शनिवार, 25 अप्रैल 2009

झामुमो प्रमुख शिबू सोरेन जी की केन्‍द्रीय राजनीति में खास भूमिका नहीं रहेगी

नेताओ की व्‍यक्तिगत भविष्‍यवाणियों की इस श्रृंखला मैं सबसे पहले अपने प्रदेश के नेता से ही आरंभ कर रही हूं। शिबू सोरेन जी के बारे में यह भविष्‍यवाणी आज उनके कमजोर राजनीतिक हालात को देखते हुए नहीं कर रही हूं । जब अगस्‍त 2008 में लेफ्ट द्वारा केन्‍द्र में यू पी ए सरकार से समर्थन वापस लिया गया था और केन्‍द्र सरकार में शिबू सारेन जी की भूमिका महत्‍वपूर्ण हो गया थी, तब लोगों द्वारा सिर्फ कयास ही लगाए जा रहे थे कि केन्‍द्रीय सरकार को बचाने के एवज में उन्‍हे केन्‍द्रीय मंत्रीमंडल में जगह मिलेगी या फिर वे झारखंड के मुख्‍यमंत्री बनाए जाएंगे।


ऐसी स्थिति में भविष्‍यवाणी के लिए कुछ पत्रकार मेरे पास पहुंचे। वैसे शिबू सोरेन जी की जन्‍मकुंडली हमारे पास नहीं है। विकीपीडीया के सौजन्‍य से उनके बारे में मुझे जो जानकारी मिली है , उसके अनुसार उनका जन्‍म 11-07-1944 को हुआ है , जिसके आधार पर उनकी जन्‍मकुंडली तो नहीं , चंद्रकुंडली अवश्‍य बनायी जा सकती थी। पर उसे बनाने के बाद भी मुझे संतोष नहीं हुआ , क्‍योंकि मेरे साफ्टवेयर द्वारा उनके जीवन के उतार चढाव का जो ग्राफ बना , वह उनके जीवन के उतार चढाव से मेल खाता नहीं दिखाई पडा। वैसे यदि मैं अपने ताउजी की मानूं , जिनका जन्‍म 1932 में हुआ है तो शिबू सोरेनजी की पढाई उनके साथ हुई थी ,और इसलिए 1944 को शिबू सोरेन जी का जन्‍म माना ही नहीं जा सकता। अब ऐसी हालत में शिबू सोरेन जी के बारे में दीर्घकालीन भविष्‍यवाणियां करना मेरे लिए बहुत कठिन है। पर उनके साथ हो रही कुछ घटनाओं का गोचर के ग्रहों के साथ तालमेल को देखते हुए मुझे यह समझने में देर नहीं लगी कि जनवरी 2009 से ही उनके सामने कुछ समस्‍याएं आएंगी , जो किसी न किसी रूप में जून तक बनीं रहेगी।


ऐसा नहीं है कि गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष के द्वारा किसी के पद के बारे में कुछ भी बताया जा सकता है , फिर भी मैने केन्‍द्रीय मंत्री न होकर उनके मुख्‍यमंत्री बनने की ही संभावना जतायी थी। इसका कारण यह था मात्र तीन या चार महीने के लिए ही उनके प्रभाव में बढोत्‍तरी होने के बाद उनके सामने जो जनवरी 2009 से जो समस्‍या आनेवाली थी , वह दवाब केन्‍द्र में रहते हुए उनपर नहीं पड सकता था , क्‍योंकि केन्‍द्रीय मंत्रीमंडल के अन्‍य नेता आगे भी तनावमुक्‍त थे। इसलिए निश्चिंत होकर मैने पत्रकारों से उनके मुख्‍यमंत्री बनने के साथ ही साथ जनवरी से जून 2009 तक बहुत बडी समस्‍या में घिरने की बात भी कह दी थी , जिसे उन्‍होने अखबार में स्‍थान भी दिया था , जिसे आप देख सकते हैं।



और सचमुच जनवरी में समस्‍या के रूप में उनको मुख्‍यमुत्री के पद से इस्‍तीफा देने की नौबत का आना और अबतक उनकी स्थिति में लेशमात्र को भी सुधार न हो पाना मेरी गणना को सही ठहराता है। वैसे तो यह पूरा वर्ष ही शिबू सोरेन जी के लिए काफी बुरा रहेगा , पर जून 2009 तक उनकी स्थिति में खास गडबडी का बने रहना इस लोक सभा चुनाव में उनके लिए शुभ संकेत तो नही दे रहा। इस कारण यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि आगामी केन्‍द्रीय सरकार के गठन में शिबू सोरेन जी की कोई विशेष भूमिका नहीं रहेगी।

गुरुवार, 23 अप्रैल 2009

इस चुनाव में सरकार बनाने में पार्टी से अधिक महत्‍व तिथियों का होगा


ग्रहों के सापेक्ष राजनीतिक हालात के बारे में चल रहे मेरे पिछले दो आलेखों में परिणाम के बाद भी कम से कम 18 मई तक अनिश्चितता के साथ ही साथ सभी राजनीतिक दलों के किंकर्तब्‍यविमूढता की स्थिति की चर्चा की गयी है। उसके बाद भी काफी जोड तोड के बावजूद किसी नतीजे पर पहुंचने में पार्टियों को अच्‍छा खासा समय लग जाएगा। इस तरह इस चुनाव में सरकार बनने में पार्टी से अधिक महत्‍व तिथियों का होगा , पर यह चर्चा बाद में भी की जा सकती है ।


पहले आते हैं उस प्रश्‍न पर , जिसमें लोगों को खास दिलचस्‍पी है , वह यह कि सरकार किसकी बनेगी ? हालांकि मैं जानती हूं कि उसका जवाब देकर भी मैं कोई तीर नहीं मार लूंगी। कांग्रेस कहूं या भाजपा या फिर तीसरी या चौथा मोर्चा ,गणित के संभावनावाद के अनुसार 33 प्रतिशत या 25 प्रतिशत ज्‍योतिषियों की भविष्‍यवाणी सही होनी ही है , मेरी भविष्‍यवाणी भी सही हो जाए तो उन्‍हीं 33 या 25 प्रतिशत ज्‍योतिषियों में मुझे शामिल किया जा सकता है। इससे भी क्‍या फायदा होनेवाला ? ज्‍योतिष को न माननेवाले ज्‍योतिष को मान लेंगे , ऐसी बात नहीं है। भविष्‍यवाणी गलत हो गयी तो क्‍या 66 या 75 प्रतिशत ज्‍योतिषियों की तरह मुझे भी गलत समझ लिया जाएगा ? नहीं , जिनको मुझपर विश्‍वास हो चुका है , वो मुझे गलत नहीं कहेंगे। इसलिए धैर्य रखें , आप मेरे सारे विश्‍लेषणात्‍मक आलेखों को पढें और खुद समझ जाएं कि सरकार किसकी बनेगी , तो मेरे लिए अधिक बडी उपलब्धि होगी। यही कारण है कि मैं शुरूआत में ही कहना नहीं चाहती कि सरकार किसकी बनेगी ?


’गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के अनुसार न तो किसी पार्टी और न ही किसी संस्‍था के जन्‍म के समयानुसार बनी कुंडली को भविष्‍यवाणी करने के उपयुक्‍त माना जाता है, क्‍योंकि ग्रह से प्रभावित होने के लिए चेतना की आवश्‍यकता होती है , जो किसी पार्टी या संस्‍था में नहीं होती। पार्टी के नेताओं पर ग्रह का प्रभाव देखा जा सकता है और उन्‍हीं के भाग्‍य के अनुरूप पार्टी की स्थिति भी बनती और बिगडती रहती है। इसलिए मैं मुख्‍य नेताओं की जन्‍मकुंडली और अभी की ग्रह स्थिति से उनके तालमेल की चर्चा करने जा रही हूं। बहुतों की मेरे पास है , उसी से चर्चा शुरू कर देती हूं , पर यदि आप पाठकों के पास भी मुख्‍य नेताओं में से किसी की जन्‍मकुंडली हो तो हमें भेजने का कष्‍ट करें। सरकार किसकी बनेगी , यह फैसला खुद आप ही करें , पर हां , सभी नेताओं पर ग्रहों के पडनेवाले प्रभाव के बारे में जानने के बाद । राजनीतिक हालात पर ग्रहों के सापेक्ष और चर्चा अभी चलती रहेगी।

मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

भारतीय अंतरिक्ष के इस कार्यक्रम की वजह शुक्र चंद्र युति ही तो नहीं

25 फरवरी 2009 को मैने एक पोस्‍ट ’27 और 28 फरवरी को आसमान में एक अनोखे दृश्‍य का नजारा लें’ किया था , जिसमें शुक्र और चंद्र की युति को एक चित्र के साथ समझाया गया था। जिन्‍होने भी आसमान में उस दृश्‍य को देखा , उन्‍हें अच्‍छा लगा तथा जिन्‍होने नहीं देखा , वे अफसोस करते रह गए थे। उनके लिए एक खुशखबरी है कि वे चाहे तो अब फिर से वैसे ही दृश्‍य को देख सकते हैं। 23 और 24 अप्रैल को पुन: शुक्र और चंद्र की ऐसी ही स्थिति बननेवाली है , हालांकि इसे दोनो ही दिन शाम में नही , सुबह 4 – 5 बजे ही देखा जा सकता है । पिछली बार जैसा दृश्‍य पश्चिमी क्षितिज पर दिखाई पडा था , ठीक वैसा ही दृश्‍य इसबार पूर्वी क्षितिज पर दिखाई देगा। बिल्‍कुल वैसा ही चांद और वैसा ही शुक्र। हालांकि दो दिन पहले चंद्र और बृहस्‍पति की युति से उतना सुंदर दृश्‍य नहीं दिखाई पडा। मेरे ख्‍याल से शाम की तुलना में भोर को दिखाई पडनेवाला चंद्र शुक्र युति कुछ हल्‍की चमक ही दिखाएगा , पर लोग फिर भी इसका आनंद ले सकते हैं।


पिछली बार के शुक्र चंद्र युति के जनसामान्‍य पर पडनेवाले प्रभाव के बारे में मैने लिखा था कि ‘जनसामान्‍य तन मन या धन से किसी न किसी प्रकार के खास सुखदायक या दुखदायक कार्यों में उलझे रहेंगे , पर सबसे अधिक प्रभाव सरकारी कर्मचारियों पर पड सकता है यानि उनके लिए खुशी की कोई खबर आ सकती है। दूसरा अंतरिक्ष से संबंधित कोई विशेष कार्यक्रम की संभावना बनती दिखाई दे सकती है।‘ और इसे संयोग भी माना जा सकता है कि 26 फरवरी के शाम को ही सरकारी कर्मचारियों के लिए महंगाई भत्‍ते की घोषणा हो गयी थी। इस बार भी इसके ठीक दो दिन पहले भारतीय अंतरिक्ष के एक महत्‍वपूर्ण कार्यक्रम को अंजाम दिया गया और अनुसंधान संगठन (इसरो) के रॉकेट पीएसएलवी-सी12 ने देश के पहले जासूसी उपग्रह राडार इमेजिंग सैटेलाइट (रिसैट-2) को धरती की कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित कर दिया। अंतरिक्ष से संबंधित इस कार्यक्रम से मेरी भविष्‍यवाणी के सही होने को क्‍या इस बार भी आप संयोग ही मानेंगे ?

रविवार, 19 अप्रैल 2009

इतना जोड तोड वाला क्‍यूं होगा आगामी लोकसभा का गठन

अभी भारतवर्ष की स्थिति को देखते हुए , विभिन्‍न राजनीतिक दलों की स्थिति को देखते हुए यह कहना कि आगामी लोक सभा चुनाव का परिणाम बडा ही उलझा हुआ होगा और सरकार बनाने के लिए गंभीर जोड तोड की गुजाइश रहेगी , किसी प्रकार की भविष्‍यवाणी नहीं मानी जा सकती। पर मैं ग्रहों की स्थिति के सापेक्ष आज के चुनावी माहौल की स्थिति का तालमेल दिखाना चाह रही हूं कि चाहे सत्‍ता पक्ष के लिए हो , समर्थन देनेवालों के लिए या फिर विपक्ष के लिए , यह चुनावी माहौल इतना दवाबपूर्ण क्‍यों है ?

मेरे ख्‍याल से अपने पाठको को अब यह बताने की बिल्‍कुल भी आवश्‍यकता नहीं कि ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ अपनी भविष्‍यवाणियों के लिए ग्रहों की गति पर आधारित है । पिछले आलेखमें ही मैने बताया है कि मंद गति के ग्रह ही सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण और दवाबपूर्ण माहौल प्रदान करनेवाले होते हैं। ‘’अधिकांश ग्रहों के सामान्‍य या मंद होने के समय का माहौल महत्‍वपूर्ण और दवाबपूर्ण होता है और उस समय जो भी जातक जन्‍म लें , जीवनभर महत्‍वपूर्ण और दवाबपूर्ण माहौल प्राप्‍त करते हैं।’’


एक दूसरे आलेखमें गौर करें .......
‘’विभिन्‍न ग्रह वक्री होने के पूर्व और मार्गी होने से पश्‍चात् इस दशा से गुजरते हैं।
बुध 10-12 दिन पूर्व से वक्री होने तक तथा मार्गी होने से 10-12 दिन पश्‍चात तक मंद गति में होता है।
शुक्र वक्री होने से डेढ महीना पूर्व से वक्री होने तक तथा मार्गी होने के दिन से डेढ महीने बाद तक मंद गति में होता है।
बृहस्‍पति वक्री होने से एक महीना पूर्व से वक्री होने तक तथा मार्गी होने के दिन से एक महीने बाद तक मंद गति में होता है।
शनि वक्री होने से एक महीना पूर्व से वक्री होने तक तथा मार्गी होने के दिन से एक महीने बाद तक मंद गति में होता है।
मंगल वक्री होने से दो महीने पूर्व से वक्री होने तक तथा मार्गी होने के दिन से दो महीने बाद तक मंद गति में होता है। ‘’


अब 2009 की ग्रहस्थिति से आपको रूबरू कराती हूं .......
बुध 7 मई को वक्री और 31 मई को मार्गी हो रहा है , जाहिर है यह 25 अप्रैल से 7 मई तक तथा 31 मई से 12 जून तक मंद गति में होगा।
18 अप्रैल को शुक्र मार्गी हो रहा है , इसका अर्थ यह कि 18 अप्रैल से 10 जून तक यह भी मंद गति का होगा।
बृहस्‍पति 15 जून को वक्री हो रहा है , जाहिर है यह भी 15 मई से 15 जून तक मंद गति में होगा।
शनि 17 मई को मार्गी हो रहा है , इसका मतलब यह भी 17 मई से 17 जून तक मंद गति में होगा।‘


एक मंगल को छोडकर बाकी सभी चार चार ग्रहों का यानि बुध , शुक्र , बृहस्‍पति और शनि का अप्रैल , मई और जून में मंद गति में होना भचक्र में सामान्‍य स्थिति नहीं है और यही कारण है कि इनके प्रभाव से भारतीय राजनीति में इतना दवाबपूर्ण माहौल तैयार हो गया है । राजनीतिक हालात पर ग्रहों के सापेक्ष और चर्चा अगले आलेख में ।