शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

सभी पाठकों को नववर्ष की शुभकामनाएं .. मुझे आप सभी पाठकों की शुभकामनाओं की आवश्‍यकता है !!

ब्‍लॉग जगत में आने के बाद महीने में 20 - 25 पोस्‍ट ठेल देने वाली मैं अचानक कुछ दिनों से कुछ भी नहीं लिख पा रही हूं। 2011 में होनेवाली इस प्रकार की व्‍यस्‍तता का कुछ अंदाजा तो मझे पहले से था , पर एकाएक लिखना इतना कम हो जाएगा , ऐसा भी नहीं सोंचा था। ब्‍लॉग जगत से जुडाव इस हद तक हो चुका है कि व्‍यस्‍तता के बावजूद एक बार डैशबोर्ड खोलकर कम से कम उन सारे ब्‍लॉग्‍स के अपडेट अवश्‍य देख लेती हूं , जिनकी मैं अनुसरणकर्ता हूं , भले ही टिप्‍पणी कर पाऊं या नहीं। यहां तक कि ईमेल में आनेवाले लिंकों , बज्‍ज की पोस्‍टों और ट्विटर तक को सरसरी निगाह से देखे बिना नहीं रह पाती। ऐसे व्‍यस्‍तता भरे समय में सारे एग्रीगेटरों के बंद होने से चाहे नए ब्‍लॉगरों और अन्‍य पाठकों को जो भी असुविधाएं हो रही हों , मुझे तो ये सहूलियत ही दे रहे हैं। चिट्ठा जगत के द्वारा स्‍वागत के लिए नए चिट्ठों के न आने से जहां एक ओर उन्‍हें पढकर उनके स्‍वागत करने से छुट्टी मिली हुई है , वहीं दूसरी ओर ब्‍लॉग4वार्ता में वार्ता न लगाने तक का बहाना मिल गया है। थोडी फुर्सत मिलते ही सोंचा , अपने नियमित पाठको को अपनी स्थिति से अवगत ही करा दूं।

अभी घर में चहल पहल का वातावरण है , कॉलेज की शीतकालीन छुट्टियों की वजह से दोनो बच्‍चे घर में मौजूद हैं , गांव तथा इस इलाके में अन्‍य कई तरह के कार्य के सिलसिले में एक महीने से पापाजी भी दिल्‍ली से आकर इसी इलाके में रह रहे हैं। पापाजी के सभी बच्‍चों में अपने गांव से सबसे निकट मैं ही हूं , इसलिए मम्‍मी ने उनकी पूरी जिम्‍मेदारी मुझे दे रखी है। ठंड के महीने में बुजुर्गो को अधिक देख रेख की आवश्‍यकता होती है , इसलिए मम्‍मी के निर्देशानुसार पापाजी काम के सिलसिले में सुबह से शाम तक या एक दो दिन कहीं रह जाएं , पर उनका असली बसेरा मेरे यहां ही है। 1999 से पापाजी के दिल्‍ली में निवास करने के बाद उनके साथ रहने का बहुत कम मौका मिला , इसलिए न सिर्फ ज्ञानार्जन के लिए उनके इस सान्निध्‍य के पल पल का उपयोग कर रही हूं , बल्कि उन्‍हें अब इस बात के लिए मना भी लिया है कि अब अपनी सेवा के लिए वे मुझे भी बेटों बहूओं से कम समय नहीं दें। यह बात और है कि इतनी उम्र के बावजूद शारीरिक तौर पर वे बिल्‍कुल स्‍वस्‍थ हैं और उन्‍हें किसी प्रकार की सेवा की आवश्‍यकता नहीं।

दिन कटते देर नहीं लगती , देखते ही देखते बच्‍चों के आए हुए 15 दिन व्‍यतीत हो गए , वैसे ही 4-5 दिन और व्‍यतीत हो जाएंगे , फिर बच्‍चे वापस अपने जीवन के सपनों को पूरा करने के लिए चले जाएंगे और मैं रह जाऊंगी अपने कार्यक्रमों को सफल बनाने में। गजब की महत्‍वाकांक्षा का युग है , किसी रिश्‍ते का अच्‍छे से सुख भी नहीं ले पाते हम। चूंकि छोटा 2010 में 12वीं पास कर आगे की पढाई के लिए बाहर जानेवाला था , मैने काफी दिनों से 2011 के लिए कई महत्‍वाकांक्षी कार्यक्रम बना रखे थे। ऐसे समय में पापाजी का मुझे समय देने का निर्णय मुझे बडा सुख पहुंचाने वाला है। अभी हमलोग 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' से संबंधित अपने ज्ञान के प्रचार प्रसार के कार्यक्रम के बारे में चिंतन कर रहे हैं , इससे संबंधित सारे बिखरे हुए लेखन को सुव्‍यवस्थित करने में कुछ समय लगेगा। साथ ही इस कार्यक्रम में आनेवाली आर्थिक समस्‍या को भी हल करने की कोशिश है। जैसा कि मेरा अनुमान है , जुलाई 2010 या जनवरी 2011 तक हमलोग अपने सोंचे हुए कार्य को अवश्‍य मूर्त्‍त रूप दे पाएंगे।

भले ही मेरे जीवन का लक्ष्‍य एक (समाज से ज्‍योतिषीय और धार्मिक भ्रांतियों को दूर करना और ग्रहों के मानव जीवन पर पडने वाले प्रभाव को स्‍थापित करना) ही हो , पर तीन चार वर्षों में मेरा काम करने का ढंग खुद ब खुद परिवर्तित हो जाया करता है। पर जिन जगहों पर मेरा संबंध बन चुका , उससे व्‍यस्‍तता के बावजूद दूरी नहीं बन पाती। इस तरह ब्‍लॉग जगत से दूर रह पाना मेरे लिए मुश्किल है , हालांकि अब पहले की तरह बहुत पाठकों के व्‍यक्तिगत प्रश्‍नों का जबाब मैं नहीं दे सकती। फिर भी अभी भी लग्‍न राशिफल के ब्‍लॉग को नियमित तौर पर अपडेट कर रही हूं , मोल तोल में शेयर बाजार की साप्‍ताहिक भविष्‍यवाणी का कॉलम लगातार अपडेट हो रहा है। अपने वादे के अनुसार 'गत्‍यात्‍मक चिंतन' में तिलियार ब्‍लॉगर मीट की रिपोर्ट का पहला भाग काफी दिन पहले ही लिखा जा चुका था , पर दूसरे भाग के लिखे जाने में हो रही देर की वजह से मैने उसे प्रकाशित नहीं किया था। पर बाद में यह सोंचकर प्रकाशित किया कि शायद प्रकाशित हो जाने के बाद दूसरी कडी लिखी जा सके।

यदि सबकुछ सामान्‍य रहा तो 2011 के अपने व्‍यस्‍त कार्यक्रम के मध्‍य भी समय निकालकर प्रत्‍येक सप्‍ताह अपने ब्‍लॉग 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' और 'गत्‍यात्‍मक चिंतन' को अपडेट करने की अवश्‍य कोशिश करूंगी , ताकि माह में छह आठ पोस्‍ट आप सबों को अवश्‍य पढने को मिल जाए। आप सभी पाठकों के लिए आनेवाला वर्ष 2011 बहुत सुख और सफलता युक्‍त हो , ऐसी कामना करती हूं । मैं भी अपने लक्ष्‍य में कामयाब हो सकूं , इसके लिए मुझे आप सभी पाठकों की शुभकामनाओं की आवश्‍यकता है !!

सोमवार, 27 दिसंबर 2010

इतने सारे चिट्ठाकारों से मुलाकात का वह दिन भुलाया जा सकता है ??

मेरे द्वारा रोहतक के तिलयार झील की यात्रा पर एक विस्‍तृत रिपोर्ट का इंतजार न सिर्फ ब्‍लॉगर बंधुओं को , वरन् ज्‍योतिषीय रूचि के कारण मेरे ब्‍लॉग को पढने वाले अन्‍य पाठकों और मित्रों को भी है। जब एक फोन पर इस रिपोर्ट का इंतजार कर रहे अपने पाठक को बताया कि व्‍यस्‍तता के कारण इस रिपोर्ट को प्रकाशित करने में कुछ देर हो रही है , तो उन्‍होने कहा कि इतनी देर भी मत कीजिए कि आप बहुत कुछ भूल ही जाएं। मैने उन्‍हे कहा कि एक सुखद यात्रा वर्षों भूली नहीं जा सकती , वैसी ही यात्राओं में तिलयार यात्रा भी एक है , भला इतने सारे ब्‍लोगरों से मुलाकात का वह दिन इतनी जल्‍द भुलाया जा सकता है ??

पहली बार सुनने पर रोहतक में होने वाली इस ब्‍लॉगर मीट की तिथि 21 नवंबर मुझे जंची नहीं थी , क्‍यूंकि ज्‍योतिषीय दृष्टि से उससे पहले ग्रहों की स्थिति मनोनुकूल नहीं थी , आसमान में ग्रहों की क्रियाशीलता कुछ इस ढंग की थी कि लोगों को किसी न किसी कार्यक्रम में व्‍यस्‍त रखने का यह एक बहाना बन सकती थी। बहुत प्रकार के कार्यों के उपस्थित हो जाने से इस प्रकार की तिथियों के कार्यक्रमों में इच्‍छा के बावजूद आमंत्रित कम संख्‍या में ही पहुंच पाते हैं। हां , 21 नवंबर को पूर्णिमा होने के कारण कार्यक्रम की सफलता पर कोई संदेह नहीं किया जा सकता था , इसलिए मुझे वहां पहुंचने की इच्‍छा तो थी ।

जब निर्मला कपिला जी से मैने रोहतक ब्‍लॉगर मीट के बारे में बात की , तो उन्‍होने कहा कि यदि मेरा कार्यक्रम निश्चित हो , तभी वो चलेंगी। इतने ब्‍लॉगरों के साथ साथ उनसे मिलने का बहाना बडी मुश्किल से मिल रहा था , मैं इंकार नहीं कर सकती थी।  पर तिथि को देखते हुए मन में अंदेशा अवश्‍य बना हुआ था कि कोई आवश्‍यक पारिवारिक या अन्‍य कार्य न उपस्थित हो जाए , छोटे मोटे कार्यक्रमों को तो अपने पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम से टाला जा सकता है , यह सोंचकर मैने मित्रों और परिवारवालों के मध्‍य अपनी रोहतक यात्रा की खबर सबसे पहले प्रचारित प्रसारित कर दी। इससे एक फायदा हुआ कि बंगाल में एक दीदी के लडके का विवाह 22 नवंबर को था , दीदी के फोन आने पर मैने उन्‍हें तत्‍काल कह दिया कि मैं विवाह में न पहुंचकर 24 को 'बहू भात' में वहां पहुंचुंगी। मेरे कार्यक्रम की जानकारी मिलने पर दिल्‍ली से मेरे पास आ रहे पापाजी ने भी 20 नवंबर का रिजर्वेशन रद्द करवाकर मेरे साथ ही दिल्‍ली से आने का कार्यक्रम बनाया।

बोकारो से दिल्‍ली और दिल्‍ली से रोहतक जाने का मेरा कार्यक्रम निश्चित हो चुका था , पर 12 नवंबर को होनेवाले छठ के बाद बिहार झारखंड से लौटने वालों की भीड में मेरे लिए रिजर्वेशन मिलना कठिन था। मैने रेलवे की वेबसाइट पर एक एक कर सभी ट्रेनों की स्थिति देखी , कहीं भी व्‍यवस्‍था नहीं दिखाई पडी। 12 नवंबर को छठ होने के कारण बर्थ अवश्‍य उपलब्‍ध थे , पर छठ के मौके पर ट्रेन में बैठे रहना मुझे जंच नहीं रहा था। दूसरे दिनों में निकलने के लिए धनबाद से किसी प्रकार व्‍यवस्‍था जरूर हो सकती थी , पर उतनी दूर जाकर ट्रेन पकडना मुझे पसंद नहीं था। इसलिए मैने दिल्‍ली के लिए 12 नवंबर का ही रिजर्वेशन करवा लिया। रिजर्वेशन के वक्‍त लोअर बर्थ की उपलब्‍धता नहीं थी , इसलिए मैने मिडिल बर्थ में ही अपना रिजर्वेशन कराया। पर रेलवे की व्‍यवस्‍था की पोल इसी से खुल जाती है कि रातभर मेरे नीचे वाली बर्थ बिल्‍कुल खाली पडी रही।

कुछ दिन पूर्व से ही खराब चल रही मेरी तबियत ऐन दिल्‍ली प्रस्‍थान के वक्‍त ही खराब हो गयी। पर दवा वगैरह लेकर अपनी तबियत को सामान्‍य बनाया और दिल्‍ली के लिए निकल पडी। चलते समय तक यह मालूम हो चुका था कि 13 नवंबर को शाम के वक्‍त कनॉट प्‍लेस में भी एक ब्‍लॉगर मीट का आयोजन है। मेरी गाडी का समय 1 बजे दिन में ही दिल्‍ली में था , पर देर होने की वजह से शाम 4 बजे ही वहां पहुंच सकी। मेट्रो से आते वक्‍त राजीव चौक में उतरकर कनॉट प्‍लेस जाने और सबसे मिलने की इच्‍छा थी , पर पहले से ही गडबड तबियत 22 घंटे के सफर के बाद और खराब हो गयी थी। रही सही कसर दूसरे दिन रेलवे वालों ने एसी ऑफ करके पूरी कर दी थी, कई यात्रियों के शिकायत दर्ज कराने पर भी एसी ऑन नहीं हुआ। स्‍लीपर बॉगी में होती तो कम से कम खिडकी खुले होने से ताजी हवा तो मिलती , बंद बॉगी में एसी बंद होने से चक्‍कर आ रहा था। कुछ दिन पूर्व ऐसी स्थिति में कुछ यात्रियों में डेंगू या स्‍वाइन फ्लू फैलने के समाचार पढने को मिला था , इससे दिमाग तनावग्रस्‍त था , ऐसे में घर पहुंचकर ही राहत मिल सकती थी ।

दिल्‍ली में भी मुझे कई काम निबटाने थे , पर तबियत बिगडी होने की वजह से कुछ भी न हो पाया। ललेकि तीन भतीजे भतीजियों की मासूम शैतानियों के कारण सप्‍ताह भर का समय व्‍यतीत होते देर न लगी।  पर जैसा संदेह था , इन दिनों ब्‍लॉग जगत से कुछ ऐसी घटनाएं सुनने को मिली , जिससे स्‍पष्‍ट हुआ कि कार्यक्रम में सम्मिलित हो रहे लोगों में से कुछ वहां नहीं पहुंच सकेंगे। इससे मन में काफी असंतोष बना रहा , पर दिल्‍ली तक आ चुकी थी , तो रोहतक तो पहुंचना ही था। रोहतक में तिलियार झील में ब्‍लॉगर मीट रखी गयी थी , निर्मला कपिला जी से संपर्क किया तो उन्‍होने बताया कि वे राजीव तनेजा जी के साथ आ रही हैं। मैने भी राजीव तनेजा जी को ही संपर्क किया , माता जी के स्‍वास्‍थ्‍य को लेकर तनेजा दंपत्ति अस्‍पताल के चक्‍कर काट रहे थे। पापाजी तैयार नहीं थे कि मैं अकेली अनजान रास्‍ते पर जाऊं , मैने अपने एक भाई का गुडगांव का कार्यक्रम रद्द करवाकर उसे अपने साथ चलने को तैयार किया , पर 20 की शाम को तनेजा जी ने कहा कि वे चलते वक्‍त मुझे ले लेंगे।

21 नवंबर को सुबह नांगलोई में मेट्रो स्‍टेशन के पास राजीव तनेजा जी , संजू तनेजा जी और निर्मला कपिला जी से मिलने का मौका मिला। तनेजा दंपत्ति से तो मैं पहले भी मिल चुकी थी , पर निर्मला कपिला जी से यह पहली मुलाकात थी। उनकी कहानियों लेखों , कविताओं और खासकर टिप्‍पणियों ने मेरे हृदय पर एक छाप छोड दी थी , इसलिए उनसे मिलने की मेरी दिली तमन्‍ना थी , कार से उतरकर उन्‍होने मुझे गले लगा लिया। इस सुखद अहसास को मैं जीवनभर नहीं भूल सकती। हमलोगों ने ब्‍लॉग जगत से जुडी बाते करते हुए ही एक डेढ घंटे का सफर तय किया और थोडी ही देर में मंजिल आ गयी। क्‍या हुआ तिलियार ब्‍लॉगर मीट में , यह जानिए अगली कडी में , इसके लिए आपलोगों को कितना इंतजार करना पड सकता है , नहीं बता सकती।

रविवार, 5 दिसंबर 2010

हममें से हर कोई प्रकृति के अभिन्‍न अंग हैं ...संगीता पुरी

हममें से हर कोई प्रकृति के अभिन्‍न अंग हैं और संपूर्ण पारिस्थितिक संतुलन की आवश्‍यकताओं के अनुरूप हमारा अपना स्‍वभाव है। इसलिए लाख चाहते हुए भी हम अपने स्‍वभाव को नहीं बदल पाते। प्रकृति हर क्षेत्र में और हर मौसम में हमारी आवश्‍यकताओं के अनुरूप ही खाने पीने की व्‍यवस्‍था करती है। भूख लगने पर हम खाना और प्‍यास लगने पर हम पानी ही नहीं पीते , जब हमारे शरीर को खास वस्‍तु की आवश्‍यकता होती है , तो हम उस ओर भी आकर्षित होता है। मेडिकल साइंस भी मानता है कि हमारी जीवनशैली सहज रहे , तो हम अपने शरीर की आवश्‍यताओं के अनुरूप ही भोजन लेते हैं। 

मनुष्‍य के जीवन में तो कृत्रिमता इतनी अधिक हो गयी है कि वह आज उपयोगी बातों को भी स्‍वीकार करने से परहेज करता है। पर प्रत्‍येक व्‍यक्ति अपनी आवश्‍यकता को अंतर्मन में कहीं न कहीं महसूस करता है। झारखंड प्रदेश ने प्राकृतिक चिकित्‍सा के विकास के लिए जब काम शुरू किया , तो इन्‍होने जंगली जानवरों के व्‍यवहार पर ध्‍यान देना आरंभ किया। जब जानवर ठंड से परेशान होते हैं , तो किन खास औषधीय वनस्‍पतियों का प्रयोग करते हैं और जब उनके पेट में गडबडी होती है , तो किन खास वनस्‍पतियों का प्रयोग , इन सबके नि‍रीक्षण से प्राकृतिक चिकित्‍सा पद्धति को विकसित करने में बडी सफलता मिली।

'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' ग्रहों के प्रभाव को कम या अधिक करने के लिए कलर थेरेपी के महत्‍व को स्‍वीकार करता है। कुछ समय पूर्व ग्रहों के प्रभाव को दूर करने में रंगों की अहम् भूमिका की जानकारी देते हुए मैने एक पोस्‍ट लिखा था जिसमें लिखा गया था कि यदि व्यक्ति का जन्मकालीनचंद्र कमजोर हो, तो उन्हें सफेद , बुध कमजोर हो , तो उसे हरे , मंगल कमजोर हो , तो उसे लाल , शुक्र कमजोर हो , तो उसे हल्के नीले , सूर्य कमजोर हो , तो उसे ईंट के रंग , बृहस्पति कमजोर हो , तो उसे पीले , तथा शनि कमजोर हो , तो काले रंग का अधिक प्रयोग कर उन ग्रहों के प्रभाव को परावर्तित किया जा सकता है। लेकिन ध्यान रहे , मजबूत ग्रहों की किरणों का अधिकाधिक प्रभाव आपपर पड़े , इसके लिए उससे संबंधित रंगों का कम से कम प्रयोग होना चाहिए। 

अपने अध्‍ययन में हमने पाया है कि जन्‍मकालीन ग्रहों के कमजोर रहने पर जिस रंग की आवश्‍यकता शरीर को अधिक होती है , वह रंग हमारी पसंद बन जाता है। जिनका जन्‍मकालीन चंद्र कमजोर हो, तो उन्हें सफेद , बुध कमजोर हो , तो उसे हरे , मंगल कमजोर हो , तो उसे लाल , शुक्र कमजोर हो , तो उसे हल्के नीले , सूर्य कमजोर हो , तो उसे ईंट के रंग , बृहस्पति कमजोर हो , तो उसे पीले , तथा शनि कमजोर हो , तो काले रंग अधिक पसंद आते हैं ,जबक‍ि जन्‍मकालीन मजबूत ग्रहों से संबंधित रंग हमारी पसंद में नहीं होते। इस तरह प्रकृति खुद ही हमें ग्रहों के प्रभाव से सुरक्षा दे देती है।

कभी कभी जो ग्रह जन्‍मकाल में मजबूत होते हैं , वे भी गोचर में कमजोर चलते हैं और इस कारण अस्‍थायी तौर पर कभी एकाध वर्ष , कभी एकाध महीने कभी एकाध सप्‍ताह और कभी दो ढाई दिनों तक उससे संबंधित समस्‍याओं को झेलने को जातक मजबूर होता है। ऐसी स्थिति में जातक उन रंगों का प्रयोग नहीं कर पाता , जो उनके लिए बेहतर होते हैं। ग्रहों की किरणों को परावर्तित करने वाले रंगों का प्रयोग कर हम संबंधित ग्रहों के बुरे प्रभाव से बच सकते हैं। इस आधार पर सभी लग्‍नवाले अलग अलग प्रकार की समस्‍याओं से बचने के लिए भिन्‍न रंगों का प्रयोग कर सकते हैं , यह प्रयोग तब तक न करें , जब तक आप इन संदर्भों के अत्‍यधिक तनाव से न गुजर रहे हों।  ...........

मेष लग्‍नवाले माता पक्ष , किसी भी प्रकार की छोटी या बडी संपत्ति से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए सफेद रंग का , स्‍वास्‍थ्‍य , आत्‍मविश्‍वास या जीवनशैली से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए लाल रंग का , भाई , बहन या अन्‍य बंधु बांधव या किसी प्रकार के झंझट से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हरे रंग का , धन , परिवार और घर गृहस्‍थी से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हल्‍के नीले रंग का , अपनी या संतान पक्ष की पढाई लिखाई से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए ईंट के रंग का , भाग्‍य , धर्म या खर्च से संबंधित से समस्‍याओं से बचने के लिए पीले रंग का , पिता पक्ष , सामाजिक पक्ष , कैरियर , हर प्रकार के लाभ से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए काले रंग का प्रयोग कर सकते हैं।

वृष लग्‍नवाले भाई , बहन और अन्‍य बंधु बांधवों से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए सफेद रंग का , घर गृहस्‍थी , खर्च या बाहरी संदर्भों की समस्‍याओं से बचने के लिए लाल रंग का , धन , परिवार , अपनी या संतान पक्ष की पढाई लिखाई के मामले से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हरे रंग का , स्‍वास्‍थ्‍य , आत्‍मविश्‍वास , प्रभाव से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हल्‍के नीले रंग का , माता पक्ष , किसी प्रकार की छोटी बडी संपत्ति से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए ईंट के रंग का , हर प्रकार के लाभ के मामले , रूटीन और जीवनशैली से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए पीले रंग का , भाग्‍य , धर्म , पितापक्ष , सामाजिक पक्ष , कैरियर से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए काले रंग का प्रयोग कर सकते हैं।

मिथुन लग्‍नवाले धन से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए सफेद रंग का , लाभ , प्रभाव से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए लाल रंग का , स्‍वास्‍थ्‍य , आत्‍मविश्‍वास , माता पक्ष , हर प्रकार की छोटी या बडी संपत्ति से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हरे रंग का , अपनी या संतान पक्ष की पढाई लिखाई , खर्च से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हल्‍के नीले रंग का , भाई , बहन या अन्‍य बंधु , बांधवो से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए ईंट के रंग का , घर गृहस्‍थी , पिता पक्ष , सामाजिक पक्ष , कैरियर से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए पीले रंग का , भाग्‍य , धर्म , रूटीन , जीवनशैली से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए काले रंग का प्रयोग कर सकते हैं।

कर्क लग्‍नवाले स्‍वास्‍थ्‍य या आत्‍म विश्‍वास से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए सफेद रंग का , अपनी या संतान पक्ष की पढाई लिखाई या कैरियर , पिता या सामाजिक पक्ष से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए लाल रंग का , भाई , बहन या अन्‍य बंधु , खर्च या बाहरी संदर्भों से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हरे रंग का , माता पक्ष , किसी प्रकार की छोटी या बडी संपत्ति या लाभ से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हल्‍के नीले रंग का , धन से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए ईंट के रंग का , धर्म , भाग्‍य ,प्रभाव से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए पीले रंग का , घर गृहस्‍थी  , रूटीन या जीवनशैली से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए काले रंग का प्रयोग कर सकते हैं।

सिंह लग्‍नवाले खर्च या बाहरी संदर्भों से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए सफेद रंग का , माता पक्ष , किसी प्रकार  की छोटी या बडी अचल संपत्ति या भाग्‍य से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए लाल रंग का , धन या लाभ से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हरे रंग का , भाई , बहन या अन्‍य बंधु , पिता पक्ष , सामाजिक पक्ष या कैरियर से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हल्‍के नीले रंग का , स्‍वास्‍थ्‍य या आत्‍म से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए ईंट के रंग का , अपनी या संतान पक्ष की पढाई लिखाई , रूटीन या जीवनशैली से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए पीले रंग का , घर गृहस्‍थी , प्रभाव से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए काले रंग का प्रयोग कर सकते हैं।

कन्‍या लग्‍नवाले लाभ से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए सफेद रंग का , भाई , बहन , अन्‍य बंधु , रूटीन से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए लाल रंग का , स्‍वास्‍थ्‍य , आत्‍मविश्‍वास , पिता पक्ष , सामाजिक पक्ष या कैरियर से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हरे रंग का , भाग्‍य , धर्म , धन या कोष से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हल्‍के नीले रंग का , खर्च या बाहरी संदर्भ से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए ईंट के रंग का , माता पक्ष  , छोटी या बडी संपत्ति , घर गृहस्‍थी से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए पीले रंग का , अपनी या संतान पक्ष की पढाई लिखाई या प्रभाव से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए काले रंग का प्रयोग कर सकते हैं।

तुला लग्‍नवाले पिता पक्ष , सामाजिक पक्ष या कैरियर से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए सफेद रंग का , घर गृहस्‍थी , धन कोष से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए लाल रंग का , भाई बहन या अन्‍य बंधु , खर्च और बाह्य संदर्भ से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हरे रंग का , स्‍वास्‍थ्‍य , आत्‍मविश्‍वास , रूटीन और जीवनशैली से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हल्‍के नीले रंग का , लाभ से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए ईंट के रंग का , भाई , बहन या अन्‍य बंधु , खर्च और बाहरी संदर्भ से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए पीले रंग का , माता पक्ष  , छोटी या बडी संपत्ति , अपनी या संतान पक्ष की पढाई लिखाई से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए काले रंग का प्रयोग कर सकते हैं।

वृश्चिक लग्‍नवाले भाग्‍य , धर्म से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए सफेद रंग का , स्‍वास्‍थ्‍य , आत्‍म विश्‍वास या प्रभाव से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए लाल रंग का , लाभ या जीवनशैली से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हरे रंग का , घर गृहस्‍थी , खर्च और बाहरी संदर्भों से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हल्‍के नीले रंग का , पिता पक्ष , सामाजिक  पक्ष या कैरियर से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए ईंट के रंग का , धन , कोष , अपनी या संतान पक्ष की पढाई लिखाई से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए पीले रंग का , भाई , बहन या अन्‍य बंधु , माता पक्ष , छोटी या बडी किसी प्रकार की संपत्ति से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए काले रंग का प्रयोग कर सकते हैं।

धनु लग्‍नवाले रूटीन या जीवनशैली से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए सफेद रंग का , अपनी या संतान पक्ष की पढाई लिखाई , खर्च या बाहरी संदर्भ  कैरियर , पिता या सामाजिक पक्ष से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए लाल रंग का , घर गृहस्‍थी  , पिता पक्ष , सामाजिक पक्ष या कैरियर से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हरे रंग का , लाभ और प्रभाव से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हल्‍के नीले रंग का , भाग्‍य या धर्म से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए ईंट के रंग का , स्‍वास्‍थ्‍य , माता पक्ष , किसी प्रकार की छोटी या बडी संपत्ति से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए पीले रंग का , धन , कोष , भाई बहन या अन्‍य बंधु से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए काले रंग का प्रयोग कर सकते हैं।

मकर लग्‍नवाले घर गृहस्‍थी से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए सफेद रंग का , माता पक्ष , छोटी या बडी संपत्ति के मामले और लाभ से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए लाल रंग का , भाग्‍य , धर्म या प्रभाव से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हरे रंग का , अपनी या संतान पक्ष की पढाई लिखाई , पिता पक्ष , सामाजिक पक्ष या कैरियर से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हल्‍के नीले रंग का , रूटीन या जीवनशैली से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए ईंट के रंग का , भाई , बहन या अन्‍य बंधु खर्च और बाहरी संदर्भ  और बाहरी संदर्भ से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए पीले रंग का , स्‍वास्‍थ्‍य , धन से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए काले रंग का प्रयोग कर सकते हैं।

कुंभ लग्‍नवाले प्रभाव की कमजोरी या झंझट के बढोत्‍तरी से बचने के लिए सफेद रंग का , भाई बहन , या अन्‍य बंधु बांधवों , पिता पक्ष , सामाजिक पक्ष या कैरियर से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए लाल रंग का , अपनी या संतान पक्ष की पढाई लिखाई , रूटीन या जीवनशैली से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हरे रंग का ,  किसी प्रकार की संपत्ति या भाग्‍य से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हल्‍के नीले रंग का , घर गृहस्‍थी से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए ईंट के रंग का ,  धन और लाभ से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए पीले रंग का , स्‍वास्‍थ्‍य , आत्‍मविश्‍वास , खर्च और बाहरी संदर्भों से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए काले रंग का प्रयोग कर सकते हैं।

मीन लग्‍नवाले अपनी या संतान पक्ष की पढाई लिखाई , या अन्‍य माहौल से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए सफेद रंग का , भाग्‍य , धर्म , धन से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए लाल रंग का , माता पक्ष , छोटी या बडी संपत्ति , घर गृहस्‍थी से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हरे रंग का , भाई , बहन या अन्‍य बंधु , रूटीन और जीवनशैली से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए हल्‍के नीले रंग का , प्रभाव से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए ईंट के रंग का , स्‍वास्‍थ्‍य , पिता पक्ष , सामाजिक पक्ष , कैरियर प्रकार की छोटी या बडी संपत्ति से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए पीले रंग का , लाभ , खर्च और बाहरी संदर्भों से संबंधित समस्‍याओं से बचने के लिए काले रंग का प्रयोग कर सकते हैं।




गुरुवार, 11 नवंबर 2010

कर्मकांड और ज्‍योतिष बिल्‍कुल अलग अलग विधा है !!

कुछ अनजान लोगों को मैं अपने प्रोफेशन ज्‍योतिष के बारे में बताती हूं , तो एक महिला के ज्‍योतिषी होने पर उन्‍हें आश्‍चर्य होता है। क्‍यूंकि उनकी जानकारी में एक ज्‍योतिषी और गांव के पंडित में कोई अंतर नहीं है , जो उनके बच्‍चों की जन्‍मकुंडली बनाता है , विभिन्‍न प्रकार के शुभ कार्यों के लिए मुहूर्त्‍त देखता है , घर में पूजा पाठ करता है , विवाह के लिए जन्‍मकुंडली मिलान करता है , लग्‍न निकालता है , कोई सामान खोने पर उसकी वापसी की दिशा बताता है। उसके पास एक पंचांग होता है ,‍ जिसमें हर काम के उपयुक्‍त तिथि और कर्मकांड की विधियां दी हुई है। पर चूंकि जनसामान्‍य को इन बातों की जानकारी नहीं है , इसलिए पंडित लोगों के लिए ज्ञानी है,  उनसे पूछे बिना कोई काम नहीं करते। कभी किसी महिला की इस पेशे में उपस्थिति नहीं देखी , इसलिए उनका आश्‍चर्यित होना स्‍वाभाविक है।

हमारे गांव में ज्‍योतिषीय सलाह लेने  दूर दूर से लोग पापाजी के पास आया करते। पापाजी की अंधभक्‍तों से कभी नहीं बनी , चाहे वो परंपरा के हों या विज्ञान के। प्रारंभ से अबतक वे तार्किक बुद्धिजीवी वर्ग से ही ग्रहों के स्‍वभाव और उसके अनुसार उसके प्रभाव की विवेचना करते रहें। उनकी लोकप्रियता में कमी का यही एक बडा कारण रहा। पर घर के बाहर हमेशा गाडी खडी होने से गांव के लोगों को बडा आश्‍चर्य होता। धीरे धीरे लोगों को मालूम हुआ कि ये पंडित है , इसलिए लोग इनके पास आया करते हैं। फिर तो गांव वाले लोग भी अपनी समस्‍याएं लेकर आने लगे। किसी की बकरी खो गयी है , किसी का बेटा चला गया है , कोई व्रत करे तो किस दिन , कोई विवाह करे तो किससे और कौन से दिन ??

गांव के किसी भी व्‍यक्ति को पापाजी 'ना' नहीं कह सकते थे , पर उनके पीछे इतना समय देने से उनके अध्‍ययन मनन में दिक्‍कत आ सकती थी। हम सभी भाई बहन भी ऊंची कक्षाओं में पढ रहे थे , किसी को भी उन्‍हें समय देने की फुर्सत नहीं थी। ग्रहों नक्षत्रों की स्थिति को देखने के लिए जो पंचांग िपापाजी  उपयोग में लाते , उसी में सबकुछ लिखा होता , पापाजी ने आठ वर्षीय छोटे भाई को पंचांग देखना सिखला दिया था। दो चार वर्षों तक मेरा छोटा भाई ही इनकी समस्‍याओं को सुलझाता रहा , क्‍यूंकि इसमें किसी प्रकार की भविष्‍यवाणी नहीं करनी पडती थी। हजारो वर्ष पूर्व जिस आधार पर पंचांग बनाए जाते थे , जिस आधार पर शकुन , मुहूर्त्‍त , दिशा ज्ञान आदि होता था , आजतक उसमें किसी भी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया गया है , इसमें कितनी सच्‍चाई और कितना झूठ है , इसकी भी कभी जांच नहीं की गयी है। अंधभक्ति में लोग पंडितों की बातों को आजतक सत्‍य मानते आ रहे हैं , आठ वर्ष के बच्‍चे की बातों को भी सत्‍य समझते रहें।

प्राचीन काल में गांव के पंडितों का संबंध सिर्फ कर्मकांड से था , क्रमश: बालक के जन्‍म का रिकार्ड रखने के लिए जन्‍मकुंडली बनाने का काम भी उन्‍हें सौंप दिया गया। पर ज्‍योतिषीय गणना का काम और किसी प्रकार की भविष्‍यवाणी तो ऋषि मुनियों के अधीन था। हां उन्‍होने कुछ पुस्‍तके जरूर लिखकर इन पंडितों को दी , जिनके आधार पर बालक की जन्‍मकुंडली  बनाने के बाद बच्‍चे के आनेवाले जीवन के बारे में कुछ बातें लिखी जा सकती थी। पर समय सापेक्ष भविष्‍यवाणी करने के लिए बडे स्‍तर पर गाणितिक अध्‍ययन मनन की आवश्‍यकता होती है , जिसकी परंपरा भारतवर्ष में उन ऋषि मुनियों के बाद समाप्‍त हो गयी। यही कारण है कि आज तक समाज में ज्‍योतिष और कर्मकांड को एक ही चीज समझा जाता है , दोनो को हेय नजर से देखा जाता है।

उस समय से लोगों के मन में जो भ्रम बना , वो अभी तक दूर नहीं हो पा रहा है। एक ज्‍योतिषी के रूप में मुझे समझने के बाद जन्‍मकुंडली बनवाने , मुहूर्त्‍त देखने , जन्‍मकुंडली मिलाने तथा अन्‍य कर्मकांडों की जानकारी के लिए मेरे पास लोग फोन किया करते हैं। कुछ लोग पूछते हैं कि बिना संस्‍कृत के आप ज्‍योतिष का काम कैसे कर सकती है ?? भले ही हर ज्ञान विज्ञान किसी न किसी रूप में एक दूसरे से सहसंबंध बनाते हों , पर लोगों को यह जानकारी होनी चाहिए कि कर्मकांड और ज्‍योतिष में फर्क है। दोनो के विशेषज्ञ अलग होते हैं , सामान्‍य तौर पर कोई जानकारी भले ही दूसरे विषय की दी जा सकती है , पर विशेष जानकारी के लिए लोग को संबंधित विषय के विशेष जानकारी रखने वालों से ही संपर्क करना उचित है। मैं ग्रहों के पृथ्‍वी के जड चेतन पर पडनेवाले प्रभाव का अध्‍ययन करती हूं और उसी आधार पर पृथ्‍वी में होनेवाली घटनाओं का समय से पूर्व आकलन करती हूं। कर्मकांड की जानकारी या अपने या अपने बच्‍चे की जन्‍मकुंडली का चक्र तो लोग किसी पंडित से प्राप्‍त कर सकते हैं , पर संबंधित व्‍यक्ति के वर्तमान भूत और भविष्‍य के बारे में कुछ जानकारी की आवश्‍यकता हो , तब मुझसे संपर्क किया जाना चाहिए।

इसे भी पढिए ....

बुधवार, 10 नवंबर 2010

छठ सिर्फ श्रद्धा और आस्‍था का त्‍यौहार है .. इसमें दिखावटीपना कुछ भी नहीं !!

बिहार और झारखंड का मुख्‍य त्‍यौहार है छठ , अभी चारो ओर इसकी धूम मची है। ब्‍लॉग में भी दो चार पोस्‍ट पढने को मिल ही जा रहे हैं।  लोग छठ की खरीदारी में व्‍यस्‍त है , पडोस में मेहमानों की आवाजाही शुरू हो गयी है।  दूर दूर से इसके खास धुन पर बने गीत सुनने को मिल ही रहे हैं , फिर भी वर्ष में एक बार इसकी सीडी निकालकर दो तीन बार अवश्‍य चला लिया करती हूं। छठ के बाद फिर सालभर  इस गाने को नहीं बजाया जाता है , पडे पडे सीडी खराब भी तो हो जाएगी। गीत सुनते हुए न जाने कब मन बचपन में छठ की पुरानी यादों में खो जाता है।

कहते हैं , हमारे पूर्वज 150 वर्ष पूर्व ही पंजाब से आकर बोकारो जिले के पेटरवार नाम के गांव में बस गए थे।  इनके नाम से गांव में एक 'खत्री महल्‍ला' कहलाने लगा था। आर्सेलर मित्‍तल ने अब अपने स्‍टील प्रोजेक्‍ट के लिए इस स्‍थान को चुनकर अब इसका नाम औद्योगिक शहरों में शुमार कर दिया है! हमलोगों के जन्‍म तक तो कई पीढियां यहां रह चुकी थी , इसलिए यहां की सभ्‍यता और संस्‍कृति में ये पूरे रच बस चुके थे। पर छठ का त्‍यौहार कम घरों में होता था और कुछ क्षेत्रीय लोगों तक ही सीमित था , खासकर उस समय तक हममें से किसी के घर में नहीं मनाया जाता था। सब लोग छठ मैय्या के नाम पर एक सूप या जोडे सूप के मन्‍नत जरूर रखते थे , उसकी खरीदारी या तैयारी भी करते , पर अर्घ्‍य देने या दिलवाने के लिए हमें किसी व्रती पर निर्भर रहना पडता था।

हमारे मुहल्‍ले में दूसरी जाति के एक दो परिवार में यह व्रत होता था , खरना में तो हमलोग निश्चित ही खीर और पूडी या रोटी का प्रसाद खाने वहीं पहुंचते थे। माना जाता है कि खरना का प्रसाद जितना बंटे , उतना शुभ होता है , इसलिए बच्‍चों के लिए रखकर बाकी पूरे मुहल्‍ले का गाय का दूध व्रती के घर चला जाता था । कभी कभार हमारा मन्‍नत वहां से भी पूरा होता। पर अधिकांश वर्ष हमलोग दादी जी के साथ अपनी एक दीदी के दोस्‍त के घर जाया करते थे। एक दिन पहले ही वहां हमलोग चढावे के लिए खरीदे हुए सामान और पैसे दे देते। दूसरे दिन शाम के अर्घ्‍य के दिन नहा धोकर घर के गाय का ताजा दूध लेकर अर्घ्‍य देने जाते थे।

वहां सभी लोग प्रसाद के रख रखाव और पूजा की तैयारी में लगे होते थे। थोडी देर में सब घाट की ओर निकलते। कुछ महिलाएं और बच्‍चे दंडवत करते जाते , तो कुछ मर्द और बच्‍चे माथा पर प्रसाद की टोकरी लिए हुए । प्रसाद के सूप में इस मौसम में होने वाले एक एक फल मौजूद होते हैं , साथ में गेहूं के आटे का ठेकुआ और चावल के आटे का कसार भी।  बाकी सभी लोग पूरी आस्‍था में तथा औरते छठ का विशेष गीत गाती हुई साथ साथ चलती। हमारे गांव में कोई नदी नहीं , इसलिए पोखर पर ही छठ मनाया जाता। घाट पर पहुंचते ही नई सूती साडी में व्रती तालाबों में डुबकी लगाती , फिर हाथ जोडकर खडी रहती। सूर्यास्‍त के ठीक पहले व्रती और अन्‍य लोग भगवान को अर्घ्‍य देते। हमारे यहो सभी मर्द लडके भी उस वक्‍त तालाब में नहाकर अर्घ्‍य देते थे। महीने या सप्‍ताह भर की तैयारी के बाद कार्यक्रम थोडी ही देर में समाप्‍त हो जाता था। पर आधी पूजा तो सुबह के लिए शेष ही रह जाती थी।

पहले ठंड भी बहुत पडती थी , सूर्योदय के दो घंटे पहले घाट में पहुंचना होता है , क्‍यूंकि वहां पूरी तैयारी करने के बाद आधे घंटे या एक घंटे व्रती को जल में खडा रहना पडता है। इसलिए सूर्योदय के ढाई घंटे पहले हमें अपने घर से निकलना होता। वहां जाने का उत्‍साह इतना अधिक होता कि हमलोग अंधेरे में ही उठकर स्‍नान वगैरह करके वहां पहुंच जाते। वहां तैयारी पूरी होती , दो तीन दिन के व्रत और मेहनत के बाद भी व्रती के चेहरे पर एक खास चमक होती थी। शाम की तरह ही सारा कार्यक्रम फिर से दुहराया जाता , उसके बाद प्रसाद का वितरण होता , फिर हमलोग घर वापस आते।

विवाह के दस वर्ष बाद तक संतान न होने की स्थिति में खत्री परिवार की दो महिलाओं ने पडोसी के घरों में जाकर इस व्रत को शुरू किया और सूर्य भगवान की कृपा कहें या छठी मैय्या की या फिर संयोग ... दोनो के ही बच्‍चे हुए , और बाद में हमारे मुहल्‍ले में भी कई परिवारों में धूमधाम से यह व्रत होने लगा। इसलिए अब हमारे मुहल्‍ले के लोगों को इस व्रत के लिए गांव के दूसरे छोर पर नहीं जाना पडता है,  उन्‍हे पूरे मुहल्‍ले की हर संभव मदद मिलती है। बचपन के बाद अभी तक कई जगहों की छठ पूजा देखने को मिली ,  हर स्‍थान पर इस व्रत और पूजा का बिल्‍कुल एक सा परंपरागत स्‍वरूप है , यह सिर्फ श्रद्धा और आस्‍था का त्‍यौहार है .. इसमें दिखावटीपना कुछ भी नहीं।

रविवार, 7 नवंबर 2010

काली पूजा के कुछ चित्र देखिए ..........

कार्तिक अमावस्या की शाम को घर घर होने वाली लक्ष्‍मी पूजा के साथ ही रात्रि में काली पूजा की भी बहुत महत्ता है। एंसी मान्‍यता है कि देवों में सबसे पराक्रमी और शक्तिशाली मां काली देवी दुर्गा का ही एक रूप हैं। मां काली की पूजा से वे सभी सभी नकारात्मक प्रवृतियां दूर होती हैं ,  जो धार्मिक प्रगति और यश प्राप्ति में बाधक हैं। बोकारो में हमारी कॉलोनी मे हुए काली पूजा के कुछ चित्र देखिए .....................




गुरुवार, 4 नवंबर 2010

पहले जन्‍म या फिर भाग्‍य . . विश्‍लेषण के लिए कम से कम 100 अस्‍पतालों का आंकडा चाहिए !!

पहले अंडा या मुर्गी , ये फैसला तो आज तक न हो सका है और न हो पाएगा , पर इसी तर्ज पर कुछ दिनों से एक महत्‍वपूर्ण विषय पर मैं चिंतन कर रही थी , जन्‍म के आधार पर भाग्‍य निश्चित होता है या भाग्‍य के निश्चित होने पर जन्‍म की तिथि निश्चित होती है। संयोग से उसी आसपास पापाजी भी बोकारो पहुंच गए , हमेशा की तरह ही इस बार भी मेरे प्रश्‍नों की झडी तैयार थी। पर जहां पहले मैं मेरे प्रश्‍नों की झडी से वे ऊब से जाया करते , हाल के वर्षों में वे किसी निष्‍कर्ष पर पहुंचने से पहले मेरे अनुभव का भी ख्‍याल रखते हैं। वर्षों के अनुभव और चार दिनों तक हुई गंभीर बहस के बाद हमलोग इस निष्‍कर्ष पर पहुंचे कि बच्‍चे का स्‍वभाव और उसकी जीवन यात्रा पहले से तय होती है , उसी के अनुसार उसके जन्‍म लेने का समय तय होता है। दरअसल गर्भावस्‍था के दौरान ही बच्‍चे की मां और बच्‍चे की परिस्थितियों और जन्‍म के पश्‍चात बनने वाली बच्‍चे की जन्‍मकुंडलियों में समानता को देखते हुए हमने ऐसा समझा।

अभी तक ज्‍योतिष शास्‍त्र ये मानता आया है कि भूण के बनने के हिसाब से बच्‍चों का भाग्‍य निश्चित नहीं होता , जन्‍म के बाद बच्‍चे जो प्रथम श्‍वास ग्रहण करते हैं, उसी वक्‍त ब्रह्मांड में मौजूद ग्रहों का प्रभाव किसी बच्‍चे पर  पडता है , जिससे उसका स्‍वभाव और उसकी जीवनयात्रा निश्चित होती है , जिसे जन्‍मकुंडली में देखा जा सकता है। इस आधार पर बालारिष्‍ट रोगों का कारक ग्रह चंद्रमा यदि जन्‍म के वक्‍त कमजोर हो , तो जन्‍म के बाद बच्‍चे के स्‍वास्‍थ्‍य में गडबडी आती है। पर अध्‍ययन के क्रम में कई कुंडलियों में हमने पाया कि जन्‍म के वक्‍त रहनेवाले कमजोर चंद्रमा के कारण या तो घर की आर्थिक स्थिति गडबड थी या माता पिता के द्वारा किसी प्रकार की लापरवाही हुई , जिसके कारण गर्भावस्‍था के दौरान ही कई बच्‍चों  के शा‍रीरिक विकास में बाधा उपस्थित हुई थी ।

 ऐसा महसूस करने पर हमलोगों ने खास विशेषतावाले 100 बच्‍चों की माताओं से बात चीत की। जन्‍मकुंडली के हिसाब से बच्‍चों के जिन जिन पक्षों को मजबूत होना चाहिए था , वे उनकी गर्भावस्‍था के दौरान उनकी माताओं के द्वारा महसूस किए गए। गर्भावस्‍था के दौरान लगभग सभी महिलाओं ने अपने व्‍यवहार में ये विशेषताएं पायी थी , जो उनके बच्‍चों में बाद में देखने को मिली। हमारे ग्रंथों में माता के व्‍यवहार का बच्‍चों पर प्रभाव के बारे में चर्चा है , पर हमने महसूस किया कि अलग अलग बच्‍चें के स्‍वभाव के हिसाब से माता के व्‍यवहार या स्‍वास्‍थ्‍य या मानसिक क्रियाकलापों में अंतर देखने को मिला। पर हमलोग इस प्रकार के रिसर्च के बिल्‍कुल प्रारंभिक दौर में थे , इसलिए इस निष्‍कर्ष को लेकर दावा नहीं कर सकते थे , चिंतन अवश्‍य बना हुआ था , पर यह भ्रम था या हकीकत , समझ में नहीं आ रहा था।

पर यह भ्रम पिछले शनिवार यानि 23 अक्‍तूबर को हकीकत में बदल गया। घटना यह हुई कि कुछ दिन पहले ही बोकारो से मेरी एक महिला मित्र अपनी गर्भवती पुत्री के पास दिन पूरे होने के लगभग दिल्‍ली पहुंच गई थी। उसकी पुत्री एक दिन पहले से ही अस्‍पताल में भर्ती थी , इसकी खबर लगते ही मैने दो बजे आसपास उनसे बात की। वो काफी घबडायी हुई थी , बिटिया को पांच घंटे पूर्व ही लेबर रूम ले जाया गया था , पूरे परिवार के लोग जमा थे और अंदर से कोई खबर भी नहीं आ रही थी। जब भी भविष्‍य अनिश्चित सा लगता है , मुझसे लोग भविष्‍य के बारे में जानना चाहते हैं। माता पिता जानना चाह रहे थे कि इसमें कितनी देर हो सकती है।

फोन रखने के बाद मैने पंचांग निकाला , पूर्णमासी का दिन था और साढे पांच बजे से साढे सात बजे के मध्‍य चांद पूर्वी दिशा में उदय होने वाला था। उस वक्‍त बच्‍चे का जन्‍म हो , तो जन्‍मकुंडली में लग्‍नचंदा योग बनेगा , इस योग के बारे में कहा जाता है कि इसमें जन्‍म लेने वाला बच्‍चा पूरे परिवार का लाडला और प्‍यारा होता है। लग्‍नचंदा योग यदि पूर्णिमा के दिन बनें , तो इसकी बात ही अलग होती है। वैसे तो अपने माता पिता के लिए हर बच्‍चा प्‍यारा ही होता है , पर जिस बच्‍चे का जन्‍म होनेवाला था , वह दादाजी और नानाजी दोनो के घर का पहला बच्‍चा था , उसके अतिरिक्‍त लाड प्‍यार में कोई संशय नहीं था। मेरे मन से सारा भ्रम हट गया , इस बच्‍चे का जन्‍म साढे पांच से साढे सात के मध्‍य लग्‍नचंदा योग में ही हो सकता है , यही वजह है कि लेबर रूम में इतनी देर हो रही है।

मेरा ध्‍यान दिल्‍ली की ओर ही लगा रहा , सात बजे सूचना मिली कि पंद्रह मिनट पहले बच्‍चे का जन्‍म हो चुका है , जच्‍चा और बच्‍चा दोनो ही स्‍वस्‍थ हैं , बच्‍चे का वजन 4 किलो है। मतलब एक निश्चित समय पर बच्‍चे का जन्‍म लेना तय था , और उसी ग्रहस्थिति के हिसाब से उसका पूरा विकास हो चुका था। इस घटना के बाद मेरा भ्रम तो बिल्‍कुल मिट चुका है , पर इसे और निश्चित करने के लिए मैं एक सर्वे करना चाहती हूं। इसके लिए कम से कम देशभर के 100 अस्‍पतालों से पूरे दिसंबर 2010 के दौरान जन्‍म लेने वाले सारे बच्‍चों का जन्‍म विवरण , उनका वजन , उनके जन्‍म से पहले और बाद का स्‍वास्‍थ्‍य , उनके माता पिता , दादा दादी या नाना नानी के बेटे बेटियों , नाती नातिनियों और पो‍ते पोतियों में उनका कौन सा स्‍‍थान है ,  इसके बारे पूरी जानकारी चाहती हूं , मैने इस दिशा में अपने नजदीकी डॉक्‍टरों और अस्‍पतालों से बात शुरू कर दी है , क्‍या आप पाठकों में से भी कोई मेरी मदद कर सकते हैं ??

मंगलवार, 2 नवंबर 2010

कौन सा व्‍यवसाय किया जाए ??

अभी हाल में एक भाई ने बहुत खुश होकर बताया कि उसने कई प्रोडक्‍टों की एजेंसी ले रखी है , बाजार में उन वस्‍तुओं की अच्‍छी खपत है और अब भविष्‍य के लिए उसे सोंचने की आवश्‍यकता नहीं। उत्‍सुकता वश मैने उसे पूछा कि‍ वे कौन कौन से प्रोडक्‍ट हैं ?? शायद उसे सबसे अधिक फायदा शायद कोल्‍ड ड्रिंक्‍स और पानी की बोतलों से आ रहा था , उसके मुहं से इन्‍हीं दोनो का नाम पहले निकला । सुनते ही मैं ऐसे सोंच में पड गयी कि बाद में उसने और कई प्रोडक्‍टों का क्‍या नाम बताया , वो भी सुन न पायी और उसके चुप्‍प होते ही उसे जीवन में नैतिक मूल्‍यों को धारण करने का लेक्‍चर देने लगी।

वो तर्क करने में मुझसे बीस ही निकला। उसने बताया कि पानी और कोल्‍ड ड्रिंक्‍स की बोतल को बेचना तो वह एक मिनट में छोड सकता है , जब मैं उसे बताऊं कि बाजार में कौन सा प्रोडक्‍ट सही है। दूध में केमिकल की क्‍या बात की जाए , पेण्‍ट का घोल तक मिलाया जाता है। मधु , च्‍यवणप्राश तक में एंटीबायोटिक और पेस्टिसाइड की बात सुनने में आ ही गयी है। जितनी सब्जियों है , उसमें आक्सीटोसीन के इंजेक्‍शन दिए जाते हैं , जिससे सब्जियां जहरीली हो जाती हैं। गाय तक को तेज इंजेक्‍शन देकर उसके सारे शरीर का दूध निचोड लिया जाता है , नकली मावा , नकली मिठाई , नकली घी। पैकिंग के चाकलेटों और अन्‍य सामानों में कीडे मकोडे , किस चीज का व्‍यवसाय किया जाए ??

सुनकर उसकी मां यानि चाची खेतों के ऊपज तक के शुद्ध नहीं रहने की चर्चा करने लगी। गांव के परंपरागत सारे बीज समाप्‍त हो गए हैं और हर वर्ष किसान को सरकारी बीज खरीदने को बाध्‍य होना पडता है। विशेष ढंग से विकसित किए गए उस बीज में प्राकृतिक कुछ भी नहीं , उसमें गोबर की खाद नहीं चल सकती , रसायनिक खाद का ही इस्‍तेमाल करना पउता है , सिंचाई की सुविधा हो तो ठीक है , नहीं तो पौधों में प्रतिरोधक क्षमता बिल्‍कुल भी नहीं होती , देखभाल में थोडी कमी हो तो मर जाते हैं। हां, सबकुछ ठीक रहा तो ऊपज अवश्‍य होती है , पर न तो पुराना स्‍वाद है और न ही पौष्टिकता।

 इस तरह के बातचीत से लोगों को कितनी निराशा होती होगी , इसका अनुमान आप लगा सकते हैं। शरीर को कमजोर कर , प्रकृति को कमजोर कर हम यदि विकसित होने का दावा करते हैं , तो वह हमारा भ्रम ही तो है। पाश्‍चात्‍य की नकल करते हुए इस अंधे विकास की दौड में किसी को कुछ भी हासिल नहीं हो सकता। एलोपैथी दवाओं का तो और बुरा हाल है , एक बार किसी बीमारी की दवा लेना शुरू करो , भाग्‍य अच्‍छा होगा , तभी उस दवा के कुप्रभाव से आप बच सकते हैं। इन दवाओं और जीवनशैली की इन्‍हीं खामियों के कारण 40 वर्ष की उम्र का प्रत्‍येक व्‍यक्ति दवाइयों पर निर्भर हो जाता है। हमारी सभ्‍यता और संस्‍कृति तथा ज्ञान ने अपने स्‍वास्‍थ्‍य के साथ साथ प्रकृति के कण कण के बारे में सोंचने को बाध्‍य करती है। इसलिए जितनी जल्‍द हमलोग परंपरागत जीवनशैली की ओर लौट जाएं , उतना ही अच्‍छा है।

सोमवार, 1 नवंबर 2010

भूल सुधार .. LOCKED BY HINDI BLOG TIPS

आशीष खंडेलवाल जी ने अपनी एक पोस्‍ट में रचनाओं को चोरी से बचाने के लिए कुछ टिप्‍स दिए थे , जिससे टेक्‍सट कॉपी नहीं किया जा सकता था। इसका प्रयोग कुछ दिन मैने भी किया था , फिर किसी सज्‍जन के अनुरोध पर अपने लेखों के प्रयोग करने की सुविधा देने के लिए हटाना पडा । पर कुछ दिनों से मैने कई ब्‍लॉग्‍स पर जब भी कुछ शब्‍दों को सेलेक्‍ट करने की कोशिश की है , ऐसा दृश्‍य पाया है ......



मतलब कि वह स्‍वामी जी के तोते की तरह अपनी कहता भी है और आपको कॉपी करने भी दे देता है। आपको नहीं मालूम तो सुन लीजिए , स्‍वामी जी का तोता शिकारी के बिछाए गए जाल में फंसकर स्‍वामी जी द्वारा रटाए गए पाठों को कैसे दोहरा रहा था ....

शिकारी आएगा , जाल बिछाएगा . लोभ से उसमें फंसना मत !!

भूल सुधार कर लें आशीष खंडेलवाल जी !!

शनिवार, 30 अक्तूबर 2010

बच्‍चों के पालन पोषण की परंपरागत पद्धतियां ही अधिक अच्‍छी थी !!

बचपन की गल्तियों में मार पडने की बात तो लोग भूल चुके होंगे , आज के बच्‍चों को डांट फटकार भी नहीं की जाती। माता पिता या अन्‍य बडे किसी काम के लिए मना कर दिया करते हैं , तो बच्‍चों का नाराज होना स्‍वाभाविक है। पर यदि शुरूआती दौर में ही उनको गल्तियों में नहीं टोका जाए और उनकी आदतों पर ध्‍यान नहीं दिया जाए , तो आगे वे अनुशासन में नहीं रह पाते। भले ही बचपन में लाड प्‍यार अधिक पाने वाले बच्‍चे अपने आत्‍मविश्‍वास के कारण हमें सहज आकर्षित कर लेते हों , तथा डांट फटकार में जीने वाले बच्‍चे सहमे सकुचाए होने से हमें थोडा निराश करते हों, पर वह बचपन का तात्‍कालिक प्रभाव है। कहावत है 'आती बहू जन्‍मता बच्‍चा' जैसी आदत रखोगे , वैसे ही रहेंगे वो। सही ढंग से यदि अनुशासित रखने के क्रम में जिन बच्‍चों को जितनी अधिक रोक टोक होती है , उसके व्‍यक्तित्‍व का उतना ही बढिया विकास होता है और वह जीवन में उतना ही सफल होता है।

आरंभिक दौर में हर आनेवाली पीढी पिछले पीढी को विचारों में कहीं न कहीं कमजोर मानती है, क्‍यूंकि उसका ज्ञान अल्‍प होता है। जैसे जैसे उम्र और ज्ञान का दौर बढता जाता है , पुरानी पीढी द्वारा कही गयी बातों में खासियत दिखाई देने लगती है। जब मैं रोटी बेलना सीख रही थी , तो गोल न बेलने पर मम्‍मी टोका करती , जब गोल बेलना सीख गयी , तो रोटी के न सिंकने को लेकर टोकाटोकी करती। रोटी के न फूलने पर उन्‍हें संतुष्टि नहीं होती , चाहे सेंकने के क्रम में दोनो ओर से रोटी को जला भी क्‍यूं न डालूं। उनका डांटने का क्रम तबतक जारी रहा , जबतक मैं बिल्‍कुल मुलायम रोटियां न बनाने लगी। मुझे मम्‍मी का टोकना बहुत बुरा लगता, मुझे लगता कि वे जानबूझकर टोका टोकी करती हैं , इतना सेंकने पर रोटी कच्‍चा कैसे रह सकता है ? बाद में समझ में आया कि भाप का तापमान खौलते पानी से भी बहुत अधिक होता है , इसलिए रोटी फूलने पर वह बाहर के साथ साथ अंदर से भी सिंकती होगी। सिर्फ रोटी बनाने में ही नहीं अन्‍य कामों को वे जितनी सफाई से किया करती , मुझसे ही वैसी ही उम्‍मीद रखती।इसका फायदा यह हुआ कि जिम्‍मेदारी के साथ हर काम को सफाई से करना तो सीखा ही , आगे भी सीखने की ललक बनी रही। मुझे किसी भी परिस्थिति में कहीं भी समायोजन करने में दिक्‍कत नहीं आती।

आज कुछ स्‍कूलों की अच्‍छी पढाई की वजह से भले ही शिक्षा और कैरियर को युवा गंभीरता से लेते हैं , पर बाकी मामलों में आज की पीढी अपने अभिभावकों से सिर्फ प्‍यार पाकर बहुत बिगड गयी है। माता पिता अपने कैरियर की चिंता में व्‍यस्‍त बच्‍चों को स्‍वास्‍थ्‍य तक का ख्‍याल नहीं रख रहे , लेकिन उसकी उल्‍टी सीधी जिद जरूर पूरी कर रहहे हैं। उन्‍हें कभी डांट फटकार नहीं पडती , उनका पक्ष लेकर दूसरे के बच्‍चों और पडोसी तक को डांट देते हैं। अपने बच्‍चों पर गजब का विश्‍वास होता है उनका , उनकी गल्‍ती स्‍वीकारने को कतई तैयार नहीं होते। आज के अभिभावक बिल्‍कुल नहीं चाहते कि बच्‍चें के आसपास के वातावरण में ऐसी कोई बात हो , जिससे उनके दिमाग पर बुरा प्रभाव पडे। अपने को कष्‍ट में रखकर भी बच्‍चों के सुख की ही चिंता करते हैं। वैसे बच्‍चे जब युवा बनते हैं , अपने सुख के आगे किसी के कष्‍ट की उन्‍हें कोई फिक्र नहीं होती , यहां तक कि अपने माता पिता के प्रति जिम्‍मेदारी का भी उन्‍हें कोई ख्‍याल नहीं रहता। इसके अतिरिक्‍त समस्‍याओं से जूझने की युवाओं की प्रतिरोधक क्षमता समाप्‍त होती जा रही है और जिस दिन भी उसके सम्‍मुख समस्‍याएं आती हैं , वो इसे नहीं झेल पाते हैं। ज्‍योतिषियों और मनोचिकित्‍सक के पास मरीजों की बढती हुई संख्‍या इसकी गवाह है।  

अपने पालन पोषण की गलत नीतियों के कारण ही आज के सभी अभिभावक अपने बाल बच्‍चों के द्वारा अपनी देख रेख की उम्‍मीद ही छोड चुके हैं। यदि किसी ने बच्‍चों को अपनी जिम्‍मेदारी का अहसास कराते हुए अपने बच्‍चों का पालन पोषण किया भी है , तो वैवाहिक संबंध बनाते वक्‍त उनसे चूक हो जाती है। जिम्‍मेदारी के प्रति पार्टनर के गंभीर न होने से भी आज के समझदार युवा के समक्ष एक अलग मुसीबत खडी हो जाती है। माता पिता या अपने सुख में से एक को चुनने की उसकी विवशता होती है , उसे आंखे मूंदकर किसी एक को स्‍वीकार करना है। अपना सुख चुने या माता पिता का , कोई भी सबको सं‍तुष्टि नहीं दे पाता , स्थिति वैसी की वैसी ही बनी रह जाती है। यदि तबतक बच्‍चे हो गए हों , तो माता पिता को छोडकर मजबूरन उन्‍हें स्‍वार्थी बनना पडता है। आनेवाले समय में रिश्‍तों की और भयावह स्थिति उपस्थित होनेवाली है , ऐसी दशा में सभी अभिभावको से निवेदन है कि वे बच्‍चे को अपने स्‍वास्‍थ्‍य के प्रति ,परिवार और समाज के प्रति जिम्‍मेदार बनने की सीख दें। हममें से कोई भी समाज से अलग नहीं है , हम जैसा बोएंगे , वैसा ही तो काटेंगे और बोने और काटने का यह सिलसिला लगातार चलता रहेगा, जो आनेवाले युग के लिए बहुत बुरा होगा।

बुधवार, 27 अक्तूबर 2010

भविष्‍य को जानने के लिए जो बात ज्‍योतिष में है .. वो किसी अन्‍य विधा में कहां ??

पिछले आलेख में राज भाटिया जी की टिप्‍पणी मिली । उन्‍होने पूछा कि एक बात पुछनी थी कि कुंडली के क्या लाभ ओर क्या हानियां हैं।  इस बारे जरुर लिखे, हमारी बीबी कहती है कि बच्चो की कुंडली बनवा ले ? तो मै कहता हूं कि क्या लाभ ??  इस का उस के पास कोई जबाब नही, फ़िर कहती है ,  बनवाने मे क्या हानि है??  इस का जबाब मेरे पास नही, शायद आप के पास हो तो जरुर बताये।

मेरे ख्‍याल से जब प्राचीन काल में ज्‍योतिष शास्‍त्र के माध्‍यम से जन्‍मकुंडली के आधार पर बच्‍चे के भूत भविष्‍य और वर्तमान को समझने का कार्य चल रहा था , तब हमारे देश में लोग बच्‍चों के जन्‍मविवरण ही नहीं रखा करते होंगे। इसलिए प्रत्‍येक गांव में  जन्‍म लेनेवाले बच्‍चों की जन्‍मकुंडली बनाने का काम पंडितों को सिखला दिया गया होगा , क्‍यूंकि हर घर में लोग पढे लिखे नहीं होते थे और बच्‍चों के जन्‍मवि‍वरण डायरी में नोट नहीं किए जाते थे। बच्‍चों का जन्‍म भी अस्‍पताल में नहीं होता था कि उनका जन्‍मविवरण कहीं मिल पाए।

बडे बडे पंडित और ज्ञानी कभी घूमते फिरते हुए हर गांव में जाया करते ही थे , वे उनमें से कुछ महत्‍वपूर्ण व्‍यक्तियों , जिसमें अच्‍छे और बुरे हर प्रकार के लोग आते थे , की जन्‍मकुंडली देख लिया करते होंगे। देशभर में घूमने से और महत्‍वपूर्ण लोगों की कुंडलियों को उनके अच्‍छे गुणों और दुगुर्णों से जोडने से उनके अनुभव में जो बढोत्‍तरी होती होगी , उससे वे ग्रंथ लिखा करते होंगे। इस तरह ब्राह्मण जन्‍मकुंडली को तो बनाते ही थे , कालांतर में साथ साथ विद्वानों द्वारा लिखे गए ग्रंथों में लिखे फल को भी जातक की जन्‍मकुंडली में उल्लिखित कर दिया करते होंगे।

पर समय के साथ साथ सामाजिक राजनीतिक स्थितियां छिन्‍न भिन्‍न हुईं , सबका जीवन जीने का ढंग बदला। कितनी महत्‍वपूर्ण पुस्‍तकें खो गयी , ब्राह्मणों की विद्या बुद्धि का ह्रास हुआ। बाद में जन्‍मकुंडली के आधार पर की जानेवाली भविष्‍यवाणियों के उतनी सटीक न हो पाने से जन्‍मकुंडली बनाना या मिलाना एक गैर जरूरी कार्य रह गया। हाल के वर्षों में तलाक के बढते दर के कारण विवाह पूर्व जन्‍मकुंडली मिलाने पर ध्‍यान जरूर दिया जा रहा है , पर जन्‍मकुंडली बनवाने या मिलवाने का काम को या उसके अनुसार अपनी जीवनशैली को बदलने को उतना महत्‍व नहीं दिया जाता। यदि कहीं ऐसा हो भी रहा है तो गुणी ज्ञानी से अधिक व्‍यावसायिक क्षमता वाले ज्‍योतिषियों के इस क्षेत्र में दखल होने से कोई फायदा नहीं दिख रहा।

पर यदि ज्‍योतिषी सच्‍चा और ज्ञानी हो तो बच्‍चे के जन्‍म के बाद ही उसकी जन्‍मकुंडली बनवाकर बच्‍चे की चारित्रिक विशेषताएं और उसकी जीवनयात्रा के बारे में अच्‍छी तरह जान लेना चाहिए, ताकि उसके जीवन में आनेवाली समस्‍याओं के प्रति पहले से तैयार रहा जा सके। पर आज अच्‍छे ज्‍योतिषी मिलते ही कहां हैं ?? किसी ज्‍योतिषी की परीक्षा लेने के लिए पहले पिता को अपनी जन्‍मपत्री ज्‍योतिषी से दिखाकर अपने बीते जीवन के बारे में पूछ लेना चाहिए। भूत को बतलाने के लिए बहुत सारे तांत्रिक ज्‍योतिषी बनकर तंत्र मंत्र का सहारा लेकर भूत की सटीक भविष्‍यवाणी करते हैं। पर वे न तो भूत की खास खास घटनाओं का वर्ष बता सकते हैं और न ही भविष्‍य की घटनाओं का समय ।

मेरे ख्‍याल से एक ज्‍योतिषी को समय विशेषज्ञ होना चाहिए , जो आपके भूत को भी सांकेतिक तौर पर ही देखता है और भविष्‍य को भी। वह बच्‍चे की जन्‍मकुंडली बनाने के दौरान बच्‍चे की चारित्रिक विशेषताओं को स्‍पष्‍ट कर देता है , जिसके कारण आप उसकी एक अलग तरह की बनावट को स्‍वीकार करते हुए , उसकी तुलना किसी और बच्‍चे से न करते हुए उसका सही पालन पोषण करें और उसका मनोवैज्ञानिक विकास ठीक ढंग से हो पाए। प्रकृति में अलग अलग तरह के इतने बीज हैं , हम उनकी बनावट पर कभी भी मुहं नहीं बिचकाते , पर बच्‍चों के बनावट की विभिन्‍नता को स्‍वीकारने में परहेज करते है , जन्‍मकुंडली के आधार पर बच्‍चों का स्‍वभाव समझ लें , तो ऐसा करने से हम बच सकते हैं। इसके अतिरिक्‍त एक ज्‍योतिषी बच्‍चे के जीवन में आने वाले उतार चढाव के बारे में पहले ही स्‍पष्‍ट कर सकता है , ताकि उसे जीवनयात्रा में किसी समस्‍या से जूझने में मदद मिल सके।

कल एक पत्रकार आरिफ जी ने भी मेल से पूछा था कि  भूत ,भविष्य और  वर्तमान  को  जानने  की  इच्छा  कब  और  किस  आयु  तक  होनी  चाहिए ? आजकल  वास्तु  ,अंक  ज्योतिष ,रेखा  गणित  या  दूसरी  विधा  में  से  कोंन  सी  सटीक  मानी जाती  है ? जिस  की  जन्म  तिथि  सही  नहीं  क्या  उसका  कोई  भविष्य नहीं  है  या  बताया  नहीं  जा  सकता ?

मैं पहले भी लिख चुकी हूं कि 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' ण्‍क घडी , टार्च और कैलेण्‍डर की तरह आपको रास्‍ता दिखाने और कार्यक्रम बनाने में मदद करता है। इनके उपयोग करने की यदि कोई सीमा है तो वही सीमा भूत ,भविष्य और  वर्तमान  को  जानने  की  आवश्‍यकता की भी मानी जा सकती है। भविष्‍य को जानने की बहुत सारी विधाएं हो सकती हैं , पर सबका अध्‍ययन एक सीमा के अंदर ही हो सकता है। पर भविष्‍य जानने के लिए एकमात्र सटीक विधा ज्‍योतिष है , जिसमें अध्‍ययन की कोई सीमा नहीं। मनुष्‍य का चरित्र , मनुष्‍य का जीवन , मनोविज्ञान , चिकित्‍सा , मौसम , राजनीति , शेयर बाजार , प्राकृतिक आपदा .... कोई भी क्षेत्र ग्रहों के प्रभाव से अछूता नहीं। हर क्षेत्र में इसका अध्‍ययन कर इसे बहुत ही व्‍यापक स्‍वरूप दिया जा सकता है, इसके बहाव को सैकडों वर्षों से अवरूद्ध करने की वजह से आज यह काम के लायक नहीं रह गया है। जिसकी जन्‍म तिथि नहीं लिखी हो , उसका भविष्‍य नहीं हो सकता , ऐसा कैसे कहा जा सकता है ??  भविष्‍य को जानने के लिए अन्‍य संकेतों का सहारा लिया जा सकता है , पर भविष्‍य की चर्चा के लिए जो बात ज्‍योतिष में है , वो भला किसी अन्‍य विधा में कहां ??

मंगलवार, 26 अक्तूबर 2010

ऐसे संयोग सबके जीवन में आते है क्‍या ??

प्रकृति में जो घटनाएं निरंतर नियमित तौर पर देखी जाती है , उसमें तो हम सहज विश्‍वास कर लेते हैं। चूकि घटनाएं किसी न किसी नियम के हिसाब से होती हैं , इसलिए इन नियमों को ढूंढ पाने की दिशा में हमं सफलता भी मिलती जाती है और इसी के कारण आज विज्ञान इतना विकसित है। पर कभी कभी कुछ घटनाएं बहुत ही विरल होती हैं , पूरे एक जीवन में किसी को एकाधिक बार दिखाई भी देती हैं , तो उसपर किसी का गंभीरता से ध्‍यान ही नहीं जाता। यदि उसका ध्‍यान गया भी तो बाकी लोग जिन्‍होने ऐसा कुछ होते नहीं देखा है , वे सहज विश्‍वास भी नहीं कर पाते हैं। इसलिए ऐसी घटनाओं की चर्चा भी नहीं हो पाती और उसके रहस्‍य का पर्दाफाश भी नहीं हो पाता , वे रहस्‍य रहस्‍य ही बने रह जाते है।


मेरे मम्‍मी , पापा और तीनों भाई काफी दिनों से दिल्‍ली में ही रह रहे हैं , इसलिए आजकल दिल्‍ली ही मायके बन गया है। गांव में कभी कभी किसी शादी विवाह या अन्‍य सिलसिले में जाने की आवश्‍यकता पडती है। तीन वर्ष पूर्व जब एक विवाह के सिलसिले में गांव गयी तो चाचाजी की लडकी गांव में ही थी , ढाई महीने के पुत्र को लेकर वह बाहर आयी , तो उसे देखकर मैं चौंकी। मुझे लगा , मैने पहले भी अपने जीवन में बिल्‍कुल उसी रंग रूप का वैसा ही एक बच्‍चा देख चुकी हूं। बच्‍चे की मां यानि मेरी वो बहन बचपन में बिल्‍कुल वैसी थी , चाची ने इस बात की पुष्टि की। बहुत देर बाद मुझे याद आया कि अगस्‍त में जन्‍म लेने वाली उस बहन को ढाई महीने की उम्र में ऊनी कपडों में लेकर नवंबर में चाची मायके से पहली बार आयी थी , तब मैने खुद से 15 वर्ष छोटी उस बहन को पहली बार देखा था , वह लडके के जैसी दिख रही थी। इस संयोग पर वहां बैठे हम सब लोग थोडी देर हंसे , फिर इस बात को भूल गए।


जब अभी पिछले महीने एक काम के सिलसिले में गांव पहुंच गयी , तो वह बहन फिर गांव में ही मिली। मैं अचानक वहां पहुंची थी , उसे लेने उसके पति भी आए हुए थे और वह शाम के ट्रेन से निकलने वाली थी , मतलब संयोग से ही मेरी उससे भेंट हो गयी। मुझे पता तक नहीं था कि उसने एक बिटिया रानी को जन्‍म दिया है , जो पूरे ढाई महीने की हो गयी है। वह बिटिया को लेकर घर के बरामदे में आयी , तो उसे देखते ही पिछली यादें फिर से ताजी हो गयी। पूरे आंगन और आस पडोस के लोग जमा थे , मैने उन्‍हें याद दिलाया तो फिर सब चौंके। दिन तो नहीं गिने , पर मैं बहन की तरह ही उसके दोनो बच्‍चों को लगभग ढाई महीने के लगभग उम्र में पहली बार देख रही थी। यह मात्र संयोग है या इसके पीछे भी कोई रहस्‍य है , मैं नहीं बता सकती। पर ऐसे संयोग जबतब मेरे जीवन में आते रहते है , आपलोगों के जीवन में आते है या नहीं ??

गुरुवार, 21 अक्तूबर 2010

धर्म का असली लक्ष्‍य मानव धर्म की रक्षा होनी चाहिए !!

ब्‍लॉग जगत में सबसे अधिक बहस वाला मुद्दा हमारे धर्मग्रंथ बने हुए हैं। इनके पक्ष और विपक्ष में हमेशा तर्कों का खेल चलता रहता है। ताज्‍जुब तो इस बात का है कि न तो किसी के तर्क काटने योग्‍य होते , और न ही सहज विश्‍वास करने योग्‍य , क्‍यूंकि जो आस्तिक है , उनकी आस्‍था धर्म पर हद से अधिक है , तो जो नास्तिक है उनकी आस्‍था विज्ञान पर हद से अधिक। मेरे हिसाब से धर्म और विज्ञान में जो आधारभूत अंतर है , वो अंतर हमारी संस्‍कृति और पाश्‍चात्‍य संस्‍कृति में भी है , वह यह कि वह यह कि धर्म की दिलचस्‍पी प्रकृति के नियमों को स्‍वीकार करते हुए , उसकी रक्षा करते हुए उसके सापेक्ष जीवन जीने की खोज में होता है , जबकि विज्ञान हमेशा प्रकृति को पराजित कर लेने का दावा करता है।

इस विकासशील युग में धर्म पर आश्रित रहकर जीवनयापन करना मुश्किल है , और हम विज्ञान का सहारा लेने को बाध्‍य हैं , पर प्रकृति के सहारे जीने की बाध्‍यता तो आदिम काल से चलती आ रही है और लाख वैज्ञानिक विकास के बावजूद भी समाप्‍त नहीं हो सकती , इसलिए प्रकृति पर विजय पाने का दावा भी बेकार है। । इसके अलावे विज्ञान के अंधाधुंध और बिना सोंचे समझे किए गए विकास के कारण उत्‍पन्‍न संकट भय जरूर उपस्थित करता है और हम यह सोंचने को बाध्‍य हो जाते हैं कि इससे अच्‍छी तो हमारी परंपरागत जीवनशैली थी , जिसमें प्रकृति और मानव धर्म दोनो सुरक्षित था। पर भारतवर्ष का सनातन धर्म , जो न तो हिंदू , न मुस्लिम , न सिक्‍ख और न ईसाई है , में हमेशा स्‍वतंत्र चिंतन और मनन को स्‍थान दिया है। तभी इसमें धर्म का क्षेत्र भी हमेशा परिष्‍कृत होता रहा , इतने धर्मगुरू हुए , सभी ने समाज के हिसाब से मानव धर्म की अपनी अपनी परिभाषाएं रची।

पर जहां आज एक ओर धर्मगुरू सही मार्ग दिखाने में असमर्थ हैं , वहीं दूसरी ओर वैज्ञानिक भी लोगों को एक सही दिशा नहीं दे पा रहें। हमारा मौलिक चिंतन समाप्‍त हो गया है और हम उसे ही सत्‍य समझ बैठते हैं , जो पाश्‍चात्‍य वैज्ञानिक कहते हैं , जबकि उनका चिंतन न कभी विराट हुआ है और न होगा। पढे लिखे भारतीय उनके विकास को देखकर और अपने को खुद उसी दिशा में जाते देखकर विकास का झूठा भ्रम पाल रहे हैं। यही कारण है कि प्रकृति जोर शोर से उपद्रव मचा रही है और आनेवाले वर्षों में इसके विनाश का विकट स्‍वरूप हमें देखना होगा। मेरा यह नहीं मानना है कि जो धर्मग्रंथों में लिखा है , आज के संदर्भ में उसकी एक एक पंक्तियां सही है , हमने अपने धर्म के अनुसार ही स्‍वतंत्र चिंतन और मनन को स्‍थान देते हुए उनमें से समय के साथ अच्‍छी बातों को चुनचुनकर ग्रहण किया है और बुरी बातों को अस्‍वीकार करते आए हैं। महाकवि कालिदास ने भी कहा था .....

पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि नवमित्यवद्यम् |
सन्तः परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः ||

न तो पुराना ही पुराना होने के कारण सही है , और न नया ही नया होने के कारण ग्राह्य , साधु बुद्धि के लोग दोनो की परीक्षा करके ही स्‍वीकार या अस्‍वीकार किया करते हैं। उलूल जुलूल तर्क देकर पुरानी हर बात को ही अच्‍छा मान लेना या नई हर बात को ही बुरा मान लेना उचित नहीं। धर्म के अनुसार गंगा को मां मानकर उसकी सुरक्षा करें या फिर विज्ञज्ञन के हिसाब से पर्यावरण की दृष्टि से , पर सुरक्षा के उपाय किए जाने चाहिए । यदि हम इस दृष्टिकोण को लेकर चलें , तो धर्म और विज्ञान में टकराव की कोई बात नहीं होगी। धर्म का असली लक्ष्‍य मानव धर्म की रक्षा होनी चाहिए , इस कारण समय समय पर इसका परिवर्तनशील होना आवश्‍यक है , धर्मगुरूओं को इस दिशा में सोचने की आवश्‍यकता है , न कि लकीर के फकीर बने रहने की।

मंगलवार, 19 अक्तूबर 2010

आज हर स्‍तर पर अधिकारों का दुरूपयोग हो रहा है !!

दुर्गापूजा में शहर से बाहर थी , कई दिनों बाद बोकारो लौटना हुआ , इस वर्ष देशभर में दुर्गापूजा के साथ साथ कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स की भी धूम रही। इस कार्यक्रम की सफलता ने जहां पूरी दुनिया के समक्ष भारत का सर ऊंचा किया , वहीं इस आयोजन की आड में पैसों का बडा हेर फेर मन को सालता रहा। भ्रष्‍टाचार के मामलों में हमारा देश दिन ब दिन आगे बढता जा रहा है और कोई इसे सुधारने की कोशिश न‍हीं कर रहा , बस हर कोई एक दूसरे को गाली ही दे रहे हैं। किसी की समस्‍या से दूसरे को कोई मतलब नहीं , क्‍या छोटे और क्‍या बडे , सब अपने अधिकारों का दुरूपयोग ही कर रहे हैं।

अभी हाल में ही एक काम के सिलसिले में अचानक रांची हजारीबाग जानेवाले एन एच पर ही बोकारो से 30 किमी दूर के गांव में जाने की आवश्‍कता पड गयी । परेशानी की कोई बात नहीं थी , मेरे निवासस्‍थान से आधे किमी से भी कम दूरी पर बस स्‍टॉप है , धनबाद और अन्‍य स्‍थानों से आधे आधे घंटे में अच्‍छी आरामदेह बसें रांची की ओर जाया करती हैं , मैं बिना किसी को कहे सुने आराम से तैयार होकर घर से निकल पडी। संयोग से एक बस हजारीबाग के लिए बोकारो से ही खुल रही थी , मैने कंडक्‍टर से एक टिकट बुक करने को कहा , पर जगह का नाम सुनते ही उसने कहा कि आपको सीट नहीं मिलेगी , केबिन में बैठकर जाओ, जबकि‍ उस समय बस पूरी खाली थी।

बसवाले पहले पूरी दूरी तक के यात्री को ही सीट देना चाहते थे और छोटे छोटे दूरी तक के यात्री को इधर उधर बैठाकर, खडे करके भी किराया ले लेते हैं। क्‍यूंकि यदि पूरी दूरी के यात्री न मिले , तो इनसे लाभ कमाया जा सके। मतलब दोनो हाथ में लड्डू , जबकि मालिक को सिर्फ सीट के पैसेंजर के ही किराये दिए जाते हैं , वो भी पूरे नहीं। मैने कहा,'ये क्‍या बात हुई , या तो आप वहां स्‍टॉपेज ही न रखें या फिर यात्रियों को सीट दें। यदि आपको नुकसान पहुंच रहा हो , तो स्‍पष्‍ट कहें कि अगले स्‍टॉपेज तक का किराया देने पर सीट दी जाएगी। आज के आरामपसंद युग में थोडा अधिक किराया देना मुश्किल भी नहीं।' पर उन्‍हें मेरी बात सुनने में कोई दिलचस्‍पी नहीं थी। उन्‍होने न मुझसे अधिक किराया लिया और न ही मुझे मेरा पसंदीदा आगे का सीट मिला, यह कहते हुए कि वह सीट बुक है और आपका तो मैडम बस आधे घंटे का सवाल है। उनके कहने के स्‍टाइल से लगा कि वे मजबूर हैं , पर यह देखकर आश्‍चर्य हुआ कि मेरे उतरने उतरने तक उस सीट पर कोई भी पैसेंजर नहीं बैठा।

वहां पहुंचने पर जिस सरकारी ऑफिस में मेरा काम था , वहां मुझे कुछ पुराने कागजात निकलवाने थे। मैने एक सज्‍जन से पहले ही इस बात से ऑफिसवालों को आगाह करवा चुकी थी , इसलिए वे तैयार थे। मेरे पहुंचते ही उन्‍होने पुराने फाइलों को खंगाला और बीस से पच्‍चीस मिनट के अंदर मेरे कागजात मुझे सौंप दिए। मेरे लिए कोई दो नंबर का कार्य उन्‍होने नहीं किया था , इस काम को करना उनका कर्तब्‍य था , क्‍यूंकि इसके लिए सरकार उन्‍हें हमारे ही द्वारा दिए गए कर से वेतन दिया करती है। पर मुझे यह देखकर आश्‍चर्य हुआ कि काम के होते ही वे स्‍टाफों को मिठाई खिलाने के बहाने से इशारे से कुछ पैसों की मांग करने लगें। 

मेरे मन को जो बात कचोटती रही , वह यह कि जिन्‍हें भी जो अधिकार मिल रहे हैं , वह उसी का दुरूपयोग कर रहा है और ऊपरवाले को गाली दे रहा है। मगर यदि वो ऊपर होता , तो वो भी ऐसा ही करता। वे सरकारी कर्मचारी हैं , हर महीने मासिक तनख्‍वाह मिलती है , पर जो उनके सामने होते हैं , वे कभी कभी लाचार भी होते होंगे। क्‍या ही अच्‍छा होता कि हम सामनेवाले की समस्‍याओं को भी समझते , ईमानदारी हममें कूट कूट कर भरी होती, हर स्‍तर पर जिम्‍मेदारियों का सही ढंग से पालन किया जाता। आज हम किसी को गाली देने से नहीं चूकते  , पर जब मुझे कोई अधिकार मिलता है , उसका दुरूपयोग करने लगते हैं।

बुधवार, 13 अक्तूबर 2010

हनुमान पचासा और हनुमान कृपाष्‍टक के बाद अब हनुमान जी की आरती भी

मेरे ब्‍लॉग में आप पहले से हमारे मित्र और पडोसी पं श्रद्धानंद पांडेय जी का हनुमान पचासा और हनुमान कृपाष्‍टक पढ चुके हैं। वैसे तो उनकी बहुत सारी अन्‍य रचनाएं भी प्रकाशित हो चुकी है , यहां तक कि भोजपुरी में रामचरित मानस तक भी , पर मेरे पास उनकी जो पुस्‍तक है , उसमें हनुमान जी की आरती भी लिखी है , जो आज प्रस्‍तुत कर रही हूं .... ......

जय महावीर मारूतनंदन ,
आरती नमन स्‍वीकार करो।
संकटमोचन संकट हर लो ,
बबाधाओं का प्रतीकार करो।।

सागर को पार किया तुमने,
अरिपुर को छार किया तुमने ,
सबका उपकार किया तुमने ,
इस जन का भी उद्धार करो।।

जय कपिवर द्राणाचलधारी ,
ररघुनायक तक हैं आभारी ,
शरणागत के दुख भयकारी ,
सुखमय सबका संसार करो।।

बलवान निरोग रहे काया,
व्‍यापे न कभी कलि की माया,
मन हो प्रभुपद में लपटाया,
ऐसा वरदान उदार करो।।

मंगलवार, 12 अक्तूबर 2010

ईश्वर की सत्ता में यकीन रखने वाले मित्रों से एक अपील!!! .... का जबाब

कल आनंद सिंह जी के एक नए ब्‍लॉग क्रांतिकारी विचार में एक कविता पढने को मिली , जिसमें उन्‍होने ईश्‍वर की सत्‍ता में यकीन रखनेवाले मित्रों से एक अपील की थी ......


उनसे पूछना कि जब हीरोशिमा और नागासाकी पर
शैतान अमेरिका गिरा रहा था परमाणु बम,
तो मानवता का कलेजा तो हो गया था छलनी छलनी ,
लेकिन महाशय के कानों में क्यों नहीं रेंगी जूँ तक?

फिर उनसे पूछना कि जब दिल्ली की सड़कों पर
कोंग्रेसी राक्षस मासूम सिखों का कर रहे थे कत्लेआम,
तब यह धरती तो काँप उठी थी 
लेकिन बैकुंठ में क्यों नहीं हुई ज़रा सी भी हलचल?

उनसे यह भी पूछना कि जब गुजरात में
संघ परिवार के ख़ूनी दरिंदों द्वारा
मुस्लिम महिलाओं का हो रहा था सामूहिक बलात्कार,
तब इंसानियत तो हो गयी थी शर्मसार
पर जनाब के रूह में क्यों नहीं हुई थोड़ी भी हरकत?



मैने कल ब्‍लॉग4वार्ता में भी इस पोस्‍ट की चर्चा की थी , ताकि उन्‍हें जबाब मिल पाए। पर इतने पाठकों में से किसी से भी उन्‍हें संतुष्टि होने सा जबाब नहीं मिला। मैं ईश्‍वर की सत्‍ता में विश्‍वास रखती हूं , पर यह मानते हुए कि वह भी मनमानी नहीं कर सकता। वह भी प्रकृति के नियमों से ही बंधा है , इसलिए अधिक पूजा पाठ या कर्मकांड के कारण उसे खुश करके सांसारिक या अन्‍य प्रकार की सफलता प्राप्‍त की जा सकती है , यह हमारा भ्रम है। ऐसे कर्मकांडों को मैं महत्‍वपूर्ण मानती हूं , जब उससे समाज का या पर्यावरण का भला हो रहा हो। सामाजिक सौहार्द बिगाडने वाला , चारित्रिक रूप से कमजोर बनाने वाला और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाला कर्मकांड मुझे बिल्‍कुल पसंद नहीं। इसलिए मेरे द्वारा दिया जाने वाला जबाब लेखक को संतुष्टि नहीं भी दे सकता, पर फिर भी अपने तर्क के हिसाब से इसका जबाब देना आवश्‍यक समझूंगी। 

एक पिता के लिए अपना संतान बहुत प्‍यारा होता है , पर उसके सही विकास के लिए डांट फटकार और मार पीट करने को भी बाध्‍य होता है। वर्ष में एक या दो दिन की डांट मार से वह या आंख दिखाने से वह पूरे वर्षभर पिता के भय से भयभीत रहता है और किसी भी गलत काम की हिम्‍मत नहीं कर पाता। उसी प्रकार समय समय पर प्रकृति को भी कुछ ऐसी व्‍यवस्‍था रखनी पडती है , ताकि इतने बडे संसार का काम सुचारू ढंग से चल सके। प्रकृति को ही कुछ लोग ईश्‍वर माना करते हैं । एक बच्‍चे के पालन पोषण में बहुत देखभाल की आवश्‍यकता होती है , यदि देखभाल के अभाव में एक दो बच्‍चे मौत के मुंह में न जाएं या अविकसित न रहें , तो बच्‍चों को ढंग से पालने की झमेले में कौन फंसना चाहेगा ??

प्रतिदिन करोडों व्‍यक्ति कहीं न कहीं आ जा रहे हैं , खतरे का काम कर रहे हैं , छिटपुट एक दो दुर्घटनाएं घटती हैं , सैकडों के जान चले जाते हैं। यदि समय समय पर ये दुर्घटनाएं नहीं हो , तो सोंचिए क्‍या होगा ?? न कोई यातायात के नियमों का पालन करे , न खुद पर नियंत्रण और न ही वाहन को सुरक्षित रखने का प्रयास। पिछले वर्ष जयपुर के पेट्रोल पंप में आग लगी थी , उस वक्‍त भी किसी नास्तिक ने ऐसा ही सवाल उठाया था। ईश्‍वर जब किसी को बुरा नहीं चाहता , तो ऐसी घटनाएं किसके अच्‍छाई के लिए घटा करती है ?? पर एक स्‍थान पर लीकेज की इस बडी घटना में भले ही अरबों का नुकसान हुआ हो , पर उसके बारे में सुनकर ही दुनियाभर के पेट्रोलवाले सावधान हो गए होंगे और उससे सौगुणे की देख रेख सही ढंग से होने लगती है।

भले ही कभी कभी निर्दोष के कष्‍ट को देखकर हम परेशान हो जाते है , पर प्रकृति में कोई भी काम बिना नियम के नहीं होते ,  उसमें से कुछ को हम समझ चुके हैं और कुछ की खोज निरेतर जारी है। । पर यदि खतरे की कोई संभावना ही न रहे , तो दुनिया में कोई भी सावधानी नहीं बरत सकेगा। इसलिए ईश्‍वर या प्रकृति जो भी करती है , उसका उद्देश्‍य शुभ हुआ करता है।  यदि प्रकृति में कोई भी काम बिना नियम के होते , तो आज विज्ञान का विकास न हो पाता। विज्ञान इन नियमों को ही तो प्रकृति के नियमों का सहारा लेकर मानव जीवन को सरल बनता है। सभी जीवों में मनुष्‍य ही ऐसा है , जो प्रकृति के रहस्‍यों को ढूंढने में समर्थ है , क्‍यूंकि उसके मस्तिष्‍क की खास बनावट है , जो उसने प्रकृति से ही पायी है।

कोई गलत काम करने से पूर्व प्रकृति की ओर से हमारे दिमाग में बार बार संदेश जाता है , 'हम गलत कर रहे हैं' , पर मनुष्‍य गलत काम करने के वक्‍त उसे दबाने की पूरी कोशिश करता है। कोई भी जीव अपनी प्रकृति के विरूद्ध काम नहीं करता , पर प्रकृति ने मनुष्‍य को अच्‍छे उद्देश्‍य के लिए जो दिमाग दिया है , उसका वही दुरूपयोग कर रहा है। जहां गल्‍ती बडी करनी होती है , वहां आत्‍मा के इस शोर को दबाने के लिए वह मदिरा का सेवन करना है , होश खोकर गलत काम किया करता है , और सारी जबाबदेही ईश्‍वर के मत्‍थे । प्रकृति या ईश्‍वर से कोई प्रश्‍न पूछने की आवश्‍यकता नहीं , आज वहीं हमसे दस प्रश्‍न पूछ सकती है।  वह उसने जितना दिया वह कम नहीं। उसे जिम्‍मेदारी पूर्वक चलाना नहीं आता , ईश्‍वर पर दोषारोपण करना तो बहुत आसान है।  

रविवार, 10 अक्तूबर 2010

आज की सरस्‍वती बिना लक्ष्‍मी के क्‍यूं नहीं रह पाती ??

प्राचीन कहावत है कि लक्ष्‍मी और सरस्‍वती एक स्‍थान पर नहीं रह सकती, यानि कि एक ही व्‍यक्ति का ध्‍यान कला और ज्ञान के साथ साथ भौतिक तत्‍वों की ओर नहीं जा सकता , इसलिए प्राचीन काल में पैसे से किसी का स्‍तर नहीं देखा जाता था, बल्कि भौतिक सुखों का नकारकर किसी प्रकार की साधना करने वालों को , ज्ञान प्राप्‍त करने वालों को धनवानों से ऊंचा स्‍थान प्राप्‍त होता था। यहां तक कि उस वक्‍त राजा भी ऋषि महर्षियों के पांव पखारा करते थे और अपने पुत्रों को ज्ञान प्राप्ति के लिए उनके पास भेजा करते थे। उच्‍च पद में रहनेवाले लोगों की संताने हर प्रकार के ज्ञान के साथ साथ नैतिक और आध्‍यात्मिक ज्ञान भी अर्जित करते थे। पर क्रमश: भौतिकवादी युग के विकास के साथ ही संपन्‍न लोग कला और साधना में रत लोगों का शोषण करने लगे ।

आज पूर्ण रूप से जड जमा चुके भौतिकवादी युग में बिना डिग्री के या बिना व्‍यवसायिक बुद्धि के कला और ज्ञान की साधना का कोई मूल्‍य नहीं , सच्‍चे साधक तो कहीं छुपे पडे होते हैं , व्‍यावसायिक तौर पर सफल ज्ञानी और धनवान के मध्‍य अपने को महत्‍वपूर्ण समझने की प्रतिस्‍पर्धा है। हमारे परिचय के एक व्‍यक्ति ने बोकारो में एक बडा नर्सिंग होम खोला था , इसी शहर के एक ख्‍यातिप्राप्‍त सर्जन उनके यहां काम करने के इच्‍छुक थे। नर्सिंग होम के संचालक की भी इच्‍छा थी कि वे उनके यहां काम करे। चूंकि दोनो ही मेरे परिचित थे , मैने दोनो से बातचीत भी की और उन्‍हें एक दूसरे का फोन नं भी दिया। पर पहल कौन करे , लक्ष्‍मी और सरस्‍वती में ऐसी टकराहट हो गयी थी कि दोनो 'पहले आप' 'पहले आप' कहते रह गए।

ऊपर के उदाहरण में सरस्‍वती ने लक्ष्‍मी से टक्‍कर लेने की हिम्‍मत इसलिए की , क्‍यूंकि उनके पास डिग्री है। आर्थिक रूप से संपन्‍न परिवारों के या व्‍यावसायिक बुद्धि रखनेवाले कुछ कलाकार भी समृद्ध लोगों से टक्‍कर ले सकते हैं , पर बाकी कलाकारों को तो धनवानों की कृपादृष्टि पर बने रहने को बाध्‍य होना पडता है। उन कलाकारो , अन्‍य प्रकार के साधकों और ज्ञानियों की सामाजिक प्रतिष्‍ठा का अभी तक लगातार ह्रास होता जा रहा है , जो समाज के लिए बहुत लाभदायक हो सकते थे। अपनी प्रतिष्‍ठा को बनाए रखने के लिए उन्‍हें साधना में कमी कर अपनी पारिवारिक जिम्‍मेदारियों के निर्वाह के लिए अलग काम करने को बाध्‍य होना पडता है।

आज के व्‍यावसायिक युग में सांसारिक सफलता प्राप्‍त करनेवालों का गुमान देखते ही बनता है , कलाकारो , बुद्धिजीवियों का उनके लिए कोई महत्‍व नहीं होता। सांसारिक सफलताओं की अनदेखी कर जो व्‍यक्ति साधना के क्षेत्र में रह जाते हैं , उनकी मानसिकता एक गुलाम की हो जाती है। जो अपने परिवार की जबाबदेहियों को हल करने में असमर्थ हों , उसका आत्‍मविश्‍वास समाज का कल्‍याण करने में नहीं हो पता। इसके परिणामरूवरूप उन नीम हकीम खतरे जान कलाकारों और दिखावटी गुरूओं की बन आती है , जो व्‍यावसायिक बुद्धि रखते हैं और अपने दिखावटीपन से समाज को लूटने में कामयाब तो होते ही हैं , धर्म , ज्ञान और साधना के प्रति समाज के विश्‍वास तो तोडने में भी सक्षम होते हैं। ऐसे लोग समाज के विश्‍वास का तबतक लगातार फायदा उठाते हैं , जबतक समाज का एक एक वर्ग उनके चंगुल में न फंस जाए।

आज जिसके पास लक्ष्‍मी नहीं , वह ज्ञानार्जन तक के योग्‍य ही नहीं। और जिसने ज्ञानार्जन नहीं किया , वह मेहनत मजदूरी करने को बाध्‍य है। सारे कोर्स प्रोफेशनल हो गए हैं , जिन्‍हें पढने के लिए पैसे चाहिए और ज्ञानार्जन के बाद पैसों का ढेर लग सकता है। आज की सरस्‍वती बिना लक्ष्‍मी के नहीं रह सकती , इसलिए तो गुण और ज्ञान प्राप्‍त करनेवाले भी गुणहीन और ज्ञानहीन हैं।  लाखों में पढाई कर करोडों में कमाई करनेवाले व्‍यक्ति से उनकी खुद की और उनके कंपनी के विकास की उम्‍मीद रखी जा सकती है , पर समाज या देश की नहीं। और जो अपने ज्ञान के बल बूते देश का कल्‍याण कर सकते हैं , वे कोने में पडे कराह रहे होते हैं।

शुक्रवार, 8 अक्तूबर 2010

जबतक ग्रहों के जड चेतन पर पडनेवाले सही स्‍वरूप का ज्ञान नहीं हो .. दुनियाभर में अंधविश्‍वास कैसे रूके ??

कल दिब्‍या जी ने एक पोस्‍ट लिखा था ... इतना मुश्किल भी नहीं आपको समझना --आप तो मेरी ही तरह भावुक हैं...न्‍यूमरोलोजी पर आधारित यह पोस्‍ट पाठको को आकर्षित करने में सक्षम रहा है , पर ऐसे पोस्‍ट परंपरावादियों और आधुनिक विचार वालों के मध्‍य वाद विवाद का केन्‍द्र बन ही जाते हैं।  पर ज्‍योतिष , तंत्र मंत्र , परंपरा , ईश्‍वर , आदि मामलों में बहस का कभी निर्णय न अब तक निकला है और न ही निकलेगा। सामान्‍य परिस्थिति में किसी झंझट को सुलझा पाना कमजोर पक्ष के बूते की बात ही नहीं , मजबूत पक्ष ही झंझट को सुलझा सकता है , इसलिए झंझट नहीं सुलझा करता ,  क्‍यूंकि इसमें मजबूत पक्ष को घाटे की गुंजाइश रहती है। आधुनिक विज्ञान आज मजबूत स्थिति में है , जबतक सामाजिक , राजनीतिक स्थिति को क्षत विक्षत और हमारी जीवनशैली को पूरी तरह प्रदूषित न कर दे , न तो परंपरागत ज्ञान को स्‍वीकारेगा और न अपनी हार  स्‍वीकार करेगा। पर परंपरागत ज्ञान का कोई आधार नहीं , ऐसा तो नहीं माना जा सकता , पर नए रिसर्च के अभाव और पुरानी पीढी के समाप्‍त होने से उसका बडा नुकसान तो हुआ है। 

19 जन्‍म तारीख होने से मेरा भी मूलांक 1 ही है, यह संयोग भी हो सकता है कि वहां लिखी बातें मेरे व्‍यक्त्वि से मिलती है, पर ज्‍योतिष में रिसर्च के बाद निष्‍कर्ष इतने सूक्ष्‍म आने लगे कि मुझे न्‍यूमरोलोजी बहुत स्‍थूल लगने लगा है। वैसे महत्‍वाकांक्षा का भी डिविजन होना चाहिए , पैसे कमाने की, राज करने की , ज्ञानार्जन करने की, दुनिया के जीवनशैली को बदलने की .. महत्‍वाकांक्षा तो हर प्रकार की हो सकती है। इसकी जानकारी भी तो आवश्‍यक है , जैसे कि मेरे बारे में जिद्दी लिखा गया, मैं ज्‍योतिष के नियमो की पूरी जांच पडताल के बाद ही एक कदम आगे बढती हूं , पर भविष्‍यवाणी करने के लिए लिए गए अपने सिद्धांतों पर अटल रहती हूं, भले ही रिजल्‍ट में एक दो जगह खामी आ जाए। अभी पृथ्‍वी के प्रक्षेपण में ही तकनीकी गडबडी आ गयी , इतने विकसित विज्ञान मे सिद्धहस्‍त पूरी टीम के द्वारा गल्‍ती हो सकती है  , तो हमारे व्‍यक्तिगत ज्ञान  को अपवाद का मौका मिलना ही चाहिए। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि मुझे अन्‍य किसी भी जगह काम्‍प्रोमाइज करने में कठिनाई होती है !!


कालिदास ने कहा था ....

पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि नवमित्यवद्यम् |
सन्तः परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः ||



अर्थात न पुरानी होने से सबकुछ बुरा है .. न नया होने से सबकुछ अच्‍छा .. बुद्धिहीन दूसरों की बुद्धि से चलते हैं .. जबकि बुद्धिमान परीक्षा करते हुए।

मेरा यह मानना है कि जबतक दुनिया में दो प्रकार के लोग बने रहेंगे .. यानि एक नए को ही अच्‍छा कहता रहे और एक पुराने को ही .. दोनो बुद्धिहीन की श्रेणी में दुनिया की खुशहाली ढूंढने में असमर्थ रहेंगे .. क्‍यूंकि बुद्धिमान दोनो के मध्‍य का रास्‍ता निकालने की कोशिश करता है .. ताकि संसार का कल्‍याण किया जा सके!!


इसी पोस्‍ट में एक टिप्‍पणी में डॉ रूपेश श्रीवास्‍तव जी भी सही कह रहे हैं सत्य वही होता है जिसे हम मानते हैं जिसे मानते ही नहीं वह सत्य कैसे हो सकता है कई जटिल बीमारियों के इलाज नहीं होने के बावजजूद भी डॉक्‍टर का ज्ञान सत्‍य है .. क्‍यूंकि इसकी पढाई के लिए टैलेंट के बल पर किसी का दाखिला होता है .. सरकार द्वारा उसके पीछे लाखों करोडों खर्च होता है .. दुनिया भर के रिसर्च होते हैं .. सरकारी तनख्‍वाह के भरोसे या लोगों के विश्‍वास के भरोसे जीवनभर एक डॉक्‍टर के सामाजिक स्‍टेटस के बढते जाने की उम्‍मीद है .. पर परंपरागत विज्ञान और उनके नियमों को एक सिरे से नकार दिया गया है .. उनके विकास के लिए न तो प्रतिभा और न ही खर्च हो रहा है उस ओर .. जिसका जीवन सामान्‍य तौर पर चलता रहता है उसके लिए तो प्राकृतिक नियम एक पहेली ही हैं .. पर जिनके जीवन में गंभीर विपत्ति आती है .. वे इसा कोई कारण नहीं ढूंढ पाते .. लोग दौडेंगे ही नीम हकीम खतरे जान ज्‍योतिषियों के पास .. जबतक विज्ञान उस ज्ञान तक पहुंचेगा कि ग्रहों या अन्‍य प्राकृतिक नियमों का प्रभाव हमपर पडता है .. और जबतक ग्रहों के पृथ्‍वी के जड चेतन पर पडनेवाले सही स्‍वरूप की विवेचना नहीं होगी .. तबतक दुनियाभर में अंधविश्‍वास फैलने से रोका ही नहीं जा सकता !!