शनिवार, 12 दिसंबर 2009

फिर वह बाबा मेरे पिताजी के पैरों पर गिर पडा .. मुझे बचा लो !!

'आपलोगों ने सुना या नहीं , कालीचरण लौट गया है' आंगन में आते ही 'खबर कागज' ने समाचार सुनाया। हमेशा की तरह हमलोगों के लिए यह एक सनसनीखेज खबर थी , इसी प्रकार की खबर सुनाने के लिए ही तो हमलोगों ने मुहल्‍ले के उस व्‍यक्ति को 'खबर कागज' की पदवी दी थी। हमलोग सब चौंक पडे 'कहां है अभी वो' 'अभी वह फलाने गांव में है , दो चार घंटे में यहां पहुंच जाएगा , 'बाबा' बना कालीचरण उस गांव में भिक्षा के लिए आया था , लोगों ने उसे पहचान लिया है , उसे लेने के लिए लोग चले गए हैं' हमलोगों को सूचित कर वे दूसरों के घर चल पडे , गांव में इस प्रकार के खबर के बाद उनकी व्‍यस्‍तता बढनी ही थी। कालीचरण के लौटने की खबर से पूरे गांव में खुशी की लहर थी।

हमलोगों के लिए यह खबर तो बिल्‍कुल खास थी , क्‍यूंकि हमारे बिल्‍कुल बगल में हमारे गोशाले से सटा हुआ कालीचरण के परिवार में उसके माता पिता , दो भाई और एक बहन रहते थे। गांव गांव में हर तरह की बिजली की चक्‍की के आने से उनलोगों की रोजी रोटी की समस्‍या खडी हो गयी थी , क्‍यूंकि उन्‍हीं की जाति के लोगों के यहां के कोल्‍हू में गांव भर के तेल की पेराई होती थी। कुछ दिनों तक तंगी झेलने से उसके पिताजी हताश और निराश थे , पर उसकी मां ने रोजी रोटी का एक साधन निकाल लिया था। गृहस्‍थों के घरों से धान खरीदकर उससे चावल बनवाकर बाजार में बेचने का कार्य शुरू किया। बहुत मेहनत करने के बावजूद महाजनों को ब्‍याज देने के बाद खाने पीने की व्‍यवस्‍था मात्र ही हल हो सकी थी , फिर भी उसने दोनो बेटो से मजदूरी न करवाकर स्‍कूल में नाम लिखवा दिया था। धीरे धीरे दोनो बेटे मैट्रिक पास कर गए थे और पढे लिखे और सभ्‍य शालीन अपने पुत्रों को देखकर मां की खुशी का ठिकाना न था।

शादी भी हो गयी और बच्‍चे भी ,  पर किसी प्रकार की नौकरी पा लेने की उनकी आशा निराशा में ही बदल गयी। सरकार के द्वारा दिए जाने वाले रिजर्वेशन का फायदा भी ऐसे लोगों को नहीं मिलना उसके औचित्‍य पर एक बडा प्रश्‍न खडा करता है। मैट्रिक पास करने से कुछ नहीं होता , अंत में उन्‍हें मजदूरी करने को बाध्‍य होना पडा। दिमाग चला चुके उनके बेटों के लिए इतनी शारिरीक मेहनत बर्दाश्‍त के बाहर था , उन्‍हें अक्‍सर चिडचिडाहट होती और कभी कभार झगडे झंझट की आवाज हमारे कानों में भी पडती। एक दिन बात कुछ अधिक ही बढ गयी , गुस्‍से से कालीचरण घर से निकला , तो लौटकर वापस ही नहीं आया। बरसात का दिन था , सभी नदी नाले में तेज पानी का बहाव , कहीं कूदकर जान ही दे दी हो , पर ये बात परिवार वालों को संतोष देता रहा कि शायद 'कालीचरण' बाबा बन गया हो। इस बात के दस वर्ष पूरे हो गए थे। कालीचरण के जाने से दुखी बाल और दाढी न बनाने के प्रण से उसके पिताजी का रूप भी बाबाजी का ही हो गया था।

सचमुच दो बजे को उस बाबा को उसके घर लाया गया। उस गांव के लोगों को बाबा भले ही कालीचरण लग रहा हो , पर हमारे गांववालों को उसके चेहरे में फर्क दिखा। कारण पूछने पर उसने बताया कि दीक्षा के दौरान उसे कई योनियों में परिवर्तित किया गया है , इसलिए उसका रूप कुछ अलग है। इस बात से गांववालों की पूरी सहानुभूति उसे मिल गयी। उसके दर्शन के लिए गांववालों का तांता लग गया। क्‍या गांववाले , क्‍या परिवार वाले , क्‍या बहन , क्‍या पत्‍नी ... सबने मान लिया था कि वह कालीचरण ही है। पर योनि परिवर्तन की बात कुछ पढे लिखे लोगों को नहीं जंच रही थी , खासकर उसकी इसी बात को सुनकर मेरे‍ पिताजी मान चुके थे कि यह कालीचरण नहीं कोई ठग है। पर इतने लोगों के बीच में एक की सही बात को भी कौन सुनेगा , यही सोंचकर उसके पोल के खुद खुलने का इंतजार कर रहे थे।

बाबा जी की पूरी सेवा हो रही थी , बहन तेल मालिश कर रही थी , तो भाई नहला रहा था। मां और पत्‍नी उसे स्‍वादिष्‍ट खाने खिलाए जा रही थी। यहां तक तो ठीक था , उस घर में कोई बडी संपत्ति तो नहीं थी , कालीचरण का रूप धरे उस बाबाजी के द्वारा लूटे जाने का भय होता। पर एक अबला स्‍त्री कहीं उसके धोखे में आ जाए , पापाजी को यही चिंता सता रही थी। पर एकबारगी विरोध भी नहीं किया जा सकता था , सो कोई उपाय निकालने की दिशा में वे चिंतन कर रहे थे। उसी वक्‍त मुहल्‍ले के तीन व्‍यक्ति हमारे आंगन में आ गए , एक ने पापाजी से पूछा कि क्‍या उन्‍हे विश्‍वास है कि वह बाबा कालीचरन ही है।

मेरे पापाजी ने 'ना' में सर हिलाया , उनमें से एक व्‍यक्ति के लिए इतना ही काफी था , वे तेजी से कालीचरन के आंगन में पहुंचे और पूछा 'क्‍या तुम कालीचरण हो'
उसका 'हां' कहना था कि गाल में एक चांटा।
'सामने किसका घर है'
'फलाने का' गाल में दूसरा चांटा।
'ये कौन है'
'फलाने हैं' गाल में तीसरा चांटा।
'मुझे माफ कर दो , उनलोगो ने जबरदस्‍ती किया , मैने नहीं कहा कि मैं कालीचरण हूं' तुरंत उसने दया की भीख मांगनी शुरू की और वो चांटे पर चांटा लगाए जा रहे थे। हल्‍ला गुल्‍ला सुनकर पापाजी वहां पहुंचे और उस सज्‍जन को डांटना शुरू किया.. 'गांव में आए मेहमान के साथ ऐसा व्‍यवहार करते हैं क्‍या'
'मेहमान है तो मेहमान की तरह रहे , यहां सबको बेवकूफ क्‍यूं बना रहा है' वो गुस्‍से से तमतमाए था और पूरा गांव तमाशा देख रहा था। उसके रौद्र रूप को देखकर वो बाबा बहुत भयभीत था , मेरे पापाजी के हमदर्दी भरे शब्‍द को सुनकर वह उनके पैरों पर वह गिर पडा 'मुझे बचा लो' । फिर पापाजी ने सबको शांत किया और मौका देखते ही वह बाबा सिर पर पैर रखकर भागा।




फिर वह बाबा मेरे पिताजी के पैरों पर गिर पडा .. मुझे बचा लो !!

'आपलोगों ने सुना या नहीं , कालीचरण लौट गया है' आंगन में आते ही 'खबर कागज' ने समाचार सुनाया। हमेशा की तरह हमलोगों के लिए यह एक सनसनीखेज खबर थी , इसी प्रकार की खबर सुनाने के लिए ही तो हमलोगों ने मुहल्‍ले के उस व्‍यक्ति को 'खबर कागज' की पदवी दी थी। हमलोग सब चौंक पडे 'कहां है अभी वो' 'अभी वह फलाने गांव में है , दो चार घंटे में यहां पहुंच जाएगा , 'बाबा' बना कालीचरण उस गांव में भिक्षा के लिए आया था , लोगों ने उसे पहचान लिया है , उसे लेने के लिए लोग चले गए हैं' हमलोगों को सूचित कर वे दूसरों के घर चल पडे , गांव में इस प्रकार के खबर के बाद उनकी व्‍यस्‍तता बढनी ही थी। कालीचरण के लौटने की खबर से पूरे गांव में खुशी की लहर थी।

हमलोगों के लिए यह खबर तो बिल्‍कुल खास थी , क्‍यूंकि हमारे बिल्‍कुल बगल में हमारे गोशाले से सटा हुआ कालीचरण के परिवार में उसके माता पिता , दो भाई और एक बहन रहते थे। गांव गांव में हर तरह की बिजली की चक्‍की के आने से उनलोगों की रोजी रोटी की समस्‍या खडी हो गयी थी , क्‍यूंकि उन्‍हीं की जाति के लोगों के यहां के कोल्‍हू में गांव भर के तेल की पेराई होती थी। कुछ दिनों तक तंगी झेलने से उसके पिताजी हताश और निराश थे , पर उसकी मां ने रोजी रोटी का एक साधन निकाल लिया था। गृहस्‍थों के घरों से धान खरीदकर उससे चावल बनवाकर बाजार में बेचने का कार्य शुरू किया। बहुत मेहनत करने के बावजूद महाजनों को ब्‍याज देने के बाद खाने पीने की व्‍यवस्‍था मात्र ही हल हो सकी थी , फिर भी उसने दोनो बेटो से मजदूरी न करवाकर स्‍कूल में नाम लिखवा दिया था। धीरे धीरे दोनो बेटे मैट्रिक पास कर गए थे और पढे लिखे और सभ्‍य शालीन अपने पुत्रों को देखकर मां की खुशी का ठिकाना न था।

शादी भी हो गयी और बच्‍चे भी ,  पर किसी प्रकार की नौकरी पा लेने की उनकी आशा निराशा में ही बदल गयी। सरकार के द्वारा दिए जाने वाले रिजर्वेशन का फायदा भी ऐसे लोगों को नहीं मिलना उसके औचित्‍य पर एक बडा प्रश्‍न खडा करता है। मैट्रिक पास करने से कुछ नहीं होता , अंत में उन्‍हें मजदूरी करने को बाध्‍य होना पडा। दिमाग चला चुके उनके बेटों के लिए इतनी शारिरीक मेहनत बर्दाश्‍त के बाहर था , उन्‍हें अक्‍सर चिडचिडाहट होती और कभी कभार झगडे झंझट की आवाज हमारे कानों में भी पडती। एक दिन बात कुछ अधिक ही बढ गयी , गुस्‍से से कालीचरण घर से निकला , तो लौटकर वापस ही नहीं आया। बरसात का दिन था , सभी नदी नाले में तेज पानी का बहाव , कहीं कूदकर जान ही दे दी हो , पर ये बात परिवार वालों को संतोष देता रहा कि शायद 'कालीचरण' बाबा बन गया हो। इस बात के दस वर्ष पूरे हो गए थे। कालीचरण के जाने से दुखी बाल और दाढी न बनाने के प्रण से उसके पिताजी का रूप भी बाबाजी का ही हो गया था।

सचमुच दो बजे को उस बाबा को उसके घर लाया गया। उस गांव के लोगों को बाबा भले ही कालीचरण लग रहा हो , पर हमारे गांववालों को उसके चेहरे में फर्क दिखा। कारण पूछने पर उसने बताया कि दीक्षा के दौरान उसे कई योनियों में परिवर्तित किया गया है , इसलिए उसका रूप कुछ अलग है। इस बात से गांववालों की पूरी सहानुभूति उसे मिल गयी। उसके दर्शन के लिए गांववालों का तांता लग गया। क्‍या गांववाले , क्‍या परिवार वाले , क्‍या बहन , क्‍या पत्‍नी ... सबने मान लिया था कि वह कालीचरण ही है। पर योनि परिवर्तन की बात कुछ पढे लिखे लोगों को नहीं जंच रही थी , खासकर उसकी इसी बात को सुनकर मेरे‍ पिताजी मान चुके थे कि यह कालीचरण नहीं कोई ठग है। पर इतने लोगों के बीच में एक की सही बात को भी कौन सुनेगा , यही सोंचकर उसके पोल के खुद खुलने का इंतजार कर रहे थे।

बाबा जी की पूरी सेवा हो रही थी , बहन तेल मालिश कर रही थी , तो भाई नहला रहा था। मां और पत्‍नी उसे स्‍वादिष्‍ट खाने खिलाए जा रही थी। यहां तक तो ठीक था , उस घर में कोई बडी संपत्ति तो नहीं थी , कालीचरण का रूप धरे उस बाबाजी के द्वारा लूटे जाने का भय होता। पर एक अबला स्‍त्री कहीं उसके धोखे में आ जाए , पापाजी को यही चिंता सता रही थी। पर एकबारगी विरोध भी नहीं किया जा सकता था , सो कोई उपाय निकालने की दिशा में वे चिंतन कर रहे थे। उसी वक्‍त मुहल्‍ले के तीन व्‍यक्ति हमारे आंगन में आ गए , एक ने पापाजी से पूछा कि क्‍या उन्‍हे विश्‍वास है कि वह बाबा कालीचरन ही है।

मेरे पापाजी ने 'ना' में सर हिलाया , उनमें से एक व्‍यक्ति के लिए इतना ही काफी था , वे तेजी से कालीचरन के आंगन में पहुंचे और पूछा 'क्‍या तुम कालीचरण हो'
उसका 'हां' कहना था कि गाल में एक चांटा।
'सामने किसका घर है'
'फलाने का' गाल में दूसरा चांटा।
'ये कौन है'
'फलाने हैं' गाल में तीसरा चांटा।
'मुझे माफ कर दो , उनलोगो ने जबरदस्‍ती किया , मैने नहीं कहा कि मैं कालीचरण हूं' तुरंत उसने दया की भीख मांगनी शुरू की और वो चांटे पर चांटा लगाए जा रहे थे। हल्‍ला गुल्‍ला सुनकर पापाजी वहां पहुंचे और उस सज्‍जन को डांटना शुरू किया.. 'गांव में आए मेहमान के साथ ऐसा व्‍यवहार करते हैं क्‍या'
'मेहमान है तो मेहमान की तरह रहे , यहां सबको बेवकूफ क्‍यूं बना रहा है' वो गुस्‍से से तमतमाए था और पूरा गांव तमाशा देख रहा था। उसके रौद्र रूप को देखकर वो बाबा बहुत भयभीत था , मेरे पापाजी के हमदर्दी भरे शब्‍द को सुनकर वह उनके पैरों पर वह गिर पडा 'मुझे बचा लो' । फिर पापाजी ने सबको शांत किया और मौका देखते ही वह बाबा सिर पर पैर रखकर भागा।





ज्‍योतिष का सहारा लेकर क्या भवितब्यता टाली भी जा सकती है - 4 ??

ज्‍योतिष की सहायता से होनी टाली जा सकती है या नहीं , इस बारे में मेरे आलेखों की श्रृंखला चल रही है , आप जैसे जागरूक पाठकों की उपस्थिति मुझे आगे बढने में बहुत मदद कर रही है। आपका बहुत बहुत धन्‍यवाद , कृपया अब आगे पढें । सबसे पहले आपने पढा........... ज्‍योतिष का सहारा लेकर क्या भवितब्यता टाली भी जा सकती है - 1 ??      उसके बाद.... . ज्‍योतिष का सहारा लेकर क्या भवितब्यता टाली भी जा सकती है - 2 ??   फिर आपने पढा  ..............ज्‍योतिष का सहारा लेकर क्या भवितब्यता टाली भी जा सकती है - 3 ??   आज आगे पढिए .....

युगों-युगों से मनुष्‍य अपने समक्ष उपस्थित होनेवाली समस्याओं के कारणों की जानकारी और उसके समाधान के लिए चिंतन-मनन करता रहा है। मानव-मन के चिंतन मनन के फलस्वरुप ही नाना प्रकार के उपचारों के विवरण हमारे प्राचीन ग्रंथों में मिलते हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि प्राकृतिक वनस्पतियों से ही सब प्रकार के रोगों का उपचार संभव है , उनकी पद्धति नेचरोपैथी कहलाती है। कुछ विद्वानों का मानना है कि जल ही जीवन है और इसके द्वारा ही सब प्रकार के रोगों का निदान संभव है। एक अलग वर्ग का मानना है कि विभिन्न प्रकार के योग और व्यायाम का भी मानव स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। कुछ ऋषि-मुनियों का मानना है कि वातावरण को स्वास्थ्यवर्द्धक बनाने में समय-समय पर होनेवाले यज्ञ हवन की भी बड़ी भूमिका होती है। सतत् विकास के क्रम में इसी प्रकार आयुर्वेद , होम्योपैथी , एक्यूपंक्चर , एक्यूप्रेशर , एलोपैथी की भी खोज हुई। फलित ज्योतिष मानता है कि मनुष्‍य के समक्ष उपस्थित होनेवाली शरीरिक , मानसिक या अन्य प्रकार की कमजोरी का मुख्य कारण उसके जन्मकाल के किसी कमजोर ग्रह का प्रभाव है और उस ग्रह के प्रभाव को मानव पर पड़ने से रोककर ही उस समस्या को दूर किया जा सकता है। इसी क्रम में विभिन्न धातुओं और रत्नों द्वारा या तरह तरह के पूजा पाठ के द्वारा ग्रहों के प्रभाव को कम कर रोगों का इलाज करने की परंपरा की शुरुआत हुई।

पर इन सबसे अलग पिछले बीस वर्षों से `गत्यात्मक ज्योतिष` भी कमजोर ग्रहों से जातकों को बचाने के लिए प्रयत्नशील रहा है। `गत्यात्मक ज्योतिष` के अनुसार ग्रहों की तीन मुख्य स्थितियॉ होती हैं , जिसके कारण जातक के सामने शारीरिक , मानसिक , आर्थिक , पारिवारिक या अन्य किसी भी असामान्य परिस्थितियां उपस्थित होती हैं और उससे वह अच्‍छे या बुरे तौर पर प्रभावित हो सकता है ----

1  सभी वक्री ग्रह कमजोर होते हैं और जातक को अपने भाव से संबंधित कमजोर तथा निराशाजनक वातावरण प्रदान करते हैं , दुखद फल प्रदान करते हैं। खासकर ग्रह के गत्यात्मक दशाकाल में इनका प्रभाव अवश्य ही महसूस किया जा सकता है।

2  सभी शीघ्री ग्रह मजबूत होते हैं और जातक को अपने भाव से संबंधित मजबूती तथा उत्साहजनक वातावरण प्रदान करते हैं , सुखद फल प्रदान करते हैं। खासकर ग्रह के गत्यात्मक दशाकाल में इनका प्रभाव अवश्य ही महसूस किया जा सकता है।

3  सभी सामान्य ग्रह महत्वपूर्ण होते हैं और जातक को अपने भाव से संबंधित स्तर तथा कार्य करने का वातावरण प्रदान करते हैं , स्तरीय फल प्रदान करते हैं। खासकर ग्रह के गत्यात्मक दशाकाल में इनका प्रभाव अवश्य ही महसूस किया जा सकता है।

गत्यात्मक ज्योतिष के अनुसार ग्रहों के बुरे प्रभाव को परिवर्तित कर पाना यानि बुरे को अच्छे में तथा अच्छे को बुरे में बदल पाना कठिन ही नहीं असंभव है , किन्तु ग्रहों के बुरे प्रभाव को कम करने के लिए या अच्छे प्रभाव को और बढ़ा पाने के लिए निम्न सलाह दी जाती है --------------

1   जिन जातकों के अधिकांश जन्मकालीन ग्रह शीघ्री होते हैं , उन्हें लगभग जीवनभर सारे संदर्भों की सुख-सुविधा आसानी से प्राप्त होती है , जिसके कारण वे थोड़े लापरवाह स्वभाव के हो जाते हैं , अपनी पहचान बनाने की इच्छा नहीं रखते हैं , इस कारण मेहनत से दूर भागते हैं। इस स्वभाव को कम करने के लिए उन्हें ऐसी अंगूठी पहननी चाहिए , जो उस दिन बनी हो , जब अधिकांश ग्रह सामान्य या मंद गति के हो।

2  जिन जातकों के अधिकांश जन्मकालीन ग्रह सामान्य होते हैं , वे लगभग जीवनभर काफी महत्वाकांक्षी होते हैं , उन्हें अपनी पहचान बननने की दृढ़ इच्छा होती है , जिसके कारण ये सतत् प्रयत्नशील होते हैं , वैसे तो वर्तमान युग में ऐसे व्यक्तित्व का काफी महत्व है , किन्तु यदि ग्रह ऋणात्मक हो और फल प्राप्ति में कुछ विलम्ब की संभावना हो तो वे ऐसी अंगूठी पहनकर कुछ आराम कर सकते हैं , जो उस दिन बनी हो , जिस दिन अधिकांश ग्रह शीघ्री हों।

3  जिन जातकों के अधिकांश ग्रह वक्री हों , उन्हें लगभग जीवनभर काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है , निरंतर निराशाजनक परिस्थितियों में जीने के कारण वे काफी कुंठित हो जाते हैं। इन परिस्थितियों को कुछ सहज बनाने के लिए उन्हें ऐसी अंगूठी दी जा सकती है , जो उस दिन बनी हो , जिस दिन अधिकांश ग्रह शीघ्री हों।

ये अंगूठियॉ उस मुहूर्त्‍त में बनवायी जा सकती हैं , जब उन ग्रहों का शुभ प्रभाव पृथ्वी के उस स्थान पर पड़ रहा हो , जिस स्थान पर वह अंगूठी बनवायी जा रही हो। दो घंटे के उस विशेष लग्न का चुनाव कर अंगूठी को अधिक प्रभावशाली बनाया जा सकता है। अगले लेख में इसके आगे का भाग पढें !!





आप चिंतन के ढंग को बदलें .. . धर्म का पालन अंधविश्‍वास बिल्‍कुल भी नहीं !!

कल मैने आप सबों को एक लेख के माध्‍यम से समझाने की कोशिश की कि किस तरह आध्‍यात्‍म , धर्म , अंधविश्‍वास और जादू टोना एक दूसरे से अलग हैं। युग के परिवर्तन के साथ ही साथ धर्म की परिभाषा बदलने लगती है। आज के विकसित समाज में भी परिवार में हर सुख या दुख के मौके की वर्षगांठ मनायी जाती है , इसके माध्‍यम से हम खुशी या दुखी होकर आपनी भावनाओं का इजहार कर पाते हैं , जिन माध्‍यमों से हमे या हमारे परिवार को सुख या दुख मिल रहा हो , उसे याद कर पाते हैं , उनके प्रति नतमस्‍तक हो पाते हैं। एक पूरे समाज में मनाए जानेवाले किसी त्‍यौहार का ही संकुचित रूप है ये , पर जब किसी की उपस्थिति और अनुपस्थिति पूरे समाज पर प्रभाव डाल रही हो , तो वैसे महान व्‍यक्ति का जन्‍मदिन या पुण्‍य तिथि पूरा समाज एक साथ मनाता है। यह हमारा कर्तब्‍य है , हमें मनाना चाहिए , पर इसे मनाने न मनाने से उन महान आत्‍माओं के धर्म में कोई परिवर्तन नहीं होगा। उनका काम कल्‍याण करना है , तो वे अपने धर्म के अनुरूप कल्‍याण ही करते रहेंगे। पर उन्‍हें याद कर हमें उनके गुणों से सीख लेने की प्रेरणा अवश्‍य मिल जाती है।

प्राचीन काल के संदर्भ में हम इसी बात को देखे तो आग , जल , वायु , सूर्य से लेकर प्रकृति की अन्‍य वस्‍तुओं में एक मनुष्‍य की तुलना में कितनी गुणी अधिक शक्ति है , इसकी कल्‍पना करना भी नामुमकिन है। आग हमें जला भी सकती है , पर ऐसा विरले करती , वह हमें गर्म रखने से लेकर हमारे लिए स्‍वादिष्‍ट खाना बनाने की शक्ति रखती है। जल हमें अपने आगोश में ले सकते हैं , पर वे ऐसा नहीं करते और हमारे जीवन यापन के हर पल में सहयोग करते हैं। वायु हमें कहां से उडाकर कहां तक ले जा सकती है , पर वो ऐसा नहीं करती , हमारे प्राण को बचाए रखने के लिए ऑक्‍सीजन का इंतजाम करती है। सूर्य हमें जलाकर खाक कर सकता है , पर हमारी दिनचर्या को बनाए रखने के लिए प्रतिदिन उदय और अस्‍त होता है। ये सब इसलिए होता है , क्‍यूंकि कल्‍याण करना उनका स्‍वभाव है।

हम प्रकृति की वस्‍तुओं के इसी स्‍वरूप की पूजा करते हैं । पूजा करने के क्रम में हम इनको सम्‍मान तो देते ही हैं , उनसे सीख भी लेते हैं कि हम अपने गुणों से संसार का कल्‍याण करेंगे। प्रकृति के एक एक कण में कुछ न कुछ खास विशेषताएं हैं , जो हमारी सेवा में तत्‍पर रहती हैं। यदि हम ढंग से प्रयोग करें , तो फूल से लेकर कांटे तक और अमृत से लेकर विष तक , सबमें किसी न किसी प्रकार का फायदा है। हर वर्ष का एक एक दिन हमने इनकी पूजा के लिए निर्धारित किया है , ताकि हम इनके गुणों को याद कर सके और इनसे सीख ले सकें। इसलिए इसे हमारे धर्म से जोडा गया है। यदि इस ढंग से सोंचा जाए कि हम इनकी पूजा नहीं करेंगे यानि इसका दुरूपयोग करेंगे , तो इनके सारे गुण अवगुण में बदल जाएंगे यानि तरह तरह की प्राकृतिक आपदाएं आएंगी , तो यह अंधविश्‍वास नहीं हकीकत ही है।






आप चिंतन के ढंग को बदलें .. धर्म का पालन अंधविश्‍वास बिल्‍कुल भी नहीं !!

कल मैने आप सबों को एक लेखके माध्‍यम से समझाने की कोशिश की कि किस तरह आध्‍यात्‍म , धर्म , अंधविश्‍वास और जादू टोना एक दूसरे से अलग हैं। युग के परिवर्तन के साथ ही साथ धर्म की परिभाषा बदलने लगती है। आज के विकसित समाज में भी परिवार में हर सुख या दुख के मौके की वर्षगांठ मनायी जाती है , इसके माध्‍यम से हम खुशी या दुखी होकर आपनी भावनाओं का इजहार कर पाते हैं , जिन माध्‍यमों से हमे या हमारे परिवार को सुख या दुख मिल रहा हो , उसे याद कर पाते हैं , उनके प्रति नतमस्‍तक हो पाते हैं। एक पूरे समाज में मनाए जानेवाले किसी त्‍यौहार का ही संकुचित रूप है ये , पर जब किसी की उपस्थिति और अनुपस्थिति पूरे समाज पर प्रभाव डाल रही हो , तो वैसे महान व्‍यक्ति का जन्‍मदिन या पुण्‍य तिथि पूरा समाज एक साथ मनाता है। यह हमारा कर्तब्‍य है , हमें  मनाना चाहिए , पर इसे मनाने न मनाने से उन महान आत्‍माओं के धर्म में कोई परिवर्तन नहीं होगा। उनका काम कल्‍याण करना है , तो वे अपने धर्म के अनुरूप कल्‍याण ही करते रहेंगे। पर उन्‍हें याद कर हमें उनके गुणों से सीख लेने की प्रेरणा अवश्‍य मिल जाती है।

प्राचीन काल के संदर्भ में हम इसी बात को देखे तो आग , जल , वायु , सूर्य से लेकर प्रकृति की अन्‍य वस्‍तुओं में एक मनुष्‍य की तुलना में कितनी गुणी अधिक शक्ति है , इसकी कल्‍पना करना भी नामुमकिन है। आग हमें जला भी सकती है , पर ऐसा विरले करती , वह हमें गर्म रखने से लेकर हमारे लिए स्‍वादिष्‍ट खाना बनाने की शक्ति रखती है। जल हमें अपने आगोश में ले सकते हैं , पर वे ऐसा नहीं करते और हमारे जीवन यापन के हर पल में सहयोग करते हैं। वायु हमें कहां से उडाकर कहां तक ले जा सकती है , पर वो ऐसा नहीं करती , हमारे प्राण को बचाए रखने के लिए ऑक्‍सीजन का इंतजाम करती है। सूर्य हमें जलाकर खाक कर सकता है , पर हमारी दिनचर्या को बनाए रखने के लिए प्रतिदिन उदय और अस्‍त होता है। ये सब इसलिए होता है , क्‍यूंकि कल्‍याण करना उनका स्‍वभाव है।

हम प्रकृति की वस्‍तुओं के इसी स्‍वरूप की पूजा करते हैं । पूजा करने के क्रम में हम इनको सम्‍मान तो देते ही हैं , उनसे सीख भी लेते हैं कि हम अपने गुणों से संसार का कल्‍याण करेंगे। प्रकृति के एक एक कण में कुछ न कुछ खास विशेषताएं हैं , जो हमारी सेवा में तत्‍पर रहती हैं। यदि हम ढंग से प्रयोग करें , तो फूल से लेकर कांटे तक और अमृत से लेकर विष तक , सबमें किसी न किसी प्रकार का फायदा है। हर वर्ष का एक एक दिन हमने इनकी पूजा के लिए निर्धारित किया है , ताकि हम इनके गुणों को याद कर सके और इनसे सीख ले सकें। इसलिए इसे हमारे धर्म से जोडा गया है। यदि इस ढंग से सोंचा जाए कि हम इनकी पूजा नहीं करेंगे यानि इसका दुरूपयोग करेंगे , तो इनके सारे गुण अवगुण में बदल जाएंगे यानि तरह तरह की प्राकृतिक आपदाएं आएंगी , तो यह अंधविश्‍वास नहीं हकीकत ही है।





आप चिंतन के ढंग को बदलें .. धर्म का पालन अंधविश्‍वास बिल्‍कुल भी नहीं !!

कल मैने आप सबों को एक लेखके माध्‍यम से समझाने की कोशिश की कि किस तरह आध्‍यात्‍म , धर्म , अंधविश्‍वास और जादू टोना एक दूसरे से अलग हैं। युग के परिवर्तन के साथ ही साथ धर्म की परिभाषा बदलने लगती है। आज के विकसित समाज में भी परिवार में हर सुख या दुख के मौके की वर्षगांठ मनायी जाती है , इसके माध्‍यम से हम खुशी या दुखी होकर आपनी भावनाओं का इजहार कर पाते हैं , जिन माध्‍यमों से हमे या हमारे परिवार को सुख या दुख मिल रहा हो , उसे याद कर पाते हैं , उनके प्रति नतमस्‍तक हो पाते हैं। एक पूरे समाज में मनाए जानेवाले किसी त्‍यौहार का ही संकुचित रूप है ये , पर जब किसी की उपस्थिति और अनुपस्थिति पूरे समाज पर प्रभाव डाल रही हो , तो वैसे महान व्‍यक्ति का जन्‍मदिन या पुण्‍य तिथि पूरा समाज एक साथ मनाता है। यह हमारा कर्तब्‍य है , हमें  मनाना चाहिए , पर इसे मनाने न मनाने से उन महान आत्‍माओं के धर्म में कोई परिवर्तन नहीं होगा। उनका काम कल्‍याण करना है , तो वे अपने धर्म के अनुरूप कल्‍याण ही करते रहेंगे। पर उन्‍हें याद कर हमें उनके गुणों से सीख लेने की प्रेरणा अवश्‍य मिल जाती है।

प्राचीन काल के संदर्भ में हम इसी बात को देखे तो आग , जल , वायु , सूर्य से लेकर प्रकृति की अन्‍य वस्‍तुओं में एक मनुष्‍य की तुलना में कितनी गुणी अधिक शक्ति है , इसकी कल्‍पना करना भी नामुमकिन है। आग हमें जला भी सकती है , पर ऐसा विरले करती , वह हमें गर्म रखने से लेकर हमारे लिए स्‍वादिष्‍ट खाना बनाने की शक्ति रखती है। जल हमें अपने आगोश में ले सकते हैं , पर वे ऐसा नहीं करते और हमारे जीवन यापन के हर पल में सहयोग करते हैं। वायु हमें कहां से उडाकर कहां तक ले जा सकती है , पर वो ऐसा नहीं करती , हमारे प्राण को बचाए रखने के लिए ऑक्‍सीजन का इंतजाम करती है। सूर्य हमें जलाकर खाक कर सकता है , पर हमारी दिनचर्या को बनाए रखने के लिए प्रतिदिन उदय और अस्‍त होता है। ये सब इसलिए होता है , क्‍यूंकि कल्‍याण करना उनका स्‍वभाव है।

हम प्रकृति की वस्‍तुओं के इसी स्‍वरूप की पूजा करते हैं । पूजा करने के क्रम में हम इनको सम्‍मान तो देते ही हैं , उनसे सीख भी लेते हैं कि हम अपने गुणों से संसार का कल्‍याण करेंगे। प्रकृति के एक एक कण में कुछ न कुछ खास विशेषताएं हैं , जो हमारी सेवा में तत्‍पर रहती हैं। यदि हम ढंग से प्रयोग करें , तो फूल से लेकर कांटे तक और अमृत से लेकर विष तक , सबमें किसी न किसी प्रकार का फायदा है। हर वर्ष का एक एक दिन हमने इनकी पूजा के लिए निर्धारित किया है , ताकि हम इनके गुणों को याद कर सके और इनसे सीख ले सकें। इसलिए इसे हमारे धर्म से जोडा गया है। यदि इस ढंग से सोंचा जाए कि हम इनकी पूजा नहीं करेंगे यानि इसका दुरूपयोग करेंगे , तो इनके सारे गुण अवगुण में बदल जाएंगे यानि तरह तरह की प्राकृतिक आपदाएं आएंगी , तो यह अंधविश्‍वास नहीं हकीकत ही है।





शुक्रवार, 11 दिसंबर 2009

अपने बचने के लिए कुछ भी करो .. पर धर्म और ज्‍योतिष को यूं बदनाम न करो बाबा !!

दुनिया भर के खासकर भारत में गली गली , मुहल्‍ले मुहल्‍ले विचरण करने वाले बाबाओं , तुम अपने शहर में न जाने कितने अपराध करते हो , पर काफी दिनों तक पुलिस की लापरवाही या उनसे मिलीभगत से तुम पकडे नहीं जाते , इस उत्‍साह से बडी बडी गलतियां करने लगते हो , फिर जब तुमपर शिकंजे कसे जाने लगते हैं , तो शहर से भागना और पुलिस से बचना ही तुम्‍हारा एक लक्ष्‍य हो जाता है , बचने का सबसे बडा रास्‍ता तुम्‍हें बाबाजी बनने में दिखाई देता है , बडी मूंछ और दाढी के कारण लोगों के लिए तुम्‍हारे चेहरे को पहचानना काफी मुश्किल हो जाता है , बाबा का रूप धारण कर लेने से जनता की आस्‍था का भी तुम नाजायज फायदा उठा लेते हो , यदि किसी की आस्‍था तुमपर नहीं बन रही होती , तो डराना और धमकाना तो तुम्‍हारा स्‍वभाव है, इसलिए इस राह में चलकर आराम से अपनी महत्‍वाकांक्षा के अनुरूप पैसे का इंतजाम तो तुम कर लेते हो !

बाबा बनने के बाद तो तुम्‍हारा जीवन और रंगीन बन जाता है , श्‍मशान सिद्ध कर चुके हो तुम , यह कहकर भक्‍तों के सम्‍मुख भी शराब पीने से तुम कोई परहेज नहीं करते , कमाख्‍या मंदिर में सिद्धि प्राप्‍त कर चुके हो , इसलिए मांस से भी कोई परहेज की आवश्‍यकता नहीं , महिलाओं को मां मानते हो , इसलिए उनसे घिरे होने में भी तुम्‍हें दिक्‍कत नहीं ,  कन्‍याओं से सेवा करवाकर तुम उनकी मनोकामना पूरी होने का आशीर्वाद दे देते हो , हत्‍या और लूटपाट के पाप के साथ तुम लोगों के कल्‍याण का दावा कर लेते हो , महात्‍मा होने के बावजूद भविष्‍यवाणी करने का रिस्‍क नहीं लेते , उपाय की पूरी व्‍यवस्‍था कर देते हो , एक शहर में तुम्‍हें रहना नहीं , इसलिए साख बनाए रखने की कोई चिंता नहीं , लोगों से पैसों की बरसात करवा लेते हो तुम , इस तरह अपराधी के नाम से भी जो सुख सुविधा नहीं मिलती , वो बाबा बनकर तुम्‍हें मिल जाती है !

तुमसे नाम पूछा जाता है तो अपने को हिंदुस्‍तानी बताते हो , गांव , जिला या प्रदेश पूछा जाता है तो हिंदुस्‍तान कहते हो , मानो हम सब देशद्रोही हैं और तुम सच्‍चे देशभक्‍त , महान आत्‍माओं के जन्‍म से लेकर मृत्‍यु तक की हर घटना इतिहास में दर्ज होती है , अपना नाम , अपना गांव , अपना प्रदेश क्‍यूं छिपाते हो , वहीं से तो स्‍पष्‍ट हो जाता है कि तुम अपने जीवन का कोई भाग छुपा रहे हो , तुम इतिहास की किताबों में अपना नाम क्‍यूं नहीं दर्ज करवाना चाहते ,  अपने भयानक सच को सामने न लाकर अपने बाबा के स्‍वरूप को सामने रखकर तुम जनता के आस्‍था के साथ खिलवाड करते हो , उनके मनोवैज्ञानिक कमजोरी का नाजायज फायदा उठाते हो , अपने स्‍वार्थ में अंधे होकर कुछ भी करो तुम , पर धर्म और ज्‍योतिष को यूं बदनाम न करो बाबा , मेरी प्रार्थना है तुमसे !





गुरुवार, 10 दिसंबर 2009

धर्म अलग है, अध्यात्म अलग है, जादू-टोना अलग है, अंध-विश्वास अलग है, कैसे ??

कल एक ब्‍लॉगमें पूछे गए कुछ प्रश्‍नों के जबाब देने के क्रम में सबसे पहले मैं आध्‍यात्‍म को परिभाषित करना चाहूंगी। अपने शरीर की आवश्‍यकताओं की पूर्ति कर हर व्‍यक्ति सुख का अनुभव करते हैं , इस कारण इसे प्राप्‍त करने के लिए लगभग सारे व्‍यक्ति मेहनत करना चाहते हैं। इसके बाद मनुष्‍य के लिए उसके परिवार का स्‍थान आता है , जिन्‍हे सुख सुविधा देने में अपने सुख का कुछ त्‍याग करने में भी संतोष का अनुभव होता है। इस कारण उसके लिए भी मेहनत करने को कुछ को छोडकर सब तैयार रहते हैं। इसके आगे बढते हुए थोडे लोग अपने मुहल्‍ले , अपने समाज , अपने गांव से बढते हुए अपने राष्‍ट्र के लिए भी जीवन उत्‍सर्ग करने में पीछे नहीं हटते। उससे आगे भी कुछ लोग विश्‍व बंधुत्‍व की भावना से ओत प्रोत होते हैं , तो कुछ विश्‍व के समस्‍त चर अचर के कल्‍याण से भी आगे पूरे ब्रह्मांड के लिए अपने कार्यक्रम बनाया करते हैं। अपने स्‍वार्थ का त्‍याग करके अपने मन और मस्तिष्‍क के सोंच को व्‍यापक बनाना ही ‘आध्‍यात्‍म’ है । जब कोई व्‍यक्ति अपनी आत्‍मा के साथ विश्‍वात्‍मा, समस्‍त जड चेतन और ब्रह्मांडीय शक्ति को जोडने में समर्थ होता है, तो वस्‍तुत: वह आध्‍यात्मिकता की चरम सीमा को प्राप्‍त करता है।


अपने मस्तिष्‍क की बनावट के कारण सामान्‍यतया मनुष्‍य स्‍वार्थी होता है , अपने सुखों का परित्‍याग नहीं कर पाता , इसलिए ‘आध्‍यात्‍म’ के स्‍तर तक पहुंचे व्‍यक्ति को स्‍वयं महात्‍मा का दर्जा मिल जाता है , वैसे उनकी संख्‍या बहुत कम होती है। अपने विश्‍व कल्‍याण के लक्ष्‍य को पूरा करने के लिए उनलोगों के द्वारा मनुष्‍य के समक्ष नियमों की संहिता बनाकर पेश की जाती हैं। इसमें जन्‍म से मृत्‍यु तक मनुष्‍य के जीवन यापन के ऐसे तरीके की चर्चा होती हैं , जिससे उसका शारीरिक , मानसिक और नैतिक विकास सही हो सके। प्रकृति की एक एक वस्‍तु एक एक व्‍यक्ति में किसी न किसी प्रकार की विशेषता छुपी हुई है , जिनके समुचित उपयोग के लिए खास नियम बनाए जाते हैं। विभिन्‍न कर्मकांडों के माध्‍यम से उनका पालन कर व्‍यक्ति अपने स्‍वार्थों को त्‍याग कर विश्‍व के समस्‍त चर अचर के कल्‍याण से भी आगे पूरे ब्रह्मांड की सुरक्षा करने में समर्थ हो पाता है। इन्‍हीं नियमों की संहिता को ‘धर्म’ का नाम दिया जाता है, ताकि इन नियमों के पालन में मनुष्‍यों के द्वारा कोई लापरवाही न बरती जाए। इसके अनुसार विभिन्‍न काल और देश में भिन्‍न भिन्‍न प्रकार के ‘धर्म’ का विकास हुआ।

मानव का धर्म मानवीय गुण है , खुद पर संयम रखने के लिए हमें व्रत रखना चाहिए। इसके अलावे प्रकृति के जिन वस्‍तुओं से हमें सुख की प्राप्ति होती है , उनके प्रति श्रद्धावनत होना चाहिए। विवाह के सुअवसर पर गवाही के लिए बडी संख्‍या में लोगों की उपस्थिति होनी चाहिए , पति पत्‍नी अपने रिश्‍तों को आसानी से तोड न सके , इसके लिए बंधन बनाए गए। लेकिन जब धर्म के मूल उद्देश्‍य मानवता और सच्‍ची भक्ति को भूलकर लोग कर्मकांडों को ही सत्‍य समझ बैठते हैं , तो वहीं से भ्रम या अंधविश्‍वास की उत्‍पत्ति होती है। यहीं से विभिन्‍न धर्म के मध्‍य टकराव का भी आरंभ होता है , मेरा धर्म अच्‍छा और मेरा धर्म बुरा कहने की शुरूआत होती है। सिर्फ वेशभूषा के आधार पर नकली गुरूओं को असली मानकर उनकी बातों पर विश्‍वास करना ‘अंधविश्‍वास’ है। वे गुरू नहीं ठग होते हैं , जो आजतक धर्म को गलत ढंग से परिभाषित कर लोगों को गुमराह करने का काम करते आए हैं। मूर्तियों का दूध पीना इसी तरह ठग गुरूओं द्वारा गुमराह किए जाने वाले कार्यों में से एक है। उनसे लोगों को सावधान कराना हमारा धर्म है , पर इसके कारण हम अपने सच्‍चे ‘धर्मगुरूओं’ या धर्म पर इल्‍जाम लगाना जायज नहीं।

‘जादू टोना’ तो मनुष्‍यों के मनोरंजन के लिए विकसित की गयी मात्र एक कला है , जिसकी जानकारी समाज के किसी एक वर्ग को दी गयी। इसके भेद को खोल देने से उस खेल की रोचकता समाप्‍त हो जाती , इसलिए इसे गुप्‍त रखा गया। पर ठग इसका भी फायदा उठाने से नहीं चूकते और भोलेभाले जनता को जादू टोने के कारनामें दिखाकर अपने को गुरू बनाकर उन्‍हें बेवकूफ बनाते है। अंत में मैं यही कहना चाहती हूं कि कोई भी क्षेत्र बुरा नहीं होता , आज युग ही बुरा हो गया है। इस कारण हर क्षेत्र में लोग अंधविश्‍वास का नाजायज फायदा उठा रहे हैं और भोले भाले लोग इसका शिकार बन रहे हैं। आज के नेता , आज के डॉक्‍टर , आज के वकील , आज के शिक्षक ... किसपर हम विश्‍वास करें वो हमारी समझ में नहीं आता , अंधविश्‍वास से हम कहीं भी हम फंस सकते हैं। जरूरत है भ्रष्‍टाचार को समाप्‍त करने की , दिखावे को समाप्‍त करने की , सुविधाभोगी वातावरण को समाप्‍त करने की। तभी विश्‍व का कल्‍याण किया जा सकता है।





ज्‍योतिष का सहारा लेकर क्या भवितब्यता टाली भी जा सकती है - 5 ??

ग्रहों के बुरे प्रभाव को दूर करने के उपायों की जो श्रृंखला चल रही है , पहले के चार भागों को पढने के लिए यहां क्लिककरें , अब उसका आगे का यानि पांचवा भाग पढे   ... ..

हम संगति के महत्व के बारे में हमेशा ही कुछ न कुछ पढ़ते आ रहें हैं। यहॉ तक कहा गया है -----` संगत से गुण होत हैं , संगत से गुण जात ´। गत्यात्मक ज्योतिष्‍ा भी संगति के महत्व को स्वीकार करता है। एक कमजोर ग्रह या कमजोर भाववाले व्यक्ति को मित्रता , संगति , व्यापार या विवाह वैसे लोगों से करनी चाहिए , जिनका वह ग्रह या वह भाव मजबूत हो। इस बात को एक उदाहरण की सहायता से अच्छी तरह समझाया जा सकता है। यदि एक बालक का जन्म अमावस्या के दिन हुआ हो , तो उन कमजोरियों के कारण , जिनका चंद्रमा स्वामी है ,बचपन में बालक का मनोवैज्ञानिक विकास सही ढंग से नहीं हो पाता है और बच्चे का स्वभाव कुछ दब्बू किस्म का हो जाता है , उसकी इस स्थिति को ठीक करने के लिए बालक की संगति पर ध्यान देना होगा। उसे उन बच्चों के साथ अधिकांश समय व्यतीत करना चाहिए , जिन बच्चों का जन्म पूर्णिमा के आसपास हुआ हो। उन बच्चों की उच्छृंखलता को देखकर उनके बाल मन का मनोवैज्ञानिक विकास भी कुछ अच्छा हो जाएगा। इसके विपरीत यदि उन्हें अमावस्या के निकट जन्म लेनेवाले बच्चों के साथ ही रखा जाए तो बालक अधिक दब्बू किस्म का हो जाएगा। इसी प्रकार अधिक उच्छृंखल बच्चों को अष्‍टमी के आसपास जन्म लेनेवाले बच्चों के साथ रखकर उनके स्वभाव को संतुलित बनाया जा सकता है। इसी प्रकार व्‍यवसाय , विवाह या अन्‍य मामलों में अपने कमजोर ग्रहों के प्रभाव को कम करने या अपने कमजोर भावों की समस्‍याओं को कम करने के लिए सामनेवाले के यानि मित्रों या जीवनसाथी की जन्‍मकुंडली में उन ग्रहों या मुद्दों का मजबूत रहना अच्‍छा होता है।

इसके अलावे ग्रहों के बुरे प्रभाव को दूर करने के लिए हमारे धर्मशास्त्रों में हर तिथि पर्व पर स्नानादि के पश्चात् दान करने के बारे में बताया गया है।प्राचीनकाल से ही दान का अपना महत्व रहा है , परंतु दान किस प्रकार का किया जाना चाहिए , इसकी जानकारी बहुत कम लोगों को है। दान के लिए शुद्ध द्रब्य का होना अनिवार्य है । दान के लिए सुपात्र वह व्यक्ति है , जो अनवरत किसी क्रियाकलाप में संलग्न होते हुए भी अभावग्रस्त है। दुष्‍कर्म या पापकर्म करनेवाले या आलसी व्यक्ति को दान देना बहुत बड़ा पाप होता है । यदि दान के नाम पर आप ठगे जाते हैं , तो इसका पुण्य आपको नहीं मिलेगा। इसलिए दान का उचित फल प्राप्त करने के लिए आप दान करते या देते समय ध्यान रखें कि दान उस सुपात्र तक पहुंच सके , जहॉ इसका उचित उपयोग हो सके।ऐसे में आपको सर्वाधिक फल की प्राप्ति होगी।

साथ ही अपनी कुंडली के अनुसार ही उसमें जो ग्रह कमजोर हो , उसको मजबूत बनाने के लिए दान करना चाहिए। जातक का चंद्रमा कमजोर हो , तो अनाथाश्रम को दान करना चाहिए , खासकर 12 वर्ष से कम उम्र के अभावग्रस्त और जरुरतमंद बच्चों को दिए जानेवाले दान से उनका काफी भला होगा। जातक का बुध कमजोर हो तो उन्हें विद्यार्थियों को या किसी प्रकार के रिसर्च कार्य में लगे व्‍यक्ति को सहयोग देना चाहिए। जातक का मंगल कमजोर हो , तो उन्हें युवाओं की मदद और कल्याण के लिए कार्यक्रम बनाने चाहिए। जातक का शुक्र कमजोर हो तो उनके लिए कन्याओं के विवाह में सहयोग करना अच्छा रहेगा। सूर्य कमजोर हो तो प्राकृतिक आपदाओं में पड़नेवालों की मदद की जा सकती है। बृहस्पति कमजोर हो तो अपने माता पिता और गुरुजनों की सेवा से लाभ प्राप्त किया जा सकता है। शनि कमजोर हो तो वृद्धाश्रम को दान करें या अपने आसपास के जरुरतमंद अतिवृद्ध की जरुरतों को पूरा करने की कोशिश करें। अगले लेख में पुन: इसके आगे का भाग पढें !!





बुधवार, 9 दिसंबर 2009

3 और 4 फरवरी 2010 के भी असामान्‍य मौसम के लिए अभी से तैयार रहें !!

'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के सूत्रों के आधार पर पिछले दो वर्षों से मैं मौसम से संबंधित संभावनाओं का आलेख प्रेषित करती आ रही हूं। इसी सिलसिले में मैने कल भी मौसम से संबंधित एक आलेख  पोस्‍ट किया। इसे पढकर दिनेश राय द्विवेदी जी ने बहुत ही सटीक टिप्‍पणी की कि मौसम विभाग द्वारा इस प्रकार की संभावना पहले से ही व्‍यक्‍त की जा चुकी है। ऐसी हालत में मेरे द्वारा संभावना व्‍यक्‍त किया जाना ज्‍योतिषीय भविष्‍यवाणी नहीं मानी जा सकती । मुझे दो तीन महीने बाद की तिथि इस प्रकार के मौसम से संबंधित बातों के लिए देनी चाहिए।

वास्‍तव में किसी भी घटना के दो चार दिन पूर्व तब कोई भविष्‍यवाणी की जाय , जिसके संकेत आज किसी और माध्‍यम से दिख रहे हों , तो उसे महत्‍व नहीं दिया जा सकता। मैं इस मामले में कभी कभी लापरवाही कर बैठती हूं , पर इस बार संयोग से 14 और 15 दिसम्‍बर के मौसम के बारे में मैने प्रवीण जाखड जी को जबाब दिए गए आलेख में चर्चा कर दी थी , इसलिए तुरंत उन्‍हें लिंक भेज दिया। पर तत्‍काल मेरे ध्‍यान में आया कि मैं अगली बार की मौसम से संबंधित ऐसी तिथि की संभावना व्‍यक्‍त कर ही दूं। इसलिए आज ही इस आलेख को लिखने की जरूरत आ गयी है।

वैसे तो भारतवर्ष में 15 जनवरी तक ही ठंड रहती है और उसके बाद क्रमश: वसंत ऋतु का शुभागमन होने लगता है। पर ग्‍लोबल वार्मिंग के इस दौर में आजकल फरवरी आते आते वातावरण में थोडी गर्मी का भी अहसास होने लगता है। पर इस वर्ष ऐसी बात नहीं होगी , 3 और 4 फरवरी 2010 के ग्रहीय योग के ज्‍योतिषीय प्रभाव के फलस्‍वरूप भारतवर्ष में असामान्‍य मौसम की संभावना बनेगी , जिसमें कहीं बारिश , तो कहीं कोहरा और कहीं तेज ठंडी हवा चलने के कारण ठंड एक बार फिर से बढेगा। आप सभी इसके लिए तो तैयार रहें ही , ग्रहों के ज्‍योतिषीय प्रभाव को समझने के लिए तथा 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के इस सिद्धांत को परखने के लिए इस बात को अपनी डायरी में भी नोट कर लें।

मंगलवार, 8 दिसंबर 2009

14-15 दिसम्‍बर 2009 का मौसम बडा ही मुसीबत भरा होगा !!

दो दिनों की गडबडी के बाद आखिरकार आज मुझे अपने कंप्‍यूटर को फॉरमैट कराना पडा और इसके साथ ही 2012 के दिसम्‍बर के लेख की अगली कडी भी अपने वर्ड फाइल में गुम ही रह गयी, क्‍यूंकि उसकी रिकवरी न हो सकी। आपलोगों को सस्पेन्स पर लाकर खड़ा करने का मेरा कोई इरादा नहीं था । इस लेख की लंबाई को देखते हुए मैने इसके दो पार्ट कर दिए थे , दूसरे पार्ट को मैं बाद  में पोस्‍ट करनेवाली थी , पर अब अगली कड़ी को फिर से तैयार करने में एक दो दिन और अधिक लग सकते हैं। तो इसके लिए अभी इंतजार करें और इस आलेख को पढकर एक दूसरी जानकारी प्राप्‍त करें।

पिछले वर्ष 16 दिसम्‍बर को एक आलेख मेंमैने  भारत के मौसम के बारे में भविष्‍यवाणी की थी ... 2 और 3 जनवरी 2009 को पुन: विभिन्‍न ग्रहों की जो स्थितियां बन रही हैं , वह मौसम को बहुत ही बडे रूप में प्रभावित करेगी , इस योग का प्रभाव इसके दो चार दिनों से एक सप्‍ताह पूर्व से ही शुरू होते देखा जा सकता है। इस योग के कारण निम्‍न बातें देखने को मिल सकती है.....


1. सारा आसमान बादलों से भरा रहेगा।


2. जगह जगह पर कुहरा बनना आरंभ होगा।


3. समुद्री भागों में तूफान आने की संभावना बनेगी।


4. पहाडी क्षेत्रों में बर्फ गिरने से मुश्किलें बढेंगी।


5. मैदानी भागों में तेज हवाएं चलेंगी।


6. बहुत सारे जगहों पर बेमौसम बरसात होने से ठंड का बढना स्‍वाभाविक होगा।


7. यह ठंड बढती हुई 21 जनवरी तक लोगों का जीना मुश्किल करेगी।


8. संभवत: इसी समय के आसपास पारा अपने न्‍यूनतम स्‍तर को स्‍पर्श करेगा।

सभी पाठकों से मेरा विनम्र अनुरोध है कि वे इस समय के मौसम पर गौर करें और ज्‍योतिष को विज्ञान समझने की कोशिश करें। आशा है , आप सबों का सहयोग मुझे अवश्‍य मिलेगा और मुझे लोगों के मन से यह भ्रम हटाने में सफलता मिलेगी कि ज्‍योतिष विज्ञान नहीं है।
 
और सचमुच खास दो तीन जनवरी 2009 को ही पूरे भारतवर्ष के मैदानी भागों मे कुहरा इतना बढ गया था कि रेलवे को कई ट्रेने कैंसिल करनी पडी , तो कई ट्रेने दस दस, बारह बारह घंटे लेट चली । उस समय कई उडान तक कैंसिल हो गए थे। बादल, बर्फ और बेमौसम बरसात की स्थिति भी यत्र तत्र थी ही , पारा काफी गिर जाने से ठंड अपनी चरम सीमा पर था। अभी इस बात की चर्चा करने का मुख्‍य उद्देश्‍य यह है कि इस वर्ष 14 , 15 दिसम्‍बर 2009 को ऐसा ही योग बन रहा है , इसलिए पुन: ऐसी स्थिति के उपस्थित होने की संभावना बन रही है। इसलिए इस समय भी मौसम से संबंधित उपरोक्‍त प्राकृतिक वातावरण बन सकता है , जिसके कारण कडाके की ठंड पड सकती है। आप सब अभी से  ही इसके लिए तैयार रहें।

ज्‍योतिष का सहारा लेकर क्या भवितब्यता टाली भी जा सकती है - 6 ??

ग्रहों के बुरे प्रभाव को दूर करने के उपायों की जो श्रृंखला चल रही है , पहले के पांच भागों को पढने के लिए यहां क्लिककरें , अब उसका आगे का यानि छठा भाग पढे ... ..

यह तथ्‍य सर्वविदित ही है कि विभिन्न पदार्थों में रंगों की विभिन्नता का कारण किरणों को अवशोषित और उत्सर्जित करने की शक्ति है। जिन रंगों को वे अवशोषित करती हैं , वे हमें दिखाई नहीं देती , परंतु जिन रंगों को वे परावर्तित करती हैं , वे हमें दिखाई देती हैं। यदि ये नियम सही हैं तो चंद्र के द्वारा दूधिया सफेद , बुध के द्वारा हरे , मंगल के द्वारा लाल , शुक्र के द्वारा चमकीले सफेद , सूर्य के द्वारा तप्‍त लाल , बृहस्पति के द्वारा पीले और शनि के द्वारा काले रंग का परावर्तन भी एक सच्‍चाई होनी चाहिए।


पृथ्‍वी में हर वस्‍तु का अलग अलग रंग है , यानि ये भी अलग अलग रंगों को परावर्तित करती है । इस आधार पर सफेद रंग की वस्‍तुओं का चंद्र , हरे रंग की वस्‍तुओं का बुध , लाल रंग की वस्‍तुओं का मंगल , चमकीले सफेद रंग की वस्‍तुओं का शुक्र , तप्‍त लाल रंग की वस्‍तुओं का सूर्य , पीले रंग की वस्‍तुओं का बृहस्‍पति और काले रंग की वस्‍तुओं का श‍नि के साथ संबंध होने से इंकार नहीं किया जा सकता। शायद यही कारण है कि नवविवाहिता स्त्रियों को मंगल ग्रह के दुष्‍प्रभावों से बचाने के लिए लाल रंग को परावर्तित करने के लिए प्राय: लाल वस्त्र से सुशोभित करने तथा मॉग में लाल सिंदूर लगे की प्रथा है।

इसी कारण चंद्रमा के बुरे प्रभाव से बचने के लिए मोती , बुध के लिए पन्ना , मंगल के लिए मूंगा , शुक्र के लिए हीरा , सूर्य के लिए माणिक , बृहस्पति के लिए पुखराज और शनि के लिए नीलम पहनने की परंपरा समाज में बनायी गयी है। ये रत्न संबंधित ग्रहों की किरणों को उत्सर्जित कर देते हैं , जिसके कारण ये किरणें इन रत्नों के लिए तो प्रभावहीन होती ही हैं , साथ ही साथ इसको धारण करनेवालों के लिए भी प्रभावहीन बन जाती हैं। इसलिए रत्नों का प्रयोग सिर्फ बुरे ग्रहों के लिए ही किया जाना चाहिए , अच्छे ग्रहों के लिए नहीं। कभी-कभी पंडितों की समुचित जानकारी के अभाव के कारण ये रत्न जातक को अच्छे फल से भी वंचित कर देती है।

रंगों में अद्भूत प्रभाव होने का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि विभिन्न रंगों की बोतलों में रखा पानी सूर्य के प्रकाश में औषधि बन जाता है , जिसका उपयोग विभिन्न रोगों की चिकित्सा में किया जाता है। 'गत्यात्मक ज्योतिष' भी कमजोर ग्रहों के बुरे प्रभाव से बचने के लिए उससे संबंधित रंगों का अधिकाधिक प्रयोग करने की सलाह देता है। रत्न धारण के साथ साथ आप उसी रंग की प्रधानता के वस्त्र धारण कर सकते हैं । मकान के बाहरी दीवारों की पुताई करवा सकते हैं।

यदि व्यक्ति का जन्मकालीनचंद्र कमजोर हो, तो उन्हें सफेद , बुध कमजोर हो , तो उसे हरे , मंगल कमजोर हो , तो उसे लाल , शुक्र कमजोर हो , तो उसे हल्के नीले , सूर्य कमजोर हो , तो उसे ईंट के रंग , बृहस्पति कमजोर हो , तो उसे पीले , तथा शनि कमजोर हो , तो काले रंग का अधिक प्रयोग कर उन ग्रहों के प्रभाव को परावर्तित किया जा सकता है। लेकिन ध्यान रहे , मजबूत ग्रहों की किरणों का अधिकाधिक प्रभाव आपपर पड़े , इसके लिए उससे संबंधित रंगों का कम से कम प्रयोग होना चाहिए। इन रंगों की वस्तुओं का प्रयोग न कर आप दान करें , तो काफी फायदा हो सकता है। अगले लेख में पुन: इसके आगे का भाग पढें !!





सोमवार, 7 दिसंबर 2009

2012 में इस दुनिया के अंत की संभावना हकीकत है या भ्रम ??(पहली कडी)

जिस तरह जन्‍म और मृत्‍यु जीवन का सत्‍य है , उसी प्रकार आशा और आशंका हमारे मन मस्तिष्‍क के सत्‍य हैं। जिस तरह गर्भ में एक नन्‍हीं सी जान के आते ही नौ महीने हमारे अंदर आशा का संचार होता रहता है , वैसे ही किसी बीमारी या अन्‍य किसी परिस्थिति में बुरी आशंका भी हमारा पीछा नहीं छोडती। मन मस्तिष्‍क में आशा के संचार के लिए हमारे सामने उतने बहाने नहीं होते , पर आशंका के लिए हम पुख्‍ता सबूत तक जुटा लेते हैं। कुछ दिनों से लगातार 2012 दिसम्‍बर के बारे में विभिन्‍न स्रोतो से भयावह प्रस्‍तुतियां की जा रही हैं। इससे भयभीत या फिर जिज्ञासु पाठक एक माह से मुझसे इस विषय पर लिखने को कह रहे हैं , पर दूसरे कार्यो में व्‍यस्‍तता की वजह से इतने दिन बाद आज मौका मिला है।


आखिर इस विषय पर विभिन्‍न विचारकों की क्‍या दलील है , इसे जानने के लिए मैने 25 नवम्‍बर को गूगलिंग की , इस विषय पर आठ दस विंडो खुले हुए थे और 12 बजकर पांच मिनट रात्रि मैं इसके अध्‍ययन में तल्‍लीन थी कि अचानक हमारे यहां भूकम्‍प का एक तेज झटका आया , दूसरी मंजिल पर होने के बावजूद मैं हिल गयी। पर झारखंड भूकम्‍प का क्षेत्र नहीं , पच्‍चीस पच्‍चास वर्षों बाद यहां कभी भूकम्‍प आता हो। मैं तो सोंच में पड गयी , इस प्रकार के लेखों को पढने के कारण शायद मुझे ऐसा भ्रम हुआ हो , पर जब अपने कमरे में पढ रहे मेरे बेटे ने आकर कहा कि वह बेड पर बिल्‍कुल डोल रहा था , तब ही मुझे तसल्‍ली हुई। फिर कुछ ही देर में इससे संबंधित जानकारी लेने के बाद मैंने कंप्‍यूटर बंद कर दिया। किसी समाचार से कोई जानकारी नहीं मिली , पर सुबह बोकारो के सारे लोगों ने पुष्टि की कि वास्‍तव में रात में भूकम्‍प आया था।

21 दिसम्‍बर 2012 ... यही वह दिन है , जिसके बारे में भयानक प्राकृतिक आपदा के उपस्थि‍त होने की आशंका बन रही है । आखिर क्‍या कह रहे हैं , उस दिन के ग्रह नक्षत्र । यह जानने के लिए मैने अपने सॉफ्टवेयर में विवरण डाला , पर परिणाम देखकर चौंक पडी , जिन ग्रहों को आसमान के 360 डिग्री में रहना चाहिए था , वे 500 डिग्री तक में दिख रहे थे। ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के अनुसार जिन ग्रहों की जिन शक्तियों के पूर्ण मार्क्‍स 100 दिए जाने थे , वे 200 यहां तक कि 400 दिखा रहे थे। यह किस चक्‍कर में पड गयी मैं , मैं तो एक बार फिर से भयभीत हो गयी , क्‍या उस दिन सचमुच कुछ उल्‍टा होनेवाला तो नहीं । पर जब प्रोग्राम के अंदर देखने की चेष्‍टा की , तो समझ में आया कि ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के सिद्धांतों पर आधारित इस सॉफ्टवेयर की प्रोग्रामिंग मैने 2010 तक के लिए ही की थी और 2012 के दिसम्‍बर की गणना की वजह से यह परेशानी आ रही थी।

अब इतनी जल्‍दी सॉफ्टवेयर को ठीक कर पाना संभव न था , आलेख को लिखने की हडबडी भी थी , मैन्‍युली काम करना ही पडेगा , फार्मूले को किसी डायरी से ढूंढकर उतना गणना करना आसान तो न था , पर संयोग अच्‍छा था कि पिताजी बोकारो आए हुए थे , उनकी अपनी शोध , अपना फार्मूला , अपने नियम , उन्‍होने फटाफट सारे ग्रहों की सब गणना कर डाली। बस उसके बाद उन्‍हें कुछ करने की आवश्‍यकता नहीं थी। उनके सिद्धांतों के आधार पर हर क्षेत्र का रिसर्च और उससे संबंधित भविष्‍यवाणियां करने की जबाबदेही मुझ पर ही है। पूरे जीवन की मेहनत के बाद उत्‍साह बढाने वाली भी कोई बात हो , तभी तो इतनी उम्र में वे पुन: मेहनत कर सकते थे। लेकिन सारी गणना करने के बाद क्‍या निकला परिणाम , इसे जानने के लिए आपको अगली कडी का इंतजार करते हुए एक बार आप सभी पाठकों को और तकलीफ करनी पडेगी।



रविवार, 6 दिसंबर 2009

ज्‍योतिष का सहारा लेकर क्या भवितब्यता टाली भी जा सकती है - 7 ??

ग्रहों के बुरे प्रभाव को दूर करने के उपायों की जो श्रृंखला चल रही है , उसे अंधविश्‍वास न समझा जाए , क्‍यूंकि हमलोग ग्रंथों को सिर्फ पढते ही नहीं , उसके सिद्धांतों की पूर्ण तौर पर परख करके गलत को गलत और सही को सही साबित करने के बाद लिखा करते हैं। अब यह हमारी विवशता ही है कि बंदूक की गोली की तरह न तो ग्रहों के प्रभाव को देखा और दिखाया जा सकता है , फिर उसके प्रभाव को रोकने के लिए किए गए उपायों को प्रमाणित करने के लिए हमारे पास कोई साधन कैसे हो सकता हैं ? पहले के छह भागों को पढने के लिए यहां क्लिक करें , अब उसका आगे का यानि सातवां भाग पढे ... ..


प्राचीनकाल से ही पेड़-पौधें का मानव विकास के साथ गहरा संबंध रहा है। भारतीय ज्योतिष में रत्नधारण की ही तरह विभिन्न वनस्पतियों की जड़ों को भी धारण करने की भी परंपरा है। सूर्य की शांति के लिए बेल की जड़ , चंद्र के लिए खिन्नी की जड़ , मंगल के लिए अनंतमूल की जड़ , बुध के लिए विधारा की जड़ , गुरु के लिए संतरे या केले की जड़ , शुक्र के लिए सरफाकों की जड़ तथा शनि की शांति के लिए बिच्छुए की जड़ धारण करने की बात ज्‍योतिष के प्राचीन ग्रंथों में लिखी है। साथ ही रंगों के अनुसार ही विभिन्न पेड़-पौधें की पूजा या विभिन्न देवी देवताओं पर पुष्‍प अर्पण करने का भी विधान है। इससे साबित होता है कि हमारे ऋषि मुनियों को ग्रहों के दुष्‍प्रभाव को दूर करने के लिए पेड़-पौधों की भूमिका का भी पता था। अन्‍य बातों की तरह ही जब गंभीरतापूर्वक काफी दिनों तक ग्रहों के प्रभाव को दूर करने में पेड पौधों की भूमिका का भी परीक्षण किया गया तो निम्न बातें दृष्टिगोचर हुई --------------

1. यदि जातक का चंद्रमा कमजोर हो , तो उन्हें तुलसी या अन्‍य छोटे-छोटे औषधीय पौधे अपने अहाते में लगाकर उसमें प्रतिदिन पानी देना चाहिए।

2. यदि जातक का बुध कमजोर हो तो उसे बिना फल फूलवाले या छोटे छोटे हरे फलवाले पौधे लगाने से लाभ पहुंच सकता है।

3. इसी प्रकार जातक का मंगल कमजोर हो तो उन्हें लाल फल-फूलवाले बड़े-बड़े पेड़ लगा़ने  से लाभ होगा।

4. इसी प्रकार जातक का शुक्र कमजोर हो तो उन्हें सफेद फल-फूलवाले बड़े-बड़े पेड़ लगा़ने से लाभ होगा।

5. इसी प्रकार जातक का सूर्य कमजोर हो तो उन्हें तप्‍त लाल रंग के फल-फूलवाले बड़े-बड़े पेड़ लगा़ने से लाभ होगा।

6. इसी प्रकार जातक का बृहस्पति कमजोर हो तो उन्हें पीले फल-फूलवाले बड़े-बड़े पेड़ लगा़ने से लाभ होगा।

7. इसी प्रकार जातक का शनि कमजोर हो तो उन्हें बिना फल-फूल वाले या काले फल-फूलवाले बड़े-बड़े पेड़ लगा़ने से लाभ होगा।

ध्यान रहे , ये सभी छोटे-बड़े पेड़-पौधे पूरब की दिशा में लगे हुए हों , इसके अतिरिक्‍त ग्रह के बुरे प्रभाव से बचने के लिए पश्चिमोत्‍तर दिशा में भी कुछ बड़े पेड़ लगाए जा सकते हैं , किन्तु अन्य सभी दिशाओं में आप शौकिया तौर पर कोई भी पेड़ पौधे लगा सकते हैं।

उपरोक्त समाधानों के द्वारा जहॉ ग्रहों के बुरे प्रभावों को कम किया जा सकता है , वहीं अच्छे प्रभावों को बढा़ पाने में भी सफलता मिल सकती है।






क्‍या जन्‍मकुंडली के विभिन्‍न ग्रहयोगों की पुष्टि गणित के संभाब्‍यता के नियम से हो जाती है ??

पुस्‍तकें पढने की परंपरा कितनी भी कम होती क्‍यूं न दिखाई पडे , पढनेवाले लोगों के हाथ में कभी कभी फुर्सत के क्षणों में पुस्‍तकें आ ही जाती हैं। बहुत दिनों बाद इधर काफी दिनों पहले खरीदी गयी एक पुस्‍तक 'ज्‍योतिष के विभिन्‍न योग' को पढने का मौका मिला। कुंडली में दिखाई देनेवाले कुल 125 योगों की इसमें चर्चा है। गजकेशरी योग से लेकर दरिद्र योग तक , दत्‍तक पुत्र योग से लेकर मातृत्‍यक्‍त योग तक , पूर्णायु या शताधिक आयुर्योग से लेकर अमितमायु योग तक , सर्पदंशयोग से दुर्मरण योग तक , महालक्ष्‍मी और सरस्‍वती योग से लेकर दरिद्र योग तक तथा सुरपति योग से लेकर भिक्षुक योग तक। एक नजर देखने पर पुस्‍तक बडी ही रोचक लगी , मुझे लगा कि इसके अध्‍ययन कर लेने से मेरी भविष्‍यवाणियों में एक नया आयाम जुड जाएगा, पर ज्‍यों ज्‍यों मैं गंभीरता से आगे बढती गयी, निराशा ही हाथ आयी।

तब मुझे उन दिनों की याद आ गयी , जब पिताजी के द्वारा ज्‍योतिष की जानकारी के बाद इसमें मेरी रूचि इतनी बढ गयी थी कि इस विषय पर दिन रात कुछ न कुछ पढने का मन होता , लेकिन मेरे लिए घर पर ज्‍योतिष के ढेर सारी पुस्‍तकों में से एक का चयन कर पाना कठिन होता। इस विषय में पिताजी से राय लेना चाहती , तो वे कहते कि ज्‍योतिष की किसी भी पुस्‍तक में कुछ बातें तो ज्ञानवर्द्धक होती है , पर कुछ बातें बिल्‍कुल गुमराह करनेवाली होती हैं। उनका कहना था कि ज्‍योतिष की पुस्‍तकों में वर्णित योगों को ढूंढने के लिए मैने बडे बडे महापुरूषों की कितनी कुंडलियों को देखने में दिन रात एक कर डाला , पर वे योग वहां नहीं मिले , जबकि हमारे मुहल्‍ले में जीवन भर एक छोटी सी दुकान चलाने वाले हिसाब किताब भर पढाई करने वाले व्‍यक्ति की कुंडली में एक बडा राजयोग दिखाई पड गया। उनका कहना था कि उन्‍होने पंद्रह वर्षों तक मेहनत करके किसी फसलवाले खेत से एक एक घास को चुनकर अलग कर दिया है और वे ज्‍योतिष की बिल्‍कुल स्‍वच्‍छ फसल मुझे प्रदान कर रहे हैं , फिर मुझे पुन: फसल और घास के मध्‍य भटकने की क्‍या आवश्‍यकता ?

योग वाली जिस पुस्‍तक की आज मैं बात कर रही हूं , उसमें पहले ही स्‍थान पर गजकेशरी योग के बारे में लिखा है। चंद्रमा से केन्‍द्र में बृहस्‍पति स्थित हो , तो गजकेशरी योग होता है। वैसे यह ज्‍योतिष का एक बहुत ही महत्‍वपूर्ण येग माना जाता है , पर हम जैसे गणित को जाननेवालों की यही दिक्‍कत है , किसी बात को ज्‍यों का त्‍यों स्‍वीकार नहीं कर पाते। किसी भी कुंडली में किसी भी ग्रह को बैठने के लिए चंद्रमा से आगे ग्‍यारह भाव होते हैं , ऐसा ही बृहस्‍पति के लिए भी है। केन्‍द्र में होने का मतलब है कि उसमें से चार स्‍थानों में बैठकर यह जातक के लिए गजकेशरी योग उपस्थित कर सकता है। संभाब्‍यता के नियम के अनुसार किसी कुडली में इस योग के बनने की संभावना 4/11 हो जाती है। अब इस योग पर मेरा विश्‍वास करना नामुमकिन है , क्‍यूंकि कुल जनसंख्‍या का 4/11 भाग इस योग में कैसे आ सकता है , जैसा कि इस पुस्‍तक में इस योग के फल के बारे में लिखा है ......

इस योग में जन्‍म लेनेवाला जातक अनेक मित्रों , प्रशंसकों और संबंधियों से घिरा रहता है और उनके द्वारा सराहा जाता है। स्‍वभाव से नम्र , विवेकवाण और सद्गुणी होता है। कृषि कार्यों से इसे विशेष लाभ होता है तथा वह नगरपालिकाध्‍यक्ष या मेयर बन जाता है। तेजस्‍वी, मेधावी, गुणज्ञ तथा राज्‍य पक्ष में यह प्रबल उन्‍नति करने वाला होता है। स्‍पष्‍टत: गजकेशरी योग में जन्‍म लेनेवाला जातक जीवन में उच्‍च स्थिति प्राप्‍त कर पूर्ण सुख भोगता है तथा मृत्‍यु के बाद भी उसकी यशगाथा अक्षुण्‍ण रहती है।