शुक्रवार, 21 अगस्त 2009

22-23-24 अगस्‍त 2009 समेत आनेवाले डेढ महीने आपके लिए सुखद होंगे या दुखद ??

इसी वर्ष इसी महीने की 22 , 23 और 24 तारीख को आसमान में ग्रहों की एक खास खगोलीय स्थिति बनेगी , जिस नजारे को देखा तो नहीं जा सकता, पर व्‍यक्तिगत , सामाजिक , राष्‍ट्रीय और अंतर्राष्‍ट्रीय तौर पर इसका ज्‍योतिषीय प्रभाव अवश्‍य महसूस किया जा सकता है। वैसे तो ग्रहों की इस खास स्थिति का प्रभाव किशोरों पर ही अधिक पडता है , खासकर 50 प्रतिशत से अधिक टीन एजरों पर , लेकिन अन्‍यों को भी अपने प्रभाव से अछूता नहीं छोडता। पूरी जनसंख्‍या के लगभग 30 से 40 प्रतिशत लोग इन दिनों में अचानक उपस्थित हुए किसी छोटे या बडे महत्‍वपूर्ण कार्यक्रम , छोटे बडे सुख या छोटे बडे दुख भरे माहौल में व्‍यस्‍त हो जाते हैं , वैसे यह अधिकांश के लिए सुखदायी , पर कुछ के लिए कष्‍टदायी तो होती ही है । यहां से यानि 22-23-24 अगस्‍त इस कार्यक्रम , सुख या कष्‍ट की जो शुरूआत होगी या दो चार दिन पहले शुरू हो चुकी होगी , वो कमाधिक होते हुए 7 अक्‍तूबर 2009 के बाद ही निश्चिंति दे सकेगी। इस मध्‍य 7 सितम्‍बर से 30 सितम्‍बर तक , खासकर 20 सितम्‍बर के आसपास का समय थोडी अधिक अनिश्चितता का हो सकता है।

किसी भी वर्ष अप्रैल में जन्‍मलेनेवालों पर इस ग्रह स्थिति का अच्‍छा ही प्रभाव देखा जा सकता है , पर 1945 , 1951 , 1958 , 1964 , 1971 , 1978 , 1984 , 1991 , 1997 के वर्ष में जिनलोगों ने अप्रैल में जन्‍म लिया हो , उनके लिए यह ग्रहयोग खासा अच्‍छा रहेगा।यहां तक कि इन वर्षों के आसपास के वर्षों यानि 1944 , 1946 , 1950 , 1952 , 1957 , 1959 , 1963 , 1965 , 1970 , 1972 , 1977 , 1979 , 1983 , 1985 , 1990 , 1992 , 1996 , 1998 में भी अप्रैल में जन्‍म लेने वालों पर कुछ अच्‍छा प्रभाव पड सकता है। यही नहीं , 1945 , 1951 , 1958 , 1964 , 1971 , 1978 , 1984 , 1991 , 1997 में अप्रैल के आसपास यानि मार्च और मई में जन्‍म लेनेवाले भी इसके अच्‍छे प्रभाव में आ सकते हैं। इसके अतिरिक्‍त मेष राशिवालों परभी इस खास ग्रह स्थिति का अच्‍छा प्रभाव पड सकता है।

इसके विपरीत , किसी भी वर्ष फरवरी में जन्‍म लेनेवालों पर इसका कुछ बुरा प्रभाव देखा जा सकता है , पर 1942 , 1948 , 1955 , 1962 , 1968 , 1975 , 1981 , 1988 , 1994 के वर्ष में जिन लोगों ने फरवरी में जन्‍म लिया हो उनके लिए यह ग्रह योग खासा बुरा होगा ।यहां तक कि इन वर्षों के आसपास के वर्षों यानि 1941 , 1943 , 1947 , 1949 , 1954 , 1956 , 1961 , 1963 , 1967 , 1969 , 1974 , 1976 , 1980 , 1982 , 1987 , 1989 , 1993 , 1995 में भी फरवरी में जन्‍म लेनेवालों पर कुछ बुरा प्रभाव पड सकता है । यही नहीं , 1942 , 1948 , 1955 , 1962 , 1968 , 1975 , 1981 , 1988 , 1994 में फरवरी के आस पास यानि जनवरी और मार्च में जन्‍म लेनेवाले भी इसके बुरे प्रभाव में आ सकते हैं। इसके अतिरिक्‍त , कुंभ राशिवालों परभी इस खास ग्रह स्थिति का बुरा प्रभाव देखा जा सकता है।

उपरोक्‍त चार्ट को देखकर आप तय कर सकते हैं कि आप पर इस ग्रह स्थिति का सुखद या दुखद प्रभाव पडनेवाला है। पर यदि आप इन दोनों मे से किसी ग्रुप में नहीं आ रहें , तो बस 24 अगस्‍त तक के माहौल का इंतजार करें । सुखद या दुखद परिस्थितियां आपसे संयुक्‍त होकर आपको महसूस करा ही देगी , अन्‍यथा समझ लें कि इस ग्रह का आपपर कोई बुरा प्रभाव नहीं पडने जा रहा , आप उन 60 से 70 प्रतिशत लोगों में हैं , जिनपर इस ग्रहयोग का कोई प्रभाव नहीं पडने जा रहा । मेरी शुभकामना रहेगी कि उपरोक्‍त ग्रह स्थिति के कारण किसी सुखद परिस्थिति से ही आपका सामना हो , पर यदि उल्‍टी नौबत आ ही गयी , तो घबराने की कोई आवश्‍यकता नहीं , इस ग्रह के प्रभाव की अधिकतम सीमा 7 अक्‍तूबर तक ही है। इतनी मुसीबतें झेलकर हमलोग आजतक जीवन की नैय्या पार लगाते आए हैं , इस डेढ महीने को भी पार लगा पाना हमारे लिए अधिक कठिन नहीं होगा , 7 अक्‍तूबर 2009 निकट ही तो है।

मंगलवार, 18 अगस्त 2009

हिन्‍दी ब्‍लाग जगत में किसी मुद्दे पर सार्थक बहस क्‍यूं नहीं हो पाती है ??


ब्‍लाग साहित्‍य है या नहीं ? कुछ दिनों तक ब्‍लोगरों के मध्‍य इस बात पर लंबी बहस चली , पर कुछ नतीजा न तो निकलना था और न ही निकला। इसी कडी के एक आलेख को पढकर मेरे दिमाग मे ये आया कि ‘यदि कुछ लोग पुस्‍तक में लिखी बातों को ही साहित्‍य मानते हैं, तो छोड दिया जाए इस बहस को। ब्‍लाग में साहित्‍य के स्‍तर की रचना होगी , तो प्रकाशक स्‍वयं उसे पुस्‍तक का रूप दे देंगे। जो पुस्‍तक बन गयी वो साहित्‍य और जो न बनी , वह ब्‍लाग , बात खत्‍म’ । लेकिन टिप्‍पणी में कह गयी ‘ब्‍लाग साहित्‍य है या नहीं यह विवाद का विषय होना ही नहीं चाहिए’ । अब क्‍यूं , यह न कह सकी तो बाद में पढनेवाले क्‍या जवाब दें। वहीं बहस को समाप्‍त होना ही है। लेकिन किसी विषय पर बहस बुरी बात तो नहीं। कोई भी दृष्टिकोण , कोई भी सोंच बुरा नहीं होता। सबके पक्ष और विपक्ष में तर्क दिए जा सकते हैं , पर देश , काल और परिस्थिति के अनुसार एक पक्ष का तर्क कमजोर और एक पक्ष का तर्क मजबूत हो जाता है। और जो मजबूत होती है , वही उस देश काल में सर्वमान्‍य हो जाती है। 


पर पता नहीं , इतने बुद्धिजीवी वर्ग के होने के बावजूद हिन्‍दी ब्‍लाग जगत में जब भी कोई बहस होती है , वह तर्कसंगत नहीं होती , बस दूसरों को नीचा दिखाने के प्रयास में बेमतलब के बहस किए जाते हैं। इतनी बात तो मेरी समझ में भी आ गयी है कि प्रवीण जाखड जी को हिन्‍दी ब्‍लाग जगत के एक बडे मुद्दे पर बात करनी थी , पर इस मुद्दे को प्रस्‍तुत करने का ये कोई ढंग था। फिर भी मैने पढा , अपनी सफाई दी और उन्‍हें जन्‍माष्‍टमी की शुभकामनाएं देती हुई सो गयी। पर सुबह से शाम तक आयी टिप्‍पणियो ने मेरा मूड और खराब कर दिया। अब यदि मैं सफाई भी न दूं तो फिर मेरा ब्‍लाग लिखने का क्‍या फायदा ? कुछ दिन पूर्व अपने व्‍यक्तिगत कष्‍ट को भी आप पाठकों से बांटकर कम करने का प्रयास किया था , तो यह तकलीफ तो फिर भी आप सबसे जुडी हुई थी , न लिखने का कोई सवाल ही न था। आप सबों ने बहुत हिम्‍मत दी , आपकी टिप्‍पणियों से हौसला मिला कि आप सब साथ हैं , वरना मैं तो घबडा ही गयी थी कि मैने कोई बडी गलती कर डाली है। 


बहुत सारे लोगों ने मेरे टिप्‍पणी देने के पक्ष में विचार रखें , तो टिप्‍पणी देने के विपक्ष वाले लोगों को भी अपने तर्क देने चाहिए थे , यदि उनका तर्क हमसे वजनदार होता , तो आगे मैं टिप्‍पणियां करना बंद कर देती। पर किसी ने ऐसा कोई तर्क नहीं दिया , उल्‍टा हमपर दोषारोपण करने लगें। यह कहकर कि मेरा तो विवादों में रहने का पुराना इतिहास है। उन्‍हें मैं इतनी सफाई अवश्‍य देना चाहूंगी कि मेरा इतिहास उलटकर देख लें , कभी भी मैने विवाद की शरूआत की हो। मैं तो विवादित मामलों में कभी एक टिप्‍पणी तक नहीं करती , पर क्‍या करूं , जब प्रकृति ने मुझे विवादास्‍पद विषय के अध्‍ययन को ही मजबूर कर दिया है । अब कोई मेरे बारे में अपने ब्‍लाग पर कुछ लिखेंगे , तो मुझे तो जवाब देना ही होगा । एक पाठक कहते हैं कि सत्‍य बहुत कडवा होता है , मेरे विचार से वे गलत हैं , सत्‍य बहुत मीठा होता है , यदि उसे अच्‍छे ढंग से प्रस्‍तुत किया जाए। याद है मुझे , जब कपिलदेवजी के ईमेल से व्‍यथित होकर मैने अपने ब्‍लाग पर एक पोस्‍ट डाला था। सभी टिप्‍पणीकर्ताओं ने कपिलदेव जी के विपक्ष में और मेरे पक्ष में टिप्‍पणी की थी , पर उससे अधिक प्रभाव मुझपर विष्‍णु वैरागी जी की टिप्‍पणी का पडा था , जिन्‍होने मुझे लिखा कि मुझे ईमेल की बातें सार्वजनिक नहीं करनी चाहिए थी । मैने उनको ईमेल पर ही जवाब दिया कि मैं अब से आपके कहे अनुसार ही करूंगी और उसके बाद मिलनेवाले वैसे सारे ईमेल मै नष्‍ट कर दिया करती हूं । 


सही तर्क दो तभी तो सब सुनेंगे न , अब आप तर्क देते हो कि मैं महिला हूं , इसलिए मेरे पक्ष में इतनी सारी टिप्‍पणियां मिलती है , तो आप एकदम गलत हो। विश्‍व की सर्वश्रेष्‍ठ सी ई ओ चुने जाने के बाद अपने इंटरव्‍यू में इंदिरा नूई ने कहा कि ईमानदारी से पुरूषों के समकक्ष आने में एक महिला को उनसे दसगुणा काम करना पडता है। मैंने जब से ब्‍लाग लिखना शुरू किया तब भी महिला थी , आज अचानक नहीं हो गयी हूं। पर पहले मेरे आलेखों को लोग बहुत कम पढते थे , मैने एक एक सीढी चढते हुए आज यह मुकाम हासिल किया है , वरना कौन जानता था मुझे। ब्‍लाग जगत में कदम रखे कुछ ही दिन हुए थे कि क्रिकेट मैच होने लगे । दरअसल मैच की भविष्‍यवाणियां करना हमारे लिए आसान नहीं , पर एक सिद्धांत की पकड हुई है ,जिससे किसी दिन किसी समय भारत के अधिकांश लोग खुशी या कष्‍ट में होंगे , इसका अंनुमान लग जाता है। इस आधार पर ही मैने मुंबई वाली घटना के दिन एक आलेख में भारतवर्ष के लोगों के परेशान बने रहने का जिक्र किया था। इस प्रकार से की जानेवाली मैच की भविष्‍यवाणी काफी हद तक सही होती है। लगभग तीन चार दिन मेरे बताए अनुरूप ही मैच की स्थिति रही , चौथे दिन की तो खासकर याद है , जब पूर्वोत्‍तर के किसी शहर में मैच हो रहा था , मैं भारत की खुशीवाले समय में आधे घंटे के अंतर को देखते हुए थोडी शंकित होकर आलेख लिख ही रही थी कि समाचार में बताया गया कि उस शहर में अंधेरा जल्‍दी हो जाता है , इस कारण मैच आधे घंटे पहले शुरू होगा। मैने उस आलेख के अंत में जोड दिया कि अभी अभी मिले समाचार के अनुसार मैच के आधे घंटे पहले शुरू होने की बात है , इस स्थिति में तय है कि मैच भारत के पक्ष में ही होगा और सचमुच वैसा ही हुआ । पर पांचवे दिन मेरी भविष्‍यवाणी उल्‍टी हो गयी। इसका कारण तो मुझे बाद में पापाजी से डिस्‍कशन करने पर मालूम हो ही गया कि जिस उत्‍सवी माहौल को देखकर हम भारत की जीत की उम्‍मीद करते थे , वह तो जीत न होने के बाद भी था , क्‍यूंकि उस दिन विजयादशमी के पहले की नवमी थी। इस तरह से हमारी भविष्‍यवाणियों में अपवाद हो जाया करता है , पर मेरी सही हुई भविष्‍यवाणी पर न ध्‍यान देकर गलत हुई भविष्‍यवाणी को चिट्ठा चर्चा में उछाला गया था। चिट्ठा चर्चा में मेरा मजाक उडाए जाने के बाद मैने तो उन्‍हें अपने ब्‍लोग से हटा ही दिया , वरन् गुस्‍से में मैच की भविष्‍यवाणियां करनी बंद भी कर दी। मेरे वर्डप्रेस के ब्‍लाग के प्रारंभिक पाठकों के राइटर में वो आलेख सुरक्षित हो सकते हैं । यहां प्रश्‍न यह उठता है कि क्‍या मैं उस दिन महिला नहीं थी ?




मैने एक एक सीढी आगे बढते हुए यहां तक की यात्रा तय की है और मुझे आगे भी जाना है। मेरी पाठक संख्‍या और टिप्‍पणियां इस दौरान लगातार बढी हैं , मै सबों को आगे बढने के लिए स‍हयोग भी करना चाहती हूं। यदि मैं कहीं पर गलत हूं , तो सही तर्क देकर मुझे समझाया जाए। पर जहां तक मैं समझती हूं कि जमाने के साथ हर बात का ढंग बदलता है । पुराने जमाने में अभिभावको द्वारा ही न सिर्फ बच्‍चों को काफी डांट फटकार लगायी जाती थी , शिक्षकों द्वारा भी। कालेज में प्रवेश के वक्‍त रैगिंग की जाती थी , यहां तक कि घर की बहू को हर वक्‍त काम के लिए ताने मारे जाते थे , बडे हो जाने पर भी हर निर्णय के लिए बुजुर्गों पर निर्भर रहना पडता था , पर आज इन सबकी जरूरत नहीं । मालूम है , क्‍यों ? आज के जीवन में किसी भी क्षेत्र में सफल होने के लिए आत्‍मविश्‍वास का अधिक महत्‍व रह गया है । किसी के पास गुण ज्ञान कितना भी हो , आत्‍मविश्‍वास न हो , तो फेल हो जाता है , जीवन की परीक्षा में तो अवश्‍य । इसलिए न शिक्षक , न अभिभावक और न ही दुनिया उसे अधिक टोकना पसंद करती है । मुझे याद भी नहीं कि मैने अपने बच्‍चों को कभी एक चपत भी लगायी हो। इतनी कम उम्र में भी अपना निर्णय वे स्‍वयं लेते हैं , मैं गलत रहूं , तो मुझे भी टोक देते हैं , उनका यह आत्‍मविश्‍वास मुझे अच्‍छा लगता है और अच्‍छे विद्यार्थियों में उनका नाम शुमार है। आज के युग को देखते हुए मेरा मानना है कि बस नए ब्‍लोगरों का हौसला बढाते जाओ , वे खुद अच्‍छा लिख लेंगे , उनमें इतना शौक है , इतनी प्रतिभा है , तभी तो उन्‍होने हिम्‍मत जुटायी है । यहां जो एक कदम चलेंगे , उनके लिए भी ‘वाह , वाह ’ , जो दो कदम चलेंगे , उनके लिए भी ‘वाह , वाह ’ और जो दौडेंगे , उनके लिए भी ‘वाह , वाह ’ , यह रेस थोडे ही है न कि इसमें एक सेकण्‍ड के सौंवे अंतराल से भी हार हो जाएगी। जितनी प्रैक्टिस होगी , उतनी निखरेंगे वे खुद , कुछ सिखाने की जरूरत नहीं , कुछ समझाने की जरूरत नहीं , सूरदास , कबीरदास को किसने लिखना पढना सिखाया था , यह अपनी प्रतिभा होती है , बस हम तो यही कहेंगे कि हौसला बढाते चलो , जबतक उसके विचारों से आपत्ति न हो या उसकी बातें किसी को आहत करने वाली न हो !!

रविवार, 16 अगस्त 2009

प्रवीण जाखड जी ... मेरी ही प्रतिष्‍ठा का जनाजा निकालना था आपको !!

“बहुत सुंदर…..आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्लॉग जगत में स्वागत है…..आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिंदी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिंदी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्त करेंगे …..हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।“

यही वह स्‍वागत संदेश है जो किसी ब्‍लागर के नए पोस्‍ट पर नवम्‍बर 2008 से प्रतिदिन मेरे द्वारा चिपकाया जाता रहा है । उससे पहले भी मेरे ईमेल बाक्‍स में चिट्ठाजगत का संदेश आया करता था , मै बहुत से पुराने चिट्ठाकारों के द्वारा इस प्रकार के संदेश लिखा देखा करती थी। मैं जब ब्‍लाग जगत में आयी थी , तो मेरा भी स्‍वागत किया गया था , जो मुझे अच्‍छा लगा था। इस कारण दूसरों के स्‍वागत की इच्‍छा रहने के बावजूद भी मेरे ब्राडबैण्‍ड में लिमिटेड डाउनलोड होने की वजह से मेरे लिए यह कर पाना संभव नहीं था। नवम्‍बर 2008 में जैसे ही अनलिमिटेड डाउनलोड का पैकेज लिया , मैने भी वह परंपरा शुरू की , जो मेरे पहले से कइयों द्वारा की जा रही थी । मेरे साथ अन्‍य लोग भी इसमें शामिल हैं। कभी कभी कोई पुराने ब्‍लागर नए ब्‍लाग्‍स बनाया करते हैं , इसलिए इस स्‍वागत संदेश मैने ‘आपके इस सुंदर से चिट्ठे के साथ आपका स्‍वागत’ लिखा है , ताकि उन्‍हें बुरा न लगे । इस कार्य में मुझे कोई बुराई दिखती तो जाहिर है , मैं अपना इतना समय तो जाया नहीं करती। इन नौ महीनों मैं तो कापी पेस्‍ट करते नहीं थकी , पर इसे पढते पढते प्रवीण जाखडजी तो हांफने लगे। वे जहां जाते थे , मेरी टिप्‍पणियां सांप की तरह कुंडली मारे बैठी होती थी , सौभाग्‍य रहा उनका कि यह विषधर नहीं थी , नहीं तो बेचारे की जान पर भी पड सकती थी।

मेरे ही शब्‍दों ‘बहुत सुंदर’ के साथ शुरू करते हुए उनके द्वारा लिखा गयापरसों का आलेख‘कितना असुंदर’ हो गया , इसपर उनका ध्‍यान गया होता , तो इसे प्रकाशित करने से पहले वे अवश्‍य सोंचते। पर क्‍या करें , बात उफान मारमारकर उनके सर से गुजरने जो लगी थी। उन्‍हें मेरा यह क्रियाकलाप ब्‍लाग जगत के किसी बडे सदस्‍य के द्वारा दारू पीने , सिगरेट पीने और आवारागर्दी करने जैसा जो लगा। उनका आलेख लिखने का उद्देश्‍य हिन्‍दी ब्‍लाग जगत रूपी घर के सारे सदस्यों को सही फीडबैक से अवगत करवाना था , मानो किसी ने आजतक मेरी टिप्‍पणी पढी ही नहीं और ये खोजी पत्रकार एक नया मुद्दा लेकर हिन्‍दी ब्‍लागजगत में तहलका मचाने आ गए हों।

और मेरे सफाई देने पर कि .. ‘नियमित ब्‍लागरों के पोस्‍टों पर मैं विमर्श अवश्‍य करती हूं .. पर नए ब्‍लोगरों के लिए मेरे मन में अलग भावना है .. आप मुझे एक बात बताएं .. आपके घर में कोई फंक्‍शन हो .. और बहुत सारे लोगों को आप बुला रहे हो .. तो उनका स्‍वागत करते समय आप उनका रंग रूप , पद , पैसा और सम्‍मान देखेंगे या फिर एक जैसा स्‍वागत करेंगे .. पहले उनका स्‍वागत करके उन्‍हे स्‍थान तो दे दें .. फिर जो भी गुण दोष निकालना हो .. सुझाव देना हो .. विचारों से सहमति असहमति हो .. बाद में फैसला होता रहेगा’

वे कहते हैं ‘हम तो राजस्थानी हैं, हमारे यहां परंपरा है, ठोक-बजा कर, अपनी सक्षमता से बढ़कर सम्मान किया जाता है। जान लगा दी जाती है सम्मान के लिए। तो क्यों ना सब मिलकर सम्मान करें, नवागंतुकों का। धूम-धाम से। पढ़ कर, समझ कर’ अब मैं तो राजस्‍थानी हूं नहीं कि बता पाउं कि पहली बार स्‍वागत करते हुए आपलोग ठोक बजाकर सम्‍मान कैसे करते हैं ? यहां झारखंड में तो रूप , गुण , डिग्री और उसके परिवार वालों की हैसियत पर न ध्‍यान देते हुए किसी भी दुल्‍हन का स्‍वागत करते समय स्‍वागत गीत गाते हुए सीधा उसे घर में ले जाने की परंपरा चलती आ रही हैं । अब कोई नई दुल्‍हन बिदक पडे कि किसी ने उसके रूप की , बनाव श्रृंगार की प्रशंसा अलग से नहीं करते हुए सामान्‍य स्‍वागत गीत ही गाया तो इसका जवाब देना परिवार वालों के लिए मुश्किल है । अब उनके आलेख की ये पंक्तियां देखें ...

'संगीता पुरी जी की टिप्पणी, समोसे में आलू की तरह है। पढ़ती भी नहीं हैं, क्या लिखा? क्यों लिखा? कोई दुखभरी बात भी पोस्ट में आई, चेप देती हैं, बधाई हो, बहुत बढिय़ा।'

इसके बारे में मेरे यह पूछने पर कि ‘आपके ब्‍लाग पर भी अक्‍सर टिप्‍पणियां करती हूं मैं .. आपको कभी अपने ब्‍लाग पर भी ऐसा महसूस हुआ है .. कि मैने आपके पोस्‍ट को पढे बिना टिप्‍पणी कर दी है .. यह इसलिए पूछ रही हूं .. क्‍यूंकि आपने यह इलजाम लगाया है कि मै आलेखों को बिना पढे टिप्‍पणियां करती हूं !!’

इनका जवाब सुनिए ‘इलजाम लगाने जितना मेरा कद कहां संगीता जी। मैंने इस पूरे मुद्दे में बात मेरी या मेरे जैसे पुराने ब्लागर्स की, की ही नहीं है। मैं तो बात ही नए ब्लॉगर्स की कर रहा हूं मैडम।’

यदि ये जनाब इलजाम भी नहीं लगा रहे , तो इस आलेख को पोस्‍ट करने का उद्देश्‍य मुझे समझ में नहीं आ रहा। फिर बात सिर्फ नए ब्‍लोगर्स की हो रही है , तो उसमें मैने स्‍वागत संदेश ही चिपकाया है , दुखभरे पोस्‍ट पर बधाई वाली बात कहां से आ गयी ? इसके जवाब में इन्‍होने किसी वरिष्‍ठ ब्‍लागर को भी लपेटे में ले लिया कि इन्‍होने वह पंक्तियां कोट की है , यदि उन्‍होने कोट की है तो कहां से , यह जानने का हक तो मेरा अवश्‍य बनता है।

मयंक जी , मनीष जी , सुमो जी , नयनसुख जी, महक जी , गिरिजेश राव जी , रतन सिंह शेखावतजी , गिरिश कुमार बिल्‍लौरेजी , डा अमर कुमार , वाणी गीत जी , एम वर्मा जी , स्‍वच्‍छ संदेश जी , रचना सिंह जी , निशांत मिश्र जी , अजय कुमार झा जी, सागर नाहर जी , अनिल कांत जी, शशांक शुक्‍ला जी , विनीत तोमर जी जैसे जितने भी टिप्‍पणीकर्ता थे , इनके पक्ष में तो कोई भी नहीं रहे। यदि इनके विचारों से कोई थोडी बहुत इत्‍तेफाक रखते भी थे , तो कम से कम इनकी भाषा से तो उनका विरोध स्‍पष्‍टत: दिख रहा था। पर ये क्‍या करें , अपनी भाषा पर नियंत्रण करना आसान भी नहीं होता , इसमें अपने माहौल और व्‍यक्तित्‍व की छाप आ ही जाती है। समय की कमी से महाशक्तिजी ने इस आलेख को बुकमार्क कर लिया है , उनके उत्‍तर का भी मुझे इंतजार है। मयंक जी की यह बात मुझे बुरी लगी ‘अगर केवल कक्षा के बच्चों का उत्साह बढ़ाने के लिए अध्यापक बार बार बहुत सुंदर बहुत सुंदर कहेगा तो ये केवल उनको पतन की ओर ही ले जाएगा...’ अब यह बार बार क्‍या, मयंक जी, पूरे आलेख में तो सिर्फ स्‍वागत संदेश की ही बात है, जैसा कि प्रवीण जाखड जी कह रहे हैं।

मयंक जी , किशोर चौधरी जी , हेतप्रकाश व्‍यास जी , सिद्धार्थ जोशी जी , चांद मुहम्‍मद जी और निधि जी प्रवीण जाखड जी की इस बात से सहमत थे कि नए ब्‍लोगरों को स्‍वागत की कोई जरूरत नहीं , मयंकजी का कहना है कि ‘नए ब्‍लोगरों का उत्‍साह बढाने के लिए उनके लेख पढे जाने जरूरी हैं , टिप्‍पणी किए जाने जरूरी हों तभी टिप्‍पणी करें , लेखक खुद ब्‍लागवाणी पर देख लेगा कि वह कितना पढा गया है’ इन सबों का प्रोफाइल देखिए , ये सभी पत्रकार हैं और इसी कारण इन्‍हें ऐसा लग रहा है , क्‍यूंकि इन्‍होने जब ब्‍लागिंग में कदम रखा होगा , इनके ढेर सारे मित्र पहले से इस दुनिया में मौजूद होंगे , जिन्‍होने पहली बार भी इनके आलेखों को पढ लिया होगा , वरना मेरा दावा है कि हिन्‍दी ब्‍लागिंग की दुनिया में आनेवाले 80 प्रतिशत से अधिक नए ब्‍लोगरों के ब्‍लोग्‍स सिर्फ स्‍वागत करने के लिए ही खोले जाते हैं। और इसका श्रेय ‘चिट्ठा जगत’ को ही जाता है , जिसने ईमेल के द्वारा उन नए चिट्ठाकारों को एक एक ब्‍लोगर्स तक पहुंचाने का बीडा उठाया है। यदि किसी नए ब्‍लागर को स्‍वागत की आवश्‍यकता नहीं , तो ‘चिट्ठाजगत’ को एक ईमेल कर दें कि उनके ब्‍लाग को स्‍वागत करने के लिए सबके ईमेल तक नहीं भेजा जाए। ‘चिट्ठाजगत’ को भी इस विषय को गंभीरता से लेना होगा , समस्‍या का समाधान हो जाएगा। अब 20 प्रतिशत से कम लोगों को जरूरत नहीं है , इसके कारण 80 प्रतिशत से अधिक जरूरतमंद को किसी सुविधा से वंचित कर देना न्‍यायपूर्ण नहीं।

एक निधि नाम की ब्‍लागर दो बार आकर मेरे विरोध में प्रतिक्रिया दे गयीं , जब मैने उनका प्रोफाइल चेक किया तो पाया कि वह अंग्रेजी में एक ब्‍लाग लिखती है , अब अंग्रेजी में लिखनेवाले ब्‍लागर हिन्‍दी ब्‍लागरों के मनोभाव को क्‍या समझेंगे , निधि नाम की उस मोहतरमा को क्‍या पता कि हिन्‍दी चिट्ठाकारिता के यहां तक के सफर में समय समय पर कितने हिन्‍दी ब्‍लोगरों ने कितनी मेहनत की है। मुझे जो बात इस पोस्‍ट से भी अधिक बुरी लगी , वह थी सिद्धार्थ जोशी जी की टिप्‍पणी , ऐसी टिप्‍पणी देकर वे साबित क्‍या करना चाहते हैं , यह मेरे पल्‍ले तो नहीं पडा और चांद मुहम्‍मद जी की टिप्‍पणी देखिए ‘संगीता जी को भी इतना बुरा नहीं मानना चाहिए क्योंकि मामला सिर्फ उनका ही नहीं था , दरअसल बिना पढ़े टिप्पणी देने वालों की अगुआ रहने के कारण ही उनका नाम पोस्ट में शामिल रहा।’ नवम्‍बर 2008 में अनलिमिटेड ब्राडबैंड लेने के बाद के नौ महीने के जोर शोर के ब्‍लागिंग में भी दो महीने मई और जून में अनुपस्थित रहने के बाद यानि 7 महीने के ब्‍लागिंग में मैं अगुआ कैसे बन गयी , यह तो चांद मुहम्‍मद जी ही बता सकते हैं। इस बात का मैं सिर्फ प्रमाण मांग सकती हूं , फैसला तो आप पाठक ही कर सकते हें कि मैं बिना पढे टिप्‍पणियां करती हूं या पढकर ।

कुछ टिप्‍पणीकारों ने मुझे वरिष्‍ठ कहा , कुछ ने मेरे महिला होने के नाते सहानुभूति जतायी । पर हिन्‍दी ब्‍लाग जगत में मैं वरिष्‍ठ होती , तो आए दिन अपने स्‍थायित्‍व के लिए इतने विरोधियों को जवाब तो न देना पडता। महिला होने के नाते मुझे अतिरिक्‍त सुविधा मिलनी चाहिए , इसकी भी मैं पक्षधर नहीं । पर प्रवीण जाखड जी और सिद्धार्थ जोशी जी को स्‍वयं इसका ख्‍याल रखना था कि जिन शब्‍दों का प्रयोग एक पुरूष के साथ किया जा सकता है , उसका महिला के साथ कतई नहीं किया जाता।

चौंकानेवाली बात तो यह है कि प्रवीण जी कहते हैं कि ‘पत्रकार मुद्दों पर जीता है। मुद्दों से उसकी जिंदगी होती है। ...और वह हमेशा उसके समाधान की गुंजाइश तलाशता है। जो मंतव्य समझ रहे हैं, वो जानते हैं, मैंने क्या कहना चाहा है।’ पर जनता को पता है , एक पत्रकार जज नहीं होता कि किसी के पक्ष या विपक्ष में फैसला ही कर दे , इसका अधिकार उन्‍हें नहीं , पाठको का था। एक पत्रकार होने के नाते उन्‍हें दोनो पक्षों की बात मात्र रखनी थी , यहां पर एकपक्षीय बात कर उन्‍होने आलेख लिखने में न्‍याय नहीं‍ किया है। यह आलेख एक पत्रकार की स्‍वस्‍थ रिपोर्ट तो कदापि नहीं कही जा सकती।

इस पोस्‍ट के 24 घंटे व्‍यतीत हुए ही थे‍ कि प्रवीण जाखड जी एक नयी पोस्‍ट लेकर आ गए। पोस्‍ट में क्‍या लिखा था , पूरा तो पढ न सकी , पर बोल्‍ड अक्षरों में ‘संगीता पुरी जी , आपका सबसे ज्‍यादा आभार’ लिखा मुझे आकर्षित कर ही गया। हां भई , आभार तो आप देंगे ही , मेरे बहाने आपकी पोस्‍ट सिर्फ ब्‍लागवाणी से 117 बार पढी गयी , अन्‍य जगहों से मिलाकर न जाने कितने हिट्स हुए हों , 49 टिप्‍पणियां भी मिली , 9 लोगों ने पसंद भी किया । आज फिर अपने ब्‍लाग पर मैने इस पोस्‍ट का लिंक बना दिया है , हिट्स अभी और बढेंगे । इस सफलता के लिए आपको बहुत बहुत बधाई । आपने विनम्रता भी सिखी , इससे भी मुझे खुशी हुई। पर दो वर्षों से हिन्‍दी ब्‍लागजगत में नियमित रहने और नौ महीनों से छह सात आठ घंटे देने के बाद भी आपके द्वारा मेरी प्रतिष्‍ठा का यूं जनाजा निकाला जाएगा , इसकी मैने कल्‍पना भी न की थी। खासकर मैं इस वाक्‍य से कितनी आहत हुई , आप अनुमान नहीं लगा सकते ....

'उनकी टिप्पणी, समोसे में आलू की तरह है। पढ़ती भी नहीं हैं, क्या लिखा? क्यों लिखा? कोई दुखभरी बात भी पोस्ट में आई, चेप देती हैं, बधाई हो, बहुत बढिय़ा।‘

वैसे प्रवीण जाखड जी के पक्ष में भी तो अन्‍य लोग भी नहीं दिखते , पर चिट्ठा चर्चा में अनूप शुक्‍ला जी ने इतना तो लिख ही दिया न कि ‘ब्लागजगत की एक सामान्य प्रवृति को किसी ब्लागर के नाम से जोड़कर लिखना , वह भी उसकी हंसी उड़ाने वाले अंदाज में लिखकर , कहां से उचित है’ । उनकी तरह सारे ब्‍लागर मान सकते हैं कि चिट्ठा जगत में कुछ ब्‍लागर ऐसे हैं और उनमें से मैं भी एक हूं। वो तो अच्‍छा है कि मैं भाग्‍यवादी हूं , और मेरे साथ जो भी बुरा होता है , उसे अपनी नियति समझकर स्‍वीकार कर लेती हूं , वरना ऐसी स्थिति का तनाव झेल पाना आसान होता है क्‍या ? वैसे मैं सकारात्‍मक सोच रखती हूं और हर बुराई में भी अच्‍छाई ही देखा करती हूं । ज्‍योतिष से ही जुडे एक प्रोजेक्‍ट पर काम करने के लिए महीनों से सोच रही थी , पर ब्‍लागिंग का नशा दूर ही नहीं पा रहा था । पर मात्र इस एक आलेख ने मेरा नशा उतार दिया है और खुश हूं कि अब अपने इस प्रोजेक्‍ट पर अधिक ध्‍यान दे पाउंगी । बस इसके लिए आप पाठक अपनी शुभकामनाएं दे दें !!