गुरुवार, 7 मई 2009

प्रेम विवाह या अभिभावक द्वारा आयोजित विवाह


आज के परिवेश में बच्‍चों के पालन पोषण में अभिभावकों की बढती उदारता से बच्‍चे न सिर्फ स्‍वतंत्र , वरन उच्‍छृंखल भी हो गए हैं। इस कारण अपने दोस्‍तों के साथ उनके व्‍यवहार में काफी खुलापन आ गया है , जिसको देखते हुए पुराने ख्‍यालात के अभिभावक अक्‍सर परेशान हो जाते हैं। यही कारण है कि आजकल सयाने बेटे बेटियों की कुंडलियों को लेकर आनेवाले अभिभावकों का एक सामान्‍य सा प्रश्‍न हो गया है कि उनके बच्‍चे प्रेम विवाह करेंगे या उनके द्वारा तय किया गया विवाह ? इस प्रश्‍न का जवाब देने के लिए कुंडली के सप्‍तम भाव पर ही ध्‍यान दिया जा सकता था , क्‍योंकि परंपरागत ज्‍योतिष में यही भाव पति , पत्‍नी , घर गृहस्‍थी और दाम्‍पत्‍य जीवन से लेकर प्‍यार और रोमांस तक के बारे में बतलाता है। यही सोंचकर मैने प्रेम विवाह करने वाले अनेको लोगों की कुंडलियों का परंपरागत ढंग से विवाह करनेवालों की कुंडलियों के साथ तुलनात्‍मक अध्‍ययन करने में काफी समय जाया किया , पर फल वही ढाक के तीन पात। काफी माथापच्‍ची में कुछ दिन व्‍यतीत होने और किसी निष्‍कर्ष पर न पहुंच पाने से मैं कुछ परेशान ही थी कि अचानक एक काफी बुजुर्ग महिला की कुंडली मेरे पास पहुंची , जिन्‍होने प्रेम विवाह किया था और उस विवाह के कारण उन्‍हें वर्षों तक बहुत ही दर्दनाक परिस्थितियों से गुजरना पडा था। कुछ दिनों तक अपने दोनो परिवारों और समाज से बहिष्‍कृत होने के बाद जब वह ससुराल में रहने लगी थी तो उनपर चोरी तक का इल्‍जाम लगाया गया था। उक्‍त महिला की जन्‍मकुंडली में प्रेम विवाह के कारण उत्‍पन्‍न होने का यह संघर्ष दिखायी पड रहा था। मुझे इस बात पर आश्‍चर्य हुआ कि जब उनकी कुंडली में प्रेम विवाह स्‍पष्‍ट दिखाई पड रहा है , तो अन्‍यों में क्‍यों नहीं दिखाई दे रहा ? 

पर तुरंत बाद ही इसका रहस्‍य मेरी समझ में आ ही गया , वह यह कि 20-25 वर्ष पहले के सामाजिक और पारिवारिक स्थिति में विवाहपूर्व प्रेम मानो एक तरह का अपराध ही था और प्रेम विवाह तो बहुत ही असामान्‍य तरह की घटना होती थी । यहां तक कि विवाह तय होने के बाद भी युवक युवतियों को एक दूसरे से मिलने की सख्‍त मनाही होती थी। बहुत उन्‍नत विचारों वाले परिवार में ही युवा अपने जीवन साथी को देख पाते थे , अन्‍यथा अधिकांश जगहों पर विवाह के बाद ही अपने जीवनसाथी की एक झलक तक मिलती थी। मुझे याद आया , जब मैं कालेज में पढ ही रही थी , अपने कालेज के एक सीनियर के प्रेम की बात उसके परिवारवालों के द्वारा स्‍वीकार नहीं किए जाने पर उन्‍होने छुपकर कोर्ट में विवाह कर लिया था तो दोनो ही परिवार के लोग इसे पचा नहीं सके थे और लगभग दस वर्ष तक उन्‍हें अपने परिवारवालों से मिले जुले बिना ही काटनी पडी थी , जबकि दोनो पढे लिखे और भौतिकी के लेक्‍चरर थे और उन्‍होने सोंच समझकर ही निर्णय लिया था। हां , स्‍वजातीय या अपने किसी परिचित के संतान होने पर एक दो प्रतिशत से भी कम मामलों में ही सही , प्रेम करनेवालों की सुन ली जाती थी और उन्‍हें खुशी खुशी वैवाहिक बंधन में बंधने की स्‍वीकृति मिलती थी। 

पर आज प्रेम विवाह या परिवार द्वारा आयोजित किए जानेवाले विवाह में कोई अंतर नहीं रह गया है। यदि युवा किसी से प्रेम भी करते हैं तो भले ही कुछ दिन इंतजार करना पडे , पर अपने अपने अभिभावकों को विश्‍वास में ले ही लेते हैं और आखिर में उनकी रजामंदी से प्रेम विवाह को अभिभावक के पसंदीदा विवाह में बदल ही दिया जाता है। सारे नाते रिश्‍तेदारों के मध्‍य उत्‍सवी माहौल में न सिर्फ उनका विवाह ही करवाया जाता है , वरन् उनके प्रेम का कोई गलत अर्थ न लगाते हुए उनके चुनाव की प्रशंसा भी की जाती है। यदि परिवारवालों की पसंद के अनुसार भी विवाह हो रहा हो , तो भी विवाह पूर्व युवकों और युवतियों को एक दूसरे से मिलने और एक दूसरे को समझने की पूरी स्‍वतंत्रता मिल ही जाती है। इस कारण उनके मन में न तो कोई संदेह होता है और न ही अनिश्चितता । अब इस स्थिति में इन दोनो प्रकार के विवाह को परिभाषित करने के लिए क्‍या कोई विभाजन रेखा खींची जा सकती है ? यही कारण है कि हमें आजकल के युवकों और युवतियों की जन्‍मकुंडली में भी इस बात का कोई संकेत नहीं दिखाई देता है कि जातक प्रेम विवाह करेंगे या अरेंज्‍ड ?

सोमवार, 4 मई 2009

क्‍या गणित में हर प्रश्‍न का जवाब ‘=’ में ही होता है ?

इसमें कोई शक नहीं कि गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष ब्‍लागिंग की मदद से अपनी पहचान बना पाने में कामयाबी प्राप्‍त करता जा रहा है , पर कुछ दिनों से पाठकों द्वारा इसके द्वारा ज्‍योतिष के विज्ञान कहे जाने के विरोध में कुछ आवाजें भी उठ रही हैं। वैसे तो सबसे पहले मसीजीवी जी ने ज्‍योतिष को विज्ञान कहे जाने पर आपत्ति जतायी थी , पर अभी हाल में ज्ञानदत्‍त पांडेय जी के द्वारा यह प्रश्‍न उठाया गया तो मुझे काफी खुशी हुई , क्‍योंकि उनकी सकारात्‍मक टिप्‍पणियां हमेशा ही मेरा उत्‍साह बढाती आयी है। उनके बाद एक दो और पाठक भी इसी प्रकार के प्रश्‍न करते मिले हैं। आज उन सबके द्वारा उठाए गए प्रश्‍न का तर्कसंगत जवाब देना मैं उचित समझ रही हूं और शायद पहली बार हो रही इस प्रकार की सकारात्‍मक चर्चा करते हुए मुझे काफी खुशी भी हो रही है। मैं चाहूंगी कि इस प्रकार के और प्रश्‍न भी सामने आएं , मैं सबकी जिज्ञासा को शांत करने का प्रयास करूंगी। 

सबसे पहले गणित विषय को ही लें। गणित में हर प्रश्‍न का जवाब ‘=’ ही नहीं होता है। इसमें किसी समीकरण का उत्‍तर ‘लगभग’ में होने के साथ ही साथ ‘>’ और ‘<’ या ‘=<’ और ‘=>’ में भी हो सकता है। कोई समीकरण ‘लिमिट’ में भी अपना जवाब देती है । सभी समीकरण एक सीधी रेखा का ही ग्राफ नहीं बनाती , पाराबोला और हाइपरबोला भी बना सकती है। गणित के संभावनावाद का सिद्धांत संभावना की भी चर्चा करता है। और चूंकि भौतिकी जैसा पूर्ण विज्ञान के भी सभी नियम गणित पर ही आधारित होते हैं , तो भला इसके भी हर प्रश्‍न का जवाब ‘=’ में कैसे दिया जा सकता है ? और बाकी विज्ञान जो भौतिकी की तरह पूर्ण विज्ञान न हो तो उसके प्रश्‍नों का जवाब ‘=’ में देना तो और भी मुश्किल है। 

एलोपैथी चिकित्‍सा विज्ञान के बहुत से प्रश्‍नों का जवाब ‘=’ में दिया जा सकता है , पर सबका दे पाना असंभव है , बहुत से प्रश्‍नों का जवाब ‘लगभग’ और बहुत से प्रश्‍नों का जवाब ‘संभावनावाद’ के नियमों के अनुसार दिया जा सकता है। पहले एक ही लक्षण देखकर चार प्रकार के बीमारी की संभावना व्‍यक्‍त की जाती है , जिससे पहले डाक्‍टरों को अक्‍सर दुविधा हो जाया करती थी , आज जरूर विभिन्‍न प्रकार के टेस्‍टों ने डाक्‍टरों का काम आसान कर दिया है , तो क्‍या पहले मेडिकल साइंस विज्ञान नहीं था ? अभी तक कोई खास सफलता नहीं मिलने के बावजूद मौसम विज्ञान कहा जाता है , क्‍योंकि इस क्षेत्र में बेहतर भविष्‍यवाणी कर पाने की संभावनाएं दिखाई पड रही है। क्‍या भूगर्भ विज्ञान की भूगर्भ के बारे में की गयी गणना बिल्‍कुल सटीक रहती है ? नहीं , फिर भी उसे भूगर्भ विज्ञान कहा जाता है। संक्षेप में , हम यही कह सकते हें कि जरूरी नहीं कि वैज्ञानिक सिद्धांत हमें सत्‍य की ही जानकारी दे , जिन सिद्धांतो की सहायता से हमें सत्‍य के निकट आने में भी सहायता मिल जाए , उसे विज्ञान कहा जाता है। 

यदि ज्‍योतिष शास्‍त्र के नियमों की बात करें , तो इसके कुछ नियम बिल्‍कुल सत्‍य हैं , मौसम से संबंधित जिस सिद्धांत के बारे में कल चर्चा हुई , वह बिल्‍कुल सत्‍य है। ऐसा इसलिए है , क्‍योंकि इस नियम को स्‍थापित करने में ग्रहों को छोडकर सिर्फ भौगोलिक तत्‍वों का ही प्रभाव पडता है। ग्‍लोबल वार्मिंग का ही यह असर माना जा सकता है कि आज यह योग कम काम कर रहा है और शायद आनेवाले दिनों में इतनी बरसात के लिए भी यह योग काम करना बंद कर दे। 14 – 15 जून को आप पुन: इस सिद्धांत को सत्‍यापित होते देख सकते हैं , हालांकि वह मानसून का महीना है , इसलिए स्थिति के इस बार से भी भीषण रूप में होने की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता। भारत में चारो ओर आंधी , तूफान के साथ ही साथ जोरों की बारिश भी होती रहेगी। पर ज्‍योतिष के कुछ नियम सत्‍य के निकट भी होते हैं , और कुछ के बारे में तो सिर्फ संभावना ही व्‍यक्‍त की जा सकती है , दावा नहीं किया जा सकता। ऐसा इसलिए होता है , क्‍योंकि उन नियमों पर सामाजिक , राजनीतिक , भौगोलिक या अन्‍य बहुत से कारकों का प्रभाव देखा जाता है । पर इसका अर्थ यह नहीं है कि यह एक विज्ञान नहीं है।

रविवार, 3 मई 2009

अब इसे विज्ञान न कहूं तो क्‍या अंधविश्‍वास कहूं‍ ??????????

अभी अभी पारूलजी का पोस्‍टपढा। इतनी भीषण गर्मी में बारिश का इंतजार भला किसे न हो , पर मुझे तो खास इंतजार था इसका , क्‍योंकि मौसम से संबंधित मेरे सिद्धांतों के खरे उतरने की एक बार और बारी जो आ रही थी। मैने मौसम की भविष्‍यवाणी की एक अलग विधा के रूप में अपने ज्‍योतिषीय सिद्धांतों को विकसीत किए जाने की चर्चा करते हुए अपने इस पोस्‍टमें लिखा था कि 1 से 4 मई के मध्‍य गर्मियों का महीना होने के बावजूद भारत में अधिकांश जगह बारिश का एक बडा योग बन रहा है। 

1 जनवरी तक गर्मी के प्रचंड तौर पर बढने के बावजूद मुझे विश्‍वास था कि 2 और 3 मई चारो ओर सुहावना मौसम लेकर आएगी। मौसम विज्ञान के अरबों रूपए के खर्च के बावजूद हमारे सिद्धांत मौसम के बारे में दूर तक की जानकारी देने में उससे अधिक सक्षम हैं , इस बात कर विश्‍वास तो हमें था ही , पर हमें पहली बार यह जानकर निराशा हुई कि मौसम विभाग उपग्रह से लिए जाने वाले आसमान के इतने सारे चित्रों के बावजूद एक दो दिनों के अंदर की जानकारी भी मुझसे अधिक सटीक तौर पर नहीं दे सकता है। मेरे दिए हुए तिथि के आ जाने के बावजूद 2 मई के दोपहर तक तापमान का बढते जाना जब मेरी चिंता बढा रहा था , तो मैने मौसम विभाग की ओर से की जानेवाली भविष्‍यवाणियों पर गौर किया। पर तबतक मौसम विभाग गर्मी के निरंतर बढने की ही भविष्‍यवाणियां ही कर रहा था। 

पर 15 वर्षों से जांचे गए मेरे सिद्धांत यूं मुझे धोखा नहीं दे सकते थे। 2 मई के दोपहर बाद ही आसमान बादलों से भरने लगा और मौसम सुहावना हो गया। रात में समाचार से मालूम हुआ कि प बंगाल और राजस्‍थान में बारिश भी हुई है। इस बारिश के बाद ही मौसम विभाग की ओर से भविष्‍यवाणी की गयी कि दो चार दिनों मे आंधी , पानी आ सकती है। आधी खुशी तो मुझे बंगाल और राजस्‍थान के बारिश से ही मिल गयी थी , पर पूरी खुशी तो मुझे तब मिलती है , जब मेरे शहर में भी बारिश हो जाती है। इसके लिए भी मुझे अधिक इंतजार नहीं करना पडा। 3 मई यानि आज 3 बजे से ही धूल भरी आंधी के बाद हुई बारिश ने पूरे वातावरण को सुहावना और मेरे सिद्धांतो का सत्‍यापन भी कर दिया । इतने सारे लोगों के सहयोग और सरकार के इतने खर्च के बावजूद जिस भविष्‍यवाणी को मौसम विभाग दो दिन पहले नहीं कर पाता , उसे हमलोग अकेले बिना खर्च के ढाई महीने पहले करने में समर्थ हैं । बिना आधार के तिथियुक्‍त ऐसी भविष्‍यवाणी कर पाना किसी के लिए संभव है भला ? इसके बाद भी सभी कहते हैं मै ज्‍योतिष को विज्ञान न कहूं , तो आप ही बताइए , मैं इसे अंधविश्‍वास कहूं ?