शनिवार, 3 अक्तूबर 2009

तय किए गए समय सीमा के अंदर प्रवीण जाखड जी के प्रश्‍नों के जबाब तैयार हैं !!

प्रवीण जाखड जी , मैं तो आपके सभी प्रश्‍नोंको आउट आफ सिलेबसकहकर उससे हार मानकर दुर्गापूजा मनाने चली गयी थी , क्‍यूंकि आपके सभी प्रश्‍न परंपरागत ज्‍योतिष पर आधारित थे, जबकि गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष ग्रहों के सांकेतिक प्रभावकी विवेचना करता है और कभी भी इन प्रकार के प्रश्‍नों के जबाब देने का दावा नहीं करता। ग्रहों का प्रभाव मनुष्‍य पर सुखात्‍मक या दुखात्‍मक पडता है और इसमें संख्‍या का कोई महत्‍व नहीं। मैने हर समय माना है कि ग्रहों का प्रभाव हर क्षेत्र में पडता है और इसमें समय के साथ बदलाव और अनुसंधान किए जाने की जरूरतहै।

 पर सांकेतिक भाषा में मेरे हार स्‍वीकार कर लेने से भी आपको संतुष्टि नहीं मिली , मेरे जाने के बाद भी उत्‍तर के लिए 7 अक्‍तूबर 2009 के रात्रि 11 बजकर 11 मिनट तक की समय सीमा बढाते हुए आपने एक पोस्‍टलिख डाला। बहुत मेहनत कर आपके समय सीमा के एक घंटे पहले यानि मैं 10 बजकर 11 मिनट तक सवालों के आधे अधूरे जबाब पोस्‍ट कर रही हूं, इस आत्‍मविश्‍वास के साथ कि 100 में से 40 अंक तो मिल ही जाएंगे तो आपकी ओर से जीत का एक सर्टिफिकेट मिल जाएगा।

वैसे तो एक ज्‍योतिषी के सामने लोगों के स्‍वभाव को मैने परिवर्तित होते हुए भी देखा है , पर यदि आप सिर्फ मेरे सामने ही नहीं , हर मामले में इतने जिद्दी हैं , तो मैं दावे के साथ कह सकती हूं कि आपका जन्‍म तब हुआ होगा , जब आसमान में चंद्रमा पूर्णमासी के आसपास का होगा , होली , शरत पूर्णिमा या गुरू पूर्णिमा या किसी और पूर्णिमा  के आसपास। बडे चांद के साथ ही कुछ ग्रहों की खास स्थिति बनने से बननेवाली कुंडली से ही लोग सामनेवालों की कुछ न सुनते हुए अपनी कहते रहते हैं। आपके प्रश्‍नों के जबाब देने के क्रम में सबसे दुखद पहलू यह है कि 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' से संबंधित जिन तथ्‍यों का जिक्र एक अपरिचित व्‍यक्ति से किया जाना चाहिए , वह मुझे एक ब्‍लागर भाई से करना पड रहा है , फिर मेरे  इसपर आधारित 200 के लगभग प्रविष्टियों को लिखने का क्‍या फायदा ??

एक बात और , अपने पोस्‍टों पर यह न लिखा करें कि "मैं ज्‍योतिष की और संगीता पुरी की बहुत इज्‍जत करता हूं" ,या "अब संगीता जी अनुभवी हैं, हमारा मार्गदर्शन करती हैं। मैंने तो बिलकुल घर का समझ कर, उन्हें पूरी तरह बड़ा होने का सम्मान देते हुए सवाल पूछे हैं। " यदि आप सचमुच इज्‍जत करते तो मुझे पढने के बाद मेरे दृष्टिकोण से अवगत होने के बाद ही सवाल करते, साथ ही आपका सवाल मेरी परीक्षा लेने के अंदाज में न होता। यहां तक कि व्‍यंग्‍यात्‍मक लहजे में आप कहते हैं कि मैं अपने गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष का प्रचार प्रसारकर रही हूं। किसी के जन्‍म विवरण मात्र से किसी व्‍यक्ति के पूरे जीवन के उतार चढाव का ग्राफ खींच पाने के फार्मूले की खोज के 20 वर्ष बादतक भी जब आप जैसे खोजी पत्रकार एक शोधकर्ता को ढूंढ न पाएं , तो उसके बाद की पीढी अपने सिद्धांतों के प्रचार के लिए बाजार में बैठने को मजबूर होगी ही।

आपका यह कहना भी बिल्‍कुल गलत है कि "आपके ज्योतिष की तारीफ नहीं की, तो आप इसे मेरी गुस्ताखी क्यों मान रही हैं? क्या मक्खन लगाकर खुश करने से ही सब खुश रहते हैं। मुझे तो मक्खन लगाने की आदत है नहीं।" शायद आप मेरे स्‍वभाव से परिचित नहीं , स्‍वस्‍थ मानसिकता रखकर कही गयी आलोचना का मैं हमेशा स्‍वागत करती हूं , नीरज रोहिल्‍ला जी के पोस्‍ट परमैने न सिर्फ उनके तर्कों को स्‍वीकार किया है , उस पोस्‍ट का लिंक भी मैने अपने ब्‍लाग के साइड बार में लगाया है । एक बात और , आप बार बार ललकार रहे थे कि मैं ज्‍योतिष को सिद्ध कर दिखाउं , उसी बात पर मैने कहा कि किसी के ललकारने से मैं कुत्‍ते की तरह शिकार नहीं करूंगी , शेर की तरह मेरी अपनी चाल होगी। मैने कुत्‍ते और शेर का प्रयोग खुद के लिए किया था , इस वाक्‍य को अपने पर लगाने की जरूरत नहीं है। आपने जो काम कर दिखाया , वह वाकई शेर ही कर सकते हैं , इसमे दो मत नहीं , अब मेरे जबाब देखें ......

आपका पहला प्रश्‍न ... राहूल गांधी की शादी किस तारीख को होगी ?

मेरा जबाब ... मेरे एक पुराने आलेख में पढिएमैने लिखा है जहॉ तक हमारा विचार है , ज्योतिष शास्त्र में ऐसा कोई भी सिद्धांत विकसित नहीं किया जा सकता है ,जिससे विवाह उम्र की निश्चित जानकारी प्राप्त हो सके । इसका कारण यह है कि विवाह उम्र के निर्धारण में परिवार ,समाज ,युग ,वातावरण और परिस्थितियों की भूमिका ग्रह-नक्षत्र से अधिक महत्वपूर्ण होती है। प्राचीनकाल में भी वही 12 राशियां होती थीं ,वही नवग्रह हुआ करते थें, दशाकाल का गणित वही था ,उसी के अनुसार जन्मपत्र बनते थे । उस समय विवाह की उम्र 5 वर्ष से भी कम होती थी , फिर क्रमश: बढ़ती हुई 10.15.20.25.से 30 वर्ष तक हो गयी है । अभी भी अनेक जन-जातियों में बाल-विवाह की प्रथा है। क्या उस समाज में विशेष राशियों और नक्षत्रों के आधार पर जन्मपत्र बनते हैं ? यदि नही तो यह अंतर क्यों ? इसलिए हमारी धारणा है कि किसी व्यक्ति के जन्म के समय ही उसके विवाह वर्ष को नहीं बतलाया जा सकता।

पर जन्‍मकुंडली से किसी के दाम्‍पत्‍य जीवन के सुखी या दुखी होने की पुष्टि की जा सकती है , पर यह नितांत व्‍यक्तिगत प्रश्‍न है और मैं इसे सार्वजनिक नहीं कर सकती। इसके अलावे आसमान में ग्रहों की खास स्थिति से विभिन्‍न लोगों के लिए भिन्‍न भिन्‍न समय में विवाह के योग बना करते हैं और परिवार ,समाज ,युग ,वातावरण और परिस्थितियों के अनुसार उनमें से ही कोई योग किसी का विवाह करा सकता है। यदि राहूल गांधी का जन्‍म 19-06-1970 को मिथुन लग्‍न में हुआ हो(जो डाटा मेरे पास उपलब्‍ध है) तो ग्रहस्थिति के हिसाब से उसके लिए विवाह का एक बडा योग मार्च 2010 से मार्च 2011 के मध्‍य, खासकर 22 जून से 24 जुलाई 2010और 14 नवम्‍बर से 18 दिसम्‍बर 2010के मध्‍य , उससे भी अधिक सूक्ष्‍म देखा जाए तो 26-27-28 जून , 3-4-5 जुलाई , 22-23-24 जुलाई,  9-10-11 नवम्‍बर,14-15-16 नवम्‍बर, 6-7-8 दिसम्‍बर, 14-15-16 दिसम्‍बर या इसी के 28-28 दिन पहले या बाद मेंआनेवाला कोई दिन या अधिक मेहनत कर इसमें से भी एक निकाला जा सकता है , पर इतनी मेहनत क्‍यूं करूं , कहीं जन्‍म विवरण ही गलत हो तो मेरी मेहनत तो बर्वाद ही होगी न , और जन्‍मविवरण सही हुई तो उपर्युक्‍त तिथियों में से कोई तिथि अवश्‍य सही होगी !!

आपका दूसरा प्रश्‍न ... गुरुवार 31 दिसंबर, 2009 को सेंसेक्स किस पॉइंट पर बंद होगा (25 पॉइंट की छूट ले सकती हैं)?

मेरा जबाब .. नवम्‍बर 2008 के पहले सप्‍ताह से ही मैं नियमित तौर परशेयर बाजार की साप्‍ताहिक भविष्‍यवाणी कर रही हूं। यदि आपको शेयर बाजार में ग्रहों के प्रभाव को सही और गलत सिद्ध करने का जरा भी शौक है तो सारे लिंक्स उसमें उपलब्‍ध हैं , उसमें रिसर्च करके देख लें , एक एक तिथि की भविष्‍यवाणी मैने की है। पहले सप्‍ताहही ,जबकि शेयर बाजार 24 अक्‍टूबर 2008 को बिल्‍कुल टूट चुका था और लोकसभा चुनाव के पूर्व कोई भी विशेषज्ञ इसके आगे बढने की उम्‍मीद नहीं कर रहे थे , मैने 4 नवम्‍बर 2008 को लिखा था .... ग्रहों के पृथ्‍वी के जड़ चेतन पर पड़ने वाले प्रभाव को जानने की एकमात्र विधा ज्‍योतिष ही है और इसे सही ढंग से विकसित कर पाने की दिशा में 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिषीय अनुसंधान संस्‍थान' बोकारो द्वारा 20वीं सदी के अंतिम 40 वर्षों में बहुत बडा़ रिसर्च हुआ। ग्रहों की वास्‍तविक शक्तियों की खोज कर ज्‍योतिष को विज्ञान बना पाने सफलता मिलने से भविष्‍य को देख पाने के लिए एक तरह की रोशनी मिली, जो काफी हद तक स्‍पष्‍ट तो नहीं कही जा सकती, पर हमारे सामने भविष्‍य का एक धुंधला सा चित्र अवश्‍य खींच देती है। इसी के आधार पर 2008 के जनवरी से ही मै शेयर से संबंधित भविष्‍यवाणी करती आ रही हूं। 24 अक्‍टूबर का दिन शेयर बाजार के सर्वाधिक बुरे दिनों में से एक था। आनेवाले दो महीने में शेयर बाजार का जो भी धुंधला सा चित्र हमें दिखाई पड़ रहा है , उसमें कहीं भी बडी़ गिरावट या बहुत बडे़ उछाल की संभावना हमें नहीं दिखाई पड़ रही है। इन दो महीने के शेयर बाजार के ग्राफ को मोटा मोटी तौर पर देखा जाए, तो छोटे उतार और बडे़ चढा़व को दिखाते हुए सेंसेक्‍स और निफटी की स्थिति 20 दिसंबर तक बढ़त का ही क्रम बनाए दिखाई दे रहे हैं। इसलिए निवेशकों को अभी धैर्य बनाए रखने की आवश्‍यकता है।

ठीक 20 दिसम्‍बर 2008 तक बाजार में बढत दिखाई पडी थी और उसके बाद कमजोर होना आरंभ हुआ था। आज फिर उसी भाषा में कह रही हूं कि 9 अक्‍तूबर 2009 तक बाजार के टूटने के बाद आनेवाले दो महीने में शेयर बाजार का जो भी धुंधला सा चित्र हमें दिखाई पड़ रहा है , उसमें कहीं भी बडी़ गिरावट या बहुत बडे़ उछाल की संभावना हमें नहीं दिखाई पड़ रही है। इन दो महीने के शेयर बाजार के ग्राफ को मोटा मोटी तौर पर देखा जाए, तो छोटे उतार और बडे़ चढा़व को दिखाते हुए सेंसेक्‍स और निफटी की स्थिति 10 दिसंबर 2009 तक बढ़त का ही क्रम बनाए दिखाई दे रहे हैं, पर कितने अंकों की , ऐसा न तो कभी दावा किया था और न करूंगी।

एक बात और बताना चाहूंगी , आपके लेखों के तनाव से ही मैं पिछले दो सप्‍ताह से मोल तोल में शेयर बाजार से संबंधित भविष्‍यवाणी नहीं पा रही हूं , जबकि 28-29-30 सितम्‍बर के ग्रहस्थिति के फलस्‍वरूप पिछले सप्‍ताह सेंसेक्‍स और निफ्टी के बढने की पूरी संभावना थी, जबकि 8-9 अक्‍तूबर के कारण इस सप्‍ताह गिरने की और सचमुच ही ऐसा हुआ , यदि शेयर बाजार पर इस ग्रहस्थिति की शक्ति के प्रभाव पर आपको यकीन न हो , तो आगे की भी ऐसी तिथियां नोट करें। इस वर्ष 26-27 अक्‍तूबर और 23–24 नवम्‍बर का शेयर बाजार देख लें , सेंसेक्‍स और निफ्टी में बढत दिखाई पडती है या नहीं , पर कितने अंकों की , एक बार फिर से कहती हूं कि ऐसा कभी न तो दावा किया था और न करूंगी।

आपका तीसरा प्रश्‍न ... विश्व का अगला बड़ा आतंकी हमला किस देश में, किस दिन होगा ?

मेरा जबाब ... इस विषय में कई बार डाटा इकट्ठा किया , पर सोंचती ही रह गयी , कभी रिसर्च करने का मौका ही नहीं मिला , इसमें रूचि रखने वाले कुछ लोग जुटे हुए हैं , रिसर्च करने पर किसी खास तिथि को पूरे विश्‍व में कहीं भीसे शुरू करते हुए हमलोग लांगिच्‍यूड तक यानि एक रेखा तक पहुंच सकते हैं , पर माफ करें , लैटिच्‍यूड के बारे में जान पाने का अभी तक कोई कंसेप्‍शन ही नहीं हुआ और बिना कंसेप्‍शन के रिसर्च हो तो कैसे ? पर ऐसा तो नहीं होता न कि जो मौत का कुआं का करतब न दिखा पाए , उस सरकस का कोई महत्‍व ही नहीं।

आपका चौथा प्रश्‍न ... सिविल सर्विस बैच - 2009 के टॉपर के नाम का प्रथम अक्षर क्या होगा?

मेरा जबाब .. प्रथम अक्षर की चर्चा पारंपरिक ज्‍योतिष इसलिए करते हैं , क्‍यूंकि वे नक्षत्र को महत्‍व देते हैं , नक्षत्र का प्रथमाक्षर से संबंध होता है। हमलोग आसमान के 30 डिग्री से अधिक के बंटवारे की बात ही नहीं करते , यानि हमारे अध्‍ययन में नक्षत्र की कोई चर्चा नहीं , इसलिए प्रथमाक्षर का हमारे लिए कोई महत्‍व नहीं। अभी चुनाव के पूर्व किया गया मेरा विश्‍लेषणदेखें , मैने सभी नेताओं की जन्‍म या चंद्रकुंडलियों से चुनाव परिणाम के बारे में विश्‍लेषण किया है। अपनी भविष्‍यवाणियों में कभी भी किसी पार्टी या किसी प्रथमाक्षर की चर्चा नहीं की है। इसलिए किसका भाग्‍य कितना साथ देगा , वह आई ए एस के परीक्षार्थियों की कुंडली देखकर ही बताया जा सकता है। वैसे 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' यह मानता है कि किसी परीक्षा में पास करने के व्‍यक्ति के मानसिक स्‍तर के बाद ही ग्रहों या भाग्‍य का रोल होता  है।

आपका पांचवा प्रश्‍न ... चीन भारत पर अगला हमला किस दिन (कृपया तारीख बतलाएं) करेगा?

मेरा जबाब ... अकेली मैं क्‍या क्‍या करूं , इस बारे में कोई शोध नहीं , अपने ब्‍लोग पर मैने कभी ऐसा कोई दावा नहीं किया। यदि आपको इस विषय पर रूचि हो , तो विदेशी हमले के डाटा और संबंधित दिनों की ग्रहस्थिति का संग्रह करें , मैं उनका विश्‍लेषण करके भारतवर्ष के अगले हमले की तिथि बतला सकती हूं।

आपका छठा प्रश्‍न ... 31 दिसंबर 2009 को दिल्ली का न्यूनतम और अधिकतम तापमान कितना-कितना रहेगा?

मेरा जबाब ... चूंकि पिताजी एक कृषि प्रधान गांव में ही रह गए थे , जन्‍मविवरण के सहारे किसी व्‍यक्ति के व्‍यक्तिगत भविष्‍यवाणी कर पाने के बाद सबसे अधिक मेहनत हमलोगों ने मौसम से संबंधित अध्‍ययनमें ही किया है। इस पोस्‍ट में मैने लिखा ही था कि सरकार का अरबों रूपए खर्च करने के बावजूद मौसम विभाग तीन महीने पहले इस प्रकार की कोई भविष्‍यवाणी नहीं कर सकता , पर जहां भविष्‍यवाणी की एक बडी विधा विकसित की जा चुकी है ,उसे बुद्धिजीवी वर्ग अंधविश्‍वास कहकर देश का कितना बडा नुकसान कर रहे हें ,वे नहीं बता सकते। पर यह पूरे देश के अधिकांश भाग को दृष्टि में रखते हुए कहा गया है , किसी एक शहर के बारे में नही। 15 अगस्‍त के बाद देश के अधिकांश भागों में हो रही बारिश को आपने अगस्‍त के महीने यानि बरसात के महीने से जोड लिया , पर यदि ग्रहयोग का महत्‍वनहीं था , तो जुलाई में बारिश न होकर ठीक 15 अगस्‍त के आसपास ही शुरू होने का कोई कारण आप ही बताएं।

अच्‍छा छोडिए इस बात को , मेरा दुर्भाग्‍य कि उस समय अगस्‍त का महीना था , अभी तो अक्‍तूबर है , मेरी यह भविष्‍यवाणी पढें, जिसमें लिखा है कि बारिश के कारण इस वर्ष दीपावली के रंग रोगन में कठिनाई आएगी। ध्‍यान दें , इसमें 8-9 अक्‍तूबर के ग्रहयोग की ही चर्चा की गयी है , आज और अगले दो दिनों तक टी वी खोलकर पूरे देश के अधिकांश भाग के मौसम का हाल ले लें। इतना ही नहीं , 10 अक्‍तूबर से ही क्रमश: मौसम में सुधार होता ही महसूस करेंगे आप। ध्‍यान दें , इस वर्ष 13 से 20 अगस्‍त के देश के कई हिस्‍सों में बाढ के बाद 2 से 9 अक्‍तूबर के मध्‍य ही पुन: बाढ के हालात बने हैं , दोनो तिथियों में मेरे अनुसार बारिश का बडा योग था। इसके अलावे किसी अन्‍य तिथि को मैने बडे स्‍तर पर बारिश होने का दावा नहीं किया।

इसे भी छोड दें , अक्‍तूबर तक भी कभी कभी बारिश होती है , दिसम्‍बर में तो नहीं होती। इस वर्ष 14-15 दिसंबरके ग्रहयोग के कारण भारत के अधिकांश भाग का मौसम खराब रहेगा। इस तिथि के कई दिन पहले से ही यत्र तत्र बादलों, कुहासों, बारिश और बर्फबारी से लोगों के सामने कई प्रकार की मुश्किलें आएगी, जो इस खास तिथि को सर्वाधिक दिखाई पडेगी। दिसम्‍बर में बादलों , कुहासे और बारिश और बर्फबारी सामान्‍य बात हो सकती है , पर किसी खास तिथि को ही ऐसा संयोग होना मायने रखता है। ग्रहों के आधार पर इतना संकेत दे देना 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' को विज्ञान सिद्ध करने के लिए काफी है।

एक एक शहर की एक एक तिथि का एक एक डिग्री में तापमान जानना हो , तो हिम्‍मत जुटाकर एक खोजी पत्रकार को उस विभाग में पूछताछ करनी चाहिए,जहां सरकार जनता के खून पसीने की कमाई के टैक्‍स के रूप में जमा किए गए खरबों खर्च करती है। किसी सरकारी , अर्द्ध सरकारी , गैर सरकारी संगठन या किसी व्‍यक्ति से एक पाई भी न लेनेवाले हम 40 वर्षों से खुद अपना पेट काट काटकर 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के विकास पर खर्च करने के कारण काफी कमजोर हो चुके हैं, यहां अधिक पूछ ताछ आप जैसे शेर को शोभा नहीं देता।

आपका सातवां प्रश्‍न ... अफगानिस्तान में 31 दिसंबर तक 'नाटो' के कुल मरने वाले सैनिकों की संख्या क्या होगी?

मेरा जबाब ... हमने कभी इससे संबंधित डाटा ही इकट्ठा नहीं किया , इसलिए इसे भी आउट आफ सिलेबस ही समझें , हमने अपने ब्‍लाग पर कभी ऐसा कोई दावा नहीं किया ।

अब आपके पक्ष के कुछ टिप्‍पणीकारों से निवेदन ....  बेनामी भाई , रजनीश जी और आर्शिया जी , आपलोगों के कहे अनुसार मैं अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के यहां दावा नहीं कर सकती , क्‍यूकि मैने इस आलेखमें साफ लिखा है कि उन‍की परीक्षा में कैसी धांधली होती है। यदि उस ढंग से आई आई टी की परीक्षा में बैठनेवालों का भी मूल्‍यांकण किया जाए तो ज्‍योतिष का तो कम से कम हेड एंड टेल सुरक्षित है , गणित , भौतिकी और रसायनका हेड एंड टेल भी नजर नहीं आएगा। यह हमारा दुर्भाग्‍य है कि परंपरागत ज्ञान विज्ञान की जब भी चर्चा की जाती है , उसे सिद्ध करने के लिए उसे उस विज्ञान के समकक्ष खडा कर दिया जाता है , जिसमें सरकार अरबों खर्च कर रही है और जिसमें बडे बडे वैज्ञानिक जुटे हैं।

जहां तक अंधविश्‍वास फैलाने के नाम पर जेल भेजने का सवाल है , आपलोग पहले टीवी कार्यक्रम दिखानेवालों से शुरू करें। वे लाखों की भीड को गुमराह करते हैं , मैं उनमें से सौ दो सौ को बचाती हूं।जब वे कुंडली मिलान की बातें करते हैं , तो मैं उसे अवैज्ञानिक करारदेती हूं। जब वे सूर्यग्रहण या चंद्रग्रहण के बुरे प्रभाव की चर्चा करते हैं , मैं उसे नकारतीहूं। जब वे 09-09-09 के नाम पर हल्‍ला मचाते हैं , मैं इसके कोई प्रभाव न होने के तर्क दियाकरती हूं। इसी प्रकार मैने अपने ब्‍लाग में सप्‍ताह के दिनों के अनुरूप यात्रा , मुहूर्त , शकुन , लौटरी , न्‍यूमरोलोजी , फेंग शुई , हस्‍ताक्षर विज्ञान , झाडफूंक , वास्‍तु शास्‍त्र , हस्‍तरेखा से लेकर नजर लगने तक के सही गलत की वैज्ञानिक व्‍याख्‍याकी है। और मेरा पक्ष लेनेवालों को आपका कहना यह उचित नहीं कि मैने उनकी जन्‍मकुंडली मुफ्त में बना दी है। हम सभी जानते हैं कि आजकल साफ्टवेयर की सहायता से जन्‍मकुंडली मुफ्त में ही बनती है।

हेतप्रकाशजी , प्रमोद वैष्‍णव जी , मैं अपनी पुरानी पोस्ट का हवाला बार-बार देकर इस मुद्दे से कन्नी नहीं काट रही थी , आपको अपने दृष्टिकोण से परिचित होने को कह रही थी और अपने अनुरूप प्रश्‍न की मांग कर रही थी। हरीश करमचंदानी जी , दूध का दूध और पानी का पानी करने के लिए मैने खुद एक पोस्‍टलिखा है। धीरेन्‍द्र राहूल जी , आपके मित्र ने ज्‍योतिष के क्षेत्र में अनिश्चितता को देखकर उसका अध्‍ययन ही छोड दिया , पर मैं उसे अनिश्चितता से उबारकर निश्चितता की ओर जाने का अध्‍ययन कर रही हूं , तो इसमें क्‍या बुराई है ? जहां संभावना दिखाई पडे , वहां अध्‍ययन करना गुनाह है क्‍या ?

 लवखुश जी , बहुत ऐसे ग्रहयोग होते हैं , जहां समान राशि के लोग समान तरह के सुख या कष्‍ट में देखे जा सकते हैं , जिसकी राशिफल में चर्चा की जाती है , पर बहुत ऐसे ग्रहयोग भी होते हैं , जहां एक ही राशि के लोगों में से कोई कष्‍ट तो कोई आराम में होता है। दिलनाज जी , याद रखें , इस भाग्यवाद ने हिंदुस्थान को जितना गुलाम बनाया है , उतना ही मानसिक संतोष भी दिया है। एक गरीब या असहाय को संतोष देने के लिए आप कोई उपाय बता सकते हैं । अमित हलदर जी , बेनकाब तो उनको किया जाता है जो नकाब पहने होते हैं, यहां निराशा हाथ लगेगी। अवधबिहारी जी , लाख बार बता चुकी कि मैं ज्‍योतिष से कमाई नहीं करती। हरिदास महतो जी , यहां कोई पोल है ही नहीं , जिसे आपलोग खोल सके , जो मेरे आत्‍मविश्‍वास का एक बडा कारण है।

चंद्रमोहन जी , विचारों से सहमति असहमति अलग बात है , पर किसी को कोई बात कहते समय भाषा का संयम बरतें और अंत में प्रशांत जी , मैं आपसे पूछना चाहती हूं कि आपके किस पोस्‍ट में मैने बिना पढे कमेंट किया है, जैसा कि आपने लिखा है "संगीता जी सहित कई ब्लौगर हैं जो बिना पढ़े कमेंट करते हैं" । इस बात पर मेरी सफाई पढ लें, वैसे अपने ब्‍लाग के पाठक होने की अच्‍छी सजा दी आपने ? व्‍यर्थ का लांछन लगाने के बाद मेरे लेखन और जज्बे की तारीफ भी मुझे कौन सा सुख दे सकती है ?

इसके अलावे मैं अपने सभी शुभचिंतकों को  बहुत बहुत धन्‍यवाद देना चाहूंगी , चाहे उन्‍होने मेरे पक्ष में टिप्‍पणी की या मौन रखकर ही मुझे मेरे साथ होने का अहसास दिलाया। उन्‍हें यह भी बताना चाहूंगी कि वे दुखी न होवें , रतन सिंह शेखावत जी की तरह मौज लेते रहें। राजीव तनेजा जी ने भी सही कहा है , जहां बरतन होंगे , वहां खडखडाहट होगी। मैंने अपने जीवन में समय समय पर बहुतों को झेला है , पर मेरे तर्क उन्‍हें मौन कर देते रहे हैं। मुझे इस बात का संतोष है कि जीवन में जो मेरे जितने बडे विरोधी रहे , कालांतर में वे मेरे उतने ही बडे समर्थक बने। और हां , उपर लिखी किसी भी बात को मेरी आत्‍मप्रशंसा न समझा जाए , जैसा कि अक्‍सर लोगों को भ्रम हो जाता है। मैं सिर्फ ज्‍योतिष के सैद्धांतिक ज्ञान को व्‍यावहारिक तौर पर विकसित करने का कार्य कर रही हूं , मेरा अपना कोई अस्त्तित्‍व नहीं , जिसका मुझे गुमान हो।

प्राचीन ऋषि मुनियों के जड और तने के उपर मेरे पिताजी श्री विद्या सागर महथा जी के द्वारा विकसित किए गए सिद्धांतों की मजबूत शाखा पर मैं तो मात्र फल फूल विकसित कर रही हूं , ताकि फल फूलों के सुगंध और स्‍वाद के बहाने मानव जाति द्वारा इतने दिनों से उपेक्षित इस पेड का अच्‍छी तरह उपयोग किया जा सके। जब ब्रह्मांड में इतने बडे बडे पिंड प्रकृति के नियमों के अनुसार चल रहे हों , एक व्‍यक्ति को अपने इस छोटे से शरीर और अपनी योग्‍यता पर गुमान करने की जरूरत ही नहीं। मैं भले ही पूरी ईमानदारी और मेहनत से काम करती हूं , पर मैं मानती हूं कि सफलता असफलता हमारे हाथ में नहीं , प्रकृति के हाथ में ही होती है। पाठकों को दीपावली की बधाई और शुभकामनाएं !!


अपडेट 1.  ... मैने प्रवीण जाखड जी के प्रश्‍नों के जबाब में इतना बडा आलेख लिख डाला ..पर इसके एक घंटे बाद के पोस्‍ट किए गएइस लिंकमें वे कहते हैं ....... "336 घंटे का इंतजार। परीक्षा के 14 दिन। हिंदी ब्लॉगिंग में ज्योतिष का सबसे बड़ा बवाल। आप इसे जो नाम देना चाहें, दे सकते हैं। ...लेकिन लंबे इंतजार के बाद हमारी ज्योतिषी ब्लॉगर संगीता पुरी जी उन सात यक्ष प्रश्नों का जवाब देने से पीछे हट गई हैं, जिनसे जुड़े दावे उन्होंने कुछ दिन पहले किए थे। वे उन सातों सवालों की गंभीरता से दूर 'भूत-भविष्य' की ऐसी गणित में उलझी हैं, जिनका कोई 'लॉजिक' नहीं है।"



अपडेट .2  .....  और यहां लिस्‍ट में आप पाएंगे कि इस आलेख में चर्चित मेरी कितनी भविष्‍यवाणियां सही हुई हैं ....

1) 9 अक्‍तूबर 2009 तक ....  शेयर बाजार टूटता रहा।
2)10 अक्‍तूबर 2009 से ...  लगभग पूरे भारतवर्ष में आसमान साफ हो गया है।
3)12 अक्‍तूबर 2009 ... शेयर बाजार न सिर्फ बढकर खुला है , वरन अंत तक बढता ही जा रहा है।





आपलोग कबतक कहते ही रहेंगे कि मैं बिना पढे टिप्‍पणियां करती हूं ??

सच ही कहा गया है , मेहनत कभी विफल नहीं होती और बूंद बूंद से घट भरता है , राज भाटिया जीको बधाई देते हुए आज मैं अपना यह आलेख शुरू कर रही हूं , जिन्‍होने कल मेरे ब्‍लाग पर अपनी टिप्‍पणियों का शतक लगा लिया है। मेरे ब्‍लाग में टिप्‍पणियों की संख्‍या के लिहाज से दूसरे स्‍थान पर रंजु भाटिया जीहैं , जिन्‍होने 90 का आंकडा पार कर लिया है। इसके साथ ही तीसरे स्‍थान पर 79 टिप्‍पणियों के साथ ज्ञानदत्‍त पांडेय जीहैं , जिन्‍होने अपने कई लागिन से मुझे टिप्‍पणियां की है , इसलिए उनका स्‍थान शीर्ष टिप्‍पणीकारों में नहीं दिखाई पडने के बावजूद वे मेरे ब्‍लाग के शीर्ष टिप्‍पणीकार हैं। इनके अलावे उडन तश्‍तरी जीएक ही लागिन से तथा डा मनोज मिश्रा जीदो लागिन से 56 टिप्‍पणियों के साथ संयुक्‍त रूप से चौथे स्‍थान पर हैं , जबकि निर्मला कपिला जी54 टिप्‍पणियों के साथ और विनय जी53 टिपपणियों के साथ पांचवे और छठे स्‍थान पर हैं। सबों को बहुत बहुत बधाई और धन्‍यवाद। इन्‍होने मेरे ब्‍लोग पर पधारकर , मेरे विचारों को समझने का और प्रतिक्रिया देने का कष्‍ट करते हुए मुझे जिस ढंग से कृतार्थ किया है , उसका कर्ज तो सिर्फ बधाई देकर और धन्‍यवाद कहकरनहीं उतारा जा सकता है , पर इससे अधिक कर पाना मेरे लिए संभव भी नहीं।


राज भाटिया जी के प्रोफाइल में चार ब्‍लागों के नाम है , जिसे मैं अक्‍सर पढा करती हूं , पर हर वक्‍त टिप्‍पणियां नहीं कर पाती। मैने ‘नन्‍हे मुन्‍ने’ में अबतक एक भी टिप्‍पणी नहीं की , जबकि ‘पराया देश’ में 6 , ‘छोटी छोटी बातों’ में 4 और ‘मुझे शिकायत है’ में 9 टिप्‍पणियां की है। आप भी इन ब्‍लोगों में जाकर इसे देख सकते हैं। रंजू भाटिया जी के भी 3 ब्‍लोग है , जिसमें से ‘साया’ का मैने सिर्फ अपनी टिप्‍पणियों से स्‍वागत किया है , ‘अमृता प्रीतमवाले ब्‍लाग’ पर भी मैं मात्र एक बार गयी और टिप्‍पणी की हूं , पर ‘कुछ मेरी कलम से’ के आलेखों को पढने और टिप्‍पणी करने का लोभ संवरण नहीं कर पाती , फिर भी मैं इसमें मुश्किल से 30 बार ही टिप्‍पणियां कर पायी होउंगी। ‘ज्ञान दत्‍त पांडेय जी का मानसिक हलचल’ को न पढने का सवाल ही नहीं , पर उसमें भी 30 से कम बार ही टिप्‍पणियां कर पायी होउंगी।

हिन्‍दी ब्‍लोग जगत में काफी दिनों से होने के बावजूद टिप्‍पणियों के संदर्भ में ‘इस हाथ दो उस हाथ पाओ’के अक्‍सर हल्‍ले और हाल फिलहाल इस विषय पर चिंतन करनेवाली मैं एक बार फिर पेशोपेश में हूं कि राज भाटिया जी ने अपनी 6 + 4 + 9 = 19 टिप्‍पणियों के बदले , रंजू भाटिया जी ने अधिक से अधिक 30 टिप्‍पणियों के बदले और ज्ञान दत्‍त पांडेय जी ने 30 के लगभग टिप्‍पणियों के बदले में मुझे इतनी सारी टिप्‍पणियां क्‍यूं दी। उनसे ही जबाब की आशा रखूंगी।इसके अलावे उडन तश्‍तरी जी, निर्मला कपिला जी डा मनोज मिश्रा जी और विनय जी को भी मैं शायद ही उतनी टिप्‍पणियां कर पायी होउं। इसके अलावे बहुत सारे ऐसे पाठकों की भी मैं शुक्रगुजार हूं , जिनके ब्‍लोग पर मैं टिप्‍पणियां नहीं कर पाती , पर वे मेरे ब्‍लोग पर आकर मुझे टिप्‍पणी कर जाते हैं। मुझे नहीं लगता कि उन्‍होने किसी स्‍वार्थ से मुझे टिप्‍पणियां की होंगी।

तस्‍वीर का ही एक दूसरा पहलू भी है, डा अनिल के हिन्‍दी ब्‍लाग की मैं शीर्ष टिप्‍पणीकार हूं , पर मुझे उनकी टिप्‍पणी शायद ही कभी मिली हो। इसी प्रकार डा आशुतोष शुक्‍ल जी के ब्‍लोग में भी मैं शीर्ष टिप्‍पणीकार हूं , पर उन्‍होने आजतक मेरे ब्‍लोग पर एक भी टिप्‍पणी नहीं की। ‘हिन्‍द युग्‍म’ पर मेरी नियमित टिप्‍पणियां होती है , जबकि शैलेश जी ने मुझे अभी तक एक बार ही टिप्‍पणी दी है। कार्टनिस्‍टों के ब्‍लोगों को मैं नियमित तौर पर देखा और टिप्‍प्‍णियां किया करती हूं , बदले में टिप्‍पणी पाने की आशा न कभी रखा और न ही पाया। इसी प्रकार विवेक सिंह जी को मैने 50 से उपर टिप्‍पणियां की है , जबकि उन्‍होने मुझे मात्र 18 टिप्‍पणियां दिए हैं। ‘आदित्‍य’ के ब्‍लोग को मैं नियमित पढती और उसपर टिप्‍पणी किया करती हूं , जबकि रंजन जी ने मुझे मात्र 17 टिप्‍पणियां की है। अविनाश वाचस्‍पति जी के विभिन्‍न ब्‍लोगों पर भी मैं नियमित टिप्‍पणियां किया करती हूं , पर उन्‍होने भी मेरे ब्‍लाग पर 17 टिप्‍पणियां ही की है । इसके अलावे बहुत ऐसे लेखक हैं, जिनके पोस्‍ट पर मैने नियमित टिप्‍पणियां की हैं , पर वे मेरे ब्‍लोग पर नहीं आते या आते भी हैं तो टिप्‍पणियों के रूप में अपनी दस्‍तखत नहीं छोड जाते। मैं उनसे आशा भी नहीं रखती कि मेरी टिप्‍पणियों के बदले टिप्‍पणी दें और उनके ब्‍लोगों पर मेरा टिप्‍पणी करना बदस्‍तूर जारी है।

मैं एक भूली बिसरी बात को दोबारा नहीं ला रही , कल पुन: एक स्‍थान पर इस बात की चर्चा देखकर इस बात को उठाने को मजबूर हूं। एक स्‍वागत संदेश की कापी पेस्‍ट से मेरे विषय में बिना पढे टिप्‍पणी करने का जो विवाद शुरू हुआ , किसी भी संदर्भ में वाद विवाद के क्रम में अभी तक वह जारी है।वास्‍तव में नए चिट्ठों का स्‍वागत करने की इच्‍छा रखनी ही मेरी एक बडी भूल मानी जा सकती है, इल्‍जाम लगानेवाले प्रतिदिन नए चिट्ठों का स्‍वागत करके देख लें। प्रतिदिन 15 से 30 चिट्ठे, एक दो को छोडकर सबमें वर्ड वेरिफिकेशन, देवनागरी में टिप्‍पणी लिखें, वर्ड वेरिफिकेशन मे दिए गए वर्ड को टाइप करें, ओफ्फोह देवनागरी में लिखी गयी, बैक स्‍पेस दबाएं, फिर आल्‍ट टैब दबाएं, फिर से रोमण में टाइप करें, इस बार ध्‍यान से टाइप नहीं किया , फिर गल्‍ती हो गयी ,फिर से मिटाकर टाइप करें, तब जाकर किसी तरह एक टिप्‍पणी पोस्‍ट होती है। फिर दूसरे ब्‍लाग में जाएं ,टिप्‍पणी करना शुरू करें, अरे ये तो रोमन में चलने लगा ,फिर से बैकस्‍पेस दबाएं ,आल्‍ट टैब दबाएं ,फिर देवनागरी में टिप्‍पणी लिखें, फिर वर्ड वेरिफिकेशन में दिए शब्‍द को टाइप करें ,ओह फिर देवनागरी , इतनी कोफ्त होती है, करके तो देखें। आज बताना चाहूंगी कि यह ही एक मुख्‍य वजह रही नए चिट्ठाकारों के ब्‍लाग में टिप्‍पणियों के कट पेस्‍ट की। चाहकर भी उन्‍हें उनकी पोस्‍टों के अनुरूप टिप्‍पणी दे पाना संभव नहीं।

पर इस एक गल्‍ती का फल मुझे हमेशा सुनने को मिलता रहेगा , यह उम्‍मीद तो मैने हिन्‍दी ब्‍लोग जगत से जुडे लोगों से तो नहीं की थी। मैने अपने परिचय में ही लिखा है ‘गंभीर अध्‍ययन सिर्फ ज्‍योतिष का’ , इसलिए बाकी विषयों से संबंधित हल्‍के फुल्‍के पोस्‍ट को ही पढती और टिप्‍पणियां करती हूं । डा जे सी फिलिप जी , समीर लाल जी , डा रूपचंद शास्‍त्री जी , बी एस पाबला जी , महक जी , योगेन्‍द्र मौद्गिल जी , अरविंद मिश्रा जी , विष्‍णु बैरागी जी , योगेश स्‍वप्‍न जी , अनिल पुसाधकर जी , महेश सिन्‍हा जी , श्‍यामल सुमन जी , घुघुती बासुती जी , शेफाली पांडेय जी , अजय कुमार झा जी , सिद्धार्थ शंकर जी जैसे बहुत सारे अन्‍य लेखकों (जिनके ब्‍लोगों पर अक्‍सर मेरी टिप्‍पणियां मौजूद होती हैं) के आसान शब्‍दों में गंभीर बातों को कह देने से मैं विशेष प्रभावित रहती हूं।पर क्‍या यह अनुचित नहीं कि टिप्‍पणियों को लेकर हुए विवाद के बाद आजकल उन्‍हें पढने के बाद मन में आए अनायास उमडे भावों को जैसे 'सुंदर भाव' , 'उत्‍तम विचार' , 'बहुत बढिया' , 'बहुत सुंदर' , 'बधाई' , 'शुभकामनाएं' , 'धन्‍यवाद' , 'आपका लिखा पढना अच्‍छा लगता है' , 'बहुत सुंदर सोंच' , 'अच्‍छी प्रस्‍तुति' , 'अच्‍छी रचना' , ‘अच्‍छा सुझाव’, ‘ज्ञानवर्द्धक आलेख रहा’ आदि को टिप्‍पणी बाक्‍स में लिखकर भी मैं टिप्‍पणी के रूप में पोस्‍ट नहीं कर पाती। इसके अलावे बहुत से नए ब्‍लोगरों को प्रोत्‍साहित करने के लिए मैं हमेशा टिप्‍पणियां करती आयी थी , पर इतना समय नहीं होने से कि लंबी टिप्‍पणियां कर पाउं , मैने टिप्‍पणियां करना ही बंद कर दिया है , जो मेरे लिए बहुत कष्‍टकर है।

लंबे आलेखों , कहानियों को पढने में मेरी दिलचस्‍पी हमेशा से कम रही है , उसमें आप कभी भी मेरी टिप्‍पणियां नहीं पाएंगे। गंभीर भाषा या साहित्‍य को यदि पढ भी लिया , तो संबंधित भाव मेरी समझ से परे होते हैं , इनमें मैं कोई टिप्‍पणियां नहीं किया करती। फुरसतिया , ताउ डाट इन , मोहल्‍ला , भडास , अजदक , शब्‍दों का संसार , रचनाकार , कबाडखाना , शिव कुमार मिश्र और ज्ञानदत्‍त पांडेय का ब्‍लाग , कस्‍बा , उन्‍मुक्‍त , आलोक पुराणिक , दिल की बातआदि बहुत सारे ब्‍लोग (जिन ब्‍लोगों पर विरले मेरी टिप्‍पणियां मौजूद हो सकती हैं) इसी श्रेणी में आते हैं , जिसे मैं पढती तो अवश्‍य हूं , पर पूरा समझ नहीं पाती। इस कारण इनमें जबतक मेरी रूचि के विषय पर न लिखा रहे , मैं कमेंट नहीं किया करती। प्रकाश बादल जी और गौतम राजऋषि जी जैसों के गजल और हिमांशु जी जैसे कुछ लोगों की रचनाएं पढकर मेरी समझ में कभी कभार ही कुछ आता है , वहां आप मेरी टिप्‍पणियां भूले भटके ही पाएंगे।सोंचने वाली बात यह है कि यदि बिना पढे कमेंट करने की मेरी आदत होती तो मैं इन ब्‍लोगों पर कमेंट क्‍यूं नहीं किया करती। यहां तक कि मुझे लेकर कोई विवाद न बने , इसके कारण कुछ न कुछ विचार रखने के बावजूद विवादित ब्‍लोगों या विवादित पोस्‍टोंतक में मैं कोई टिप्‍पणियां नहीं करती , वहां आप मेरी टिप्‍पणियां शायद ही पाएंगे , पर इसके बावजूद विवादों में बने रहना मेरी नियति बन गयी है।

यदि ज्‍योतिष के प्रति रूचि की बात छोड दी जाए , तो मेरे प्रोफाइल में स्‍पष्‍टत: लिखा है कि मेरा खाने पीने , पढने लिखने , सुनने या देखने में कोई खास पसंदीदा नहीं , जो दिल को भा जाए वही उस समय अच्‍छा बन गया। यदि पढने का मूड बना तो ब्‍लागवाणी खोलकर पढती चली गयी , टिप्‍पणी करती चली गयी। अभी हिन्‍दी दिवस की ही बात है , अपनी हिन्‍दी पर लिखे गए अच्‍छे अच्‍छे आलेखों को देखकर अच्‍छा लगा , बस पढती और टिप्‍पणियां करती चली गयी। लेखकों को हिन्‍दी दिवस की बधाई देने के लिए कट पेस्‍ट का कुछ सहारा तो लिया था , पर उससे पहले टिप्‍पणी में मैने हर लेख की आत्‍मा से जुडे कमेंट किए थे। कल एक बच्‍चे को हिन्‍दी प्रदर्शनी के लिए सामग्री जुटाने के क्रम में गूगल सर्च में 'हिन्दी के प्रति सबो की जागरूकता को देखकर अच्छा लग रहा है' कीबर्ड को सर्च करने में मुझे सारे 90 आलेख दिखाई पडे , तो एक ही दिन में किए गए इतने कमेंटों को देखकर मैं स्‍वयं ही दंग रह गयी।वास्‍तव में सामान्‍य से अधिक कार्यक्षमता के कारण मेरे बारे में अक्‍सर किसी न किसी बात को लेकर संदेह किया जाता रहा है , पर समय के साथ सारी गलतफहमियां स्‍वयं दूर हो जाती हैं । दो तीन वर्षों से ससुराल पक्ष के कुछ लोगों के मध्‍य फैली यह गलतफहमी कि मैं खाना नहीं बनाती , मेरे पति और बच्‍चे होटल से ही मंगवाकर खाना खाते हैं , तब दूर हुई , जब मेरी सास चार महीने मेरे पास रहकर गयीं। अपनी गल्‍ती न होने के बावजूद भी जीवन में ऐसा कुछ कुछ होते रहे , तो ग्रहों को दोष दे देना हमें बिल्‍कुल सामान्‍य बनाए रखता है।

शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2009

गाय को पहली रोटी खिलाने का रहस्‍य पता है आपको ??


मैं रसोई में साफ सफाई का कुछ अधिक ही ध्‍यान रखती हूं। धोए हुए बर्तन का प्रयोग करते वक्‍त भी उसे फिर से धोना मेरी आदत में शुमार है । वास्‍तव में परिवार के सभी जनों के अच्‍छे स्‍वास्‍थ्‍य के लिए मैं ऐसा किया करती हूं। प्रयोग करते वक्‍त कुछ बरतन गीले हों तो कुछ दिक्‍कत आती है , उसे मैं धोकर सूखने छोड दिया करती हूं। रोटी बेलने के लिए चकले और बेलन को थोडी देर पहले धोकर सूखने को रख देती हूं , ताकि रोटी बनाते समय वह सूखा मिले।

कुछ दिन पहले गांव से एक दूर के रिश्‍तेदार अपनी पत्‍नी को डाक्‍टर को दिखाने मेरे यहां पहुंचे। तबियत खराब होने और हमारे मना करने के बावजूद उनकी पत्‍नी रसोई में काम करने को पहुंच जाती। उसके काम करने का तरीका मुझे हायजनिक नहीं लगता , इसलिए उसे मना करती। पर उसको बुरा न लगे , यह सोंचकर एक दो कामों में मैं उसे शामिल कर ले रही थी। पर मेरा पूरा ध्‍यान उसके काम करने के तरीके पर ही रहता था।

एक दिन शाम को मैं थोडी देर के लिए बाहर गयी तो उसने आटा गूंधकर फुल्‍के बनानी शुरू कर दी। मैंने आकर देखा तो परेशान। धोकर और पलटकर रखे हुए बर्तन में आटा गूंधा जाना मुझे उतना परेशान नहीं कर रहा था , जितना उस बिना धोए हुए चकले और बेलन में उसे बेला जाना। अब उन फुल्‍कों को न तो फेका ही जा सकता था और न परोसा । पर शीघ्र ही मेरे दिमाग में एक विचार आया , चकले और बेलन की गंदगी तो एक या दो रोटी में ही बेलकर निकल गए होंगे। उसके बाद की रोटियां तो अवश्‍य कीटाणुओं से सुरक्षित होंगी , फिर क्‍यूं न पहले बनी दो रोटियों को फेक दिया जाए।

मैं सोंच ही रही थी कि किस बहाने से पहली दो रोटियों को मांगकर फेका जाए , तभी उसने नीचे से दो रोटियां निकालकर दी और कहा कि ये पहली रोटियां है और उसने इसे गाय के लिए रखा है। मेरी समस्‍या समाप्‍त हो गयी । मैने उन दोनो रोटियों को लिया और गाय को खिलाने चली गयी। इतने दिनों से गाय को पहली रोटी खिलाने का रहस्‍य मेरे सामने उस दिन उजागर हुआ।

गुरुवार, 1 अक्तूबर 2009

परंपरागत ज्ञान-विज्ञान के अनुसार शरीर में जीव तत्‍व की उपस्थिति

परंपरागत ज्ञान-विज्ञान पुराने युग के जीवन पद्धति के अनुकूल था, इसलिए आज की जीवनपद्धति के अनुसार देखा जाए , तो इसमें कुछ कमियां अवश्‍य दिखाई पडती हैं, पर इसके बावजूद यह मुझे बहुत आकर्षित करता है और शायद यही कारण है कि न सिर्फ इसकी वैज्ञानिक व्‍याख्‍या सुननी ही मुझे अच्‍छी लगती है , मैं स्‍वयं छोटी मोटी हर परंपरा तक की वैज्ञानिक व्‍याख्‍या में दिलचस्‍पी रखती हूं। 2004 में राष्‍ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला , दिल्‍ली में परंपरागत ज्ञान विज्ञान के एक सेमिनार में इस प्रकार के कई शोध प्रस्‍तुत किए गए थे , जिसमें से रानी दुर्गावती विश्‍व विद्यालय , जबलपुर के पूर्व कुलपति डा सुरेश्‍वर शर्मा द्वारा प्रस्‍तुत किए गए एक शोघपत्र ने मुझे आश्‍चर्यित कर दिया था , जो आपलोगों के लिए प्रस्‍तुत कर रही हूं .... 

महामहोपाध्‍याय पं गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी ने अपने ग्रंथ ‘वैदिक विज्ञान और भारतीय संस्‍कृति’ में एक प्राचीन श्‍लोक का उद्धरण दिया है , जिसमें जीव तत्‍व की उपस्थिति के आकार को बताया है ... 

बालाग्र शतभागस्‍य शतधा कल्पितस्‍य च । 
तस्‍य भागस्‍य भागम् ऐषा जीवस्‍थ कल्‍पना ।। 
एक जीवन से दूसरे जीवन की निरंतरता विज्ञान की भाषा में जीवन तत्‍व अथवा ‘जीन’ के नाम से और उसके द्वारा जानी जाती है। इसके आकार माप का जो वर्णन इस श्‍लोक में बताया गया है , वह अद्भुत और आश्‍चर्यजनक रूप से ठीक वही है , जो आधुनिक विज्ञान ने जीन अथवा आनुवंशिकी कारक अर्थात डी एन ए के अणु को मापा है। यह माप 10 नैनो मीटर है। मनुष्‍य के बाल की मोटाई 100 माइक्रोमीटर या एक मि मी के दसवें भाग के बराबर मापी गयी है। एक नैनोमीटर एक मि मी का सौ करोडवां भाग है। माइक्रोमीटर एक मीटर का दस लाखवां भाग है और मि मी का हजारवां भाग। इस प्रकार दस नैनोमीटर बाल की मोटाई का दस करोडवां भाग हुआ। प्राचीन और आधुनिक विज्ञानियों के सूक्ष्‍म मापन में अद्भुत समानता आ‍श्‍चर्यित करती है। यह अपने आपमें प्रमाण है कि सामान्‍य नेत्रों से देखकर इतनी सूक्ष्‍म माप संभव नहीं है। अत: उस समय उन्‍नत सूक्ष्‍मदर्शी यंत्र या उससे मिलती जुलती कुछ उपकरण व्‍यवस्‍था अवश्‍य होगी , जिसकी खोज की जानी चाहिए। 
उसी प्रकार पं चतुर्वेदी ने मनुष्‍य के संतानोत्‍पादन करनेवाले गुणों को धारण करनेवाले तत्‍व को ‘सह:’ का नाम दिया है , जो इस बात को स्‍पष्‍ट करता है कि ये ‘सह:’ यानि साथ साथ चलते हैं। अर्थात् अनेक एक साथ रहते हैं , जिनकी संख्‍या 84 है। 'सह:' को आधुनिक भाषा में हम सेट भी कह सकते हैं। गुणसूत्र तो 23 जोडे होते हैं , परंतु उसमें जीन सेट अर्थात् लिंक्ड जीन सेट्स के समूह होते हैं। वे ही एक पीढी से दूसरी पीढी में अदल बदल कर स्‍थानांतरित होते हैं। जीन सेट ट्रांसमिशन की निश्चित संख्‍या का ज्ञान अभी ह्यूमन जीनोम प्रोजेक्‍ट की शोध परियोजनाओं का विषय है। 

इन 84 'सह:' के संयोग और पीढी स्‍थानांतरण में इनकी निश्चित संख्‍या भी हैरान करनेवाली है क्‍यूंकि अभी इस स्‍तर पर हमारा आधुनिक अनुवांशिकी‍ विज्ञान भी नहीं पहुंच सका है। 84 में से 56 'सह:' यानि जीन सेट अनुवांशिक होते हैं , 84 में से 28 'सह:' या जीन सेट उपार्जित होते हैं , 56 में से 21 'सह:' माता + पिता के मिलते हैं , 15 'सह:' दादा + दादी के‍ मिलते हैं , 10 'सह:' पडदादी + पढदादा के मिलते हैं , 6 'सह:' प्रपडदादी + प्रपडदादा के मिलते हैं , 3 'सह:' पूर्व प्रपडदादी + पूर्व प्रपडदादा के होते हैं और 1 'सह:' पूर्व छठी पीढी के। वंशावली तालिका बनाकर इन महत्‍वपूर्ण वैज्ञानिक ज्ञान का सत्‍यापन कर ह्यूमन जीनोम प्रोजेक्‍ट के शोधकर्ता इस प्राचीन ज्ञान को वैज्ञानिक ढंग से लोगों के सामने रख सकते हैं।

बुधवार, 30 सितंबर 2009

बृहस्‍पति-चंद्र युति के फलस्‍वरूप 11 नवम्‍बर तक आपपर क्‍या प्रभाव पडेगा ??

कई दिनों की अनुपस्थिति के बाद कल बोकारो वापस आकर मैने ज्‍यों ही ब्‍लागवाणी को खोला , ब्‍लागवाणी के वापस होने की सूचना मिली। कई आलेखों को पढने के बाद महसूस हुआ कि हिन्‍दी ब्‍लाग जगत से जुडे लोगों ने 24 घंटे तक काल्‍पनिक रूप से ब्‍लागवाणी के न होने का दर्द झेला , सौभाग्‍य मेरा कि मेरे वापस लौटने से पहले ब्‍लागवाणी ने अपनी पुनर्वापसी की सूचना दे दी। ब्‍लागवाणी की पूरी टीम को बहुत बहुत धन्‍यवाद। लौटते ही आसमान में बृहस्‍पति और चंद्रमा के युति पर नजर चली गयी। कल दोनो के मध्‍य कुछ फासला था , पर आज शाम वे दोनो एक साथ दिखेंगे। आनेवाले एक महीने में बृहस्‍पति बहुत प्रभावी स्थिति में होंगे , इसकी पाठकों को सूचना देने के लिए इस आलेख को लिखने की आवश्‍यकता पड गयी।


13 मई 2009 को मैने आकाश में बृहस्‍पति और चंद्र के खास योग के बनने और उसके 16 मई से 19 जून तक उसके जड चेतन पर पडनेवाले प्रभाव की चर्चा करते हुए एक आलेखलिखा था। मई के महीने में इस ग्रहयोग को रात्रि में देखा जा सकता था , पर सूर्य की बदली हुई स्थिति से इस योग को अभी शाम को ही देखा जा सकता है। इस एक बार आप सभी पाठकों को पुन: याद दिला दूं कि ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के अनुसार इस योग के फलस्‍वरूप निम्‍न समयांतराल में जन्‍म लेनेवालों के लिए शुभ प्रभाव की उम्‍मीद की गयी थी ...


सितम्‍बर 1945 से फरवरी 1946, जुलाई 1946 से सितम्‍बर 1946, सितम्‍बर 1957 से फरवरी 1958, जुलाई 1958 , अगस्‍त 1958, अगस्‍त 1969 से फरवरी 1970 , जुलाई 1970 , अगस्‍त 1970, नवम्‍बर 1980 से जनवरी 1981, जुलाई 1981 से नवम्‍बर 1981, नवम्‍बर 1992 से जनवरी 1993, जून 1993 से नवम्‍बर 1993। इसके अलावे इस ग्रहयोग का कन्‍या राशिवाले लोगों पर शुभ प्रभाव पडेगा।
यदि अबतक आपलोगों ने ऐसा कुछ महसूस न‍हीं किया या कोई खुशखबरी आते आते रह गयी हो , और 15 अगस्‍त के आसपास उम्‍मीद बिल्‍कुल समाप्‍त होने के बाद पुन: आशा की किरण दिखाई पड रही है तो अभी से 11 नवम्‍बर के मध्‍य आपके कार्य के सिद्ध होने की संभावना है। 


किंतु इसके विपरीत ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के अनुसार इस योग के फलस्‍वरूप निम्‍न समयांतराल में जन्‍म लेनेवालों के लिए गडबड प्रभाव की उम्‍मीद की गयी थी ...


नवम्‍बर 1931 से मई 1932, दिसम्‍बर 1943 से मई 1944, दिसम्‍बर 1955 से मई 1956, अक्‍तूबर 1966 से दिसम्‍बर 1966, नवम्‍बर 1978 से जनवरी 1979,नवम्‍बर 1990 से अप्रैल 1991,नवम्‍बर 2002 से अप्रैल 2003। इसके अलावे इस ग्रहयोग का कर्क राशिवाले लोगों पर शुभ प्रभाव पडेगा। 


हो सकता है , आपलोगों ने भी ऐसा कुछ गडबड महसूस नहीं किया हो , पर किसी मुद्दे को लेकर किंकर्तब्‍यविमूढावस्‍था में तो अवश्‍य होंगे , आनेवाले एक महीने थोडी सावधानी बरतें। 11 नवम्‍बर के पश्‍चात आपकी समस्‍या के समाधान की संभावना है।


इसके अलावे ज्‍योतिष में सबसे शुभग्रह के रूप में पूजनीय गुरू बृहस्‍पति सामान्‍य लोगों के लिए शुभता ही लाता है। पर मई जून से आरंभ होने और 15 अगस्‍त के आसपास भयावह स्थिति में बने होने को देखते हुए अपने रिसर्च में मैनेस्‍वाइन फ्लूको भी बृहस्‍पति की इसी गति से जोडा है , 13 अक्‍तूबर से 11 नवम्‍बर तक स्‍वाइन फ्लू के खात्‍मे के लिए पुरजोर कोशिश होगी और 11 नवम्‍बर के पश्‍चात इसका लगभग खात्‍मा हो जाना चाहिए।


इसके अलावे जैसा कि आज के युग में धर्म का रूप भी वीभत्‍स हो गया है , इसलिए युग के अनुरूप ही दो चार वर्षों से बृहस्‍पति चंद्र की इस युति के फलस्‍वरूप यत्र तत्र धार्मिक और सांप्रदायिक माहौल को भडकते हुए भी पाया गया है । मेरे इस आलेख को लिखे जाने के बाद 16 मई से 19 जून के मध्‍य पंजाब मेंसंप्रदायिक आगभडक ही गयी थी। वैसे इस महीने की बृहस्‍पति के कारण ऐसी स्थिति आने की संभावना कम रहती है , फिर भी हम 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के साथ गुरू बृहस्‍पति से प्रार्थना करें कि वे अपने शुभत्‍व को ही बनाए रखें और लोगों के समक्ष कल्‍याणकारी वातावरण ही बनाए रखें।