सोमवार, 26 दिसंबर 2011

मुहूर्त्‍त को लकर लोगों के भ्रम ... अतिथि पोस्‍ट ... (मेरे पिताजी श्री विद्या सागर महथा की)

कई प्रकार की व्‍यस्‍तता के कारण कुछ दिनों से अपने ब्‍लोग पर नियमित रूप से ध्‍यान नहीं दे पा रही हूं। फिलहाल जहां एक ओर दोनो बच्‍चों की छुट्टियां मनमाने ढंग से मनाने में उनकी मदद कर रही हूं , वहीं दूसरी ओर बिखरे पडे सभी आलेखों को संपादित कर उसे पुस्‍तकाकार देने में भी व्‍यस्‍त हूं। इस पुस्‍तक का काम जल्‍द ही पूरा हो जाएगा , जिसमें ज्‍योतिष की सारी कमियों को सटीक ढंग से स्‍वीकार करते हुए उसे दूर करने के उपायों की चर्चा की गयी है। जल्‍द ही इसकी पी डी एफ फाइल इंटरनेट पर डाल दूंगी , ताकि इसे पढकर ज्‍योतिष प्रेमी ज्‍योतिष के वास्‍तविक स्‍वरूप को समझ पाएं। इसी दौरान पिताजी की भी एक डायरी पढने का मौका मिला , उसमें से भी कुछ उपयोगी आलेखों को इस पुस्‍तक में सम्मिलित करने की भी इच्‍छा है। उन्‍हीं चुने हुए आलेखों में से एक आज आपके लिए प्रस्‍तुत है .....

आज के अनिश्चित और अनियमित युग में हर व्यक्ति स्वयं को असुरक्षित महसूस करता है। अपने कर्मों और कार्यक्रमों पर भरोसेवाली कोई बात नहीं रह जाती है। जैसे जैसे आत्मविश्वास में कमी होती जा रही है , मुहूर्त , यात्रा आदि संदर्भों की ओर लोगों का झुकाव बढ़ता जा रहा है। पत्र-पत्रिकाओं में अक्सर फिल्म-निर्माण प्रारंभ करने और उसके प्रदर्शन की शुरुआत के लिए मुहूर्त की चर्चा देखने को मिलती है। फिल्म-निर्माण करने में अधिक से अधिक खर्च-शक्ति और पूंजी की लागत होती है , कामयाबी मिलने पर लागत-पूंजी न केवल सार्थक होती है , वरन् प्रतिदान के रुप में कई गुणा बढ़ भी जाती है। दूसरी ओर फिल्म फलॉप होने पर फिल्म निर्माता दर-दर भटकाव की स्थिति को प्राप्त करते हैं। सचमुच फिल्म निर्माण बहुत बड़ा रिस्क होता है , इसलिए फिल्मनिर्माता एक अच्छे मुहूर्त की तलाश में होते हैं , ताकि काम अबाध गति से चलता रहे और प्रदर्शन के बाद भी फिल्म काफी लाभदायक सिद्ध हो। किन्तु वस्तुतः होता क्या है ? आज का फिल्म उद्योग काफी लाभप्रद नहीं रह गया है , कुछ सफल है , तो अधिकांश की स्थिति बिगड़ी हुई है। क्या सचमुच मुहूर्त काम करता है ?

पूरे देश में प्रवेशिका परीक्षा देनेवालों की संख्या करोड़ों में होती है। इस वैज्ञानिक युग में जैसे-जैसे मनोरंजन के साधन बढ़ते चले गए , पढ़ाई का वातावरण धीरे-धीरे कमजोर पड़ता चला गया। आज जैसे ही परीक्षा के लिए कार्यक्रम की घोषणा होती है , अधिकांश विद्यार्थी परेशान नजर आते हैं , क्योंकि उनकी तैयारी संतोषजनक नहीं होती है , इसलिए उनका आत्मविश्वास काम नहीं करता रहता है। प्रायः सभी विद्यार्थी और उनके अभिभावक अपने आवास से परीक्षा-स्थल पर पहुंचने के लिए मुहूर्त्‍त की तलाश में पंडितों के पास पहुंच जाते हैं। पंडितजी के पास ग्रहों , नक्षत्रों के आधार पर शोध किए गए कुछ विशिष्ट शुभ समय-अंतराल की तालिका होती है।

कभी महेन्द्र योग , कभी अमृत योग तो कभी सिद्धियोग से संबंधित इस प्रकार के शुभफलदायी लघुकालावधि की सूचना बारी-बारी से सभी विद्यार्थियों और अभिभावकों को दी जाती है या फिर एक ही विद्यार्थी पंडितजी से यह मुहूर्त्‍त प्राप्त कर कई विद्यार्थियों को जानकारी देते हैं। विद्यार्थी झुंड बनाकर एक ही साथ उसी शुभ मुहूर्त्‍त में अपने गांव , कस्बे या क्षेत्र से परीक्षास्थल के लिए निकलते हैं। पर सोंचने की बात है कि क्या सबका परिणाम एक सा होता है ? नहीं , विद्यार्थियों को उनकी प्रतिभा के अनुरुप ही फल प्राप्त होता है। उत्तीर्ण होने लायक विद्यार्थी सचमुच उत्तीर्ण होते हैं और जिन विद्यार्थियों के अनुत्तीर्ण होने की संभावना पहले से ही रहती है , वैसे ही विद्यार्थी अनुत्तीर्ण देखे जाते हैं। विरले ही ऐसे विद्यार्थी होते हैं , जिनका परीक्षा परिणाम प्रत्याशा के विरुद्ध होता है , उन विद्यार्थियों ने शुभ मुहूर्त्‍त में यात्रा नहीं की , इसलिए ही ऐसा हुआ , यह तो कदापि नहीं कहा जा सकता।

यहां तो मैं केवल यात्रा की बात कर रहा हूं , किन्तु कल्पना करें किसी समय अमृत योग , सिद्धि योग या महेन्द्र योग चल रहा हो और उसी समय किसी विषय की परीक्षा चल रही हो , तो क्या लाखों की संख्या में परीक्षा दे रहे विद्यार्थी उस विषय में उत्तीर्ण हो जाएंगे ? कदापि नहीं , सभी विद्यार्थियों को उनकी योग्यता के अनुरुप ही  परीक्षाफल की प्राप्ति होगी। अमृतयोग या सिद्धियोग कुछ काम नहीं कर पाएगा।

हर विषय की परीक्षा का समय निर्धारित होता है और लाखों की संख्या में परीक्षार्थी परीक्षा में सम्मिलित होकर भिन्न-भिन्न परीणामों को प्राप्त करते हैं। समय के छोटे से टुकड़े को ही मुहूत्र्त कहा जाता है। इस दृष्टिकोण से परीक्षा की कुल अवधि , जिसमें सभी विद्यार्थी परीक्षा दे रहे हैं , एक प्रकार का मुहूत्र्त ही हुआ। वह मुहूर्त्‍त अच्छा है या बुरा , सभी विद्यार्थियों के लिए एक जैसा ही होना चाहिए , परंतु क्या वैसा हो पाता है ? स्पष्ट है , ऐसा कभी नहीं हो सकता ।

बहुत बार समय का एक छोटा सा अंतराल आम लोगों को प्रभावित करता है। हवाई जहाज या रेल के दुर्घटनाग्रस्त होने पर सैकड़ो लोग एक साथ मरते हैं। इसी तरह युद्ध , भूकम्प या तूफान के समय मरनेवालों की संख्या हजारो में होती है। उक्त कालावधि को हम बहुत ही बुरे समय से अभिहित कर सकते हैं , क्योकि इस प्रकार की घटनाएं जनमानस पर बहुत ही बुरा प्रभाव डालती है , किन्तु इस प्रकार की घटनाओं को अच्छे योगों में भी घटते हुए मैंने पाया है। इसी प्रकार शुभ विवाह के लिए शुभ मुहूर्तों की एक लम्बी तालिका होती है , जिन तिथियों में ही शादी-विवाह की व्यवस्था की जाती है। परंतु बहुत बार हम ऐसा सुनते हैं कि आकस्मिक दुर्घटना के कारण बरातियों की मौत हो गयी , ऐसी हालत में इन योगों की कौन सी प्रासंगिकता रह जाती है ? क्या यह बात दावे से कही जा सकती है कि जो हवाई जहाज दुर्घटनाग्रस्त हुई , उसमें हवाई यात्रा करने से पूर्व सभी यात्रियों में से किसी ने मुहूर्त्‍त नहीं देखा होगा ? उसमें स्थित कोई आम आदमी , जो भाग्यवादी दृष्टिकोण भी रखता होगा , यात्रा के विषय में अवश्य ही पंडितों से सलाह ले चुका होगा , फिर भी सभी यात्रियो का परिणाम एक सा ही देखा जाता है।

जहां एक ओर  सामूहिक उत्सव , एक ही मेले में लाखो लोगों का एक साथ उपस्थित होना , सामूहिक विवाह , सौंदर्य प्रतियोगिता आदि सुखद अहसास खास समय अंतराल के विषय वस्तु हो सकते हैं , वहीं दूसरी ओर भूकम्प , तूफान , युद्ध और दुर्घटनाओं से लाखों लोगों का प्रभावित होना भी सच हो सकता है। इस प्रकार से अच्छे या बुरे समय को स्वीकार करना हमारी बाध्यता तो हो सकती है , किन्तु इन दोनों प्रकार के समयों को अलग-अलग कर दिखाने के सूत्रों की पकड़ जब अच्छी तरह हो जाएगी , तो फलित ज्योतिष के द्वारा समय और तिथियुक्त भविष्यवाणियां भी आसानी से की जा सकेगी।

अमुक दिन अमुक समय पर भूकम्प आनेवाला है , तूफान आनेवाला है , कहकर लोगों को सतर्क किया जा सकेगा। अगर ऐसा हो पाया तो बुरे समय का बोध स्वतः हो जाएगा। किन्तु अभी फलित ज्योतिष इतना ही विकसित है कि वह ग्रह की स्थिति अंश , कला और विकला तक कर सकता है , परंतु उसके फलाफल की प्राप्ति किस वर्ष होगी , इसकी भी चर्चा नहीं कर पाता । दूसरी ओर फलित ज्योतिष के ज्ञाता किसी खास घंटा और मिनट को भी शुभ और अशुभ कहने में नहीं चूकते हैं। फलित कथन की यह दोहरी नीति फलित ज्योतिष में भ्रम उत्पन्न करती है।

कभी-कभी एक ही समय में एक घटना घटित होती है और उस घटना का प्रभाव दो भिन्न-भिन्न व्यक्ति और समुदाय के लिए अलग-अलग यानि एक के लिए शुभ और दूसरे के लिए अशुभ फलदायक होता है। इस प्रकार की घटनाएं अक्सर होती हैं , एक हारता है , तो दूसरा जीतता है। एक को हानि होती है , तो दूसरा लाभान्वित होता है। वर्षों तक मुकदमा लड़ने के बाद दोनों पक्ष के मुकदमेबाज ज्योतिषी से सलाह लेने पहुंच जाते हैं। फैसले के लिए कौन सी तिथि का चुनाव किया जाए। पंचांग में एक बहुत ही शुभ समय का उल्लेख है। दोनो पक्ष भिन्न-भिन्न ज्योतिषियों से सलाह लेकर उस शुभ दिन को फैसले की सुनवाई के लिए तैयार होकर जाते हैं। पर परिणाम क्या होगा ? एक को जीत तो दूसरे को हार मिलनी ही है। निर्धारित शुभ समय एक के लिए शुभफलदायक तो दूसरे के लिए अशुभ फलदायक होगा।

दो देशों के मध्य क्रिकेट मैच हो रहा है।  दोनो देशों के निवासी बड़ी तल्लीनता के साथ मैच देख रहे होते हैं। कई घंटे बाद निर्णायक क्षण आता है। जीतनेवाला देश कुछ ही मिनटों में खुशी का इजहार करते हुए करोड़ो रुपए की आतिशबाजी कर लेता है , किन्तु प्रतिद्वंदी देश गम में डूबा , शोकाकुल मातम मनाता रहता है। ऐसे निर्णायक क्षण को बुरा कहा जाए या अच्छा , निर्णय करना आसान नहीं है। इसी तरह बंगला देश के आविर्भाव के समय 1971 में दिसम्बर के पूर्वार्द्ध में एक पखवारे तक दोनो देशों के बीच युद्ध होता रहा , जान-माल की हानि होती रही। बंगला देश अस्तित्व में आया। सिद्धांततः भारत की जीत हुई , पाकिस्तान की पराजय। किन्तु दोनो ही देशों को भरपूर आर्थिक नुकसान हुआ। इन पंद्रह दिनों की अवघि को किस देश के लिए किस रुप में चिन्हित किया जाए। 15 दिनों के अंदर उल्लिखित अमृत , महेन्द्र और सिद्धियोग का भारत और पाकिस्तान के सैनिकों के लिए और बंगला देश के नागरिकों के लिए क्या उपयोगिता रही ?

इस अवधि में बंगला देश निवासी स्त्री-पुरुषों के साथ पाकिस्तानी सैनिकों का अत्याचार अपनी पराकाष्ठा पर था। क्या फलित ज्योतिष के दैनिक मुहूर्तों का इनपर कोई प्रभाव पड़ सका ? मुहूर्त के रुप मे छोटे-छोटे अंतराल की चर्चा न कर स्थूल रुप से ही इस लम्बी अवधि तक की युद्ध की विभीषिका को क्या फलित ज्योतिष में एक अनिष्टकर योग के रुप में  चित्रित किया जा सकता है ? नहीं , क्योकि इस घटना का प्रभाव सारे विश्व के लिए एक जैसा नहीं था । न्यूटन के तीसरे नियम के अनुसार प्रत्येक क्रिया के बराबर और विपरीत एक प्रतिक्रिया होती है। यदि यह प्रकृति का नियम है , तो समय के छोटे से अंतराल में भी , जिसे हम बुरा या अशुभ फल प्रदान करनेवाला कहते हैं , किसी न किसी का कल्याण हो रहा होता है।

अतः किसी भी समय को किसी व्यक्ति विशेष के लिए अच्छा या बुरा समय कहना ज्यादा सटीक होगा। अमृत योग में भी किसी को फांसी पर लटकाया जा सकता है , विषयोग में भी कल्याणकारी कार्य हो सकते हैं । किसी वर्ष मक्का-मदीना में गए हजयात्रियों की संख्या 20 लाख थी। गैस-रिसाव से अग्नि प्रज्वलित हुई तथा तेज हवा के झोकों के कारण आग की लपटे हजारो पंडालों तक फैल गयी। इससे 400 तीर्थयात्री मारे गए। शेष हजयात्रा पूरी करके सकुशल वापस आ गए। जो मारे गए , वे सीधे जन्नत सिधार गए। उनका संपूर्ण परिवार पीडि़त हुआ। जो घायल हुए , वे स्वयं पीडि़त हुए। शेष हादसे से प्रभावित नहीं होने के कारण हजयात्रा की सफलता को उपलब्धि के रुप में लेंगे। सभी अपने अपने दशाकाल के अनुसार फल की प्राप्ति कर रहे थे , मुहूर्त के अनुसार उनका फल प्रभावित नहीं हुआ।

किसी धनाढ्य व्यक्ति के यहां लक्ष्मीपूजन किस समय किया जाए , इसके लिए पंडित शुभ मुहूर्त निकाल देते हैं , पूजा भी हो जाती है , धन की वर्षा भी होने लगती है , किन्तु एक पंडित अपने लिए वह शुभ मुहूर्त कभी नहीं निकाल पाता है । यदि पक्के विश्वास की बात होती , तो पंडित उस शुभ घड़ी में स्वयं अपने यहां लक्ष्मी-पूजन करता और धन की वर्षा उसी के यहां होती , उसे केवल दक्षिणा से संतुष्ट रहने की बात नहीं होती।

निष्कर्ष यह है कि हर समय का महत्व हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग होता है। पंचांग में यदि एक समय को शुभ लिख दिया जाए , तो कोई समय शुभ नहीं हो जाएगा। एक समय एक व्यक्ति हॅसता है , तो दूसरा रोता है। यात्रा या मुहूर्त के बल पर बुरे समय को अच्छे समय में बदलना कठिन ही नहीं , असंभव कार्य है। अपने कर्मफल को भोगने के लिए हम सभी विवश हैं। किसी की यात्रा या मुहूर्त उसी दिन शुरु हो जाता है , जिस दिन उसका जन्म पृथ्वी पर होता है। जबतक यह जीवन है , हर व्यक्ति अपने यात्रा-पथ में है।

जन्म के अनुसार संस्कार , विचारधारा , कर्तब्य , सुखदुख सब निर्धारित है। जन्मकालीन ग्रहों द्वारा निर्मित वातावरण इन सबके लिए काफी हद तक जिम्मेवार है। जन्म से मृत्यु तक के यात्रापथ में उसके समस्त कार्यक्रम , उसकी सफलता और असफलता तक के क्षणों का निर्धारण लगभग हो चुका होता है। इस बीच यदि कोई बार-बार मुहूर्त की तलाश करता है , तो क्या सचमुच अपनी प्रकृति , विचारधारा , कार्यप्रणाली और मंजिल को बदलने की क्षमता रखता है ? यदि ये सारे संदर्भ हर समय बदल दिए जाए , तो व्यक्ति कहां पहुंचेगा ?

पंचांगों में शुभ विवाह के लिए बहुत सारे मुहूर्तों का उल्लेख होता है। वैवाहिक बंधनों में बॅघनेवालों के लिए शुभ तिथियां कुल मिलाकर 40 से 50 के बीच होती हैं। उनमें भी कई प्रकार के दोषों का उल्लेख रहता है। लोग भ्रमजाल में उलझे उनमें से किसी अच्छी तिथि के लिए पंडितों के पास पहुंचते हैं। अभिभावकों के पास पंचांगों में लिखी बातों को मानने के अलावा और कोई उपाय नहीं होता। वैवाहिक संस्कार जीवन का एक बहुत ही महत्वपूर्ण संस्कार है , इसका बंधन बहुत ही नाजुक होता है , संपूर्ण जीवन पर गहरा प्रभाव डालनेवाला।

इसलिए लोग शुभलग्न या शुभ तिथियों में ही विवाह निश्चित करते हैं। सीमित तिथियां होने से कभी-कभी एक ही तिथि में शादी की इतनी भीड़ हो जाती है कि हर प्रकार की व्यवस्था में अभिभावकों को काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उत्सवी वातावरण बोझिल बन जाता है। जिस कार्यक्रम की शुरुआत में ही कष्ट या तनाव हो जाए , उसका मनोवैज्ञानिक बुरा प्रभाव भविष्य में भी देखने को मिलता है। शुभ तिथि के चयन में इस बात का सर्वाधिक महत्व होना चाहिए कि वांछित कार्यक्रम का किस प्रकार से समापन हो , पर इसका सहारा न लेकर ऊबाऊ मुहूर्त की चर्चा करना समाज में व्यर्थ का बोझ देना है। 

पंचांग में शुक्र के अस्‍त होने पर शादी के लिए कोई शुभ लग्न पंचांगों में दर्ज नहीं किया जाता है। पर ज्योतिषियों को यह मालूम होना चाहिए कि शुक्र का अस्त होना हर स्थिति में कष्टकर नहीं होता। सूर्य के साथ अंतर्युति करते हुए जब शुक्र अस्त होता है , तो वह आम लोगों के लिए कष्टकर हो सकता है , किन्तु वही शुक्र सूर्य से बहिर्युति करते हुए जब अस्त हो , तो बहुत ही अच्छा फल प्रदान करता है। जब शुक्रास्त सूर्य के साथ बहिर्युति करते होता है तो शुक्र की कमजोरी को दृष्टिकोण में रखकर वैवाहिक शुभ लग्न का उल्लेख नहीं करना अनजाने में बहुत बड़ी भूल होती है। पंचांग निर्माता या फलित ज्योतिष के विशेषज्ञ विभिन्न कारणों से शादी के लिए किसी वर्ष शुभ लग्न की कितनी भी कमी दर्ज क्यों न करें , विवाह की कुछ संख्या घट सकती है , परंतु होगी तो अवश्य ही और यदि वे लागातार कुछ वर्षों तक शुभ लग्न की कमी दिखलाते रहें तो विवाह बिना लग्न के ही होते देखे जाएंगे।

कहने का अभिप्राय यह है कि विधि-निषेध ओर कर्मकाण्ड से संबंधित ज्योतिषीय चर्चा जब भी हो , उसका ठोस वैज्ञानिक आधार होना आवश्यक होगा , अन्यथा उन नियमों की अवहेलना स्वतः युग के साथ होनी स्वाभाविक है। जब आजतक ग्रह-शक्ति निर्धारण और उनके प्रतिफलन काल से संबंधित ठोस सूत्र ज्योतिषियों को मालूम नहीं है , तो मुहूर्त को लेकर तनाव में पड़ने की कोई आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। जबतक फलित ज्योतिष को विकसित स्वरुप न प्रदान कर दी जाए , यानि ग्रह की इस स्थिति का यह परिणाम होगा , यह बात दावे से न कही जा सके , तबतक ज्योतिषियों के अधूरे ज्ञान या संशय का लाभ जनता को मिलना चाहिए। अनावश्यक विधि निषेध से संबंधित नियमावलि से आमलोगों को कदापि परेशान नहीं किया जाना चाहिए।

शादी के लिए कन्या पक्ष और वरपक्ष तैयार है , सांसारिक दृष्टि से उसे अंजाम देने में सप्ताह भर का समय काफी है , परंतु फिर भी विवाह नहीं हो पा रहा है , इसका कारण यह है कि पंचांग में शुभ लगन का अभाव है। इस तरह सिर्फ वैवाहिक लग्न के संदर्भ में ही नहीं , अपितु हर प्रकार के कार्यों में पंचांगों में दर्ज मुहूर्तों का अभाव आम जीवन में कई प्रकार की असुविधाओं को जन्म देता है , जबकि विश्वासपूर्वक मुहूर्तों की उपयोगिता और प्रभाव को अभी कदापि सिद्ध नहीं किया जा सका है।

स्मरण रहे , हर शुभ मुहूर्त का आधार तिथि , नक्षत्र , चंद्रमा की स्थिति , योगिनी , दिशा और ग्रहस्थिति के आधार पर किया गया है , किन्तु ग्रह-शक्ति के सबसे बड़े आधार ग्रह की विभिन्न प्रकार की गतियों के आधार पर मुहूर्तों का चयन नहीं हुआ है। अतः अभी तक के मुहूर्त पूर्ण विश्वसनीय नहीं हैं। अभी यह भी अनुसंधान बाकी ही है कि एक व्यक्ति के लिए सभी शुभ मुहूर्त शुभफल ही प्रदान करते हैं , अतः कर्मकाण्ड से डरने की कोई आवश्यकता नहीं। विकसित विज्ञान का काम सभी व्यक्तियों के मन से भय को दूर कर मनुष्य को निडर बनाना है। .. और हमें उसी प्रयास में बने रहना चाहिए।

न तो एक व्यस्त डॉक्टर मुहूर्त देखकर रोगी का ऑपरेशन करता है , और न ही एक व्यस्त वकील मुहूर्त देखकर अपने मुकदमें की पैरवी करता है , न ही एक कुशल वैज्ञानिक मुहूर्त देखकर उपग्रह या मिसाइल का प्रक्षेपण करते हैं। जो अधिक फुर्सत में होते है , वे ही मुहूर्त की तलाश में होते हैं या फिर जिनके आत्मविश्वास में थोड़ी कमी होती है , वे ही मुहूर्त की चर्चा करते हैं। योजनाओं के अनुरुप हर प्रकार के संसाधन उपस्थित हो तो किसी भी व्यक्ति को यह समझ लेना चाहिए कि मुहूर्त स्वयं आकर हमारे सामने खड़ा है , उसे ढूंढ़ने के लिए पंडित के पास जाने की आवश्यकता नहीं। ऐसी परिस्थिति उत्पन्न होने पर किसी भी व्यक्ति को अपने काम में विलम्ब नहीं करना चाहिए। यह अलग बात हे कि जब योजना को स्वरुप देने में संसाधन की कमी हो रही हो , कई तरह की बाधाएं उपस्थित हो रही हो , तो ऐसी परिस्थिति में ज्योतिषी से यह सलाह लेने की बात हो सकती है कि निकट भविष्य में कोई शुभ मुहूर्त उसके जीवन में है या नहीं ?   

सोमवार, 5 दिसंबर 2011

विश्वविद्यालयों में ज्योतिष की पढाई का विरोध क्‍यूं ??

दिल्ली की एचआरडी मिनिस्ट्री छह जनवरी से एक पाठ्यक्रम शुरू करने जा रही है ,ज्योतिष और वास्तु शास्त्र को लेकर जिस तरह से टीवी चैनलों-न्यूज पेपरों मे अंधविश्‍वासी बातें सामने आ रही हैं, उसको ध्यान में रखकर देश के विद्वानों से राय लेकर  तीन महीने के इस तरह के पाठ्यक्रमों को चलाने की योजना बनायी गयी। लोगों को ज्योतिष और वास्तु शास्त्र विधाओं से परिचित कराने की जिम्मेदारी लखनऊ स्थित केंद्रीय राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान को दी गई है। इससे पूर्व भी यू जी सी द्वारा ज्‍योतिष की शिक्षा देने का कार्यक्रम बनाया गया था , पर इसे जनसामान्‍य का विरोध झेलना पडा था। पर मेरा मानना है कि किसी प्रकार का ज्ञान हर प्रकार के भ्रम का उन्‍मूलन करता है , इसलिए इसका विरोध नहीं होना चाहिए। मै पहले भी इस संबंध में आलेख लिख चुकी हूं।

जब हमारी प्राचीन वैदिक ज्ञानसंपदा सामाजिक , राजनीतिक , आर्थिक , नैतिक , धार्मिक ,वैज्ञानिक , पर्यावरणीय और स्वास्थ्य की दृष्टि से सही साबित हो रही है , तो फिर विश्वविद्यालयों में ज्योतिष की पढ़ाई को लेकर बवाल क्यों मचाया जाता है ? वैज्ञानिक संसाधनों के अभाव के बावजूद हमारे ऋषि मुनियों के द्वारा `गणित ज्योतिष´ का विकास जब इतना सटीक है , तो उन्हीं के द्वारा विकसित `फलित ज्योतिष´ अंधविश्वास कैसे हो सकता है ? भले ही सदियों की उपेक्षा के कारण वह अन्य विज्ञानों की तुलना में कुछ पीछे रह गया हो और इस कारण उसके कुछ सिद्धांत आज की कसौटी पर खरे न उतरते हों। भले ही व्यक्ति अपनी मेहनत , अपने स्तर और अपने कर्मों के अनुसार ही फल प्राप्त करता हो , किन्तु उनकी परिस्थितियों और चारित्रिक विशेषताओं पर ग्रह का ही नियंत्रण होता है और `गत्यात्मक ज्योतिष´ द्वारा इसे सिद्ध किया जा सकता है।


मानव जब जंगल में रहते थे , उस समय भी उनकी जन्मपत्री बनायी जाती , तो वैसी ही बनती , जैसी आज के युग में बनती है। वही बारह खानें होते , उन्हीं खानों में सभी ग्रहों की स्थिति होती , विंशोत्तरी के अनुसार दशाकाल का गणित भी वही होता , जैसा अभी होता है। आज भी अमेरिका जैसे उन्नत देश तथा अफ्रीका जैसे पिछड़े देश में लोगों की जन्मपत्र एक जैसी बनती है। मानव जाति ने अपने बुद्धि के प्रयोग से जंगलों की कंदराओं को छोड़कर सभ्य और प्रगतिशील समाज की स्थापना की है , ये सब किसी के भाग्य में लिखे नहीं थे , ये चिंतन , अन्वेषण और प्रयोग के ही परिणाम हैं। लेकिन यह तो मानना ही होगां कि इसके लिए प्रकृति ने अन्य जानवरों की तुलना में मानव को अतिरिक्त बुद्धि से नवाजा। यदि यह नहीं होता , तो मनुष्य आज भी पशुओं की तरह ही होते। बस इसी तरह सामूहिक तौर पर ही नहीं ,  प्रकृति व्‍यक्तिगत तौर पर भी हमारी मदद करती है। 


विश्वविद्यालय में ज्योतिष का प्रवेश विवाद का विषय नहीं होना चाहिए , विवाद सिर्फ इसपर हो कि ज्योतिष के विभाग में नियुक्ति किनकी हो और पुस्तकें कैसी रखी जाएं ? यदि इसमें भी राजनीति हुई , तो ज्योतिष जैसा पवित्र विभाग भी मैला हो जाएगा।

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

पूरे ब्रह्मांड में बनते रहते हैं सुंदर सुंदर दृश्‍य .....

जिस तरह पृथ्‍वी में सुंदर दृश्‍यों की कमी नहीं , वैसे ही पूरे ब्रह्मांड में भी बनते रहते हैं। हमारा ब्रह्मांड करोड़ों निहारिकाओं के समूह से भरा हुआ है। आसमान में अक्‍सर इनकी विभिन्‍न गतियों के कारण सुंदर दृश्‍य बनते हैं। कभी कभी इनमें से किसी एक को आधी रात के आकाश में धुंधले बादल के रूप में देख सकते हैं। टेलीस्कोप से देखने पर यह बैलगाड़ी के चक्के के समान दिखाई देती है। कोरी आंखों से जरा ध्यान से देखना होता है। अन्‍य ग्रहों , उपग्रहों और नक्षत्रों की चाल और विशेषताओं के फलस्‍वरूप सौरमंडल के अंदर और सौरमंडल के बाहर और धरती से सटे आसमान में दिखाई देने वाले आकाश के ऐसे प्राकृतिक सुंदर दृश्‍यों को नासा कैमरे में कैद कर अपनी वेबसाइट पर डाल दिया करता है। इंटरनेट में मौजूद आसमान के इन सुंदर दृश्‍यों के साथ साथ नासा के आसमान में किए गए क्रियाकलापों के कुछ कृत्रिम सुंदर दृश्‍यों को भी इस पृष्‍ठ पर देखा जा सकता है। मैं तो इन्‍हे नियमित देखती हूं , आप भी आनंद लिया कीजिए। कुछ खास चित्र यहां दिए जा रहे हैं .....











ऐसे ही और दृश्‍यों का आनंद लेना चाहते हैं तो अभी पहुंच जाइए यहां पर ....दश्‍यों के साथ साथ इनसे संबंधित जानकारियां भी यहां उपलब्‍ध हैं।

सोमवार, 7 नवंबर 2011

ग्रहीय स्थिति के हिसाब से 11-11-11 जादुई आंकडें का दिन नहीं !!

इंतजार की घडी बहुत निकट आ गयी है , 11-11-11 के जादुई आंकडें के दिन में मात्र चार दिन बच गए हैं। जैसे जैसे यह निकट आ रहा है , वैसे वैसे शुभ काम शुरू करने की प्रतीक्षा में युवाओं के दिल की धडकने तेज हो गयी है। कुछ विवाह के लिए तो कई परिवार नन्हे मेहमान के इंतजार में बैठे है। वे चाहते हैं कि बच्चा सदी की खास तारीख 11-11-11 को ही इस दुनिया में आए। यहां तक कि ऐश्वर्या राय ने भी इसी दिन मां बनने का निश्‍चय किया है। अंक ज्‍योतिषियों की मानें , छह 1 यनि ट्रिपल इलेवन के आने से ही यह दिन महत्‍वपूर्ण बन गया है। इस दिन लडका हुआ तो राजयोग में जन्‍म लेगा , धनवान , ईमानदार, ऊर्जावान , कुशल नेतृत्वकर्ता , पुरुषार्थी होगा , जबकि बेटी हुई तो शक्ति का अवतार और धर्मपरायण होगी , उसे संगीत से लगाव होगा तथा वह लेखनी में निपुण होगी। इस खास तारीख का महत्‍व अंक विशेषज्ञों ने ऐसा बना डाला है कि लोग इस दिन सिजेरियन के लिए भी तैयार हैं ,  दस दिन पूर्व और पश्‍चात् जन्‍म लेने वाले बच्‍चे भी इसी दिन जन्‍म लेने को विवश हैं। कइयों के मां बाप ने तो अस्‍पतालों में एडवांस बुकिंग भी करा ली है और इस दिन की प्रसूति के लिए विशेषज्ञ डॉक्‍टरों की देख रेख में गर्भवती महिलाओं को रखा गया है।

पर ज्‍योतिष की दृष्टि से देखा जाए तो इस दिन ग्रहों की स्थिति की ऐसी कोई खासियत नहीं दिखाई देती , जिसका प्रभाव जन्‍म लेने वाले बच्‍चे पर असाधारण ढंग से पडे। यह दिन पूर्णिमा का है , इसलिए ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष के हिसाब से चंद्रमा पूरी ताकत में होगा , इस कारण बच्‍चे के बचपन के स्‍वच्‍छंद मनोवैज्ञानिक विकास में कोई बाधा नहीं होनी चाहिए। मंगल की राशि में पूर्ण चंद्र मंगल से संबंधित पक्षों को भी मजबूत बन सकता है। पर इसके साथ का वक्री बृहस्‍पति बच्‍चे को किसी न किसी मुद्दे को लेकर संवेदनशील बनाएगा , जिसका प्रभाव भी उसके विकास पर पडेगा। इस जातक की चंद्र कुंडली में दो दो ग्रहों बुध और शुक्र की आठवें भाव में स्थिति बनेगी , जिसके कारण जीवन के तीन चार पक्ष मनोनुकूल नहीं बने रहने से जीवन में बाधाएं आती रहेंगी। यही नहीं , इन ग्रहों के प्रभाव से बचपन में ही छह वर्ष की उम्र के बाद ही पारिवारिक मामलों में कई तरह की बाधाएं देखने को मिलेगी। चंद्रमा के बाद एक शनि की ग्रह स्थिति ही कुछ मनोनुकूल बनकर जातक को कभी कभी अपने संदर्भों में राहत दे सकती है , पर जिस प्रकार के असाधारण बच्‍चों की बात अंक विशेषज्ञ कर रहे हैं , वैसा तो गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष के हिसाब से हमें नहीं दिखाई देता।
 

रविवार, 30 अक्तूबर 2011

हैकरों के लिए ऐसे पासवर्डों का तोड निकालना कुछ कठिन होता है !!

इस वर्ष नवरात्र में दस बारह दिनों के लिए गांव चली गयी , चूंकि गांव में मेरे पास कंप्‍यूटर और इंटरनेट की सुविधा नहीं थी , इसलिए इतने दिनों तक अपने जीमेल को लॉगिन भी नहीं कर सकी। आने के बाद जैसे ही काम करना शुरू किया , एलर्ट आने शुरू हुए। मेरा अकाउंट 8 अक्‍तूबर को किसी दूसरे देश से खोला गया था। राहत की बात थी कि किसी को मेल वगैरह नहीं किया गया था। मैने झट से पासवर्ड बदला , पर बदलने के बाद भी मुझे कोई राहत नहीं मिली। 11 अक्‍तूबर को ब्राजील और 13 अक्‍तूबर को टर्की से पुन: इस अकाउंट को खोले जाने की सूचना मिली। इसके बाद मैने अपने पासवर्ड को बहुत मजबूत बनाया , उसमें कैपिटल , स्‍माल अक्षरों और अंकों के साथ संकेत चिन्‍हों का भी प्रयोग किया , यानि कि वैसा ही मजबूत पासवर्ड रखा , जैसा इंटरनेट बैंकिंग में रखने की सलाह दी जाती है ..


पासवर्ड को बदलने के बाद इतने दिन गुजर चुके हैं , अभी तक पुन: ऐसी कोई सूचना नहीं मिली है । शायद हैकरों के लिए ऐसे पासवर्डों का तोड निकालना शायद कुछ कठिन होता हो या फिर उन्‍हें अब मेरे अकाउंट को खोलने की आवश्‍यकता नहीं हो रही हो , पर मुझे तो राहत मिल गयी है। हालांकि ऐसे पासवर्डों को याद रखना लोगों के लिए भी कठिन होता है , पर मेरी सलाह है कि  इंटरनेट का अच्‍छी तरह उपयोग करनेवालों को ऐसी सावधानी बरतनी ही चाहिए , उन्‍हें ऐसे ही पासवर्ड रखने चाहिए , क्‍यूंकि अकाउंट का दुरूपयोग किए जाने के बाद कोई चारा नहीं होता।

बुधवार, 26 अक्तूबर 2011

भला बिना बच्‍चों के कैसी दीपावली ??

वैसे तो पूरी दुनिया में हर देश और समाज में कोई न कोई त्‍यौहार मनाए जाते हैं , पर भारतीय संस्‍कृति की बात ही अलग है। हर महीने एक दो पर्व मनते ही रहते हैं , कुछ आंचलिक होते हैं तो कुछ पूरे देश में मनाए जानेवाले। दीपावली , ईद और क्रिसमस पूरे विश्‍व में मनाए जाने वाले तीन महत्‍वपूर्ण त्‍यौहार हैं , जो अलग अलग धर्मों के लोग मनाते हैं। भारतवर्ष में पूरे देश में मनाए जानेवाले त्‍यौहारों में होली , दशहरा , दीपावली जैसे कई त्‍यौहार हैं। त्‍यौहार मनाने के क्रम में लगभग सभी परिवारों में पति खर्च से परेशान होता है , पत्‍नी व्रत पूजन , साफ सफाई और पकवान बनाने के अपने बढे हुए काम से , पर बच्‍चों के लिए तो त्‍यौहार मनोरंजन का एक बडा साधन होता है। स्‍कूलों में छुट्टियां है , पापा के साथ घूमघूमकर खरीदारी करने का और मम्‍मी से मनपसंद पकवान बनवाकर खाने की छूट है , तो मस्‍ती ही मस्‍ती है। मम्‍मी और पापा की तो बच्‍चों की खुशी में ही खुशी है। सच कहं , तो बच्‍चों के बिना कैसा त्‍यौहार ??

पर आज सभी छोटे छोटे शहरों के मां पापा बिना बच्‍चों के त्‍यौहार मनाने को मजबूर हैं। चाहे होली हो , दशहरा हो या दीपावली , किसी के बच्‍चे उनके साथ नहीं। इस प्रतियोगिता वाले दौर में न तो पढाई छोटे शहरों में हो सकती है और न ही नौकरी। दसवीं पास करते ही अनुभवहीन बच्‍चों को दूर शहरों में भेजना अभिभावकों की मजबूरी होती है , वहीं से पढाई लिखाई कर आगे बढते हुए कैरियर के चक्‍कर में वो ऐसे फंसते हैं कि पर्व त्‍यौहारों में दो चार दिन की छुट्टियों की व्‍यवस्‍था भी नहीं कर पाते। मैं भी पिछले वर्ष से हर त्‍यौहार बच्‍चों के बिना ही मनाती आ रही हूं। दशहरे में गांव चली गयी , भांजे भांजियों को बुलवा लिया , नई जगह मन कुछ बहला। पर दीपावली में अपने घर में रहने की मजबूरी थी , लक्ष्‍मी जी का स्‍वागत तो करना ही पडेगा। पर बच्‍चों के न रहने से भला कोई त्‍यौहार त्‍यौहार जैसा लग सकता है ??

पहले संयुक्‍त परिवार हुआ करते थे , तीन तीन पीढियों के पच्‍चीस पचास लोगों का परिवार , असली त्‍यौहार मनाए जाते थे। कई पीढियों की बातें तो छोड ही दी जाए , अब तो त्‍यौहारों में पति पत्‍नी और बच्‍चों तक का साथ रह पाना दूभर होता है। जबतक बच्‍चों की स्‍कूली पढाई चलती है , त्‍यौहारों में पति की अनुपस्थिति बनी रहती है , क्‍यूंकि बच्‍चों की पढाई में कोई बाधा न डालने के चक्‍कर में वे परिवार को एक स्‍थान पर शिफ्ट कर देते हैं और खुद तबादले की मार खाते हुए इधर उधर चक्‍कर लगाते रहते हैं। हमारे मुहल्‍ले के अधिकांश परिवारों में किराए में रहनेवाली सभी महिलाएं बच्‍चों की पढाई के कारण अपने अपने पतियों से अलग थी। पर्व त्‍यौहारों में भी उनका सम्मिलित होना कठिन होता था , किसी के पति कुछ घंटों के लिए , तो किसी के दिनभर के लिए समय निकालकर आ जाते। मैने खुद ये सब झेला है , भला त्‍यौहार अकेले मनाया जाता है ??

बच्‍चों की शिक्षा जैसी मौलिक आवश्‍यकता के लिए भी सरकार के पास कोई व्‍यवस्‍था नहीं है। पहले समाज के सबसे विद्वान लोग शिंक्षक हुआ करते थे , सरकारी स्‍कूलों की मजबूत स्थिति ने कितने छात्रों को डॉक्‍टर और इंजीनियर बना दिया था। पर समय के साथ विद्वान दूसरे क्षेत्रों में जाते रहें और शिक्षकों का स्‍तर गिरता चला गया। शिक्षकों के हिस्‍से इतने सरकारी काम भी आ गए कि सरकारी स्‍कूलों में बच्‍चों की पढाई पीछे होती गयी।सरकार ने कर्मचारियों के बच्‍चों के पढने के लिए केन्‍द्रीय स्‍कूल भी खोलें , उनमें शिक्षकों का मानसिक स्‍तर का भी ध्‍यान रखा , पर अधिकांश क्षेत्रों में खासकर छोटी छोटी जगहों के स्‍कूल पढाई की कम राजनीति की जगह अधिक बनें।  इसका फायदा उठाते हुए प्राइवेट स्‍कूल खुलने लगे और मजबूरी में अभिभावकों ने बच्‍चों को इसमें पढाना उचित समझा। आज अच्‍छे स्‍कूल और अच्‍छे कॉलेजों की लालच में बच्‍चों को अपनी उम्र से अधिक जबाबदेही देते हुए हम दूर भेज देते हैं। अब नौकरी या व्‍यवसाय के कारण कहीं और जाने की जरूरत हुई तो पूरे परिवार को ले जाना मुनासिब नहीं था। इस कारण परिवार में सबके अलग अलग रहने की मजबूरी बनी रहती है।

वास्‍तव में अध्‍ययन के लिए कम उम्र के बच्‍चों का माता पिता से इतनी दूर रहना उनके सर्वांगीन विकास में बाधक है , क्‍यूंकि आज के गुरू भी व्‍यावसायिक गुरू हैं , जिनका छात्रों के भविष्‍य या चरित्र निर्माण से कोई लेना देना नहीं। इसलिए उन्‍हें अपने घर के आसपास ही अध्‍ययन मनन की सुविधा मिलनी चाहिए।  यह सब इतना आसान तो नहीं , बहुत समय लग सकता है , पर पारिवारिक सुद्ढ माहौल के लिए यह सब बहुत आवश्‍यक है। इसलिए आनेवाले दिनों में सरकार को इस विषय पर सोंचना चाहिए।  मैं उस दिन का इंतजार कर रही हूं , जब सरकार ऐसी व्‍यवस्‍था करे , जब प्राइमरी विद्यालय में पढने के लिए बच्‍चे को अपने मुहल्‍ले से अधिक दूर , उच्‍च विद्यालय में पढने के लिए अपने गांव से अधिक दूर , कॉलेज में पढने या कैरियर बनाने के लिए अपने जिले से अधिक दूर जाने की जरूरत नहीं पडेगी। तभी पूरा परिवार साथ साथ रह पाएगा और आनेवाले दिनों में पर्व त्‍यौहारों पर हम मांओं के चेहरे पर खुशी आ सकती है , भला बिना बच्‍चों के कैसी दीपावली ??

आप सबकी .. आपके परिवार की और आपके मित्रों की दीपावली मंगलमय हो !!!!!! .. संगीता पुरी




सोमवार, 24 अक्तूबर 2011

आपको जन्‍मदिन की बहुत बहुत बधाई मम्‍मी !!

ज्योतिष से जुड़े होने के कारण पापाजी की चर्चा अक्सर कर लेती हूँ , पर मम्मी को आज पहली बार याद कर रही हूँ . बिहार के नवादा जिले के एक गांव खत्रिया माधोपुर के एक समृद्ध परिवार में सत्‍तर वर्ष पूर्व कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी यानि धनतेरस की संध्या  स्व करतार नारायण कपूर की पुत्री के रुप में साक्षात लक्ष्मी का जन्‍म हुआ। बचपन से विवाह होने तक पांच भाइयों और पांच भतीजों के मध्य अकेली होने के कारण काफी लाड प्यार से पालन पोषण होता रहा . किन्तु जैसा कि हर बेटियों का प्रारब्ध है, उन्‍होने जन्म वहां लिया , परंतु रोशनी फैलाने वह हमारे घर पहुच गयी।

शायद ही किसी दार्शनिक या विचारक का दाम्पत्य जीवन इतना सफल रहता है , जितना कि मेरे पापाजी का रहा । इसका सारा श्रेय मेरी मम्मी की कर्तब्यपरायणता , सहनशीलता , उदारता और त्याग को ही जाता है। पापाजी चालीस वर्षों तक अपनी ज्योतिष की साधना में लीन रहें , उनको कोई व्यवधान न देकर उन्होनें घर-गृहस्थी की सारी जवाबदेही अपने कंधों पर उठायी। सारे जीवन में अधिकारों की कोई चिंता नहीं , केवल कर्तब्य निभाती रही , चाहे सास-ससुर हों या देवर-ननद या देवरानिया-जिठानिया । भतीजे-भतीजीयों और बेटे-बेटियों की जिम्‍मेदारी तो थी ही उनकी। 

सभी बच्चों के उचित लालन-पालन करने , शिक्षा-दीक्षा देने में वे सफल हुईं। मैं जैसा समझती हॅ , इसका सबसे बड़ा कारण माना जा सकता है , उनके गजब के दृष्टिकोण को । सकारात्मक दृष्टिकोण के बारे में लोग कहते हैं - ‘गिलास में आधा पानी हो तो उसे आधा गिलास खाली न कहकर आधा गिलास भरा कहो।’ पर मेरी मम्मी तो दस प्रतिशत भरे गिलास को भी गिलास में पानी है , कहना पसंद करेगी। फूल की प्रशंसा तो हर कोई करता है , काटों की भी प्रशंसा करना कोई मेरी मम्मी से सीखे। किसी के हजारो खामियों को छोड़कर उसके गिने-चुने गुणों की प्रशंसा करते ही मैंने उन्हें देखा और सुना है। 

गाँव में न जाने कितने सास-ससुर इनकी जैसी बहू पाने , कितने ही नौजवान इनकी जैसी पत्नी या भाभी पाने , कितने बच्चे इनकी जैसी माँ और चाची , मामी पाने के लिए आहें भरते रह गए , पर जिन्हें आसानी से सुख मिल जाता है , वो कहाँ कभी उसकी कद्र कर पाता है। आज जब उम्र के उस मोड़ पर मैं खड़ी हूँ , जहाँ वे बीस वर्ष पूर्व वे खड़ी थीं , मैं उनकी महानता को नजरअंदाज नहीं कर पा रही । मेरा आदर्श मेरी माँ है और कोई नहीं , मैं उनके जैसी मेहनती, सहनशील और कर्तब्यपरायण बनना चाहती हूँ । मैं ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ कि मुझे उतनी शक्ति प्रदान करे। ईश्‍वर आपको लंबी आयु और हर सुख दे मम्‍मी , आपको जन्‍म दिन की बहुत बहुत बधाई !!!!!!!

बुधवार, 28 सितंबर 2011

'गत्‍यात्‍मक चिंतन' के सभी पाठकों को नवरात्र की शुभकामनाएं !!

navratri Scraps

ABCD पढते जाएं ..... जय माता दी कहते जाएं !!!!!

आपको ABCD आती है क्‍या ??
आती भी होगी तो ऐसी तो नहीं आती होगी ....
क्‍यूंकि ऐसी ABCD आपको अभी तक किसी ने नहीं सिखाई होगी ....


A ..... FOR ..... AMBE
B ..... FOR ..... BHAVANI
C ..... FOR ..... CHAMUNDA
D ..... FOR ..... DURGA
E ..... FOR ..... EKRUPI
F ..... FOR ..... FARSADHARNI
G ..... FOR ..... GAITRI
H ..... FOR ..... HINGLAAJ
I ..... FOR ..... INDRANI
J ..... FOR ..... JAGDAMBA
K ..... FOR ..... KALI
L ..... FOR ..... LAKSHMI
M ..... FOR ..... MAHAMAYA
N ..... FOR ..... NARAYANI
O ..... FOR ..... OMKARINI
P ..... FOR ..... PADMA
Q ..... FOR ..... QATYAYNI
R ..... FOR ..... RATNAPRIYA
T ..... FOR ..... TRIPUR SUNDARI
U ..... FOR ..... UMA
V ..... FOR ..... VAISHNAVI
W ..... FOR ..... WARAHI
Y ..... FOR ..... YATI
Z ..... FOR ..... ZYANA

ABCD पढते जाएं ... जय माता दी कहते जाएं .. पूरे परिवार सहित आपको नवरात्रि की असीम शुभकामनाएं !!!!!
(पिछले वर्ष नवरात्र पर मिला एक एस एम एस)

Navratra Orkut Scraps Graphics

बुधवार, 21 सितंबर 2011

एक समस्‍या के हल होने में पूरे पंद्रह दिन लग गए .. अब राहत की सांस ले सकी हूं !!


एक समस्‍या से जूझते मुझे पूरे पंद्रह दिन हो गए , आज मैने राहत की सांस ली है। हुआ यूं कि कुछ दिनों से कंप्‍यूटर कुछ स्‍लो चल रहा था , जिसके कारण 6 सितंबर को मैने इसे फोरमेट किया। पर इसके बाद जब अपना सॉफ्टवेयर इंस्‍टॉल कर उसका उपयोग आरंभ किया , जिसे मैने VB6 पर कई वर्ष पहले बनाया था , तो उसमें पुराने डेटा पर तो सारे काम किए जा सकते थे , पर कोई नया डेटा सेव हो ही नहीं रहा था। हालांकि बाद में महसूस हुआ कि पुराने डेटा में कोई परिवर्तन भी वह एक्‍सेप्‍ट नहीं कर रहा है। इतना ही नहीं, सेव बटन पर क्लिक कर देने से ही एक एरर दिखाकर सॉफ्टवेयर को बंद कर देता है , एरर नं बता रहा था ....
2147286781(80030103)

मैने गूगल में इस एरर के बारे में जानकारी ढूंढ ढूंढकर समस्‍या को दूर करने के लिए दो चार दिनों में कई फाइलें इंस्‍टॉल और रन कराए , पर फल वही ढाक के तीन पात। दो तीन दिन बाद यह सोंचकर कि विंडो सही ढंग से इंस्‍टॉल नहीं हो सका है , कंप्‍यूटर को फिर से फोरमैट कर अच्‍छी तरह विंडो इंस्‍टॉल करवाया , पर इससे समस्‍या और बढ गयी। पहले तो मैं पुराने डेटा पर काम कर सकती थी , सिर्फ नया सेव करने की समस्‍या थी , पर इस बार तो सॉफ्टवेयर चल ही नहीं रहा था। एरर भी अब बदल गया था ....
2147319765(8002802b)

मैं न तो किसी की जन्‍मकुंडली का अध्‍ययन कर पा रही थी और न अन्‍य कोई गणना। इतने दिन कंप्‍यूटर की मदद लेने के बाद जोड , घटाव , गुणा , भाग करना आसान नहीं। इसके अभाव में कोई महत्‍वपूर्ण पोसट भी नहीं कर पा रही थी। अगस्‍त के अंत में ही लग्‍न राशिफल की गणना कर उसे शिड्यूल कर दिया था , जिसके कारण ब्‍लॉग जगत में उपस्थिति बनी हुई महसूस होती थी। पहले कभी भी अपने प्रोग्राम को चलाने के लिए विज्‍युअल बेसिक के सॉफ्टवेयर को इंस्‍टॉल करने की आवश्‍यकता नहीं पडी थी , पर इस बार वो भी किया , पर कोई फायदा नहीं। प्रोग्राम चलाने पर आरंभ में ही एरर आता रहा ....
msadodc.ocx could not be loaded

मैने इस फाइल को नंट पर ढूंढा और अलग से इंस्‍टॉल करने की भी कोशिश की , पर पीसी महाराज ने बताया कि यह फाइल उनके पास मौजूद है , रजिस्‍ट्रेशन नहीं होने से यह नहीं चल पा रही। अपने जान पहचान के कई कंप्‍यूटर विशेषज्ञों से इस बारे में बात हुई , जैसा जैसा निर्देश मिला करती गयी। इतने निर्देशों का पालन करते हुए फोरमेट किया गया तेज कंप्‍यूटर फिर से सुस्‍त पड गया। पर मेरे सॉफ्टवेयर को नहीं चलना था , नहीं चला।  उसके बाद एक साइट खोलने में यह समस्‍या भी दिखी , जिससे स्‍पष्‍ट हुआ कि डेटाबेस की कोई समस्‍या हो सकती है , पर यह समस्‍या कुछ सॉफ्टवेयरों के रन कराने के बाद दूर हुई।
Microsoft JET Database Engine error '80040e07'

मुझे याद आया , 2004 में वीबी की कक्षा ज्‍वाइन करने के महीनेभर के अंदर ही दिल्‍ली के विज्ञान भवन के एक सम्‍मेलन में जमा हुए वैज्ञानिकों को अपने शोध से संबंधित प्रजेंटेशन दिखाने के लिए इस सॉफ्टवेयर के छोटे संस्‍करण की शुरूआत की थी , सेटअप तैयार होने के बाद भाडे के कंप्‍यूटर में भी इसे चलाने में कोई समस्‍या नहीं आयी थी। उसके बाद दस से अधिक कंप्‍यूटर में यह सॉफ्टवेयर चल चुका  था। आज इस तरह धोखा खाने की कोई वजह समझ में नहीं आ रही थी। वैसे इस बार होम की जगह प्रोफेशनल को मैने जरूर इंस्‍टॉल किया था , पर दिल्‍ली से मेरे भाई ने खबर पहुंचायी कि वहां के प्रोफेशनल वर्सन में भी मेरा सॉफ्टवेयर आराम से चल रहा है। 

अपने कंप्‍यूटर में हार्डवेयर का दोष समझते हुए  अपना ध्‍यान इधर से हटा दिया , बेकार में प्रयास करने का क्‍या फायदा ?? किसी अच्‍छे डॉक्‍टर से इसका इलाज कराने के लिए तैयारी करने लगी । इस पंद्रह दिन में कुछ पारिवारिक मामलों में भी फंसी रही। घर पर मेहमानों की भी उपस्थिति थी , उनकी विदाई करने के बाद बोकारो जाने के लिए आज का शुभ मुहूर्त्‍त निकाला गया था। कल शाम को बैठे बिठाए अंतिम कोशिश करने का मूड बन आया। फिर से अपने सॉफ्टवेयर को इंस्‍टॉल कर आनेवाले एरर को गूगल में एक बार फिर से देखने की इच्‍छा हुई। सॉफ्टवेयर इंस्‍टॉल करने पर system32/msado20.tlb को रजिस्‍टर करने में समस्‍या दिखाई पडी। मुझे याद आया , ये समस्‍या पहले भी आती थी , मैं इग्‍नोर बटन पर क्लिक कर देती थी , शायद विंडो का वो वर्सन उसे इग्‍नोर कर देता हो। पर ये नया वर्सन इसे इग्‍नोर नहीं कर पा रहा था और डेटाबेस से सॉफ्टवेयर के कनेक्‍शन बनने में समस्‍या आ रही थी।

मैने गूगल सर्च में इसी समस्‍या का समाधान ढूंढने की कोशिश की , तो पहले पृष्‍ठ पर पहले नं पर बडा ही आसान समाधान मिला ....
There are several ways to resolve this problem. Which method you use depends on your circumstances and whether it is convenient for you to repackage the application. In Resolutions 1 and 2, you do not have to repackage the application. Resolutions 3, 4, and 5 require repackaging. Resolutions 4 and 5 are the only long-term fixes and are recommended.
Resolution 1
1.        Locate the Setup.lst file for your package.
2.        In any text editor, open Setup.lst.
3.        In Setup.lst, locate the line that references the ADO type library that is referenced in the error. If you are using Notepad, you can search for the file name.
4.        Change $(DLLSelfRegister) to $(TLBRegister).
5.        Save the file, and try the installation again.

बस मैने इसी इंस्‍ट्रक्‍शन पर काम किया और मुझे सफलता मिल गयी , और पंद्रह दिनों बाद कल शाम मैने अपने प्‍यारे सॉफ्टवेयर को सुचारू ढंग से चलते हुए पाया , इस कारण आज से काम शुरू हो गया है। इस दौरान बहुत पाठकों और अपने क्‍लाएंट्स के काम मैं समय पर न कर सकी। उनके इंतजार में बेवजह पंद्रह दिनों का इजाफा हो गया , अब धीरे धीरे सबका काम हो पाएगा।

शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

सभी ग्रहों का दशा काल यानि ग्रहों का प्रभावी वर्ष ( भाग . 2 ) .....

लगभग 24 वर्ष की उम्र के बाद अक्‍सरहा लोग पूरे उत्‍साह के साथ जीविकोपार्जन के लिए संघर्ष शुरू कर देते हैं। वे शादी कर पति पत्‍नी भी बन जाते हैं। परंपरागत ज्‍योतिष में मंगल को शक्ति और साहस का प्रतीक ग्रह माना जाता है और यदि मानव जीवन पर ध्‍यान दिया जाए , तो 24 वर्ष की उम्र के बाद शक्ति और साहस की प्रचुरता बनती है। 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' ने अपने अध्‍ययन में पाया कि जन्‍मकुंडली में मंगल प्रतिकूल हो , तो जातक का प्रारंभिक दाम्‍पत्‍य जीवन या तो कलहपूर्ण होता है या वे 24 वर्ष की उम्र से 36 वर्ष की उम्र तक बेरोजगार की स्थिति में भटकते रहते हैं। इस अंतराल इनके जीवन में किसी तरह भी स्‍थायित्‍व नहीं आ पाता। जबकि मंगल मजबूत हो तो लोगों को कैरियर में अच्‍छी सफलता मिलती है। इनका दाम्‍पत्‍य जीवन भी सुखद होता है।  परंपरागत ज्‍योतिष शास्‍त्र में भी इस ग्रह को वयस में युवा सेनापति कहा गया है , अत: इस वय में मंगल के काल की पुष्टि हो जाती है।

36 वर्ष की उम्र तक शरीर की सारी ग्रंथियां बनकर तैयार हो जाती है , मनुष्‍य का नैतिक दृष्टिकोण निश्चित हो जाता है। इसलिए भारत के राष्‍ट्रपति बनने के लिए आवश्‍यक शर्त की उम्र 35 वर्ष है। इस उम्र में आते आते व्‍यक्ति को परिवार के प्रति लगाव बढने लगता है , इस वक्‍त जिम्‍मेदारियां भी भरपूर होती हैं। 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' ने अपने अध्‍ययन में पाया कि यदि जन्‍मकालीन शुक्र मजबूत हो , तो जातक 36 वर्ष से 48 वर्ष तक का समय बहुत अच्‍छे एंग से गुजारते हैं , बच्‍चों के प्रति अपनी जिम्‍मेदारियों का निर्वाह आसानी से करने में सफलीभूत होते हैं/ रोजगार में रहनेवालों को अधिक मुनाफा होता है और नौकरी करनेवालों को प्रोन्‍नति मिलती है। यदि शुक्र कमजोर होता है तो जातक इस अवधि में पगतिकूल परिस्थितियों से गुजरना पडता है।

जिन कुंडलियों मे सूर्य बलवान होता है , उनके उत्‍कर्ष का समय 48 से 60 वर्ष तक की अवस्‍था होती है। सूर्य बलवान होने के कारण ही इंदिरा गांधी 48 वर्ष की उम्र में प्रधानमंत्री बनी और 1977 तक यानि 60 वर्ष की उम्र तक बिना परिवर्तन के डटी रही। इसके विपरीत सूर्य कमजारे हो , तो 48 वर्ष से 60 वर्ष की उम्र तक जातकों को कई प्रकार की मुसीबत से जूझना पडता है। फलित ज्‍योतिष के प्राचीन ग्रंथो में मंगल को राजकुमार और सूर्य को राजा कहा गया है। मंगल के दशाकाल 24 वर्ष से 36 वर्ष की उम्र में पिता बनने की उम्र 24 वर्ष जोड दी जाए , तो वह 48 वर्ष से 60 वर्ष हो जाता है। अत: इसे सूर्य का दशाकाल माना जा सकता है।

प्राचीन ज्‍योतिष में बृहस्‍पति को सृजनशील वृद्ध ब्राह्मण माना जाता है। इसलिए हंस योग के फलीभूत होने की उम्र 60 वर्ष से 72 वर्ष की अवस्‍था  मानी जाती है। सचमुच मानव जीवन में इस उम्र को अत्‍यंत ही बडप्‍पन युक्‍त और प्रभावपूर्ण देखा गया है। जिसकी जन्‍मकुंडली में बृहस्‍पति मजबूत होता है , सेवावनवृत्ति के बाद निश्चिंति से जीवन निर्वाह करते हैं। बृहस्‍पति कमजोर होने पर उनकी जबाबदेहियां सेवानिवृत्ति के पश्‍चात् भी बनी रहती हैं। पं जवाहर लाल नेहरू जी की जन्‍मकुंडली में बृहस्‍पति बहुत मजबूत स्थिति में था नेहरू जी 60 वर्ष की उम्र से 72 वर्ष की उम्र तक लागातार भारत के प्रधानमंत्री बने रहें। इसलिए इस उम्र में बृहस्‍पति के दशाकाल की पुष्टि हो जाती है।

'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' ने 72 वर्ष की उम्र के बाद मानव जीवन पर शनि का प्रभाव महससू किया है , क्‍यूंकि यदि महात्‍मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू की कुंडली पर ध्‍यान दिया जाए , तो यही मिलेगा कि दोनो के ही मारक भाव द्वितीय भाव में शनि स्थित है। इन दोनो महापुरूषों की मृत्‍यु 72 वर्ष की उम्र के बाद हुई। परंपरागत ज्‍योतिष भी शनि को अतिवृद्ध के रूप में स्‍वीकार करता है। शनि बली सभी मनुष्‍य इस उम्र में सुखी होते हैं , जबकि जन्‍मकालीन शनि कमजोर हो तो इस उम्र में वे प्रतिकूल स्थिति में जीने को बाध्‍य होते हैं।

84 वर्ष के बाद 120 वर्ष तक की आयु , जो मनुष्‍य की परमायु बतायी गयी है , का समय तीन ग्रहों यूरेनस , नेप्‍च्‍यून और प्‍लूटों को दिया जा सकता है। इनमें से प्रत्‍येक ग्रह को बारी बारी से 12 - 12 वर्षों का समय दिया जा सकता है। इस प्रकार किसी जातक के उम्र विशेष पर विभिन्‍न ग्रहों का प्रभाव इस प्रकार देखा जा सकता है .........
जन्‍म से 12 वर्षों तक का समय .... बाल्‍यावस्‍था ..... चंद्रमा,
12 से 24 वर्षों तक का समय .... किशोरावस्‍था ...... बुध ,
24 से 36 वर्षों तक का समय ..... युवावस्‍था ...... मंगल,
36 से 48 वर्षों तक का समय .... पूर्व प्रौढावस्‍था ... शुक्र,
48 से 60 वर्षों तक का समय ..... उत्‍तर प्रौढावस्‍था .... सूर्य,
60 से 72 वर्ष तक का समय ..... पूर्व वृद्धावस्‍था .... बृहस्‍पति,
72 से 84 वर्ष तक का समय ..... उत्‍तर वृद्धावस्‍था ..... शनि,

इस प्रकार सभी ग्रह कुंडली में प्राप्‍त बल और स्थिति के अनुसार मानव जीवन में अपनी अवस्‍था विशेष में प्रभाव डालते रहते हैं। लेकिन इन 12 वर्षों में भी प्रथम छह वर्ष और बाद के छह वर्ष में अलग अलग प्रभाव दिखाई देता है। इसके अलावे इन 12 वर्षों में भी बीच बीच में उतार चढाव का आना या छोटे छोटे अंतरालों में खास परिस्थितियों का उपस्थित होने का ज्ञान इस पद्धति से संभव नहीं है। 12 वर्ष के अंतर्गत होनेवाले उलटफेर का निर्णय हम 'लग्‍न सापेक्ष गत्‍यात्‍मक गोचर प्रणाली' से करें , तो दशाकाल से संबंधित सारी कठिनाइयां समाप्‍त हो जाएंगी।

मंगलवार, 30 अगस्त 2011

सभी ग्रहों का दशा काल यानि ग्रहों का प्रभावी वर्ष .....

अबतक की प्रचलित दशा पद्धति , चाहे कितनी भी लोकप्रिय क्‍यूं न हो , लेकिन अबतक ज्‍योतिषियों के सरदर्द का सबसे बडा कारण दशाकाल का निर्णय यानि ग्रहों के प्रभावी वर्ष का निर्णय ही रहा है। भले ही उसकी गणना का आधार स्‍थूल नक्षत्र प्रणाली ही हो। यदि इस तरह की बात न होती , तो शनि महादशा और इसकी ही अंतर्दशा के अंतर्गत शत प्रतिशत ज्‍योतिषियो की आशा के विपरीत 1971 में श्रीमती इंदिरा गांधी पुन: प्रधानमंत्री का पद सुशोभित नहीं करती। इस लेख का उद्देश्‍य पुराने विंशोत्‍तरी या अन्‍य दशा पद्धतियों की आलोचना नहीं , लेकिन इतना निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि एक निश्चित उद्देश्‍य के लिए जब एक नियम पूर्णत: काम नहीं करते , तो उस नियम के पूरक के रूप में दूसरे , तीसरे चौथे .... अनेक नियम बनते चले जाते हैं या बनते चले जाने चाहिए। अभी भी सामान्‍य या उच्‍च कोटि के जितने भी ज्‍योतिषी हैं , चाहे वो जिस दशा पद्धति के अनुयायी हों , अपने तथ्‍य की पुष्टि अन्‍तत: लग्‍न सापेक्ष गोचर प्रणाली (यानि आज के आसमान की स्थिति को देखकर ) से करते हैं।

दशा काल निर्णय के संदर्भ में इस लग्‍न सापेक्ष गोचर प्रणाली को भी अमोघ शस्‍त्र के रूप में स्‍वीकार करने में दिक्‍कतें आती हैं , जैसे एक ग्रह गोचर में अनेक बार अच्‍छे र‍ाशि और भाव में आता है , पर एक राशि और भाव में रहने के बावजूद हर बार मात्रा या गुण के ख्‍याल से समान नहीं होता। जैसे किसी व्‍यक्ति का लग्‍न और राशि मेष हो , तो गोचर काल में जब जब वृष राशि में बलवान चद्रमा आएगा , नियमत: जातक को मात्रा और गुण के संदर्भ में द्वितीय भाव से संबंधित तत्‍वों अर्थात् धन , कोष कुटुम्‍ब आदि के संदर्भ में सुख की अनुभूति होगी। पर जीवन के विस्‍तृत अंतराल में फलित एक जैसा नही होता है।

'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' की मान्‍यता है कि फलित में यह परिवर्तन ग्रहों की अवस्‍था के अनुसार मनुष्‍य की अवस्‍था पर पडनेवाला प्रभाव है। हम सभी जानते हैं कि लडकपन भोलेपन की जिंदगी होती है। परंतु लडकपन में भोलेपन का कारण किसी भी दशापद्धति के अनुसार दशा और महादशा के हिसाब से भोले ग्रहों का काल नहीं होता। इसी प्रकार विश्‍व के सभी व्‍यक्ति किशोरावस्‍था में ही ज्ञानार्जन करते हैं , चाहे विद्या जिस प्रकार की भी हो , पर दशाकाल के हिसाब से सबकी जन्‍मकुंडली में विद्यार्जन करानेवाले ग्रहों का ही काल नहीं होता है। एक विशेष उम्र में ही लडके और लडकियों में परस्‍पर आकर्षण होता है , वे नियिचत उम्र में ही प्रणय सूत्र में बंधते हैं। दशा अंतर्दशा के हिसाब से कोई औरत वृद्धावस्‍था में प्रजनन नहीं कर पाती है। शारीरिक शक्ति के ह्रास के साथ वृद्धावस्‍था में सभी स्‍त्री पुरूष नीति आचरण की संहिता बन जाते हैं। दशा अंतर्दशा की प्रतिक्षा किए वगैर उपर्युक्‍त घटनाएं स्‍वाभाविक ढंग से प्रत्‍येक व्‍यक्ति के जीवन में घटती रहती है।

इसका अर्थ यह है कि बचपन में भोलेपन के ग्रह यानि चंद्रमा का प्रभाव पडना चाहिए। कुंभ लग्‍न की उन कुंडलियों में , जिसमें चंद्रमा कमजोर हो , बच्‍चे 12 वर्ष की उम्र तक बहुत बीमार होते हैं और शरीर से कमजोर रहते हैं। उनका जन्‍म किस नक्षत्र में हुआ , यह मायने नहीं रखता। इसके विपरीत कर्क लग्‍न के चंद्रबली बच्‍चे शरीर से निरोग रहते हुए अपने बाल साथियों के नेता रहते हैं। वृश्चिक लग्‍न के जातकों में बचपन से ही धार्मिक प्रवृत्ति देखने को मिलती है। कमजोर चंद्र के कारण बालपन में कोई समस्‍या चल रही हो , तो 12 वर्ष की उम्र के पश्‍चात् वे समाप्‍त हो जाती हैं। परंपरागत ज्‍योतिष में चंद्रमा को बाल ग्रह माना गया है , शास्‍त्रों में भी बालारिष्‍ट योग की चर्चा चंद्रमा के प्रतिकूल प्रभाव से ही की जाती है , इसलिए जीवन के प्रारंभिक भाग को चंद्र की ही दशा समझनी चाहिए।

इसी तरह वास्‍तविक अर्थ में विद्यार्जन का समय 12 वर्ष से 24 वर्ष की उम्र तक का होता है। 12 वर्ष के पहले बालक की तर्कशक्ति न के बराबर होती है। ज्ञानार्जन से संबंधित ग्रंथियां 24 वर्ष की उम्र तक पूर्ण तौर पर बन जाती हैं। इसलिए अधिकांश देशों में इस उम्र तक पहुंचते पहुंचते लोगों को बालिग घोषित कर दिया जाता है। इसलिए विद्या के कारक ग्रह बुध का दशाकाल 12 वर्ष से 24 वर्ष तक माना जाना चाहिए। बुध बली इस उम्र में विद्यार्जन के लिए अनुकूल वातावरण प्राप्‍त करते हैं , जबकि जिनका बुध निर्बल होता है , उन्‍हें विद्यार्थी जीवन में मुसीबतें झेलनी पडती हैं।

(24 वर्ष की उम्र के बाद क्रम से किन ग्रहों का दशाकाल आता है, इसे जानने के लिए इस लेख का दूसरा भाग पढें)


गुरुवार, 25 अगस्त 2011

..... बस यादें ही तो शेष रह जाती हैं हमारे पास !!!!

परसों शाम जैसे ही ब्‍लॉगर का डैशबोर्ड रिफ्रेश किया , अलबेला खत्री जी की एक पोस्‍ट के शीर्षक पर नजर गयी। भगवान करे यह सच न हो , झूठ हो , डॉ अमर कुमार जी जीवित ही हों , पढने के बाद इसे खोलने की हिम्‍मत ही नहीं हो रही थी। कांपते हाथो से इसपर क्लिक किया  , एक दूसरी पोस्‍ट भी पढी। घटना सच्‍ची ही है , भला कोई ऐसा मजाक करता है ??  न कभी मिलना जुलना , न कभी फोन या पत्र , बस एक दूसरे की पोस्‍ट और टिप्‍पणियों को पढते हुए ब्‍लोगरों के विचारों से रूबरू होने के कारण ऐसा लगता है , मानो हम एक कितने दिनों से एक दूसरे के परिचित हों। इस दौरान हमारे मध्‍य गलतफहमियां भी जन्‍म लेती हैं , पर उसका असर कितने दिन रह पाता है ?? वैसे शायद डॉ अमर कुमार जी को ज्‍योतिष में रूचि न हो , और ज्‍योतिष के सिवा दूसरे मुद्दों पर मैं अधिक लिखती नहीं , इसलिए किसी मुद्दे पर मेरा प्रत्‍यक्ष वाद विवाद उनसे नहीं रहा। पर उनके व्‍यक्तित्‍व से काफी प्रभावित रही , हालांकि उनसे मेरे परिचय की शुरूआत एक टिप्‍पणी को लेकर गलतफहमी से ही हुई।

तब ब्‍लॉग जगत में आए बहुत दिन नहीं हुए होंगे , समाज में फैले ज्‍योतिषीय और धार्मिक भ्रांतियों को दूर करने की दिशा में छोटे मोटे लेख लिखने लगी थी। 16 फरवरी को प्रकाशित मेरे एक लेख नजर कब लगती है ?? को पढकर मसीजीवी जी के द्वारा की गई टिपपणी  क्‍या इस पोस्‍ट के आने का अर्थ माना जाया कि हिन्‍दी ब्‍लॉगजगत पर नकारात्‍मक ग्रहों का प्रभाव हो गया है :) से मैं आहत हुई , अपने मनोभाव को व्‍यक्‍त करने के लिए मैने मसीजीवी जी की टिप्‍पणी के जबाब में एक पोस्‍ट लिख डाली। शीर्षक में ही मसीजीवी जी का नाम देखकर डा अमर कुमार जी मेरे ब्‍लॉग पर आए , पर उनकी नजर मेरे ब्‍लॉग के नीचे कोने पर रखे तिरंगे पर गयी और उन्‍होने पोस्‍ट पर ऐसी टिप्‍पणी की ....


बड़े हौसले से आया हूँ कि,
कुछ सार्थक बहस की ग़ुंज़ाईश हो..
पर, एक खेद व्यक्त करके लौट जा रहा हूँ
[ क्योंकि इससे अधिक और कर ही क्या सकता हूँ :) ]
इतने बुरे दिन भी नहीं आयें है, बहना 
कृपया अपने राष्ट्रीय तिरंगे को नीचे कोने से उठा कर कहीं ऊपर सम्मानजनक स्थान दें ।आप देशभक्त हैं, यह तो ज़ाहिर हो गया ।


उनके द्वारा दिया गया सुझाव तो मुझे पसंद आया , पर अंतिम पंक्तियों में छुपा व्‍यंग्‍य मुझे बहुत चुभा , पर मैने इसे सार्वजनिक नहीं किया और उन्‍हे ईमेल से ही जबाब भेजा ....

मुझे जो कोड मिला था.......वह मैने ज्‍यों का त्‍यों पेस्‍ट कर दिया....आप सही तरीके से भी हमें इस बात से आगाह कर सकते थे.........इसपर इतना व्‍यंग्‍य करने की आवश्‍यकता नहीं थी........झंडे को उपर डालने के बारे में मुझे जानकारी नहीं.......इसे हटा ही देती हूं.।

मैं तो इस बात को कुछ दिन बाद भूल गयी , पर वो इसे नहीं भूल सकें। कुश जी के टोस्‍ट विद टू होस्‍ट  में इंटरव्‍यू देते वक्‍त उन्‍होने इस बात की चर्चा कर ही दी .....

एक बार संगीता पुरी और मसिजीवी जी के बीच के कुछ कुछ हो गया .. देखने मैं भी पहुँच गया, टिप्पणी कर दी कि ब्लाग के निचले दायें कोने में पड़े तिरंगे को उचित सम्मान तो दीजिये, बहन जी..फिर, क्या हुआ होगा ? झुमका तो गिरना ही था । ज़ायज़ है भई, मैं देश के सम्मान का ठेकेदार न सही, पर भी तो नहीं ?भला बताओ, मैं कोई अमेरीकन हूँ क्या ? जो अपने झंडे का कच्छा बना लें, या ट्रेंडी नाइट गाऊन, उन्हें कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता !

जब डॉ अमर कुमार जी सार्वजनिक कर ही चुके थे , तो मैं अपनी सफाई क्‍यूं न देती??  पर हमारे मध्‍य संवादहीनता नहीं रही , इस पोस्‍ट को पढकर उन्‍होने भी टिप्‍पणी की .....


व्यंग्य और तंज़ मेरे लेखन के स्तंभ हैं, इनको घुसने से कैसे रोका जा सकता है ?
जिस किसी ने भी यह कोड बनाया है, उसे position: no-repeat fixed right bottom; का विकल्प रखना ही नहीं था ।
position: no-repeat fixed top right ; करने में मुझे कोई बुराई नहीं दिखती !
अपने ’ देश ’ का मैंने ऎसा अपमान देखा है, कि अपने झंडॆ के प्रति सदिव ही संवेदी रहूँगा !
मुझे कोई खेद नहीं है !
क्योंकि वाकई यह बतंगड़ बनाने वाली बात ही नहीं है !
और मेरी मंशा ऎसी थी भी नहीं..


सचमुच उनकी मंशा ऐसी न थी , दो चार महीने बाद ही जब टिप्‍पणी करने वाली आदत को लेकर प्रवीण जाखड जी ने मुझपर व्‍यंग्‍य करता हुआ लेख लिखा , उन्‍होने आकर मेरे पक्ष में टिप्‍पणी की ....


आप क्यों आपना समय और मानसिक ऊर्ज़ा ज़ाखड़ पर बरबाद कर रही हैं ।
उनकी टैगलाइन ही उनके व्यक्तित्व को प्रतिबिम्बित करती है ।
अपने फैसलों पर पुनर्विचार करना उनकी आदत में है, या नहीं..
यह वह बेहतर बता सकते हैं । पर, जहाँ कोई न पहुँच रहा हो, वहाँ नवाँगतुकों का ऎसा रस्मी स्वागत कोई बुरी बात तो नहीं ?

उसके बाद नए वर्ष की पूर्व संध्‍या पर मैने उन्‍हें नववर्ष की शुभकामनाएं दी , 50 मिनट तक  तो मैं यही समझती रही कि वे मुझे जबाब नहीं देंगे , पर न सिर्फ उनका जबाब आया , उन्‍होने बीते वर्ष हुई गलतफहमी के लिए क्षमा भी मांगी ....


१०:३७ अपराह्न मुझे: आपके और आपके पूरे परिवार के लिए नया वर्ष मंगलमय हो !!

50 मिनट
११:२८ अपराह्न 
अमर: धन्यवाद.. मेरी यही शुभेच्छायें आपके लिये भी है ।
बीते वर्ष में जो कुछ भूल चूक हुई हो क्षमा करेंगी !

११:२९ अपराह्न 
मुझे: जी
धन्‍यवाद

... और मैं इतना भी नहीं समझ पायी थी कि मैं उन्‍हे क्षमा करने लायक हूं भी नहीं !!!

अभी कुछ दिन पूर्व ही तो फेसबुक में उनका प्रोफाइल देखा था , जो उनकी खुशमिजाजी को बयान करता है।

नियोक्ता

महाविद्यालय

उच्च माध्यमिक

दर्शनशास्त्र

धार्मिक विचारमतलब परस्ती

राजनैतिक विचारयह क्यों पिट रहा है, भाई ?

पसन्दीदा वाक्यमुझे पढ़ लो, हज़ार कोटेशन पर भारी पडूँगा !


उन्‍होने ऑरकुट में मित्रता का अनुरोध भेजा , मैने उसे स्‍वीकार कर लिया । पर अभी कुछ दिन पूर्व फेसबुक में भेजा गया मेरा मित्र अनुरोध उनके पास लंबित ही रह गया। इस कारण उनके वॉल में मैं श्रद्धांजलि के दो शब्‍द भी नहीं लिख सकती।








'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' में तो नहीं , यदा कदा 'गत्‍यात्‍मक चिंतन' में टिपपणी करते रहें। टिप्‍पणी में मॉडरेशन के विरूद्ध थे वे , मेरी एक पोस्‍ट एक लोकोक्ति का अर्थ स्‍पष्‍ट करें !!! पर लिखा था ......


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फिर भी..
इसका भावार्थ यह होगा ।

माघ की आर्द्रा और इस समय की हथिया ( हस्तिका ) सबके लिये बराबर है, चाहे मेहमान हों या गृहस्थ सभी अपनी जगह ठप्प पड़ जाते हैं ।


उनके कडे शब्‍दों की वजह से अक्‍सर उन्‍हें लोग गलत समझ लेते थे , पर उनके कहने का वो मकसद नहीं होता था। ब्‍लॉग जगत के नए पन्‍ने पर तो अब हम उनकी टिप्‍पणियों का इंतजार ही करते रह जाएंगे। उन्‍हें याद रखने के लिए अब सिर्फ पुराने पन्‍ने ही तो उल्‍टे जा सकते हैं , क्‍यूंकि किसी के जाने के बाद बस यादें ही तो शेष रह जाती हैं हमारे पास !!!!

उन्‍हें हार्दिक नमन !!!!!