बुधवार, 29 सितंबर 2010

हैती के बाद नवंबर 2010 के मध्‍य में एक और बडे भूकम्‍प की आशंका

मेरे पुराने पाठकों में से सबों को 11 जनवरी का एक आलेख याद ही होगा , जिसमें मैने 16 जनवरी को एक बडे भूकम्‍प के आने की आशंका जतायी थी , इसपर बहुत पाठकों ने सोंचा था कि मैं प्रतिदिन आनेवाली भूकम्‍प की घटना को ग्रहों का प्रभाव सिद्ध करने की बेमतलब कोशिश कर रही हूं,पर इसी दिन हैती में आए भूकम्‍प ने मेरा साथ देकर ग्रहों के पृथ्‍वी पर पडनेवाले प्रभाव को साबित कर दिया था। 200 साल के सबसे भयंकर भूकंप में कैरेबियाई देश हैती में हजारों लोग मलबे के नीचे दब गए थे। भूकंप में हैती का राष्ट्रपति भवन भी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था। संयुक्त राष्ट्र के पीसकीपर का हेड क्वार्टर, नेशनल पैलेस(राष्ट्रपति भवन ), एक अस्पताल और कुछ महत्वपूर्ण बिल्डिंग इस भूकंप में बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुई थी। 

दो तीन वर्षों के ब्‍लॉग लेखन में मौसम को लेकर मैं तो अक्‍सर भविष्‍यवाणियां करती रहती हूं , पर भूकम्‍प को लेकर मेरे द्वारा यह पहली भविष्‍यवाणी की गयी थी , जिसके तिथि और समय के निर्धारण में तो मुझे पूरी कामयाबी मिली थी , पर स्‍थान के बारे में मेरी गणना में चूक रह गयी थी। इस घटना पर ब्‍लॉग जगत का पूरा ध्‍यान गया था और चार दिनों तक हमारी बहस भी चली थी। जहां कुछ ने मेरी भविष्‍यवाणी को सही मानते हुए मुझे और सटीकता के साथ भविष्‍यवाणी करने के लिए शुभकामनाएं दी थी , वहीं कुछ पाठकों ने भूकम्‍प के बारे में मेरे स्‍थान की कमजोरी को दिखाते हुए और इस भविष्‍यवाणी की सार्थकता के बारे में प्रश्‍न भी किया था। 

वास्‍तव मे इतने बडे ब्रह्मांड में आकाशीय पिंडों की खास खास स्थिति , उनके मध्‍य खास कोणिक दूरी से पृथ्‍वी पर कुछ विशेष प्रकार की घटनाओं का अंदाजा लगता है। पृथ्‍वी पर होनेवाली हलचल का पूरा संबंध ब्रह्मांड में ग्रहों की खास स्थिति से है, इसलिए इसके आकलन में दिक्‍कत नहीं आती , साथ ही सटीकता बनी रहती है। पर जहां तक पृथ्‍वी के खास भाग के प्रभावित होने का प्रश्‍न है , हमें कामयाबी नहीं मिल पाती। 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के नियमों की माने तो 2010 में ही आनेवाले समय में एक और बडे भूकम्‍प की आशंका नजर आ रही है , नवंबर के मध्‍य में आसमान में मौजूद ग्रहीय स्थिति पृथ्‍वी पर एक बडे भूकम्‍प की जबाबदेह हो सकती है। इस भूकम्‍प में बडे पैमाने पर नुकसान की भी संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।

नवंबर के मध्‍य में भूकम्‍प की संभावना की खास तिथि , समय और स्‍थान की चर्चा करते हुए इसपर और विस्‍तार से जानकारी देते हुए एक पोस्‍ट नवम्‍बर के प्रथम सप्‍ताह में लिखने की कोशिश करूंगी। हालांकि मैने पहले भी स्‍पष्‍ट किया है कि जितनी सटीकता से किसी घटना की तिथि और समय की जानकारी दी जा सकती है , उतनी सटीकता घटना के स्‍थान में नहीं हो सकती है। इसकी वजह पृथ्‍वी की इतनी तेज गति मानी जा सकती है , दैनिक गति के कारण पृथ्‍वी 1669 किमी प्रतिघंटे के रफ्तार से चलती है। इसके अलावे वार्षिक गति के कारण प्रतिघंटे 108,000 किमी की दूरी पार करती है , जिसके कारण इसका कौन सा भाग कब कहां और कैसे गुजर जाता है , इसका अंदाजा लगाना हम जैसे संसाधन विहीनों लिए काफी मुश्किल होता है। लेकिन फिर भी मैं अपनी पूरी जानकारी से स्‍थान का पता लगाने की कोशिश कर रही हूं।

वैसे मोटा मोटी तौर पर मेरे द्वारा अबतक जो गणना हुई है , उसमें भारतवर्ष के आक्षांस और देशांतर का स्‍थान किसी भी कोण से नहीं आ रहा है। फिर भी भूगर्भशास्त्रियों से उम्‍मीद रखूंगी कि वो इसका ध्‍यान रखे। प्रकृति अचानक किसी भी घटना को अंजाम नहीं देती , किसी प्रकार की दुर्घटना से पहले वह बारंबार किसी न किसी प्रकार का संकेत दिया करती है। पर हम मनुष्‍य उसके संकेत को नहीं समझते और अंत में अनिष्‍ट हो ही जाया करता है। यदि पृथ्‍वी के किसी भाग में नवंबर के मध्‍य में एक बडा भूकम्‍प आना है , तो उस भाग में आनेवाले डेढ महीने के अंदर भूगर्भ शास्त्रियों को हलचल तो अवश्‍य दिखाई पडेगा , आवश्‍यकता है इस बात पर ध्‍यान देने की , ताकि उस क्षेत्र के कम से कम लोगों को नुकसान पहुंच सके। वैसे मैं अभी भी इस बात के लिए अध्‍ययनरत हूं कि इस बारे में मुझे अधिक से अधिक जानकारी मिल सके।

मंगलवार, 28 सितंबर 2010

अब से मौसम संबंधी भविष्‍यवाणियों की कॉपियां मौसम विभाग और मानव संसाधन विकास मंत्रालय को भेजी जाएंगी !!

 24 सितंबर तक देश के अधिकांश हिस्‍सों में हो रही बारिश और इसके कारण नदियों में बाढ के कारण बना अस्‍त व्‍यस्‍त जनजीवन 25सितंबर के बाद बारिश के बंद होते ही सामान्‍य होने लगा , जैसा कि मैने 16 सितंबर के अपने आलेख में लिखा था। दो तीन वर्षों से इस प्रकार के आकलन करते रहने से हमारे ब्‍लॉग के पुराने पाठकों को तो आश्‍चर्य नहीं हुआ होगा , पर इस ब्‍लॉग से जुडे एक नए पाठक काफी प्रभावित हुए। उनके अनुसार मेरे पाठक कितने भी बढ जाएं , आपकी मदद नहीं कर सकते , हमारे इस विधा की जानकारी सरकार को होनी चाहिए , जिससे दूर तक की मौसम की भविष्‍यवाणी अच्‍छी तरह की जा सकती है। उनके कहने पर आज से मैने अपनी मौसम संबंधी भविष्‍यवाणियों की एक कॉपी मौसम विभाग और दूसरी कॉपी मानव संसाधन विकास मंत्रालय को भेजने का निश्‍चय किया है। इन दोनो को आज भेजी गयी कॉपी इस प्रकार है .......

30 वर्षों से हमारी संस्‍था 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिषीय अनुसंधान केन्‍द्र' ने ग्रहों की गति के आधार पर भारत के मौसम से तालमेल बिठाते हुए कुछ आश्‍चर्यजनक तथ्‍य प्राप्‍त किए हैं , जिसके आधार पर मौसम से संबंधित दूर दूर तक की भविष्‍यवाणियां की जा सकती हैं। इसी आधार पर मैं अपने ब्‍लॉग http:/sangeetapuri.blogspot.com पर कई वर्षों से अक्‍सर मौसम से संबंधित भविष्‍यवाणियां करती आ रही हूं।

इस वर्ष 29 मार्च के लेख http://sangeetapuri.blogspot.com/2010/03/blog-post_29.html में मैने इस वर्ष की बारिश के बारे में लिखा था कि 29 अप्रैल के आसपास उत्‍तर भारत के अधिकांश भागों में गर्मी अपनी चरम सीमा पर रहेगी। उसके बाद क्रमश: कुछ सुधार होते हुए 12 मई के बाद स्थिति थोडे नियंत्रण में आ सकती है, क्‍यूंकि 18 मई के आसपास का समय पुन: हल्‍की फुल्‍की बारिश लानेवाला होगा , जो आमजनों को थोडी राहत दे सकता है। उसके बाद मई का बाकी समय भी सामान्‍य गर्मी का ही होगा। 24 जून तक लगातार बढते हुए क्रम में नहीं , वरन् कमोबेश होती हुई गर्मी बनी रहनी चाहिए , पर उसके तुरंत बाद शुभ ग्रहों का प्रभाव आरंभ होगा , जिसके कारण बादल बनने और बारिश होने की शुरूआत हो सकती है , यदि नहीं तो कम से कम मौसम खुशनुमा बना रह सकता है। इस वर्ष यानि 2010 में मौसम की सबसे अधिक बारिश 4 अगस्‍त के आसपास से शुरू होकर 19 सितम्‍बर के आसपास तक होगी।

पुन: 16 सितंबर को ही http://sangeetapuri.blogspot.com/2010/09/blog-post_16.html पर मैने लिखा कि 19 सितंबर बहुत निकट है और इस हिसाब से तेज बारिश का मौसम यहीं समाप्‍त हो जाना चाहिए। वैसे 16 सितंबर को एक खास ग्रहयोग एक दो दिनों तक यत्र तत्र बहुत तेज बारिश और आंधी तूफान तक का दृश्‍य उपस्थित कर सकती है , लेकिन इसके बाद लगातार होनेवाली बारिश बादलों को समाप्‍त करनेवाली है और अब बारिश खात्‍मे की ओर है। यदि थोडी देर भी हुई तो यह अधिकतम 24 सितंबर तक दिखाई दे सकती है।  इसलिए कॉमनवेल्थ गेम्स में ऐसी मुसीबतभरी बारिश की कोई संभावना नहीं दिखती। पर अक्‍तूबर के पहले सप्‍ताह तक हस्‍त नक्षत्र में सूर्य होने तक बारिश बिल्‍कुल नहीं होगी , ऐसा नहीं माना जा सकता। यत्र तत्र तो बारिश होगी ही , खासकर 3 अक्‍तूबर को खेल के उद्घाटन के दिन ही थोडी बहुत बारिश की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता। पर 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के हिसाब से बारिश से भयानक तबाही वाली कोई बात अब नजर नहीं आएगी।

अब हाल फिलहाल में बहुत अधिक बारिश की कोई संभावना नहीं दिखाई पड रही। मौसम में गडबडी लानेवाले कारक ग्रह अब दिसंबर के पहले सप्‍ताह में ही क्रियाशील हैं , इसलिए उस समय तक मौसम में कोई बडा परिवर्तन नहीं होता दिखेगा। उम्‍मीद रखती हूं , मेरी बातों पर गौर करते हुए ग्रहों को मौसम में परिवर्तन लाने का कारक मानते हुए इस दिशा में भी शोध को भी आप महत्‍व देंगे।

मौसम से संबंधित सारे तथ्‍यों को पूर्ण तौर पर परखने के बाद ही आपसे संपर्क किया जा रहा है , मौसम विभाग के अलावे इसकी एक प्रति मानव संसाधन विभाग को भी भेजी जा रही है , आनेवाले समय में भी यहां से मौसम से संबंधित सभी भविष्‍यवाणियां आप दोनो को भेजी जाती रहेगी । ताकि सरकार इसपर ध्‍यान दें और मौसम की सटीक भविष्‍यवाणी समय से पूर्व किया जा सके ।

लंबाई बढते वक्‍त बच्‍चों के कपडे जूत्‍ते खरीदना बहुत बडी समस्‍या होती है !!

बोकारो के बारे में अबतक आपने पढा .... बोकारो में दोनो बच्‍चों के साथ परिवार के किसी अन्‍य सदस्‍य के न होने से मुझे पढाई के साथ ही साथ बच्‍चों के शारीरिक और चारित्रिक विकास पर भी मैने पूरा ध्‍यान देना पडा। बहुत बचपन में तो बच्‍चें की लंबाई तेज गति से बढती नहीं है , यदि बढती भी हो , तो अधिकांशत: हाफ शर्ट और हाफ पैण्‍ट में मालूम भी नहीं चलता। पर किशोरावस्‍था के दो चार वर्ष लंबाई में बहुत तेज गति से वृद्धि होती है , खासकर हमारे घर के सभी बच्‍चे 13 की उम्र तक अपनी पूरी लंबाई छह फीट पूरे कर लेते हैं , इस दौरान इनकी पीठ , बगल और जांघों में वो स्‍क्रैच पड जाता है , जो महिलाओं के शरीर में गर्भावस्‍था के दौरान पडता है। इसलिए 9 से 13 की उम्र के चार पोंच वर्ष जहां एक ओर पौष्टिक खाना खिलाने पर इनपर पूरा ध्‍यान देना आवश्‍यक होता हैं , वहीं फैशन के इस दौर में कपडे , जूते खरीदने में साइज को लेकर खासी मशक्‍कत होती है। कपडे जूत्‍ते तुरंत छोटे हो जाते , इसको ध्‍यान में रखते हुए बडे कपडे जूत्‍ते खरीदने की मजबूरी होती ।

कक्षा आठवीं तक ही पूरी लंबाई प्राप्‍त कर लेने से उसके बाद कपडों के छोटे होने को लेकर अधिक समस्‍या नहीं रह गयी थी। यह बात मुझे इसलिए याद है , क्‍यूंकि स्‍कूल की ओर से इस कक्षा में उनके नाप के अनुरूप जो नीले स्‍कोलर ब्‍लेजर मिले , वो दुबारा हमें नहीं बनवाने पडे थे। लंबाई पूरी होने के बाद फिर कमर की साइज बढने से समस्‍या आती रही। हां जब से हॉस्‍टल में रहने लगे हैं , बाहर के अस्‍वास्‍थ्‍यकारी और अरूचिकर खाने ने उनकी कमर भी कम कर दी है। अभी तक जिन पैण्‍टों के कमर छोटे हो गए थे , वो भी अब फिट हो रहे हैं। पर एक समय था , जब कपडे के कारण अच्‍छी मुसीबत हो जाया करती थी , खासकर एक प्रसंग तो हमेशा याद रखने लायक है।

बोकारो में दुर्गापूजा बहुत धूमधाम से मनायी जाती है , पूजा के कारण अधिकांश घरों में लोग नए कपडे खरीदते ही हैं , पर हमलोग कपडे का बाजार जरूरत के मुताबिक ही करते हैं । एक वर्ष दोनो भाइयों के सारे कपडे छोटे मिले , खासकर पैरों और हाथों की लंबाई बढने से फुल पैण्‍ट , फुल शर्ट और पार्टी के जूत्‍तों पर अधिक असर पडता है , क्‍यूंकि स्‍कूल के जूत्‍ते तो एक वर्ष में पहनने लायक नहीं होते। चार छह महीने के दौरान कहीं जाना हो , तो दिक्‍कत हो जाएगी , यह सोंचकर दोनो के तीन तीन सेट अच्‍छे कपडे बनवाए। दिसंबर में ही चाचाजी की लडकी का विवाह तय हुआ , वे फरवरी में विवाह कर सकते थे , पर घर के बच्‍चों की परीक्षा को देखते हुए 5 मार्च कर दिया ।

छह माह पहले पूजा में ही कपडे बनवाए थे , तैयारी की कोई आवश्‍यकता नहीं थी , इसलिए मैं बच्‍चों की परीक्षा की तैयारी में ही व्‍यस्‍त रही। 5 मार्च को मेरे बच्‍चों की अंतिम परीक्षा थी , परीक्षा देकर उन्‍हें 12 बजे तक स्‍कूल से लौटना था। मेरा मायका 30 किमी की दूरी पर है , मैने 1 बजे तक चलने का कार्यक्रम बनाया । दोनो को स्‍कूल भेजकर मैने जल्‍दी जल्‍दी सारी पैकिंग शुरू कर दी , एक एक सेट कपडे बच्‍चें के रास्‍ते के लिए भी रख लिए। स्‍कूल से बच्‍चे आए तो खा पीकर तैयार होने लगे। घर से कहीं निकलना हो , तो अंत अंत में कई तरह के काम होते हैं , मैं उसी में व्‍यस्‍त थी कि छोटे बेटे ने आकर दिखाया कि मैने उसके लिए जो पैंट निकालकर रखी थी , वह छोटा हो गया है। रास्‍ते की ही तो बात थी , मैने उसे बडे बेटे की वह पैण्‍ट दे दी , जो उसने एकाध दिन पहनकर हैंगर में टांग दिया था।

विवाह के घर में रिश्‍तेदारों की भीड , आजकल महिलाओं को काम तो कुछ रहता नहीं है , गप्‍पें मारते दोपहर से कैसे शाम हो गयी , पता भी न चला। बरात आने वाली थी , आठ या साढे आठ बजे हमलोग तैयार होने अपने पापा के घर आए , क्‍यूंकि हमारी अटैची वहीं थी। सब अपने अपने कपडे पहनने लगे , पर यह क्‍या ?? बडे ने तो पिछले वर्ष ही अपनी लंबाई पूरी कर ली थी , इसलिए इन छह महीनों में उसके कपडे छोटे नहीं हुए थे , पर छोटे बेटे की पैंट तो मेरे बढाकर खरीदे हुए दो तीन इंच अधिक का मेकअप करते हुए उसके पैरो से दो इंच ऊपर आ गयी थी यानि छह महीने के अंदर उसके कमर के नीचे का हिस्‍सा 5 इंच से अधिक बढ गया था। मेरे पास उसके और कपडे थे नहीं और मेरे घर में कोई उसका हमउम्र भी नहीं था । पुरानी पैंट, जो वह पहनकर गया था , उसमें रसगुल्‍ले के रस गिर चुके थे , बाजार भी बंद हो गया था , बडे ने पिछले वर्ष ही अपनी लंबाई पूरी कर ली थी , इसलिए उसके कपडे काफी लंबे थे , किसी तरह मोडकर उससे ही काम चलाना पडा।

सोमवार, 27 सितंबर 2010

बुरे समय का इलाज ... संगीता पुरी

जहां जीवन में अच्‍छे ग्रहों के कारण सुखमय समय जीवन को आनंदमय बनाए रहते हैं , वहीं बुरे ग्रहों के कारण चलने वाले बुरे समय को झेलने को भी मनुष्‍य विवश होता है , परंपरागत ज्‍योतिषियों द्वारा इसके इलाज के लिए बडे बडे दावे किए जाते हैं । 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' इस बारे में एक अलग ही धारणा रखता है , इसपर मै लगभग 10 पोस्‍ट लिख चुकी हूं। कल पिताजी के द्वारा 15 वर्ष पूर्व हस्‍तलिखित कुंडली बनाई जाने वाली एक पुस्तिका मिली। इसमें उन्‍होने संक्षेप में बुरे समय के इलाज के निम्‍न विंदुओं को प्रकाशित करवाया था ....

  • बुरे समय में घबडाहट की बात न हो , समय बहुत तेज गति से बदलता है। 
  • समय से पूर्व अभिष्‍ट की प्राप्ति नहीं होती , समय का इंतजार करें। 
  • समय की वास्‍तविक जानकारी ही हर प्रकार के भ्रमों का उन्‍मूलन करती है। 
  • अच्‍छे बुरे समय की जानकारी सही समय में सही कदम उठाने को प्ररित करती है। 
  • बुरे दिनों में रिस्‍क न ले , गर्दिश के ग्रहों का यह सर्वोत्‍तम इलाज है। 
  • रत्‍न धारण , पूजा पाठ , तंत्र मंत्र या किसी प्रकार के अनुष्‍ठान से अच्‍छा समय के अनुसार सूझ बूझ और धैर्य से किया गया काम होता है। 
  • बुरे समय का अभिप्राय निष्क्रियता नहीं , वरन् परिस्थितियों से समझौता है , अतिरिक्‍त रिस्‍क की अवहेलना करें। 
  • अनुशासित रहे , गुरूजनों की इज्‍जत एवं दलितों की सहायता करें। 
  • नेष्‍ट ग्रह जब गोचर में सबसे अधिक गति‍शीलता को प्राप्‍त करे , तो अपने लग्‍नकाल में सोना , चांदी या ताम्‍बे को पूर्ण तौर पर गलाकर नया रूप देकर उसे धारण करें।

मंगलवार, 21 सितंबर 2010

कोई भी धर्म देश , समाज या मानवता से ऊपर नहीं होता !!

विश्‍वभर में सभी धर्म की स्‍थापना लोगों में उदारता विकसित करने के लिए ही हुई है। दुनिया के सभी धर्मों का उदय पशु को मनुष्‍य बनाने के लिए हुआ है , इसलिए उसमें जीवन जीने से संबंधित एक एक बात की चर्चा है , पर वही धर्म आज मनुष्‍य को पशु बनाने के लिए उद्दत है। धर्म को लचीला होना चाहिए , ताकि युग के साथ साथ नियमों में परिवर्तन किया जा सके। हमारे कुछ महापुरूषों ने कई पंथ चलाकर इस दिशा में प्रयास भी शुरू किया , पर हर वर्ग का सहयोग न मिल पाने से उनका प्रयास अधूरा ही रह गया।


जहां परंपरागत ज्‍योतिष ग्रहों की किसी भाव में उपस्थिति और दृष्टि के हिसाब से ग्रहों की शक्ति का आकलन करता है , वहीं 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' में ग्रहों के शक्ति के निर्धारण के लिए सूर्य से उनकी को‍णात्‍मक दूरी और ग्रहों की गति का ध्‍यान रखा जाता है। वर्तमान में 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' दृष्टि से धार्मिक क्रियाकलापों के लिए जिम्‍मेदार ग्रह बृहस्‍पति बहुत ही कमजोर स्थिति में है , क्‍यूंकि वह सूर्य के आमने सामने और अपेक्षाकृत कम शक्ति में है। धर्म और भाग्‍य का स्‍वामी ग्रह बृहस्‍पति जब भी आसमान में मजबूत होता है , वह धर्म का सकारात्‍मक पक्षों को दर्शाता है , जबकि आसमान में उसकी स्थिति कमजोर होती है तो उसकी कमजोरियों को झेलने को हमें बाध्‍य होना पडता है। 

बृहस्‍पति तो अभी कमजोर है ही , उसके साथ चंद्रमा की युति को भी 23 और 24 सितंबर को लगभग 5 बजे से 7 बजे तक पूर्वी क्षितिज पर आसमान में उदित होते देखा जा सकता है। 25 सितंबर के बाद बृहस्‍पति से चंद्र की दूरी के बढते जाने के साथ ही साथ बृहस्‍पति के प्रभाव का खात्‍मा होना चाहिए। आसमान में बृहस्‍पति की यही स्थिति इतनी बारिश के लिए भी जिम्‍मेदार है , जिसने कई प्रदेशों में लोगों का जीना मुहाल कर रखा है। इसलिए मैने तीन चार दिन पूर्व के आलेख में ही लिखा था कि कॉमनवेल्‍थ गेम को भीषण बारिश का सामना नहीं करना पडेगा।  पर इस योग के ठीक पहले आनेवाला बाबरी मस्जिद और रामजन्‍मभूमि के मामले का निर्णय धर्म के मामलों में कट्टर तौर पर जुडे लोगों को तनाव देनेवाला ही होगा

ईश्‍वर एक है , चाहे उसे राम कहा जाए रहीम , अल्‍लाह या गॉड ... ये तो कहनेवाले पर निर्भर है। आस्‍था आस्‍था की बात है , आज के युग में भी बडे रूप में मौजूद समस्‍याओं को समाप्‍त करनेवाले को हम भगवान या महात्‍मा ही मानते हैं , मानते ही रहेंगे। पर उनके नाम से अधिक महत्‍व उनके विचारों को दिया जाना चाहिए , तभी हम उनके सच्‍चे पुजारी माने जा सकते हैं। इस ख्‍याल से चाहे हम किसी भी धर्म के हों , बाबरी मस्जिद और राम जन्‍मभूमि के मामले का न्‍यायालय का विवेकपूर्ण निर्णय  को स्‍वीकारने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। हमें यह समझना चाहिए कि कोई भी धर्म देश , समाज या मानवता से ऊपर नहीं होता , हम भारत के नागरिक हैं और भारत की रक्षा के लिए हमें एकजुट रहना चाहिए। आइए अपने धर्म को भूलकर हम शपथ लें कि हम ऐसा कोई काम नहीं करेंगे , जिससे देश को थोडा भी नुकसान पहुंचे !!

रविवार, 19 सितंबर 2010

शक्तिशाली ग्रह लाखों किमी तक की दूरी को प्रभावित कर सकते हैं !!

ग्रहों और नक्षत्रों का प्रभाव पृथ्‍वी के जड चेतन पर पड सकता है , इसे लेकर लोगों के मन में बडा संशय बना होता है। इतने दिनों  से ज्‍योतिष के अध्‍ययन के बाद पृथ्‍वी में घटनेवाली घटनाओं का ग्रहों से संबंध और ग्रहों के हिसाब से लोगों के जीवन को प्रभावित होते देखकर हमें अब संशय तो नहीं , पर आश्‍चर्य अवश्‍य होता है। भाग्‍य और भगवान तो आस्‍था की बातें हैं , पर 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' हमेशा ग्रहों के पृथ्‍वी पर पडनेवाले वैज्ञानिक प्रभाव की ही चर्चा करता है।

पिछले आलेख में मैने लिखा था कि 16 सितंबर के आसपास का ग्रहयोग पृथ्‍वी के मौसम को प्रभावित करनेवाला है , इस दौरान भारत ही नहीं , कई देशों में कई तूफान और भूकम्‍प तक आए। भारत में इस दौरान बारिश का मौसम था , इसलिए इसके अछूते होने का तो प्रश्‍न ही नहीं था। आसमान में सुदूर स्थित ग्रह की गति मौसम पर प्रभाव डालते हैं , यह तो काफी दिनों से हमने महसूस किया है , पर अचानक चक्रवात बनने , आंधी तूफान आने और बादलों के इकट्ठे होने की वजह ग्रह कैसे हो सकता है , इसके बारे में पहली बार पिताजी से रोचक जानकारी मिली।

उन्‍होने बताया कि एक तेज गति की ट्रेन कुछ मीटर तक की हवाओं को अपने साथ लेकर चलती है। यदि सामने की दिशा से भी कोई ट्रेन आ रही हो , तो वह भी अपने साथ कुछ मीटर तक की हवा को लेकर चल सकती है। यदि आमने और सामने के ट्रेन की गति में अंतर हो , तो जिस ट्रेन की गति तेज होगी , उसकी ओर हवा को रूख होता जाएगा । यदि कुछ देर के लिए दोनो ट्रेनों को समान गति से चलाया जाए तो भौतिकी के नियम के हिसाब से ही दोनो की गति के कारण उनके मध्‍य चक्रवात बनता दिखाई दे सकता है।

एक ट्रेन की तुलना में ग्रह लाखों गुणा शक्तिशाली हैं , और अपनी तेज गति के कारण वे लाखों किमी तक की दूरी  को प्रभावित कर सकते हैं। पर किसी भी ग्रह का अपना वायुमंडल तो अपने ग्रह की गति के सापेक्ष घूमता होता है , उसके बाद शून्‍य में किसी भी शक्ति के प्रभाव को स्‍पष्‍ट देखना मुश्किल है। इसलिए आसमान में गतिशील किसी भी दो ग्रहों की सापेक्षिक गति का प्रभाव पृथ्‍वी या दूसरे ग्रह के वायुमंडल पर पडता है। और इस कारण अचानक दो चार दिनों के लिए तेज हवाएं , आंधी , तूफान और बादलों के इकट्ठे होने से तेज बारिश आदि की संभावना बन जाती है।

मेरे पिताजी का मानना है कि हमारे जैसे एक ज्‍योतिषी के पास आज के वैज्ञानिक युग के अनुरूप संसाधन नहीं मौजूद होते , इसलिए तिथि की जानकारी होते हुए भी ग्रहों के द्वारा प्रभावित होनेवाले पृथ्‍वी के खास हिस्‍से को इंगित नहीं किया जा सकता है। पर यदि मौसम विभाग के वैज्ञानिक ज्‍योतिषी के साथ मिलकर इन तथ्‍यों की ओर ध्‍यान दें तो उन्‍हें आशातीत सफलता मिल सकती है। विज्ञान की पढाई के बाद ज्‍योतिष के अध्‍ययन , चिंतन और रिसर्च में अपना पूरा जीवन व्‍यतीत करने के बाद इस प्रकार के कई तथ्‍यों का उल्‍लेख अपने लेखों में किया है , जिसके द्वारा पृथ्‍वी के मौसम पर ग्रहों के पडनेवाले प्रभाव का उल्‍लेख है।

गुरुवार, 16 सितंबर 2010

दिल्‍ली के कॉमनवेल्थ गेम्स में बारिश की परेशानी ??

चार छह दिनों के ट्रिप के बाद कल ही बोकारो लौटना हुआ, झारखंड और बिहार में तो इस वर्ष बारिश बहुत ही कम हुई है , पर देश के बाकी हिस्‍सों में बारिश से जनजीवन अस्‍त व्‍यस्‍त सा लगा । हर स्‍थान पर रुक-रुक कर कभी तेज तो कभी हल्की बारिश होने से कई इलाकों में सड़कों पर पानी जमा हो गया है। अखबारों में चर्चा है कि पहाडी स्‍थानों पर भी मानसून कुछ ज्यादा ही मेहरबान रहा और बारिश ने पिछले 15 साल का रिकॉर्ड तो़ड दिया। यही नहीं , पहाड़ी क्षेत्र की मूसलाधार बरसात ने मैदानी इलाके में खतरा उत्पन्न कर दिया है।  नदी को खतरे के निशान की ओर बढ़ता देख नजदीकी आबादी में डर गहराने लगा है। लगातार हो रही बारिश से सब्जियों की आवक में कमी ने गृहिणियों की रसोई का बजट बिगाड़ दिया है।


इस बारिश की वजह से सबसे अधिक चिंता में हमारी सरकार है , दिल्ली में कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारियां युद्धस्तर पर चल रही हैं और आयोजन समिति यह भी प्रार्थना कर रही है कि बरसात कहीं रंग में भंग में डाल दे. मौसम विभाग का मानना है कि अक्तूबर महीने में बारिश बिलकुल भी नहीं होगी ऐसा तो पक्के तौर पर कहा ही नहीं जा सकता. पिछले 110 सालों में मौसम का अध्ययन कर भारतीय मौसम विभाग ने कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान बारिश होने की संभावना 15 से 20 प्रतिशत जताई है. मौसम विभाग का कहना है कि पिछले 40 सालों का आंकड़ा दिखाता है कि बारिश होने की संभावना उदघाटन समारोह के दिन ज्यादा है.


मौसम के बारे में भविष्‍यवाणी करते हुए 29 मार्च को पोस्‍ट किए गए अपने आलेख में मैने लिखा था कि 24 जून तक लगातार बढते हुए क्रम में नहीं , वरन् कमोबेश होती हुई गर्मी बनी रहनी चाहिए , पर उसके तुरंत बाद शुभ ग्रहों का प्रभाव आरंभ होगा , जिसके कारण बादल बनने और बारिश होने की शुरूआत हो सकती है , यदि नहीं तो कम से कम मौसम खुशनुमा बना रह सकता है। इस वर्ष यानि 2010 में मौसम की सबसे अधिक बारिश 4 अगस्‍त के आसपास से शुरू होकर 19 सितम्‍बर के आसपास तक होगी। ठीक अगस्‍त के पहले सप्‍ताह से ही ऐसी बारिश्‍ा शुरू हुई है कि आम जन जीवन अस्‍त व्‍यस्‍त ही बना हुआ है। 

पर अब 19 सितंबर बहुत निकट है और इस हिसाब से तेज बारिश का मौसम यहीं समाप्‍त हो जाना चाहिए। वैसे 16 सितंबर को एक खास ग्रहयोग एक दो दिनों तक यत्र तत्र बहुत तेज बारिश और आंधी तूफान तक का दृश्‍य उपस्थित कर सकती है , लेकिन इसके बाद लगातार होनेवाली बारिश बादलों को समाप्‍त करनेवाली है और अब बारिश खात्‍मे की ओर है। यदि थोडी देर भी हुई तो यह अधिकतम 24 सितंबर तक दिखाई दे सकती है। इसलिए कॉमनवेल्थ गेम्स में ऐसी मुसीबतभरी बारिश की कोई संभावना नहीं दिखती। पर अक्‍तूबर के पहले सप्‍ताह तक हस्‍त नक्षत्र में सूर्य होने तक बारिश बिल्‍कुल नहीं होगी , ऐसा नहीं माना जा सकता। यत्र तत्र तो बारिश होगी ही , खासकर 3 अक्‍तूबर को खेल के उद्घाटन के दिन ही थोडी बहुत बारिश की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता। पर 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के हिसाब से बारिश से भयानक तबाही वाली कोई बात अब नजर नहीं आएगी।

बुधवार, 15 सितंबर 2010

सटीक और अकाट्य भविष्‍यवाणी कर पाने की क्षमता हमारे प्राचीन ऋषि महर्षियों को थी !!

प्राचीन काल से अबतक के विकास के लिए बनने वाले हर कार्यक्रम में हमें पूर्वानुमान करने की आवश्‍यकता पडती है। इस पूर्वानुमान को करते वक्‍त हमें आधार के रूप में सिर्फ अपने ही जीवनभर का नहीं , पूर्वजों के द्वारा संचित अनुभव का भी सहारा लेना पडता है। इस मामले में भिन्‍न भिन्‍न लोगों का नजरिया भिन्‍न भिन्‍न प्रकार का होता है , कुछ मानते हैं कि भविष्‍य बिल्‍कुल अनिश्चित है और पूर्वानुमान कर पाना असंभव है ,तो कुछ पूर्वानुमान करने के लिए आसपास होनेवाले क्रियाकलापों पर ध्‍यान रखते आए हैं। इसी क्रम में मनुष्‍य से लेकर पशु पक्षी तक के शारिरीक बनावट से लेकर व्‍यवहार तक के अध्‍ययन से व्‍यक्ति और पशु के चारित्रिक बनावट और उसके भविष्‍य को जानने का प्रयास किया जाता रहा है। खासकर भारतवर्ष में तो किसी प्रकार की भविष्‍यवाणी करने के लिए अनेक विधियां प्रचलित हैं .......

1. हमारे समाज में अनेक साधु महात्‍मा ऐसे मिल जाएंगे , जो  किसी के मस्तिष्‍क की रेखाओं को देखकर भविष्‍य का अनुमान लगा लेते हैं। मनुष्‍य के चिंतन का माथे से संबंध है , हो सकता है खास चारित्रिक विशेषता रखनेवाले लोगों के माथे में खास तरह की लकीरें हुआ करती हो , जिससे ज्ञानी पुरूषों को माथे की लकीरें देखकर ही बच्‍चे के भविष्‍य का अनुमान लगाने में मदद मिलती हो , पर यह विधा न तो उतनी स्‍पष्‍ट है और न ही सटीक , शायद इसी कारण इसका प्रचार प्रसार कम हो पाया और इस तरह का ज्ञान रखनेवाले कम ही लोग हमें दिखाई देते हैं।

2.   शरीर में स्थित तिल , मस्‍से और अन्‍य प्रकार के दागों , चेहरे की बनावट ही नहीं , शरीर के अन्‍य अंगों की बनावट को देखते हुए भी व्‍यक्ति के चारित्रिक विशेषताओं को लेकर समाज में कहीं कहीं पर कई धारणाएं बनीं हुई हैं। इस प्रकार के आकलन को अंधविश्‍वास ही माना जा सकता है , फिर भी बहुत इलाकों में बहू या दामाद के चुनाव में इसका ध्‍यान रखा जाता है। इतना ही नहीं , इन लक्षणों को देखते हुए माता पिता के द्वारा अपने बच्‍चों के भविष्‍य की भी चर्चा की जाती है। पर जबतक बडे स्‍तर पर शोध न हो , यह कोई वैज्ञानिक विधा तो नहीं मानी जा सकती , इसलिए इनका कोई महत्‍व नहीं।

3.   किसी व्‍यक्ति के शारिरीक , मानसिक , आर्थिक पहलूओं तथा भविष्‍य को जानने के लिए उसकी हस्‍तरेखा को बहुत अधिक महत्‍व दिया जाता है , इसे पूर्ण तौर पर एक शास्‍त्र के रूप में विकसित किया गया है। विशेषज्ञ हस्‍तरेखाओं को देखकर जातक के बारे में 'सबकुछ' जानने का दावा करते हैं , वैसे मुझे अभी तक ऐसा कोई विशेषज्ञ नहीं मिला , जिससे इसकी पुष्टि हो जाए। किसी भविष्‍यवाणी की सार्थकता उसको समय के सापेक्ष बनाने में हैं , जबकि हस्‍तरेखा विज्ञान में 5 या 6 इंच की एक रेखा जीवनभर यानि 100 वर्षों तक की कहानी कहती है। किसी घटना का समय निकालने में बाधा आएगी ही , जो इस विधा की सबसे बडी कमजोरी है।

4.   इसके अलावे अंकविज्ञान के जानकार भी मनुष्‍य के चारित्रिक विशेषताओं और आनेवाले समय के बारे में 'बहुत कुछ' बताने का दावा करते हैं। जन्‍मतिथि के आधार पर प्रत्‍येक व्‍यक्ति का एक मूलांक होता है , जो 0 से 9 तक का कोई नंबर हो सकता है। इसी मूलांक के आधार पर जातक के जीवन के बारे में भविष्‍यवाणी की जा सकती है , यानि इसमें दुनियाभर के लोगों को 10 भागों में बांट कर उनके बारे में भविष्‍यवाणी की जाती है , जो भविष्‍यवाणियों को सीमित करने के लिए काफी है।

5.   जन्‍म के समय के ग्रहों और नक्षत्रों के आधार पर जन्‍मकुंडली बनाकर किसी व्‍यक्ति के चारित्रिक विशेषताओं और उसके जीवन भर के बारे में भविष्‍यवाणी करने की विधा ज्‍योतिष शास्‍त्र है। इसके द्वारा जातक की चारित्रिक विशेषताओं , उसकी मन:स्थिति , उसके विभिन्‍न संदर्भों के सुख दुख और उसकी जीवनयात्रा में आनेवाले उतार चढावों की समय सापेक्ष भविष्‍यवाणी करना आसान और सटीक होता है। खुले आसमान की तरह ही इसके आयामों की कोई सीमा नहीं , आप रिसर्च में जितना ही आगे बढते जाएंगे , सांकेतिक तौर पर प्रकृति के रहस्‍यों का उतना ही पर्दाफाश होता जाएगा।

पर इसकी भी एक सीमा है , ज्‍योतिष के द्वारा ग्रह नक्षत्रों की सहायता से आप किसी जातक के , किसी देश के गुणात्‍मक पहलुओं की चर्चा कर सकते हैं , परिमाणात्‍मक पहलुओं की नहीं। क्‍यूंकि परिमाणात्‍मक पहलू जातक के जन्‍म जन्‍मांतर के कर्मों के फल होते हैं और ग्रह नक्षत्रों से उसका कोई संबंध नहीं होता। हमने पाया है कि जन्‍म जन्‍मांतर के कर्मों के फल के अंतर से एक ही आकाशीय स्थिति में एक ही समय में कोई व्‍यक्ति मंत्री या सेनापति के घर , तो कोई गरीब के झोपडे में जन्‍म ले लेता है। पुन: इस जन्‍म का माहौल और उसके कर्म पर उसके विभिन्‍न संदर्भों के परिमाणात्‍मक पहलू निर्भर होते हैं , जिसके बारे में किसी की कुंडली देखने से नहीं जाना जा सकता।  

6.   पर हमारे ग्रंथों में ऋषि महर्षियों द्वारा की जाने वाली कुछ ऐसी भविष्‍यवाणियों की चर्चा है , जो अकाट्य हुई हैं। वैसे तो इन प्राचीन कथाओं को मैं विज्ञान गल्‍प कथा भी मानती हूं , जिसमें हमारे पूर्वजों द्वारा कल्‍पना में भविष्‍यवाणी को इतनी दूर तक ले जाने की कल्‍पना की गयी हो । पर इस प्रकार की घटना या भविष्‍यवाणी को यदि सत्‍य माना जाए , तो इसका कारण आध्‍यात्‍म मान जा सकता है , जिसके सहारे जातक के जन्‍म जन्‍मांतर के कर्मों को जानने की क्षमता हमारे प्राचीन ऋषि महर्षियों को थी। नियमित तपस्‍या के कारण वे प्रकृति के बहुत निकट थे , किसी जातक को देखकर जन्‍म जन्‍मांतर में उसके द्वारा अर्जित किए गए प्‍वाइंट्स को समझना उनके लिए कठिन न था।

जन्‍मकुंडली के द्वारा इस अर्जित प्‍वाइंट्स का किस क्षेत्र में उपयोग हो पाएगा , उसको भी वे आध्‍यात्‍म के सहारे भली भांति समझ सकते थे , इसलिए बिल्‍कुल सही और अकाट्य भविष्‍यवाणी कर पाने की क्षमता हमारे प्राचीन ऋषि महर्षियों को थी । आज ज्‍योतिष या हस्‍तरेखा या न्‍यूमरोलोजी के जानकार ऐसा दावा करें , तो यह विश्‍वास करने योग्‍य नहीं। यदि उनमें सचमुच ऐसी शक्ति है , तो ज्‍योतिष , हस्‍तरेखा या न्‍यूमरोलोजी के साथ साथ खुद के सहारे ऐसी भविष्‍यवाणी करके दुनिया भर के लोगों को चकित कर सकते हैं ।

शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

11 सितंबर के शुक्र चंद्र युति के दर्शन किया जाए या नहीं ??

11 अगस्‍त को पोस्‍ट किए गए अपने आलेख में मैने चर्चा की थी कि सिर्फ 13 अगस्‍त को ही नहीं , आने वाले दिनों में लगभग पांच महीनों तक यानि 11 सितंबर , 9 अक्‍तूबर , 2 दिसंबर , 31 दिसंबर और 29 जनवरी को भी आसमान में ऐसी स्थिति बनती रहेगी, जिसमें सर्वाधिक चमक के साथ शुक्र और सबसे छोटा चांद 9 अक्‍तूबर को दिखेगा , जो आसमान में वाकई देखने में खूबसूरत लगता है। 13 अगस्‍त के शुक्र चंद्र युति को तो हमलोग अत्‍यधिक बारिश की वजह से नहीं देख सकें , कल ही 11 सितंबर है और इस योग के फलस्‍वरूप अधिकांश जगह बारिश या कम से कम बादल की संभावना भी दिख रही है। ऐसे में कल भी इसके दर्शन मुश्किल ही लग रहे हैं।

वैसे पाठकों को कल इस युति के दर्शन करने की सलाह दी जाए या नहीं , ये समझ में नहीं आ रहा। । वैसे तो कल गणेश चतुर्थी है , देशभर में यह त्‍यौहार बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता हैं , खासकर महाराष्‍ट्र में तो गणेश चतुर्थी से अनन्त चतुर्दशी तक दस दिन गणेशोत्सव मनाया जाता है। पर मान्‍यता है कि एक बार चंद्रमा ने गणेश जी का मजाक उड़ाया था, गणेश जी ने चंद्रमा को श्राप दे दिया कि आज से आज के दिन जो भी तुम्हें देखेगा उसे मिथ्या कलंक लगेगा । इसलिए भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को रात्रि में चन्द्र-दर्शन (चन्द्रमा देखने को) निषिद्ध किया गया है। जो व्यक्ति इस रात्रि को चन्द्रमा को देखते हैं उन्हें झूठा-कलंक प्राप्त होता है। ऐसा शास्त्रों का निर्देश है। इस दिन चांद के दर्शन करने से भगवान श्री कृष्ण को भी मणि चोरी का कलंक लगा था। और हमारे पाठकों को कोई कलंक लगे , ये तो मैं कतई नहीं चाहूंगी।



वैसे इतने बडे देश में अनेकता में भी एकता , हर क्षेत्र में व्रत मनाने का ढंग भिन्‍न भिन्‍न है। मिथिलांचल में महिलाएं इस दिन व्रत रखती हैं और शाम को चंद्र दर्शन के बाद ही वे व्रत तोडती हैं। इस क्षेत्र में इस दिन चंद्रमा की पूजा करने का विधान है। यहां बिना कुछ अर्घ्‍य के खाली हाथ चंद्रमा का दर्शन निषिद्ध है , परे परिवार के एक एक व्‍यक्ति हाथ में कुछ न कुछ लेकर ही चंद्र का दर्शन करते हैं। माना जाता है कि चंद्रमा को देखने का बुरा प्रभाव उसकी पूजा से समाप्‍त हो जाता है। भूल चूक से देखे गए इस चंद्रमा के इस बुरे प्रभाव को दूर करने के लिए मंत्र भी हैं , पर जनसामान्‍य इसे टोटकों से भी दूर करते हैं। कुछ लोग कच्चे मकानों और खपरैल वाले मकानों के जमाने में चन्द्रमा की ओर पत्थर उछालने पर मकान के कवेलुओं के टूटने से मामूली विवाद की स्थिति से चन्द्र दर्शन का ताजा कुफल समाप्त होता मानते है। 

हमारे गांव में तो इस चंद्र के दर्शन का बडा दोष माना जाता है। 'चौक चंदा का फंदा' बडा बलवान माना जाता है , और इस दिन का चांद भी अंधेरा होने से पहले ही जगमगाने लगता है। इसलिए इस दिन अंधेरा होने से पहले ही सबलोग घरों में दुबके होते हैं। मनाहीवाले काम को बच्‍चे खूब किया करते हैं , इसलिए बच्‍चों को इसकी जानकारी नहीं दी जाती है , पर कोशिश ऐसी की जाती है कि बच्‍चे शाम होने से पहले घर में आ जाएं। खेलने जाते हुए बच्‍चों को कहा जाता है 'आज घर थोडी जल्‍दी आ जाना , अंधेरा होने से काफी पहले' 
'क्‍यूं भला?' बच्‍चे पूछते हैं। 
'आज फलाने चाचाजी आनेवाले हैं'  बडों का जबाब होता है। 
बच्‍चे संतुष्‍ट हो जाते हैं। 
'सीधा नजर नीची रखते हुए आना , इधर उधर देखना मत' बडों का एक और निर्देश। 
'ऐसा क्‍यूं ??' बच्‍च्‍े की उत्‍सुकता तो बढेगी ही। 
'अरे आज हवा चल रही है बहुत , आंखों में कुछ पड जाए तो' बडों के द्वारा एक और झूठ। 
कई वर्षों तक लगातार ऐसी बातचीत से बडे बच्‍चों को तो समझ में आ जाता। पर चंद्र दर्शन के दुष्‍प्रभावों को समझते हुए और छोटे बच्‍चे धूल और आंधी से आंखों को बचाते हुए नीची निगाह किए खेल के मैदानों से सारे बच्‍चे घर वापिस आते, मेरे ख्‍याल से अंधविश्‍वास को बढावा देते और प्रचारित करते!

पर इस अनुच्‍छेद में जो कहा जा रहा है , वह अंधविश्‍वास नहीं , 25 फरवरी 2009 को भी शुक्र चंद्र युति के अवसर पर पोस्‍ट लिखने के दूसरे ही दिन सरकारी कर्मचारियों के लिए अच्‍छे महंगाई भत्‍ते की घोषणा हुई थी।  आसमान के पश्चिमी क्षितिज की ओर कोई देखे या न देखे , शुक्र और चंद्र के इस विशेष मिलन का पृथ्‍वी के जड चेतन पर प्रभाव तो पडेगा ही। वैसे तो पृथ्‍वी पर इसके अच्‍छे खासे प्रभाव से 10 , 11 और 12 सितंबर को जनसामान्‍य तन मन या धन से किसी न किसी प्रकार के खास सुखदायक या दुखदायक कार्यों में उलझे रहेंगे , पर सबसे अधिक प्रभाव सरकारी कर्मचारियों पर पड सकता है यानि उनके लिए खुशी की कोई खबर आ सकती है। दूसरा अंतरिक्ष से संबंधित कोई विशेष कार्यक्रम की संभावना बनती दिखाई दे सकती है। सफेद वस्‍तुओं पर इसका अच्‍छा प्रभाव देखा जा सकता है। यह योग वृष और तुला राशि वालों के लिए काफी अच्‍छा और मीन  राशिवालों के लिए कुछ बुरा रह सकता है।  


मंगलवार, 7 सितंबर 2010

नास्तिक अपना मुसीबत भरा समय किसके सहारे काटें ??

पिछली पोस्‍ट में पूरी बात तो हो नहीं पायी , आज उसी प्रसंग को आगे बढाती हूं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखनेवाले और विज्ञान की मोटी मोटी पुस्‍तके पडनेवाले मेरे पापाजी और अन्‍य भाइयों के कारण हमलोगों ने बचपन से ही धर्म पर तो नहीं , पर धार्मिक क्रियाकलापों पर जरूर ऊंगली उठाते पाया था। बडे संयुक्‍त परिवार में दादाजी और उनके सभी बच्‍चे कर्म पर विश्‍वास रखनेवाले तो दादी जी और उनकी बहूएं धर्म पर आस्‍था रखनेवाली , दोनो पार्टियों के मध्‍य पुरजोर बहस होना निश्चित था।  ज्‍योतिष के अध्‍ययन के कारण पापाजी के समक्ष कुछ रहस्‍यों का पर्दाफाश हो चुका था , इसलिए तर्क करने में वो भयभीत नहीं होते थे। जबकि दूसरे भाई विज्ञान के नियमों तक की बात तो पूरे विश्‍वास से करते , पर धार्मिक या आध्‍यात्मिक बातों के लिए उनके पास तर्क नहीं होते , थोडा भय भी होता , सो चुप्‍पी साधने की मजबूरी होती। पर पापाजी के वैज्ञानिक नजरिये से हम बच्‍चों की भी तर्क शक्ति बढती गयी।

मेरे पापाजी प्रकृति के सारे नियमों को ही सर्वशक्तिमान मानते हैं , जिसके हिसाब से प्रकृति में एक एक क्रिया की प्रतिक्रिया तय है। उनके अनुसार किसी भी कर्मकांड का मुख्‍य उद्देश्‍य समाज के एक एक वर्ग और प्रकृति की एक एक वस्‍तु के महत्‍व को बढाने के लिए है , जो हमारे दूरदर्शी महापुरूषों द्वारा तय किया गया है , इनका ईश्‍वर से कोई लेना देना नहीं और इससे ईश्‍वर खुश हो जाएंगे , ऐसा नहीं है। ईश्‍वर या प्राकृतिक वातावरण को अपने पक्ष में करने के लिए हमें उन गुणों को विकसित करना होगा , जिसका प्राचुर्य हमें प्रकृति की ओर से मिला है। प्रत्‍येक व्‍यक्ति अच्‍छे या बुरे दोनो प्रकार के गुणों से युक्‍त होता है , अध्‍यवसाय द्वारा अपनी अच्‍छी आदतों को विकसित करना और संयम द्वारा बुरी आदतों को समाप्‍त करना हमारा लक्ष्‍य होना चाहिए और यही आध्‍यात्‍म तक पहुंचने का रास्‍ता है। इसके लिए कर्मकांड का सहारा भी लिया जा सकता है , पर इसे भी हर युग में परिवर्तनशील होना चाहिए।

पर धर्म के मामलों में पापाजी के इतने अच्‍छे दृष्टिकोण के बावजूद भी दादी जी और मम्‍मी के कारण हमलोगों में आस्तिकता आ ही गयी और पूजा पाठ , धर्म कर्म के मामले में हम आस्‍था अवश्‍य रखने लगे। वैसे इससे पापाजी को उतनी आपत्ति नहीं होती , सामान्‍य तौर पर व्रत वगैरह में भी नहीं , पर यदि घर पर किसी की तबियत खराब हो और व्रत करना जरूरी हो , तो इतना हल्‍ला मचाते कि व्रत करनेवाली की हालत और नाजुक हो जाती। ऐसे में व्रत की परंपरा हमारे घर से तो समाप्‍त ही हो गयी। मेरे ससुराल पहुंचने पर मेरी माताजी भी कर्मकांड को लेकर अधिक गंभीर नहीं दिखी। हालांकि वो खुद तो व्रत त्‍यौहार करती रही , पर हम बहूओं के लिए कुछ भी अनिवार्य नहीं रहने दिया , हां , पंडितों के अधिकार में अभी तक उन्‍होने कोई कटौती नहीं होने दी है। धार्मिक कर्मकांडों में कम रूचि के बावजूद भी मेरे मायके या ससुराल में कोई बडी हानि या असफलता को घटित होते नहीं देखा , जिससे इस मान्‍यता को बल मिले कि पूजा पाठ नहीं करने से कोई बडा नुकसान होता है।

मायके और ससुराल .. दोनो का मिला जुला प्रभाव ऐसा बना कि धार्मिक कर्मकांडों से तो मैं मुक्‍त ही हो गयी , पर मंदिर , मस्जिद , गुरूद्वारे या गिरजाघर को देखकर सर को झुका लेना , पर्व त्‍यौहार में पूजा पाठ में सम्मिलित होना .. ये दिलचस्‍पी तो बिल्‍कुल सहज ढंग से बनी रही । जीवन में समय समय पर उपस्थित होनेवाली ऐसी विपत्ति या परिस्थिति , जहां किसी का भी वश नहीं होता , विज्ञान के विकास के बावजूद एक संयोग या दुर्योग समस्‍या को बढा या घटा सकती है। किसी बडी शक्ति को याद करते हुए मेरा सर स्‍वयमेव झुक जाया करता है, उस समय मेरे सारे वैज्ञानिक तर्क एक ओर पडे होते हैं। पालन पोषण में ईश्‍वर के प्रति आस्‍था का ही परिणाम है कि किसी असामान्‍य परिस्थिति में मेरे साथ ईश्‍वर होते हैं , जो कुछ क्षण बाद , कुछ घंटों बाद , कुछ दिनों बाद , कुछ महीनों बाद , यहां तक कि कुछ वर्षों बाद मुझे उस मुसीबत से निकाल देते हैं , ऐसा मुझे अहसास होता रहता है , जो निर्मूल भी हो सकता है। पर ईश्‍वर की आसपास उपस्थिति को महसूस करने के कारण इतना समय व्‍यतीत कर लेने में मुझे दिक्‍कत नहीं होती।

पर हमारे व्‍यक्तित्‍व में पापाजी का कहीं न कहीं प्रभाव अवश्‍य था कि मैं इसे अपनी कमजोरी मानने लगी थी। हालांकि कर्तब्‍य पथ पर हमेशा ही चलती रही , फिर भी अपनी असफलताओं को भाग्‍यवाद से जोड दिया तथा अपने बच्‍चों को हमेशा कर्म के लिए प्रेरित करती रही । जैसे थे मेरे पापाजी , वैसे ही बच्‍चों के पापाजी , बच्‍चों के पालन पोषण के क्रम में ईश्‍वर के प्रति कोई आस्‍था ही नहीं विकसित होने दी।  घर में बडे स्‍तर पर धार्मिक क्रियाकलापों की कमी के कारण पूजा पाठ , धर्म या आस्‍था से बच्‍चों का संबंध भी नहीं रहा , जिसका बाद में मुझे अफसोस हुआ। कम उम्र में ही बडे बेटे के समक्ष एक मुसीबत आयी , मुझे प्रतिदिन ईश्‍वर की रट्ट लगाते देखा , तो वह तो मानने लगा , पर छोटा तो अभी तक ईश्‍वर के अस्तित्‍व से इंकार करता है। जीवन में उतार और चढाव आना तो तय है , आस्तिक मुसीबत का समय प्रार्थना और संतोष में गुजार देते हैं , पर नास्तिकों के लिए मुसीबत का समय काटना अधिक मुश्किल होता है ।

कर्म के अनुसार या उससे अधिक सफलता से जीवन भर संयुक्‍त होने के बाद अपनी असफलता का कोई कारण नहीं समझ पाते , तब उनका दृष्टिकोण अंधविश्‍वासी हो जाता है , पापाजी के जीवन में आनेवाले सैकडों लोग ऐसे उदाहरण हैं। छोटे छोटे लोग तो साधनहीनता के कारण अंधविश्‍वास में पडे होते हैं , एक डॉक्‍टर के यहां जाने के पैसे न हो और झाडफूंक वाले से ही इलाज करा लिया तो इसमें कैसा अंधविश्‍वास ?? उससे समाज को कोई नुकसान नहीं होता। प्रकृति तो उसकी सलामती के लिए बीमारी से लड ही रही है , अधिकांश लोगों का दो चार दिनों में स्‍वस्‍थ होना तय है। पर बडे स्‍तर पर सर्वे हो , तो आपको मिलेगा कि आज जितने भी अंधविश्‍वासी हैं , वे कभी भी धार्मिक नहीं रहें , विपत्ति में पडकर धार्मिक होने का नाटक कर रहे हैं। सही भी है , आस्तिक तो अपना समय ईश्‍वर को आसपास महसूस करते हुए काट लेती हूं , भला नास्तिक अपना मुसीबत भरा समय किसके सहारे काटें ??

सोमवार, 6 सितंबर 2010

मेरी पहली प्राथमिकता ज्‍योतिष का विकास करने की थी !!

अभी तक आपने पढा .... दूसरे ही दिन से टी वी पर ज्‍योतिष के उस विज्ञापन की स्‍क्रॉलिंग शुरू हो गयी थी , जो मैने पिछली पोस्‍ट में लिखा है....

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पर नई नई पिक्‍चर देखने में व्‍यस्‍त लोगों का अधिक ध्‍यान इस ओर जाता नहीं है , यदि ध्‍यान जाता भी है तो लोगों को यह भ्रम है कि एक ज्‍योतिषी के पास हमें मुसीबत पडने पर ही जाना चाहिए। मुसीबत के वक्‍त भी बहुत दूर तक लोग स्‍वयं संभालना चाहते हैं , क्‍यूंकि एक ज्‍योतिषी को ठग मानते हुए लोग उससे संपर्क करना नहीं चाहते। यदि एक ज्‍योतिषी के पास जाने से समस्‍याएं सुलझने की बजाए उलझ जाती हों , तो उसके पास जाने का क्‍या औचित्‍य ??  पर फिर भी कुछ लोग तो समस्‍याओं के अति से गुजरते ही होते हैं , जिनके पास समस्‍या के समाधान को कोई रास्‍ता नहीं होता , उनका ध्‍यान बरबस इस ओर आकृष्‍ट हो जाता है। वैसे ही लोगों में से कुछ के फोन मेरे पास आने लगे थे ।

भले ही टोने टोटके , तंत्र मंत्र या झाडफूंक की समाज के निम्‍न स्‍तरीय लोगों और समाज में गहरी पैठ हो , पर ज्‍योतिष से हमेशा उच्‍च वर्ग की ही दिलचस्‍पी रही है। राजा , सेनापति ,मंत्री  , बडे नेता और बडे से छोटे हर स्‍तर तक के व्‍यवसायियों को बिना ज्‍योतिषी के काम शुरू करते नहीं देखा जाता। यह भी अतिशयोक्ति नहीं होगी कि ऊंची सामाजिक और आर्थिक स्थिति के होते हुए भी ये ग्रहों के प्रभाव को लेकर अंधविश्‍वास में होते हैं। पर मैने उनके मध्‍य विज्ञापन न कर बोकारो स्‍टील सिटी के सेक्‍टरों  में प्रसारित होते चैनल में विज्ञापन किया था , जहां आमतौर पर व्‍यवसायी नहीं , अच्‍छे पढे लिखे नौकरीपेशा निवास करते हैं , जो स्‍थायित्‍व के संकट से नहीं गुजरते होते हैं और जिनमें तर्क करने की पूरी शक्ति होती है।  एप्‍वाइंटमेंट लेने के बाद वे हमारे पास आते , अपना जन्‍म विवरण दे देते और चुपचाप रहते , कोई प्रश्‍न तक न करते। अपने ज्‍योतिष में विश्‍वास दिलाने की पूरी जबाबदेही मुझपर होती।

मैं तबतक एक गृहिणी के तौर पर घर के अंदर रह रही थी , एक प्रोफेशनल के तौर पर बातें करने में बिल्‍कुल अयोग्‍य। लंबे जीवनयात्रा से गुजरनेवाले अधेड उम्र के लोगों को तो उनके अच्‍छी और बुरी जीवनयात्रा के बारे में जानकारी देकर विश्‍वास में लिया जा सकता था , पर अधिकांश लोग खुद की परेशानी को लेकर मेरे पास नहीं आया करते थे। वे अपने बेटे बेटियों की समस्‍याएं , मुख्‍य तौर पर कैरियर या विवाह की समस्‍याएं लेकर आते , उन बच्‍चों की जन्‍मकुंडली के अनुसार छोटी सी जीवनयात्रा में कोई बडा उतार चढाव मुझे नहीं दिखता , जिसको बताकर मैं उन्‍हें विश्‍वास में लेती। दस पंद्रह मिनट तक पूरी शांति का माहौल बनता , पर इसके बाद मुझे कई विंदू मिल ही जाते , जिससे मैं उन्‍हें विश्‍वास में ले पाती । मैं साफ कर देती कि समय के साथ कह रही भूतकाल की बातों से यदि उन्‍हें विश्‍वास न हो , तो वे वापस जा सकते हैं , उन्‍हे फी देने की कोई जरूरत नहीं। पर छह महीने तक स्‍क्रॉलिंग चली , हर दिन एक दो लोग आते रहें , पर भूतकाल की बातें सुनकर कोई भी बिना भविष्‍य की जानकारी के नहीं लौटे। हां, इन छह महीनों में दो बार ऐसा वाकया हुआ , जानबूझकर प्‍लानिंग बनाकर दो युवा भाई बहन आए , सबकुछ पूछ भी लिया और कहा कि वे संतुष्‍ट नहीं हुए , मैने कहा कि आपने मेरा इतना समय क्‍यूं लिया , तो उन्‍होने कहा कि मुझसे अधिक उनका समय बर्वाद हुआ है।

धीरे धीरे चार महीने व्‍यतीत हो चुके थे , इस मध्‍य मैं बहुतों को प्रभावित कर चुकी थी , इसलिए उनके परिचय से भी कुछ लोग आने लगे थे। चूंकि मेरी पहली प्राथमिकता ज्‍योतिष का विकास करने की थी , पैसे कमाने की नहीं , इसलिए मैने विज्ञापन बंद कर दिया था। एक ज्‍योतिषी के पास आनेवाले तो बहुत अपेक्षा से मेरे पास आते , पर मेरे पास आने के बाद उन्‍हें मालूम होता कि ज्‍योतिषी भगवान नहीं होता। एक डॉक्‍टर , एक वकील , एक शिक्षक की तरह ही ज्‍योतिष भी कुछ सीमाओं के मध्‍य स्थित होता है , यहां सबकुछ स्‍पष्‍ट नहीं दिखाई देता और हमलोग ग्रहों की सांकेतिक स्थिति को देखकर भविष्‍यवाणियां करते हैं। इसके अलावे ग्रह के प्रभाव को कम या अधिक कर पाना तो संभव है , पर दूर कर पाना प्रकृति को वश में करना है , जो कदापि संभव नहीं , हमारे विश्‍लेषण से वे पूर्णत: संतुष्‍ट होते। पर बहुत दिनों तक मैं इस ज्ञान को न बांट सकी , क्‍यूंकि मेरे सामने अन्‍य काम भी बिखरे पडे थे , इसे जानने के लिए फिर अगली कडी ....

रविवार, 5 सितंबर 2010

विज्ञान को ईश्‍वर कैसे कहा जा सकता है ??

पिछले चार छह दिनों से शहर के बाहर थी , बाहर होने पर ही मुझे कभी कभार टी वी देखने का मौका मिल जाया करता है। आज सुबह आते वक्‍त भी जी न्‍यूज चैनल पर एक कार्यक्रम चलता पाया , जो अति उत्‍साह में एक वैज्ञानिक स्‍टीफेंस हॉकिंस द्वारा विज्ञान को ईश्‍वर मानने के वक्‍तब्‍य पर आधारित थी। हालांकि इनसे पहले बहुत सारे वैज्ञानिकों ने एक सर्वशक्तिमान की अवधारणा की पुष्टि भी की है , पर इनका मत भिन्‍न है। चैनल पर ही दिखाया गया कि इस बात पर धार्मिक लोग भी उलझे हैं , जिनका मानना है कि कर्म कभी भी कर्ता के बिना नहीं होते और इस दुनिया में ऐसा बहुत कुछ होता है , जिसके कर्ता को नहीं देखा जा सकता , वो ही  ईश्‍वर है। प्राचीन काल से अबतक आस्तिकों , नास्तिकों के मध्‍य बहस की सीमा नहीं है , पर अंतिम निष्‍कर्ष पर नहीं आया जा सका है और आनेवाले समय में भी इसका अंत नहीं हो , जबतक विज्ञान हर एक रहस्‍य पर से पर्दा न हटा दे।

आज के वैज्ञानिक युग में ईश्‍वर का जो भी नाम दे दिया जाए , हमलोग इसे प्रकृति भी मान सकते हैं , पर प्राचीनकाल से ही लोगों में ईश्‍वर , अल्‍लाह या गॉड के नाम पर एक सर्वशक्तिमान को मानने और उसके क्रियाकलापों के बारे में चिंतन करने प्रवृत्ति रही है। इस सर्वशक्तिमान के रूप में सत्‍य को समझने के क्रम में हम भावावेश में आकर भले ही अंधविश्‍वासी हो जाते हों , पर तलाश तो अवश्‍य सत्‍य की हुआ करती है। पर विज्ञान भावना में नहीं बहता , कार्य और कारण के मध्‍य एक स्‍पष्‍ट संबंध को देखते हुए सत्‍य की ओर बढता है , इसलिए इस रास्‍ते में अंधविश्‍वास का विरोध है। पर ईश्‍वर या सर्वशक्तिमान साध्‍य है , तो धर्म की तरह ही विज्ञान उसे प्राप्‍त करने का एक साधन। प्रकृति के सारे नियमों को ढूंढकर ही ईश्‍वर तक पहुंचा जा सकता है , पर प्रकृति के सारे रहस्‍यों से पर्दा उठाने में विज्ञान को युगों लग जाएंगे। विज्ञान तो धर्म की तरह ही उसके क्रियाकलापों को समझने का एक साधन मात्र है , इसे ईश्‍वर कैसे कहा जा सकता है ??