बुधवार, 24 अक्तूबर 2012

‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष: परिचय एवं उपयोगिता’ का एक प्रजेंटेशन और कार्यक्रम ( Astrology )



समाज से ज्‍योतिषीय एवं धार्मिक भ्रांतियों को दूर करने के उद्देश्‍य से पेटरवार के वन एवं पर्यावरण विभाग के सभागार में अविभाजित बिहार के वित्‍त राज्‍य मंत्री रह चुके श्री छत्रु राम महतो की अध्‍यक्षता में ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिषीय अनुसंधान केन्‍द्र द्वारा ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष: परिचय एवं उपयोगिता’ का एक प्रजेंटेशन और कार्यक्रम आयोजित किया गया। 

श्रीमती शालिनी खन्‍ना ने बीस वर्षों में गत्‍यात्‍मक ज्‍योति
ष की यत्र तत्र पत्र पत्रिकाओं में होने वाले चर्चा के बारे में बताया। गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष के जनक श्री विद्या सागर महथा जी ने जीवनभर चलने वाले अपने ज्‍योतिषीय यात्रा के बारे में बताने के क्रम में कहा कि प्रकृति के नियम हर क्षेत्र में काम करते हैं , कहीं वे दिखाई पडते हैं और कहीं नहीं दिखाई देते। इन्‍होने इस नियम को समझने में सफलता पायी है और इसका फायदा उठाया जाना चाहिए। 





श्रीमती संगीता पुरी ने प्रजेंटेशन के माध्‍यम से आसमान के ग्रह नक्षत्रों की चाल दिखाते हुए बताया कि उनके पिताजी ने क्‍या ढूंढा है और गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष में नया क्‍या है। स्‍लाइड शो के माध्‍यम से ही इसकी उपयोगिता के बारे में बताया कि जो लाभ या निश्चिंति हमें घडी , टॉर्च और कैलेण्‍डर से मिलती है , वैसी ही गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष के आधार पर अपने जन्‍मकालीन ग्रहों के स्‍वभाव को समझ जाने से मिलती है।






 कार्यक्रम में उपस्थित रांची विश्‍व विद्यालय के स्‍नातकोत्‍तर विभाग ‘इतिहास’ के पूर्व विभागाध्‍यक्ष डॉ एच एस पांडेय ने महथा जी के दीर्घायु होने की कामना की ताकि इस वैज्ञानिक खोज को विश्‍व के जन जन तक पहुंचाया जा सके। 





झारखंड विद्युत बोर्ड के अवकाश प्राप्‍त उप प्रबंधक श्री उमेश सिंह ने कहा कि महथा जी के सिद्धांत वर्षों से अभी तक उनका मार्गदर्शन करते आ रहे हैं। धनबाद जिला खनन पदाधिकारी श्री रामेश्‍वर राणा ने कहा कि गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष जैसे वैज्ञानिक खोज को प्रचारित प्रसारित करना आवश्‍यक है। वरिष्‍ठ चिकित्‍सक डॉ अमर कुमार श्रीवास्‍तव ने बताया कि‍ हमारे परिवार के मामले में महथा जी की भविष्‍यवाणी शत प्रतिशत सही रही है। 





वरिष्‍ठ पत्रकार श्री अशोक वर्मा ने निकट भविष्‍य में चार शहरों में इस तरह के आयोजन करने की घोषणा की , ताकि गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष के सिद्धांत जन जन तक पहुंच सके। इस कार्यक्रम में पेटरवार में मौजूद अधिकारियों और बुद्धिजीवियों के अलावे रांची , रामगढ , धनबाद , बोकारो से बडी संख्‍या में लोग पहुंचे थे। सभा के अंत में ‘प्रश्‍न मंच’ के माध्‍यम से श्रोताओं की जिज्ञासा को शांत किया गया। 





लीला जानकी विद्यालय , पेटरवार के संस्‍थापक श्री सुधीर कुमार सिन्‍हा जी ने मंच संचालन करते हुए खुशी जतायी कि पेटरवार कि धरती में इतनी बडी प्रतिभा का होना गांव वालों का सौभाग्‍य है। अध्‍यक्ष महोदय ने भी गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष पर अपना विश्‍वास जताया और इसके संदेश को जन जन तक पहुचने की शुभकामनाएं दी।




शनिवार, 4 अगस्त 2012

नजर का असर ..... अतिथि पोस्‍ट .... श्री विद्या सागर महथा

कुणाल की आंखों पर उसकी सौतेली मां की नजर थी , कारण यह था कि उसकी आंखें बहुत ही खूबसूरत थी और उसकी तथाकथित मां उन आंखों पर मोहित थी। लाख कोशिश के बाद भी जब वह उन आंखों को हासिल न कर सकी तो अपने पति से उसकी शिकायत कर , उसपर छेड़खानी का इलजाम लगाकर उन आंखों को निकलवा लेने से भी बाज नहीं आयी। खड्गसिंह डाकू की नजर बाबा भारती के घोड़े पर थी , किसी भी तरह वह उस घोड़े को प्राप्त करना चाहता था। इसी क्रम में वह अपंग और असहाय बनने का ढोंग कर गन्तव्य तक जाने के लिए सहारा मांगकर बाबा भारती के घोड़े पर बैठा और उन्हें धक्का देकर गिराकर घोड़े को लेकर चंपत हो गया।

चोर उचक्के की नजर उस धन पर होती है , जिसे आसानी से झपटा जा सके। डाकू की नजर वैसे धन पर होती है , जिसे बंदूक के बल पर या शक्ति प्रदर्शन के साथ जबर्दस्ती हासिल किया जा सके। नेताओं की नजर हमेशा कुर्सी पर होती है , कुर्सी पर बैठे नेताओं को हराया जाए तथा खुद उसपर बैठा जाए , इसी तिकड़म में वे लगे होते हैं। पुलिस की नजर क्रिमिनल पर तथा इनकम टैक्सवालों की नजर टैक्स की चोरी करनेवालों पर होती है। मनचलों की नजर सुंदर युवतियो पर होती है। इन्द्र की नजर तप करनेवालों पर होती थी , किसी भी हालत में उनकी तपस्या पूरी न हो , ताकि उनकी गद्दी सुरक्षित रहे । इतना ही नहीं ग्रहों की भी दृष्टि की चर्चा शास्त्रों में की गयी है। मान्यता है कि शनि की दृष्टि बुरी होती है , जबकि बृहस्पति की दृष्टि को शुभ कहा गया है। अब प्रश्न यह उठता है कि यह दृष्टि या नजर वास्तव में अच्छी होती है या बुरी ?

चोर , डकैत या अपराधी पुलिस की नजर से बचना चाहते हैं। रिश्वतखोर बड़े अफसर , नौकरशाह या नेता सी बी आई या मिडिया की नजरों से बचना चाहते हैं। कर्जदार साहूकार या महाजन की नजरों से बचना चाहते हैं। लेकिन अपने से बड़े , शक्तिशाली और सक्षम व्यक्ति से कोई काम निकालना हो , तो सभी अपने ऊपर कृपादृष्टि बनाए रखने के लिए गिड़गिड़ाकर अनुरोध करते हुए देखे जाते हैं। ‘ महाशय , आपके ऑफिस में मेरा लड़का काम करता है , कृपया उसपर नजर रखिएगा। ’ इस तरह लोग कभी किसी की नजर के मुहॅताज होते हैं , तो कभी किसी की नजर से बचना चाहते हैं। स्पष्ट है , उन नजरों से हम बचना चाहते हैं , जिनसे हमारे बुरे होने की आशंका बनी होती है। इसके विपरीत , जिन कृपादृष्टि में हमारा कल्याण छुपा होता है , उनके हम आकांक्षी होते हैं।

अशिक्षित लोगों के बीच , गांवों या देहातों में नजर का मतलब केवल बुरी नजरों से ही होता है , जिससे किसी के सिर्फ अहित होने की ही संभावना है , किन्तु अज्ञानतावश उन नजरों को ही कसूरवार समझा जाता है , जिनमें किसी प्रकार की शक्ति नहीं होती , उनकी नीयत भी बुरी नहीं होती। वास्तव में वे शक्तिहीन होते हैं तथा अनेक प्रकार की शक्तियों से निरंतर घिरे होने के कारण उनका आत्मविश्वास मरा होता है। वे दूसरों से नजर मिलाने की हिम्मत भी नहीं कर पाते , फिर भी उनके किसी काम को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है , इससे उनमें घबराहट पैदा होती है , उनसे संबंधित किसी प्रश्न को भी पूछे जाने पर वे उसका उत्तर अनाप-शनाप ढंग से ही देते हैं तथा अधिक छानबीन करने होने पर मैदान छोड़कर भाग भी जाते हैं। ऐसी हालत में समाज उनके किसी भी कार्यवाही को गलत मान लेता है तथा उन्हें कसूरवार समझ बैठता है।

समाज में इस मानसिकता की औरतें डायन कहलाती हैं , जिनके चेहरे पर असमय ही पहाड़ जैसी पीड़ा को झेलने की छाया टपकती रहती है। वे शक्तिहीन , असहाय और निरीह होती है। किसी शुभ अवसर पर लोग उसकी उपस्थिति को बुरा समझने लगते हैं। छोटे सुंदर बच्चों को भी उनकी नजर से बचाने का प्रयास किया जाता है। लेकिन इन बातों में कोई दम नहीं है , असहाय शक्तिहीन की नजर घातक नहीं होती , वास्तव में लोगों को किसी शक्तिशाली की बुरी नजर से बचना चाहिए।

जब मैं ढाई वर्ष का था , भयंकर रुप से चेचक के प्रकोप से ग्रस्त होने के कारण लगभग मरनासन्न स्थिति में पड़ा हुआ था । उन्हीं दिनों मेरी माताजी भी लम्बे समय तक टायफायड से ग्रस्त होने के कारण बुरी तरह कमजोर हो चुकी थी , अपने को सॅभालना ही मुश्किल था , मेरी देख-रेख कर पाने का कोई प्रश्न ही नहीं था । इस हालत में मेरे पिताजी ने मेरी देखभाल के लिए ऐसी औरत को नियुक्त किया , जो समाज की नजरों में उपेक्षिता एक डायन थी , उसी की सतत् सेवा से मुझे पुनर्जन्म मिला। बड़े होने के बाद भी तथाकथित कई डायनों से मिला , सबकी नजरों में मुझे शक्तिहीनता , बदनामी और विवशता से संश्लिष्ट गहरी पीड़ा के सिवा कुछ भी देखने को नहीं मिली ।

सुंदर ताजमहल पर करोड़ों की नजर पड़ चुकी है , किन्तु सैकड़ों वर्षों बाद भी वह वही सुंदरता बिखेर रहा है। फिल्मी हीरो-हीरोइनों की सुंदरता और नाज-नखरों पर करोड़ों की नजरें पड़ती हैं। क्रिकेट के मैदान में खिलाडि़यों के खेल पर करोड़ो की अच्छी और बुरी निगाहे पड़ती हैं। इन नजरों में जहां एक ओर अपने देश के खिलाडि़यो के लिए शुभकामनाएं व्यकत होती हें , तो दूसरी ओर प्रतिद्वंदी देश के खिलाडि़यों के लिए बुरी नजर का इस्तेमाल होता है , परंतु होता वही है , जो मंजूरे खुदा होता है। जिन हीरो-हीरोइनों , क्रिकेटखिलाड़ी या जड़-चेतन पर उनकी विशेषताओं की वजह से अधिक से अधिक नजरें पड़ती हैं , वह उतना ही लोकप्रिय हो जाता है। कश्मीर की वादियों पर देशी-विदेशी करोड़ो पर्यटकों की नजरें टिकी होती हैं , परंतु उसका कुछ नहीं बिगड़ता , उसकी सुंदरता तो अक्षुण्ण है। यदि नजरों से ही बिगड़ने की बात होती , तो देश-रक्षा के लिए सीमा में सैनिको की जगह डायनों की नियुक्ति न की जाती।

व्यक्ति की विशेषता के साथ उसकी विनम्रता करोड़ो लोगों की दुआ हासिल करने में समर्थ होती है। उसकी लोकप्रियता को दिन दूनी रात चैगुनी गति से बढ़ा पाने में समर्थ होती है , विपरीत स्थिति में यानि अहंकारयुक्त विशेषता उतना लोकप्रिय नहीं हो पाता , क्योंकि अहंकार से उसकी कार्यक्षमता बाधित होती है। सुंदरता या विशेषता पर नजर स्वाभाविक आकर्षण की वजह से होता है , उसे प्राप्त करने की इच्छा या लोलुपता , ईर्ष्‍या आदि उसके नुकसान का कारण बनती हैं। इस प्रकार जैसा कि मैं पहले भी लिख चुका हूं , शक्तिशाली व्यक्ति की नजर से बचने की चेष्टा करनी चाहिए , किन्तु कमजोर , सामर्थ्‍यहीन और निरीह व्यक्ति की नजरों से नुकसान नहीं होता। उन्हें मनहूस या डायन समझकर प्रताडि़त करना या उन्हें कसूरवार समझना गलत है। उनकी उपेक्षा करना बड़प्पन और मानवता के खिलाफ तथा अंधविश्वास है।

मेरे पिताजी श्री विद्या सागर महथा जी के द्वारा 

मंगलवार, 31 जुलाई 2012

भगवान महाकाल के ये रूप आपने नहीं देखे होंगे ... सौजन्‍य दैनिक भास्‍कर

महाकालेश्‍वर के उद्भव के बारे में मान्‍यता है कि भगवान शिव के परम भक्त उज्‍जयिनी के राजा चंद्रसेन को एक बार उनके शिवगणों में प्रमुख मणिभद्र ने तेजोमय 'चिंतामणि' प्रदान की, जिसे गले में धारण देखकर दूसरे राजाओं ने उसे पाने के प्रयास में आक्रमण कर दिया। शिवभक्त चंद्रसेन भगवान महाकाल की शरण में जाकर ध्यानमग्न हो गया। जब चंद्रसेन समाधिस्थ था तब वहाँ कोई गोपी अपने पांच वर्ष के छोटे बालक को साथ लेकर दर्शन हेतु आई। राजा चंद्रसेन को ध्यानमग्न देखकर बालक भी शिव की पूजा हेतु प्रेरित हुआ। कुछ देर पश्चात क्रुद्ध हो माता ने उस बालक को पीटना शुरू कर दिया और समस्त पूजन-सामग्री उठाकर फेंक दी। ध्यान से मुक्त होकर बालक चेतना में आया तो उसे अपनी पूजा को नष्ट देखकर बहुत दुःख हुआ। अचानक उसकी व्यथा की गहराई से चमत्कार हुआ। भगवान शिव की कृपा से वहाँ एक सुंदर मंदिर निर्मित हो गया। मंदिर के मध्य में दिव्य शिवलिंग विराजमान था एवं बालक द्वारा सज्जित पूजा यथावत थी। उसकी माता की तंद्रा भंग हुई तो वह भी आश्चर्यचकित हो गई। राजा चंद्रसेन को जब शिवजी की अनन्य कृपा से घटित इस घटना की जानकारी मिली तो वह भी उस शिवभक्त बालक से मिलने पहुँचा। अन्य राजा जो मणि हेतु युद्ध पर उतारू थे, वे भी पहुँचे। सभी ने राजा चंद्रसेन से अपने अपराध की क्षमा माँगी और सब मिलकर भगवान महाकाल का पूजन-अर्चन करने लगे। तभी वहाँ रामभक्त श्री हनुमानजी अवतरित हुए और उन्होंने गोप-बालक को गोद में बैठाकर सभी राजाओं और उपस्थित जनसमुदाय को संबोधित किया। दैनिक भास्‍कर में छपे इन तस्‍वीरों और वर्णन को आपसे शेयर करने से नहीं रोक पायी .........

हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार सावन के महीने में भगवान शिव के दर्शन करने से सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। सावन के महीने में 12 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन करने का भी विशेष महत्व है। इन सभी ज्योतिर्लिंगों का अपनी एक अलग विशेषता है। इन सभी में एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर की महिमा देखते ही बनती है।

यह ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश की धार्मिक राजधानी कहे जाने वाले उज्जैन शहर में स्थित है। यहां के लोग भगवान महाकाल को अपना राजा मानते हैं। हर साल भगवान महाकाल सावन व भादौ के महीने में पालकी में सवार होकर जनता का हाल-चाल जानने के लिए निकलते हैं। ऐसी कई अनोखी परंपराएं यहां प्रचलित हैं। भगवान महाकाल के अद्भुत श्रृंगार भक्तों का मन मोह लेते हैं। आप भी देखिए भगवान महाकाल के विभिन्न श्रृंगारों की तस्वीरें-
1- ये है भगवान महाकाल के अद्र्धनारीश्वर रूप का श्रृंगार।






Source: धर्म डेस्क. उज्जैन
 2- ये है भगवान महाकाल के भांग श्रृंगार का अनोखी रूप।







Source: धर्म डेस्क. उज्जैन

 3- इस तस्वीर में बाबा महाकाल घटाटोप श्रृंगार में दिखाई दे रहे हैं।







Source: धर्म डेस्क. उज्जैन


4- भगवान महाकाल का शिव तांडव श्रृंगार भक्तों का मन मोह लेता है।





Source: धर्म डेस्क. उज्जैन

5- केसर-चंदन श्रृंगार में भगवान महाकाल का अद्भुत रूप दिखाई देता है।





Source: धर्म डेस्क. उज्जैन


 6- ये है भगवान महाकाल का रुद्र श्रृंगार।






Source: धर्म डेस्क. उज्जैन

 7- इस फोटो में भगवान महाकाल सेहरा श्रृंगार में दिखाई दे रहे हैं। बाबा महाकाल का ये श्रृंगार साल में सिर्फ एक बार महाशिवरात्रि के दिन किया जाता है।

Source: धर्म डेस्क. उज्जैन


मंगलवार, 17 जुलाई 2012

समग्र गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष ..... संगीता पुरी

ज्‍योतिष के बारे में जन सामान्‍य की उत्‍सुकता आरंभ से ही रही है , गणित ज्‍योतिष के क्षेत्र में हमारे ज्‍योतिषियों द्वारा की जाने वाली काल गणना बहुत सटीक है। पर इसके फलित के वास्‍तविक स्‍वरूप के बारे में लोगों को कोई जानकारी नहीं होने से भ्रम की संभावना बनी रहती है, अभी तक यह समझने में सफलता नहीं मिल पायी है कि भाग्‍य बडा या कर्म ????? समय समय पर ज्‍योतिषियों को चुनौती दी जाती रही है ,  पर हेड और टेल  ज्‍योतिष का नहीं आंकडों का खेल होता है। ज्‍योतिषीयों की समस्‍या है कि वे ग्रहीय प्रभाव को सिद्ध नहीं कर पाते। कुछ लोग दैवी विद्या मानकर इसका अंधानुकरण करते हैं , तो कुछ शत प्रतिशत सटीक भविष्‍यवाणी न देने से इसे विज्ञान मानने को तैयार नहीं। ज्‍योतिषियों को चुनौती देने से पहले हमारे सुझाव पर ध्‍यान दिया जाना चाहिए। हर ज्ञान पहले ही स्‍तर पर विकसित नहीं हो जाती। क्‍या गणित में हर प्रश्‍न का जबाब '='  में दिया जा सकता है ? सारे लोगों के ज्‍योतिष में रूचि और इतने ग्रंथो के होने के बावजूद ज्‍योतिष अबतक विवादास्‍पद क्‍यूं है ?   एक और प्रश्‍न का जबाब देने की कोशिश की गयी , पहले जन्‍म या फिर भाग्‍य .??


फलित ज्‍योतिष एक सांकेतिक विज्ञान है , कर्म का महत्‍व सर्वविदित है , जन्‍मकुंडली पर हमारा वश नहीं , पर अपनी कर्मकुंडली अच्‍छी बनानी चाहिए , ज्‍यातिष में राजयोग जैसे परंपरागत नियमों को आज की कसौटी में कसा जाना चाहिए। चिंतन करना होगा कि क्‍या कहता है हमारी जन्‍मकुंडली का कमद्रुम योग ? अध्‍ययन में हमने पाया कि विवाह के लिए जन्‍मकुंडली मिलाना आवश्‍यक नहीं। विभिन्‍न युग में जीवनशैली में अंतर होने से ग्रहों के प्रभाव को भी भिन्‍न भिन्‍न कोण से देखा जाना चाहिए। यही कारण है कि आज जन्‍मकुंडली देखकर जातक के प्रेम विवाह या अभिभावक द्वारा आयोजित विवाह होने के बारे में जानकारी नहीं दी जा सकती है। पर इस दुनिया में सबकुछ नियम से होते हैं, संयोग या दुर्योग कुछ नहीं होता। धन, कर्म और प्रयोग से हमें 'विज्ञान' मिल सकता है, 'ज्ञान' प्राप्‍त करने के लिए ग्रहों का साथ होना आवश्‍यक है। संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि प्रकृति से अपने वातावरण और जमाने के अनुकूल मिली विशेषताएं ही हमारा भाग्‍य हैं !! पर समाज से ज्‍योतिषीय भ्रांतियों को दूर करने का अथक प्रयास बेकार नजर आने लगता है तो कभी कभी मन विचलित हो जाता है , तब सोंचती हूं , काश हमारा सपना दिल्‍ली में एक कोठी लेने का ही होता।


गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष कई तरह से परंपरागत ज्‍योतिष से भिन्‍न है। मेरे ब्‍लॉग के एक पोस्‍ट में इसके और इसके जनक के बारे में जानकारी दी गयी है। इसको पढने के बाद आप समझ सकेंगे कि गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष क्‍या है ? इसमें माना गया है कि जड चेतन को प्रभावित करने की मुख्‍य वजह ग्रहों की गति है। भविष्‍यवाणी में भी ग्रहों की गति पर ध्‍यान दिए जाने के कारण इस पद्धति को 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष कहते हैं, सिर्फ नाम से ही नहीं है गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष!  पच्‍चीस तीस वर्षों तक हमारा घर ज्‍योतिषीय रिसर्च का केन्‍द्र बना रहा , आप मान सकते हैं कि हमारी छत एक तरह की वेधशाला ही थी।  ग्रहों के आसमान में स्थिति का पृथ्‍वी के जड चेतन पर बनुकूल या प्रतिकूल प्रभाव प्रत्‍यक्ष तौर पर पडता है ,क्‍या इस तरह के ग्राफों के बाद भी ज्‍योतिष की वैज्ञानिकता पर प्रश्‍नचिन्‍ह लगाया जा सकता है ?? समय युक्‍त भविष्‍यवाणियां प्रदान करने के कारण  'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के जानकार को समय विशेषज्ञ माना जा सकता है। इस ब्‍लॉग के एक पोसट में ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष: ग्रहों का प्रभाव’ पुस्‍तक की उपलब्‍धता ..के बारे में भी विस्‍तार से लिखा गया है। वास्‍तव में हर क्षेत्र की घुसपैठ से ज्‍योतिष अधिक बदनाम हुआ है !! प्रकृति के नियमों की जानकारी से अहंकार समाप्‍त होता है , ज्‍योतिष का सही ज्ञान हमें आध्‍यात्‍म की ओर भी ले जाता है !!


व्‍यक्ति के बालपन से ही चंद्रमा का मनोवैज्ञानिक प्रभाव शुरू हो जाता है। च्रदमा कमजोर होने से भले ही बाल मन के मनोवैज्ञानिक विकास में कमी आती है , पर ऐसे चंद्रमा के साथ कुछ योग मिलकर उसे असाधारण व्‍यक्तित्‍व का स्‍वामी बना सकते हैं। मेरे ब्‍लॉग में आप मंगल के बारे में विशेष जानकारी प्राप्‍त कर सकते हैं , इसका प्रभाव हमेशा एक सा नहीं होता , आकाश में मंगल की विभिन्‍न स्थिति का पृथ्‍वी पर अच्‍छा और बुरा प्रभाव  पडता है। मंगल के खास प्रभाव को दिखाते हुए विज्ञान दिवस पर खगोलविदों के लिए भी एक खास लेख लिखकर उन्‍हें इस नई पद्धति के बारे में जानकारी देने की कोशिश की गयी। इस आधार पर भृगुसंहिता लिखने की भी कोशिश हुई। क्‍या आपने भृगुसंहिता का नाम सुना है ? महर्षि भृगु द्वारा रचित यह एक कालजयी पुस्‍तक है , उसमें ग्रहों की गति के आधार पर फल में आनेवाले अंतर को दिखाया जाना था , पर भृगुसंहिता आधा अधूरा ही रह गया। काफी दिनों से इसे पुन: लिख पाने के प्रयास में हू , पर पुन: 'गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता' तैयार करने में इतनी देरी होने का कारण  भी स्‍पष्‍ट है। प्रत्‍येक लग्‍नवालों की चारित्रिक विशेषताओं और उनके विभिन्‍न संदर्भों के मध्‍य सहसंबंध को दिखलाते हुए बारह लेख लिखें गए , यह प्रमाणित किया गया कि मेष लग्‍न की कुंडली मानव जाति की जीवनशैली का प्रतिनिधित्‍व करती है !! इसके साथ ही एक लेख यह भी कि कुंभ लग्‍न की कुंडली भारतीयों के जीवनशैली का प्रतिनिधित्‍व करती है !!


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गोचर के ग्रहों पर आधारित फल को आसानी से महसूस किया जा सकता है , खासकर बहुत आसान है चंद्रमा के प्रभाव को समझना। ज्‍योतिष के वैज्ञानिक तौर पर सक्षम होने के बावजूद राशिफल की वैज्ञानिकता में कुछ संशय है , पर लग्‍न राशिफल वैज्ञानिक और विश्‍वसनीय माने जा सकते हैं। जन्‍म कालीन ग्रहों से जीवन में वैवाहिक संदर्भों के अच्‍छे या बुरे होने का पता चलता है , पर विवाह समय के निर्धारण में मंद ग्रहों की भूमिका होती है। इसी प्रकार अन्‍य घटनाओं के लिए भी ग्रह की विभिन्‍न स्थितियां जिम्‍मेदार होती है, इसे समझा जा सकता है , दूर नहीं किया जा सकता। भूकम्‍प के बारे में की गयी मेरी भविष्‍यवाणी के सटीक होने के बाद मैने लिखा था काश मेरी भविष्‍यवाणी सही नहीं हुई होती।वास्‍तव में ज्‍योतिष को अन्‍य विज्ञान से काटकर रख दिया गया है , जबकि सच तो यह है कि  अन्‍य विज्ञानों से तालमेल बनाकर ही ज्‍योतिष को अधिक उपयोगी बनाया जा सकता है !!फिर तो   चार दिनों तक चलती रही हमारी बहस .. संपादन के बाद आपके लिए एक पोस्‍ट तैयार हो गयी !!


कुछ दिनों से लगातार 2012 दिसम्‍बर के बारे में विभिन्‍न स्रोतो से भयावह प्रस्‍तुतियां की जा रही हैं। 2012 दिसंबर को दुनिया के समाप्‍त होने के पक्ष में जो सबसे बडी दलील दी जा रही है , वो इस वक्‍त माया कैलेण्‍डर का समाप्‍त होना है। दुनिया के नष्‍ट होने की संभावना में एक बडी बात यह भी आ रही है कि ऐसा संभवतः पृथ्‍वी के चुंबकीय ध्रुव बदलने के कारण होगा। वास्‍तव में हमलोग सूर्य की सिर्फ दैनिक और वार्षिक गति के बारे में जानते हैं , जबकि इसके अलावे भी सूर्य की कई गतियां हैं। जब अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की ओर से पृथ्‍वी के धुर बदलने या किसी प्रकार के ग्रह के टकराने की संभावना से इंकार किया जा रहा है , तो निश्चित तौर पर प्रलय की संभावना सुनामी, भूकम्‍प, ज्वालामुखी, ग्लोबल वार्मिग,अकाल, बीमारियां, आतंकवाद, युद्ध की विभीषिका व अणु बम जैसी घटनाओं से ही मानी जा सकती है, जिनका कोई निश्चित चक्र न होने से उसके घटने की निश्चित तिथि की जानकारी अभी तक वैज्ञानिकों को नहीं है। पिछले 40 वर्षों से‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’विश्‍व भर में होनेवाले इन प्राकृतिक या मानवकृत बुरी घटनाओं का ग्रहीय कारण ढूंढता रहा है। 


अक्‍सर कुछ लोग पूछते हैं कि क्‍या ज्योतिष आम जन के लिए उपयोगी हो सकता है ?? जरूर , समय की जानकारी देकर टार्च , घडी और कैलेण्‍डर की तरह ही गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष आपकी मदद कर सकता है। इसके अलावे अच्‍छे मुहूर्त्‍त में बनी अंगूठी पहनकर स्‍वयं को बुरे ग्रहों के प्रभाव से बचाया जा सकता है, पूर्णिमा के दिन तैयार किए गए छल्‍ले को लगभग सभी व्‍यक्तियों को पहनना चाहिए।  इस वैज्ञानिक युग में पदार्पण के बावजूद अभी तक हमने प्रकृति के नियमों को नहीं बदला । युग की दृष्टि से किसी वस्तु का विशेष महत्व हो जाने से हम पाय: उसी वस्तु की आकांक्षा कर बैठते हैं , तो क्या अन्य वस्तुओं को लुप्त होने दिया जाए ? इस प्रकार वे अपने जीवनग्राफ के अच्छे समय के समुचित उपयोग द्वारा विशेष सफलता हासिल कर सकते हैं , जबकि बुरे समय में वे प्रतिरोधात्मक ढंग से जीवन व्यतीत कर सकते हैं । भविष्‍य में उत्पन्न होनेवाले बच्चों के लिए गत्यात्मक ज्योतिष वरदान हो सकता है। ग्रहों के प्रभाव को दूर करने के लिए दो घंटे के उस विशेष लग्न का चुनाव कर अंगूठी को अधिक प्रभावशाली बनाया जा सकता है। 


साथ ही अपनी कुंडली के अनुसार ही उसमें जो ग्रह कमजोर हो , उसको मजबूत बनाने के लिए दान करना चाहिए।  'गत्यात्मक ज्योतिष' भी कमजोर ग्रहों के बुरे प्रभाव से बचने के लिए उससे संबंधित रंगों का अधिकाधिक प्रयोग करने की सलाह देता है। प्राचीनकाल से ही पेड़-पौधें का मानव विकास के साथ गहरा संबंध रहा है।अन्‍य बातों की तरह ही जब गंभीरतापूर्वक काफी दिनों तक ग्रहों के प्रभाव को दूर करने में पेड पौधों की भूमिका का भी परीक्षण किया गया तो निम्न बातें दृष्टिगोचर हुई। पर आजकल आपका शुभ मुहूर्त्‍त चल रहा होता है तो आप गहने नहीं बनवाते , गहने खरीदकर ले आते हैं , वह गहना उस समय का बना हो सकता है , जब आपके ग्रह कमजोर चल रहे थे। इसलिए इन सारे ग्रहों की स्थिति को मजबूत बनाने के लिए संबंधित जगहों पर दान करना या मदद में खडे हो जाना उचित है। इसमें किसी तरह की शंका नहीं की जा सकती , सीधे स्‍वीकार कर लेना बेहतर है। पर प्रकृति से दूर कंप्‍यूटर में विभिन्‍न रंगों के संयोजन से तैयार किए गए नाना प्रकार के रंगों में से एक को चुनना आज हमारा फैशन है और वह हमें ग्रहों के दुष्‍प्रभाव से लडने की शक्ति नहीं दे पाता। यही कारण है कि हमें कृत्रिम तौर पर रंगों की ऐसी व्‍यवस्‍था करनी होती है , ताकि हम विपरीत परिस्थितियों में भी खुश रह सके।

बुधवार, 9 मई 2012

बोलने और लिखने में सरल सार्थक नाम अधिक उचित है !!

किसी खास तरह की ग्रहस्थिति का प्राचीन ऋषि महर्षियों ने पृथ्‍वी पर कुछ खास प्रभाव देखा , तो उसे सही ढंग से समझने के लिए पूरी ताकत लगा दी और उसका ही परिणाम है कि एक सुव्‍यवस्थित ज्ञान के रूप में ज्‍योतिष शास्‍त्र विकसित हो सका। चंद्रमा के किसी खास नक्षत्र और उनके विभिन्‍न चरणों में जन्‍म लेने वाले जातकों के स्‍वभाव पर पूरा रिसर्च करने के लिए उन्‍होने जातको के नाम खास अक्षर से रखने की परंपरा शुरू की , ताकि जन्‍म विवरण या जन्‍मकुंडली नहीं होने पर भी उनके चरित्र के बारे में कुछ समझा जा सके। प्राचीन काल में हर गांव के पंडितों को इतनी जानकारी होती ही थी कि वे पंचांग से बच्‍चों की जन्‍मकुंडली बना सके और नक्षत्र के आधार पर उनका नामकरण कर सकें। उस नाम से ही जातक के चारित्रिक विशेषताओं को समझने में मदद मिलती थी, इसलिए नाम का महत्‍व माना गया।

भारतीय संस्कृति में 16 संस्कारों में नामकरण संस्कार का कम महत्‍व नहीं होता था। विधि विधान से नामकरण करने की परंपरा का ज्‍योतिषीय आधार हुआ करता था। किसी शुभ मुहूर्त्‍त में नामकरण जन्म के 11 से 27 दिन के अंदर किया जाता था। शिशु के जन्म के समय चंद्रमा जिस राशि में संचरण करता है, वह राशि जन्म राशि कहलाती है और इस राशि में आने वाले नामाक्षर पर उसका नाम रखा जाता है। अक्षर विशेष में नाम रखने के लिए कुल 27 नक्षत्रों के चार चार चरण किए गए हैं। इनमें जिस चरण में जन्म होता है, उसी अक्षर विशेष पर नाम रखा जाता है। उदाहरण के लिए बालक का जन्म अश्विनी नक्षत्र के पहले चरण में हुआ है तो बालक का नामाक्षर चू होगा। अश्विनी नक्षत्र में चार अक्षर चू, चे, चो और ला अक्षर होते हैं। नाम कम अक्षरों वालों होना अधिक उचित होता है। पुत्र का नाम सम व पुत्री का नाम विषम संख्या में रखा जाता है।

जब पंडितो के द्वारा नाम रखे जाने की परंपरा समाप्‍त हुई या जन्‍मकुंडली तक ही सीमित रह गयी , तब भी बहुत दिनों तक नाम दिन, महीने , तिथि , पक्ष, प्रहर या कभी कभी उनकी शारिरीक या पारिवारिक स्थिति के हिसाब से रखा जाता रहा , पर फिर भी लोगों के दिलोदिमाग में नाम का महत्‍व बना रहा और बच्‍चों में चारित्रिक विशेषताओं को बनाए रखने के लिए सुंदर और सार्थक नाम रखने की परंपरा शुरू हुई। आज तो बच्‍चे का सटीक नाम रखने के लिए अभिभावक काफी माथापच्‍ची करते हैं।पुराने बहुत से नामों को तो लोगों ने ओल्ड फैशन बनाकर साइड लाइन कर दिया है, आज हर कोई अपने बच्चे को नाम से एक अलग पहचान देना चाह रहा है। कुछ समय से लडकियों के नाम में अनन्या, नेहा, शगुन, भव्या, आस्था, अदिति, रिया, खुशी, अणिता, अन्या, अनुष्का, परी, दिया, नव्या, काव्या आदि बहुतायत में रखे जा रहे हैं , तो लडकों में प्रतीक, पीयूष, हर्षित, यश, शुभम, आर्यन, कृष्णा, अर्णव, सांई, आरुष, इशान, नील, ओम, विहान, आयुष, अभिनव, वैदांत, विवान, शौर्य आदि अधिक प्रसिद्ध हैं। 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के हिसाब से नाम रखने में जातक की जन्‍मकुंडली को ध्‍यान में रखने की आवश्‍यकता नहीं, बच्‍चे का पुकारने का या वास्‍तविक नाम कुछ भी हो सकता है , पर बोलने और लिखने में सरल सार्थक नाम अधिक उचित है।

बच्‍चों के नाम चुनकर रखने की समस्‍या बहुत ही बडी है , इसका हल कई वेबसाइटों में मिल सकता है ....
www.indif.com
www.bachpan.com
www.pitarau.com
www. hinduchildnames.com
www.babynamenetwork.com
www.whereincity.com
www.hindubabynames.net
www.indianhindunames.com
www.hindunames.net
www.babynamesindia.com

रविवार, 6 मई 2012

विश्‍वास और श्रद्धा नहीं ... बौद्ध धर्म की नीव बुद्धि है !!


बौद्ध धर्म एक अनीश्‍वरवादी धर्म है, इसके अनुसार कर्म ही जीवन में सुख और दुख लाता है। भारत ही एक ऐसा अद्भूत देश है जहां ईश्वर के बिना भी धर्म चल जाता है। ईश्वर के बिना भी बौद्ध धर्म को सद्धर्म माना गया है। दुनिया के प्रत्येक धर्मों का आधार विश्वास और श्रद्धा है जबकि बौद्ध धर्म की नीव बुद्धि है, यह इस धर्म और गौतम बुद्ध के प्रति आकर्षित करता है। सभी धर्म अपना दर्शन सुख से आरम्भ करते हैं जो कि सर्वसाधारण की समझ से कोसों दूर होता है। महात्मा बुद्ध अपना दर्शन दुःख की खोज से आरम्भ तो करते हैं पर परिणति सुख पर ही होती है। बौद्ध धर्म का आधार वाक्य है ‘सोचो, विचारो, अनुभव करो जब परम श्रेयस् तुम्हारे अनुभव में आ जाये तो श्रद्धा या विश्वास करना नहीं होगा स्वतः हो जाएगा।’

बौद्ध धर्म के चार तीर्थ स्थल हैं- लुंबिनी, बोधगया, सारनाथ और कुशीनगर। लुम्बिनी  नेपाल में , बोधगया बिहार में , सारनाथ काशी के पास और कुशीनगर गोरखपुर के पास है। बौद्ध धर्म एक धर्म ही नहीं पूरा दर्शन है। महात्मा बुद्ध ने इसकी स्‍थापना की, इन्‍हें गौतम बुद्ध, सिद्धार्थ, तथागत और बोधिसत्व भी कहा जाता है। उनके गुज़रने के अगले पाँच शताब्दियों में यह पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फ़ैला और बाद में मध्य, पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी जम्बू महाद्वीप में भी फ़ैल गया। बौद्ध धर्म दुनिया का चौथा बडा धर्म माना गया है , क्‍योंकि इसे पैंतीस करोड़ से अधिक लोग मानते हैं। "अज्ञानता की नींद"से जागने वाले ,  जिन्होने सालों के ध्यान के बाद यथार्थता का सत्य भाव पहचाना हो , वे "बुद्ध" कहलाते हैं ।

बौद्ध धर्म के हिसाब से पहला आर्य सत्य दुःख है। जन्म दुःख है, जरा दुःख है, व्याधि दुःख है, मृत्यु दुःख है, अप्रिय का मिलना दुःख है, प्रिय का बिछुड़ना दुःख है, इच्छित वस्तु का न मिलना दुःख है। दुःख समुदय नाम का दूसरा आर्य सत्य तृष्णा है, सांसारिक उपभोगों की तृष्णा, स्वर्गलोक में जाने की तृष्णा और आत्महत्या करके संसार से लुप्त हो जाने की तृष्णा, इन तीन तृष्णाओं से मनुष्य अनेक तरह का पापाचरण करता है और दुःख भोगता है। तीसरा आर्य सत्य दुःखनिरोध है। तृष्णा का निरोध करने से निर्वाण की प्राप्ति होती है, देहदंड या कामोपभोग से मोक्षलाभ होने का नहीं। चौथा आर्य सत्य दुःख निरोधगामिनी प्रतिपद् है। यह दुःख निरोधगामिनी प्रतिपद् नामक आर्य सत्य भावना करने योग्य है। इसी आर्य सत्य को अष्टांगिक मार्ग कहते हैं। वे अष्टांग ये हैं :- 1. सम्यक्‌ दृष्टि, 2. सम्यक्‌ संकल्प, 3. सम्यक्‌ वचन, 4. सम्यक्‌ कर्मांत, 5. सम्यक्‌ आजीव, 6. सम्यक्‌ व्यायाम, 7. सम्यक्‌ स्मृति, 8. सम्यक्‌ समाधि। दुःख का निरोध इसी अष्टांगिक मार्ग पर चलने से होता है। पहला अंत अत्यंतहीन, ग्राम्य, निकृष्टजनों के योग्य, अनार्य्य और अनर्थकारी है। दूसरा अंत है शरीर को दंड देकर दुःख उठाना। इन दोनों को त्याग कर मध्यमा प्रतिपदा का मार्ग ग्रहण करना चाहिए। यह मध्यमा प्रतिपदा चक्षुदायिनी और ज्ञानप्रदायिनी है।

कलिंग के युद्ध के बाद अशोक ने व्यक्ति गत रूप से बौद्ध धर्म अपना लिया था , अशोक के शासनकाल में ही बौद्ध भिक्षु विभिन्नी देशों में भेजे गये, जिनमें अशोक के पुत्र महेन्द्र एवं पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका भेजा गया । अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए धर्मयात्राओं का प्रारम्भ किया , राजकीय पदाधिकारियों और धर्म महापात्रों की नियुक्ति की, दिव्य रूपों का प्रदर्शन तथा धर्म श्रावण एवं धर्मोपदेश की व्यवस्था की लोकाचारिता के कार्य, धर्मलिपियों का खुदवाना तथा विदेशों में धर्म प्रचार को प्रचारक भेजने आदि काम किए। इस तरह विभिन्न् धार्मिक सम्प्रदायों के बीच द्वेषभाव को मिटाकर धर्म की एकता स्थापित करने में अशोक ने महत्‍वपूर्ण भूमिका निभायी।

बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर सूपरमून ... बडा और चमकीला होगा आज का चांद !!


खगोलीय घटनाओं और दृश्‍यों में रूचि रखने वाले लोगों के लिए 5 और 6 मई की रात कुछ खास है , क्योंकि इस वक्‍त चांद पूरे वर्ष के हिसाब से सबसे चमकीला और बड़ा नजर आएगा। ऐसे संयोग पूर्णिमा के दिन ही बनते हैं और चूंकि चांद धरती के सबसे निकट होगा , इसलिए अपनी कक्षा में घूमते हुए चांद पहले की अपेक्षा पृथ्वी से अधिक निकट वाले बिंदु पर पहुंचेगा। इस घटनाक्रम को 'सुपरमून' कहा जाता है और इस साल ऐसा बुद्घ पुर्णिमा के अवसर पर हो रहा. छह मई को सूर्योदय से कुछ मिनट पहले चंद्रमा पश्चिमी क्षितिज पर डूबेगा और उसी शाम सूर्यास्त के एक घंटे के बाद पूर्वी क्षितिज पर उसका उदय होगा।

इस वर्ष नवंबर की 28 तारीख को पूर्णिमा के दिन चांद धरती से सबसे दूर रहेगा और दोनों की बीच की दूरी 4,06,349 रहेगी, जबकि अभी पृथ्वी और चंद्रमा के बीच की दूरी घटकर 3,56,955 किलोमीटर होगी विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूर्णिमा को चांद औसत से 14 फीसदी अधिक चमकीला नजर आएगा। चांद के ज्यादा चमकीला होने के कारण गुरुत्वाकर्षण बल बढ़ेगा और इसका समुद्र के ज्वार भाटे पर अधिक असर पड़ेगा। अब तक के सबसे बड़े और बेहद चमकीले चांद का किसी भी रूप में प्राकृतिक आपदा से कोई सम्बंध नहीं है। लेकिन गुरुत्वाकर्षण बल बढ़ने से समुद्र में ज्वार-भाटा की ऊंची लहरें उठ सकती हैं और उस पर चमकीले चांद की रोशनी अद्भुत दृश्य बना सकती है।

कल से ही इस मनोहारी दृश्य को निहारने को लोगों में उत्सुकता रही। तमाम लोग चांद के दर्शन के लिए आंगन , बाहर या छतों पर निकल गये। देर रात तक उसका लुत्फ उठाया। शनिवार दोपहर 12.52 बजे से पूर्णिमा लग गयी, जो रविवार को दोपहर प्रात: 9.05 बजे तक रहेगी। चंद्रमा तुला राशि में होने और दिन में भी पूर्णिमा लगने की वजह से चंद्रमा का आकार बढ़ता गया । दिन में पूर्णिमा शुरू होने के बाद रात नौ बजे तक चांद पूर्ण आकार में पहुंच गया। धीरे-धीरे उसका प्रभाव कम होता गया। तांत्रिकों के हिसाब से इस रात को मंत्र साधना लाभदायक रहती

अन्‍य खगोलीय स्थिति की तरह इस चंद्र का प्रभाव पृथ्‍वी के जड चेतन पर पडेगा , इस संभावना से तो हम इंकार नहीं कर सकते , पर सामान्‍य तौर पर यह सुखद स्थिति के ही होने का संकेत दे रहा है। पर इससे वृष और मिथुन राशि वाले अधिक अच्‍छे ढंग से प्रभावित होंगे। अक्‍तूबर नवंबर में जन्‍म लेनेवालों पर भी इसका अच्‍छा प्रभाव देखा जा सकती है। इसलिए प्रकृति की इस गतिविधि से  चिंतित होने की बिल्कुल जरूरत नहीं है , लुत्‍फ उठाइए इसका।

मंगलवार, 1 मई 2012

ज्‍योतिष के उज्‍जवल पक्ष की खोज .... विद्या सागर महथा (अतिथि पोस्‍ट )


‘ज्‍योतिष : सच या झूठ’ नामक अपने ब्‍लॉग में जहां एक ओर ज्‍योतिष की समस्‍त कमजोरियों को स्‍वीकार किया है , वहीं दूसरी ओर इसके उज्‍जवल पक्ष की मैने वकालत भी की है। मैं इस विद्या का अंध भक्‍त नहीं हूं , फिर भी मैने पाया कि इस विद्या में वैज्ञानिकता की कोई कमी नहीं। यह वैदिककालीन विद्या है और हजारो वर्षों के बाद भी इसका अस्तित्‍व ज्‍यों का त्‍यों बना हुआ है। अत: इसमें अंतर्निहित सत्‍य को अस्‍वीकार करना अपनी अपरिपक्‍वता का परिचय देना है। 

ज्‍योतिष विद्या मुझे काफी रूचिकर , आत्‍मज्ञान प्रदान करनेवाली लगी और मैने अपना संपूर्ण जीवन इसी में समर्पित कर दिया। मुझे प्रथम दृष्टि में ही महसूस हुआ कि इस विद्या में वैज्ञानिक विकास की अपरिमित बहुआयामी संभावनाएं हैं। गाणितिक संभावनावाद का उपयोग करके राजयोगों को विरल और चुस्‍त दुरूस्‍त किया जा सकता है और विरामावस्‍था के ग्रहों को सम्मिलित करके राजयोगों की सार्थकता को सिद्ध की जा सकती है। ग्रह शक्ति से संबंधित रहस्‍य ग्रहों की गति में छिपा हुआ है , इसलिए गतिज और स्‍थैतिज ऊर्जा को निर्धारित करने वाले सूत्रों की खोज की जा सकती है। पुन: फलित ज्‍योतिष में काल निर्धारण के लिए जितनी भी पद्धतियां प्रचलित हैं , सभी की गणना चंद्र नक्षत्र से की जाती हैं और शेष ग्रहों को अपना फल प्रदान करने के लिए पंक्तियों में खडा कर दिया जाता है। 

सभी ग्रहों या आकाशीय पिंडों का परिभ्रमण पथ अप्रत्‍यक्षत: पृथ्‍वी के सापेक्ष भी निश्चित दूरी पर है। अगर सचमुच शरीर ब्रह्मांड का प्रतिनिधित्‍व करता है , तो शरीर के ग्रंथियों को प्रतिनिधित्‍व इन ग्रहों को करना चाहिए। बाल्‍य काल की ग्रंथि से बाल्‍य काल की गतिविधि , किशोरावस्‍था की ग्रंथि से किशोरावस्‍था की गतिविधि , युवावस्‍था की ग्रंथि से युवावस्‍था की गतिविधि को जोडा जाना चाहिए। इसी तरह हर काल के लिए जिम्‍मेदार एक ग्रंथि होगी और मानव जीवन के हर काल की एक ग्रंथि का प्रतिनिधित्‍व एक निश्चित आकाशीय पिंड करेगा। उल्लिखित सारे संदर्भ मेरे चिंतन मनन के विषय अनवरत बने रहे। इस कारण आज मैं फलित ज्‍योतिष की वैज्ञानिकता को सिद्ध करने की स्थिति में हूं।

परंपरागत फलित ज्‍योतिष का जिस ढंग से विकास हुआ , जहां पर आकर इसकी विकास गति अवरूद्ध हो गयी है , वहां से इसे दावापूर्वक विज्ञान सिद्ध करना कठिन है। किसी विशेष ग्रह के विशेष भाव स्थिति में एक परिणाम को सिद्ध नहीं किया जा सकता। एक ग्रह ,एक भाव के फलाफल की परिवर्तनशीलता को अन्‍य ग्रह स्थिति से जोडा जाता रहा है , जो सर्वथा उचित नहीं है , वरन् फलाफल परिवर्तनशीलता का कारण ग्रह की विभिन्‍न गतियां हैं। परंपरागत ज्‍योतिष में ग्रहों की राशि और भाव स्थिति का फल वर्णित है , वहां ग्रह की स्‍थैतिक शक्ति का प्रतिशत क्‍या है , उस भाव में किस हैसियत से काम कर रहा है , इसे समझाने की बहुविध कोशिश होती रही और आम ज्‍योतिषी इस प्रयास में अनुमान के जंगल में भटक गए। एक ही ग्रह के विभिन्‍न गतियों में उसके भिन्‍न भिन्‍न फलाफल का गहरा संबंध है। इन खोजों के पश्‍चात फलित ज्‍योतिष को अनायास विज्ञान सिद्ध किया जा सकता है।

मुझे अब इस बात में किसी प्रकार का संशय नहीं रह गया कि ग्रहों का जड चेतन , वनस्‍पति , जीव जंतु और मानव जीवन पर प्रभाव है। अब किस दिन भूकम्‍प हो सकता है , किस दिन वर्षा हो सकती है , किस दिन समुद्री तूफान आ सकता है , किस दिन संसद में पक्ष विपक्ष में गर्मागर्म बहस होगी और लोग उनकी बातों को सांसे थाम सुन रहे होंगे , अभिप्राय सरकार के टूटने और बनने की स्थिति कब आएगी , किस विशेष तिथि को शिखर सम्‍मेलन होगा , कब कोई आंदोलन या हडताल निर्णायक मोड पर होगी। कोई व्‍यक्ति अपने जीवन के किस भाग में अपने सर्वोच्‍च मंजिल को प्राप्‍त कर सकता है, किस तिथि या काल में महत्‍वपूर्ण व्‍यक्ति कुंठित जीवन जी सकता है , इन प्रश्‍नों का उत्‍तर फलित ज्‍योतिषी आसानी से दे सकता है। 

अब उस युग का शीघ्र ही अंत होनेवाला है , जब कोई ज्‍योतिषी किसी व्‍यक्ति के मनोभाव को समझकर तद्नुरूप अनुमानित भविष्‍यवाणी किया करते थे और सभी ज्‍योतिषियों की भविष्‍यवाणियां भिन्‍न भिन्‍न हुआ करती थी। मेरे शोधपूर्ण लेखों के पठन पाठन , अध्‍ययन मनन के पश्‍चात् अति दूरस्‍थ अपरिचित व्‍यक्ति की कुंडली देखकर उसके भूत , वर्तमान और भविष्‍य की जानकारी आसानी से दी जा सकती है। इन सिद्धांतों पर की गयी सभी ज्‍योतिषियों की भविष्‍यवाणियां एक जैसी होंगी। इस पुस्‍तक में ग्रह गति को ग्रह शक्ति का आधार मानते हुए ग्रह शक्ति निर्धारण का सूत्र दिया गया है तथा एक नई दशा पद्धति का उल्‍लेख है , जिसमें मानव जीवन के निश्चित उम्र अवधि में ग्रहों के फलाफल की चर्चा है। अत: अब ग्रहों के प्रभाव को लेखाचित्र में प्रस्‍तुत किया जा सकता है। इन नए सूत्रों और सिद्धांतों के प्रयोग से फलित ज्‍योतिष का कायाकल्‍प हो गया है।

आकाश में ग्रह की गति में जैसे ही बदलाव आता है , पृथ्‍वी पर प्रभाव डालनेवाले , मानव जीवन पर प्रभाव डालने वाले परिवेश में द्रुत गति से परिवर्तन होता है। ग्रहों की गति के सापेक्षा संसार में घटित होने वाली घटनाओं को देखकर पृथ्‍वी की समस्‍त घटनाओं को नियंत्रित करने वाली उस महाशक्ति और उसकी यांत्रिकी का बोध हो जाता है। इस तरह फलित ज्‍योतिष न अनुमान और अनिश्चितता की बात करेगा और न ज्‍योतिषियों के समक्ष ऐसी नौबत आएगी कि उन्‍हें बार बार अपनी भविष्‍यवाणियों के लिए पश्‍चाताप करना पडेगा। बुद्धिजीवी और वैज्ञानिक भी ग्रह गति के नियमों और उससे उत्‍पन्‍न शक्ति की जानकारी प्राप्‍त करके तद्नुरूप फल प्राप्ति के पश्‍चात् इसकी वैज्ञानिकता को स्‍वीकार करेंगे। उन्‍हें यह महसूस होगा कि इतने दिनों तक इस महानतम ब्रह्म विद्या की व्‍यर्थ ही उपेक्षा हो गयी। इस ज्‍योतिष विज्ञान के वि‍कसित हो जाने पर ज्ञान और आत्‍म ज्ञान का अद्भुत प्रकाश संपूर्ण धरा को आलोकित करेगा। उपग्रह प्रक्षेपण जैसे कार्य में सुविधाएं होंगी , किसी देश के करोडों अरबों रूपए को नष्‍ट होने से बचाया जा सकेगा। इस विद्या को सरकारी संरक्षण और विश्‍वविद्यालयों में प्रवेश दिलाकर ही लाखों लोगों को रूचि लेने में प्रोत्‍साहित तथा सर्वोच्‍च विज्ञान को विकसित किया जा सकेगा। मेरे सिद्धांतों को समझने के बाद मुझे विश्‍वास है कि इस दिशा में वैज्ञानिक, सरकारी तंत्र , बुद्धिजीवी भी रूचि लेने लगेंगे तथा इस स्‍वदेशी प्राचीन विद्या के विकास की अनिवार्यता महसूस की जाने लगेगी।

सोमवार, 16 अप्रैल 2012

समाज से अंधविश्‍वास को दूर करने का है हमारा कार्यक्रम

हमारे देश में तरह तरह के अंधविश्‍वास फैले हुए हैं , ताज्‍जुब है कि अंधविश्‍वासों के चक्‍कर में सिर्फ अनपढ , गरीब निम्‍न स्‍तरीय जीवन जीनेवाले ही नहीं हैं , बल्कि पढे लिखे और अमीर लोगों का तबका भी अंधविश्‍वासों से बाहर नहीं है। इसके चक्‍कर में कभी नवजात की बलि चढ़ जाती है , कभी बेबस स्‍त्री डायन बन जाती है , तो कभी सामान्‍य पुरूष महापुरूष। अक्‍सर पत्र पत्रिकाओं में हम इनके विरोध में खबरें प्रकाशित होती हैं , सरकारी और स्‍वयंसेवी संस्‍थाओं द्वारा विज्ञान के प्रचार प्रसार के कार्यक्रम चलते रहते हैं , पर सुधार की गति बहुत धीमी है। अर्थप्रधान युग में भविष्‍य के प्रति आशंका से अंधविश्‍वास और बढता जा रहा है। अंधविश्‍वास का मूल कारण अज्ञानता है , आग , वर्षा, बाढ , बिजली, रोग, भूकंप, चंद्रग्रहण , सूर्यग्रहण आदि घटनाओं के बारे में पर्याप्‍त जानकारी न होने से आदिम मानव के मध्‍य इन्‍हें लेकर अंधविश्‍वास था। पर जैसे जैसे रहस्‍यों का पर्दाफाश होता गया , अंधविश्‍वास समाप्‍त होता गया। देवी-देवता और आस्था से जुड़े कर्मकाण्डों मे भागीदारी गलत नहीं , पर समाज का अंध्‍विश्‍वासी होना इसके विकास में एक रूकावट है।

प्रकृति के सभी प्राणियों की तुलना में व्‍यक्ति की बनावट अलग होती है , इसलिए उसे जरूरत, सुरक्षा और सुविधा के लिए परिवार और समाज की जरूरत होती है , समाज को शक्ति देने के लिए समय समय पर उपलब्ध जानकारियों और तजुर्बों के आधार पर कुछ नियम बनाए जाते हैं। सामाजिक आचार संहिता व्यक्ति के स्वार्थ में कमी लाती है और व्‍यक्ति को संस्‍कारित करने में मदद करती है। पर ऐसा नहीं है कि इन संस्कारों को अपरिवर्तनशील मान लिया जाए। समाज में हो रहे परिवर्तनों के साथ पुराने नियम प्रासंगिक न होकर विकृतियाँ फैलाने वाले हो जाते हैं , ये नियम व्‍यक्ति को अंधविश्‍वासी बनाते हैं। तर्कशीलता का कवच पहनकर नए नियमों को समाविष्‍ट करके ही परम्परा को जीवंत रखा जा सकता है। नए विचार को प्रारम्भ में कड़ी भर्त्सना की जाती है , पर गहरे तर्क वितर्क के बाद इसे सार्वभौम सत्य समझ लिया जाता है और यह अंधविश्‍वास के खात्‍में की राह प्रशस्‍त करता है।

प्रकृति के रहस्‍यों की जानकारी के बाद बहुत सारे अंधविश्‍वास समाप्‍त होते चले गए , यदि आज समाज में कुछ अंधविश्‍वास प्रचलित हैं , तो इसकी वजह कुछ ऐसे रहस्‍य हैं , जिनका पता विज्ञान नहीं लगा सका है। बीमारी का इलाज भले ही मेडिकल साइंस के पास हैं , पर वह यह नहीं बता सकता कि कोई व्‍यक्ति बीमारी से ग्रस्‍त या अस्‍वस्‍थ क्‍यों है ? अधिकांश परिवार को परिवार नियोजन के कार्यक्रम का सहारा लेना पडता है , वहीं कुछ दंपत्ति डॉक्‍टरों के निरंतर इलाज के बावजूद बच्‍चे को जन्‍म देने में बाधाएं उपस्थित पा रहे हैं। कुछ आर्थिक मामले में स्‍वतंत्र हैं तो कुछ को जीवन में कठिन परीक्षा से गुजरना पड रहा है। किसी के बच्‍चे पढाई लिखाई में माता पिता का नाम रोशन कर रहे हैं , तो कुछ उनके लिए बोझ बने हुए हैं। सामान्‍य विद्यार्थी कैरियर में हर तरह से सफल हैं, तो मेधावी और सफल रहे विद्यार्थी दर दर की ठोकर खाने को मजबूर। इसी प्रकार कभी अच्‍छा भला चल रहा व्‍यवसाय अचानक दम तोडने लगता है , तो कभी साधारण व्‍यवसाय अचानक पनप जाता है। कभी अच्‍छे भले बच्‍चे आत्‍म हत्‍या को मजबूर हो जाते हैं , अच्‍छी भली बच्चियां दहेज लोभियों के चंगुल में फंस जाती है। भले ही विज्ञान इसके पीछे किसी नियम के होने की वास्‍तविकता से इंकार करे , पर 1981 से अबतक पच्‍चीस तीस हजार जन्‍मकुंडलियों के विश्‍लेषण के बाद ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ का दावा है कि समय समय पर आनेवाली मनुष्‍य की हर अच्‍छी भली परिस्थिति के पीछे उसके जन्‍मकालीन और गोचर के ग्रहों का हाथ होता है और इसे समझा और समझाया जा सकता है।

प्राचीन काल से ही फलित ज्योतिष को काल गणना का विज्ञान माना जाता रहा है। काफी ठोस नियमों के नहीं होने के बावजूद भी समाज में इसे कभी अंधविश्‍वास नहीं माना गया , क्‍योंकि इसका आधार ग्रहों नक्षत्रों के गणित पर आधारित है। पर इसमें कुछ कमजोरियां थी , जिसका निदान करने के बाद मनुष्‍य के जीवन में आनेवाली परिस्स्थितियों के बारे में जानकारी प्राप्‍त की जा सकती है। ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के सारे सिद्धांतों की चर्चा एक बार में संभव नहीं है , पर इसके कुछ फार्मूले को डालकर मैने एक सॉफ्टवेयर विकसित किया है जिससे इस तरह के दो तरह के ग्राफ निकलते हैं ,
पहला ग्राफ आपके जीवन के उतार चढाव को समझाने में समर्थ है , ग्राफ काफी ऊपर हो तो मनमौजी वातावरण , मध्‍य में हो तो काम करने का वातावरण तथा नीचे हो तो निराशाजनक वातावरण देता है। हरा ग्राफ आपके परिस्थितियों की सूचना देता है , लाल यदि हरे से ऊपर हो तो प‍रिस्थितियों आपके नियंत्रण में होंगी , विपरीत स्थिति में आपको परिस्थितियों के हिसाब से चलना होता है।

दूसरा ग्राफ आपके जीवन के विभिन्‍न संदर्भों के बारे में प्रकृति से मिलनेवाले सहयोग की सूचना देता है। जिन संदर्भों का प्रतिशत बीस प्रतिशत के आसपास होगा , उससे संबंधित सुख प्राप्‍त करेंगे , दस प्रतिशत के आसपास होगा , तो उन संदर्भों में महत्‍वाकांक्षी होंगे , दो तीन प्रतिशत के आसपास होगा तो किसी न किसी कारण से उन संदर्भों से कष्‍ट प्राप्‍त करेंगे। इसके अलावे इस ग्राफ से विभिन्‍न संदर्भों से संतुष्टि और असंतुष्टि की जानकारी भी आपको मिल सकती है।



इसके अलावे छोटी छोटी अवधि में आने वाली खुशियों और कष्‍ट का आकलन भी गोचर के ग्रहों द्वारा संभव है , पर उसका प्रोग्रामिंग नहीं हो पाने से उसके आकलन में समय लगता है। सॉफ्टवेयर में अभी कुछ दिनों तक नियमित तौर पर काम चलता रहेगा और इस वर्ष के अंत तक हम बहुत हद तक अभी तक प्राप्‍त जानकारी को समाहित करने में कामयाब हो जाएंगे , पर अभी सिर्फ इन्‍हीं दो ग्राफों से किसी को भी उनकी प्रकृति और जीवनयात्रा के बारे में जानकारी दी जा सकती है, जो उन्‍हें खुद को समझने और अंधविश्‍वास से बचाने में मदद कर सकती है।  'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' भी समाज से अंधविश्‍वास को दूर करने के लिए पिछले चालीस वर्षों से सक्रिय है , विवाह के लिए जन्‍मकुंडली मिलाना आवश्‍यक नहीं , सूर्य और चंद्रग्रहण के प्रभाव का क्‍या है सच ? , मुहूर्त्‍त को लेकर लोगों के भ्रम  जैसी पोसट इसका प्रमाण हैं।


शनिवार, 14 अप्रैल 2012

हम सार्थक ढंग से बाबा अम्बेदकर जयंती मनाना सकते हैं !!!!!

हमारे देश में प्राचीन काल से जो दर्शन मौजूद है इसकी सबसे बडी शक्ति इसका लचीलापन है। कुछ भी विचार , जो ईश्वर, समाज या राजनीति से सम्बन्धित है, इसके दर्शन का अंग बन सकता है। सभी महापुरूषों के विचारों को सुनना , अमल करना यहां के लोगों का स्‍वभाव है। सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में तो हमारे देश ने सभी के अनुभवों से सीख ली ही है , धार्मिक क्षेत्र में भी देखा जाए तो हाल के सालों में न जाने कितने बाबाओं , कितनी माताओं को यहां के लोगों ने भगवान बना डाला है। सिर्फ आस्तिक ही नहीं , नास्तिक दर्शन भी आसानी से हिन्दू धर्म का अंग बन सकतें हैं यानि अपने अपने विचारों और भावनाओं के साथ हर प्रकार के लोगों का यहां स्‍वागत होता रहा है , उनके अनुसार समाज में परिवर्तन आता रहा है।

वैसे तो हमारे पास इतिहास का अवतारवाद का सिद्धांत हैं, जिसके अनुसार इतिहास एक दैवी योजना के तहत् चलता है। मानव जाति को हर प्रकार का कष्‍ट झेलते हुए उस समय तक निरंतर बने रहना होता है जब तक कोई अवतार न हो। पर अम्बेदकर का मानना था कि यदि समय की सही मांग को पहचानने वाले ज्ञान चक्षु हों, उसे सही मार्ग दिखाने का साहस एवं शौर्य हो तो एक महापुरूष द्वारा भी किसी भी युग का उद्धार हो सकता है। दैवी या सामाजिक शक्तियों को मानना और झेलना हमारी मजबूरी है , पर मनुष्य इतिहास के निर्माण का एक साधन है। डॉक्टर अम्बेदकर इस मामले में दूरदर्शी माने जा सकते हैं कि वे समझते थे कि समाज के लोगो के बीच जितनी सं‍तुलित आर्थिक स्थिति होगी, उतना ही देश में विकास हो सकता है। ऐसे में जल्‍द ही भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बन सकता है। पर उनकी सोच का मतलब परिवर्तित हो गया , उन्‍हें संपूर्ण राष्‍ट्र का ना मान कर सिर्फ दलितों और पिछडो का मसीहा बना दिया।

ऐसा इसलिए क्‍योंकि अम्बेदकर ने भारत की जाति व्‍यवस्‍था को समझने के लिए अधिक श्रम और समय दिया । उनके हिसाब से आदिम समाज घुमन्तु कबीलों में बँटा समाज था, बाद में कुछ लोग गाँवों मे बस गए, किन्तु कुछ लोग घुमंतु बने रहे । कालांतर में एक समझौते के तहत किसी हमले की हालत में छितरे लोग, बसे लोगों के सुरक्षा कवच का काम और बसे हुए लोग उन्हे रहने को सीमा पर जगह और अपने मृत पशु देने लगें। भारत में यही छितरे लोग अछूत बन गए। प्राचीन वैदिक संस्कृति बलि की संस्कृति थी, नरमेध, अश्वमेध और गोमेध आदि यज्ञों में नर, अश्व, गो आदि की बलियां होती थीं और सब मिल कर सारा मांस आपस में बाँट लेते थे।

पर बुद्ध के मानवीय धर्म का समाज पर गहरा प्रभाव पड़ा.. बड़ी संख्या में राजाओं और आम जन ने ब्राह्मण धर्म को ठुकरा कर बुद्ध के सच्चे धर्म को अपना लिया.। ब्राह्मण संघर्षशील हो गए, देश में लगातार बौद्धो को हटाकर ब्राह्मण धर्म को पुनर्स्थापित किया जाने लगा। पर जनमामस में अहिंसा का भाव बैठ गया था जो कृषि आधारित समाज के लिये उपयोगी भी था। बौद्ध हिंसा के विरोधी होने के बावजूद ऐसे जानवर का मांस खा लेते थे जिसे उनके लिये मारा न गया हो। बौद्धो से भी दो कदम आगे निकलने के लिए ब्राह्मणों ने गोवध को सबसे बड़ा पाप घोषित कर दिया और गोमांस खाने वाले को अस्पृश्य , ऐसे में ब्राह्मण गोभक्षक से गोरक्षक बन गये। प्राचीन समझौते के तहत मृत जानवरों को ठिकाने लगाने का काम कर रहे छितरे लोगों के लिए मृत जानवरों का मांस खाना मजबूरी थी , इसलिए ये अस्पृश्य हो गये, इसकी शुरुआत अम्‍बेदकर ४०० ई. के आस पास का तय करते हैं।

अम्‍बेदकर आर्थिक सुधार का मॉडल नीचे से ऊपर की ओर रखना चाहते थे , वे सामाजिक ढांचे में दलितों को सम्मानजनक स्थान दिलाना चाहते थे। वे हिंदू समाज के आंतरिक सुधार को लेकर बहुत चिंतित थे। 1930 में गांधी जी द्वारा दलितों को हरिजन कहा जाना भी उन्‍हें अपमानजनक महसूस हुआ , न सिर्फ इसलिये कि दक्षिण भारत में मन्दिरों की देवदासियों के अवैध सन्तानो को हरिजन कहा जाता था, बल्कि इसलिये भी इस शब्द से दलित हिन्दू समाज की मुख्य धारा से अलग थलग दिखायी पडते थे। हिंदू या अन्‍य सम्प्रदायों से उनका कोई विद्वेष नहीं था। अम्बेदकर ने जब धर्म परिवर्तन का फैसला लिया तो उनको मनाने कई धर्माचार्य पहुंचे लेकिन अम्बेदकर ने सबको ठुकरा कर बौद्ध धर्म चुना था। शायद अम्बेदकर के मन में ये बात थी कि जिन दलितों ने अतीत में इस्लाम, इसाई और सिख धर्म अपनाया था समाजिक-आर्थिक रुप से उनमें कोई खास बदलाव नहीं आय़ा। जब एक हिंदू धर्माचार्य अम्बेदकर के पास हिंदू धर्म में ही बने रहने का आग्रह कर रहे थे तो अम्बेदकर ने उनसे पूछा कि क्या हिंदू समाज, शंकराचार्य के पद पर एक दलित को स्वीकार कर लेगा ?

इन दिनों महापुरूषों की जयंती भी जाति के आधार पर ही मनाई जाती है। बाबा अम्‍बेदकर भले ही संविधान के जरिये सबकी बराबरी की वकालत करते रहे मगर आज उनके नाम पर कोई भी राजनीति करने से नहीं चूक रहा। दलित अगर एकजुट हो किसी के पक्ष में मतदान कर दे तो सत्ता मिलनी तय है, पार्टियां दलितों का मसीहा क्‍यूं न बने ? सभी पार्टी अम्बेदकर के विचारों को ही पूरा करने का दंभ भरती है। इनके नाम पर सिर्फ जयंती मनाने , जुलूस निकालने या संस्‍थाओं , पुरस्‍कारों के नाम रखने और आरक्षण की राजनीति करने से कोई लाभ नहीं। दलितों के लिए हर प्रकार की सुविधाएं और उनकी आनेवाली पीढियों की प्रतिभाओं को विकास का सर्वोत्तम प्रबन्ध करके ही हम सार्थक ढंग से बाबा अम्बेदकर जयंती मना सकते हैं। तभी समाज में समता और समरसता बनी रह सकती है।

शनिवार, 7 अप्रैल 2012

अपने पसंदीदा रंग से जानिए अपना भाग्‍य ....

रंग हमारे मन और मस्तिष्‍क को काफी प्रभावित करते हैं। कोई खास रंग हमारी खुशी को बढा देता है तो कोई हमें कष्‍ट देने वाला भी होता है। जिस तरह यदि हम प्रकृति के निकट हों , तो खुद को फायदा पहुंचाने वाले वस्‍तुओं की ओर हमारा ध्‍यानाकर्षण होता है , उन वस्‍तुओं का प्रयोग हम आरंभ कर देते हैं , उसी तरह 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' की मान्‍यता है कि कमजोर ग्रहों के प्रभाव को दूर करने के लिए जिस रंग का हमें सर्वाधिक उपयोग करना चाहिए , उस रंग को हम खुद पसंद करने लगते हैं और उस रंग का अधिकाधिक उपयोग करते हैं। इस कारण रंगों की पसंद के अनुसार भी किसी व्यक्ति की परिस्थितियों और स्वभाव के बारे में जानकारी प्राप्‍त की जा सकती है।

सफेद रंग पसंद करने वाले लोग बचपन में ही अपने माहौल में किसी न किसी प्रकार की कमजोरी को देखते हैं और कमजोरियों दूर करने के लिए मनोवैज्ञानिक रुप से परेशान रहते हैं , बचपन के व्यवहार में संकोच हावी होता है , हर समय इन्‍हें भय बना होता है कि कोई गलती न हो जाए। यही मनोवैज्ञानिक कमजोरी इनके जीवन के अन्य भागों में भी देखी जा सकती है। 'पूरी तैयारी और सावधानी करके ही काम करो’ की प्रवृत्ति के कारण काम की शुरुआत ही नहीं हो पाती , बहुत सारे काम विचाराधीन भी पड़े रहते हैं। जीवनभर निरंतर इन कमजोरियों को दूर करने के लिए ये सतर्क रहते हैं। अपने विचारों को कमजोर समझकर दूसरों के सामने रखने में संकोच करते हैं। इनके मन के आवेग में पर्याप्त ठहराव होता है और अपनी बातों को रखने के लिए उचित समय की तलाश करते हैं। ये मन से कभी आक्रामक नहीं होते , फलतः आपपर बाह्य आक्रमण होता है। ये रूठकर प्रतिरोधात्मक शक्ति का प्रदर्शन करते हैं।

हरा रंग पसंद करने वाले लोग किशोरावस्था में अपने माहौल को बहुत कमजोर पाते हैं , अध्ययन काल में विपरीत परिस्थितियों से गुजरते हैं । इनकी कठिनाइयां 12 वर्ष की उम्र से 18 वर्ष की उम्र तक बढ़ते हुए क्रम में बनी रहती हैं। बौद्धिक विकास या शिक्षा-दीक्षा के महत्व को समझने के बावजूद परिस्थितियों के विपरित होने से इनका कोई काम सही ढंग से नहीं हो पाता है , इस समय बाधाओं की निरंतरता बनी रहती है।  17 से 19 वर्ष की उम्र में भी इनके मनोबल को तोड़नेवाली कोई घटना घटती है । उस समय इनका आत्मविश्‍वास काम नहीं कर रहा होता है , भीड में पींछे पीछे रहने की आदत रहती है और जीवनभर  नेतृत्‍व क्षमता की कमी मौजूद होती है। इनके व्‍यक्तित्‍व में सेवा भावना होती है। कम उम्र में माहौल में आयी गडबडी इनके धैर्य और निर्णय लेने की शक्ति को बढाती है और इनके आगे के जीवन को संतुलित बनाने में भी मदद करती है। 

लाल रंग पसंद करने वाले लोगों के जीवन में युवावस्था के दौरान परेशानी उपस्थित रहती हैं , यूं तो इनकी समस्याएं 18 वर्ष के उम्र के बाद से ही आरंभ हो जाती हैं , पर 24 वर्ष की उम्र के बाद विपरीत परिणामों की निरंतरता से इनमें शक्ति साहस की कमी और संघर्ष करने की क्षमता कमजोर पड़ती है। 30 वर्ष की उम्र से पहले  ये भीतर से कुछ दब्बू होते हैं , चुस्त जीवनशैली से कोसों दूर इन्‍हें ग्रामीण या एकांतिक जीवन पसंद आता है , वृद्ध जैसा स्वभाव बना रहता है। जीवनभर व्‍यक्तित्‍व में हिम्मत की कुछ कमी बनी रहती है , पर ये लोगों के विश्‍वसनीय बने रहतें हैं । इन्‍हें परंपरागत नियमों पर विश्‍वास होता है , सरल जीवन पसंद होता है। 

नीला रंग पसंद करने वाले लोगों पर घरेलू उत्तरदायित्वों का भारी बोझ रहता है , बढती जिम्‍मेदारियों के साथ समय पर नौकरी या व्यवसाय में आगे बढने में दिक्कत आने से जीवन का मध्य खासकर 36 वर्ष से 42 वर्ष की उम्र तक का समय कष्टकर व्यतीत होता है , इस वक्त लोगों का कम सहयोग मिलता है। पारिवारिक सांसारिक मामलों का कष्ट बना होता है , इसलिए सांसारिक मामलों में रूचि कम होती है , इन्‍हें अपना जीवन नीरस महसूस होता है। 

नारंगी रंग पसंद करने वाले लोगों को किसी खास संदर्भ में निश्चिंत या लापरवाह रहने का बुरा फल कभी कभी जीवन में सामने आ जाया करता है। 48 वर्ष से 54 वर्ष की उम्र तक हर तरह की जवाबदेही बहुत बढ़ी हुई होती है। उम्र के ऐसे पड़ाव पर इतनी सारी जबाबदेहियों को सॅभाल पाने में तकलीफ होती है , प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण इनको अपना जीवन निरर्थक लगने लगता है, स्तर में बढोत्तरी के बावजूद 48 से 54 वर्ष की उम्र में ये खुद को सफल नहीं महसूस करते। परिस्थितियों की कुछ गडबडी 60 वर्ष की उम्र तक बनी होती है।

पीला रंग पसंद करने वाले लोग धार्मिक स्वभाव रखने वाले होते हैं , जीवनभर बहुतों को काम आते हैं । इन्‍हें परंपरागत नियमों पर पूरा विश्‍वास रहता है , पर सेवानिवत्ति के पहले अपनी जबाबदेहियों का निर्वाह कर पाने में असमर्थ रहते हैं , इस कारण उसके बाद इनके जीवन में कष्टकर परिस्थितियों की शुरूआत होती है। वृद्धावस्था में यानि 60 वर्ष की उम्र के बाद असफलताएं दिखाई देती हैं , इस समय इनका जीवन निराशाजनक बना रहता है , उम्र अधिक होने के कारण मानसिक कष्ट बहुत होता है , कमजोर शारीरिक मानसिक हालत के कारण किसी प्रकार के निर्णय लेने में दिक्कत आती है।

काले या स्‍लेटी रंग को पसंद करने वाले लोग जीवन में बहुत छोटी छोटी बातों में उलझे रहते  हैं , इनकी सोंच व्यापक नहीं बन पाती, इस कारण तरक्‍की में रूकावट आती है। मेहनत के हिसाब से कम सामाजिक महत्व प्राप्त करते हैं , जीवन में कभी कभी रहस्यमय ढंग से विपत्ति से घिर जाते हैं, इसका सामना करने की इनमें शक्ति नहीं होती , बहुत निरीह हो जाते हैं , पर जिस ढंग से अचानक समस्या आती है , उसी ढंग से तीन वर्ष के बाद उसका निराकरण भी हो जाता है। इनका अति वृद्धावस्था का समय यानि 72 वर्ष की उम्र के बाद का समय कष्‍टकर होता है। 
(बहुत दिनों से सबका पसंदीदा रंग नोट करने , ग्रहों के साथ उसका तालमेल बिठाने तथा उनकी परिस्थितियों पर ध्‍यान देने के बाद यह लेख लिखा गया है , आप भी अपने अनुभव साझा करें , तो हमें सुविधा होगी , पक्ष और विपक्ष दोनो में टिप्‍पणियां आमंत्रित हैं )

बुधवार, 4 अप्रैल 2012

भगवान महावीर का दर्शन अहिंसा का ही नहीं क्रांति का दर्शन है .. संगीता पुरी


ईसा से 600 वर्ष पूर्व जब भारतवर्ष अंधविश्वासों के अंधेरे में डूब चुका था , ईर्ष्या और द्वेष की बहुलता थी, समाज जातिवाद के झमेले में फंसा था , धर्म पुस्तकों में सिमट कर रह गया था , धर्म के नाम पर लड़ाई-झगड़े, दंगा-फसाद एवं अत्याचार चरम पर थे , धर्म के नाम पर पशुबलि और हिंसा का प्रचलन बढ़ रहा था , आध्यात्म समाप्‍त था , तब देश में अहिंसा, सत्य, त्याग और दया की किरणें ले आना बहुत बडी बात थी। भगवान महावीर ने जगह-जगह घूमकर धर्म को पुरोहितों के शोषण , कर्म-कांडों के जकडन , अंधविश्वासों के जाल तथा भाग्यवाद की अकर्मण्यता से बाहर निकाला। उन्‍होने कहा कि धर्म स्‍वयं की आत्मा को शुद्ध करने का एक तरीका है।

धर्म का चतुष्टय भगवान महावीर स्वामी के सिद्धांतों का सार है , जो हमारी जीवनशैली को किसी भी युग में बदल सकता है ...


महावीर का पहला सिद्धांत अहिंसा का है , प्राणियों को मारना या सताना नहीं चाहिए । जैसे हम सुख चाहते हैं, वैसे ही सभी प्राणी सुख चाहते हैं, और जीना चाहते हैं। अहिंसा से अमन चैन का वातावरण बनता है। उन्‍होने किसी के शरीर को कष्ट देने को ही अहिंसा नहीं माना , बल्कि मन, वचन , कर्म से भी किसी को आहत करना उनकी दृष्टि से अहिंसा ही थी। उन्‍होने कहा कि दूसरों के साथ वह व्यवहार कभी मत करो जो स्वयं को अच्छा ना लगे। ‘स्वयं जीओ और औरों को जीने दो।‘ किसी भी प्राणी को मार कर बनाये गये प्रसाधन प्रयोग करने वाले को भी उतना ही पाप लगता है जितना किसी जीव को मारने में। उन्‍होने यहां तक माना कि बड, ऊमर, कठूमर, अंजीर, मधु , दही-छाछ , दही बडा आदि को खाने में भी मांस भक्षण का पाप लगता है। आज तो विज्ञान ने भी सिद्ध कर दिया है कि वनस्पति सजीव है, पर महावीर ने आज से ढाई हजार वर्ष पूर्व ही कह दिया था कि वनस्पति भी मनुष्य की भांति सुख-दुःख का अनुभव करती है।

महावीर का दूसरा सिद्धांत अनेकांत का है , संसार के सभी प्राणी समान हैं, कोई भी छोटा या बडा नहीं है। पर वस्तु और व्यक्ति विविध धर्मी हैं , सबका स्‍वभाव एक सा नहीं हो सकता। एक के लिए जो सही है, वह दूसरे के लिए भी सही हो, यह आवश्यक नहीं है। किसी को भी उसके स्वभाव से दूर नहीं किया जा सकता, ऐसा करने से वे रोगों से आक्रान्त हो जाते हैं। ये रोग पहले मन पर आक्रमण करते हैं, फिर शरीर को धर दबोचते हैं। मन सहज ही एक पक्ष को लेकर विरोधी पक्ष का खण्डन करने को आतुर रहता है। क्या दर्शन और क्या राजनीति, सर्वत्र यही दुराग्रह-पूर्ण पक्षपात दिखाई पडता है। सत्य पक्षपात में नहीं, निष्पक्षता में है। एक ही राय को सब को मानने के लिए बाध्य करना मानवाधिकार हनन की श्रेणी में आता है। हम समन्वय का मार्ग लें, अति का मार्ग नहीं। हर वक्‍त दो विरोधी द्रव्यों अथवा विरोधी धर्मों के बीच सही अस्तित्व स्थापित करने वाले नियम को खोजा जाना चाहिए।

भगवान महावीर का तीसरा सिद्धांत अपरिग्रह का है। उनका मानना था कि संग्रह मोह का परिणाम है। जो हमारे जीवन को सब तरफ से घेर लेता है, जकड लेता है। धन पैसा आदि लेकर प्राणी के काम में आने वाली तमाम वस्तु/सामग्री परिग्रह की कोटि में आती है। मान, माया, क्रोध, लोभ.. इन चार से जो जितना मुक्त होगा, वह उतना ही निरोग होगा।

भगवान महावीर द्वारा प्रतिपादित चौथा सिद्धांत आत्म स्वातंत्र्य का है, इसे ही अकर्तावाद या कर्मवाद कहते हैं। यह ‘ किसी ईश्वरीय शक्ति/सत्ता से सृष्टि का संचालन नहीं मानना।‘ यानि हमें अपने किये गये कर्म पर विश्वास हो और उसका फल धैर्य, समता के साथ सहन करें। हम पर कोई कष्ट, विपत्ति या संकट आ पड़े तो उससे बचने के लिए देवी-देवता या ईश्वर के आगे सहायता के लिए भीख न मांगनी पड़े। बल्कि अपने आत्मबल को एकत्र कर उसका सामना करें। व्यक्ति जन्म से नहीं कर्म से महान बनता है, यह उद्घोष भी महावीर की चिंतन धारा को व्यापक बनाता है। मानव से महामानव, कंकर से शंकर, भील से भगवान और नर से नारायण बनने की कहानी ही महावीर का जीवन दर्शन है।

वे प्रकृति में मौजूद छोटे छोटे कण तक को समान मानते थे और किसी को भी कोई दु:ख देना नहीं चाहते थे। उन्‍होने अपने इसी सोच पर आधारित एक नया विज्ञान विश्व को दिया। यह था परितृप्ति का विज्ञान। वास्तव में विज्ञान ने जब-जब कोई नई खोज अथवा नया आविष्कार किया है , मानव की प्यास बढती गयी है। जब व्यक्ति अपने जीवन को इच्छा से संचालित करता है तो निरन्तर नई आवश्यकताएँ पैदा होने का सिलसिला चल निकलता है, जो मानव के लिए कष्टों का घर होता है। इच्छा आवश्यकता को और आवश्यकता इच्छा को जन्म देती है। भोग की अनियंत्रित इच्छा सामाजिक जीवन को विषाक्त कर देती है। भगवान महावीर इस अन्तहीन सिलसिले को समाप्त करना चाहते थे। जो अपने को जीत ले, वह जैन है। भगवान महावीर ने अपनी इन्द्रियों को जीत लिया और जितेन्द्र कहलाए। एक राजकुमार सुख सुविधाएं , ऐश्‍वर्य स्वेच्छा से त्यागकर वैराग्य धारण कर लेता है , तो वह घटना अविस्मरणीय और अनुकरणीय है ही। आत्मज्ञान प्राप्त करने वाले ऐसे राजकुमार वर्धमान से महावीर हो जाते हैं और ऐसे महामानव के लिए देश के कोने कोने में मनाई जाती है महावीर जयंती।

आज भगवान महावीर हमारे बीच नहीं है पर यह हमारा सौभाग्‍य है कि उनके विचार हमारे पास सुरक्षित हैं। उनका मानना था कि जीवन में आर्थिक, मानसिक और शारीरिक विकास तीनों एक साथ चलने चाहिए। भगवान महावीर का दर्शन अहिंसा और समता का ही दर्शन नहीं है, क्रांति का दर्शन है। उनके विचारों को किसी काल, देश अथवा सम्प्रदाय की सीमा में नहीं बाँधा जा सकता। यह प्राणी मात्र का धर्म है। ईसा से छह सौ वर्ष पूर्व उन्‍होने जो कहा , आज भी अनुकरणीय है। आज विश्व हिंसा की ज्वाला में झुलस रहा है। पूंजीवादी मानसिकता के कारण बडे छोटे का भेदभाव बढता जा रहा है। धर्म के नाम पर तरह तरह की कुरीतियां व्‍याप्‍त हैं। पेड पौधों , पशु पक्षियों की अवहेलना से प्रकृति में असंतुलन बढता जा रहा है , महावीर के विचार को माने जाने से ही संसार को राहत मिल सकती है। पर आज कठिनाई यह हो रही है कि महावीर का भक्त भी उनकी पूजा करना चाहता है , पर उनके विचारों पर नहीं चलता। कई जैन मंदिरों में महावीर की प्रतिमा बहुमूल्य आभूषणों से आभूषित मिलती है। यह महावीर का सही चित्रण नहीं है। यदि हम उनके चिंतन को जन-जन तक पहुंचा सकें, तभी उनके जन्म के इस महोत्सव को सच्ची सार्थकता प्राप्त होगी।

विभिन्‍न लग्‍नवालों के लिए योगकारक और अयोगकारक ग्रहों का फलाफल

16 फरवरी 2012 को पोस्‍ट किए गए लेख में   विभिन्‍न लग्‍नवालों के लिए योगकारक और अयोगकारक ग्रहों का फलाफल तय करने की चर्चा की गयी थी।  इस हिसाब से मेष लग्‍नवालों की चंद्रमा को +2  , बुध को -5 , मंगल को +4 , शुक्र को +4 , सूर्य को +6 , बृहस्‍पति को +7 तथा शनि को 0 अंक मिलते हैं। इसलिए यदि और कोई बडा ज्‍योतिषीय कारण न हो तो सुख प्राप्ति के मामलों में मेष लग्‍नवालों की भाग्‍य , खर्च और बाहरी संदर्भों की स्थिति सर्वाधिक अच्‍छी होती है , उसके बाद बुद्धि , ज्ञान और संतान का स्‍थान होता है , उसके बाद शरीर , व्‍यक्तित्‍व , स्‍वास्‍थ्‍य , आत्‍मविश्‍वास , जीवन शैली , धन , कोष , घर गृहस्‍थी और ससुराल पक्ष का वातावरण होता है , वाहन समेत हर प्रकार की संपत्ति की भी स्थिति अच्‍छी होती है , पिता , समाज , प्रतिष्‍ठा , कर्मक्षेत्र की सफलता और अन्‍य प्रकार के लाभ का नं उसके बाद होता है , बुध के ऋणात्‍मक होने से भाई , बहन बंधु बांधव और सहयोगी से संबंधित जबाबदेही या किसी प्रकार के झंझट की उपस्थिति की संभावना बनती है।


इसी प्रकार वृष लग्‍नवालों की जन्‍मकुंडली में चंद्रमा को -2 अंक मिलते हैं , बुध को +7 अंक , मंगल को +3 , शुक्र को +2 , सूर्य को +2 , बृहस्‍पति को -5 तथा शनि को +11 अंक मिलते हैं। इसलिए यदि और कोई बडा ज्‍योतिषीय कारण न हो तो सुख प्राप्ति के मामलों में वृष लग्‍नवालों का भाग्‍य , पिता , प्रतिष्‍ठा और सामाजिक राजनीतिक वातावरण की स्थिति सबसे अच्‍छी होती है , उसके बाद इनकी धन , कोष , बुद्धि , ज्ञान , संतान का स्‍थान होता है , इसके बाद घर , गृहस्‍थी , खर्च और बाहरी संदर्भ , उसके बाद स्‍वास्‍थ्‍य , व्‍यक्तित्‍व , आत्‍मविश्‍वास , झंझट के लडने की शक्ति , वाहन समेत हर प्रकार की संपत्ति के मामले होते हैं , चंद्रमा के कारण भाई बहन , बंधु बांधवों के सुख में थोडी कमी और बृहस्‍पति के कारण सबसे कमजोर इनकी जीवन शैली और लाभ होता है। 

इसी प्रकार मिथुन लग्‍नवालों की जन्‍मकुंडली में चंद्रमा को +1 अंक मिलते हैं , बुध को +7 अंक , मंगल को -7 , शुक्र को +6 अंक मिलते हैं। इसी प्रकार सूर्य को -2 , बृहस्‍पति को +7 तथा शनि को +6 अंक मिलते हैं।  इसलिए यदि और कोई बडा ज्‍योतिषीय कारण न हो तो सुख प्राप्ति के मामलों में  मिथुन लग्‍नवालों के शरीर , व्‍यक्तित्‍व , आत्‍मविश्‍वास , हर प्रकार की संपत्ति , घर गृहस्‍थी का वातावरण , पिता पक्ष और पद प्रतिष्‍ठा की स्थिति अच्‍छी होती है , उसके बाद बुद्धि , ज्ञान , संतान , खर्च , बाहरी संदर्भ , भाग्‍य और जीवन शैली का स्‍थान भी पक्ष में ही होता है , धन की स्थिति भी सकारात्‍मक होती है , पर भाई , बहन , बंधु बांधव की स्थिति थोडी गडबड तथा किसी प्रकार के झंझट की उपस्थित की संभावना और लाभ की कमजोरी बनी रहती है।

इसी प्रकार कर्क लग्‍नवालों की जन्‍मकुंडली में चंद्रमा को +5 अंक मिलते हैं , बुध को -2 अंक , मंगल को +10 , शुक्र को -2 , सूर्य को  +1 , बृहस्‍पति को +4 तथा शनि को +2 अंक मिलते हैं।  इसलिए यदि और कोई बडा ज्‍योतिषीय कारण न हो तो सुख प्राप्ति के मामलों में कर्क लग्‍न वालों के बुद्धि , ज्ञान , संतान , पिता , समाज , पद ,प्रतिष्‍ठा और सामाजिक राजनीतिक वातावरण को सर्वाधिक बढिया माना जा सकता है। उसके बाद उनके शरीर , व्‍यक्तित्‍व और आत्‍मविश्‍वास की स्थिति होती है , इसके बाद भाग्‍य और हर प्रकार के झंझट से जूझने की शक्ति , फिर घर , गृहस्‍थी और जीवनशैली को भी सकारात्‍मक माना जा सकता है। इनका भाई , बहन , बंधु बांधव , खर्च , बाहरी संदर्भ , माता पक्ष , हर प्रकार की संपत्ति या लाभ से संबंधित मामले कुछ कमजोर होते हैं।

इसी प्रकार सिंह लग्‍नवालों की जन्‍मकुंडली में चंद्रमा को 0 , बुध को -3 अंक , मंगल को +9 , शुक्र को +2 , सूर्य को +5 , बृहस्‍पति को +5 , तथा शनि को 0 अंक मिलते हैं।  इसलिए यदि और कोई बडा ज्‍योतिषीय कारण न हो तो सुख प्राप्ति के मामलों में सिंह लग्‍न वालों  का भाग्‍य और हर प्रकार की संपत्ति की स्थिति बहुत अच्‍छी होती है। उसके बाद इनके शरीर , व्‍यक्तित्‍व , आत्‍म विश्‍वास , बुद्धि , ज्ञान , संतान और जीवन शैली को स्‍थान दिया जा सकता है , भाई , बहन , बंधु ,बांधव , पद  प्रतिष्‍ठा की स्थिति भी अच्‍छी होती हैं , खर्च , बाहरी संदर्भ , घर गृहस्‍थी और किसी प्रकार के झंझट से जूझने की शक्ति भी होती है , पर बुध के ऋणात्‍मक होने से धन के मामले काफी सुखद नहीं रह पाते।

इसी प्रकार कन्‍या लग्‍नवालों की जन्‍मकुंडली में चंद्रमा को -4 अंक , बुध को +9 अंक , मंगल को -3 , शुक्र को +8 , सूर्य को 0 , बृहस्‍पति को +5 तथा शनि को +3 अंक मिलते हैं। इसलिए यदि अन्‍य कोई बडा ज्‍योतिषीय कारण न हो तो कन्‍या लग्‍न वालों के शरीर , व्‍यक्तित्‍व , आत्‍मविश्‍वास , पिता पक्ष , सामाजिक राजनीतिक पक्ष और प्रतिष्‍ठा संबंधी मामले काफी सुखद होते हैं। इनके भाग्‍य और धन की स्थिति भी अच्‍छी होती है , घर गृहस्‍थी , पारिवारिक मामले और हर प्रकार की संपत्ति के मामले भी सुखद होते हैं , संतान पक्ष , प्रभाव और हर प्रकार के झंझट से जूझने की शक्ति भी सामान्‍य तौर पर अच्‍छी होती है , खर्च के मामले भी सामान्‍य होते हैं , पर लाभ के मामले ऋणात्‍मक महसूस होते हैं , भाई बहन बंधु बांधवों से भी इन्‍हें सहयोग कम मिलता है।

इसी प्रकार तुला लग्‍नवालों की जन्‍मकुंडली में चंद्रमा को +4 अंक , बुध को +7 अंक , मंगल को +4 , शुक्र को +4 अंक , सूर्य को -4 , बृहस्‍पति को -5 तथा शनि को +8 अंक मिलते हैं। इस कारण यदि अन्‍य कोई बडा ज्‍योतिषीय कारण न हो तो तुला लग्‍नवाले सुख के मामलों में बुद्धि , ज्ञान , हर प्रकार की संपत्ति और संतान की स्थिति को सर्वाधिक मजबूत पाते हैं। इनके भाग्‍य और खर्च की स्थिति भी काफी सुखद होती है , स्‍वास्‍थ्‍य , जीवन शैली , पिता , समाज , प्रतिष्‍ठा , धन , कोष और घर गृहस्‍थी का वातावरण भी अच्‍छा होता है , पर लाभ के मामले कष्‍टकर होते हैं ,  भाई बहन , बंधु बांधव और प्रभाव की स्थिति भी ऋणात्‍मक होती है। 

इसी प्रकार वृश्चिक लग्‍नवालों की जन्‍मकुंडली में चंद्रमा को +7 अंक , बुध को -5 अंक , मंगल को +2 , शुक्र को+3 अंक , सूर्य को +4 अंक, बृहस्‍पति को +7 अंक तथा शनि को 0 अंक मिलते हैं। इसलिए यदि कोई बडा ज्‍योतिषीय कारण न हो तो वृश्चिक लग्‍नवाले भाग्‍य , धन , बुद्धि , ज्ञान और संतान के मामले में सर्वाधिक सुखद वातावरण प्राप्‍त करते हैं , पिता पक्ष , पद प्रतिष्‍ठा और सामाजिक वातावरण भी सुखद होता है , इनकी घर गृहस्‍थी और खर्च का वातावरण भी सुखद बनी होतीं है , भाई बंधु , हर प्रकार की संपत्‍ित के मामले भी अच्‍छे होते हैं , पर जीवनशैली कुछ कष्‍टकर होती है , इन्‍हें लाभ से कुछ समझौता करना पडता है।

इसी प्रकार धनु लग्‍नवालों की जन्‍मकुंडली में चंद्रमा को -1 अंक , बुध को +7 अंक , मंगल को +6 , शुक्र को -7 अंक , सूर्य को +7 , बृहस्‍पति को +7 तथा शनि को -1 अंक मिलते हैं। इसलिए यदि कोई बडा ज्‍योतिषीय कारण न हो तो धनु लग्‍न वालों का सबसे सुखद संदर्भ पिता , घर गृहस्‍‍थी का वातावरण और सामाजिक वातावरण होता है , शरीर , व्‍यक्तित्‍व , माता पक्ष , हर प्रकार की संपत्ति , भाग्‍य , बुद्धि , ज्ञान , संतान और खर्च की स्थिति भी मनोनुकूल बने होते है , पर धन कोष , भाई बहन , बंधु बांधव की स्थिति और जीवन शैली कुछ कमजोर होता है , शुक्र के अधिक ऋणात्‍मक होने से जीवन में कई प्रकार के झंझट की उपस्थिति और लाभ की कमी की संभावना बनी रहती है।

इसी प्रकार मकर लग्‍नवालों की जन्‍मकुंडली में चंद्रमा को +3 अंक , बुध को +4 अंक , मंगल को -2 , शुक्र को+10 अंक , सूर्य को -1 , बृहस्‍पति को -2 तथा शनि को = +6 अंक मिलते हैं।  इस कारण यदि कोई ज्‍योतिषीय बडा कारण न हो तो मकर लग्‍न वालों के लिए सर्वाधिक सुखद संदर्भ बुद्धि , ज्ञान , संतान , पिता , कैरियर और सामाजिक वातावरण होता है। शरीर , व्‍यक्तित्‍व और धन की स्थिति भी सुखद होती है , भाग्‍य , घर गृहस्‍थी का वातावरण , प्रभाव और हर प्रकार के झंझट से जूझने की शक्ति भी अच्‍छी होती है , पर ये जीवन शैली को लेकर हल्‍की कमजोरी महसूस करते हैं , माता पक्ष और किसी प्रकार की संपत्ति से संबंधित लाभ में कमी होती है , भाई , बंधु और खर्च के मामले भी कुछ दबाबपूर्ण होते हैं।


इसी प्रकार कुंभ लग्‍नवालों की जन्‍मकुंडली में चंद्रमा को -3 अंक , बुध को +5 अंक , मंगल को +2 , शुक्र को +9 , सूर्य को +3 , बृहस्‍पति को  -3 तथा शनि +5 अंक मिलते हैं।  इसलिए यदि ज्‍योतिषीय कारण न हो तो माता पक्ष , हर प्रकार की संपत्ति और भाग्‍य के मामले में कुंभ लग्‍नवालों की स्थिति सर्वाधिक सुखद होती है , इनके शरीर , व्‍यक्तित्‍व , खर्च और बाहरी संदर्भ के मामले भी सुखद होते हैं , बुद्धि , ज्ञान , संतान और जीवन शैली के मामले भी अच्‍छे होते हैं , घर गृहस्‍थी का वातावरण सुखद होता है , उसके बाद इनके जीवन में भाई , बहन , बंधु बांधव , पिता और प्रतिष्‍ठा से संबंधित मामलों का सुख आता है , पर किसी प्रकार के झंझट से जूझने की शक्ति कम होती है , धन और लाभ का वातवरण भी कमजोर बना होता है।


इसी प्रकार मीन लग्‍नवालों की जन्‍मकुंडली में चंद्रमा को +6 अंक , बुध को +5 अंक , मंगल को +8 , शुक्र को -3 , सूर्य को -3 , बृहस्‍पति को +9 तथा शनि को -4 अंक मिलते हैं। इसलिए यदि कोई बडा ज्‍योतिषीय कारण न हो , तो मीन लग्‍न वाले शरीर , व्‍यक्तित्‍व , हर प्रकार की संपत्ति , धन और भाग्‍य के मामले में सर्वाधिक सुख प्राप्‍त करते हैं , इनका बुद्धि , ज्ञान , संतान , घर गृहस्‍थी और पद प्रतिष्‍ठा का वातावरण भी सुखद होता है , पर भाई , बहन , बंधु , बांधव , जीवन शैली , झंझट से जूझने की शक्ति कुछ कमजोर बनी होती है , लाभ और खर्च के मामले सर्वाधिक कमजोर होते हैं।


उपरोक्‍त लेख ग्रहों के स्‍वामित्‍व के आधार पर लिखा गया है , योग कारक और अयोग कारक ग्रहों के निर्णय में जन्‍मकुंडली में जिस भाव में ग्रह की उपस्थिति हो , इसके अंक को भी जोडा जाना चाहिए , जिससे ग्रहों की शक्ति का उपयुक्‍त निर्णय हो सकता है। इसके बाद ग्रहों की गत्‍यात्‍मक और स्‍थैतिक शक्ति के आधार पर ग्रहों की शक्ति का निर्णय करना उचित है । अपनी अपनी शक्ति के हिसाब से ही सभी ग्रह अपने  प्रतिफलन काल में प्रभाव डालते हैं। 

गुरुवार, 29 मार्च 2012

क्‍या ज्योतिष आम जन के लिए उपयोगी हो सकता है ??

जीवन को देखने और समझने का सबका नजरिया भिन्‍न भिन्‍न होता है , कुछ लोग उथली मानसिकता के साथ इसे देखते हैं तो कुछ गहरी समझ के साथ। जो गहराई से जीवन के रहस्‍यों को समझने की कोशिश करते हैं , उन्‍हें हम दूरदर्शी और अनुभवी मानते हैं और उनकी सोंच के साथ चलने की कोशिश भी करते हैं। प्रत्‍येक परिवार में एक दो व्‍यक्ति , समाज में कुछ अनुभवी लोग आनेवाली पीढी को रास्‍ता दिखाने में काम करते हैं। कुछ तो इतने अनुभवी और ज्ञानी होते हैं , जिनकी परिवार या समाज की किसी समस्‍या को गहराई से समझते हुए उसके निराकरण का भरपूर उपाय करते है , ताकि आने वाली पीढी को उस समस्‍या का सामना न करना पडे। इस तरह छोटे छोटे स्‍तर पर ऐसे बहुत सारे अनुसंधान होते रहते हैं।

किसी भी विज्ञान को विकसित करने के लिए युगों तक न जाने कितने विद्वानों ने काम किया होता है। वर्षों तक प्रकृति में बिखरे ज्ञान को व्‍यवस्थित करने के बाद एक विज्ञान का जन्‍म होता है , जिसके प्रयोग से मानव जाति लाभान्वित होती है।  लाभ ही न हो तो किसी विज्ञान का कोई महत्‍व नहीं होता। विज्ञान के विकसित होने से पूरे राष्‍ट्र , नए युग के लिए जीने के लिए एक नई सोंच , नया ढंग आता है। सामने आती है , ऐसी जीवन शैली , जो आपको बेहतर जीवन जीने में मदद कर सकती है। पर किसी के अनुभव से या विज्ञान से लाभ प्राप्‍त करने के लिए उसपर विश्‍वास करना आवश्‍यक होता है , उसके द्वारा बनाए गए नियमों को अपने जीवन में लागू करना होता है , बिना विश्‍वास किए उसके कथनानुसार हम नहीं चल पाएंगे।

इतने वर्षों से ज्‍योतिष के नि:स्‍वार्थ अध्‍ययन और ग्रहों के जड और चेतन पर पडने वाले प्रभाव के खुलासे के बाद आज के युग के अनुरूप 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' को विकसित कर लेने के पश्‍चात् कुछ दिनों से ज्‍योतिष को मानवोपयोगी बनाने के बारे में निरंतर चिंतन चल रहा है। ग्रहों के बुरे प्रभाव को पूर्णतया दूर करने में तो हमें सफलता नहीं मिल सकती , पर ग्रहों के अच्‍छे प्रभाव को  बढाया और बुरे प्रभाव को घटाया जा सकता है। इसके अलावे ग्रहों के प्रभाव की जानकारी के बाद जीवन के प्रति मानव जाति की सोंच में एक बडा परिवर्तन आ सकता है । इसके लिए सबसे पहले ज्‍योतिष पर विश्‍वास करना होगा, ऐसी जीवन शैली विकसित करनी होगी , जिसके द्वारा हम ग्रहों के बुरे प्रभाव में आकर भी निश्चिंत रह सकें। समाज किसी सफलता और असफलता का श्रेय मनुष्‍य के साथ साथ उसके भाग्‍य को भी दे दे, तो काफी समस्‍या हल हो सकती है। कोई व्‍यक्ति निश्चिंत होकर अपनी रूचि के काम तो कर सकता है , वह सफलता की उम्‍मीद में किसी प्रकार का समझौता तो नहीं करेगा।

हम बीमारी में किसी भी पैथी की कोई दवा भी लेते हैं , तो हमारे भीतर की भावना असर करती है। हम जितने ही विश्‍वास के साथ डॉक्‍टर के दिए हुए दवा या सुझाव को ग्रहण करते हैं , हमें उतना ही अधिक फायदा नजर आता है। यहां तक कि यदि डॉक्‍टर पर विश्‍वास हो , तो उसका स्‍पर्श ही रोगी को ठीक करने में समर्थ है। चूंकि एलोपैथी पर हमें पूरा विश्‍वास है , किसी खास शारीरिक मानसिक हालातों में यदि डॉक्‍टर की सलाह न हो , तो हम बच्‍चे को गर्भ में भी आने न देंगे। यदि सबकुछ सामान्‍य हो , तब भी किसी बच्‍चे के गर्भ में आते ही हम उस हिसाब से बच्‍चे की देख रेख शुरू कर देते हैं। लोगों की यही भावना ज्‍योतिष के प्रति भी तो होनी चाहिए, शुरूआत से ही ग्रहों के हिसाब से उसकी देख भाल , रूचि के काम करने देने की छूट होनी चाहिए। सफलता में अति उत्‍साह और असफलता में नैराश्‍य को जन्‍म देने से बचना चाहिए। अच्‍छी परिस्थितियों का इंतजार किया जाना चाहिए।

पर ऐसा नहीं है , ज्‍योतिष को हम विज्ञान नहीं मानते , इसलिए हमारे जीवन शैली में इसका कोई स्‍थान नहीं है। जिनका शुरूआती जीवन असफल होता है , वो ग्रहों के प्रभाव को कुछ हद तक मानते भी हैं , पर जिनका जीवन सामान्‍य होता है , जबतक सामान्‍य बना रहता है , इसका कोई महत्‍व नहीं समझते। जिनके जीवन में सफलता आती रहती है , वे इसका श्रेय अपनी मेहनत को देते हैं। जैसे ही असफलता की शुरूआत होती है , ज्‍योतिषी के पास सबसे पहले वही पहुंचते हैं , मानो एक ज्‍योतिषी तुरंत चमत्‍कार ही कर देगा। मैने ग्रहों के बुरे प्रभाव  को कम या दूर करने से संबंधित कई लेख लिखे हैं , सबमें ग्रहों के अनुरूप अपनी जीवन शैली को ढालने के बारे में ही समझाया है, किसी चमत्‍कार की बात नहीं लिखी गयी है। समाज में जबतक ज्‍योतिष को विज्ञान के रूप में समझने की कोशिश नहीं की जाएगी , ज्‍योतिष से कोई लाभ प्राप्‍त करना नामुमकिन है। पर यह विडंबना ही है कि आजतक ज्‍योतिष को चमत्‍कार समझा जाता रहा है।

रविवार, 25 मार्च 2012

प्रकृति से अपने वातावरण और जमाने के अनुकूल मिली विशेषताएं ही हमारा भाग्‍य हैं !!

विचित्रता से भरी इस प्रकृति में नाना प्रकार की विशेषताओं के साथ मौजूद पशु पक्षी , पेड पौधे तो अपने विकास के क्रम में सुविधाएं और बाधाएं प्राप्‍त करते ही हैं , इन सबके साथ ही साथ हानिकारक किटाणुओं विषाणुओं के साथ जीवनयापन करता मनुष्‍य भी अपनी राह में तरह तरह के मोड प्राप्‍त करता है , इसके बाद भी आमजन का भाग्‍य के प्रति अनजान दिखना आश्‍चर्यजनक प्रतीत होता है। भले ही उस भाग्‍य को पूर्ण तौर पर जान पाने में हम असमर्थ हों , पर उसके अनुकूल या प्रतिकूल होने में तो शक की कुछ भी गुंजाइश नहीं।

सबसे पहले तो प्रकृति के विभिन्‍न पशु पक्षियों के जीवन पर ही गौर किया जा सकता है , जहां बलवान शिकार करता है और उसके डर से बलहीन दुबके पडे होते हैं। भाग्‍य भरोसे ही इनका जीवन चलता है , अच्‍छा रहा तो शिकार नहीं होता है , बुरा रहा तो तुरंत मौत के मुंह में चले जाते हैं , कर्म कोई मायने ही नहीं रखता। बलवान पशुओं से बचने के लिए ये कोई कर्म भी करते हैं , तो वह भाग्‍य से मिलने वाली इनकी विशेषताएं होती हैं। जैसे कि उडकर , डंसकर या भागकर ये खुद को बचा लेते हैं।

आदिम मानव का जीवन भी पशुओं की तरह ही अनिश्चितता भरा था , कर्म कोई मायने नहीं रखता था , कब किसके चंगुल में आ जाएं और प्राणों से हाथ धो बैठे कहना मुश्किल था। इन्‍हें बुद्धि की विशेषता भाग्‍य से ही मिली है , जिसके उपयोग से वह बलवान पशुओं तक को नियंत्रित कर सका। प्रकृति में मौजूद हर जड चेतन की विशेषताओं का खुद के लिए उपयोग करना सीखा , पर इसके बावजूद इसके नियंत्रण में भी सबकुछ नहीं है , भाग्‍य से लडने की विवशता आज भी बनी ही है।

क्रमश: मनुष्‍य का जीवन विकसित हुआ , पर यहां भी भाग्‍य की भूमिका बनी रही। एक बच्‍चे का भिखारी के घर तो एक अरबपति के घर में जन्‍म होता है , कोई हर सुख सुविधा में तो कोई फटेहाल जीवन जीने को विव‍श है। यदि आर्थिक स्‍तर को छोड भी दिया जाए , क्‍यूंकि अपने अपने स्‍तर पे ही जीने की सबकी आदत होती है , हर स्‍तर पर सुख या दुख से युक्‍त होने की संभावना बन सकती है। पर जन्‍म के बाद ही दो बच्‍चे में बहुत अंतर हो सकता है। एक मजबूत शरीर लेकर उत्‍साहित तो दूसरा शरीर के किसी अंग की कमी से मजबूर होता है। किसी का पालन पोषण माता पिता परिजनों के लाड प्‍यार में तो किसी को इनकी कमी भी झेलना होता है। पालन पोषण में ही वातावरण में अन्‍य विभिन्‍नता देखने को मिल सकती है।

आज प्रकृति से लडता हुआ मनुष्‍य बहुत ही विकसित अवस्‍था तक पहुंच चुका है , पर लोगों के जीवन स्‍तर के मध्‍य का फासला जितना बढता जा रहा है , भाग्‍य की भूमिका उतनी अहम् होती जा रही है। किसी व्‍यक्ति की जन्‍मजात विशेषता उसे भीड से अलग महत्‍वपूर्ण बनाने में समर्थ है , इसी प्रकार जहां संयोग के कारण एक बडी सफलता या असफलता जीवन स्‍तर में बडा परिवर्तन ला देती है , वहीं किसी प्रकार का दुर्योग लोगों को असफल जीवन जीने को बाध्‍य कर देता है। संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि हम प्रकृति की ओर से अपने वातावरण और जमाने के अनुकूल जो विशेषताएं प्राप्‍त करते हैं , वो हमारा भाग्‍य है , इसके प्रतिकूल हमारे व्‍यक्तित्‍व और वातावरण की विशेषताएं हमारा दुर्भाग्‍य कही जा सकती हैं।

शुक्रवार, 23 मार्च 2012

'ज्‍योतिष दिवस' आते जाते रहेंगे .. न ज्‍योतिष और न ही ज्‍योतिषी को सम्‍मान मिलेगा !!

कल के अखबार में पढने को मिला कि इस वर्ष से नव संवत्सर को 'विश्व ज्योतिष दिवस' के रूप में मनाया जाएगा। इसमें कुछ गलत नहीं , जीवन के हर कमजोर संदर्भ को मजबूती देने के लिए उन्‍हें वर्ष के एक एक दिन निश्चित किए गए हैं तो ज्‍योतिष के लिए तो होने ही चाहिए। भविष्‍य को जानने की उत्‍सुकता तो सबमें होती ही है , खासकर बडे स्‍तर पर पहुंचे लोगों को। जीवन आपके हाथ में कभी नहीं होता , भले ही कुछ समय तक लोगों को ऐसा भ्रम होता रहता है।


जिस दिन यह भ्रम टूटता है , उसी दिन से किसी अज्ञात शक्ति के प्रति लोगों का झुकाव बनने लगता है और लोग अंधविश्‍वास में फंसने लगते हैं। जिनका भविष्‍य अनिश्चित दिशा में जा रहा होता है , उनके लिए भविष्‍य की जानकारी फायदेमंद भी होती है। और चूंकि भविष्‍य को जानने की एकमात्र विधा ज्‍योतिष है , इसलिए जीवन में इसके महत्‍व को इंकार नहीं किया जा सकता। ज्‍योतिष ही सही जानकारी ही समाज से हर प्रकार के भ्रम का उन्‍मूलन कर अंधविश्‍वास को बढने से रोक सकती है। इसलिए इसके विकास की ओर ध्‍यान तो दिया ही जाना चाहिए।


मुझे तो ज्‍योतिष के विकास के मार्ग में सबसे बडी बाधा दिखती है , लोगों का पूर्वाग्रह ग्रस्‍त होना , चाहे वे ज्‍योतिषी हों या वैज्ञानिक , परंपरावादी हों या अधुनिक विचारधारा के लोग , सबने ज्‍योतिष को लेकर कोई न कोई भ्रम पाल रखा है। जबतक आज के वैज्ञानिक युग के अनुरूप ज्‍योतिष की व्‍याख्‍या नहीं की जाएगी , ज्‍योतिष को उपयोगी या लोकप्रिय नहीं बनाया जा सकता। जमशेदपुर, झारखंड में हुए ज्‍योतिष सम्‍मेलन में ही मेरे पिताजी श्री विद्या सागर महथा जी ने ज्‍योतिषियों से यही कहा था।

भौतिक विज्ञान में विभिन्‍न प्रकार की शक्तियों का उल्‍लेख है , हर शक्ति का शक्तिमापक ईकाई है , उसकी माप के लिए वैज्ञानिक सूत्र हैं , उपकरण हैं , अत: ये निकश्‍चत सूचना प्रदान करने में कामयाब हैं , पर फलित ज्‍योतिष के वैज्ञानिकों से पूछा जाए कि ग्रहशक्ति की तीव्रता को मापने के लिए उनके पास कौन सा वैज्ञानिक सूत्र या उपकरण हैं , तो इस प्रश्‍न का उत्‍तर ज्‍योतिषि नहीं दे सकते । और जबतक ज्‍योतिषियों के पास ग्रहों की शक्ति और उसके प्रतिफलन काल का एक प्रामाणिक सूत्र नहीं होगा , लोग इसे अनुमान मानते रहेंगे , अंधविश्‍वास मानते रहेंगे।

उन्‍होने कहा था कि इक्‍कीसवीं सदी कंप्‍यूटर की होगी , इसकी बहुआयामी विशेषताएं तो जगजाहिर हैं , पर इसकी एक विशेषता यह भी होगी कि नकली और अव्‍यवस्थित नियमों की पोल बहुत आसानी से उद्घाटित कर सकता है। ग्रहों की शक्ति के दस बीस नियमों ,कई दशा पद्धतियों के साथ ही साथ गोचर के आधार पर भविष्‍यवाणी करने में कंप्‍यूटर भी समर्थ नहीं हो सकते। क्‍योंकि आम ज्‍योतिषी तो अनुमान का सहारा ले सकता है , पर एक कंप्‍यूटर नहीं लेगा ,हमें उसे सशक्‍त आधार देना ही होगा।

ज्‍योतिष को उसकी कमजोरियों से छुटकारा दिलाने के लिए पूरे जीवन किए गए प्रयास के बाद समझ में आ ही गया कि ग्रहों की सारी शक्ति उसकी गति में है। हमें बंदूक की एक छोटी सी गोली में शक्ति दिखाई पउती है , एक पत्‍थर का टुकडा लेकर हम अपने को बलवान समझते हैं , क्‍योंकि इन्‍हें गति देकर इनसे शक्ति उत्‍सर्जित करवाया जा सकता है। पर जब ग्रहों की शक्ति ढूंढने की बारी आती है तो ज्‍योतिषी उनकी गति पर ध्‍यान न देकर स्थिति पर होता है। इसके बाद इन्‍होने ग्रहों की शक्ति के लिए सूत्र का प्रतिपादन कर पूरे देश के ज्‍योतिषियों को ज्‍योतिष के वास्‍तविक स्‍वरूप को समझाना चाहा , पर इसे स्‍वीकार करने को कोई ज्‍योतिषी तैयार नहीं थे।

शरीर ब्रह्मांड का प्रतिनिधित्‍व करता है और इसमें मौजूद ग्रंथियां ग्रहों के हिसाब से चलती हैं। इसलिए व्‍यक्ति के जीवन को निर्धारित करने में ग्रहों का हाथ है ,और इसे ज्‍योतिष के माध्‍यम से ही समझा जा सकता है।  ज्‍योतिष को विकसित बनाने के लिए जहां एक ओर ज्‍योतिषियों को इसकी समस्‍त कमजोरियों को समझकर इसे सुलझाने की जरूरत है ,वहीं दूसरी ओर वैज्ञानिकों को भी इसमें निहित सत्‍य को समझने की आवश्‍यकता है। तभी ज्‍योतिष का विकास हो सकता है , अन्‍यथा कितने 'ज्‍योतिष दिवस' आते जाते रहेंगे ,न ज्‍योतिष और न ही ज्‍योतिषी को सम्‍मान मिलेगा। समाज उन्‍हें अंधविश्‍वासी न समझे , इसलिए भीड में लोग ज्‍योतिषी से बात करने से भी कतराते रहेंगे।