडा नुकसान चुकाना पडा, चाहे चिकित्‍सा का क्षेत्र हो या गणित का या फिर ज्‍योतिष का। आज एक अच्‍छे वैज्ञानिक , डाक्‍टर और इंजीनियर बनने के लिए इनसे संबंधित कालेजों में प्रवेश परीक्षा लेने की व्‍यवस्‍था है। जो बच्‍चे आजतक के अपने ज्ञान और प्रतिभा की बदौलत प्रतियोगिता में सफल हो पाते हैं वही उसमें ज्ञान प्राप्‍त कर सकते हैं यानि विज्ञान की जानकारी के लिए पहली शर्त प्रतिभा का होना है , प्रतिभा के साथ फिर उन्‍हें वैसा ही गुरू भी मिल जाए तो प्रतिभा दुगुनी निखरती है। यही कारण है कि एक अच्‍छा विशेषज्ञ बनने के लिए आज अच्‍छे संस्‍थानों में प्रवेश लेने की विद्यार्थियों में होड लगी होती है। पर एक प्रतिभासंपन्‍न ब्राह्णण को मजबूरी थी कि वह इतने सारे जटिल सूत्रों और कठिन गणितों से युक्‍त वैदिक ज्ञान सिर्फ अपने बच्‍चे को ही दे सकता था , चाहे वे उसके योग्‍य हों या न हों। इसके अतिरिक्‍त भारत गांवों में बसता था , गांव में पढाई लिखाई के अनुकूल कोई वातावरण नहीं था , गुरूकुल की प्रथा समाप्‍त हो चुकी थी । जब गांव में पढाई लिखाई आरंभ हुई तो ब्राह्मण परिवार के भी प्रतिभासंपन्‍न बच्‍चे इसे परंपरागत व्‍यवसायजनित पढाई समझते हुए इसमें न उलझकर कालेजों में जाकर पढाई करना पसंद करने लगें। इस तरह के कई कारणों से जहां पीढी दर पीढी इस ज्ञान को विकसित होना चाहिए था , वहीं कभी कम प्रतिभा संपन्‍न बच्‍चों और कभी कम प्रतिभासंपन्‍न गुरू के संयोग से अधकचरे ज्ञान का आदान प्रदान हो सका , जिसके कारण इन वैदिक ज्ञानों का और ह्रास होता चला गया। भविष्‍यवाणियों मे सटीकता न दिखाई पडने के कारण ही ज्‍योतिष की हालत एक विज्ञान से बदलती हुई अंधविश्‍वास पर जाकर टिक गयी।


ठीक है , वैज्ञानिको की बात को मानते हुए कुछ देर के लिए हम यह मान भी लें कि ज्‍योतिष शुरू से ही अंधविश्‍वास है , इसके आधारभूत नियम ही सही नहीं हैं और इसलिए पंडितों की भविष्‍यवाणियां गलत हो जाती हैं। पर वैदिक गणित के नियम तो अकाट्य हैं , वो भारत से क्‍यों लुप्‍तप्राय होते चले गए ? भारत के सभी ब्राह्मण परिवारों तक उनकी जानकारी क्‍यों नहीं रही ? चिकित्‍सा के क्षेत्र में किए गए शोध यानि आयुर्वेद , होम्‍योपैथी भी वैसे ही पिछडे क्‍यों रह गए ? शायद इन सब बातों के जवाब किसी पाठक के पास नहीं होंगे , पर सही तो यह है कि इतने सारे जटिल सूत्रों और कठिन गणितों से युक्‍त वैदिक ज्ञान को छोडकर ब्राह्मण परिवारों ने अभी तक अपने काम को सिर्फ पूजा पाठ , विवाह , यज्ञ जाप , कुंडली बनाने और मिलाने तथा मुहूर्त्‍त निकालने तक ही सीमित रखा है और वही पीढी दर पीढी परंपरागत व्‍यवसाय के रूप में चलता रहा है। पर अन्‍य वैदिक ज्ञान की तरह ही फलित ज्‍योतिष एक विज्ञान है और इसमें विकास की पूरी संभावनाएं हैं , पर यह तभी संभव है , जब समाज में इसकी विवादास्‍पदता समाप्‍त हो जाए। जो अंधानुकरण कर रहे हें , वे अंधानुकरण करना छोडे और जो इसके प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं वो पूर्वाग्रह छोडें , स्‍वस्‍थ मानसिकता से ज्‍योतिष पर लिखे गए आलेखों को पढें , भविष्‍यवाणियों पर गौर करें। किसी की जन्‍मकुंडली के विश्‍लेषण के लिए तो बहुत सारे सूत्र होने से काफी सटीक भविष्‍यवाणी की जा सकती है , पर विभिन्‍न प्रकार के डाटाबेस को ग्रहों के आधार पर विश्‍लेषित कर भविष्‍यवाणियों की सटीकता को बढाते हुए क्रमश: 70-80-90 प्रतिशत तक भी ले जाया जा सके , तो इसे विज्ञान माना जा सकता है। क्‍योंकि विज्ञान मानता है कि बिना आधार के भी भविष्‍यवाणी करने से 50 प्रतिशत सत्‍यता की संभावना तो बनती ही है। पर ऐसा भी नहीं है , सिर्फ अनुमान से दो बार भविष्‍यवाणी की जाए और दोनो बार ही गलत हो सकती है।

गुरुवार, 12 मार्च 2009

ज्योतिष में राजयोग

राजयोगों की विवेचना या उल्लेख करते हुए सामान्यतया ज्योतिषी या ज्योतिषप्रेमी अपने मस्तिष्क मे भावी उपलब्धियों की बहुत बड़ी तस्वीर खींच लेने की भूल करते हैं। चूंकि आज का युग राजतंत्र का नहीं है , कई लोग इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं कि राजयोग का जातक मंत्री , राज्यपाल , राष्ट्रपति , कमांडर , जनप्रतिनिधि या टाटा ,बिड़ला जैसी कम्पनियों का मालिक होना है। लेकिन जब इस प्रकार के योगों की प्राप्ति बहुत अधिक दिखलाई पड़ने लगी , यानि राजयोगवाली बहुत सारी कुंडलियॉ देखने को मिलने लगीं , तो ज्योतिषी फलित कहते वक्त कुछ समझौता करने लगे और राजयोग का अर्थ गजेटेड अफसरो से जोड़ने लगें हैं। 

पर जिस राजयोग में एक राजा को पैदा होना चाहिए , उसमें एक मामूली दुकानदार पैदा हो जाता है और जब श्रीमती इंदिरा गॉधी जैसे सर्वगुणसंपन्न प्रधानमंत्री की कुंडली की व्याख्या करने का अवसर मिलता है , तो बड़े से बड़े ज्योतिषी उनकी कुंडली में बुधादित्य राजयोग ही उनके प्रघानमंत्री बनने का कारण बताते हैं , जबकि संभावनावाद के अनुसार 50 प्रतिशत से अधिक लोगों की कुंडली में बुधादित्य योग के होने की संभावना होती है। एक महान ज्योतिषी ने अपनी पुस्तक में लिखा है , बुधादित्य योग यद्यपि प्राय: सभी कुंडलियों में पाया जाता है , फिर भी इसे कम महत्वपूर्ण नहीं समझना चाहिए। इस तरह राजयोगों का विश्लेषण क्या असमंजस में डालनेवाला पेचीदा , अस्पष्ट और भ्रामक नहीं है ? इस तरह के पेचीदे वाक्य राजयोग के विषय में ही नहीं , वरन् ज्योतिष के समस्त नियमों के प्रति बुिद्धजीवी वर्ग की जो धारणा बनती है , उससे फलित ज्योतिष का भविष्य उज्जवल नहीं दिखाई पड़ता है। 

आज कम्प्यूटर का जमाना है , अपने समस्त ज्योतिषीय नियमों , सिद्धांतो को कम्प्यूटर में डालकर देखा जाए , कुंडली निर्माण से संबंधित गणित भाग का काम संतोषजनक है , परंतु फलित भाग बिल्कुल ही स्थूल पड़ जाता है , इससे किसी को संतुष्टि नहीं मिल पाती है। एक मामूली प्रथमिक स्कूल के शिक्षक और बसचालक की कुंडली में अनेक राजयोग निकल आते हैं और अमेरिका के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की कुंडली में एक दरिद्र योग का उल्लेख इस तरह होता है , मानो वह अति विशिष्ट व्यक्ति न होकर भिखारी हो। ऐसी स्थिति में आवश्‍यक है कि विभिन्‍न ग्रहों की स्थिति को देखते हुए आज के युग के अनुरूप राजयोगों की अलग से व्‍याख्‍या की जाए।

बुधवार, 11 मार्च 2009

होली की बधाई एवं शुभकामनाएं

हिन्‍दी चिट्ठा जगत के सभी लेखकों लेखिकाओं और पाठक पाठिकाओं को मेरी ओर से होली की बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं।

मंगलवार, 10 मार्च 2009

मुहूर्त , शकुन या लॉटरी का महत्व

किसी धनाढ्य व्यक्ति के यहॉ लक्ष्मी-पूजन करने के लिए पंडित शुभ मुहूर्त निकालते हैं , पूजा हो जाती है , धन की वर्षा भी होने लगती है , किन्तु आश्चर्य की बात यह है कि एक पंडित अपने लिए वह शुभ मुहूर्त क्यों नहीं निकाल पाता ? वैसी हालत में धन की वर्षा उसी के यहॉ होती। उसे केवल दक्षिणा से संतुष्ट नहीं रहना पड़ता। 

जहॉ एक ओर सामूहिक उत्सव , एक ही मेले में लाखों लोगों का एक साथ उपस्थित होना , सामूहिक विवाह , सौंदर्य प्रतियोगिता आदि सुखद अहसास खास समयांतराल के विषयवस्तु हो सकते हैं , वहीं दूसरी ओर भूकम्प , तूफान , युद्ध और दुर्घटनाओं से एक समय में लाखों लोगों का प्रभावित होना भी सच है। इस प्रकार अच्छे या बुरे समय को स्वीकार करना हमारी बाध्यता है , किन्तु किसी समय अमृतयोग , सिद्धियोग या महेन्द्रयोग चल रहा हो और उसी समय किसी विषय की परीक्षा चल रही हो , तो क्या लाखों की संख्या में परीक्षा दे रहे सभी विद्यार्थी पास कर ही जाएंगे ? कदापि नहीं , सभी विद्यार्थियों को उनकी योग्यता के अनुरुप ही फल की प्राप्ति होगी।

शकुन या लॉटरी की पद्धति से कई संभावनाओं में से एक को स्वीकार करने की प्रथा है। किन्तु हम अच्छी तरह जानते हैं कि बार-बार ऐसे प्रयोगों का परिणाम विज्ञान की तरह एक जैसा नहीं होता। अत: इस प्रकार के शकुन भले ही कुछ क्षणों के लिए आहत मन को राहत दे दे , भविष्य या वर्तमान जानने की विधि कदापि नहीं हो सकती।

स्मरण रहे , विज्ञान से सत्य का उदघाटन किया जाता है। अनुमान से कई प्रकार की संभावनाओं की व्याख्या करके अनिश्चय और निश्चय के बीच पेंडुलम की तरह थिरकते रहना पड़ सकता है , किन्तु इन दोनों से ही अलग लॉटरी या शकुन पद्धति से अनुमान और सत्य दोनो की अवहेलना करते हुए जो भी हाथ लग जाए , उसे अपनी नियति मानने का दर्द झेलने को विवश होना पड़ सकता है।लेकिन जब योजना को स्वरुप देने में संसाधन की कमी हो रही हो , कई तरह की बाधाएं आ रही हों , तो ऐसी परिस्थिति में ज्योतिषी से यह सलाह अवश्य ली जा सकती है कि निकट भविष्य में कोई शुभ मुहूर्त उसके जीवन में है या नहीं ?

रविवार, 8 मार्च 2009

यात्राएँ और सप्ताह के दिन

सप्ताह के सभी दिनों का ग्रहों से कोई लेना देना ही नहीं हैं ,तब यात्रा के संबंध में विधि-निषेध से संबंधित ज्योतिषीय नियमों में भी सवालिया निशान लग जाता है। ज्योतिष ग्रंथों में लिखा है——- 

सोम शनिश्चर पूरब न चालू।मंगल बुध उत्तर दिशि कालू।

एक लोकोक्ति है ...

बृहस्‍पत दक्खिन करे पयाना , फिर समझो नहीं लौट के आना। 

यानि सोमवार और शनिवार को पूर्व दिशा में नहीं जाना चाहिए ,बृहस्‍पतिवार को दक्षिण दिशा की यात्रा नहीं करनी चाहिए। किन्तु सब लोग इस बात से भिज्ञ हैं कि प्रत्येक दिन की तरह सोमवार और शनिवार को पूरब दिशा से चलनेवाली गाडि़यों की संख्या उतनी ही होती है , जितनी अन्य दिनों में। यदि सोमवार , शनिवार को पूरब दिशा से चलनेवाली हजारों गाडि़यों में से कोई एक कभी दुर्घटनाग्रस्त हो भी जाती है तो इस प्रकार की बात पूरब से चलनेवाली गाड़ी में भी शुक्रवार को देखी जा सकती है। इसलिए इस बात की पुष्टि नहीं हो पाती है कि निश्चित तौर पर सोमवार , शनिवार को पूरब की ओर चलनेवाली सभी गाडि़यों को सुरक्षा की दृष्टि से रोक दिया जाए या मंगलवार ,बुधवार को उत्तर दिशा में कोई गाड़ी नहीं चलने दी जाए। 

वास्तव में ज्योतिष शास्त्र में उल्लिखित ये सारे नियम बिना वजह भय और संशय उत्पन्न करनेवाले हैं। इन नियमों की अवैज्ञानिकता से ही फलित ज्योतिष अविश्वसनीय बना हुआ है। इन अंधविश्वासों को हम हजारो वर्षों से ढोते आ रहें हैं। आज के वैज्ञानिक युग में इस प्रकार की बातें आम लोगों के बीच कौतुहल,हास्य और व्यंग्य का कारण बनतीं हैं। इन नियमों को मानने के लिए कोई तैयार नहीं है। किन्तु ज्योतिषी बंधुओं को इस प्रकार की कमजोरियों को भी स्वीकार करने में हिचकिचाहट है। अब तक ज्योतिष के जिस स्वरुप को उभारा गया है , उससे आम आदमी संकट के समय ग्रहों के भय से भयभीत होते है । जिस दिन ज्योतिष के वैज्ञानिक स्वरुप को वे जान जाएंगे , वे निडर और निश्चिंत दिखाई पड़ेंगे।