रविवार, 22 दिसंबर 2013

ज्‍योतिष का अन्‍य विज्ञानों के साथ धनात्‍मक सहसंबंध आवश्‍यक ... अतिथि पोस्‍ट विद्या सागर महथा ( Astrology )


पृथ्‍वी की निरंतर गतिशीलता के कारण प्रत्‍येक दो घंटे में विभिन्‍न लग्‍नों का उदय है। इसकी दैनिक गति के कारण दिन और रात का अस्तित्‍व है, वार्षिक गति के कारण इसके ऋतु परिवर्तन का चक्र। गति के कारण ही चंद्रमा का बढता घटता स्‍वरूप है , गति के कारण विशिष्‍ट ग्रहों की पहचान है। सूर्य और चंद्र की गति के कारण ही नक्षत्रों का वर्गीकरण है , सूर्य और चंद्र का ग्रहण है। ग्रहों की गति के कारण ही संसार का नित नूतन पिरवेश है और इसी परिवर्तनशीलता के कारण इसका नाम जगत है। न्‍यूटन ने गति के सिद्धांत को समझा, तो भौतिक विज्ञान में क्रांति आ गयी। आज उन्‍ही सिद्धांतों को अधिक विकसित कर वैज्ञानिक अंतरिक्ष में अरबों मील की यात्रा करके तरह तरह की खोज करके सकुशल पृथ्‍वी पर लौट आते हैं।

सृष्टि काल के आरंभ से ही सूर्य , चंद्र और सभी ग्रहों की गति हमारे लिए आकर्शण का केन्‍द्र बने रहें। वैदिककालीन विद्याओं में यह प्रमुख विद्या थी , इसलिए इसे वेद का नेत्र कहा जाता था। उस समय से आजतक आकाशीय पिंडों की गति और स्थिति के विषय में बहुत जानकारी प्राप्‍त कर ली गयी है , सभी पिंडों की गति और परिभ्रमण पथ की इतनी सूक्ष्‍म जानकारी आज है कि आज से सैकडों वर्ष बाद के सभी ग्रहों की स्थिति , सूर्य और चंद्र ग्रहण की जानकारी मिनट सेकण्‍ड की शुद्धता के साथ दी जा सकती है। सूर्य चंद्र परिभ्रमण पथ की सम्‍यक जानकारी के कारण यह भी बताया जा सकता है कि पृथ्‍वी के किस भाग में यह ग्रहण दिखाई पडेगा। यही कारण है कि गणित ज्‍योतिष की पढाई संपूर्ण विश्‍व में हो रही है। गति की सम्‍यक जानकारी के कारण ही पंचांग में तिथि , नक्षत्र , योग , करण आदि का समुचित उल्‍लेख किया जाता है , पर फलित के मामलों में गहों की गति की उपेक्षा की गयी है। फलित ज्‍योतिष में ग्रहों की सिर्फ स्थिति पर ही विचार किया गया है , इसलिए आज तक इसके द्वारा कहा जाने वाला फल अधूरा और अनिश्चित रह गया है।

पृथ्‍वी स्‍वयं गतिशील है , दैनिक और वार्षिक गति के कारण अपने अक्ष और कक्षा में सदैव अपने को हजारो मील दूर ले जाती है। किंतु पृथ्‍वी वासी होने के कारण हमें इसकी गति का आभास भी नहीं हो पाता है , क्‍यूंकि पृथ्‍वी पर स्थित हर जड चेतन की गति पृथ्‍वी की गति के बराबर हो जाती है। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार ट्रेन पर सवार सभी व्‍यक्ति विरामावस्‍था में होते हुए भी लंबी दूरी तय कर लेते हैं। फलित ज्‍योतिष के अध्‍येता अपने को ब्रह्मांड का केन्‍द्र विंदू मानकर इसे स्थिरावस्‍था में समझते हुए ही संपूर्ण ब्रह्मांड और आकाशीय पिंडों का अध्‍ययन करता है। ब्रह्मांड में दरअसल पृथ्‍वी के साथ शेष ग्रह भी सूर्य की परिक्रमा कर रहे हैं। अत: पृथ्‍वी को विरामावस्‍था में मानने से इसके सापेक्ष सभी ग्रहों की सापेक्षिक गति की जानकारी होती है।

पृथ्‍वी सूर्य की प्रत्‍यक्ष परिक्रमा करता है , इस कारण उसके सापेक्ष सूर्य की समरूप गति को हम देख पाते हैं , चंद्रमा को भी पृथ्‍वी की प्रत्‍यक्ष परिक्रमा करते हुए देखा जा सकता है। भचक्र में ये दोनो ग्रह लगभग समरूप गति में होते हैं। सूर्य कभी उत्‍तरायण तो कभी दक्षिणायण होता है , उसके हिसाब से विभिन्‍न ऋतुएं होती हैं , विभिन्‍न नक्षत्रों से गुजरता है तो उसके अनुरूप उसका फल होता है। चंद्रमा के प्रकाशमान भाग के अनुरूप ही जातक की मनोवैज्ञानिक शक्ति होती है । किसी निश्चित तिथि को सूर्य आकाश के एक निश्चित भाग में ही होता है , पर उस दिन जन्‍म लेने वाले समस्‍त जातकों की कुंडली में विभिन्‍न भावों में दर्ज किया जाता है। उसका फल भी भिन्‍न भिन्‍न जातकों के लिए अलग अलग होता है।

आकाश में शेष ग्रहों का पृथ्‍वी से अप्रत्‍यक्ष गत्‍यात्‍मक संबंध है। यानि की सौरमंडल में अन्‍य सभी ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हुए कभी पृथ्‍वी की ओर आ जाते हैं , तो कभी पृथ्‍वी के विपरीत दिशा में। इसके कारण पृथ्‍वी से विभिन्‍न ग्रहों की दूरी और सापेक्षिक गति बढती घटती है। पृथ्‍वी के सापेक्ष कभी कभी ग्रहों की गति ऋणात्‍मक भी हो जाती है। ‘गणित ज्‍योतिष’ में इसकी विशद चर्चा है , पर ‘फलित ज्‍योतिष’ का अध्‍ययन करते वक्‍त आज तक ग्रहों की इस गति को नजरअंदाज कर दिय गया , जो ग्रहों के बलाबल का सही आधार है। यह विडंबना ही है कि बंदूक की छोटी सी गोली में उसकी शक्ति का अनुमान उसकी गति के कारण हम सहज ही कर लेते हैं। हथेली पर एक छोटा सा पत्‍थर का टुकडा रखकर अपने को बलवान समझते हैं , क्‍यंकि उसे गति देकर शक्ति उत्‍सर्जित की जा सकती है , पर हजारो मील प्रतिघंटा की गति वाले भीमकाय ग्रहों की शक्ति को आज तक ज्‍योतिषी इसकी स्थिति में ढूंढते आ रहे हें। जाने अनजाने ग्रहों की गति के रहस्‍य को नहीं समझ पाने से फलित ज्‍योतिष की गति स्‍वत: अवरूद्ध हो गयी। यही करण है कि हजारो वर्षों से इसकी स्थिति यथावत बनी हुई है और लोग इसे अनुमान शास्‍त्र कहने लगे हैं।

प्रकृति के नियम बहुत ही सरल होते हैं , एक दो प्रतिशत ही अपवाद होते हैं,पर इसे समझने में हमें बहुत समय लग जाता है। फलित ज्‍योतिष की पुस्‍तकों में ग्रह शक्ति के निर्धारण के लिए बहुत सारे नियम हैं। स्‍थान बल , काल बल , दिक बल , नैसर्गिक बल , चेष्‍टा बल , अंश बल , योग कारक बल , पक्ष बल , अयन बल , स्‍थान बल के अलावे भी ष्‍डवर्ग अष्‍टकवर्ग आदि आदि। इसका अभिप्राय यह है कि हमारे .षि मुनि पूर्व ज्‍योतिषियों ने ग्रह शक्ति को समझने की चुनौती को स्‍वीकार किया था। इस परिप्रेक्ष्‍य में उनके द्वारा बहुआयामी प्रयास किया गया , इस लिए ग्रहशक्ति से संबंधित इतने नियम हैं , किंतु व्‍यवहारिक दृष्टि से एक ज्‍योतिषी इतने नियमों को आतमसात करते हुए तल्‍लीन रहकर भविष्‍य कथन नहीं कर सकता। इतने नियमों के मध्‍य विभिन्‍न ज्‍योतिषियों के फलकथन में एकरूपता की बात हो ही नहीं सकती। ज्‍योतिष के इन जटिल सूत्रों ने ग्रह फल कथन में ज्‍योतिषियों के निष्‍कर्ष में विरूपता पैदा कर इसके वैज्ञानिक स्‍वरूप को नष्‍ट करते हुए इसे अनुमान शास्‍त्र बना दिया है। इन उलझनों से बचने के लिए एकमात्र उपाय ग्रहों की गतिज और स्‍थैतिज ऊर्जा का सहरा लेना समीचीन सिद्ध हुआ है। फलित ज्‍योतिष में अन्‍य नियमों की तरह ये नियम भी ग्रह शक्ति निर्धारण के लिए एक नया प्रयोग नहीं है। सन् 1981 से अबतक चालीस पचास हजार कुंडलियों में किए गए प्रयोग का निचोड निष्‍कर्ष है।

फलित ज्‍योतिष सबसे पुरानी विधाओं में एक वैदिककालीन विद्या है। किंतु भौतिक विज्ञान में वर्णित न्‍यूटन के गति के सिद्धांत का आविष्‍कार सन् 1887 में हुआ , इससे पूर्व ज्‍योतिष में इसका उपयोग संभव नहीं था। पर उसके बाद इसका उपयोग फलित ज्‍योतिष के क्षेत्र में भी होना चाहिए था , क्‍यूंकि किसी भी विज्ञान का विकास विकसित विज्ञान के साथ सहसंबंध बनाकर ही होता है। अगर हम फलित ज्‍योतिष को विज्ञान बनाना चाहते हैं तो हमें भौतिक विज्ञान में वर्णित गतिज और स्‍थैतिज ऊर्जा का सहारा लेना , उसका उपयोग करना एक स्‍वस्‍थ दृष्टिकोण होगा। ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ में ग्रहों की गति की विशद व्‍याख्‍या करते हुए इसकी विभिन्‍न प्रकार की गतियों का सपष्‍ट भिन्‍न भिन्‍न प्रभाव मानव जाति पर कैसे पडता है , का अध्‍ययन किया गया है।

मेरे पिताजी विद्या सागर महथा जी के द्वारा लिखा गया 

गुरुवार, 16 मई 2013

सॉफ्टवेयर को अपग्रेड करने में कल मिली एक बडी सफलता ( Astrology )

अभी तक एक स्‍वर से गणित ज्‍योतिष को विज्ञान स्‍वीकार किए जाने के बावजूद इसी पर आधारित फलित पक्ष पर हमेशा वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वालों के द्वारा सवालिया निशान लगाया जाता रहा है। 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' ने इसे चुनौतीपूर्ण ढंग से लेते हुए इस शास्‍त्र को भी वस्‍तुपरक बनाने का पूरा प्रयास किया है। इस चिट्ठे को नियमित तौर पर पढने वालों को मालूम हो ही गया होगा कि ग्रहों के प्रभाव की इस नई गत्‍यात्‍मक खोज के बाद किसी भी व्‍यक्ति के जन्‍म कालीन ग्रहों के आधार पर उसके पूरे जीवन के उतार चढाव का चिंत्र खींचा जा सकता है। लगभग 40 से 50 हजार लोगों की जन्‍मकुंडली में इस ग्राफ की सटीकता को देखा गया , इस पोस्‍ट में कुछ महत्‍वपूर्ण लोगों के जन्‍मकालीन ग्रहों पर आधारित जीवन ग्राफ की चर्चा हुई है , जिसमें देखा जा सकता है कि उनके जीवन में परिस्थितियों का उतार चढाव इस ग्राफ के सापेक्ष ही रहा। इसी तरह हमारा सॉफ्टवेयर एक पाई चार्ट भी तैयार करता है , जिससे मालूम होता है कि पूरे जीवन आपके जीवन के विभिन्‍न संदर्भों का सुख दुख किस किस अनुपात में होगा। पर इस तरह के ग्राफ को देखने से यह स्‍पष्‍ट तो होता है कि किसी के जीवन में आनेवाला समय धनात्‍मक होगा या ऋणात्‍मक , पर यह स्‍पष्‍ट नहीं हो पाता कि जीवन में उतार या चढाव किन किन संदर्भों को लेकर होगा।

वस्‍तु परक ढंग से इसे समझाने के लिए मेरे पिताजी श्री विद्या सागर महथा जी ने भी कई तरह के प्रयोग किए , जिसमें बीस पच्‍चीस वर्ष पूर्व उनके द्वारा बनायी जाने वाली हस्‍त लिखित जन्‍म कुंडली में बनाया गया एक चार्ट सबसे महत्‍वपूर्ण था ....
इस चार्ट में एक ओर जीवन के विभिन्‍न संदर्भों का उल्‍लेख है तो दूसरी ओर जीवन के विभिन्‍न आयु वर्ग का भी। किस आयु वर्ग में किसी व्‍यक्ति के जीवन का कौन सा संदर्भ किस स्थिति में रहेगा , इसको उससे संबंधित खाने में भरा गया है।  A > B > C > D का चिन्‍ह बतलाता है कि जिस खाने में D लिखा हो उसे कार्यक्षमता , महात्‍वाकांक्षा , उत्‍तरदायित्‍व का बोध और स्‍तर के हिसाब से कमजोर और जिस खाने में A लिखा हो उसे  कार्यक्षमता , महात्‍वाकांक्षा , उत्‍तरदायित्‍व का बोध और स्‍तर के हिसाब से मजबूत समझा जाना चाहिए। इसी प्रकार + ऊंचे मनोबल के लिए तथा - मनोबल की गिरावट के लिए लिखा गया है। + और - में जितना अधिक पावर है , उस उम्र और उस संदर्भ में किसी का मनोबल उतना ही बढा या घटा हुआ होगा। इसी प्रकार दो तीन और चिन्‍ह के लिए भी अलग अलग अर्थ हैं , जिन्‍हें पाठक देख सकते हैं।

पिछले दस वर्षों से मैं नियमित तौर पर अपने पिताजी के 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के सभी सिद्धांतों को कंप्‍यूटराइज्‍ड कर कंप्‍यूटर से अलग अलग प्रकार के फल लेने की कोशिश करती आ रही हूं। काफी दिनों से मेरी भी इच्‍छा एक ऐसा ही चार्ट बनाने की थी , जिसमें अलग अलग आयु में लोगों के अलग अलग प्रकार के सुख और दुख को स्‍पष्‍टत: बताया जा सके। सहारा तो हमें इसी सूत्र का लेना था , पर परिणाम शब्‍दों में निकालना था। तीन महीने तक 84 खानों में अलग अलग सटीक परिणाम लाने के प्रयास में गंभीर मशक्‍कत होनी ही थी , पर इसके बाद कल मिली सफलता से मैं खुद ही चौंक गयी, जब मेरे सॉफ्टवेयर ने एक जन्‍मविवरण से इस तरह का पन्‍ना निकाला ........

उम्र के जिस जिस भाग में उन्‍हें जिस जिस प्रकार की सफलताएं और असफलताएं मिली , इसका सटीक उल्‍लेख इस एक पन्‍ने में मिल जाता है , वैसे तो इस खोज का सारा श्रेय मेरे पिताजी को ही जाता है , पर मैं कंप्‍यूटर की थोडी जानकारी रखते हुए अपने सॉफ्टवेयर में सटीक परिणाम ले आती हूं तो वह भी कम बडी उपलब्धि नहीं। 

शनिवार, 11 मई 2013

अंधविश्‍वास , आस्‍था और विज्ञान

वह विश्‍वास जो तर्क की कसौटी पर खरा नहीं उतरता , हम अंधविश्‍वास कहते हैं , अंधविश्‍वास से स्‍वस्‍थ समाज का निर्माण नहीं हो सकता । कभी कभी अंधविश्‍वास समाज में व्‍यापक रूप से व्‍याप्‍त रहता है । इससे जनसमुदाय को बडा नुकसान होता है। स्‍वस्‍थ समाज के विकास क्रम में बहुत सारी बाधाएं होती हैं । अंधविश्‍वास का लाभ चंद ऐसे लोगों को मिलता है , जो बहुत ही धूर्त्‍त होते हैं । अंधविश्‍वास परिवार , समाज या राष्‍ट्र को तोडता है , आदमी से आदमी को अलग करता है। अपेक्षाकृत कम बुद्धिवाले या संकीर्ण बुद्धि वाले इससे प्रभावित होते हैं। बुद्धिजीवी के लिए यह कष्‍टकर होता है , भगवान चम्‍मच से दूध पी रहे हैं , इन्‍हें दूध पिलाओ , पूरा संसार एक ही दिन में करोडों चम्‍मच का उपयोग करते हुए भगवान को दूध पिलाया। यह अंधविश्‍वास है , भगवान निश्चित रूप से आस्‍था का विषय हैं , लेकिन वे दूध पी रहे हैं , यह अंधविश्‍वास है। अंधविश्‍वास बहुत समय तक जीवित नहीं रहता या टिकाऊ नहीं होता।

आस्‍था वह विसवास है , जिससे सदा सर्वदा हमारा मन स्‍वीकार करता है ,, लेकिन जिसे हम प्रमाणित करने में कठिनाई महसूस करते हैं , पृथ्‍वी की बडी से बडी आबादी यह स्‍वीकार करती है , कि भगवान हैं। हममें तुममें खड्ग ख्‍ंभ में भगवान हैं , उसकी अभिव्‍यक्ति के लिए इसके स्‍वरूप और चरित्र चिंत्रण में अनेकानेक कथाओं को सहारा लेते हैं। हरि अनंत हरि कथा अनंता। उनके निवास के लिए मंदिर मस्जिद , गि‍रजाघर और गुरूद्वारे का निर्माण करते हैं। हर व्‍यक्ति अपनी अपनी भावना के अनुसार उनके दर्शन करते हैं। कोई राम कोई मुहम्‍मद पैगंबर , कोई ईसा मसीह को मानते हैं। इस प्रकार जाकि रहे भावना जैसी , प्रभु मूरत देखी तिन तैसी । लेकिन भवनों के निर्माण में या उनके स्‍वरूप के निर्धारण में पूरी आबादी में एकता का अभाव है।

वैज्ञानिकों के देखने का नजरिया कुछ भिन्‍न होता है , वे संपूर्ण ब्रह्मांड, आकाशीय पिंडों , पृ;थ्‍वी , अनु परमाणु , इलेक्‍ट्रोन , प्रोट्रोन , न्‍यूट्रॉन , गॉड पार्टिकल के रूप में इसे स्‍वीकारण्‍ करते हैं। जिससे सारे विश्‍व का निर्माण हुआ , यह सर्वत्र व्‍याप्‍त है , शाष्‍वत है , अक्षुण्‍ण है , हर काल में मौजूद है । कभी नश्‍वर नहीं होता। हम सौर परिवार में रहते हैं। इसमें स्थित सारे ग्रह उपग्रह निरंतर गतिशील हैं , पृथ्‍वी में रहनेवाले हर व्‍यक्ति की जन्‍मकुंडली बन सकती है। जन्‍म कालीन ग्रहों की गति और स्थिति से हर व्‍यक्ति विभिन्‍न शक्तियों और स्‍वभाव से संयुक्‍त है। उसकी कार्यशैली संसाधन और गंतब्‍य भिन्‍न भिन्‍न हो सकते हैं , किंतु एक ही सृष्टि होने की वजह से एक दूसरे का पूरक होना उसका सर्वोत्‍तम उपयोग है।

सभ्‍य सुशिक्षित समाज के विकास क्रम में पहले अंधविश्‍वास , फिर आस्‍था और अंत में विज्ञान आता है। जबतक व्‍यक्ति वैज्ञानिक सोंच विचार का अध्‍ययन मनन नहीं करेगा , अंधविश्‍वास को दूर नहीं भगा सकता। आस्‍था के विषय को भी सही ढंग से प्रमाणित नहीं कर पाएगा। अनपढ गंवार वृद्ध बुढिया एक पढी लंबी रेखा के नीचे अनगिनत रेखाएं खींचकर राम लक्ष्‍मण सीता नामक आस्‍था के तीन शब्‍दों से परीक्षार्थियों का रिजल्‍ट पहले ही बताने की चेष्‍टा करती थी। भविष्‍य को समझने और समझाने की यह चेष्‍टा उसकी बुद्धि के अनुसार हो सकती है , लेकिन बुद्धिजीवी इसे कदापि स्‍वीकार नहीं करेंगे , एक ही व्‍यक्ति के लिए इसका प्रयोग अनेक बार करने से एक ही निष्‍कर्ष नहीं निकलेगा। तोते से भाग्‍य की पत्र निकालना रेलवे स्‍टेशन में मशीन से वजन कराने के समय प्राप्‍त वजन टिकट पर लिखा भविष्‍य भी विश्‍वसनीय नहीं है। सप्‍ताह के दिन और पक्ष के तिथियों के अनुसार यात्रा , बाल कटवाना या दाढी बनवाना भी अंधविश्‍वास है। पुस्‍तकों में बहुत सारी बातें लिखि गयी हैं , जो तर्क की कसौटी पर खरी नहीं उतरती हैं। इसमें उलझकर व्‍यक्ति का समय बर्वाद होता है , इसके करने या न करने के अपराध बोध से मन विचलित होता है। हम सुख का अनुभव नहीं कर पाते और अधिकांश समय अज्ञात भय से ग्रसित होते हैं। तर्क की दृष्टि से , संभावनावाद की दृष्टि अभी तक विज्ञान नहीं बन सके हैं।

विज्ञान विश्‍व को जोडता है , हिंदू , मुस्लिम सिक्‍ख ईसाई में कोई भेद उत्‍पन्‍न नहीं करता , सभी का खून एक जैसा होता है। एक ग्रुप का खून सबके शरीर में एक जैसा काम करेंगा। अस्‍वस्‍थ होने पर सबकी दवाएं एक ही ढंग से काम करती हैं , एक ही तरह का इलाज है , सब उसी बडी शक्ति की उपज हैं। सभी के साथ ग्रह नक्षत्र एक जैसा ही काम करता है। प्रकृति के रहस्‍य को समझने के लिए निरंतर वैज्ञानिक सोंच की जरूरत है , प्रकृति में अनगिनत या अनंत रहस्‍य छिपे हुए हैं। हर सत्‍य को उजागर करने के लिए एक नई सोंच की जरूरत है। लेकिन यह कोई जरूरी नहीं कि एक ही वैज्ञानिक विज्ञान के हर क्षेत्र में एक ही साथ निपुणता प्रापत कर ले , हर वैज्ञानिक को एक ही साथ प्रकृति का हर रहस्‍य दिखाई दे।

अणु परमाणु , इलेक्‍ट्रोन प्रोट्रोन न्‍यूट्रोन , गॉड पार्टिकल्‍स जैसे सूक्ष्‍मातिसूक्ष्‍म तत्‍वों के गुण स्‍वभाव को समझने वाले वैज्ञानिक समुदाय को भी अजतक विशालकाय त्‍वरित तीव्रगामी ग्रहों के मानव जीवन पर पडनेवाले प्रभाव और गुण दोष को समझने में भी विलंब हो गया है। आजतक ग्रहों के प्रभाव को अंधविश्‍वास समझा जाता रहा है। जिस बडी आबादी को इसके प्रभाव के प्रति जबर्दस्‍त आस्‍था है , वे ज्‍योतिष प्रेमी यहां तक की ज्‍योतिष को समझनेवाले ज्‍योतिषी भी इसे विज्ञान सिद्ध नहीं कर पाए। इसमें अगर वैज्ञानिकों ने इसे विज्ञान नहीं माना तो इसमें उनका भी कसूर क्‍या है ?

जहां तक मेरी सोंच है , विकास क्रम में अकस्‍मात विज्ञान का आगमन नहीं होता , पृथ्‍वी के बने अरबों वर्ष हो चुके , किंतु सभ्‍यता के विकास का सबूत कुछ हजार वर्षों से ही दिखाई पड रहा है। विज्ञान का जोरदार आगमन दो तीन सौ वर्षों से ही दिखाई पड रहा है। मुख्‍यत: विगत सौ दो सौ वर्षों में ही आधुनिक विज्ञान का विकास हुआ है।

संपूर्ण ब्रह्मांड विराट ऊर्जा पुंज है। यही सर्वोच्‍च सत्‍ता या भगवान है। ऊर्जा सदैव नापतौल के हिसाब से शाष्‍वत और अक्षुण्‍ण बनी रहती है , यह रूपांतरित हो सकती है , पर नष्‍ट नहीं हो सकती। पृथ्‍वी सहित इसके संपूर्ण जड चेतन इसकी उपज है। विभिन्‍न गति और स्थिति के कारण ही सारे प्राणियों का अस्त्तिव भिन्‍न भिन्‍न गुण दोषों से संयुक्‍त होता है। एक दूसरे से अलग होता हुआ प्रतीत होता है। पृथ्‍वी सौर िपरिवार का सदस्‍य है , सूर्य की परिक्रमा करने वाले हर ग्रह उपग्रह जो विभिन्‍न सापेक्षिक गतियों के कारण अपरिमित ऊर्जा उत्‍सर्जित करते हैं , उससे पृथ्‍ववी प्रभावित होती है। इसमें स्थितजड चेतन समस्‍त प्राणी प्रभावित होते हें। मनुष्‍य विभिन्‍न शक्तियों से निर्मित विश्‍व का सर्वश्रेष्‍ठ प्राणी है , इसमें सोच विचार करने की अद्भुत क्षमता होती है , अगर वह अपनी शक्तियों का सदुपयोग करे तो हिमालय से ऊंचा और प्रशांत महासागर से गहरा सोंच मानव कल्‍याण के लिए प्रस्‍तुत कर सकता है।

उल्लिखित तथ्‍यों को समझने के लिए विज्ञान विशेषकर भौतक विज्ञान को समझना बहुत जरूरी है , क्‍योंकि विज्ञान की इस शाखा में ही ऊर्जा की संपूर्ण विशेषताओं का उल्‍लेख है। आम आदमी न तो विज्ञान की परिभाषा से परिचित है और न इन्‍हें विज्ञान का अध्‍ययन करने का मोका मिलता है। ऐसी परिस्थिति में वह कैसे कह सकता है कि उसकी अभिव्‍यक्ति वैज्ञानिकता से परिपूर्ण है।

मनुष्‍य के विकास क्रम में लडकपन , जवानी और वृद्धावस्‍था सम्मिलित है। अत: भूत वर्तमान और भविष्‍य तीनों कालों का वर्गीकरण को हर कोई समझता है , भूत वर्तमान का , और वर्तमान भविष्‍य का आधार है। भूत से वर्तमान तक का रास्‍ता स्‍पष्‍टत: दिखाई पडता है , जिधर से हम आ रहे होते हैं। वर्तमान में हम सदैव चौराहे पर खडे होते हैं , जहां से सही रास्‍ते का चयन करना सर्वाधिक कठिन होता है , क्‍योंकि पृथ्‍वी में मानव सर्वधिक विकसित प्राणी है। अन्‍य जीव जंतुओं के साथ इतनी कठिन परिस्थितियां नहीं होती हैं। वर्तमान से भविष्‍य की ओर कदम रखने के लिए हजारो विकल्‍प होते हैं। अत: पग पग पर दूरदृष्टि रखने वले अनुभवी लोगों के दिशा निर्देश की जरूरत महसूस होती है। पर हर जगह सूझ बूझ , अनुभवी दूर दृष्टि रखनेवाले व्‍यक्ति नहीं होते। भविष्‍य को समझने के लिए गत्‍यात्‍मक फलित ज्‍योतिष श्रेष्‍ठतम वैज्ञानिक विधा है।

भूत वर्तमान और भविष्‍य तीनों कालों का वर्गीकरण को हर कोई समझता है , भूत वर्तमान का , और वर्तमान भविष्‍य का आधार है। भूत से वर्तमान तक का रास्‍ता स्‍पष्‍टत: दिखाई पडता है , जिधर से हम आ रहे होते हैं। वर्तमान में हम सदैव चौराहे पर खडे होते हैं , जहां से सही रास्‍ते का चयन करना सर्वाधिक कठिन होता है , क्‍योंकि वर्तमान से भविष्‍य की ओर कदम रखने के लिए हजारो विकल्‍प होते हैं। अत: पग पग पर दूरदृष्टि रखने वले अनुभवी लोगों के दिशा निर्देश की जरूरत महसूस होती है। पर हर जगह सूझ बूझ , अनुभवी दूर दृष्टि रखनेवाले व्‍यक्ति नहीं होते। भविष्‍य को समझने के लिए गत्‍यात्‍मक फलित ज्‍योतिष श्रेष्‍ठतम वैज्ञानिक विधा है।

(मेरे पिताजी श्री विद्या सागर महथा जी के द्वारा लिखा गया )

गुरुवार, 9 मई 2013

हमारे सॉफ्टवेयर के आधार पर बने कुछ महत्‍वपूर्ण लोगों के जीवनग्राफ

मेरे ब्‍लॉग में और फेसबुक में अनेक बार जीवन ग्राफ शब्‍द की चर्चा हुई है .. शायद ही लोग जानते होंगे कि 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के सूत्रों के आधार पर किसी के जन्‍मकालीन ग्रहों को देखकर किसी के पूरे के उतार चढाव का लेखा चित्र ख्‍ींचा जा सकता है ... जीवन ग्राफ के अनुसार ही या तो हम आराम से सफलता प्राप्‍त करते हैं या कठिन श्रम से सफलता या कठिन श्रम के बाद भी असफलता या फिर निराशाजनक वातावरण में जीने को बाध्‍य होते हैं .... कभी परिस्थितियां हमारे नियंत्रण में होती हैं तो कभी हम परिस्थितियों के नियंत्रण में ... मेरे सॉफ्टवेयर ने कुछ महत्‍वपूर्ण लोगों का जीवन ग्राफ निकाला है ... इस लेख में कुछ उदाहरणों द्वारा स्‍पष्‍ट किया जा रहा है ...



यह फिल्‍म स्‍टार संजय दत्‍त का जीवन ग्राफ है ... बचपन में मां की मृत्‍यु के उपरांत इनका 1983 तक का समय बहुत कठिनाईपूर्ण व्‍यतीत हुआ , उसके बाद 1989 तक आरामदायक जीवन था , पर 1989 के बाद से ही ग्राफ ने मोड लिया , 1995 के बाद किए जाने वाले मेहनत के बाद भी 2001 के आसपास का समय असफलतापूर्ण बना रहा , पर उसके बाद कानूनी शिकंजे में कुछ ढील मिली , इन्‍हें काम करने का वातावरण और 2007 से 2013 तक का समय तो जीवन के सर्वाधिक सफलता का समय बना रहा।। 2013 में अचानक कानूनी शिकंजा कुछ तेज हो गया है , ग्राफ के हिसाब से भी आगे समय सही नहीं दिखता।

यह फिल्‍म स्‍टार अमिताभ बच्‍चन का जीवन ग्राफ है .. ये भी 1966 तक के जीवन को काफी सुखद नहीं मानते , परिस्थितियों की कुछ कठिनाई हो न हो स्‍वभाव के अतर्मुखी थे और उनके बाद में इतने बडे स्‍टार बन जाने की बात कोई नहीं सोंच सकता था , पर हम देख सकते हैं कि उसके बाद इनका पूरे जीवन ग्राफ सकारात्‍मक रहा और 2014 तक निरंतर काम का वातावरण और सफलता मिलती गई , 2006 से स्‍वास्‍थ्‍य को लेकर यदा कदा परेशानी आती रही है वो 2014 के बाद बढ सकती है , क्‍योंकि 2014 के बाद इनके जीवन ग्राफ में ऋणात्‍मकता है।


यह बिहार के मुख्‍य मंत्री लालू प्रसाद यादव का जीवन ग्राफ है .. बचपन से कमजोर परिस्थितियों के साथ आरंभ होने वाली जीवन यात्रा 1978 तक बहुत ही अच्‍छी बन गयी , जहां छात्र नेता के रूप में इनका व्‍यक्तित्‍व महत्‍वपूर्ण था , पर उसके बाद काम का वातावरण मिलने के बावजूद स्‍तर के बावजूद 1990 तक बडी सफलता नहीं दिख सकी , 1990 से 2002 तक ग्राफ के उत्‍तरोत्‍तर विकास के साथ मुख्‍यमंत्री के तौर पर ये महत्‍वपूर्ण बने रहें , 2002 के बाद ग्राफ में गिरावट के साथ ही इन्के सम्‍मुख कुछ न कुछ कठिनाई उपस्थित होनी आरंभ हुई और 2008 के बाद असफलता का क्रम 2014 तक किसी न किसी रूप में मौजूद रहा । 2014 में पुन: परिस्थितियों में कुछ सुधार की गुंजाइश है। 


यह मेनका गांधी का जीवन ग्राफ है .... जन्‍म से 1974 तक सुखद माहौल में पालन पोषण और व्‍यक्तित्‍व का संपूर्ण विकास प्राप्‍त करने के बाद इनका परिस्थितियों से नियंत्रण कमजोर दिखने लगा है , किस तरह की ऋणात्‍मक वातावरण को झेल रही थी , उनकी मन:स्थिति के बारे में तो मैं नहीं बता सकती , पर 1980 के बाद की परिस्थिति तो उनके ग्राफ के सत्‍य को बयान कर ही देती है। उनके साथ जो हुआ वह 1986 तक उन्‍हें निराश करने के लिए काफी था। 1986 के बाद वो निरंतर काम कर अपने महत्‍व को स्‍थापित करती जा रही है , पर 2010 तक का समय बडी सफलता का नहीं दिख रहा। 2016 के बाद कुछ अच्‍छी उम्‍मीद रखी जा सकती है।


यह फिल्‍म स्‍टार सलमान खान का जीवन ग्राफ है , 2007 के आसपास के कुछ वर्षों को छोड दिया जाए तो 1989 से 2019 तक ग्राफ सकारात्‍मक ही दिख रहा है , निरंतर सफलता की सीढियां चढते जा रहे हैं , 2019 के बाद ही इनके जीवन में कुछ बाधाएं आ सकती हैं , जो 2025 के बाद बडा रूप ले लें।


यह गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष के जनक मेरे पिताजी श्री विद्या सागर महथा जी का जीवन ग्राफ है .. जैसा कि ग्राफ की शुरूआत निम्‍न स्‍तर से हुई है , बचपन में हुए चेचक ने न सिर्फ छह महीने बिस्‍तर पर रहने मजबूर और शरीर को कुछ दिनों के लिए कमजोर किया , वरन् पूरे जीवन के लिए चेहरे पर चेचक के दाग दे दिया , पर क्रमश: बढते हुए ग्राफ ने इन्‍हें समाज में मेधावी छात्र के तौर पर स्‍थापित किया और 1963 तक की जीवनयात्रा एक विद्यार्थी के तौर पर बहुत अच्‍छी रही। पर 1963 के बाद जैसे ही ग्राफ में गिरावट आरंभ हुई , कैरियर में हर जगह असफलता ही हाथ आयी , 1969 तक निराशा के भंवर में डूबने उतराने के बाद उन्‍होने गंभीरता से प्रकृति के उस रहस्‍य को समझने की चेष्‍टा की , जिसके कारण इतने प्रतिभाशाली होते हुए भी वे ढंग की नौकरी न प्राप्‍त कर सके। छह वर्षों तक तरह तरह की ज्‍योतिष की पुस्‍तकों में बिखरे पडे ज्‍योतिषीय तथ्‍यों के परत दर परत खोलते हुए उनके सामने 1975 तक सचमुच एक रहस्‍य सामने आया , उसके बाद तो ग्रहों के प्रभाव के एक एक रहस्‍य की गुत्‍थी सुलझती चली गई। 1981 के बाद प्रायोगिक तौर पर काम आरंभ हुआ और निरंतर चल रहा है। 

यह ग्राफ  उ०  प० के मुख्य मंत्री अखिलेश यादव की है, २०१५ तक अनायास सफलता प्राप्ति का ग्राफ दिख रहा है ,  .... 

यह ग्राफ क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी का है , २०११ तक आसान सफलता के बाद गंभीरता बढ़ी है …… 


यह ग्राफ बॉलीवुड की महान अदाकारा हेमा मालिनी जी का है ....... 

यह ग्राफ जैकी श्रॉफ को तब दिया गया था , जब लगातार उनकी हर फिल्म हिट हो रही थी .... 

यह ग्राफ संसद मनोज तिवारी का है.... 


यह ग्राफ शबाना आजमी जी का है ....... 


यह ग्राफ वरुण गांधी का है ................... 









यह ग्राफ पूरे आसमान में मौजूद सारे ग्रहों के चित्र को देखकर बनाया जाता है , अबतक 40,000 से ऊपर कुंडलियों में इसकी जांच हो चुकी है , विरले ही कहीं अपवाद नजर आया हो। इस खोज के बाद एक बात स्‍पष्‍ट हुई है कि आज के समाज की जो जीवनशैली है , वह प्राकृतिक तौर पर सही नहीं है , हमें अपनी जीवनशैली अपनी सोंच बदलनी होगी। 

पूरे ब्रह्मांड में बनते रहते हैं सुंदर सुंदर दृश्‍य .....

जिस तरह पृथ्‍वी में सुंदर दृश्‍यों की कमी नहीं , वैसे ही पूरे ब्रह्मांड में भी बनते रहते हैं। हमारा ब्रह्मांड करोड़ों निहारिकाओं के समूह से भरा हुआ है। आसमान में अक्‍सर इनकी विभिन्‍न गतियों के कारण सुंदर दृश्‍य बनते हैं। कभी कभी इनमें से किसी एक को आधी रात के आकाश में धुंधले बादल के रूप में देख सकते हैं। टेलीस्कोप से देखने पर यह बैलगाड़ी के चक्के के समान दिखाई देती है। कोरी आंखों से जरा ध्यान से देखना होता है। अन्‍य ग्रहों , उपग्रहों और नक्षत्रों की चाल और विशेषताओं के फलस्‍वरूप सौरमंडल के अंदर और सौरमंडल के बाहर और धरती से सटे आसमान में दिखाई देने वाले आकाश के ऐसे प्राकृतिक सुंदर दृश्‍यों को नासा कैमरे में कैद कर अपनी वेबसाइट पर डाल दिया करता है। इंटरनेट में मौजूद आसमान के इन सुंदर दृश्‍यों के साथ साथ नासा के आसमान में किए गए क्रियाकलापों के कुछ कृत्रिम सुंदर दृश्‍यों को भी इस पृष्‍ठ पर देखा जा सकता है। शायद आपको याद होगा , इस लेख में भी कुछ चित्रों को आपके सामने रखा गया था , मैं तो इन्‍हे नियमित देखती हूं , आप भी आनंद लिया कीजिए। कुछ खास चित्र यहां भी दिए जा रहे हैं .................








दिए जा रहे हैं .....

शनिवार, 4 मई 2013

फिलहाल किसी क्रांति की कोई संभावना नहीं मुझे तो नहीं दिखती ..



आज निम्न  वर्गीय परिवारों के बच्चों को खाना , कपडा , मकान , सायकल और जरूरत की अन्य चीजें मुफ्त मिल रही है .. जो उनके माता पिता को दिनभर कडी मेहनत के बाद भी नहीं मिल पाती थी ... वे इस व्यवस्था में क्या खामी देखेंगे ??
मध्यमवर्गीय परिवार के बच्चों  को प्रतियोगिता और मल्टीनेशनल कंपनी की नौकरी के दायित्वों तले उलझा दिया गया है .. भले ही महानगर में रहने की बाध्यता तले उनके पैसे न बच पाए .. पर बडी बडी सेलरी को देखने के बाद वे इस व्यवस्था में क्या खामी देखेंगे ??
उच्च वर्गीय परिवारों के बच्चे भी अपनी कंपनी को चुंबकीय बनाने के लिए ऐसी ऐसी ट्रेनिंग लेने में व्यस्‍त है .. जो पूरे बाजार में बिखरे पडे पैसो को अपनी ओर खींच सके .. इसकी पूरी सुविधा होने से वे इस व्यवस्था में क्या खामी देखेंगे ??
इसके अलावा सरकारी तंत्र के लोगों ने इसे सीमा से अधिक भ्रष्‍ट कर दिया है ... अपने अधिकारों का नाजायज फायदा उठाकर अपनी संतानों को कई पीढी तक नालायक बनाने की पूरी व्‍यवस्‍था कर चुके हैं .. उनकी संताने भी इस व्‍यवस्‍था में क्‍या खामी देखेंगी ??
 इस व्यवस्था में खामी को दूर करने की हमारी सोंच तभी कामयाब हो सकती है ... जब हम दूसरे की तकलीफ को अपनी तकलीफ समझें .. पर किसी भी वर्ग के नवयुवकों के पास खुद के सिवा दूसरों की समस्‍या  के लिए सोंचने का वक्त नहीं .... अब इस स्वा‍र्थपूर्ण माहौल में भारतवर्ष में हाल फिलहाल में किसी क्रांति की कोई संभावना नहीं मुझे तो नहीं दिखती  ..

गुरुवार, 2 मई 2013

रांची कॉलेज , रांची के भूतपूर्व प्राचार्य डॉ बी एन पांडेय जी के द्वारा मेरी पुस्‍तक के लिए लिखा गया प्राक्‍कथन ( Astrology )



सूर्यादि ग्रहों तथा अश्विन्‍यादि नक्षत्रों के गणित तथा फलित का वर्णन विवेचन करने वाले शास्‍त्र की अभिद्दा ज्‍योतिष है। वेद के छठे अंग ( अनुक्रमत शिक्षा , कल्‍प , व्‍याकरण , तिरूक्‍त , छंद और ज्‍योतिष ) के रूप में ज्‍योतिष विद्या की प्राचीनता एवं महत्‍व निर्विवाद है। वेदांगों के बिना वेदों का सम्‍यक अध्‍ययन तथा उनके द्वारा अनुदेशित आचरणों के अनुरूप जीवनचर्या ढालकर ऊर्घ्‍वगामिता सिद्ध नहीं हो सकती। वेदांगों में ज्‍योतिष को वेदों का साक्षात नेत्र (वेदस्‍य चक्षु o) कहा गया है। हमारा जीवन श्रोताश्रित यानि  वंदाधारित हो अथवा स्‍मार्त्‍ताश्रित यानि परंपरावादी धर्मशास्‍त्रानुरूप ज्‍योतिष विज्ञान दोनो का अधिष्‍ठान है। प्रारंभ में वैदिक कर्मकांड की तिथियों तथा उससे संबंधित मांगलिक मुहूर्त्‍तों को जानने के लिए ज्‍योतिष विद्या का चिंतन एवं आविर्भाव किया गया। पर कालक्रम से इसके आयाम उपवृंहित होकर भविष्‍य का पूर्वज्ञान करने तथा जीवन जातक के भावी शुभाशुभ घटनाओं के पूर्व कथन करने तक विस्‍तीर्ण हो गया। विष्‍णुधर्मोत्‍तरपुराण के एक श्‍लोक से सिद्ध होता है कि ज्‍योतिष विद्या या ज्‍योतिर्विज्ञान का दूसरा नाम काल विधान शास्‍त्र भी है ..
वेदास्‍तु यज्ञार्थमभिप्रवृत्‍ता: कालानुपूर्वा विहिताश्र्च यज्ञा:।
तस्‍मादिदं कालविधान शास्‍त्र, यो ज्‍योतिषं वेद स वेद सर्वम् ।।

अर्थात् वेद तो यज्ञों के अनुष्‍ठान के लिए प्रवृत्‍त हुए हैं और सभी यज्ञ कालानुपूर्व ( क्रमबद्ध रूप से निर्धारित यानि निर्णित काल से पहले ही बंधे हुए हैं ) हैं , इसलिए जो विद्वान कालविधानशास्‍त्र यानि ज्‍योतिष विद्या का ज्ञाता है वही सर्वज्ञाता है ।
इससे यह भी सिद्ध होता है कि ज्‍योतिर्विज्ञान के और चाहे जितने उद्देश्‍य हों , इसका मुख्‍य प्रयोजन काल विधान ही है। इसके बिना षोडष संस्‍कार , तिथि , वार , योग , नक्षत्रों की स्थिति इसके अनुरूप व्रत निर्देश , जातक एवं होरा विषयक मुहूर्त्‍तादि विचार संभव ही नहीं है। समासत: सकल ज्ञान का आधार ज्‍योतिष विद्या ही है तथा यही इसका मुख्‍य उद्देश्‍य भी है।

अर्थात यह ज्‍योतिष शास्‍त्र वेदो का नेत्र है , अतएव उसकी प्रधानता अन्‍य वेदांगों के बीच स्‍वत: प्रमाणित है , क्‍योंकि अन्‍य सभी अंगों से परिपूर्ण व्‍यक्ति नेत्रहीन होने से नहीं के बराबर है।
वेदस्‍य चक्षु किल शास्‍त्रमेतत्‍प्रधानतांगेषु ततोर्थजाता।
अंगैर्युतोन्‍ये: परिपूर्णमूर्तिश्र्चक्षुर्विहीन: पुसषों न किंचित्।। 

यह ज्‍योतिष शास्‍त्र स्‍कंध त्रियात्‍मक है , इसका प्रथम स्‍कंध ( शाखा अथवा विभाग ) सिद्धांत स्‍कंध , दूसरा संहिता स्‍कंध और तीसरा होरा स्‍कंध कहा जाता है। त्रुटि ( समय का अत्‍यंत सूक्ष्‍म भाग ) से लेकर प्रलय के अंत तक के काल और सूर्यादि ग्रहों से संबंधित कालमान की गणना की गणित विद्या को सिद्धांत स्‍कंध कहते हैं।

सूर्यदि ग्रहों , विविध केतुओं , तारामंडलों , नक्षत्रों , ताराओं , तारामंडलों के स्‍थान , योग , उनकी गति संबंधी शुभाशुभ फलों के विचार , शास्‍त्र को संहिता स्‍कंध कहते हैं। तथा ज्‍योतिष के जिस अंग के द्वारा जन्‍म , वर्ष , इष्‍ट काल पर ग्रहादि के प्रभाव , दृष्टि , बल , दशा एवं अंतर्दशादि की गणना और फलाफल का र्नि‍णय किया जाता है , उसे होरा स्‍कंध कहते हैं। होरा , जातक तथा हायन इसी के पर्यावाची नाम हैं। विद्वानों के मतानुसार अहोरात्र शब्‍द के आदि और अंत के वर्णों का लोप होकर ही होरा शब्‍द निर्मित हुआ है , जिसका अर्थ लग्‍न अथवा लग्‍नार्थ होता है , जिसके द्वारा जातक अर्थात जन्‍म और नवजात शिशु संबंधी सभी घटना फलों का विचार किया जाता है।

‘चतुर्लक्षं च ज्‍योतिषं’ सूत्र के अनुसार मूल ज्‍योतिर्विज्ञान 400000 श्‍लोकों से समृद्ध है। नारदसंहिता , कश्‍यपसंहिता और पराशरसंहिता के साक्ष्‍य से इस विज्ञान के 18 प्रवर्तक माने जाते हैं। यथा ब्रह्मा , सूर्य , वशिष्‍ठ , अवि , मनु , सोम या पौल्‍स्‍त्‍य , लोमश , मरीच , अंगिरा , व्‍यास , नारद , शौनक , भृगु , च्‍यवन , यवन , गर्ग , कश्‍यप तथा पराशर । ( कुछ पश्चिम भक्‍त लेखकों ने यवनाचार्य को म्‍लेच्‍छ के रूप में यूनानी लोमश को रोमश बताकर रोम का तथा पौल्‍स्‍त्‍य को एलेक्‍जेन्ड्रिया का पॉल नाम से विदेशी निर्धारित करने की चेष्‍टा की है। दृष्‍टब्‍य अद्भुत भारत ( वंडर दैट वाज इंडिया ) लेखक ए एल बाशम पृष्‍ठ 492 )

उत्‍तर वैदिक काल के ज्‍योतिषियों में आर्यभट्ट (पांचवी शताब्‍दी) , वराहमिहिर (छठी शताब्‍दी) , लल्‍लू ब्रह्मगुप्‍त (सातवीं शताब्‍दी) तथा भास्‍कराचार्य के नाम से प्रख्‍यात है। ज्ञातब्‍य है कि पश्चिम जगत को ज्ञात होने से काफी पहले आर्यभट्ट ने यह सिद्धांत स्‍थापित किया था कि सूर्य स्थिर है तथा पृथ्‍वी ही उसकी परिक्रमा करती है। यद्पि सिद्धांत , संहिता और होरा स्‍कंध के अंतर्गत शतश: उपविषय सिन्‍नविष्‍ट है , पर स्‍थूल रूप से इसके ही दो भाग प्रमुख हैं..
1. गणित तथा 2. फलित , जो गिरा ( वाणी ) और अर्थ अथवा जल और वीचि यानि लहर के समान परस्‍पर अभिन्‍न रूप से जुडे है , जिस प्रकार अर्थरहित शब्‍द बेकार होता है , उसी प्रकार फलित पक्ष विहीन गणित ज्‍योतिष भी व्‍यर्थ होता है। तदापि इन दोनो में ज्‍योतिष प्रधन्‍तर है , क्‍योंकि गणित के बिना फलित ज्‍योतिष किसी निष्‍कर्ष पर नहीं पहुंच सकता। वह सर्वथा परतंत्र और गणित ज्‍योतिष के अधीन है।

पूर्वोक्‍त प्राचीन 18 प्राचीन आचार्यों के सिद्धांतों में संप्रति जो सिद्धांत सर्वाधिक मान्‍य है , वह है सूर्य सिद्धांत। वैसे वराह मिहिर ने अपनी पुस्‍तक पंच सिद्धांतिका में पांच , नृसिंह दैवज्ञ ने हिल्‍लाजदीपिका में छह , दैवज्ञ पुंजराज ने अपने ग्रंथ शंभुहोरा प्रकाश में सात तथा शाकल्‍य संहिता के ब्रह्म सिद्धांत में आठ सिद्धांतों के होने की चर्चा मिलती है।  किंतु सभी ने सूर्य सिद्धांत को ही सबसे अधिक मान्‍य प्रामाणिक और शुद्ध माना है। ज्‍योतिर्विज्ञान की प्राचीनता के अतिरिक्‍त यह निर्विवाद है कि गणित और ज्‍योतिष शास्‍त्र सारे संसार में भारत से ही फैले हैं। खगोल और भूगोल विद्या भी ज्‍योतिष के अंग हैं। सामान्‍य भाषा में शून्‍य का अर्थ आकाश होता है। पर ज्‍योतिष के अनुसार आकाश शून्‍य ( खाली ) नहीं है। इसमें अनेक ग्रहों , नक्षत्रों और तारामंडल की अवस्थिति है। आकाश को प्राचीन ऋषियों ने तीन भागों में विभक्‍त किया है ...
क. पृथ्‍वी ख. अंतरिक्ष और ग. द्यूलोक । नक्षत्र मंडल को भी राशिचक्रों में विभाजित किया गया है और प्रत्‍येक राशि के साथ सूर्य के संक्रमण को देखकर 12 राशियों के नाम पर 12 सोर मास तथा पूर्णिमा की रात में नक्षत्र विशेष के साथ चंद्रमा की सन्निकटता के आधार पर चांद्रमासों का विधान किया गया। जिस मास की पूर्णिमा चित्रा नक्षत्र से युक्‍त थी , उसे चैत , विशाखा से युक्‍त को बैशाख , ज्‍येष्‍ठा से ज्‍येष्‍ठ , पूर्वाषाढ या उत्‍तराषाढ से आषाढ , श्रवण से श्रावण , पूर्व एवं उत्‍तर भाद्रपद से भाद्रपद ( भादो ) , अश्विनी से आश्विन , कृतिका से कात्रिक , मृगशिरा से मार्गशीर्ष ( अगहन  , पुष्‍य से पौष , मघा से माघ तथा पूर्वा और उत्‍तरा फाल्‍गुनी नक्षत्र से फाल्‍गुन महीने का नामकरण हुआ। इसी तरह वारों या दिनों के नाम भी ग्रहों के प्रात:कालीन स्थिति के आधार पर हैं और इनका क्रम पूर्णत: वैज्ञानिक है।

भारतीय ज्‍योतिष में चिंतन और प्रयोग का बराबर महत्‍वपूर्ण स्‍थान रहा है। जयपुर और दिल्‍ली की वेधशालाएं इनकी प्रयोग धर्मिता के प्रमाण हैं,  केवल बंधे बंधाए सूत्रों पर यह नहीं चलता रहा है , अन्‍यथा आर्यभट्ट वराहमिहिर , ब्रह्मगुप्‍त का कोई स्‍थान नहीं होता। वशिष्‍ठ , लोमश , अत्रि , आर्यभट्ट एवं ब्रह्मगुप्‍त से लेकर कृष्‍णमूर्ति तक भारतीय ज्‍योतिष को नया आयाम देने की परेपरा चलती आ रही है , चाहे वह गणित के क्षेत्र में हो या फलित के क्षेत्र में। ज्‍योतिष में व्‍यास , वशिष्‍ठ , मृग , पराशर के बाद , सत्‍याचार्य और उसके बाद प्रसिद्ध वैज्ञानिक ज्‍योतिषाचार्य वाराह मिहिर हुए , जिन्‍होने इस विद्या को व्‍यवस्थित किया। 20वीं सदी में उल्‍लेखनीय स्‍वर्गीय सूर्य नारायण राव , श्री लक्ष्‍मण दास मदान , डॉ वी भी रमण , डॉ कृष्‍णमूर्ति और भगवान दास मित्‍तल रहें। डॉ रमण की अंग्रेजी की पत्रिका ‘द एस्‍ट्रोलोजिकल मैगजीन’ ने देश विदेश में भारतीय ज्‍योतिष की महानता को उजागर किया है। उनके संपादकीय देश विदेश के राजनीतिक उतार चढाव के लिए काफी चर्चित रहे हैं। नवीनता के संदर्भ में श्री भगवान दास मित्‍तल का बहुत बडा योगदान रहा , जिन्‍होने राशि से अधिक महत्‍वपूर्ण लग्‍न को समझा और इनकी सारी विवेचनाएं इसी पर आधारित रही हैं। श्री कृष्‍णमूर्ति भी ज्‍योतिष को पूर्ण विज्ञान का दर्जा दिलाने में अग्रसर रहे हैं। उनका ज्‍योतिष पंचांग एवं अयनांश शत प्रतिशत शुद्ध है। इसी प्रकार पत्रिका बाबाजी राजनैतिक और व्‍यक्तिगत भविष्‍यवाणी , भूकम्‍प , भ्रष्‍टाचार , सनसनीखेज हत्‍याएं और दुर्घटनाओं की शत प्रतिशत भविष्‍यवाणियों के लिए नाम कमा चुकी है। इसके संपादक श्री मदान जी इस प्रकार की घटनाओं का अंदाजा ग्रहों की चाल से लगाते हैं। इसी प्रकार ‘ज्‍योतिष तंत्र विज्ञान’ , ‘तंत्र मंत्र यंत्र विज्ञान’ ‘ज्‍योतिष्‍मती’ , ज्‍योतिष धाम’ आदि पत्रिकाओं के संपादक अपनी अपनी पत्रिका के माध्‍यम से ज्‍योतिष विज्ञान का प्रचार प्रसार करते आ रहे हैं।

ज्‍योतिष के क्षेत्र में पिता से शिक्षा ग्रहण करने और पुत्री से सहयोग प्राप्‍त करने की परंपरा भी प्राचीन काल से ही चली आ रही है। लीलावती ने अपने पिता से ही ज्‍योतिष का ज्ञान प्राप्‍त किया था। अपने पिता के मरणोपरांत उनकी पुत्री श्रीमती सुप्रिया जगदीश ही ‘ज्‍योतिष्‍मती’ का संपादनभार संभाल रही है। श्रीमती गायत्री देवी वासुदेवन ‘द एस्‍ट्रोलोजिकल मैगजीन’ के संपादन में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इसी ज्‍योतिष विज्ञान की विकास दशा एवं नव्‍य दिशा बुद्धि की परंपरा में प्रस्‍तुत पुस्‍तक ‘गत्‍यात्‍मक दशा पद्धति: एक परिचय’ का प्रणयण गणित विषय में कुशाग्र प्रज्ञा समृद्ध लेखिका श्रीमती संगीता पुरी ने किया है। यह विद्या उन्‍हें स्‍वनाम धन्‍य तेजस्‍वी ज्‍योतिषी पिता श्री विद्या सागर महथा , ज्‍योतिष वाचस्‍पति , ज्‍योतिष रत्‍न से प्राप्‍त हुई है , जिन्‍होने लगभग पूरी आयु ज्‍योतिष के अध्‍ययन मनन और चिंतन में लगायी है। दशा पद्धति की गत्‍यात्‍मक पद्धति उनके चिंतन और अन्‍वेषण का परिणाम हैं, जिसे विरासत के रूप में उनकी पुत्री ने उनसे पूरी अर्हता के साथ ग्रहण किया है। पुस्‍तक की विषय वस्‍तु , प्रमेयों , प्रतिपत्तियों , निष्‍कर्षों और तार्किक विश्‍लेषणों से यह सहज ही विश्‍वास होता है कि इस पुस्‍तक से फलित ज्‍योतिष को एक नई और मौलिक चिंतन दिशा मिलेगी। फलित ज्‍योतिष के क्षेत्र में गत्‍यात्‍मक दशा पद्धति की यह पहली कृति है , जिसका श्रेय लेखिका को मिलेगा। फलित ज्‍योतिष की पिटी पिटायी परंपराओं के यांत्रिक विवेचन से हटकर वैज्ञानिक ज्‍योति‍षीय तथ्‍यों का प्रादुष विवेचन इस पुस्‍तक की विशेषता है , जो अभी तक फलित ज्‍योतिष के एकमेव आश्रय विंशोत्‍तरी पद्धति की शरणागति की अनिवार्यता को अस्‍वीकार करती है।

विंशोत्‍तरी पद्धति के स्‍थान पर ज्‍योतिष में वर्णित ग्रहों की अवस्‍था को क्रमानुसार स्‍थान पुस्‍तक की विवेच्‍य प्रणाली में दिया गया है , लेखिका की मान्‍यता है कि बाल्‍यावस्‍था में प्रभावित करनेवाला उपग्रह चंद्रमा है , भले ही जातक का जन्‍म किसी भी नक्षत्र में हुआ हो। इसी तरह वृद्धावस्‍था को प्रभावित करने वाले ग्रह बृहस्‍पति और शनि हैं। इसका कारण यह है कि फलित ज्‍योतिष में वृद्धावस्‍था का ज्ञानी ग्रह बृहस्‍पति माना गया है , उत्‍तर वृद्धावस्‍था के प्रतीक ग्रह के रूप में शनि की मान्‍यता है। इस दशा पद्धति में ग्रहों का कालक्रम क्रमश: चंद्र , बुध , मंगल , शुक्र , सूर्य , बृहस्‍पति , शनि , यूरेनस , नेप्‍च्‍यून और प्‍लूटो को रखा गया है। जन्‍म नक्षत्र पर इस दशाकाल की कोई आश्रिति नहीं है। इस मौलिक दशा पद्धति के जन्‍म दाता श्री विद्या सागर महथा की मान्‍यता है कि सभी ग्रहों के दशाकाल को संचालित करने का अधिकार मात्र चंद्रमा को देना सर्वथा अवैज्ञानिक है। अपने दशाकाल में सभी ग्रह अपनी बल स्थिति अपनी गत्‍यात्‍मकता के अनुसार संभालेंगे , यह सहज वैज्ञानिक बुद्धि से समर्थित और पुष्‍ट होता है।

इस दशा पद्धति में राहू और केतु कोई आकाशीय पिंड नहीं है ,  भौतिक विज्ञान के अनुसार पदार्थ की अनुपस्थिति में शक्ति या ऊर्जा की परिकल्‍पना नहीं की जा सकती। प्रस्‍तुत दशा पद्धति में एक ओर ग्रहों के दशा काल में निश्चित कालक्रम को स्‍थान दिया गया है , तो उसी वैज्ञानिकता से ग्रहों में बलाबल की परंपरागत रीति से हटकर विचार किया गया है। इसमें चेष्‍टा बल , दिकबल , स्‍थानबल , अष्‍टकवर्ग बल आदि से भिन्‍न ग्रहों के गत्‍यात्‍मक और स्‍थैतिक बल को तथा ग्रहों की गमता को ग्रह बल का मुख्‍य आधार माना गया है। जो हो , यह तो सभी मानेंगे कि जिस विधि से संपूर्ण जीवन की तिथियुक्‍त भविष्‍यवाणी बहुत ही आत्‍मविशवास के साथ और सही सही की जा सके , वही विधि अंतत: लोकग्राह्य होगी।

यूरेनस, नेप्‍च्‍यून तथा प्‍लूटो आदि पाश्‍चात्‍य मान्‍यता के ग्रहों की स्‍वीकृति तथा भारतीय फलित ज्‍योतिष में उसका सन्निवेश भी इस बात का प्रमाण है कि लेखिका अबतक की रूढ परंपराओं में बंधी नहीं होकर प्राच्‍य और पाश्‍चात्‍य पुरातन और अर्वाचीन दोनो की उपयोगी ज्‍योतिषीय पद्धतियों का स्‍वीकार करने में कोई संकोच नहीं किया है। ‘ या नो भद्रा तत्‍वो यन्‍तु विश्‍वस्‍त:’ ( सारे विश्‍व से भद्र विचार हमारे पास आवें) के आर्ष वाक्‍य के अनुदेश के सर्वथा अनुकूल हैं। नए रास्‍ते पर चलनेवाले पहले व्‍यक्ति को बहुत सी कठिनाइयों का सामना करना पडता है। उसके लिए सारस्‍वत स्‍वीकृति सहज नहीं होती। ऐसी ही परिस्थिति में महाकवि कालिदास ने कहा था ....
पुराणमित्‍येव न साधु सर्वं , न चापि सर्व नवमित्‍यवद्यम ।
सन्‍त: परिक्ष्‍याण्‍यतरद् भजन्‍त , मूढ: पर प्रत्‍ययनेय बुद्धि ।।

‘जो पुराना है , वह न तो सबका सब ठीक है और न जो नया है वह सभी केवल नया होने के कारण अग्राह्य है। साधु बुद्धि के लोग दोनो की परीक्षा करके स्‍वीकार और अस्‍वीकार करते हैं , दूसरों के कहने पर तो मूढ ही राय बनाते हैं’
मेरा विश्‍वास है कि प्रस्‍तुत पुस्‍तक अपनी मौलिकता और विवेचन बल पर ज्‍योतिषीय जगत में अपने आदर का स्‍थान स्‍वयमेव बना लेगी और इसकी प्रतिभापूर्ण लेखिका एक नए हस्‍ताक्षर के रूप में सम्‍मान अर्जित करेंगी , ऐसा ही हो , यह मेरा आशीर्वचन तथा शुभांशसा दोनो है। राष्‍ट्रीय एवं अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर के नक्षत्र शास्‍त्रीय पत्र पत्रिकाओं में लेखिका की जो रचनाएं स्‍वागत पा रही हैं , उससे मेरी इन आशाओं और विश्‍वासों को मूर्त्‍त होने की आश्‍वस्ति मिलती है।

इत्‍यलम् इतिशुभम
डॉ विश्‍वंभर नाथ पांडेय
एम ए , एल एल बी, पी एच डी
निदेशक , भारतीय संस्‍कृति एवं लोक सेवा संस्‍थान
भूतपूर्व प्राचार्य , रांची कॉलेज , रोची , झारखंड 

मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

अंधविश्‍वासों के आवरण में प्रच्‍छन्‍न : क्‍या है सत्‍य ?? ( Astrology )

समाज में भांति भांति के अंधविश्‍वास व्‍याप्‍त हैं , जो बुद्धिजीवी वर्ग को स्‍वीकार्य नहीं हो सकते , पर इन अंधविश्‍वासों के मध्‍य भी कुछ वैज्ञानिक सत्‍य हैं , जिनका खुलासा हमारे पिताजी श्री विद्या सागर महथा इस पुस्‍तक में कर रहे हैं , जिन्‍होने विज्ञान से स्‍नातक और हिंदी भाषा में मास्‍टर डिग्री लेने के बाद अपना सारा जीवन प्रकृति के उन रहस्‍यों को समझने में लगा दिया , जिससे पूरी दुनिया अनजान है , सालभर से मैं इस पुस्‍तक को सारगर्भित बनाने में ही जुटी थी , अब यह प्रकाशन के लिए तैयार हो चुकी है , समाज से अंधविश्‍वास दूर करने के लिए सामान्‍य लोगों के लिए पठनीय इस पुस्‍तक का प्रकाशन और जन जन तक वितरण आवश्‍यक भी है। 

समर्पण

मेरी माताजी सदैव भाग्य और भगवान पर भरोसा करती थी। मेरे पिताजी निडर और न्यायप्रिय थे। दोनों के व्यक्तित्व का संयुक्त प्रभाव मुझपर पड़ा। जहां एक ओर माताजी की अतिशय भाग्यवादिता ने मुझे परम शक्ति की यांत्रिकी को समझने को प्रेरित किया , वहीं दूसरी ओर पिताजी की न्यायप्रियता के फलस्वरुप मुझे सच और झूठ की पहचान एवं उसकी अभिव्यक्ति की शक्ति मिली। अतः मै अपनी पहली पुस्तक ‘ अंधविश्वासों के आवरण में प्रच्छकन्न् : क्या है सत्य़ ’ पूज्य माता-पिता के चरण-कमलो में सादर समर्पित करता हूं।




विषय क्रम ...
5. हस्त रेखाएं
6. वास्तुशास्त्र
7. हस्ताक्षर विज्ञान
8. नजर का असर
9. न्यूमरोलोजी
10. प्रश्न कुंडली
11. ज्यो्तिष की सीमाएं
12. ज्यो्तिषी का विवादास्पद सामाजिक महत्व
13. राजयोग
14. कुंडली मेलापक
15. राहू और केतु
16. विंशोत्तरी पद्धति
17. ज्योतिष की त्रुटियां एवं दूर करने के उपाय
18. ज्योतिष का वैज्ञानिक आधार
19. ग्रह शक्ति का रहस्य
20. हम ग्रह की किस शक्ति से प्रभावित हैं ?
21. गत्यात्म्क दशा पद्धति
22. ग्रहों का मानव जीवन पर प्रभाव
23. सहजन्मा के मंजिल की एकरूपता
24. क्या् बुरे ग्रहों का इलाज है ?
25. खतरे की पूर्व जानकारी से लाभ
26. घडी की तरह समय की जानकारी आवश्यलक है
27. ज्योतिष और आध्यात्म
28. ज्योतिषियों से विनम्र निवेदन

1. वार से फलित कथन अवैज्ञानिक
2. यात्राएं और सप्ताह के दिन
3. शकुन
4. मुहूर्त्त

... पढने के बाद प्रतिक्रिया दें .. दस उत्‍तम प्रतिक्रियाओं को पुस्‍तक में जगह दी जाएगी .....

शनिवार, 13 अप्रैल 2013

नारी को युग के अनुरूप अपने व्‍यक्तित्‍व को मजबूत बनाना होगा ....


कुछ दिनों पूर्व एक उलझा हुआ सवाल मिला था , कहते हैं कि नियति निर्धारित है और उसे परिवर्तित नहीं किया जा सकता. तो क्या स्त्री की नियति भी निश्चित है जो उसे सदियों से भोग्या बना कर रख दिया गया है? पुरुष वर्ग ने ही सारी किस्मत का ठेका ले रखा है और औरत किस्मत की मारी बेचारी बन के रह गई है. क्या ज्योतिष की नजर से स्त्री चिंता का कोई समाधान मिल सकता है? आशा है आप मेरे इस सवाल का उत्तर अवश्य देंगी……
चिंतन के क्रम में बहुत सारी बातें जुटती गयी , जो आज पोस्‍ट के रूप में प्रस्‍तुत है ….

विविधता प्रकृति की सबसे बडी खासियत है , इसलिए जहां एक ओर शैवाल जैसे एक कोशिकीय जीव और केंचुए से लेकर ह्वेल और हाथी जैसे जीव और कमल एवं गुलाब जैसे सुंदर फूलदार से लेकर नागफनी जैसे रेगिस्तानी पौधे यहां मौजूद हैं, तो दूसरी ओर नीम, पीपल और वट जैसे विशाल वृक्ष जीवन के अनेक रूपों को आश्रय प्रदान कर जैव विविधता को बनाए हुए हैं । एक एक कण अलग अलग रंग रूप और स्‍वभाव लेकर बिखरे हुए हैं , यदि गंभीरता से विचार किया जाए तो किसी का भी महत्‍व कम नहीं लगता । विष और अमृत दोनो जगह जगह पर उपयोगी हैं , पर युग के अनुरूप प्रकृति की प्रत्‍येक वस्‍तु में कभी किसी का महत्‍व कम और कभी अधिक हो जाता है।

जब ‘शक्ति’ के आधार पर कोई सभ्‍यता और संस्‍कृति चले , अधिकांश समय ऐसा ही चला है , तो जैसा कि जंगल राज में चलता है , मजबूत अपने शिकार के लिए कमजोर जीवों को मारते हैं और कमजोर अपने बचाव का रास्‍ता ढूंढते हैं। पशुओं की प्रकृति को स्‍वीकार करना हमारी मजबूरी हो सकती है , पर हमारा दुर्भाग्‍य है कि हमें ऐसी प्रवृत्ति वाले मनुष्‍य को भी स्‍वीकार करना पडता है। ऐसा राज होने पर मनुष्‍य भी पशु ही हो जाते हैं , ऐसी स्थिति में बलवान शोषण करता है और बलहीनों को शोषित होना पडता है , इस दृष्टि से हमेशा नारी कमजोर है। इसी प्रकार कभी ‘पद’ तो कभी ‘धन’ को मजबूत माना जाता रहा और समाज में इनका महत्‍व बना रहा। प्राचीन नारियों के पास भी कभी न तो धन रहे और न पद। नारियों ने कभी एकजुट होकर इसके लिए लडने की हिम्‍मत भी नहीं की।

इसी प्रकार जब ‘ज्ञान’ के आधार पर कोई सभ्‍यता और संस्‍कृति चले तो ज्ञानी शोषण करते हैं और अज्ञानियों को शोषित होना पडता है। अज्ञानियों के हर कमजोरी का फायदा उठाकर ज्ञानी उसकी खासियत का उपयोग करते हैं , प्रकृति के सभी जीव जंतुओं को ऐसे ही उपयोग में लाया गया , इसके कारण आज कुछ ही वर्षों में न जाने कितने जीव विनाश के कगार पर हैं। प्राचीन काल से समाज में नारियों के ‘ज्ञान’ प्राप्‍त करने की सुविधा न होने से यहां भी उनकी लाचारी हो जाती है , उनकी कोमल भावनाओं का फायदा उठाकर उनकी हर खासियत का उपयोग किया जाता है। पर मैं समझती हूं कि ज्ञान का नाजायज फायदा उठानेवाले ऐसे ज्ञानी अज्ञानियों से भी बदतर हैं।

आज विकासशील और विकसीत देशों में ‘ज्ञान’ के आधार पर ही सभ्‍यता और संस्‍कृति चल रही है , इसी कारण पर्यावरण का हद से भी बुरा हाल है , वनों और वन्‍य जीवों का तो हाल पूछिए ही मत। पर यहां नारियों की स्थिति अविकसित देशों की तुलना में कुछ अच्‍छी मानी जा सकती है। जिन देशों में इन्‍हें ‘ज्ञान’ प्राप्‍त की सुविधा भी मिल रही है, इनकी लाचारी कम ही दिखती है , यदि विकास का क्रम बना रहा तो आनेवाले दिनों में इनकी स्थिति में सुधार संभव है । पर आनेवाली संस्‍कृति में ‘अर्थोपार्जन करने वाले ज्ञान’ का ही महत्‍व है , स्‍त्री हैं या पुरूष कोई मायने नहीं रखता । जो खुद , किसी व्‍यक्ति को , किसी कंपनी को या किसी सरकार को अर्थोपार्जन में मदद करते हैं , समाज में उनकी उपयोगिता है , चाहे इसके लिए आपको कोई भी उल्‍टा सीधा काम करना पडे , आपके सौ खून भी माफ हो सकते हैं। इसके विपरीत आप अर्थोपार्जन के गुर नहीं जानते तो आपके गुण , ज्ञान और ईमानदारी की कोई कीमत नहीं।

इसलिए हमारे प्राचीन ऋषि मुनियों ने सभ्‍यता संस्‍कृति को ‘धर्म’ के आधार पर चलाने का फैसला लिया था , ऐसी स्थिति में ‘शक्ति’ , ‘ज्ञान’ , ‘पद’ या ‘धन’ का नाजायज फायदा उठानेवाले नहीं होते। प्रकृति के एक एक कण की खासियत देखी जाती है और तदनुरूप उसका उपयोग किया जाता है। धर्म ने हमेशा आज के लिए नहीं , आनेवाले कल के लिए सोंचा , आनेवाली पीढी के लिए सार्थक चिंतन किया। यही कारण है कि सभी ‘धर्म’  का मूल व्‍यक्ति के मानवीय गुणों का विकास करना है। सिर्फ ‘स्‍व’ के बारे में सोचना आज के युग में बहुत बडी गल्‍ती है , प्रकृति में एक एक व्‍यक्ति के कार्य याद रखे जाते हैं और उन्‍हें उनके अच्‍छे और बुरे दोनो तरह के परिणाम भी मिलते हैं। पर विडंबना ही है कि जब सभ्‍यता संस्‍कृति ‘शक्ति’ , ‘ज्ञान’ , ‘पद’ या ‘धन’ के हिसाब से चलती है तो धर्म नाममात्र के लिए रह जाता है , क्‍यूंकि इसको भी उसी हिसाब से चला दिया जाता है।

अब यदि ज्‍योतिष पक्ष की बात की जाए तो ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ का विकास मात्र पचास वर्ष पुराना है और इससे पहले के ज्‍योतिष की पुस्‍तकों में सिद्धांतों की इतनी भीड है कि अध्‍ययन में किसी के पूरे जीवन गुजर जाएंगे और किसी निष्‍कर्ष पर पहुंचना संभव नहीं। उनके सभी नियमों में विरोधाभास है , एक का दूसरे से तालमेल का सर्वथा अभाव है। इसलिए खगोल शास्‍त्र के मूल आधार को लेकर हमारे पिताजी विद्या सागर महथा जी ने नए रूप में अध्‍ययन , मनन , चिंतन आरंभ किया और पचास वर्षों तक लगातार एक एक निष्‍कर्ष स्‍थापित करते चले गए। फलस्‍वरूप ज्‍योतिष की एक नई शाखा ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ का विकास हुआ। इतने मजबूत आधार प्राप्‍त करने के बाद 25 वर्षों से मैने भी उन्‍हें सहयोग देना आरंभ किया है ,  फलस्‍वरूप इसके विकास में तेजी आयी है।

‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ ने मनुष्‍य के जीवन में पडनेवाले ग्रहों के प्रभाव का बहुत अच्‍छा अध्‍ययन किया है,  मानव जीवन के बहुत सारे पक्षों की बातें अब स्‍पष्‍ट समझ में आती है। खासकर मनुष्‍य के जीवन के विभिन्‍न काल पर ग्रहों से वे किस प्रकार प्रभावित होंगे , इसको स्‍पष्‍टत: बताया जा सकता है । ग्रहों के गत्‍यात्‍मक और स्‍थैतिक शक्ति की नई जानकारी के बाद मौसम , शेयर बाजार , राजनीति और अन्‍य क्षेत्रों में ग्रह के प्रभाव के बारे में लगातार अध्‍ययन चल रहा है और कई निष्‍कर्ष स्‍थापित किए जा चुके हैं।

पर युग पर ग्रहों के प्रभाव के अध्‍ययन की अभी शुरूआत ही हुई है , हाल फिलहाल में मैने वृद्धों के जीवन पर पड रहे ग्रहों के बुरे प्रभाव का कारण ढूंढने में सफलता पायी है। उसके हिसाब से भारतवर्ष में 2020 के बाद क्रमश: ऐसा वातावरण बनना आरंभ होगा कि वृद्धों का महत्‍व बढता जाएगा। पिछली सदी के अंतिम दशक में युवाओं को गंभीर निराशाजनक परिस्थिति का सामना करना पडा था, क्‍यूंकि हर नौकरी में छंटनी का दौर चल रहा था, विरले ही किसी प्रतियोगिता में सफल होते थे। 2000 के बाद युवाओं के समक्ष कार्यक्रमों की कमी नहीं , चारो ओर उन्‍हें प्रशिक्षित करने के लिए कॉलेज खुल रहे हैं और उनकी मांग बनी हुई है।

पर ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ नारियों की दुर्दशा के बारे में कोई ग्रहीय कारण स्‍पष्‍टत: नही समझ सका है , अभी लंबे शोध की आवश्‍यकता है। वैसे भी नए सिरे से अध्‍ययन की जाए तो युग के अध्‍ययन में युग लग जाते हैं , विदेशियों के आक्रमण ने हमारा परंपरागत ज्ञान को नष्‍ट जो कर दिया है। पर इतना तो अवश्‍य है कि प्रकृति ने युग और काल के अनुरूप किसी के बनावट में कुछ कमजोरी दी है तो इनके भाग्‍य में कुछ कमी तो अवश्‍य होगी और उसका फल उन्‍हें झेलना ही होगा। नारी को युग के अनुरूप अपने व्‍यक्तित्‍व को मजबूत बनाना होगा।


गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

एक जिम्‍मेदार व्‍यक्ति को ही भविष्‍य की चिंता होती है ..... ( Astrology )


ज्‍योतिष सही है या गलत ? विज्ञान है या अंधविश्‍वास ? यह सिर्फ तर्कों से सि‍द्ध नहीं की जा सकती। हर मुददे में पक्ष और विपक्ष दोनो के पास बडे बडे तर्क होते हैं। ज्‍योतिष को विज्ञान सिद्ध कर पाने में भी अभी तक पक्ष के लोगों को सफलता नहीं मिल पायी है , इसलिए इनकी बात भी लोग नहीं सुनते। ज्‍योतिष को विज्ञान न सिद्ध कर पाने में भी अभी तक विपक्ष के लोगों को कोई सफलता नहीं मिल पायी है। लोग उनकी बातें भला क्‍यों सुनेंगे ?

लोगों का मानना है कि ज्‍योतिष जैसे विषय पर या ग्रह नक्षत्रों पर विश्‍वास करनेवाले आलसी , निकम्‍मे और निठल्‍ले हुआ करते हैं। पर मैं नहीं मानती , मैं मानती हूं कि एक जिम्‍मेदार व्‍यक्ति को ही भविष्‍य की चिंता होती है। हमारी कामवाली का युवा बेटा अपनी मां से जिद करके मोबाइल खरीदवाता है , अपने पिता के द्वारा खरीदे गए सेकंड हैंड मोटरसाइकिल पर बैठकर घूमता फिरता है। उसे भविष्‍य की कोई चिंता नहीं , क्‍यूंकि न सिर्फ तीन वक्‍त का खाना ही , वरन् भविष्‍य की छोटी मोटी हर जरूरत को वह दस बारह घरों में चौका बरतन करनेवाली अपनी मां या बीबी को दो तमाचे जडकर पूरा कर सकता है। इसलिए उसे भविष्‍य को लेकर कोई उत्‍सुकता नहीं , वह ज्‍योतिष या ज्‍योतिषियों की शरण में क्‍यूं जाए ?

कुछ समय पहले तक लोगों का जीवन इतना अनिश्चितता भरा नहीं हुआ करता था, संयुक्त परिवार होते थे, इस कारण यदि परिवार के एक दो व्यक्ति जीवन में आर्थिक क्षेत्र में सफल नहीं हुए, तो भी घर के छोटे मोटे कामों को संभालते हुए उनका जीवन यापन आराम से हो जाता था, क्यूंकि उन्हें संभालने वाले दूसरे भाई या परिवार के अन्य सदस्य होते थे। पर आज व्यक्तिगत तौर पर अधिक से अधिक सफलता पाने की इच्छा ने, व्यक्तिगत परिवारों की बहुलता ने हर व्यक्ति के जीवन को अनिश्चितता भरा बना दिया है। एक लड़के की कमाई के बिना उसका शादी विवाह या सामाजिक महत्व नहीं बन पाता है। 

इसके अलावा वैज्ञानिक सुख सुविधाओं ने व्यक्ति को आराम तलब बना दिया है। जो अच्छी जगह पर हैं, वो अपने आनेवाली पीढी के मामलों में काफी महत्वाकांक्षी हो गए हैं। दो लोगों, दो परिवारों की जीवनशैली में बडा फासला बनता जा रहा है, ऐसे में भविष्य की ओर लोगों का ध्यान स्वाभाविक है। इसी कारण भविष्य को जाननेवाली विधा यानि ज्योतिष पर लोगों का विश्वास बढता जा रहा है।

सफलता के लिहाज से इस दुनिया के लोगों को कई भागों में विभक्‍त किया जा सकता है। कुछ वैसे हैं , जिन्‍हें अपने जीवन में माहौल भी अच्‍छा नहीं मिला , वे काम भी नहीं करते या करना चाहते। किसी प्रकार उनके दिन कट ही जाते हैं , इस‍लिए उन्‍हें भविष्‍य की कोई चिंता नहीं होती , वे अपने इर्द गिर्द के माहौल के अनुसार अपने और अपने परिवार के भविष्‍य को एक सीमा के अंदर ही देख पाने से निश्चिंत रहते हैं। दूसरे वैसे , जिन्‍हे अपने जीवन में माहौल भी मिला , काम भी कर पा रहे हैं और उसके अनुसार सफलता के पथ पर अग्रसर भी हैं , जीवन में भाग्‍य की किसी भूमिका को वे भी स्‍वीकार नहीं कर पाते , उन्‍हें अपना और अपने परिवार का भविष्‍य बहुत ही उज्‍जवल नजर आता है।

पर तीसरे वैसे लोग हैं , जो महत्‍वाकांक्षी बने होने और अपने साधन और मेहनत का भरपूर उपयोग करने के बावजूद भी कई कई वर्षों से असफल हैं ,चाहे समस्‍या कोई एक ही क्‍यूं न हो , उसके समाधान का कोई रास्‍ता उन्‍हें नजर नहीं आता । वैसी स्थिति में किसी अज्ञात शक्ति की ओर उनका रूझान स्‍वाभाविक है और ऐसे लोगों को ज्‍योतिष की आवश्‍यकता पडती है। प्रकृति के किसी नियम को बदल पाना तो किसी के लिए संभव नहीं , पर ज्‍योतिष के सही ज्ञान से लोगों को कुछ सलाह तो दी ही जा सकती है , जो उन्‍हे बेहतर जीवन जीने में मदद करें ।

गुरुवार, 7 मार्च 2013

अंतर्राष्‍ट्रीय महिला दिवस पर एक जरूरी मांग ... अपनी सरकार से

पिछले माह ट्रेन से आ रही थी , रिजर्वेशन नहीं होने और भीड के अधिक होने के कारण महिला बॉगी में चढ गयी , यहां हर वर्ग का प्रतिनिधित्‍व करने वाली महिलाएं मौजूद थी , बच्चियों , युवतियों से लेकर वृद्धा तक , मजदूर से लेकर सामान्‍य गृहस्‍थ तक और नौकरीपेशा से लेकर हम जैसी महिलाओं तक , जिसे किसी वर्ग में रखा ही नहीं जा सकता। पुलिस को ध्‍यान न रहे तो महिला बॉगी में महिलाओं के साथ वाले पुरूष भी अड्डा जमा ही लेते हैं , सफर में महिलाओं की संख्‍या कम नहीं रहती , इसलिए सबके बैठने की समुचित व्‍यवस्‍था नहीं हो पा रही थी। दस और बारह वर्ष की दो बच्चियां एक दो जगहों पर खुद को एडजस्‍ट करने की भी कोशिश की , पर कोई फायदा नहीं हुआ तो कुछ देर खडी इंतजार करती रही , जैसे ही उन्‍होने दो महिलाओं को उतरते देखा तो वे तेजी से सीट की ओर बढी , पर उन्‍होने पाया कि पहले जिस सीट पर सात महिलाएं बैठी थी , वहां इन पांच ने ही खुद को फैलाकर पूरी जगह घेर ली थी। बच्चियों ने पहले उनसे आग्रह किया , पर बात न बनी तो तर्कपूर्ण बातें कर हल्‍ला मचाकर सभी यात्रियों का ध्‍यान इस ओर आकृष्‍ट किया। सबको उनके पक्ष में देखकर महिलाओं ने खुद को समेटकर उन्‍हें बैठने की जगह दी। बच्चियों की माताजी को बच्चियों के उचित पालन पोषण के लिए शाबाशी मिली , शाबाशी देने वालों में दो कॉलेज की छात्राएं ही नहीं थी , जो छुट्टियों में महानगर से वापस आ रही थी, वरन् हर वर्ग की महिलाएं थी। बीस पच्‍चीस साल में बच्चियों के पालन पोषण में यह बडा अंतर आया है , हमारे जमाने में तो बडों के प्रति सम्‍मान और छोटों के प्रति स्‍नेह का प्रदर्शन करते हुए नाजायज को भी जायज कहने की शिक्षा दी जाती थी। यही कारण है कि सामने वालों के गलत वक्‍तब्‍य पर उस वक्‍त महिलाओं के मुंह से चूं भी नहीं निकलती थी। 

मैने जब कॉलेज की लडकियों से इस अंतर की चर्चा की तो उन्‍होने कहा कि उनकी मम्‍मी भी कुछ ऐसे ही बताती हैं। फिर बात आयी हमारे जमाने में परिवार के लिए किए जाने वाले महिलाओं के समझौते पर , एक लडकी ने बताया कि उसकी मम्‍मी बीएड कर चुकी थी , नौकरी करने को पापा ने मना कर दिया और मम्‍मी घर परिवार संभालने के चक्‍कर में मान भी गयी। मैने कहा कि उस जमाने में किसी एक महिला के साथ नहीं , बहुतों के साथ ऐसा हुआ कि उन्‍हें कैरियर को ताक पर रखना पडा। हमारे परिचय की एक गायनोको‍लोजिस्‍ट हैं , जिन्‍होने नौकरी के अधिकांश समय छुट्टियों में ही व्‍यतीत किए , फिर रिजाइन करना पडा , क्‍योंकि पतिदेव की पोस्टिंग जहां थी , वहां से वे ट्रासफर नहीं करा सकते थे और ये न तो वहां आ सकती थी और न अकेले बच्‍चों को लेकर रह सकती थी। सबसे बडी बात कि वे कैरियर को छोडकर भी राजी खुशी अपने पारिवारिक दायित्‍वों को निभाती रहीं। मैने खुद भी अपने परिवार और बच्‍चों को संभालने के लिए कैरियर के बारे में कभी नहीं सोंचा। पर आज की पीढी की लडकियां ऐसा समझौता नहीं कर सकती , दोनो लडकियां एक साथ बोल उठी , ‘हमारा सबकुछ बर्वाद हो जाए , हम कैरियर को नहीं बर्वाद होने देंगे’। वास्‍तव में ये आवाज इन दो लडकियों की नहीं , आज की पूरी पीढी की युवतियों की ये आवाज बन रही है और इसकी प्रेरणा उन्‍हें इनकी मांओं से ही मिल रही है , जो कल तक परिवार संभालने के कारण खुद के कैरियर पर ध्‍यान नहीं दे रही थी। समाज के लिए चिंतन का विषय है कि इन प्रौढ महिलाओं के चिंतन में बदलाव आने में कहीं उनका ही हाथ तो नहीं ?
सरकारी नौकरी कर रही महिलाओं को भले ही दुधमुंहे कभी कमजोर ,कभी बीमार बच्‍चे को छोडकर भले ही नौकरी को संभाल पाने में महिलाओं को दिक्‍कत होती हो , पर घर परिवार की जिम्‍मेदारी से मुक्‍त होते ही बच्‍चों के स्‍कूल में एडमिशन के पश्‍चात हल्‍के रूप में और बच्‍चों के बारहवीं पास करते ही अचानक महिलाओं को कुछ अधिक ही फुर्सत मिलने लगती है। कम पढी लिखी कम विचारशील महिलाएं अपनी अपनी मंडलियों में आ जाकर , फिल्‍में टीवी देखकर समय काट ही नहीं लेती , अपने दायित्‍व विहीन अवस्‍था का नाजायज फायदा उठाती हैं और समय का पूरा पूरा दुरूपयोग करती हैं। उनकी छोटी मोटी जरूरतें पतियों के द्वारा पूरी हो जाने से वे निश्चिंत रहती हैं। पर विचारशील महिलाएं कोई न कोई रचनात्‍मक कार्य करना चाहती है , पर बढती उम्र के साथ कुछ बाधाएं भी आती हैं , और उनको काम में परिवार , समाज का सहयोग भी नहीं मिल पाता , उन्‍हें ऐसा महसूस होने लगता है कि उनकी प्रतिभा का कोई महत्‍व नहीं। उनकी प्रतिभा को समाज में महत्‍व दिया जाता , तो उनका दृष्टिकोण ऐसा नहीं होता। जिस त्‍याग को अब वे भूल समझ रही हों , वह त्‍याग अपनी बच्चियों से नहीं करवा सकती। पर इससे भी आनेवाली पीढी को बहुत नुकसान है , यह बात समाज को समझनी चाहिए।
पूरी एक पीढी की युवतियों का यह सोंचना कि परिवार के लिए कैरियर को छोडना उचित नहीं , आने वाले समय में बहुत बडी अव्‍यवस्‍था पैदा कर सकता है। हमारी पीढी की गैर कामकाजी महिलाओं ने बच्‍चों के प्रत्‍येक क्रियाकलापो पर ध्‍यान रखा , उसे शारीरिक , नैतिक , बौद्धिक और चारित्रिक तौर पर सक्षम बनाया । सारी कामकाजी महिलाओं के बच्‍चों का लालन पालन ढंग से न हो सका , ऐसी बात भी नहीं है , यदि परिवार में बच्‍चों पर ध्‍यान देने वाले कुछ अभिभावक हों या पति और पत्‍नी मिलकर ही बच्‍चों का ध्‍यान रख सकते हों , तो महिलाओं के नौकरी करने पर कोई दिक्‍कत नहीं आयी। पर आज की युवतियॉ कैरियर को अधिक महत्‍व देंगी , वो भी प्राइवेट जॉब को वरियता देती हैं , तो बच्‍चे आयाओं के भरोसे पलेंगे , उनके हिसाब से ही तो उनका मस्तिष्‍क विकसित होगा। एक भैया की शादी मेरे साथ ही हुई थी , पत्‍नी अपने जॉब में तरक्‍की कर रही हैं , इसलिए संतुष्‍ट हैं , पर बच्‍चों के विकास से संतुष्‍ट नहीं , अफसोस से कहती हैं , ‘जब सबका बच्‍चा बढ रहा था , मेरा बढा नहीं , जब सबका बच्‍चा पढ रहा है , मेरा पढा नहीं।‘ हां चारित्रिक तौर पर दोनो अच्‍छे हैं पर इस प्रकार की असंतुष्टि उस समय एक दो परिवार की कहानी थी , अब यही हर परिवार की कहानी होगी। बच्‍चों का विकास ढंग से नहीं होगा , उनके व्‍यक्तित्‍व का पतन होगा तो उसे भी देश को ही झेलना होगा। महिला दिवस पर न जाने कितने सेमिनार और कार्यक्रम हा, पर शायद ही किसी का ध्‍यान इस गंभीर समस्‍या पर जाएगा।
कैरियर को महत्‍व देते हुए विवाह न करने या विवाह के बाद बच्‍चे न पैदा करने का व्‍यक्तिगत फैसला समाज के लिए दुखदायी नहीं है , पर विवाह कर बच्‍चे को जन्‍म देने के बाद उसका उचित लालन पालन न हो , यह समाज के लिए सुखद संकेत नहीं। आने वाले समय में बच्‍चों का पालन पोषण , देख रेख भी सही हो , और महिलाएं भी संतुष्‍ट रहे , इसके लिए सरकार को बहुत गंभीरता से एक उपाय करने की आवश्‍यकता है। नौकरी को लेकर महिलाओं के सख्‍त होने का सबसे बडा कारण यह है कि उम्र बीतने के बाद उनके लिए कोई संभावनाएं नहीं बचती , जबकि बच्‍चों को पढाने के क्रम में उनकी पढाई लिखाई चलती रहती है और भले ही अपने विशिष्‍ट विषय को भूल भी गयी हूं , उनका सामान्‍य विषयों का सामान्‍य ज्ञान कम नहीं होता। इसलिए सरकार को 35 से 40 वर्ष की उम्र के विवाहित बाल बच्‍चेदार महिलाओं पर उचित ध्‍यान देना चाहिए। उनके लिए हर प्रकार के सरकारी ही नहीं प्राइवेट नौकरियों में भी आरक्षण देने की व्‍यवस्‍था करनी चाहिए। इसके अतिरिक्‍त उन्‍हें व्‍यवसाय के लिए बैंको से बिना ब्‍याज के ऋण और अन्‍य तरह की सुविधाएं मुहैय्या करायी जानी चाहिए, ताकि घर परिवार संभालते वक्‍त भविष्‍य में कुछ आशाएं दिखती रहें। महिला विकास के लिए काम कर रही सरकारी गैरसरकारी तमाम संस्‍थाओं से मेरा अनुरोध है कि सिर्फ गांव की महिलाओं के लिए ही नहीं , मध्‍यम वर्ग की महिलाओं के लिए तथा आने वाली पीढी की बेहतर सुरक्षा के लिए इस मांग को सरकार के समक्ष रखे। आने वाली बेहतर पीढी के लिए महिलाओं का भविष्‍य के लिए आश्‍वस्‍त रहना आवश्‍यक है।

शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

दामिनी को सच्‍ची श्रद्धांजलि कैसे मिले ??

पुराने वर्ष को विदा करने और नए वर्ष का स्‍वागत करने के , व्‍यतीत किए गए वर्ष का मूल्‍यांकण करने और नए वर्ष के लिए अपने कार्यक्रम बनाने यानि हर व्‍यक्ति के लिए महत्‍वपूर्ण दिसंबर के उत्‍तरार्द्ध और जनवरी के पूवार्द्ध में पड रही कडाके की ठंड के मध्‍य देश एक अलग ही आग में जल रहा है । एक दुष्‍कर्म के एवज में अपराधियों को फांसी मिलने की मांग पर जनता अटल है , और सरकार अपनी जिद पर । पर सारी घटनाओं को देखने सुनने और चिंतन करने के बाद चाहकर भी इतने दिनों तक अपने विचारों को सुनियोजित ढंग से लिख पाने में सफल न हो सकी। क्‍यो‍कि मेरा सारा ध्‍यान संकेन्‍द्रण अपने सॉफ्टवेयर में एक एक्‍सटेंशन करने में बना हुआ था , जिसकी जानकारी ज्‍योतिषप्रेमियों को मेरे ज्‍योतिष वाले ब्‍लॉग से मिल जाएगी , मुझे यहां चर्चा करने की जरूरत नहीं है , क्‍योंकि इससे मुख्‍य मुद्दे से भटकने का भय है। 

वैसे बहुत खुशी की बात है कि 23 वर्षीया बच्‍ची दामिनी को इंसाफ दिलाने के लिए सारा देश एक साथ उठ खडा हुआ है। वैसे ऐसी घटना कोई पहली बार हमारे देश में नहीं हुर्इ है , प्रतिदिन अखबारों में ऐसी घटनाएं नजर में आ ही जाती हैं , शारिरीक और भावनात्‍मक तौर पर कमजोर होने का फायदा कभी कोई उठा ही लेता है। पुराने जमाने में तो बच्चियां अभिभावकों के आसपास उनकी देख रेख में रहा करती थी । पर आज युग बदल चुका है , बचे भी तो वे कैसे ? शिक्षा दीक्षा काम काज सब उनके लिए भी आवश्‍यक है , पहले की महिलाओं की तरह चादर बुरके में घर आंगन में कैद तो नहीं रह सकती। हजारों महिलाएं अपने साथ हो रहे अन्‍याय को आज भी बेबसी से देख रही हैं। 

इसका मुख्‍य कारण यह है कि हमारे समाज में आजतक ऐसी व्‍यवस्‍था है कि इस मामले में शिकारी को नहीं शिकार को ही सजा दी जाती है। यही कारण है कि आजतक लडकियों की जीवनशैली को इस कदर बनाया जाता रहा कि वे किसी के शिकार होने से बचे। यदि कभी किसी खास परिस्थिति में उनके साथ कोई हादसा हो भी गया तो इस बात को पचाना लडकियों या उसके परिवार वालों की मजबूरी होती है। दुनिया भर में प्रत्‍येक समाज और राष्‍ट्र में अपराध के हिसाब से दिया दोषी को दंड दिए जाने का नियम है। पर हमारे यहां आजतक ऐसे अपराध करने वाले समाज में सर उठाकर घूमते हैं। पर तरह तरह के सवालों , तानों से मासूम लडकियों का जीवन बेकार हो जाता है । इसलिए आजतक प्रत्‍येक गांव शहरों में ऐसे मुद्दों को अभिभावकों द्वारा ढंककर ही रखा जाता है। यहां तक कि ऐसी अपराधों की जानकारी बच्चियों या घर की महिलाओं तक ही सीमित रह जाती है , घर के पुरूषों तक को ऐसे अपराधों का पता नहीं चल पाता। बच्चियों , उनके अभिभावकों की चुप्पियों का बलात्‍कारी नाजायज फायदा उठा रहे हैं।

गिने चुने मामलों में ही ऐसी बातें सार्वजनिक होती है , जब घरवालों के नहीं, बाहरवालों के नजर में ऐसी घटनाएं आ जाती हैं। इस वक्‍त भी घरवालों के द्वारा नहीं , बाहरी लोगों के नजर में आ जाने से ही बलात्‍कारियों के विरूद्ध ऐसी आवाज उठी है , लाखों दामिनियां अभी भी सबकुछ झेलती जा रही हैं। खैर दामिनी अब नहीं रही , इसलिए उसकी जिंदगी के बेकार होने का खतरा तो नहीं है । पर समाज को अपनी सोंच बदलने की आवश्‍यकता है , किसी निर्दोष को दोषी ठहराना कदापि उचित नहीं , यही अपराधियों की संख्‍या के बढने की मुख्‍य वजह है। यदि महिलाओं को यह विश्‍वास होता कि उनके साथ हुए हादसे के प्रति समाज संवेदनशील रहेगा , उसकी मदद करेगा , तो ऐसे अपराध नहीं बढते , इसलिए किसी तरह के आंदोलन से पहले समाज के लोगों को अपनी मानसिकता बदलने की आवश्‍यकता है। समाज में ऐसी व्‍यवस्‍था होनी चाहिए कि अपराधी को अपना चेहरा छुपाना पडे , न कि उनके द्वारा सतायी गयी शारीरिक मानसिक तौर पर परेशान युवतियों को। उन्‍हें ससम्‍मान जीने का हक चाहिए , बिना भेदभाव के नौकरी और शादी विवाह के अवसर मिले। तभी ऐसे अपराधों में कमी हो पाएगी और दामिनी को सच्‍ची श्रद्धांजलि यही होगी।