सोमवार, 23 अगस्त 2010

क्‍या टेलीविजन के माध्‍यम से सिर्फ धर्म और ज्‍योतिष ही अंधविश्‍वास फैला रहे हैं ??

कई दिन पूर्व एक खास कार्यक्रम के लिए दूसरे शहर में जाना हुआ , पर जाने के बाद ही कार्यक्रम के रद्द होने की सूचना मिली। वैसे सामान्‍य तौर पर टी वी देखने की मेरी आदत नहीं, कितने दिन पहले मैं टी वी के सामने बैठी होऊंगी , वो भी मुझे याद नहीं , पर वहां मुझे टी वी देखकर ही दिनभर का समय काटना पडा। टी वी के इतने सारे चैनल , दिन भर बदलती रही , पर शायद ही आधे घंटे कहीं मन लग सका हो । पर दिनभर में ये तो पता चल गया कि आज टी वी चैनल किस कदर अंधविश्‍वास परोस रहे हैं। मेरी समझ में आ गया कि शायद यही वजह है कि आज आम आदमी धर्म और ज्‍योतिष के नाम से चिढ जाता है।

एक से एक जंत्र और मंत्र , आम जन के कल्‍याण के लिए बने हुए हैं , इतना ही नहीं , सारे सब्सिडी मूल्‍य के साथ उपलब्‍ध भी हैं , और इसके प्रचार के लिए एक से बढकर एक स्‍टार तक लगे हुए हैं। इनका उपयोग करने से आपके यहां सरस्‍वती और लक्ष्‍मी दोनो की कृपा शुरू हो जाएगी  , यदि आप प्रतियोगिता की तैयारी कर रहे हैं , तो निश्चित तौर पर सफलता मिलेगी , नौकरी कर रहें हो , तो प्रोमोशन निश्चित और व्‍यवसाय कर रहे हों तो इसमें भी बडी सफलता। इन यंत्रों का उपयोग करके एक भी व्‍यक्ति हानि में नहीं रह सकता , जितने पहन लें , सबको लाभ ही लाभ। छोटी छोटी संस्‍था को इतनी मेहनत करनी पड रही है , फिर भी लक्ष्‍य को नहीं प्राप्‍त कर पा रहें हैं। इसकी जिम्‍मेदारी को सरकार ले ले और एक एक व्‍यक्ति तक इस यंत्र को पहुंचा दे , तो भारत को तरक्‍की में देर नहीं हो , पूरे विश्‍व में भारत का राज होगा।


प्रकृति ने अंधकार के साथ प्रकाश बनाया , मीठा के साथ कडवा , फूल के साथ कांटे और दोस्‍ती के साथ दुश्‍मनी। इनमें से एक को भी समाप्‍त कर दिया जाए , तो दूसरे का कोई महत्‍व नहीं रह जाएगा। भले ही हम अपनी सोंच से ऋणात्‍मक पहलुओं को अलग कर दें , पर जबतक दुनिया है , वास्‍तविक तौर पर सारी ऋणात्‍मक बाते हमारे समक्ष मौजूद रहेंगी। हम हारेंगे भी , गिरेंगे भी , मरेंगे भी , असफलता को जीवन से दूर करना चाहें , तो हमें प्रकृति से ही जीतना होगा , जो किसी भी युग में संभव नहीं। पर टेलीवीजन में अपनी सामग्रियों का प्रचार करनेवालों ने तो मानों प्रकृति को ही जीत लिया है , उनका एक यंत्र हर कष्‍ट को दूर कर सकता है , इसका कितने लुभावने ढंग से ये प्रचार कर रहे हैं। आज पैसों के लिए लोग क्‍या न कर बैठें ??


शायद यही कारण है कि आज धर्म और ज्‍योतिष के नाम से ही लोगों को चिढ है। पर आज सिर्फ इन्‍हीं के कारण अंधविश्‍वास नहीं फैल रहा है , आज का व्‍यावसायिक युग इसके लिए जिम्‍मेदार है। ये अंधविश्‍वास फैलाकर भी समाज का कितना बडा नुकसान कर रहे हें , यदि इनके अंधविश्‍वास फैलाने पर दो से पांच हजार खर्च करके कोई इनके यंत्र खरीदता है , तो कुछ नहीं पाकर भी एक पूरा परिवार अपनी श्रद्धा की वजह से मानसिक शांति प्राप्‍त करता है। निरंतर हार के पश्‍चात थकी हुई आपनी शक्ति के बावजूद एक बार रिस्‍क लेने की उसकी हिम्‍मत और बढ जाती है। और कभी कभी इसका फल सकारात्‍मक भी दिख सकता है। यदि उसके मन में विश्‍वास हो , तो इस यंत्र के फल का इंतजार करता हुआ एक सकारात्‍मक शक्ति के सहारे वह आगे बढने लगता है।


पर हमारे स्‍टार कलाकार करोडों अरबों की लालच में पडकर रोग उत्‍पन्‍न करने वाले पेय पदार्थों का , हानिकारक प्रोडक्‍टों का , बिगडी जीवनशैली का जो संदेश देते नजर आते हैं , वो अधिक अंधविश्‍वास फैला रहे हैं। छोटे छोटे बच्‍चे जिन महापुरूषों की नकल करना चाहते हैं , वो ही समाज में गलत संदेश दे रहे हैं । जिन नेताओं से , जिन डॉक्‍टरों से , जिन प्रोफेसरों से , जिन वकीलों से , जिन शिक्षकों से , जिन व्‍यवसायियों से हमारे आनेवाली पीढी को अच्‍छा संदेश मिलना चाहिए था , वो ही आज कडवाहट का बीज बो रहे हैं। आज हमें हर क्षेत्र में बढती व्‍यावसायिकता को समाप्‍त करने की आवश्‍यकता है , हर क्षेत्र में नैतिक मूल्‍यों को पुनरस्‍थापित करने की आवश्‍यकता है , टेलीविजन के माध्‍यम से सिर्फ धर्म और ज्‍योतिष ही अंधविश्‍वास नहीं फैला रहे , सबको जागरूक होने की आवश्‍यकता है।
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