गुरुवार, 21 अक्तूबर 2010

धर्म का असली लक्ष्‍य मानव धर्म की रक्षा होनी चाहिए !!

ब्‍लॉग जगत में सबसे अधिक बहस वाला मुद्दा हमारे धर्मग्रंथ बने हुए हैं। इनके पक्ष और विपक्ष में हमेशा तर्कों का खेल चलता रहता है। ताज्‍जुब तो इस बात का है कि न तो किसी के तर्क काटने योग्‍य होते , और न ही सहज विश्‍वास करने योग्‍य , क्‍यूंकि जो आस्तिक है , उनकी आस्‍था धर्म पर हद से अधिक है , तो जो नास्तिक है उनकी आस्‍था विज्ञान पर हद से अधिक। मेरे हिसाब से धर्म और विज्ञान में जो आधारभूत अंतर है , वो अंतर हमारी संस्‍कृति और पाश्‍चात्‍य संस्‍कृति में भी है , वह यह कि वह यह कि धर्म की दिलचस्‍पी प्रकृति के नियमों को स्‍वीकार करते हुए , उसकी रक्षा करते हुए उसके सापेक्ष जीवन जीने की खोज में होता है , जबकि विज्ञान हमेशा प्रकृति को पराजित कर लेने का दावा करता है।

इस विकासशील युग में धर्म पर आश्रित रहकर जीवनयापन करना मुश्किल है , और हम विज्ञान का सहारा लेने को बाध्‍य हैं , पर प्रकृति के सहारे जीने की बाध्‍यता तो आदिम काल से चलती आ रही है और लाख वैज्ञानिक विकास के बावजूद भी समाप्‍त नहीं हो सकती , इसलिए प्रकृति पर विजय पाने का दावा भी बेकार है। । इसके अलावे विज्ञान के अंधाधुंध और बिना सोंचे समझे किए गए विकास के कारण उत्‍पन्‍न संकट भय जरूर उपस्थित करता है और हम यह सोंचने को बाध्‍य हो जाते हैं कि इससे अच्‍छी तो हमारी परंपरागत जीवनशैली थी , जिसमें प्रकृति और मानव धर्म दोनो सुरक्षित था। पर भारतवर्ष का सनातन धर्म , जो न तो हिंदू , न मुस्लिम , न सिक्‍ख और न ईसाई है , में हमेशा स्‍वतंत्र चिंतन और मनन को स्‍थान दिया है। तभी इसमें धर्म का क्षेत्र भी हमेशा परिष्‍कृत होता रहा , इतने धर्मगुरू हुए , सभी ने समाज के हिसाब से मानव धर्म की अपनी अपनी परिभाषाएं रची।

पर जहां आज एक ओर धर्मगुरू सही मार्ग दिखाने में असमर्थ हैं , वहीं दूसरी ओर वैज्ञानिक भी लोगों को एक सही दिशा नहीं दे पा रहें। हमारा मौलिक चिंतन समाप्‍त हो गया है और हम उसे ही सत्‍य समझ बैठते हैं , जो पाश्‍चात्‍य वैज्ञानिक कहते हैं , जबकि उनका चिंतन न कभी विराट हुआ है और न होगा। पढे लिखे भारतीय उनके विकास को देखकर और अपने को खुद उसी दिशा में जाते देखकर विकास का झूठा भ्रम पाल रहे हैं। यही कारण है कि प्रकृति जोर शोर से उपद्रव मचा रही है और आनेवाले वर्षों में इसके विनाश का विकट स्‍वरूप हमें देखना होगा। मेरा यह नहीं मानना है कि जो धर्मग्रंथों में लिखा है , आज के संदर्भ में उसकी एक एक पंक्तियां सही है , हमने अपने धर्म के अनुसार ही स्‍वतंत्र चिंतन और मनन को स्‍थान देते हुए उनमें से समय के साथ अच्‍छी बातों को चुनचुनकर ग्रहण किया है और बुरी बातों को अस्‍वीकार करते आए हैं। महाकवि कालिदास ने भी कहा था .....

पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि नवमित्यवद्यम् |
सन्तः परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः ||

न तो पुराना ही पुराना होने के कारण सही है , और न नया ही नया होने के कारण ग्राह्य , साधु बुद्धि के लोग दोनो की परीक्षा करके ही स्‍वीकार या अस्‍वीकार किया करते हैं। उलूल जुलूल तर्क देकर पुरानी हर बात को ही अच्‍छा मान लेना या नई हर बात को ही बुरा मान लेना उचित नहीं। धर्म के अनुसार गंगा को मां मानकर उसकी सुरक्षा करें या फिर विज्ञज्ञन के हिसाब से पर्यावरण की दृष्टि से , पर सुरक्षा के उपाय किए जाने चाहिए । यदि हम इस दृष्टिकोण को लेकर चलें , तो धर्म और विज्ञान में टकराव की कोई बात नहीं होगी। धर्म का असली लक्ष्‍य मानव धर्म की रक्षा होनी चाहिए , इस कारण समय समय पर इसका परिवर्तनशील होना आवश्‍यक है , धर्मगुरूओं को इस दिशा में सोचने की आवश्‍यकता है , न कि लकीर के फकीर बने रहने की।

मंगलवार, 19 अक्तूबर 2010

आज हर स्‍तर पर अधिकारों का दुरूपयोग हो रहा है !!

दुर्गापूजा में शहर से बाहर थी , कई दिनों बाद बोकारो लौटना हुआ , इस वर्ष देशभर में दुर्गापूजा के साथ साथ कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स की भी धूम रही। इस कार्यक्रम की सफलता ने जहां पूरी दुनिया के समक्ष भारत का सर ऊंचा किया , वहीं इस आयोजन की आड में पैसों का बडा हेर फेर मन को सालता रहा। भ्रष्‍टाचार के मामलों में हमारा देश दिन ब दिन आगे बढता जा रहा है और कोई इसे सुधारने की कोशिश न‍हीं कर रहा , बस हर कोई एक दूसरे को गाली ही दे रहे हैं। किसी की समस्‍या से दूसरे को कोई मतलब नहीं , क्‍या छोटे और क्‍या बडे , सब अपने अधिकारों का दुरूपयोग ही कर रहे हैं।

अभी हाल में ही एक काम के सिलसिले में अचानक रांची हजारीबाग जानेवाले एन एच पर ही बोकारो से 30 किमी दूर के गांव में जाने की आवश्‍कता पड गयी । परेशानी की कोई बात नहीं थी , मेरे निवासस्‍थान से आधे किमी से भी कम दूरी पर बस स्‍टॉप है , धनबाद और अन्‍य स्‍थानों से आधे आधे घंटे में अच्‍छी आरामदेह बसें रांची की ओर जाया करती हैं , मैं बिना किसी को कहे सुने आराम से तैयार होकर घर से निकल पडी। संयोग से एक बस हजारीबाग के लिए बोकारो से ही खुल रही थी , मैने कंडक्‍टर से एक टिकट बुक करने को कहा , पर जगह का नाम सुनते ही उसने कहा कि आपको सीट नहीं मिलेगी , केबिन में बैठकर जाओ, जबकि‍ उस समय बस पूरी खाली थी।

बसवाले पहले पूरी दूरी तक के यात्री को ही सीट देना चाहते थे और छोटे छोटे दूरी तक के यात्री को इधर उधर बैठाकर, खडे करके भी किराया ले लेते हैं। क्‍यूंकि यदि पूरी दूरी के यात्री न मिले , तो इनसे लाभ कमाया जा सके। मतलब दोनो हाथ में लड्डू , जबकि मालिक को सिर्फ सीट के पैसेंजर के ही किराये दिए जाते हैं , वो भी पूरे नहीं। मैने कहा,'ये क्‍या बात हुई , या तो आप वहां स्‍टॉपेज ही न रखें या फिर यात्रियों को सीट दें। यदि आपको नुकसान पहुंच रहा हो , तो स्‍पष्‍ट कहें कि अगले स्‍टॉपेज तक का किराया देने पर सीट दी जाएगी। आज के आरामपसंद युग में थोडा अधिक किराया देना मुश्किल भी नहीं।' पर उन्‍हें मेरी बात सुनने में कोई दिलचस्‍पी नहीं थी। उन्‍होने न मुझसे अधिक किराया लिया और न ही मुझे मेरा पसंदीदा आगे का सीट मिला, यह कहते हुए कि वह सीट बुक है और आपका तो मैडम बस आधे घंटे का सवाल है। उनके कहने के स्‍टाइल से लगा कि वे मजबूर हैं , पर यह देखकर आश्‍चर्य हुआ कि मेरे उतरने उतरने तक उस सीट पर कोई भी पैसेंजर नहीं बैठा।

वहां पहुंचने पर जिस सरकारी ऑफिस में मेरा काम था , वहां मुझे कुछ पुराने कागजात निकलवाने थे। मैने एक सज्‍जन से पहले ही इस बात से ऑफिसवालों को आगाह करवा चुकी थी , इसलिए वे तैयार थे। मेरे पहुंचते ही उन्‍होने पुराने फाइलों को खंगाला और बीस से पच्‍चीस मिनट के अंदर मेरे कागजात मुझे सौंप दिए। मेरे लिए कोई दो नंबर का कार्य उन्‍होने नहीं किया था , इस काम को करना उनका कर्तब्‍य था , क्‍यूंकि इसके लिए सरकार उन्‍हें हमारे ही द्वारा दिए गए कर से वेतन दिया करती है। पर मुझे यह देखकर आश्‍चर्य हुआ कि काम के होते ही वे स्‍टाफों को मिठाई खिलाने के बहाने से इशारे से कुछ पैसों की मांग करने लगें। 

मेरे मन को जो बात कचोटती रही , वह यह कि जिन्‍हें भी जो अधिकार मिल रहे हैं , वह उसी का दुरूपयोग कर रहा है और ऊपरवाले को गाली दे रहा है। मगर यदि वो ऊपर होता , तो वो भी ऐसा ही करता। वे सरकारी कर्मचारी हैं , हर महीने मासिक तनख्‍वाह मिलती है , पर जो उनके सामने होते हैं , वे कभी कभी लाचार भी होते होंगे। क्‍या ही अच्‍छा होता कि हम सामनेवाले की समस्‍याओं को भी समझते , ईमानदारी हममें कूट कूट कर भरी होती, हर स्‍तर पर जिम्‍मेदारियों का सही ढंग से पालन किया जाता। आज हम किसी को गाली देने से नहीं चूकते  , पर जब मुझे कोई अधिकार मिलता है , उसका दुरूपयोग करने लगते हैं।