शनिवार, 4 अप्रैल 2009

फलित ज्‍योतिष की कमजोरियां और उसका समाधान



गणित ज्‍योतिष जैसे वैदिक कालीन ज्ञान पर आधारित होने के बावजूद भी फलित ज्‍योतिष इसलिए विवादास्‍पद है , क्‍योंकि यह ग्रहों का मानव पर पडने वाले प्रभाव की कहानी कहता है , जबकि वैज्ञानिक इसे मानने को तैयार नहीं हैं। इतने वर्षों से यह लोगों का विश्‍वास जीतने में सफलता नहीं प्राप्‍त कर सका है , जाहिर है अपनी खूबियों के साथ ही साथ कई कमजोरियों को भी यह झेल रहा है। अपने आरंभिक अध्‍ययन काल में गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष ने परंपरागत फलित ज्‍योतिष में दो कमजोरियां पाई थी ...

1. ग्रहों के शक्ति निर्धारण की , जिसके लिए ज्‍योतिष में कम से कम बारह या उससे अधिक सूत्र हैं , पर विज्ञान मानता है कि किसी भी शक्ति को मापने का एक सूत्र होना चाहिए , बारह सूत्रों में मालूम कैसे हो कि कुंडली में कोई ग्रह बलवान है या कमजोर, जो ज्‍योतिष को विवादास्‍पद बनाने के लिए काफी है । 

2. ग्रहों के दशाकाल निर्धारण की , यानि किसी खास ग्रह का अच्‍छा या बुरा प्रभाव कब पडेगा , जिसके लिए कोई विंशोत्‍तरी पर आधारित हैं , कोई कृष्‍णमूर्ति पर , कोई गोचर पर तो कोई अभी तक उलझे ही हुए हैं कि सत्‍य किस माना जाए , अब मालूम कैसे हो कि जो ग्रह कमजोर हैं , उसका बुरा या जो ग्रह मजबूत हें , उसका अच्‍छा प्रभाव कब पडेगा ?

‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिषीय अनुसंधान संस्‍थान’ इन दोनो कमजोरियों को दूर करने का एक प्रामाणिक सूत्र तैयार कर चुका है और मेरी एक पुस्‍तक ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष : ग्रहों का प्रभाव’ के द्वारा वह जनसामान्‍य के द्वारा उपयोग में भी लायी जा रही है। ‘गत्‍यात्‍मक शक्ति’ निकालने के सूत्र और ‘गत्‍यात्‍मक दशा पद्धति’ और ‘गत्‍यात्‍मक गोचर प्रणाली’ की खोज के बाद अब ज्‍योतिष टटोलने वाला विज्ञान नहीं रहा। इसके बारे में अधिक जानकारी के लिए ज्‍योतिष प्रेमी मेरे इस आलेखको देखें।

गुरुवार, 2 अप्रैल 2009

आज आपलोग मेरी कहानिया पढें ...



आज 01:00 बजे दोपहर मेरी कहानी ‘पहला विरोध’ साहित्‍य शिल्‍पी में प्रकाशित की गयी है। इसे पढने के लिए यहांक्लिक करें। इसके पहले भी 7 दिसम्‍बर 2008 को साहित्‍य शिल्‍पी मेरी एक कहानी ‘एक झूठ’ को प्रकाशित कर चुका है। उसे पढने के लिए यहांक्लिक करें। आपके सुझावों का स्‍वागत रहेगा।

मंगलवार, 31 मार्च 2009

किसी घटना के लिए धार्मिक क्रियाकलापों को दोषी न मानें

कुछ लोगों को लग रहा होगा कि मै धर्म के साथ सामाजिक या पारिवारिक नियमो का घालमेल कर रही हूं , ऐसा सिर्फ मैं ही नहीं कर रही , जब भी धर्मविरोधी धर्म के विरूद्ध तर्क देते हैं , इन सामाजिक और पारिवारिक नियमों को भी धर्म के अंदर समाहित मानते हैं , जबकि ये जो वास्‍तव से धर्म से नहीं जुडे है , अलग अलग क्षेत्र और माहौल के अनुरूप उपजी आवश्‍यकताओं से जुडी हैं । इनमें से कुछ नियमों का आज कोई महत्‍व नहीं , पर धर्मभीरू भी इन नियमों का पालन करने को बाध्‍य है। हमें इन नियमों का पालन करते वक्‍त आज के संदर्भ में इसके परिणामों को सोंचना चाहिए। यदि ये उचित जान पडे, यानि आज भी उससे व्‍यक्तिगत तौर पर नहीं , सामाजिक लाभ हो रहा हो तो नियम पालन में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए , पर अगर आज उससे किसी तरह का नुकसान हो तो पालन नहीं करने की कडाई दिखयी जानी चाहिए। बहुत लोगों को इस बात से भय होता है कि समाज या परिवार में चलती आ रही परंपराओं का पालन न किया जाना किसी बडे नुकसान की वजह बनती है। पर ऐसा नहीं है , कभी कभी यूं ही संयोग से कुछ घटनाएं हो जाया करती हैं , जिसे हम इसकी वजह मान लेते हैं और कमजोर पडकर पुन: नियम पालन को आवश्‍यक समझ बैठते हें।

जैसा कि कल मैने बताया कि हमारे परिवार में मुंडन के वक्‍त एक बकरे की बलि चढाने की प्रथा है और मेरा मुंडन इसके बिना किया गया। मेरे साथ तो कोई अनहोनी नहीं हुई , पर मेरे बाद एक भाई जन्‍म के छठे दिन ही भगवान को प्‍यारा हो गया। ज्‍योतिष के जानकार मेरे पिताजी पूरे आत्‍मविश्‍वास में बनें रहें कि यह सामान्‍य सी घटना है। चिकित्‍सीय सुविधाओं के अभाव में ऐसा अक्‍सर हो जाया करता था , पर आगे मेरे साथ ऐसी कोई दुर्घटना नहीं घटेगी। इसी सोंच से प्रभावित मेरे यहां पुन: बलि की शुरूआत नहीं की गयी । पंद्रह सत्रह वर्षों तक घर में सबकुछ कुशल मंगल ढंग से चलता रहा , तबतक हमारे घर में जन्‍म लेनेवाले सभी बच्‍चों, यानि हमारे चाचा जी वगैरह के भी सारे बच्‍चों का मुंडन बिना बलि के होता रहा। पर उसके बाद चाचा जी की एक लडकी को पोलियो हो गया , उसी के कुछ दिनों बाद एक चाचाजी का पीलीया कोमा स्‍टेज तक पहुंच गया , घर में मम्‍मी पापा के सिवा अन्‍य सभी लोगों का मानना था कि देवी मां को बलि न दिए जाने की ही वजह से ऐसा हो रहा है और लगभग 17 वर्षों बाद पुन: बलि प्रथा आरंभ कर दी गयी। तबतक हमारे अपने सभी भाई बहनों का मुंडन हो चुका था और सभी स्‍वस्‍थ और सानंद थे , पर इससे किसी को मतलब नहीं था।

अब हमारे एक ही परिवार में दो तरह के नियम बने हुए हैं , जहां मेरे सगे भतीजे भतीजियों के मुंडन में बलि की आवश्‍यकता नहीं पडती है , क्‍योंकि हमारा सबका मुंडन बिना ब‍लि के हो चुका है , वहीं चाचाजी के पोते पोतियों के मुंडन में बलि दी जाती है। मैं यही समझने लगी हूं कि अपने विचारों के अनुरूप ही काम किया जाना श्रेयस्‍कर होता है। ऐसी हालत में प्रकृति आपका साथ अवश्‍य देती है , पर यदि आपने नियम तोडकर काम करना आरंभ किया है तो अपने दिल को थोडा मजबूत बनाए रखें , क्‍योंकि जीवन में कभी भी किसी प्रकार की घटना घट जाया करती हें और इसके लिए आप अपने धार्मिक क्रियाकलापों को दोषी न मानें।

सोमवार, 30 मार्च 2009

धर्म के पालन में भी धर्म संकट ?????

जी हां , कभी कभी धर्म के पालन में भी धर्म संकट उठ खडा होता है। ऐसा तब होता है जब पुस्‍तकों में लिखे या परंपरागत तौर पर चलते आ रहे धर्म का हमारे अंदर के धर्म से टकराव होता है। अंदर का धर्म यदि स्‍वार्थ से लिप्‍त हो तो इच्‍छा के बावजूद भी हममें इतनी हिम्‍मत नहीं होती कि हम सार्वजनिक तौर पर परंपरागत रूप से चलते आ रहे धर्म का विरोध कर सकें , पर यदि हमारा आंतरिक धर्म परोपकार की भावना या किसी अच्‍छे उद्देश्‍य पर आधारित होता है, तो हमें नियमों के विपक्ष में उठ खडा होने की शक्ति मिल जाती है। ऐसी हालत में समाज के अन्‍य जनों के सहयोग से भी हम विरोध के स्‍वर को मजबूत कर पाते हैं। इससे कुछ परंपरावादी लोगों को अवश्‍य तकलीफ हो जाती है , पर हम लाचार होते हैं।

इस संदर्भ में मैं दो घटनाओं का उल्‍लेख करना चाहूंगी। पहली घटना मेरे जन्‍म के छह महीनें बाद मेरा मुंडन करवाने के वक्‍त की है । हमारे परिवार के सभी बच्‍चों का मुंडन बोकारो और रामगढ के मध्‍य दामोदर नदी के तट पर एक प्रसिद्ध धर्मस्‍थान रजरप्‍पा में स्थित मां छिन्‍नमस्तिका देवीकी पूजा के बाद ही की जाती आ रही है। पूजा के लिए एक बकरे की बलि देने की भी प्रथा है। मेरे मम्‍मी और पापा बलि प्रथा के घोर विरोधी , पर परिवार के दूसरे बच्‍चों के मामलों में तो दखलअंदाजी कर नहीं सकते थे , ईश्‍वर न करे , पर कोई अनहोनी हो गयी , तो कौन बर्दाश्‍त करेगा इनके सिद्धांतों को , इसलिए आंखे मूंदे अपने स्‍वभाव के विपरीत कार्य को होते देखते रहे। पर जैसे ही उनकी पहली संतान यानि मेरे मुंडन की बारी आयी , उन्‍होने ऐलान कर दिया कि वे देवी मां की पूजा फल, फूल और कपडे से करेंगे, पर इस कार्यक्रम में बकरे की बलि नहीं देंगे। घरवाले परेशान , नियम विरूद्ध काम करें और कोई विपत्ति आ जाए तो क्‍या होगा ? कितने दिनो तक घर का माहौल ही बिगडा रहा , पर मेरे मम्‍मी पापा को इस मामले में समझौता नहीं करना था , सो उन्‍होने नहीं किया । फिर मेरे दादाजी तो काफी हिम्‍मतवर थे ही , उनका सहयोग मिल गया। देवी देवता की कौन कहे , भूत प्रेत तक के नाम से वे नहीं डरते थे , उनकी हिम्‍मत का बखान किसी अगले पोस्‍ट में करूंगी । बाकी घरवाले भी विश्‍वास में आ गए और बिना बलि के ही मेरा मुंडन हो गया। क्‍या मुंडन के बाद सबकुछ सामान्‍य ही रहा , जानने के लिए मेरी अगली पोस्‍ट कल पढें।
दूसरी घटना तब की है , जब विवाह के पश्‍चात पहली बार अपने पति के साथ मै अपने गांव पहुंची थी। चूंकि हमारे गांव में नवविवाहिताओं को पति के साथ पूरे गांव के मंदिरों में जाकर देवताओं के दर्शन करने की प्रथा चल रही है , इसलिए हमलोगों को भी ले जाया गया। वैज्ञानिक दृष्टिकोण युक्‍त स्‍वभाव होने के बावजूद सभी देवी देवताओं के आगे हाथ जोडने में तो हमें कोई दिक्‍कत नहीं है। मान लें , वो भगवान न भी हो , सामान्‍य व्‍यक्ति ही हो , धर्मशास्‍त्रों में उनके बारे में यूं ही बखान कर दिया गया हो , पर हमारे पूर्वज तो हैं , कुछ असाधारण गुणों से युक्‍त होने के कारण ही इतने दिनों से उनकी पूजा की जा रही है , हम भी कर लें तो कोई अनर्थ तो नहीं होगा। पर आगे एक सती मंदिर आया , इसमें हमारे ही अपने परिवार की एक सती की पूजा की जाती है , मैने तो बचपन से सती जी की इतनी कहानियां सुनी है , शादी विवाह या अन्‍य अवसरों पर उनके गाने भी गाए जाते हैं ,पति के मरने के बाद उनकी चिता पर बैठने के लिए बिना भय के उन्‍होने अपना पूरा श्रृंगार खुद किया था , पर कोई उन्‍हे शीशे की चूडियां लाकर नहीं दे सके थे , न जाने कितने दिन हो गए इस बात के ,पर इसी अफसोस में आजतक हमारे परिवार में शीशे की चूडियां तक नहीं पहनी जाती है। इतनी इज्‍जत के साथ उनकी पूजा होते देखा था , इसलिए सती प्रथा को दूर करने के राजा राम मोहन राय के अथक प्रयासों को पुस्‍तकों में पढने के बावजूद मेरे दिमाग में उक्‍त सती जी या अपने परिवार की गलत मानसिकता के लिए कोई सवाल न था। पर इन्‍होने तो यहां हाथ जोडने से साफ इंकार कर दिया ‘यहां हाथ जोडने का मतलब सती प्रथा को बढावा देना है’ उनकी इस बात से घर की बूढी महिलाएं परेशान , ये किसी को दुखी नहीं करना चाहते थे , पर परिस्थितियां ही ऐसी आ गयी थी। धर्म पालन में ऐसा ही धर्म संकट खडा हो जाता है कभी कभी।

धर्म के पालन में भी धर्म संकट ?????

जी हां , कभी कभी धर्म के पालन में भी धर्म संकट उठ खडा होता है। ऐसा तब होता है जब पुस्‍तकों में लिखे या परंपरागत तौर पर चलते आ रहे धर्म का हमारे अंदर के धर्म से टकराव होता है। अंदर का धर्म यदि स्‍वार्थ से लिप्‍त हो तो इच्‍छा के बावजूद भी हममें इतनी हिम्‍मत नहीं होती कि हम सार्वजनिक तौर पर परंपरागत रूप से चलते आ रहे धर्म का विरोध कर सकें , पर यदि हमारा आंतरिक धर्म परोपकार की भावना या किसी अच्‍छे उद्देश्‍य पर आधारित होता है, तो हमें नियमों के विपक्ष में उठ खडा होने की शक्ति मिल जाती है। ऐसी हालत में समाज के अन्‍य जनों के सहयोग से भी हम विरोध के स्‍वर को मजबूत कर पाते हैं। इससे कुछ परंपरावादी लोगों को अवश्‍य तकलीफ हो जाती है , पर हम लाचार होते हैं।

इस संदर्भ में मैं दो घटनाओं का उल्‍लेख करना चाहूंगी। पहली घटना मेरे जन्‍म के छह महीनें बाद मेरा मुंडन करवाने के वक्‍त की है । हमारे परिवार के सभी बच्‍चों का मुंडन बोकारो और रामगढ के मध्‍य दामोदर नदी के तट पर एक प्रसिद्ध धर्मस्‍थान रजरप्‍पा में स्थित मां छिन्‍नमस्तिका देवीकी पूजा के बाद ही की जाती आ रही है। पूजा के लिए एक बकरे की बलि देने की भी प्रथा है। मेरे मम्‍मी और पापा बलि प्रथा के घोर विरोधी , पर परिवार के दूसरे बच्‍चों के मामलों में तो दखलअंदाजी कर नहीं सकते थे , ईश्‍वर न करे , पर कोई अनहोनी हो गयी , तो कौन बर्दाश्‍त करेगा इनके सिद्धांतों को , इसलिए आंखे मूंदे अपने स्‍वभाव के विपरीत कार्य को होते देखते रहे। पर जैसे ही उनकी पहली संतान यानि मेरे मुंडन की बारी आयी , उन्‍होने ऐलान कर दिया कि वे देवी मां की पूजा फल, फूल और कपडे से करेंगे, पर इस कार्यक्रम में बकरे की बलि नहीं देंगे। घरवाले परेशान , नियम विरूद्ध काम करें और कोई विपत्ति आ जाए तो क्‍या होगा ? कितने दिनो तक घर का माहौल ही बिगडा रहा , पर मेरे मम्‍मी पापा को इस मामले में समझौता नहीं करना था , सो उन्‍होने नहीं किया । फिर मेरे दादाजी तो काफी हिम्‍मतवर थे ही , उनका सहयोग मिल गया। देवी देवता की कौन कहे , भूत प्रेत तक के नाम से वे नहीं डरते थे , उनकी हिम्‍मत का बखान किसी अगले पोस्‍ट में करूंगी । बाकी घरवाले भी विश्‍वास में आ गए और बिना बलि के ही मेरा मुंडन हो गया। क्‍या मुंडन के बाद सबकुछ सामान्‍य ही रहा , जानने के लिए मेरी अगली पोस्‍ट कल पढें।

दूसरी घटना तब की है , जब विवाह के पश्‍चात पहली बार अपने पति के साथ मै अपने गांव पहुंची थी। चूंकि हमारे गांव में नवविवाहिताओं को पति के साथ पूरे गांव के मंदिरों में जाकर देवताओं के दर्शन करने की प्रथा चल रही है , इसलिए हमलोगों को भी ले जाया गया। वैज्ञानिक दृष्टिकोण युक्‍त स्‍वभाव होने के बावजूद सभी देवी देवताओं के आगे हाथ जोडने में तो हमें कोई दिक्‍कत नहीं है। मान लें , वो भगवान न भी हो , सामान्‍य व्‍यक्ति ही हो , धर्मशास्‍त्रों में उनके बारे में यूं ही बखान कर दिया गया हो , पर हमारे पूर्वज तो हैं , कुछ असाधारण गुणों से युक्‍त होने के कारण ही इतने दिनों से उनकी पूजा की जा रही है , हम भी कर लें तो कोई अनर्थ तो नहीं होगा। पर आगे एक सती मंदिर आया , इसमें हमारे ही अपने परिवार की एक सती की पूजा की जाती है , मैने तो बचपन से सती जी की इतनी कहानियां सुनी है , शादी विवाह या अन्‍य अवसरों पर उनके गाने भी गाए जाते हैं ,पति के मरने के बाद उनकी चिता पर बैठने के लिए बिना भय के उन्‍होने अपना पूरा श्रृंगार खुद किया था , पर कोई उन्‍हे शीशे की चूडियां लाकर नहीं दे सके थे , न जाने कितने दिन हो गए इस बात के ,पर इसी अफसोस में आजतक हमारे परिवार में शीशे की चूडियां तक नहीं पहनी जाती है। इतनी इज्‍जत के साथ उनकी पूजा होते देखा था , इसलिए सती प्रथा को दूर करने के राजा राम मोहन राय के अथक प्रयासों को पुस्‍तकों में पढने के बावजूद मेरे दिमाग में उक्‍त सती जी या अपने परिवार की गलत मानसिकता के लिए कोई सवाल न था। पर इन्‍होने तो यहां हाथ जोडने से साफ इंकार कर दिया ‘यहां हाथ जोडने का मतलब सती प्रथा को बढावा देना है’ उनकी इस बात से घर की बूढी महिलाएं परेशान , ये किसी को दुखी नहीं करना चाहते थे , पर परिस्थितियां ही ऐसी आ गयी थी। धर्म पालन में ऐसा ही धर्म संकट खडा हो जाता है कभी कभी।

रविवार, 29 मार्च 2009

राज को राज ही रहने दो ... तर्क की क्‍या जरूरत

कई दिनों से मैं ज्‍योतिष से हटकर धर्म और अंधविश्‍वास की चर्चा करने लगी हूं , ज्‍योतिषीय के साथ साथ धार्मिक और अन्‍य भ्रांतियां भी समाज में कम नहीं , इसलिए इसकी चर्चा भी आवश्‍यक है। बात यह है कि चूंकि धर्म है , तो भगवान का होना स्‍वाभाविक है , और भगवान है , तो भक्‍त तो होंगे ही , अब दोनो है , तो दोनो के मध्‍य संबंध मजबूत करने के लिए नियम और कानून की आवश्‍यकता तो पडेगी ही। कसौटी पर कसे बिना भगवान भक्‍त को दर्शन क्‍यूं दें ? धर्म के नियमानुसार काम करो , तो पुण्‍य की प्राप्ति होगी , जिससे मरने के बाद स्‍वर्ग में जगह मिलेगी , भगवान के दर्शन होंगे। न करो तो पाप मिलेगा , मरने के बाद नरक में कष्‍ट झेलने को मजबूर होना पडेगा। आंख मूंदकर माना जाए तो भले ही धर्म की ये बातें सच्‍ची लगे , पर तर्क की कसौटी पर ये खरी तो नहीं उतरती। पर हमने अपने जीवन में पाया है कि जो अपने प्रारंभिक जीवन से ही धर्मपरायन होते हैं , धार्मिक क्रियाकलापों और पुस्‍तको आदि में जिनकी रूचि होती है ,वे मानवीय गुणों को भी महत्‍व देते हैं और गलत कार्यों से परहेज रखते हैं। ऐसी स्थिति में यह सोंचनेवाली बात अवश्‍य हो जाती है कि आखिर ऐसा क्‍या लिखा है, उन धार्मिक पुस्‍तकों में , प्राचीन कहानियों में और कर्मकांडों में , जिसे पढने के बाद किसी प्रकार की गलती करने पर हमें भय होता है ?

हो सकता है , हमें मरने के बाद स्‍वर्ग में जाने का लालच देकर अच्‍छे काम करने को कहा जाता रहा है और नरक में जाने का भय दिखाकर बुरे काम से डराया जाता रहा है , जबकि स्‍वर्ग और नरक कुछ नहीं होते हैं , पर हमें इतने तर्क करने की क्‍या जरूरत है ? आज पोलीथीन के प्रयोग से पर्यावरण का बहुत नुकसान हो रहा है , लाख चेताने के बावजूद आज की सुविधा को देखते हुए लोग इसका प्रयोग करना बंद नहीं करते हैं । वैसे तो आज के दौर में ऐसे गुरू शायद न हो , जो सबों का विश्‍वास जीत ले , पर मान ही लें कि किसी बडे गुरू , जिनकी बातें सब मानते हों , के द्वारा किसी दिन घोषणा कर दी जाए कि पोलीथीन के प्रयोग करने से लोगों को नरक जाना पड सकता है और लोग इसका प्रयोग करना बंद कर दें , तो इसमें दिक्‍कत की क्‍या बात है ? हम स्‍वर्ग या नरक के होने या न होने की बहस में क्‍यों पडें।


इसी क्रम में अचानक एक बात याद आ गयी , तब मेरे दोनो बेटे छोटे थे , गर्मियों में कभी कभी उन्‍हे अपने कमरे से अटैच बाथरूम में नहाने को छोड दिया करती थी। वे नहाकर निकलते तो सारा कमरा पानी से भीग जाया करता था। एक दिन मैने गौर किया तो पाया कि सर पर पानी डालकर वो सीधा कमरे में आ जाते हैं । मुंडन हुआ नहीं था उनका, बाल लंबे थे, कमरे में आने के बाद बाल से टपकता वह पानी फर्श को पूरी तरह गीला कर देता था। मैने उन्‍हें बताया कि नहाने के वक्‍त अंत में सर पर पानी नहीं डालते । सर पर पानी डालने के बाद एक दो बार बदन पर पानी डाल लो, फिर कमरे में आओ। मैने ऐसा इसलिए कहा , क्‍योकि जबतक वे दो बार बदन में पानी डालें , सर का पानी बह जाए और कमरे में पानी न टपके। तर्क करने की बुद्धि नहीं थी तब उनकी , उनलोगों ने इसे नियम बना लिया और जब तौलिया लेकर बाथरूम जाने और पोछ पाछकर निकलने की आदत हो गयी , तब भी वे सर में पानी डालने के बाद कम से कम दो बार बदन में पानी डालकर ही स्‍नान को पूरा समझते रहें। एक दिन पूछने पर मैने कारण बताया तो अपनी बेवकूफी पर हंसने लगे । वास्‍तव में, वे अबतक इसका कोई बडा कारण समझते आ रहे थे। आज का जमाना है , दो पीढी के लोग बैठकर हर मुद्दे पर बात कर लेते हैं ,सब समझ में आ जाता है , पर पहले तो बात होती नहीं होगी , जो नियम बन गया सो बन गया । छोटे छोटे फायदे के लिए बना दिया , कभी कारण नहीं बताया और लोग उसे ढोते रहे । यदि कारण बता दिया जाता तो शायद नहीं मानते।


किसी भी धर्म के सारे नियम गलत नहीं होते हैं , इसलिए इन नियमों या समाज में चले आ रहे अन्‍य नियमों , कानूनों के लिए तबतक पचडे में पडने की आवश्‍यकता नहीं , जबतक उससे किसी प्रकार का अहित न हो रहा हो। हां , किसी जमाने में लडकियों के सुरक्षा को देखते हुए ही सही , बालविवाह की प्रथा की जो शुरूआत की गयी , वह आज के दौर में एक सामाजिक कलंक है और इसे सुधारना हमारा कर्तब्‍य अवश्‍य होना चाहिए। इसी प्रकार की और बहुत सी बातें हैं , जिन्‍हे सुधारा जाना चाहिए। लेकिन कुछ ऐसे लोगों ने धर्म के नाम को बदनाम किया है जो वास्‍तव में धर्मपरायण नहीं हैं , जीवन भर गलतियां करना इनके स्‍वभाव में शुमार है , ये हर प्रकार का षडयंत्र रच सकते हैं और जब कुछ बुरा वक्‍त आता है और फंसने लगते हें तो भगवान को पुकारते हैं । अपनी शक्ति , अपने सामर्थ्‍य की बदौलत वे भगवान का विश्‍वास प्राप्‍त करने की कोशिश करते हैं। मगर वे नहीं जानते हैं कि धर्म सच्‍चे दिलवालों का होता है और भगवान को पैसों से नहीं , प्‍यार से जीता जा सकता ।