सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

कुंभ लग्‍न की कुंडली भारतीयों के जीवनशैली का प्रतिनिधित्‍व करती है !!


आजादी मिलने के वक्‍त की गंहस्थिति पर ध्‍यान दिया जाए तो भारतवर्ष की जन्‍मकुंडली भले ही वृषभ लग्न और कर्क राशि की बनें और उसके अनुसार सभी ज्‍योतिषी भारतवर्ष के बारे में भविष्‍यवाणी करने को बाध्‍य हों ,पर गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' की मान्‍यता है कि भारत के अलग होने के आधार पर यानि देश के विस्‍तार के कम या अधिक हो जाने से उसकी नई जन्‍मकुंडली नहीं बनायी जानी चाहिए। मैने पिछले दिनों सभी लग्‍नवालों की विशेषताओं की चर्चा करते हुए 12 लेख लिखे ,पहले ही लेख में तर्क दिए गए थे कि मनुष्‍य की जीवनशैली मेष लग्‍न की जन्‍मकुंडली की जीवनशैली से मेल खाती है। इन्‍हीं लेखों के आधार पर कहा जा सकता है कि भारतवासियों की जीवनशैली पूर्ण तौर पर कुंभ लग्‍न की जन्‍मकुंडली का प्रतिनिधित्‍व करती है और इस आधार पर भारतवर्ष का जन्‍म लग्‍न कुंभ होना चाहिए। इसलिए कुंभ लग्‍न के हिसाब से विभिन्‍न भावों में गोचर के ग्रहों की स्थिति के आधार पर भारतवर्ष के बारे में भविष्‍यवाणी की जानी चाहिए। इस मान्‍यता के पक्ष में ये तर्क दिए जा सकते हैं ....

कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार एक जातक के स्‍वभाव के बारे में आपने पढा। कुंभ लग्‍नवालों के मन का स्‍वामी चंद्र षष्‍ठ भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के प्रभाव और रोग , ऋण , शत्रु जैसे हर प्रकार के झंझट का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए कुंभ लग्‍न के जातकों के मन को पूर्ण तौर पर प्रभावित करने वाले संदर्भ किसी प्रकार के झंझट ही होते हैं। रोग , ऋण या शत्रु जैसे झंझट न होने पर मन को खुशी मिलती है , जबकि झंझट उपस्थित होकर इनके मन को दुखी करते हैं। भारतवासियों को भी किसी प्रकार के झंझट लेने की इच्‍छा नहीं होती , ये रोग के इलाज के लिए नहीं , रोग से बचने के लिए परहेज पर विश्‍वास रखते हैं , ऋण लेने को बडी मुसीबत मानते हैं , शत्रुता जैसे झंझट से दूर रहना पसंद करते हैं , हजारों साल का इतिहास गवाह है कि इन्‍होने आजतक कहीं भी आक्रमण नहीं किया।
कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार समस्‍त जगत में चमक बिखेरने वाला सूर्य सप्‍तम भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के घर गृहस्‍थी का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए अपने नाम यश को फैलाने के लिए कुंभ लग्‍न के जातक अपने घर गृहस्‍थी को महत्‍व देते हैं। घर गृहस्‍थी का वातावरण और दाम्‍पत्‍य जीवन बहुत ही उत्‍तम कोटि का और अनुकरणीय होता है , भले ही सूर्य कमजोर रहने पर इन्‍हें अपनी दाम्‍पत्‍य जीवन से कष्‍टकर समझौता करने को बाध्‍य होना पडे। भारतवासी भी अपनी घर गृहस्‍थी को इतना महत्‍व देते हैं कि यहां कष्‍टकर समझौता भी इन्‍हें मंजूर होता है , जो अनुकरणीय है।
कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार मंगल तृतीय और दशम भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के भाई बहन , बंधु बांधव , पिता , समाज और पद प्रतिष्‍ठा का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍न के जातकों के परिवेश में भाई , बहन , बंधु बांधव , पिता , समाज सभी शामिल होते है , चाहे मंगल के मजबूत होने से भाई बंहन बंधु बांधवों से लेकर पिता समाज के सारे बुजुर्गों से इनके संबंध अच्‍छे बने हों और इसके कारण प्रतिष्‍ठा के पात्र हों , या फिर मंगल के कमजोर होने पर भाई , बंधु , पिता , समाज या अन्‍य लोगों का कष्‍ट झेलने को इन्‍हे बाध्‍य होना पडता है , इनकी प्रतिष्‍ठा पर भी आंच आए। पर भाई बहन बंधु बांधव और सामाजिकता के बिना एक भारतीय नहीं रह सकता।

कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार शुक्र चतुर्थ और नवम भाव का स्‍वामी है और यह जातक के मातृ पक्ष और हर प्रकार की छोटी बडी संपत्ति , स्‍थायित्‍व के साथ साथ भाग्‍य आदि का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए कुंभ लग्‍नवालों के हर प्रकार के संपत्ति का उनकी माता या भाग्‍य से संबंध बना होता है। कुंभ लग्‍नवाले माता या भाग्‍य के सहयोग से हर प्रकार की संपत्ति का सुख प्राप्‍त कर लेते हैं और स्‍थायित्‍व की मजबूती पाते हैं। यदि भाग्‍य के साथ न देने से हर प्रकार के संपत्ति के सुख में बाधा हो और स्‍थायित्‍व कमजोर दिखाई पडे । एक भारतवासी के संदर्भ में भी देखें तो इन्‍हें भाग्‍य से ही इन्‍हें प्राकृतिक संपदा प्राप्‍त है , जो जिस क्षेत्र में हैं , उसी क्षेत्र में किसी न किसी प्रकार का प्रचुर भंडार उपलब्‍ध हैं। कभी प्राकृतिक विपत्ति का सामना करना भी पडे तो इतने बडे साधन संपन्‍न भारतवर्ष में उन्‍हें गुजारे की दिक्‍कत नहीं होती।

कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार बुध पंचम और नवम भाव का स्‍वामी है और यह जातक के बुद्धि , ज्ञान संतान और जीवनशैली का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍न के जातक अपनी बुद्धि का उपयोग हमेशा जीवनशैली को सुधारने के लिए करते हैं। यही कारण है कि हमारे देश में अधिकांश चिंतकों और विचारकों ने कुंभ लग्‍न में ही जन्‍म लिया था और उन्‍होने अपने ज्ञान का उपयोग भौतिक या अन्‍य सुख के लिए नहीं , सिर्फ और सिर्फ जीवनशैली को सुधारने के लिए किया। कुंभ लग्‍नवालों की तरह ही भारतीय ऐसी जीवनशैली पर विश्‍वास रखते हैं , जो आनेवाली पीढी को अधिक सक्षम बना सके। हजारो वर्षों से भारतवासियों ने भी अपने दिमाग का पूरा उपयोग जीवनशैली को मजबूत बनाने में किया है , ताकि आनेवाली पीढी शारीरिक मानसिक और आर्थिक तौर पर अधिक मजबूत हो सके।

कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार बृहस्‍पति द्वितीय और एकादश भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के धन , कोष , लाभ के मामलों का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए कुंभ लग्‍न के जातकों के धन कोष का लाभ से और लाभ का धन कोष से संबंध बना होता है। कुंभ लग्‍न के जातक संसाधन वाले परिवार में जन्‍म लेते हैं , जिससे इन्‍हें लाभ को लेकर कोई चिंता नहीं होती , सतत लाभ से इनका कोष मजबूत बना होता है। संसाधन हीनता से इनका लाभ प्रभावित होता है तो इनके कोष पर बुरा प्रभाव पडता है। भारतवासियों को भी लाभ संसाधन के बल पर ही मिलता आ रहा है , कभी किसी प्रकार की आपत्ति में एक क्षेत्र के लोगों का लाभ भले ही प्रभावित हो जाए , पर उन्‍हे दूसरे क्षेत्र से संरक्षण मिल ही जाता है।

कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार शनि प्रथम और द्वादश भाव का स्‍वामी होता है यानि यह जातक के शरीर , व्‍यक्तित्‍व , खर्च और बाहरी संदर्भों आदि मामलों का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍नवाले जातकों की अपने स्‍वास्‍थ्‍य या व्‍यक्तित्‍व को मजबूती देने में अधिक से अधिक खर्च करने की प्रवृत्ति होती है। जातकों का स्‍वास्‍थ्‍य अच्‍छा रहता है , खर्च शक्ति के बने होने से और खाने पीने के सुख से आत्‍मविश्‍वास में बढोत्‍तरी होती है। कभी कभार कुंभ लग्‍नवालों के स्‍वास्‍थ्‍य में कमजोरी बनी रहती है , खर्चशक्ति की कमी से आत्‍मविश्‍वास कमजोर होता है। भारतवासियों के संदर्भ में देखा जाए , तो आजतक इनका खर्च भोजन में ही होता आया है। इनमें स्‍वास्‍थ्‍य के मामलों को गंभीरता से देखने की प्रवृत्ति मौजूद है , स्‍वास्‍थ्‍य के अलावे दूसरी जगह पर इनका खर्च बहुत कम होता है।

देश की तरह ही अपने अपने परिवार या समाज के हिसाब से , धर्म के हिसाब से माता और पिता के विचारों के हिसाब से भी अलग अलग लग्‍नानुसार हर व्‍यक्ति जीता है। मानव जाति के हिसाब से हममें से हर किसी की शैली मेष लग्‍न के अनुरूप होती है , पुन: भारतवासी होने के हिसाब से कुंभ लग्‍न के अनुरूप और अपने अपने धर्म , समाज या परिवार के हिंसाब से माता , पिता को प्रतिनिधित्‍व करनेवाले लग्‍न का भी छाप हमपर पडता है। पर मूल तौर पर अपने जन्‍मकालीन लग्‍न के हिसाब से जीने की सभी मनुष्‍यों की अपनी प्रवृत्ति होती है , क्‍यूंकि इन सबके बावजूद हर कोई अलग अलग बीज होता है और उसका निर्धारण लग्‍नकुंडली से ही किया जा सकता है, ठीक वैसे ही जैसे विशेष तौर पर विकसित किए गए लंगडे आम के पेड में कुछ गुण पेड के हिसाब से , कुछ आम के हिसाब से और कुछ अपनी जाति के हिसाब से होते हैं , पर उनमें मुख्‍य खूबी वह होती है , जिस गुण के कारण उसका अस्तित्‍व होता है।



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शनिवार, 19 फ़रवरी 2011

मीन लग्‍नवालों के विभिन्‍न संदर्भों का आपस में सहसंबंध ...


आसमान के 3...30 डिग्री से 360 डिग्री तक के भाग का नामकरण मीन राशि  के रूप में किया गया है। जिस बच्‍चे के जन्‍म के समय यह भाग आसमान के पूर्वी क्षितिज में उदित होता दिखाई देता है , उस बच्‍चे का लग्‍न मीन माना जाता है। मीन लग्‍न की कुंडली के अनुसार मन का स्‍वामी चंद्र पंचम भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के बुद्धि , ज्ञान , संतान पक्ष का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए मीन लग्‍न के जातकों के मन को पूर्ण तौर पर प्रभावित करने वाले संदर्भ यही होते हैं। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में चंद्र के मजबूत रहने पर ऐसे जातकों की बुद्धि तीक्ष्‍ण होती है  , इन्‍हें संतान पक्ष का भरपूर सुख प्राप्‍त होता है , जो मन को खुश रखता है। जबकि जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में चंद्र के कमजोर रहने पर बुद्धि और सूझ बूझ की कमी और संतान पक्ष के सुख में कमी इनके मन को दुखी करते हैं।

मीन लग्‍न की कुंडली के अनुसार समस्‍त जगत में चमक बिखेरने वाला सूर्य षष्‍ठ भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के रोग , ऋण , शत्रु या अन्‍य प्रकार के झंझट का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए अपने नाम यश को फैलाने के लिए मीन लग्‍न के जातक किसी प्रकार के झंझट को हल कर प्रभाव बढाने में विशेष दिलचस्‍पी रखते हैं। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में सूर्य के मजबूत रहने से इनके झंझट को हल करने का तरीका उत्‍तम कोटि का और अनुकरणीय होता है , जबकि जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में सूर्य के कमजोर रहने इन्‍हें हर प्रकार के झंझट से कष्‍टकर समझौता करने को बाध्‍य होना पडता है।

मीन लग्‍न की कुंडली के अनुसार मंगल द्वितीय और नवम भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के धन , कोष और भाग्‍य का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍न के जातकों के धन की स्थिति को मजबूत बनाने में भाग्‍य की बडी भूमिका होती है , किसी प्रकार के संयोग से संसाधन प्राप्‍त करते तथा किसी दुर्योग से संसाधनहीन होते है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में मंगल के मजबूत रहने पर भाग्‍य के साथ देने से इनका धन कोष मजबूत बना रहता हैं। विपरीत स्थिति में यानि जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में मंगल के कमजोर रहने पर भाग्‍य की कमजोरी धन कोष को कमजोर बनाती है।

मीन लग्‍न की कुंडली के अनुसार शुक्र तृतीय और अष्‍टम भाव का स्‍वामी है और यह जातक के भाई , बहन , बंधु , बांधव और जीवनशैली का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए मीन लग्‍नवालों की जीवनशैली का भाई बहन बंधु बांधव का संबंध बना होता है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शुक्र के मजबूत रहने पर मीन लग्‍नवाले भाई , बहन , बंधु और बांधव का सुख प्राप्‍त करते हैं , उनकी जीवनशैली को सुखमय बनाने में भाई बंधु की भमिका होती है। पर जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शुक्र कमजोर हो तो भाई बहन बंधु बांधव से संबंधित जबाबदेहियों के कारण उनकी जीवनशैली कमजोर दिखाई पडती है,  इनसे सहयोग की कमी से तनावग्रस्‍त रहते हैं।

मीन लग्‍न की कुंडली के अनुसार बुध चतुर्थ और सप्‍तम भाव का स्‍वामी है और यह जातक के मातृ पक्ष , हर प्रकार की संपत्ति और घर गृहस्‍थी का  प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍न के जातक के घर गृहस्‍थी का उनकी माता या हर प्रकार की संपत्ति से संबंध बना होता हैं। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बुध के मजबूत रहने पर ऐसे जातकों को मातृ पक्ष का भरपूर सहयोग मिलता है , हर प्रकार की संपत्ति इनके घर गृहस्‍थी के वातावरण को सुखमय बनाती हैं। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बुध के कमजोर रहने पर जातक का मातृ पक्ष के विचारों से तालमेल नहीं होता , हर प्रकार की छोटी बडी संपत्ति कष्‍ट का कारण बनकर घर गृहस्‍थी के माहौल को बिगाडती है।

मीन लग्‍न की कुंडली के अनुसार बृहस्‍पति प्रथम और दशम भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के स्‍वास्‍थ्‍य , व्‍यक्तित्‍व , पिता पक्ष , पद प्रतिष्‍ठा और सामाजिक राजनीतिक वातावरण का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए मीन लग्‍न के जातकों के आत्‍मविश्‍वास को बढाने घटाने में पिता की भूमिका बनती है , उनके व्‍यक्तित्‍व का समाज में एक पहचान बना होता है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बृहस्‍पति के मजबूत होने पर मीन लग्‍न के जातक को पिता का भरपूर सुख प्राप्‍त होता है , प्रकृति की ओर से स्‍वस्‍थ शरीर प्राप्‍त करते हैं , अपने आत्‍मविश्‍वास से समाज में अच्‍छी पहचान बनती है। इसके विपरीत , जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बृहस्‍पति के कमजोर होने पर मीन लग्‍नवाले जातक को पिता का सहयोग नहीं मिलता , स्‍वास्‍‍थ्‍य की गडबडी भी आत्‍मविश्‍वास को कमजोर बनाती है और उनकी पहचान में बाधा उपस्थित करती है।

मीन लग्‍न की कुंडली के अनुसार शनि एकादश और द्वादश भाव का स्‍वामी होता है यानि यह जातक के लाभ , खर्च और बाहरी संदर्भों आदि मामलों का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍नवाले जातकों के लाभ और खर्च में बडा संबंध होता है । जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शनि के मजबूत रहने पर ऐसे जातकों को नियमित लाभ होता रहता है , जिससे खर्च की दिक्‍कत नहीं आती , हर प्रकार के संबंधों का निर्वाह भी ये आसानी से कर लेते हैं। पर जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शनि के कमजोर रहने पर मीन लग्‍नवालों के लाभ में कमी खर्चशक्ति को कमजोर बनाती है , बाह्य संदर्भों को कमजोर करने में सहायक होती है।

गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

कुंभ लग्‍नवालों के जीवन के विभिन्‍न संदर्भों के सहसंबंध ......

आसमान के 300 डिग्री से 330 डिग्री तक के भाग का नामकरण कुंभ राशि  के रूप में किया गया है। जिस बच्‍चे के जन्‍म के समय यह भाग आसमान के पूर्वी क्षितिज में उदित होता दिखाई देता है , उस बच्‍चे का लग्‍न कुंभ माना जाता है। कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार मन का स्‍वामी चंद्र षष्‍ठ भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के प्रभाव और रोग , ऋण , शत्रु जैसे हर प्रकार के झंझट का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए कुंभ लग्‍न के जातकों के मन को पूर्ण तौर पर प्रभावित करने वाले संदर्भ किसी प्रकार के झंझट ही होते हैं। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में चंद्र के मजबूत रहने पर ऐसे जातकों के समक्ष किसी प्रकार का झंझट उपस्थित नहीं होता , जो मन को खुश रखता है। जबकि जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में चंद्र के मजबूत रहने पर कई तरह के झंझट उपस्थित होकर इनके मन को दुखी करते हैं।

कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार समस्‍त जगत में चमक बिखेरने वाला सूर्य सप्‍तम भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के घर गृहस्‍थी का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए अपने नाम यश को फैलाने के लिए कुंभ लग्‍न के जातक अपनी घर गृहस्‍थी को महत्‍व देते हैं। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में सूर्य के मजबूत रहने से इनके घर गृहस्‍थी का वातावरण और दाम्‍पत्‍य जीवन बहुत ही उत्‍तम कोटि का और अनुकरणीय होता है , जबकि जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में सूर्य के कमजोर रहने इन्‍हें अपनी दाम्‍पत्‍य जीवन से कष्‍टकर समझौता करने को बाध्‍य होना पडता है।

कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार मंगल तृतीय और दशम भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के भाई बहन , बंधु बांधव , पिता , समाज और पद प्रतिष्‍ठा का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍न के जातकों के परिवेश में भाई , बहन , बंधु बांधव ,  पिता , समाज सभी शामिल होते है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में मंगल के मजबूत रहने पर भाई बंहन बंधु बांधवों से लेकर पिता समाज के सारे बुजुर्गों से इनके संबंध अच्‍छे बने होते हैं और इसके कारण प्रतिष्‍ठा के पात्र बनते हैं। विपरीत स्थिति में यानि जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में मंगल के कमजोर रहने पर भाई , बंधु , पिता , समाज या अन्‍य लोगों का कष्‍ट झेलने को इन्‍हे बाध्‍य होना पडता है , इनकी प्रतिष्‍ठा पर भी आंच आती है।

कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार शुक्र चतुर्थ और नवम भाव का स्‍वामी है और यह जातक के मातृ पक्ष और हर प्रकार की छोटी बडी संपत्ति , स्‍थायित्‍व के साथ साथ भाग्‍य आदि का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए कुंभ लग्‍नवालों के हर प्रकार के संपत्ति का उनकी माता या भाग्‍य से संबंध बना होता है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शुक्र के मजबूत रहने पर कुंभ लग्‍नवाले माता या भाग्‍य के सहयोग से हर प्रकार की संपत्ति का सुख प्राप्‍त कर लेते हैं और स्‍थायित्‍व की मजबूती पाते हैं। पर जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शुक्र कमजोर हो तो मातृ पक्ष से कष्‍ट होता है , उनके साथ विचारों का तालमेल न होने से या भाग्‍य के साथ न देने से हर प्रकार के संपत्ति के सुख में बाधा आती है और स्‍थायित्‍व कमजोर दिखाई पडता है।

कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार बुध पंचम और नवम भाव का स्‍वामी है और यह जातक के बुद्धि , ज्ञान संतान और जीवनशैली का  प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍न के जातक अपनी बुद्धि का उपयोग हमेशा जीवनशैली को सुधारने के लिए करते हैं। यही कारण है कि हमारे देश में अधिकांश चिंतकों और विचारकों ने कुंभ लग्‍न में ही जन्‍म लिया था। ये ऐसी जीवनशैली पर विश्‍वास रखते हैं , जो आनेवाली पीढी को अधिक सक्षम बना सके। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बुध के मजबूत रहने पर ऐसे जातकों की अपनी बुद्धि , ज्ञान की मजबूती के साथ साथ संतान के मामलों की मजबूती भी देखने को मिलती है , इनकी जीवनशैली मजबूत होती है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बुध के कमजोर रहने पर जातक खुद तो दिमाग से कमजोर होता ही है , संतान पक्ष से भी बडी उम्‍मीद नहीं रख पाता और उसकी जीवनशैली में सुधार नहीं हो पाता।

कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार बृहस्‍पति द्वितीय और एकादश भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के धन , कोष , लाभ के मामलों का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए कुंभ लग्‍न के जातकों के धन कोष का लाभ से और लाभ का धन कोष से संबंध बना होता है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बृहस्‍पति के मजबूत होने पर कुंभ लग्‍न के जातक संसाधन वाले परिवार में जन्‍म लेते हैं , जिससे इन्‍हें लाभ को लेकर कोई चिंता नहीं होती। सतत लाभ से इनका कोष मजबूत बना होता है। इसके विपरीत , जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बृहस्‍पति के कमजोर होने पर कुंभ लग्‍नवाले जातक के समक्ष संसाधन हीनता की स्थिति होती है , जिससे इनका लाभ प्रभावित होता है और इनके कोष पर बुरा प्रभाव पडता है।

कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार शनि प्रथम और द्वादश भाव का स्‍वामी होता है यानि यह जातक के शरीर , व्‍यक्तित्‍व , खर्च और बाहरी संदर्भों आदि मामलों का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍नवाले जातकों की अपने स्‍वास्‍थ्‍य या व्‍यक्तित्‍व को मजबूती देने में अधिक से अधिक खर्च करने की प्रवृत्ति होती है । जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शनि के मजबूत रहने पर ऐसे जातकों का स्‍वास्‍थ्‍य अच्‍छा रहता है , खर्च शक्ति के बने होने से और खाने पीने के सुख से आत्‍मविश्‍वास में बढोत्‍तरी होती है। पर जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शनि के कमजोर रहने पर मकर लग्‍नवालों के स्‍वास्‍थ्‍य में कमजोरी बनी रहती है , खर्चशक्ति की कमी से आत्‍मविश्‍वास कमजोर होता है।

YEAR PREDICTION 2020
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बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

मकर लग्‍नवालों के सभी संदर्भों का आपस में सहसंबंध ....

आसमान के 270 डिग्री से 300 डिग्री तक के भाग का नामकरण मकर राशि  के रूप में किया गया है। जिस बच्‍चे के जन्‍म के समय यह भाग आसमान के पूर्वी क्षितिज में उदित होता दिखाई देता है , उस बच्‍चे का लग्‍न मकर माना जाता है। मकर लग्‍न की कुंडली के अनुसार मन का स्‍वामी चंद्र सप्‍तम भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के घर गृहस्थी का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए मकर लग्‍न के जातकों के मन को पूर्ण तौर पर संतुष्‍ट करने वाले संदर्भ घर गृहस्‍थी ही होते हैं। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में चंद्र के मजबूत रहने पर ऐसे जातकों की घर गृहस्‍थी का माहौल सुखद होता है।जबकि विपरीत स्थिति हो तो घर गृहस्‍थी का माहौल कष्‍टकर बना होता है।

मकर लग्‍न की कुंडली के अनुसार समस्‍त जगत में चमक बिखेरने वाला सूर्य अष्‍टम भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के रूटीन और जीवनशैली का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए अपने नाम यश को फैलाने के लिए मकर लग्‍न के जातक जीवनशैली को मजबूत बनाए रखने में रूचि लेते हैं। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में सूर्य के मजबूत रहने से इनकी जीवनशैली बहुत ही उत्‍तम कोटि की और अनुकरणीय होती है , जबकि जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में सूर्य के कमजोर रहने इन्‍हें अपनी जीवनशैली से कष्‍टकर समझौता करने को बाध्‍य होना पडता है।

मकर लग्‍न की कुंडली के अनुसार मंगल चतुर्थ और एकादश भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के मातृ पक्ष , हर प्रकार की संपत्ति , स्‍थायित्‍व और लाभ का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍न के जातकों के लाभ में मातृ पक्ष , किसी प्रकार की संपत्ति या स्‍थायित्‍व का सहसंबंध बना होता है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में मंगल के मजबूत रहने पर माता से इनके संबंध अच्‍छे बने होते हैं , ये हर प्रकार की संपत्ति और स्‍थायित्‍व का सुख प्राप्‍त करते हैं। विपरीत स्थिति में यानि जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में मंगल के कमजोर रहने पर मातृ पक्ष से संबंधित समस्‍याएं बनी होती हैं , हर प्रकार की संपत्ति कष्‍ट का कारण बनती हैं और स्‍थायित्‍व कमजोर बने होने से लाभ में बाधाएं आती हैं।

मकर लग्‍न की कुंडली के अनुसार शुक्र पंचम और दशम भाव का स्‍वामी है और यह जातक के बुद्धि , ज्ञान , संतान , पिता और सामाजिक राजनीतिक स्थिति आदि का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए मकर लग्‍नवालों के प्रतिष्‍ठा पक्ष को मजबूती देने में अपने बुद्धि , ज्ञान या संतान की बडी भूमिका होती है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शुक्र के मजबूत रहने पर मकर लग्‍नवाले अपने बुद्धि ज्ञान से कैरियर को मजबूती देते हैं । इनके सामाजिक राजनीतिक महत्‍व को बढाने में संतान भी सहयोगी सिद्ध होते हैं , पर जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शुक्र कमजोर हो तो बुद्धि ज्ञान की कमी से अपना कैरियर तो बाधित होता ही है , संतान पक्ष के काम भी मनोनुकूल ढंग से नहीं हो पाते।

मकर लग्‍न की कुंडली के अनुसार बुध षष्‍ठ और नवम भाव का स्‍वामी है और यह जातक के भाग्‍य और झंझट का  प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍न के जातकों के झंझट को दूर करने में भाग्‍य की बडी भूमिका होती है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बुध के मजबूत रहने पर ऐसे जातकों के झंझटों को हल करने में भाग्‍य बहुत बडी भूमिका निभाता है , किसी संयोग से उनके काम बन जाते हैं। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बुध के कमजोर रहने पर दुर्भाग्‍य की भूमिका होने से मकर लग्‍नवालों के झंझट में बडी बडी समस्‍याएं आती हैं।

मकर लग्‍न की कुंडली के अनुसार बृहस्‍पति तृतीय और द्वादश भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के भाई , बहन , बंधु , बांधव , खर्च और बाहरी संदर्भों का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए मकर लग्‍न के जातकों के खर्च के साथ भाई बहन , बंधु बांधवों का संबंध बना होता है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बृहस्‍पति के मजबूत होने पर मकर लग्‍न के जातकों की खर्च शक्ति मजबूत होती है , जिसका फायदा इनके भाई , बहन , बंधु बांधव उठाते हैं। इन्‍हें देशाटन का भी बडा शौक होता है। इसके विपरीत , जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बृहस्‍पति के कमजोर होने पर मकर लग्‍नवाले जातकों की खर्च शक्ति कमजोर होती है , जिसके कारण उन्‍हें भाई , बहन , बंधु बांधवों का सहयोग लेने की आवश्‍यकता होती है। इनका बाहरी संदर्भ भी बहुत कमजोर होता है।

मकर लग्‍न की कुंडली के अनुसार शनि प्रथम और द्वितीय भाव का स्‍वामी होता है यानि यह जातक के शरीर , व्‍यक्तित्‍व , धन , कोष आदि मामलों का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍नवाले जातकों के आत्‍मविश्‍वास को बढाने या घटाने में धन की बडी भूमिका होती है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शनि के मजबूत रहने पर ऐसे जातकों का स्‍वास्‍थ्‍य अच्‍छा रहता है , धन का अनायास आगम होता रहता है , जिससे आत्‍मविश्‍वास में बढोत्‍तरी होती है। पर जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शनि के कमजोर रहने पर मकर लग्‍नवालों के स्‍वास्‍थ्‍य में कमजोरी बनी रहती है , धन की कमी होती है , जिससे आत्‍मविश्‍वास कमजोर होता है।

सोमवार, 14 फ़रवरी 2011

धनु लग्‍नवालों के विभिन्‍न संदर्भों का आपस में सहसंबंध ...

आसमान के 240 डिग्री से 270 डिग्री तक के भाग का नामकरण धनु राशि  के रूप में किया गया है। जिस बच्‍चे के जन्‍म के समय यह भाग आसमान के पूर्वी क्षितिज में उदित होता दिखाई देता है , उस बच्‍चे का लग्‍न धनु माना जाता है। धनु लग्‍न की कुंडली के अनुसार मन का स्‍वामी चंद्र अष्‍टम भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के रूटीन और जीवनशैली का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए धनु लग्‍न के जातकों के मन को पूर्ण तौर पर संतुष्‍ट करने वाले संदर्भ ये ही होते हैं। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में चंद्र के मजबूत रहने पर ऐसे जातकों की जीवनशैली सुखद होती है , रूटीन सुव्‍यवस्थित होता है । जबकि विपरीत स्थिति हो तो रूटीन अस्‍तव्‍यस्‍त और जीवनशैली कष्‍टकर होती है।

धनु लग्‍न की कुंडली के अनुसार समस्‍त जगत में चमक बिखेरने वाला सूर्य नवम् भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के भाग्‍य और धर्म का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए अपने नाम यश को फैलाने के लिए धनु लग्‍न के जातक भाग्‍य के रूप में प्रकृति के नियमों को समझने और धर्म का प्रचार प्रसार करने में रूचि लेते हैं। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में सूर्य के मजबूत रहने से ये भाग्‍य का सहयोग प्राप्‍त करते हैं , धर्म और भाग्‍य से संबंधित बातों में इनका सकारात्‍मक चिंतन बना रहता है , जबकि जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में सूर्य के कमजोर रहने ये भाग्‍य की कमजोरी झेलने को बाध्‍य होते हैं और अंधविश्‍वासी होते चले जाते हैं।

धनु लग्‍न की कुंडली के अनुसार मंगल पंचम और द्वादश भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के बुद्धि , ज्ञान , संतान , खर्च और बाहरी संदर्भों का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍न के जातकों के अपनी या संतान पक्ष के बौद्धिक विकास में खर्च और बाहरी स्‍थान का सहसंबंध बना होता है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में मंगल के मजबूत रहने पर ये और इनकी संतान बुद्धि के तीक्ष्‍ण होते हैं , खर्च की मजबूती रखते है और देशाटन वगैरह में रूचि भी। विपरीत स्थिति में यानि जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में मंगल के कमजोर रहने पर ये और इनके संतान सामान्‍य दिमाग के होते हैं , खर्च शक्ति की कमी से बौद्धिक विकास में बाधाएं आती हैं और बाहरी संदर्भों को कमजोर पाते हैं।

धनु लग्‍न की कुंडली के अनुसार शुक्र षष्‍ठ और एकादश भाव का स्‍वामी है और यह जातक के लाभ , प्रभाव और रोग , ऋण शत्रु जैसे झंझट आदि का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इनके लाभ के वातावरण में बहुत झंझट होते हैं। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शुक्र के मजबूत रहने पर धनु लग्‍नवाले प्रभाव की मजबूती से झंझटों को हल करते हुए लाभ प्राप्ति का माहौल बनाते हैं। पर जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शुक्र के कमजोर रहने पर प्रभाव की कमजोरी से झंझटों को न हल कर पाने के कारण धनु लग्‍नवालों के लाभ में कमजोरी आती है।

धनु लग्‍न की कुंडली के अनुसार बुध सप्‍तम और दशम भाव का स्‍वामी है और यह जातक के पिता पक्ष , घर गृहस्‍थी के माहौल और पद प्रतिष्‍ठा का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍न के जातकों की घर गृहस्‍थी का प्रतिष्‍ठा से संबंध बना होता है । जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बुध के मजबूत रहने पर ऐसे जातकों का प्रतिष्ठित परिवार में जन्‍म होता है , ससुराल पक्ष भी बहुत ही मनोनुकूल होता है और घर गृहस्‍थी के वातावरण भी प्रतिष्‍ठा में वृद्धि करनेवाला होता है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बुध के कमजोर रहने पर धनु लग्‍नवाले पिता से संबंधित मामलों का कष्‍ट प्राप्‍त करते हैं , ससुराल पक्ष का वातावरण इनके मनोनुकूल नहीं होता , घर गृहस्‍थी में भी तनाव आता है और कभी कभी बात कानून तक भी पहुंच जाती है।

धनु लग्‍न की कुंडली के अनुसार बृहस्‍पति लग्‍न और चतुर्थ भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के शरीर , व्‍यक्तित्‍व , हर प्रकार की छोटी बडी संपत्ति  और स्‍थायित्‍व का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए धनु लग्‍न के जातकों के आत्‍मविश्‍वास को बढाने में उनकी स्‍थायित्‍व की मजबूत स्थिति और हर प्रकार की संपत्ति का बउा महत्‍व होता है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बृहस्‍पति के मजबूत होने पर धनु लग्‍न के जातकों का स्‍वास्‍थ्‍य अच्‍छा रहता है , हर प्रकार की संपत्ति का सुख मिलता है , जिससे आत्‍मविश्‍वास की बढोत्‍तरी होती है। इसके विपरीत , जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बृहस्‍पति के कमजोर होने पर धनु लग्‍नवाले जातकों के स्‍वास्‍थ्‍य में समस्‍याएं आती है , हर प्रकार की छोटी बडी संपत्ति कष्‍ट देनेवाली बनती हैं और आत्‍मविश्‍वास में कमी आती है।

धनु लग्‍न की कुंडली के अनुसार शनि द्वितीय और तृतीय भाव का स्‍वामी होता है यानि यह जातक के धन , कोष , भाई , बहन , बंधु बांधवों का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍नवाले जातकों के भाई , बंधुओं के धन कोष की स्थिति से संबंध बने रहने की संभावना होती है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शनि के मजबूत रहने पर ऐसे जातकों को भाई बंधु बांधव से संबंध अच्‍छा बना होता है , धन का लाभ भी प्राप्‍त होता है। पर जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शनि के कमजोर रहने पर धनु लग्‍नवालों के धन कोष की स्थिति कमजोर होती है , भाई बहनों से भी संबंध में खराबी होने से धन की स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव पडता है।

शनिवार, 12 फ़रवरी 2011

वृश्चिक लग्‍नवालों के विभिन्‍न संदर्भों का आपस में संबंध ...


आसमान के 210 डिग्री से 240 डिग्री तक के भाग का नामकरण ...वृश्चिक राशि  के रूप में किया गया है। जिस बच्‍चे के जन्‍म के समय यह भाग आसमान के पूर्वी क्षितिज में उदित होता दिखाई देता है , उस बच्‍चे का लग्‍न वृश्चिक माना जाता है। वृश्चिक लग्‍न की कुंडली के अनुसार मन का स्‍वामी चंद्र नवम् भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के भाग्‍य , धर्म आदि मामलों का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए वृश्चिक लग्‍न के जातकों के मन को पूर्ण तौर पर संतुष्‍ट करने वाले संदर्भ ये ही होते हैं। जन्‍मकुंडली या गोचर में चंद्र के मजबूत रहने पर ऐसे जातक बहुत भाग्‍यशाली होते हैं , संयोग से इनका काम होता रहता है।भाग्‍य का भरपूर सुख मिलने से  तुला लग्‍न के जातक का मन खुश और जन्‍मकुंडली या गोचर में चंद्र के कमजोर रहने पर इनकी कमजोर स्थिति से इनका मन आहत होता है।

वृश्चिक लग्‍न की कुंडली के अनुसार समस्‍त जगत में चमक बिखेरने वाला सूर्य दशम भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के पिता , पद प्रतिष्‍ठा और सामाजिक राजनीतिक स्थिति का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए अपने नाम यश को फैलाने के लिए वृश्चिक लग्‍न के जातक अपने पद प्रतिष्‍ठा को मजबूत बनाने पर जोर देते हैं। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में सूर्य के मजबूत रहने से इनका जन्‍म प्रतिष्ठित परिवार में होता है , इन्‍हें पिता का सुख प्राप्‍त होता है ,  पद प्रतिष्‍ठा की मजबूती से इनकी कीर्ति फैलती और जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में सूर्य के कमजोर रहने इन सबकी कमी से इनकी कीर्ति घटती है। 

वृश्चिक लग्‍न की कुंडली के अनुसार मंगल प्रथम और षष्‍ठ भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के शरीर , व्‍यक्तित्‍व , आत्‍मविश्‍वास और रोग , ऋण , शत्रु जैसे झंझटों का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍न के जातकों के  स्‍वास्‍थ्‍य में झंझट बने होने की संभावना रहती है ।  जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में मंगल के मजबूत रहने पर इनका स्‍वास्‍थ्‍य अच्‍छा होता है , जीवन में अधिक झंझट नहीं आते , झंझओं से लडने की शक्ति मौजूद होती है , जिससे प्रभावशाली माने जाते हैं। विपरीत स्थिति में यानि जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में मंगल के कमजोर रहने पर स्‍वास्‍थ्‍य की कमजोरी आत्‍मविश्‍वास को कमजोर बनाती है, झंझटों से लडने की शक्ति कम होती है तथा प्रभाव की कमी महसूस करते हैं।

वृश्चिक लग्‍न की कुंडली के अनुसार शुक्र सप्‍तम और दशम भाव का स्‍वामी है और यह जातक के घर गृहस्‍थी , खर्च और बाह्य संदर्भों आदि का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इनके घर गृहस्‍थी के वातावरण में खर्च का बहुत महत्‍व होता है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शुक्र के मजबूत रहने पर वृश्चिक लग्‍नवालों को खर्चशक्ति की प्रचुरता प्राप्‍त होती है , इस कारण इनकी घर गृहस्‍थी बहुत आरामदायक होती है। पर जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शुक्र के कमजोर रहने पर खर्चशक्ति की कमी के कारण वृश्चिक लग्‍नवालों के घरेलू जीवन में समस्‍याएं देखने को मिलती हैं।

वृश्चिक लग्‍न की कुंडली के अनुसार बुध अष्‍टम और दशम भाव का स्‍वामी है और यह जातक के जीवनशैली और लाभ का  प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍न के जातकों के जीवनशैली को मजबूती देने में लाभ की तथा लाभ को मजबूत बनाने में जीवनशैली  की महत्‍वपूर्ण भूमिका होती है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बुध के मजबूत रहने पर ऐसे जातकों का लाभ मजबूत होता है , जिससे जीवनशैली सुखद बनी होती है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बुध के कमजोर रहने पर वृश्चिक लग्‍नवाले लाभ की कमी के कारण अपनी जीवनशैली को बहुत कमजोर पाते हैं। 

वृश्चिक लग्‍न की कुंडली के अनुसार बृहस्‍पति द्वितीय और पंचम भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के धन , कोष , परिवार , बुद्धि , ज्ञान और संतान का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए वृश्चिक लग्‍न के जातकों के अपनी या संतान की पढाई लिखाई में धन की महत्‍वपूर्ण भूमिका होती  है।  जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बृहस्‍पति के मजबूत होने पर तुला लग्‍न के जातकों की धन की स्थिति  मजबूत होती है , जिससे अपना या संतान पक्ष का बौद्धिक विकास सुखद ढंग से हो पाता है। इसके विपरीत , जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बृहस्‍पति के कमजोर होने पर वृश्चिक लग्‍नवाले जातकों की आर्थिक स्थिति कमजोर होती है , जिसका बुरा प्रभाव उनकी खुद या संतान पक्ष के बौद्धिक विकास पर पउता है। 

वृश्चिक लग्‍न की कुंडली के अनुसार शनि तृतीय और चतुर्थ भाव का स्‍वामी होता है यानि यह जातक के भ्रातृ पक्ष , मातृ पक्ष , हर प्रकार की संपत्ति , स्‍थायित्‍व मामलों का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍नवाले जातकों के भाई , बंधुओं के कारण स्‍थायित्‍व के मजबूत या कमजोर होने की संभावना बनती है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शनि के मजबूत रहने पर ऐसे जातकों को भाई बंधु बांधव से सुख प्राप्‍त होता है, हर प्रकार की संपत्ति की स्थिति मजबूत होती है। पर जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शनि के कमजोर रहने पर वृश्चिक लग्‍नवालों के भाई बंधु में संपत्ति को लेकर विवाद बनने की संभावना बनती है। मातृ पक्ष के सुख में भी कमी देखने को मिलती है।

गुरुवार, 10 फ़रवरी 2011

तुला लग्‍न वालों के विभिन्‍न संदर्भों का आपस में सहसंबंध ...


आसमान के 180 डिग्री से 210 डिग्री तक के भाग का नामकरण तुला राशि  के रूप में किया गया है। जिस बच्‍चे के जन्‍म के समय यह भाग आसमान के पूर्वी क्षितिज में उदित होता दिखाई देता है , उस बच्‍चे का लग्‍न तुला माना जाता है। तुला लग्‍न की कुंडली के अनुसार मन का स्‍वामी चंद्र दशम भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के पिता , समाज , पद प्रतिष्‍ठा आदि का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए तुला लग्‍न के जातकों के मन को पूर्ण तौर पर संतुष्‍ट करने वाले संदर्भ ये ही होते हैं। जन्‍मकुंडली या गोचर में चंद्र के मजबूत रहने पर पिता का भरपूर सुख और मन मुताबिक प्रतिष्‍ठा मिलने से  तुला लग्‍न के जातक का मन खुश और जन्‍मकुंडली या गोचर में चंद्र के कमजोर रहने पर इनकी कमजोर स्थिति से इनका मन आहत होता है।

तुला लग्‍न की कुंडली के अनुसार समस्‍त जगत में चमक बिखेरने वाला सूर्य एकादश भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के लाभ , मंजिल आदि का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए अपने नाम यश को फैलाने के लिए तुला लग्‍न के जातक अपने लाभ को मजबूत बनाने पर जोर देते हैं। नाम यश फैलाने के लिए ये अपनी मंजिल को बहुत मजबूत बनाने में दिलचस्‍पी लेते हैं। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में सूर्य के मजबूत रहने से लाभ और मंजिल की मजबूती से इनकी कीर्ति फैलती और जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में सूर्य के कमजोर रहने इनकी कमी से इनकी कीर्ति घटती है। 

तुला लग्‍न की कुंडली के अनुसार मंगल द्वितीय और सप्‍तम भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के धन , कोष , घर गृहस्‍थी , ससुराल पक्ष आदि का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍न के जातकों के घर गृहस्‍थी में धन का काफी महत्‍व होता है।  जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में मंगल के मजबूत रहने पर इनकी आर्थिक मजबूती से घर गृहस्‍थी का वातावरण बहुत अच्‍छा होता है , पत्‍नी पक्ष से या ससुराल से भी धन प्राप्‍त करने की संभावना बनी होती है। विपरीत स्थिति में यानि जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में मंगल के कमजोर रहने पर आर्थिक मामलों की कमजोरी घर गृहस्‍थी के मामलों को कमजोर बनाती है। ससुराल पक्ष का माहौल भी कमजोर बना होता है।

तुला लग्‍न की कुंडली के अनुसार शुक्र प्रथम और अष्‍टम भाव का स्‍वामी है और यह जातक के शरीर , व्‍यक्तित्‍व , आत्‍मविश्‍वास और जीवनशैली आदि से संबंधित मामलों का  प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इनकी जीवनशैली से स्‍वास्‍थ्‍य और स्‍वास्‍थ्‍य से जीवनशैली का संबंध होता है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शुक्र के मजबूत रहने पर तुला लग्‍नवालों की जीवनशैली बहुत आरामदायक होती है , जिसके कारण इनका स्‍वास्‍थ्‍य अच्‍छा होता है। पर जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शुक्र के कमजोर रहने पर जीवनशैली की गडबडी के कारण तुला लग्‍नवालों के स्‍वास्‍थ्‍य में समस्‍याएं देखने को मिलती हैं।

तुला लग्‍न की कुंडली के अनुसार बुध नवम और द्वादश भाव का स्‍वामी है और यह जातक के भाग्‍य , खर्च , बाहरी संदर्भों का  प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍न के जातकों के भाग्‍य को मजबूती देने या कमजोर बनाने में खर्च तथा बाहरी संदर्भों  की महत्‍वपूर्ण भूमिका होती है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बुध के मजबूत रहने पर ऐसे जातकों का संबंध खर्चशक्ति की मजबूती के कारण दूर दूर तक बना होता है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बुध के कमजोर रहने पर तुला लग्‍नवाले खर्च शक्ति की कमी के कारण अपने भाग्‍य को बहुत कमजोर मानते हैं। बाहरी संबंधों में भी बाधाएं आती हैं।

तुला लग्‍न की कुंडली के अनुसार बृहस्‍पति तृतीय और षष्‍ठ भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के भाई बहन , बंधु बांधव और झंझट भरे वातावरण का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए तुला लग्‍न के जातकों के भाई , बहन , बंधु बांधव का झंझट से संबंध बना होता है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बृहस्‍पति के मजबूत होने पर तुला लग्‍न के जातकों को भाई बहन , बंधु बांधव का सुख प्राप्‍त होता है , जिससे प्रभाव की बढोत्‍तरी होती है। इसके विपरीत , जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बृहस्‍पति के कमजोर होने पर तुला लग्‍नवाले जातकों को भाई , बहन बंधु बांधवों की कमजारियों को झेलने को विवश होना पडता है।  इनसे झंझट होने की संभावना भी बहुत अधिक होती है।

तुला लग्‍न की कुंडली के अनुसार शनि चतुर्थ और पंचम भाव का स्‍वामी होता है यानि यह जातक के मातृ पक्ष , हर प्रकार की संपत्ति , स्‍थायित्‍व , बुद्धि , ज्ञान और संतान जैसे मामलों का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍नवाले जातकों के अपनी या संतान पक्ष की पढाई लिखाई में मातृ पक्ष की भूमिका होती है , संतान के द्वारा स्‍थायित्‍व के मजबूत या कमजोर होने की संभावना बनती है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शनि के मजबूत रहने पर ऐसे जातकों को माता से सुख प्राप्‍त होता है, खुद की सूझ बूझ अच्‍छी होती है , संतान पक्ष बहुत मजबूत स्थिति में होता है। पर जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शनि के कमजोर रहने पर तुला लग्‍नवाले मातृ पक्ष के सुख में कमी , छोटी बडी संपत्ति का सुख न प्राप्‍त करने के कारण स्‍थायित्‍व की कमी तथा अपनी या बच्‍चों की पढाई लिखाई के मामलों में असफलता प्राप्‍त करते हैं।।

मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011

सरस्‍वती पूजा पर आज तो बस पुरानी यादें ही साथ हैं !!

सरस्‍वती पूजा को लेकर सबसे पहली याद मेरी तब की है , जब मैं मुश्किल से पांच या छह वर्ष की रही होऊंगी और सरस्‍वती पूजा के उपलक्ष्‍य में शाम को स्‍टेज में हो रहे कार्यक्रम में बोलने के लिए मुझे यह कविता रटायी गयी थी ...

शाला से जब शीला आयी ,
पूछा मां से कहां मिठाई ।
मां धोती थी कपडे मैले ,
बोली आले में है ले ले।
मन की आशा मीठी थी ,
पर आले में केवल चींटी थी।
खूब मचाया उसने हल्‍ला ,
चींटी ने खाया रसगुल्‍ला।

गांव में रहने के कारण अपनी पढाई न पूरी कर पाने का मलाल दादाजी को इतना रहा कि उन्‍होने पांचों बेटों को अधिक से अधिक पढाने की पूरी कोशिश की। एक मामूली खेतिहर और छोटा मोटा व्‍यवसाय करनेवाले मेरे दादाजी अपने पांचो बेटे को कक्षा में टॉपर पाकर और उनके ग्रेज्‍युएट हो जाने मात्र से ही काफी खुश रहते और मानते कि हमारे परिवार पर मां सरस्‍वती की विशेष कृपा है , इसलिए अच्‍छा खासा खर्च कर अपने घर  पर ही वसंत पंचमी के दिन सरस्‍वती जी की विशेष पूजा करवाया करते थे। सुबह पूजा होने के बाद शाम को लोगों की भीड जुटाने के लिए एक माइक और लाउस्‍पीकर आ जाता , वहां के सांस्‍कृतिक कार्यक्रम में हमारे परिवार के लोगों का तो शरीक रहना आवश्‍यक होता। घर के छोटे बच्‍चे भी स्‍टेज पर जाकर अपना नाम ही जोर से चिल्‍लाकर बोल आते।

थोडी बडी होने पर स्‍कूल में भी हमारा उपस्थित र‍हना आवश्‍यक होता , चूंकि स्‍कूलों के कार्यक्रम में थोडी देरी हो जाया करती थी , इसलिए हमारे घर की पूजा सुबह सवेरे ही हो जाती और माता सरस्‍वती को पुष्‍पांजलि देने के बाद ही हमलोग तब स्‍कूल पहुंचते , जब वहां का कार्यक्रम शुरू हो जाता था। सभी शिक्षकों को मालूम था कि हमारे घर में भी पूजा होती है , इसलिए हमें कभी भी देर से पहुंचने को लेकर डांट नहीं पडी। बचपन से ही हम भूखे प्‍यासे स्‍कूल जाते और स्‍कूल की पूजा के बाद ही प्रसाद खाते हुए सारा गांव घूमते , प्रत्‍येक गली में एक सरस्‍वती जी की स्‍थापना होती थी , हमलोग किसी भी मूर्ति के दर्शन किए बिना नहीं रह सकते थे।

ऊंची कक्षाओं के बच्‍चों को स्‍कूल के सरस्‍वती पूजा की सारी व्‍यवस्‍था खुद करनी होती थी , इस तरह वे एक कार्यक्रम का संचालन भी सीख लेते थे। चंदा एकत्रित करने से लेकर सारा बाजार और अन्‍य कार्यक्रम उन्‍हीं के जिम्‍मे होता। सहशिक्षा वाले स्‍कूल में पढ रही हम छात्राओं को सरस्‍वती पूजा के कार्यक्रम में चंदा इकट्ठा करने और पंडाल की सजावट के लिए घर से साडियां लाने से अधिक काम नहीं मिलता था , इसलिए सबका खाली दिमाग अपने पहनावे की तैयारी करता मिलता।

तब लहंगे का फैशन तो था नहीं , बहुत कम उम्र से ही सरस्‍वती पूजा में हम सभी छात्राएं साडी पहनने के लिए परेशान रहते। आज की  तरह तब महिलाओं के पास भी साडियों के ढेर नहीं हुआ करते थे , इसलिए अच्‍छी साडियां देने को किसी की मम्‍मी या चाची तैयार नहीं होती और पूजा के मौके पर साधारण साडियां पहनना हम पसंद नहीं करते थे। साडियों के लिए तो हमें जो मशक्‍कत करनी पडती , उससे कम ब्‍लाउज के लिए नहीं करनी पडती। किसी भी छात्रा को अपनी मम्‍मी और चाचियों का ब्‍लाउज नहीं आ सकता था, ब्‍लाउज के लिए हम पूरे गांव में दुबली पतली नई ब्‍याहता भाभियों को ढूंढते। तब रंगो के इतने शेड तो होते नहीं थे , हमारी साडी के रंग का ब्‍लाउज कहीं न कहीं मिल ही जाता , तो हमें चैन आता।

हमारे गांव में वसंतपंचमी के दूसरे दिन से ही मेला भी लगता है , हमारे घर में तो सबका संबंध शुरू से शहरों से रा है , इसलिए मेले को लेकर बडों को कभी उत्‍साह नहीं रहा , पर दूर दराज से पूरे गांव में सबके घर मेहमान मेला देखने के लिए पहुंच जाते हैं। अनजान लोगों से भरे भीड वाले वातावरण में हमलोगों को लेकर अभिभावक कुछ सशंकित भी रहते , पर एक सप्‍ताह तक हमलोगों का उत्‍साह बना रहता। ग्रुप बनाकर ही सही , पर मेले में आए सर्कस से लेकर झूलों तक और मिठाइयों से लेकर चाट पकौडों तक का आनंद हमलोग अवश्‍य लेते।

वर्ष 1982 में के बी वूमेन्‍स कॉलेज , हजारीबाग में ग्रेज्‍युएशन करते हुए चतुर्थ वर्ष में पहली बार सरस्‍वती पूजा के आयोजन का भार हमारे कंधे पर पडा था। इस जिम्‍मेदारी को पाकर हम दस बीस लडकियां अचानक बडे हो गए थे और पंद्रह दिनों तक काफी तैयारी के बाद हमलोगों ने सरस्‍वती पूजा के कार्यक्रम को बहुत अच्‍छे ढंग से संपन्‍न किया था। वो उत्‍साह भी आजतक नहीं भूला जाता। आज तो बस पुरानी यादें ही साथ हैं , सबों को सरस्‍वती पूजा की शुभकामनाएं !!

कन्‍या लग्‍नवालों के सभी संदर्भों का सहसंबंध ...


आसमान के 150 डिग्री से 180 डिग्री तक के भाग का नामकरण कन्‍या राशि  के रूप में किया गया है। जिस बच्‍चे के जन्‍म के समय यह भाग आसमान के पूर्वी क्षितिज में उदित होता दिखाई देता है , उस बच्‍चे का लग्‍न कन्‍या माना जाता है। कन्‍या लग्‍न की कुंडली के अनुसार मन का स्‍वामी चंद्र एकादश भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के लाभ , लक्ष्‍य और मंजिल आदि का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए कन्‍या लग्‍न के जातकों के मन को पूर्ण तौर पर संतुष्‍ट करने वाले संदर्भ ये ही होते हैं। जन्‍मकुंडली या गोचर में चंद्र के मजबूत रहने पर लाभ प्राप्ति की मजबूत स्थिति से कन्‍या लग्‍न के जातक का मन खुश और जन्‍मकुंडली या गोचर में चंद्र के कमजोर रहने पर इनकी कमजोर स्थिति से इनका मन आहत होता है।

कन्‍या लग्‍न की कुंडली के अनुसार समस्‍त जगत में चमक बिखेरने वाला सूर्य द्वादश भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के खर्च और बाहरी संदर्भों का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए अपने नाम यश को फैलाने के लिए कन्‍या लग्‍न के जातक अपनी खर्च शक्ति को मजबूत बनाने पर जोर देते हैं। नाम यश फैलाने के लिए ये बाह्य संदर्भों को मजबूत बनाने में दिलचस्‍पी लेते हैं। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में सूर्य के मजबूत रहने से खर्चशक्ति और बाह्य संदर्भों की मजबूती से इनकी कीर्ति फैलती और जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में सूर्य के कमजोर रहने इनकी कमी से इनकी कीर्ति घटती है। 

कन्‍या लग्‍न की कुंडली के अनुसार मंगल चतुर्थ और एकादश भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के भाई बहन , बंधु बांधव और जीवनशैली का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍न के जातकों के भाई बहन , बंधु बांधवों का इनकी जीवनशैली से सहसंबंध होता है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में मंगल के मजबूत रहने पर इन्‍हें भाई बंधुओं का सहयोग मिलता है , जिससे जीवनशैली मजबूत बनी होती है। विपरीत स्थिति में यानि जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में मंगल के कमजोर रहने पर भाई , बहन , बंधु बांधवों के सहयोग न मिलने या उनसे संबंधित तनाव के कारण जीवनशैली बहुत कमजोर दिखती है। 

कन्‍या लग्‍न की कुंडली के अनुसार शुक्र द्वितीय और नवम् भाव का स्‍वामी है और यह जातक के भाग्‍य , धन आदि से संबंधित मामलों का  प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए किसी प्रकार के संयोग या दुर्योग का इनके धन से सहसंबंध होता है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शुक्र के मजबूत रहने पर कन्‍या लग्‍नवालों के धनविषयक मामलों में भाग्‍य मददगार सिद्ध होते हैं। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शुक्र के कमजोर रहने पर भाग्‍य की गडबडी के कारण जीवन में आर्थिक मामलों में बडी गडबडी देखने को मिलती है।

कन्‍या लग्‍न की कुंडली के अनुसार बुध प्रथम और दशम भाव का स्‍वामी है और यह जातक के स्‍वास्‍थ्‍य , व्‍यक्तित्‍व , आत्‍मविश्‍वास , पिता , पद प्रतिष्‍ठा , सामाजिक राजनीतिक मामलों का  प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍न के जातकों के आत्‍मविश्‍वास बढाने या घटाने में पिता और कैरियर की महत्‍वपूर्ण भूमिका होती है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बुध के मजबूत रहने पर ऐसे जातक अपने पिता की मजबूत स्थिति के बलबूते मजबूत आत्‍मविश्‍वास तथा इस मजबूत आत्‍‍मविश्‍वास के बल पर कैरियर को मजबूती देने में समर्थ होते हैं। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बुध के कमजोर रहने पर कन्‍या लग्‍नवाले पिता की कमजोरी के कारण आत्‍विश्‍वास को कमजोर पाते हैं , स्‍वास्‍थ्‍य की गडबडी और कार्यस्‍थल पर मनोनुकूल वातावरण का अभाव भी इन्‍हें प्राप्‍त होता है।

कन्‍या लग्‍न की कुंडली के अनुसार बृहस्‍पति चतुर्थ और सप्‍तम भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के माता , हर प्रकार की संपत्ति , घर गृहस्‍थी का वातावरण का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए कन्‍या लग्‍न के जातकों के मातृ पक्ष या हर प्रकार की संपत्ति का उनके घरगृहस्‍थी से संबंध बना होता है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बृहस्‍पति के मजबूत होने पर कन्‍या लग्‍न के जातकों को मातृ पक्ष तथा हर प्रकार की संपत्ति का सुख प्राप्‍त होता है , जिससे घर गृहस्‍थी का वातावरण मजबूत बना होता है। इसके विपरीत , जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बृहस्‍पति के कमजोर होने पर कन्‍या लग्‍नवाले जातकों को मातृ पक्ष , हर प्रकार की संपत्ति और स्‍थायित्‍व की कमजोरी देखने को मिलती है , जिससे घर गृहस्‍थी की स्थिति कमजोर महसूस होती है।

कन्‍या लग्‍न की कुंडली के अनुसार शनि पंचम और षष्‍ठ भाव का स्‍वामी होता है यानि यह जातक के बुद्धि , ज्ञान , संतान पक्ष और रोग , द्वण , शत्रु जैसे झंझट का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍नवाले जातकों के अपनी या संतान पक्ष की पढाई लिखाई और अन्‍य मामलों में झंझट आने की बहुत संभावना बन जाती है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शनि के मजबूत रहने पर ऐसे जातकों की खुद की सूझ बूझ अच्‍छी होती है , संतान पक्ष बहुत मजबूत स्थिति में होता है , जो प्रभाव को बढाने में सहायक सिद्ध होता है। पर जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शनि के कमजोर रहने पर कन्‍या लग्‍नवाले अपनी या बच्‍चों की पढाई लिखाई को लेकर बडा झंझट प्राप्‍त करते हैं।

रविवार, 6 फ़रवरी 2011

सिंह लग्‍नवालों के विभिन्‍न संदर्भों का आपस में सहसंबंध ....

आसमान के 120 डिग्री से 150 डिग्री तक के भाग का नामकरण सिंह राशि  के रूप में किया गया है। जिस बच्‍चे के जन्‍म के समय यह भाग आसमान के पूर्वी क्षितिज में उदित होता दिखाई देता है , उस बच्‍चे का लग्‍न सिंह माना जाता है। सिंह लग्‍न की कुंडली के अनुसार मन का स्‍वामी चंद्र द्वादश भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के खर्च , बाहरी संदर्भों आदि का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए सिंह लग्‍न के जातकों के मन को पूर्ण तौर पर संतुष्‍ट करने वाले संदर्भ खर्च और बाह्य संपर्क होते हैं। जन्‍मकुंडली या गोचर में चंद्र के मजबूत रहने पर खर्च शक्ति की मजबूत स्थिति और देशाटन वगैरह से सिंह लग्‍न के जातक का मन खुश और जन्‍मकुंडली या गोचर में चंद्र के कमजोर रहने पर इनकी कमजोर स्थिति से इनका मन आहत होता है।

सिंह लग्‍न की कुंडली के अनुसार समस्‍त जगत में चमक बिखेरने वाला सूर्य लग्‍न भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के शरीर , व्‍यक्तित्‍व और आत्‍मविश्‍वास का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए अपने नाम यश को फैलाने के लिए सिंह लग्‍न के जातक अपने शरीर को मजबूत बनाने पर जोर देते हैं। नाम यश फैलाने के लिए ये अपने व्‍यक्तित्‍व का ही स‍हारा लेना पसंद करते हैं। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में सूर्य के मजबूत रहने व्‍यक्तित्‍व की मजबूती से इनकी कीर्ति फैलती और जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में सूर्य के कमजोर रहने इनकी कमी से इनकी कीर्ति घटती है। 

सिंह लग्‍न की कुंडली के अनुसार मंगल चतुर्थ और नवम भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के मातृ पक्ष , किसी प्रकार की छोटी या बडी संपत्ति , स्‍थायित्‍व और भाग्‍य का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍न के जातकों के मातृ पक्ष , किसी प्रकार की छोटी या बडी संपत्ति , स्‍थायित्‍व का भाग्‍य से  सहसंबंध होता है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में मंगल के मजबूत रहने पर इन्‍हें मातृ पक्ष का सहयोग मिलता है , हर प्रकार की संपत्ति और स्‍थायित्‍व की मजबूती रहती है , जिससे भाग्‍य की मजबूती बनती है । विपरीत स्थिति में यानि जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में मंगल के कमजोर रहने पर भाग्‍य बहुत कमजोर हो जाता है। इसी प्रकार भाग्‍य के मजबूत होने का सर्वाधिक फायदा माता और हर प्रकार की संपत्ति को मिलता है , जबकि विपरीत स्थिति में ये पक्ष कमजोर बने होते हैं।

सिंह लग्‍न की कुंडली के अनुसार शुक्र तृतीय और दशम भाव का स्‍वामी है और यह जातक के भाई , बहन , बंधु , बांधव पक्ष , पिता पक्ष और सामाजिक राजनीतिक स्थिति का  प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इनका आपस में सहसंबंध होता है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शुक्र के मजबूत रहने पर सिंह लग्‍नवालों के सामाजिक राजनीतिक और कैरियर के मामलों की मजबूती में भाई बहन बंधु बांधव मददगार सिद्ध होते हैं और भाई बहन बंधु बांधव की मजबूती में सामाजिक राजनीतिक वातावरण। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शुक्र के कमजोर रहने पर भाई बहन बंधु बांधव का सहयोग नहीं मिलता और ऐसे लोगों के कैरियर या सामाजिक राजनीतिक मामलों में बडी गडबडी आ जाती है।

सिंह लग्‍न की कुंडली के अनुसार बुध द्वितीय और एकादश भाव का स्‍वामी है और यह जातक के धन , कोष और लाभ से संबंधित मामलों का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍न के जातकों के धन कोष को मजबूती देने में हर प्रकार के लाभ तथा लाभ को मजबूती देने में धन और कौटुम्बिक मजबूती का हाथ होता है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बुध के मजबूत रहने पर ऐसे जातक अपनी मजबूत पूंजी के बल पर लाभ को मजबूती देने में समर्थ होते हैं और लाभ की मजबूती से कोष को मजबूती देने में समर्थ होते हैं। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बुध के कमजोर रहने पर सिंह लग्‍नवाले धन की कमी से लाभ से और लाभ की कमी से कोष से वंचित रह जाते हैं ।

सिंह लग्‍न की कुंडली के अनुसार बृहस्‍पति पंचम और अष्‍टम भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के बुद्धि , ज्ञान , संतान और जीवनशैली का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए सिंह लग्‍न के जातकों के बुद्धि , ज्ञान और संतान पक्ष का जीवनशैली पर बहुत प्रभाव देखा जाता है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बृहस्‍पति के मजबूत होने पर सिंह लग्‍न के जातकों का खुद का बुद्धि , ज्ञान या संतान पक्ष बहुत मजबूत दिखाई पडता है , जिससे जीवनशैली मजबूत बनी रहती है , उनकी जीवनशैली संतान पक्ष को मजबूती देती है। इसके विपरीत , जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बृहस्‍पति के कमजोर होने पर सिंह लग्‍नवाले जातकों की अपनी सूझ बूझ और संतान पक्ष में गडबडी पैदा होती है , जिससे जीवन कमजोर हो जाता है और इससे आनेवाली पीढी के जीवन में भी गडबडी आती है।

सिंह लग्‍न की कुंडली के अनुसार शनि षष्‍ठ और सप्‍तम  भाव का स्‍वामी होता है यानि यह जातक के घर , गृहस्‍थी और झंझट का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍नवाले जातकों के घर गृहस्‍थी से संबंधित मामलों में झंझट आने की बहुत संभावना बन जाती है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शनि के मजबूत रहने पर ऐसे जातकों के घर गृहस्‍थी या ससुराल का पक्ष बहुत मजबूत होता है , जो प्रभाव को बढाने में सहायक सिद्ध होता है। पर जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शनि के कमजोर रहने पर सिंह लग्‍नवाले घर गृहस्‍थी के मामलों को लेकर बडा झंझट प्राप्‍त करते हैं , उनके ससुराल पक्ष का माहौल भी अच्‍छा नहीं होता।