शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2015

ज्‍योतिष का सही ज्ञान हमें आध्‍यात्‍म की ओर भी ले जाता है !!

किसी खास युग में हर क्षेत्र में किसी प्रकार की सफलता प्राप्‍त करने के लिए चाहे जिन गुणों और ज्ञान का महत्‍व हो , वे किसी एक व्‍यक्ति को शीर्ष तक क्‍यूं न पहुंचा देते हो , उनकी देखा देखी वैसे गुणों को आत्‍मसात कर स्‍वयं भी ऊंचाई पर पहुंचने के लिए चाहे हमारे जैसे कितने भी लोग प्रयत्‍नशील क्‍यूं न हों , सफल होकर हम सांसारिक सफलताओं से लैस ही क्‍यूं न हो जाएं , पर वह चिरंतन और स्‍थायी सुख नहीं दे पाते। स्‍थायी मा‍नसिक सुख प्राप्‍त करने के लिए कुछ ऐसे नियमों की जानकारी आवश्‍यक होती है , जिसे हमारे महापुरूषों द्वारा हर धर्म के सिद्धांतों के रूप में जोड दिया गया। ये सिद्धांत किसी भी व्‍यक्ति से 'अहं' को दूर करते हैं और इनके पालन से हमारे क्रियाकलाप सर्वजनहिताय होते हैं। सिर्फ अपने बारे में ही नहीं , सारे प्राणियों के साथ साथ दुनिया के एक एक कण से प्‍यार और उनकी सुरक्षा के लिए चिंतन ही आध्‍यात्‍म की ओर जाने की सीढी है । आज के दौर में गलत हाथों में जाकर धर्म का स्‍वरूप भले ही विकृत हो गया हो , पर दुनिया के प्रत्‍येक धर्म की खासियत यही थी , इससे इंकार नहीं किया जा सकता। 

आज का युग पूरे स्‍वार्थ का हो गया है , हर व्‍यक्ति को सिर्फ अपने से मतलब है।  अपना शरीर , अपने परिवार , अपने बच्‍चे , अपना व्‍यवसाय और अपना ही विकास , इसके लिए हम कोई भी तरीका अपनाने को तैयार हैं। गलत धरातल पर खडे होने के बाद भी हम अपनी उपलब्धियों पर गुमान करते हैं , बच्‍चों को भी सांसारिक रूप से ही सफल होने के हर गुर सिखाते हैं। एक व्‍यक्ति नहीं , आज सारे ही आगे बढने के लिए एक दूसरे को धक्‍का दे रहे हैं। आज ताकतवर की ही चल रही है , अपनी अपनी ताकत का हम सब दुरूपयोग कर रहे हैं , ऐसे में समस्‍त चर अचर मुसीबत में हैं। जबतक खुद के साथ विपत्ति नहीं आ जाती , दूसरे की समस्‍या पर हंसना आज हमारा खेल बना होता है। पर जब हमारे ऊपर मुसीबत आती है और हम लाचार होते हैं , तब समझ में आता है कि हमने जीवन में क्‍या क्‍या गल्तियां की हैं और हमारी जीवनशैली क्‍या होनी चाहिए। पर तब पछताने के सिवा कुछ भी नहीं होता।

ज्‍योतिष की सहायता से हम ग्रहों के पृथ्‍वी के जड चेतन पर पडनेवाले प्रभाव का अध्‍ययन करते हैं। जिस प्रकार प्रकृति में मौजूद हर जड चेतन की तरह में कुछ न कुछ विशेषताएं होती हैं , इसी प्रकार प्रत्‍येक मनुष्‍य भी भिन्‍न भिन्‍न बनावट के होते हैं , प्रत्‍येक में अलग अलग क्षमता होती है , इसलिए सबके पास सबकुछ नहीं हो सकता। भले ही सभी जड चेतन एक जैसे जीवन चक्र से गुजरते हों , पर चूंकि मनुष्‍य सबसे अधिक विकसित प्राणी है , और इसके जीवन के बहुत सारे आयाम हैं , इस कारण एक जैसे दिखने के बाद भी मनुष्‍य की जीवनशैली एक जैसी नहीं। दुनियाभर में समान उम्र के लोग भी भिन्‍न भिन्‍न परिस्थितियों से गुजरने को बाध्‍य होते हैं , प्रकृति के खास नियम के हिसाब से एक का समय अनुकूल होता है तो दूसरे का प्रतिकूल ।

ज्‍योतिष विषय की सहायता से हमें ग्रहों की मदद से अनुकूल और प्रतिकूल परिथितियों को जानने में मदद मिलती है। जब अनुकूल समय होता है , तो हमारा आत्‍मविश्‍वास बढाने के लिए हमारे मनोनुकूल वातावरण होता है , जबकि प्रतिकूल समय में हमारे साथ ऐसी ऐसी घटनाएं होती हैं , जिनसे हमारे आत्‍मविश्‍वास पर असर पडता है। जब हम अपने मनोनुकूल समय में अपने अधिकार के साथ साथ कर्तब्‍यों का पालन भी करें , तो प्रतिकूल समय में हमें काफी राहत मिल सकती है। पर यदि मनोनुकूल समय में अधिकारों का दुरूपयोग करेंगे , तो उसका बुरा फल प्रतिकूल समय में हमें या हमारे संतान को अवश्‍य झेलने को मजबूर होना होगा। प्रत्‍येक बुरा कार्य करने से पहले हमारी अंतरात्‍मा बारंबार झकझोरती है , पर हम उसे अनसुना करते हैं , पर उस गल्‍ती को करने के बाद एक दिन भी चैन से नहीं रह पाते। जिस सांसारिक सफलता को देखकर हम प्रभावित होते हैं , उसका मनुष्‍य के सुख और चैन से कोई संबंध नहीं होता। प्रकृति से जुडा व्‍यक्ति ही सर्वाधिक सुख और चैन से रह सकता है।

इसके अलावे ज्‍योतिष से हमें इस बात के संकेत मिल जाते हैं कि जातक के आनेवाले समय में किसी खास पक्ष का वातावरण सुखद रहेगा या कष्‍टप्रद ..  इस बात का अहसास होते ही प्रकृति के नियमों के प्रति हमारा विश्‍वास गहराने लगता है। चूंकि सुख और कष्‍ट की सीमा को जान पाना मुश्किल है , इसलिए हमलोग किसी भी परिस्थिति में हार नहीं मानते , अंत अंत तक जीतने की कोशिश करते है , पर न जीत का घमंड होता है , न हार का गम । हम यह मान लेते हैं कि जो भी परिणाम हमारे सामने है , वो प्रकृति के किसी नियम के अनुसार हैं। हमने किसी समय कोई गल्‍ती की , जिसका फल हमें भुगतना पड रहा है। ऐसी स्थिति में हम दूसरों पर व्‍यर्थ का दोषारोपण नहीं करते , प्रकृति को जिम्‍मेदार मानकर अपने मन को कलुषित होने से बचा लेते हैं। हमें विश्‍वास हो जाता है कि यदि जानबूझकर दूसरा हमें कष्‍ट दे रहा है , तो प्रकृति उसका हिसाब किताब अवश्‍य रखती है और आनेवाले दिनों में उसका फल उसे स्‍वयं मिलेगा। इस प्रकार प्रकृति के नियमों के सहारे आध्‍यात्‍म का ज्ञान हमें ज्‍योतिष के माध्‍यम से मिल जाता है।

गुरुवार, 20 अगस्त 2015

हर क्षेत्र की घुसपैठ से ज्‍योतिष अधिक बदनाम हुआ है !!

आम जनता एक ज्‍योतिषी के बारे में बहुत सारी कल्‍पना करती है , ज्‍योतिषी सर्वज्ञ होता है , वह किसी के चेहरे को देखकर ही सबकुछ समझ सकता है , यदि नहीं तो कम से कम माथे या हाथ की लकीरे देखकर भविष्‍य को बता सकता है। यहां तक कि किसी के नाम से भी बहुत कुछ समझ लेने के लिए हमारे पास लोग आ जाते हैं। एक ज्‍योतिषी खोए हुए वस्‍तु , व्‍यक्ति के बारे में भी बतलाए , शुभ और अशुभ मुहूर्त्‍तों के बारे में भी और हर प्रकार की पूजा की पद्धति के बारे में भी। इतना ही नहीं, एक ज्‍योतिषी आपको कष्‍ट से पूरी तरह उबारे, किसी न किसी प्रकार की पूजा पाठ यंत्र तंत्र मंत्र और पूजा पाठ का सहारा लेकर आपको सफलता के नए नए सोपानों को तय करने में मदद करे। मानो ज्‍योतिषी ज्‍योतिषी न हुए , पूरे भगवान हो गए ।

प्राचीन काल से ही मनुष्‍य बहुत ही महत्‍वाकांक्षी है , वह भूत के अनुभवों  और वर्तमान की वास्‍तविकताओं को लेकर तो काम करता ही आया है , भविष्‍य के बारे में भी अनुमान लगाने की उसकी प्रवृत्ति रही है। प्राचीन काल से ही एक आसमान से उन्‍हें बहुत सारी सूचनाएं मिल जाती थी , सूर्योदय और सूर्यास्‍त की , अमावस्‍या और पूर्णिमा की तथा ऋतु परिवर्तन की भी। आसमान में होनेवाले हवा के रूख और बादलों के जमावडे को देखकर ही बारिश का अनुमान वे लगाते  थे , यहां तक कि आसमान में फैले धूल तूफान का और धुआं आग के फैलने की जानकारी देता था। इस तरह से भविष्‍य को कुछ दूर तक देख पाने में मनुष्‍य आसमान पर निर्भर होता गया और आसमान को देखने की प्रवृत्ति भी विकसित हुई।

कालांतर में ग्रहों नक्षत्रो के पृथ्‍वी पर पडनेवाले प्रभाव को देखते हुए 'ज्‍योतिष' जैसे विषय का विकास किया गया। घटनाओं का ग्रहों से तालमेल होता है , इस दिशा में शोध की अनगिनत संभावनाएं हो सकती है , पर वैदिक ज्ञान ही इस मामले में पर्याप्‍त है , ऐसा नहीं माना जा सकता। क्‍यूंकि सैद्धांतिक ज्ञान भले ही सैकडों वर्ष पुरानी पुस्‍तकों में लिखी हों , पर व्‍यावहारिक ज्ञान हमेशा देश , काल और परिस्थिति के अनुरूप होता है। इसलिए आज के प्रश्‍नों का जबाब हम वैदिक कालीन ग्रंथ में नहीं तलाश सकते। इसके लिए हमें नए सिरे से शोध की आवश्‍यकता है ही , यही कारण है कि जब जब ज्‍योतिष को साबित करने की बारी आती है , तो इसकी कई कमजोरियां उजागर हो जाती हैं , हम सफल नहीं हो पाते। लेकिन इतना तो अवश्‍य तय है कि भविष्‍य को जानने और समझने की एकमात्र विधा ज्‍योतिष ही है , इसलिए किसी भी काल में इसका महत्‍व कम नहीं आंका जा सकता।

इसके महत्‍व को देखते हुए ही हर क्षेत्र के लोगों ने इस विषय में घुसपैठ करने की कोशिश की है , कर्मकांडी , आयुर्वेदाचार्य या गणितज्ञ को तो छोड ही दें , जादूगरों और तांत्रिक ने भी इस क्षेत्र में प्रवेश की पूरी कोशिश की। यज्ञ , हवन , पूजा पाठ आदि के लिए विधि विधान की जो बातें हैं , उनकी जानकारी कर्मकांडी पंडितों को बहुत अच्‍छी तरह होती है , पर वैसे सभी पंडित एक अच्‍छे ज्‍योतिषी नहीं हो सकते। इसी प्रकार गणित जानने वाला का ज्‍योतिष से कोई संबंध नहीं होता। आयुर्वेदाचार्य भले ही कुछ बीमारियों का ज्‍योतिष से संबंध बनाकर ज्‍योतिष में एक पाठ जोड दें , पर उनको एक सफल ज्‍योतिषी मानने में बडी बाधाएं आएंगी। जादूगर और तांत्रिक की कला और माया से भी ज्‍योतिष को कोई मतलब नहीं ।

पर इस दिखावटी दुनिया में कुछ गणितज्ञ अपने गणित की गति से , कुछ जादूगर अपने जादू से , कुछ तांत्रिक अपने तंत्र मंत्र से तो कुछ कर्मकांडी अचूक कर्मकांडों से लोगों को भ्रमित कर ज्‍योतिष के क्षेत्र में भी अपना सिक्‍का चलाना चाहते हैं।  इनके क्रियाकलापों के कारण आम जनता 'ज्‍योतिष' जैसे पवित्र विषय का सटीक मतलब नहीं समझ पाती। इसके साथ साथ सदियों से चले आ रहे जन किंवदंतियों को भी ज्‍योतिष में भी जोड दिया गया है। सबका घालमेल होने से ही ज्‍योतिष के एक सही स्‍वरूप की कल्‍पना कर पाने में लोग असमर्थ है। लोगों को यह ज्ञात नहीं हो पाता कि ज्‍योतिष भविष्‍य के बारे में अनुमान में और समय समय पर निर्णय लेने में उनकी बहुत मदद कर सकता है , और यही समाज में ज्‍योतिष के महत्‍व को कम करने की मूल वजह भी है।

शुक्रवार, 14 अगस्त 2015

कर्मकांड और ज्‍योतिष बिल्‍कुल अलग अलग विधा है !!

कुछ अनजान लोगों को मैं अपने प्रोफेशन ज्‍योतिष के बारे में बताती हूं , तो एक महिला के ज्‍योतिषी होने पर उन्‍हें आश्‍चर्य होता है। क्‍यूंकि उनकी जानकारी में एक ज्‍योतिषी और गांव के पंडित में कोई अंतर नहीं है , जो उनके बच्‍चों की जन्‍मकुंडली बनाता है , विभिन्‍न प्रकार के शुभ कार्यों के लिए मुहूर्त्‍त देखता है , घर में पूजा पाठ करता है , विवाह के लिए जन्‍मकुंडली मिलान करता है , लग्‍न निकालता है , कोई सामान खोने पर उसकी वापसी की दिशा बताता है। उसके पास एक पंचांग होता है ,‍ जिसमें हर काम के उपयुक्‍त तिथि और कर्मकांड की विधियां दी हुई है। पर चूंकि जनसामान्‍य को इन बातों की जानकारी नहीं है , इसलिए पंडित लोगों के लिए ज्ञानी है,  उनसे पूछे बिना कोई काम नहीं करते। कभी किसी महिला की इस पेशे में उपस्थिति नहीं देखी , इसलिए उनका आश्‍चर्यित होना स्‍वाभाविक है।

हमारे गांव में ज्‍योतिषीय सलाह लेने  दूर दूर से लोग पापाजी के पास आया करते। पापाजी की अंधभक्‍तों से कभी नहीं बनी , चाहे वो परंपरा के हों या विज्ञान के। प्रारंभ से अबतक वे तार्किक बुद्धिजीवी वर्ग से ही ग्रहों के स्‍वभाव और उसके अनुसार उसके प्रभाव की विवेचना करते रहें। उनकी लोकप्रियता में कमी का यही एक बडा कारण रहा। पर घर के बाहर हमेशा गाडी खडी होने से गांव के लोगों को बडा आश्‍चर्य होता। धीरे धीरे लोगों को मालूम हुआ कि ये पंडित है , इसलिए लोग इनके पास आया करते हैं। फिर तो गांव वाले लोग भी अपनी समस्‍याएं लेकर आने लगे। किसी की बकरी खो गयी है , किसी का बेटा चला गया है , कोई व्रत करे तो किस दिन , कोई विवाह करे तो किससे और कौन से दिन ??

गांव के किसी भी व्‍यक्ति को पापाजी 'ना' नहीं कह सकते थे , पर उनके पीछे इतना समय देने से उनके अध्‍ययन मनन में दिक्‍कत आ सकती थी। हम सभी भाई बहन भी ऊंची कक्षाओं में पढ रहे थे , किसी को भी उन्‍हें समय देने की फुर्सत नहीं थी। ग्रहों नक्षत्रों की स्थिति को देखने के लिए जो पंचांग िपापाजी  उपयोग में लाते , उसी में सबकुछ लिखा होता , पापाजी ने आठ वर्षीय छोटे भाई को पंचांग देखना सिखला दिया था। दो चार वर्षों तक मेरा छोटा भाई ही इनकी समस्‍याओं को सुलझाता रहा , क्‍यूंकि इसमें किसी प्रकार की भविष्‍यवाणी नहीं करनी पडती थी। हजारो वर्ष पूर्व जिस आधार पर पंचांग बनाए जाते थे , जिस आधार पर शकुन , मुहूर्त्‍त , दिशा ज्ञान आदि होता था , आजतक उसमें किसी भी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया गया है , इसमें कितनी सच्‍चाई और कितना झूठ है , इसकी भी कभी जांच नहीं की गयी है। अंधभक्ति में लोग पंडितों की बातों को आजतक सत्‍य मानते आ रहे हैं , आठ वर्ष के बच्‍चे की बातों को भी सत्‍य समझते रहें।

प्राचीन काल में गांव के पंडितों का संबंध सिर्फ कर्मकांड से था , क्रमश: बालक के जन्‍म का रिकार्ड रखने के लिए जन्‍मकुंडली बनाने का काम भी उन्‍हें सौंप दिया गया। पर ज्‍योतिषीय गणना का काम और किसी प्रकार की भविष्‍यवाणी तो ऋषि मुनियों के अधीन था। हां उन्‍होने कुछ पुस्‍तके जरूर लिखकर इन पंडितों को दी , जिनके आधार पर बालक की जन्‍मकुंडली  बनाने के बाद बच्‍चे के आनेवाले जीवन के बारे में कुछ बातें लिखी जा सकती थी। पर समय सापेक्ष भविष्‍यवाणी करने के लिए बडे स्‍तर पर गाणितिक अध्‍ययन मनन की आवश्‍यकता होती है , जिसकी परंपरा भारतवर्ष में उन ऋषि मुनियों के बाद समाप्‍त हो गयी। यही कारण है कि आज तक समाज में ज्‍योतिष और कर्मकांड को एक ही चीज समझा जाता है , दोनो को हेय नजर से देखा जाता है।

उस समय से लोगों के मन में जो भ्रम बना , वो अभी तक दूर नहीं हो पा रहा है। एक ज्‍योतिषी के रूप में मुझे समझने के बाद जन्‍मकुंडली बनवाने , मुहूर्त्‍त देखने , जन्‍मकुंडली मिलाने तथा अन्‍य कर्मकांडों की जानकारी के लिए मेरे पास लोग फोन किया करते हैं। कुछ लोग पूछते हैं कि बिना संस्‍कृत के आप ज्‍योतिष का काम कैसे कर सकती है ?? भले ही हर ज्ञान विज्ञान किसी न किसी रूप में एक दूसरे से सहसंबंध बनाते हों , पर लोगों को यह जानकारी होनी चाहिए कि कर्मकांड और ज्‍योतिष में फर्क है। दोनो के विशेषज्ञ अलग होते हैं , सामान्‍य तौर पर कोई जानकारी भले ही दूसरे विषय की दी जा सकती है , पर विशेष जानकारी के लिए लोग को संबंधित विषय के विशेष जानकारी रखने वालों से ही संपर्क करना उचित है। मैं ग्रहों के पृथ्‍वी के जड चेतन पर पडनेवाले प्रभाव का अध्‍ययन करती हूं और उसी आधार पर पृथ्‍वी में होनेवाली घटनाओं का समय से पूर्व आकलन करती हूं। कर्मकांड की जानकारी या अपने या अपने बच्‍चे की जन्‍मकुंडली का चक्र तो लोग किसी पंडित से प्राप्‍त कर सकते हैं , पर संबंधित व्‍यक्ति के वर्तमान भूत और भविष्‍य के बारे में कुछ जानकारी की आवश्‍यकता हो , तब मुझसे संपर्क किया जाना चाहिए।

गुरुवार, 13 अगस्त 2015

पूर्णिमा के दिन तैयार किया जानेवाला चाँदी का छल्ला

हमलोग जब भी ग्रहों के प्रभाव और ज्‍योतिष की चर्चा करते हैं , आम लोगों की जिज्ञासा किन्‍ही अन्‍य बातों में न होकर ग्रहों के दुष्‍प्रभाव को दूर करने के उपायों को जानने की ही होती है। इस विषय पर हमने 'क्‍या भवितब्‍यता टाली जा सकती है ?' शीर्षक से 11 आलेखों की एक पूरी शृंखला ही तैयार की है , जिसमें स्‍पष्‍ट किया गया है कि प्रकृति के नियमों को समझना ही बहुत बडा ज्ञान है , उपचारों का विकास तो इसपर विश्‍वास होने या इस क्षेत्र में बहुत अधिक अनुसंधान करने के बाद ही हो सकता है। अभी तो परंपरागत ज्ञानों की तरह ही ज्‍योतिष के द्वारा किए जाने वाले उपचारो को बहुत मान्‍यता नहीं दी जा सकती , पर ग्रहों के प्रभाव के तरीके को जानकर अपना बचाव कर पाने में हमें बहुत सहायता मिल सकती है। लेकिन फिर भी ज्‍योतिषियों द्वारा लालच दिखाए जाने पर लोग उनके चक्‍कर में पडकर अपने धन का कुछ नुकसान कर ही लेते हैं।

ग्रहों के अनुसार हो या फिर पूर्वजन्‍म के कर्मों के अनुसार, जिस स्‍तर में हमने जन्‍म लिया , जिस स्‍तर का हमें वातावरण मिला,  उस स्‍तर में रहने में अधिक परेशानी नहीं होती। पर कभी कभी अपनी जीवनयात्रा में अचानक ग्रहों के अच्‍छे या बुरे प्रभाव देखने को मिल जाते हैं , जहां ग्रहों का अच्‍छा प्रभाव हमारी सुख और सफलता को बढाता हुआ हमारे मनोबल को बढाता है , वहीं ग्रहों का बुरा प्रभाव हमें दुख और असफलता देते हुए हमारे मनोबल को घटाने में भी सक्षम होता है। वास्‍तव में , जिस तरह अच्‍छे ग्रहों के प्रभाव से जितना अच्‍छा नहीं हो पाता , उससे अधिक हमारे आत्‍मविश्‍वास में वृद्धि होती है द्व ठीक उसी तरह बुरे ग्रहों के प्रभाव से हमारी स्थिति जितनी बिगडती नहीं , उतना अधिक हम मानसिक तौर पर निराश हो जाया करते हैं। ज्‍योतिष के अनुसार हमारी मन:स्थिति को प्रभावित करने में चंद्रमा का बहुत बडा हाथ होता है। धातु में चंद्रमा का सर्वाधिक प्रभाव चांदी पर पडता है। यही कारण है कि बालारिष्‍ट रोगों से बचाने के लिए जातक को चांदी का चंद्रमा पहनाए जाने की परंपरा रही है। बडे होने के बाद भी हम चांदी के छल्‍ले को धारण कर अपने मनोबल को बढा सकते हैं।

आसमान में चंद्रमा की घटती बढती स्थिति से चंद्रमा की ज्‍योतिषीय प्रभाव डालने की शक्ति में घट बढ होती रहती है। अमावस्‍या के दिन बिल्‍कुल कमजोर रहने वाला चंद्रमा पूर्णिमा के दिन अपनी पूरी शक्ति में आ जाता है। आप दो चार महीने तक चंद्रमा के अनुसार अपनी मन:स्थिति को अच्‍छी तरह गौर करें , पूर्णिमा और अमावस्‍या के वक्‍त आपको अवश्‍य अंतर दिखाई देगा। पूर्णिमा के दिन चंद्रोदय के वक्‍त यानि सूर्यास्‍त के वक्‍त चंद्रमा का पृथ्‍वी पर सर्वाधिक अच्‍छा प्रभाव देखा जाता है। इस लग्‍न में दो घंटे के अंदर चांदी को पूर्ण तौर पर गलाकर एक छल्‍ला तैयार कर उसी वक्‍त उसे पहना जाए तो उस छल्‍ले में चंद्रमा की सकारात्‍मक शक्ति का पूरा प्रभाव पडेगा , जिससे व्‍यक्ति के मनोवैज्ञानिक क्षमता में वृद्धि होगी। इससे उसके चिंतन मनन पर भी सकारात्‍मक प्रभाव पडता है। यही कारण है कि लगभग सभी व्‍यक्ति को पूर्णिमा के दिन चंद्रमा के उदय के वक्‍त तैयार किए गए चंद्रमा के छल्‍ले को पहनना चाहिए।

'वक्‍त की ताकत' को देखते हुए गत्यात्मक ज्योतिष ने दिए जीने के १० सूत्र ……।

    'वक्‍त की ताकत' को देखते हुए गत्यात्मक ज्योतिष ने दिए हैं जीने के १० सूत्र ……

  1. विरले लोग ही ऐसे होते हैं , जिनके अधिकांश ग्रह मजबूत और जीवन भर का समय या जीवन का हर पक्ष सुखात्मक  हो ! 
  2. विरले लोग ही ऐसे भी होते हैं , जिनके अधिकांश ग्रह कमजोर  और  जीवन भर का समय या  जीवन का हर पक्ष दुःखात्मक हो  !
  3. आपके जन्‍मकालीन ग्रहों की चाल के हिसाब से बने इस ग्राफ के अनुसार आपका अच्‍छा और बुरा वक्‍त चलता रहता है , उसपर ध्‍यान न दें और नियमित तौर पर अपने कर्म करते रहें। 
  4. जीवनयापन के लिए अपनी रूचि के कर्म ढूंढें , क्‍योंकि जितनी पहचान आपको आपके रूचि के काम में मिल सकती है उतनी कहीं नहीं। 
  5. कर्म करने वालों को बुरे वक्‍त में यथोचित सफलता नहीं मिलती,  पर उनके अनुभव में निरंतर वृद्धि होती है, जिससे भविष्‍य में उसके सफल होने की संभावना बनी रहती है। 
  6. जिन्‍हेंं अच्‍छे वक्‍त में उम्‍मीद से अधिक सफलता मिलने लगती है , वे थोडे लापरवाह हो जाते हैं, जिससे भविष्‍य में उनके असफल होने की संभावना बनती है। 
  7. यदि जीवन में अच्‍छा वक्‍त पहले आए तो अपने अधिकारों का सदुपयोग करें , जनहित के कार्य करें , आनेवाले बुरा वक्‍त भी कोई बडी समस्‍या नहीं लेकर आता।
  8. यदि जीवन में अच्‍छा वक्‍त पहले आए तो कभी भी अपने अधिकारों का दुरूपयोग न करें , बाद में आनेवाला बुरा वक्‍त आपको रूला सकता है। 
  9. यदि जीवन में बुरा वक्‍त पहले आए तो धैर्य बनाए रखें और काम करते रहें, वक्‍त कभी भी पलट जाता है और आपको अपने कर्मों का फल दे जाता है। 
  10. यदि जीवन में बुरा वक्‍त पहले आए तो धैर्य खोकर काम करना न बंद करें, क्‍योंकि आपने जब कुछ किया नहीं तो जब वक्‍त बदलेगा भी तो आपको कुछ नहीं दे पाएगा। 

बुधवार, 12 अगस्त 2015

अपने बचने के लिए कुछ भी करो .. पर धर्म और ज्‍योतिष को यूं बदनाम न करो बाबा !!

दुनिया भर के खासकर भारत में गली गली , मुहल्‍ले मुहल्‍ले विचरण करने वाले बाबाओं , तुम अपने शहर में न जाने कितने अपराध करते हो , पर काफी दिनों तक पुलिस की लापरवाही या उनसे मिलीभगत से तुम पकडे नहीं जाते , इस उत्‍साह से बडी बडी गलतियां करने लगते हो , फिर जब तुमपर शिकंजे कसे जाने लगते हैं , तो शहर से भागना और पुलिस से बचना ही तुम्‍हारा एक लक्ष्‍य हो जाता है , बचने का सबसे बडा रास्‍ता तुम्‍हें बाबाजी बनने में दिखाई देता है , बडी मूंछ और दाढी के कारण लोगों के लिए तुम्‍हारे चेहरे को पहचानना काफी मुश्किल हो जाता है , बाबा का रूप धारण कर लेने से जनता की आस्‍था का भी तुम नाजायज फायदा उठा लेते हो , यदि किसी की आस्‍था तुमपर नहीं बन रही होती , तो डराना और धमकाना तो तुम्‍हारा स्‍वभाव है, इसलिए इस राह में चलकर आराम से अपनी महत्‍वाकांक्षा के अनुरूप पैसे का इंतजाम तो तुम कर लेते हो !

बाबा बनने के बाद तो तुम्‍हारा जीवन और रंगीन बन जाता है , श्‍मशान सिद्ध कर चुके हो तुम , यह कहकर भक्‍तों के सम्‍मुख भी शराब पीने से तुम कोई परहेज नहीं करते , कमाख्‍या मंदिर में सिद्धि प्राप्‍त कर चुके हो , इसलिए मांस से भी कोई परहेज की आवश्‍यकता नहीं , महिलाओं को मां मानते हो , इसलिए उनसे घिरे होने में भी तुम्‍हें दिक्‍कत नहीं ,  कन्‍याओं से सेवा करवाकर तुम उनकी मनोकामना पूरी होने का आशीर्वाद दे देते हो , हत्‍या और लूटपाट के पाप के साथ तुम लोगों के कल्‍याण का दावा कर लेते हो , महात्‍मा होने के बावजूद भविष्‍यवाणी करने का रिस्‍क नहीं लेते , उपाय की पूरी व्‍यवस्‍था कर देते हो , एक शहर में तुम्‍हें रहना नहीं , इसलिए साख बनाए रखने की कोई चिंता नहीं , लोगों से पैसों की बरसात करवा लेते हो तुम , इस तरह अपराधी के नाम से भी जो सुख सुविधा नहीं मिलती , वो बाबा बनकर तुम्‍हें मिल जाती है !

तुमसे नाम पूछा जाता है तो अपने को हिंदुस्‍तानी बताते हो , गांव , जिला या प्रदेश पूछा जाता है तो हिंदुस्‍तान कहते हो , मानो हम सब देशद्रोही हैं और तुम सच्‍चे देशभक्‍त , महान आत्‍माओं के जन्‍म से लेकर मृत्‍यु तक की हर घटना इतिहास में दर्ज होती है , अपना नाम , अपना गांव , अपना प्रदेश क्‍यूं छिपाते हो , वहीं से तो स्‍पष्‍ट हो जाता है कि तुम अपने जीवन का कोई भाग छुपा रहे हो , तुम इतिहास की किताबों में अपना नाम क्‍यूं नहीं दर्ज करवाना चाहते ,  अपने भयानक सच को सामने न लाकर अपने बाबा के स्‍वरूप को सामने रखकर तुम जनता के आस्‍था के साथ खिलवाड करते हो , उनके मनोवैज्ञानिक कमजोरी का नाजायज फायदा उठाते हो , अपने स्‍वार्थ में अंधे होकर कुछ भी करो तुम , पर धर्म और ज्‍योतिष को यूं बदनाम न करो बाबा , मेरी प्रार्थना है तुमसे !

सुप्रसिद्ध गणितज्ञ और खगोलशास्‍त्री भास्‍कराचार्य और उनकी पुत्री लीलावती की कथा से हम एक बडी सीख ले सकते हैं !!



ब्‍यूटी पार्लर आरंभ करने जा रही मेरी भांजी ने शायद पंडित या ज्‍योतिषी को भगवान ही समझ लिया , तभी तो उसने अपनी दुकान खोलने के लिए मुझे एक ऐसा मुहूर्त्‍त देखने को कहा , जिसमें खोलने पर उसकी दुकान में घाटे का कोई सवाल ही नहीं हो। ज्‍योतिष की सहायता से कोई दुकान खोलने या न खोलने या देर सवेर करने की सलाह दी जा सकती है , पर शकुन और मुहूर्त्‍त पर तो गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष बिल्‍कुल विश्‍वास नहीं करता , कई दिन पूर्व इसपर पापा जी के द्वारा एक पोस्‍ट भी किया जा चुका है , मुझे इस सोंच पर अचंभा हुआ। उसने मुझे ही समझाते हुए कहा कि उसके शहर में एक पंडित है , जो ऐसा मुहूर्त्‍त निकाल‍कर देते हैं , जिससे आपके फर्म में घाटे की कोई गुंजाइश नहीं। पढे लिखे लोग भी कभी कभी ऐसे भ्रम में कैसे पड जाते हैं , जो अव्‍यवहारिक हो। ग्रहों के पृथ्‍वी पर पडनेवाले प्रभाव के रहस्‍य को हम ढूंढ भी लें , किसी के भाग्‍य को समझने में सफलता भी प्राप्‍त कर लें , पर इसे बदलने में सफलता प्राप्‍त करना संभव है भला ? इसी संदर्भ में मुझे विद्वान भास्‍कराचार्य और उनकी पुत्री लीलावती की कथा याद आ गयी , जिसे मैने उसे भी समझाया और आज आपको सुनाने जा रही हूं ...

भास्कराचार्य प्राचीन भारत के एक प्रसिद्ध गणितज्ञ एवं खगोलशास्त्री थे। उनका जन्‍म और पालन पोषण ही एक ऐसे घर में हुआ था , जहां स लोग ज्‍योतिषी थे। इनका जन्म 1114 ई0 में हुआ था। भास्कराचार्य उज्जैन में स्थित वेधशाला के प्रमुख थे. यह वेधशाला प्राचीन भारत में गणित और खगोल शास्त्र का अग्रणी केंद्र था। लीलावती भास्कराचार्य की पुत्री का नाम था। जब लीलावती का जन्‍म हुआ , तो उसकी जन्‍मकुंडली देखकर या उसके जन्‍म के समय आसमान में ग्रहों की खास स्थिति देखकर भास्‍कराचार्य परेशान हो गए। उसकी कुंडली में वैधब्‍य योग था, वह योग बडा प्रबल था और उसके घटित होने की शत प्रतिशत संभावना थी। वे दिन रात किसी ऐसे उपाय की सोंच में थे जिससे कि उसके वैधब्‍य योग को काटा जा सके। देखते ही देखते लीलावती सयानी हो गयी , विवाह योग्‍य होने पर उसका विवाह आवश्‍यक था , पर पिता उसके विधवा रूप की कल्‍पना कर ही कांप जाते। अंत में चिंतन मनन कर उन्‍होने एक उपाय निकाल ही लिया।




उस वर्ष विवाह का एक ऐसा विशेष मुहूर्त्‍त आने वाला था , जहां किसी भी कन्‍या का विवाह किए जाने से उसके अखंड सौभाग्‍यवती रहने की संभावना थी।भास्‍कराचार्य ने उसी मुहूर्त्‍त में लीलावती का ब्‍याह करने का निश्‍चय किया। मुहूर्त्‍त देखने के लिए उस समय घडी तो होती नहीं थी , आकाश में ग्र्रहों नक्षत्रों की स्थिति से ही समय का आकलन किया जाता था । ब्‍याह की पूरी तैयारी की गयी , लेकिन ऐन मौके पर कोई अति आवश्‍यक कार्य निकल आया। भास्‍कराचार्य के पास हर क्षण का हिसाब किताब हुआ करता था , पर उनके जाने से शुभ मुहूर्त्‍त में ब्‍याह होना मुश्किल था। इसलिए काम पर जाने से पहले उन्‍होने एक यंत्र बनाया , एक बरतन में अपनी गणना के अनुसार जल डाला और उसके प्रवाह के लिए एक छिद्र बनाया। उस बरतन के पूरे जल के बह जाने के तुरंत बाद उस विवाह योग को शुरू होना था , परिवार के सब लोगों को समझाकर वे अपने काम पर चल पडें। पर बरतन के ढक्‍कन को उठाकर बार बार जल के स्‍तर को देखने के क्रम में लीलावती के गले के माले का एक मोती या कुछ और बरतन में गिर पडा और उससे जल का प्रवाह रूक गया। जल के प्रवाह में रूकावट आने से जल पूरा बह न सका और देखते ही देखते विवाह का मुहूर्त्‍त निकल गया। पिता के लौटने तक तो बहुत देर हो चुकी थी , मजबूरन किसी और मुहूर्त्‍त मे उसका विवाह करवाना पडा।

इस कहानी से सीख मिलती है कि सचमुच प्रकृति के नियमों को कोई नहीं बदल सकता। फिर वहीं हुआ , जो लीलावती की जन्‍मकुंडली में लिखा था, विवाह के एक वर्ष के अंदर ही उसके पति की मृत्‍यु हो गयी। लीलावती को अपने पिताजी के ज्ञान पर और ज्‍योतिष पर विश्‍वास होना ही था। वह पिता के साथ ही गणित और ज्‍योतिष के अध्‍ययन में जुट गयी। लीलावती के प्रश्‍नों का जबाब देने के क्रम में ही "सिद्धान्त शिरोमणि" नामक एक विशाल ग्रन्थ लिखा गया , जिसके चार भाग हैं (१) लीलावती (२) बीजगणित (३) ग्रह गणिताध्याय और (४) गोलाध्याय। ‘लीलावती’ में बड़े ही सरल और काव्यात्मक तरीके से गणित और खगोल शास्त्र के सूत्रों को समझाया गया है। यहां तक कि आजकल हम कहते हैं कि न्यूटन ने ही सर्वप्रथम गुरुत्वाकर्षण की खोज की, परन्तु उसके 550 वर्ष पूर्व भास्कराचार्य ने पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति को विस्तार में समझा दिया था।


मंगलवार, 11 अगस्त 2015

हमारी प्रार्थना का वास्‍तविक स्‍वरूप क्‍या हो ??

जब भी हमें किसी ऐसे वस्‍तु की आवश्‍यकता होती है , जिसे हम खुद नहीं प्राप्‍त कर सकते , तो इसके लिए समर्थ व्‍यक्ति से निवेदन करते हैं। निवेदन किए जाते वक्‍त हमें अपने मन का अहंकार समाप्‍त करना पडता है । यदि हम ऐसा न करें और अपने अहंकार में बने रहें तो हमारा निवेदन स्‍वीकार्य नहीं हो सकता। इस समय हम अपनी कमजोरी को स्‍वीकार करने के साथ ही साथ सामने वाले की महत्‍ता को भी स्‍वीकार करते हैं , मन की यही निर्मलता हमें कुछ प्राप्‍त करने के लायक बनाती है। इतने बडे जीवन में हर कोई किसी न किसी स्‍थान पर एक दूसरे से महान होता है और एक दूसरे की मदद करते हुए दुनिया को आगे बढाने में समर्थ होता है। विनम्रता का अभाव और अहंकार की कमी होने से हम आगे बढने में कामयाब नहीं हो सकते हैं।

कभी कभी हमारे सामने ऐसी समस्‍याएं आ जाती है , जिसे हम न तो खुद और न ही दूसरों से हल करवा पाते हैं , उस समय एक सर्वशक्तिमान की याद अवश्‍य आ जाती है , जिसके सामने हम प्रार्थना करने लगते हैं। इस सर्वशक्तिमान का स्‍वरूप भिन्‍न भिन्‍न दृष्टिकोण वालों का भिन्‍न भिन्‍न होता है। ऐसा माना जाता है कि प्रार्थना में अद्भुत शक्ति होती है और इसके जरिए हम प्रभु या प्रकृति से संबंध बना लेते हैं। जहां धार्मिक और आध्‍यात्मिक रूचि रखने वाले व्‍यक्ति प्रतिदिन प्रार्थना करते हैं , वहीं सांसारिक या व्‍यस्‍त रहने वाले व्‍यक्ति‍ विपत्ति के उपस्थित होने पर अवश्‍य ईश्‍वर की प्रार्थना किया करते हैं। अधिकांश जगहों पर विपत्ति आते ही नास्तिकों को भी ईश्‍वर याद आ जाते हैं। प्रत्‍येक व्‍यक्ति के समक्ष ईश्‍वर का अलग अलग रूप होता है , पर प्रार्थना के सफल होने के लिए ईश्‍वर के प्रति समर्पित होने के साथ साथ अपने अहंकार का त्‍याग और मन की निश्‍छलता की आवश्‍यकता होती है। 

भले ही पूजा करने के वक्‍त हमारा स्‍नान करना , साफ सुथरा वस्‍त्र पहनना आवश्‍यक है , प्रार्थना करते वक्‍त ऐसा नहीं होता , इस समय मन का निर्मल रहना ही अधिक आवश्‍यक है। जीवन में हमारे समक्ष जो भी परिस्थितियां उत्‍पन्‍न होती हैं , वे प्रकृति के द्वारा निश्चित होती हैं। पर हम उन परिस्थितियों से लडते हुए अपने कर्म के द्वारा जीवन में आगे बढते जाते हैं। कभी कभी अचानक उपस्थित कोई विपत्ति हमें बहुत भारी लगने लगती है और उस विपत्ति को तुरंत दूर करने के लिए हम प्रार्थना करते हैं। कभी कभी हमारी प्रार्थना से समय से पहले विपत्ति दूर हो जाती है , तो उसके बदले हमें अपना कोई सुख भी छोडना पड सकता है, क्‍यूंकि प्रकृति में हमेशा किसी लेने के बदले देने का नियम होता है। भले ही इसे सामान्‍य ढंग से समझ पाना कठिन हो। इसलिए हमें उस विपत्ति को सहने की शक्ति को बढाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। इसके अलावे अधिकांश समय लोग सांसारिक सुख के लिए ही प्रार्थना करते हैं,यह भी बिल्‍कुल गलत है।

निर्मल मन से  अहंकार को त्‍याग देने के बाद की गयी प्रार्थना से हमारे मन की मुराद अवश्‍य  पूरी होती है , पर कभी कभी इसमें बडी गडबडी आती है। बाबर और हूमायूं की कहानी आपने सुनी होगी। हुमायूं जब मृत्युशय्या पर पड़ा था, बाबर ने उसकी तीन बार परिक्रमा की और अल्लाह से प्रार्थना की के वह हुमायूं की ज़िन्दगी बख्स दे चाहे बदले में उसकी ज़िन्दगी ले ले। फिर ऐसा ही हुआ, हुमायूं तो ठीक हो गया लेकिन बाबर शीघ्र ही बीमार हो कर चल बसा। इसलिए किसी मनोकामना के पूरी होने के लिए प्रार्थना करते वक्‍त कभी भी उसके बदले में कुछ ले लेने की बात मुंह से न निकाले। यह समझते हुए कि अभी आयी समस्‍या के अतिरिक्‍त अन्‍य बातों का कोई महत्‍व नहीं , लोग अक्‍सर भावावेश में कह बैठते हैं ' मेरा यह काम कर दो , चाहे बदले में कुछ भी ले लो' ऐसे में कभी कभी उस सफलता की बडी कीमत चुकानी पडती है। इसलिए प्रार्थना करते वक्‍त सांसारिक सुख और सफलता न मांगते हुए मानसिक सुख और शांति की इच्‍छा रखनी चाहिए। 

सोमवार, 10 अगस्त 2015

जड चेतन को प्रभावित करने की मुख्‍य वजह ग्रह की गति ही है

कल के आलेख में यह स्‍पष्‍ट किया गया था कि ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ किसी प्रकार की भविष्‍यवाणी करने के लिए ग्रहों की गति पर ही आधारित है। पृथ्‍वी को स्थिर मान लेने से उसके सापेक्ष ग्रहों की गति में प्रतिदिन भिन्‍नता देखी जाती है। पृथ्‍वी के जड चेतन या अन्‍य प्रकार की घटनाओं के खास व्‍यवहार का कारण ग्रहगति की ये विभिन्‍नता ही है। 40 वर्षों तक विभिन्‍न ग्रहों की विभिन्‍न गतियों का पृथ्‍वी पर पडनेवाले प्रभाव को देखते हुए ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ निम्‍न निष्‍कर्ष पर पहुंचा है ....


1. अति‍शीघ्री गति ... ग्रह जब अतिशीघ्री होते हैं तो उन्‍हें अत्‍यधिक गत्‍यात्‍मक शक्ति संपन्‍न माना जाता है । ये अनायास सुख और सफलता देनेवाले ग्रह होते हैं , जिसके कारण लोग निश्चिंत या लापरवाह स्‍वभाव के हो जाते हैं। लोगों के जो ग्रह अतिशीघी हो उनसे संबंधित संदर्भ और उनका गत्‍यात्‍मक दशाकाल निश्चिंति भरा होता है।


2. शीघ्री गति ... ग्रह जब शीघ्री होते हैं तो उन्‍हें भी गत्‍यात्‍मक शक्ति संपन्‍न माना जाता है । ये थोडी मेहनत से अधिक सफलता देनेवाले ग्रह होते हैं , जिसके कारण लोग कम मेहनत हो जाते हैं। लोगों के जो ग्रह शीघी हो उनसे संबंधित संदर्भ और उनका गत्‍यात्‍मक दशाकाल भी अच्‍छा ही होता है।


3. सामान्‍य गति ... ग्रह जब सामान्‍य होते हैं तो उन्‍हें सामान्‍य गत्‍यात्‍मक शक्ति संपन्‍न माना जाता है । ये महत्‍वपूर्ण ग्रह होते हैं , जिसके कारण लोग समन्‍वयवादी दृष्टिकोण के हो जाते हैं। लोगों के जो ग्रह सामान्‍य हो उनसे संबंधित संदर्भ और उनका गत्‍यात्‍मक दशाकाल महत्‍वपूर्ण होता है।


4. मंद गति ... ग्रह जब मंदगति के होते हैं तो उन्‍हें कुछ कम गत्‍यात्‍मक शक्ति संपन्‍न माना जाता है । ये बहुत मेहनती ग्रह होते हैं , जिसके कारण लोगों का किसी भी क्षेत्र में बहुत अधिक ध्‍यान संकेन्‍द्रण होता है। लोगों के जो ग्रह मंद गतिशील हो उनसे संबंधित संदर्भ और उनका गत्‍यात्‍मक दशाकाल बहुत ही दवाबपूर्ण होता है।


5. वक्री गति .... ग्रह जब वक्री गति में होते हैं तो उन्‍हें कम गत्‍यात्‍मक शक्ति संपन्‍न माना जाता है । ये कुछ कठिनाई और असफलता देनेवाले ग्रह होते हैं , जिसके कारण लोग थोडे चिडचिडे और निराश हो जाते हैं। लोगों के जो ग्रह वक्री हो उनसे संबंधित संदर्भ और उनका गत्‍यात्‍मक दशाकाल कठिनाई भरा होता है।


6. अतिवक्री गति ... ग्रह जब अतिवक्री होते हैं तो उन्‍हें बहुत कम गत्‍यात्‍मक शक्ति संपन्‍न माना जाता है । ये बहुत अधिक कठिनाई और तनाव देनेवाले ग्रह होते हैं , जिसके कारण लोग किंकर्तब्‍यविमूढ और अवसाद ग्रस्‍त हो जाते हैं। लोगों के जो ग्रह अतिवक्री हो उनसे संबंधित संदर्भ और उनका गत्‍यात्‍मक दशाकाल पराधीन और लाचार होता है।


यदि गत्‍यात्‍मक शक्ति की दृष्टि से यानि सुख के नजर से देखा जाए तो अतिशीघ्री ग्रह को सर्वाधिक मजबूत और अतिवक्री ग्रह को सर्वाधिक कमजोर माना जा सकता है , पर स्‍थैतिक शक्ति की दृष्टि से यानि कार्यक्षमता और महत्‍व की नजर से देखा जाए तो सामान्‍य और मंद ग्रह को सर्वाधिक मजबूत माना जा सकता है , क्‍योकि अधिकांश ग्रहों के शीघ्री या अतिशीघ्री होने के समय का माहौल खुशनुमा होता है और उस समय जो भी जातक जन्‍म लें , जीवनभर खुशनुमा माहौल प्राप्‍त करते हैं। इसी तरह अधिकांश ग्रहों के वक्री या अतिवक्री होने के समय का माहौल कष्‍टदायक होता है और उस समय जो भी जातक जन्‍म लें , जीवनभर कष्‍टप्रद माहौल प्राप्‍त करते हैं। इन दोनो के ही विपरीत , अधिकांश ग्रहों के सामान्‍य या मंद होने के समय का माहौल महत्‍वपूर्ण और दवाबपूर्ण होता है और उस समय जो भी जातक जन्‍म लें , जीवनभर महत्‍वपूर्ण और दवाबपूर्ण माहौल प्राप्‍त करते हैं।

रविवार, 9 अगस्त 2015

सिर्फ नाम से ही गत्‍यात्‍मक नहीं है ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’


‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ सिर्फ नाम से ही गत्‍यात्‍मक नहीं है , इसका नामकरण ऐसा किया गया है क्‍योंकि इसके द्वारा भविष्‍यवाणी करने का मुख्‍य आधार ग्रहों की गति ही है। सौरमंडल में भले ही सूर्य स्थिर हो और पृथ्‍वी उसकी परिक्रमा करती हो , पर फलित ज्‍योतिष पृथ्‍वी को स्थिर मानकर उसके सापेक्ष ग्रहों की स्थिति का अध्‍ययन करता है। पृथ्‍वी को स्थिर मान लेने से उसके सापेक्ष ग्रहों की गति में प्रतिदिन भिन्‍नता देखी जाती है। यूं तो गणित ज्‍योतिष के सूर्य सिद्धांत में ग्रहों की इन गतियों की विभिन्‍नता की चर्चा हुई है , पर इसके अनुसार फलित पर प्रभाव पडने की चर्चा कहीं नहीं हुई। फलित पर ग्रहों की विभिन्‍न ग्रहों की गतियों का भिन्‍न भिन्‍न तरह के प्रभाव को देखते हुए ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष द्वारा’ ग्रह गति का निम्‍न प्रकार से वर्गीकरण किया गया है ....

1. अति‍शीघ्री गति ... ग्रह वास्‍तविक तौर पर पृथ्‍वी से अधिक दूरी पर तथा सूर्य से कम की कोणात्‍मक दूरी पर हो तो ग्रह अतिशीघ्री स्थिति में होते हैं। बुध सूर्य से 0 डिग्री से 9 डिग्री की कोणिक दूरी पर तथा 2 डिग्री प्रतिदिन की गति में हो , शुक्र सूर्य से 0 डिग्री से 15 डिग्री की कोणिक दूरी पर तथा प्रतिदिन 1 डिग्री से अधिक प्रतिदिन की गति में हो तो अतिशीघ्री अवस्‍था में होते हें। मंगल , बृहस्‍पति और शनि की कोणात्‍मक दूरी सूर्य से 0 डिग्री से 30 डिग्री के मध्‍य हो तो अतिशीघ्री होते हैं।

2. शीघ्री गति ... अतिशीघ्री की तुलना में जब ग्रहों की कोणात्‍मक दूरी सूर्य से और इनकी गति सामान्‍य से कुछ अधिक हो , तो ग्रह शीघ्री कहे जाते हैं। बुध सूर्य से 9 डिग्री से 24 डिग्री की दूरी पर तथा 1 डिग्री से अधिक प्रतिदिन की गति में हो , शुक्र 15 डिग्री से 40 डिग्री की कोणात्‍मक दूरी पर और 1 डिग्री से अधिक प्रतिदिन की गति में हो तो शीघ्री अवस्‍था का होता है। मंगल , बृहस्‍पति और शनि की दूरी सूर्य से 30 डिग्री से 75 डिग्री के मध्‍य हो तो ये शीघ्री अवस्‍था के होते हें।

3. सामान्‍य गति ... इस समय ग्रह पृथ्‍वी से औसत दूरी पर होते हैं । सूर्य से बुध की कोणात्‍मक दूरी लगभग 27 डिग्री और शुक्र की सूर्य से कोणात्‍मक दूरी 45 डिग्री होती है , जबकि मंगल , बृहस्‍पति और शनि सूर्य से 90 डिग्री की दूरी पर सामान्‍य गति में होते हैं।

4. मंदगति ... विभिन्‍न ग्रह वक्री होने के पूर्व और मार्गी होने से पश्‍चात् इस दशा से गुजरते हैं। बुध 10.12 दिन पूर्व से वक्री होने तक तथा मार्गी होने से 10;12 दिन पश्‍चात तक मंद गति में होता है। शुक्र वक्री होने से डेढ महीना पूर्व से वक्री होने तक तथा मार्गी होने के दिन से डेढ महाने बाद तक मंद गति में होता है। बृहस्‍पति वक्री होने से एक महीना पूर्व से वक्री होने तक तथा मार्गी होने के दिन से एक महीने बाद तक मंद गति में होता है। मंगल वक्री होने से दो महीने पूर्व से वक्री होने तक तथा मार्गी होने के दिन से दो महीने बाद तक मंद गति में होता है। शनि वक्री होने से एक महीना पूर्व से वक्री होने तक तथा मार्गी होने के दिन से एक महीने बाद तक मंद गति में होता है।

5. वक्री गति .... पृथ्‍वी से सापेक्षिक गति कम होने से ग्रह वक्री गति में देखे जाते हैं। इस समय पृथ्‍वी से ग्रहों की वास्‍तविक दूरी बहुत कम होने लगती है। बुध सूर्य से 18 कोणात्‍मक डिग्री की दूरी पर और शुक्र सूर्य से लगभग 30 डिग्री की कोणात्‍मक दूरी पर स्थित हो तो वे वक्री होते हें। मंगल , बृहस्‍पति और शनि सूर्य से 120 डिग्री की कोणात्‍मक दूरी पर वक्री स्थिति में आते हैं।

6. अतिवक्री गति ... इस समय ग्रहों की वास्‍तविक दूरी पृथ्‍वी से निकटतम होती है। वक्री स्थिति में सूर्य से 0 से 9 डिग्री के मध्‍य बुध और वक्री स्थिति में सूर्य से 0 डिग्री से 15 डिग्री के मध्‍य शुक्र हो तो ऐसी स्थिति बनती है। मंगल , बृहस्‍पति और शनि सूर्य से 150 डिग्री से 180 डिग्री की दूरी पर अतिवक्री अवस्‍था में होते हैं।

ग्रहों की इन भिन्‍न भिन्‍न गति के कारण उनकी गत्‍यात्‍मक और स्‍थैतिक शक्ति का आकलन और उसके जनसामान्‍य पर पडनेवाले प्रभाव की चर्चा अगले पोस्‍ट में की जाएगी।

शनिवार, 8 अगस्त 2015

क्‍या गणित में हर प्रश्‍न का जवाब ‘=’ में ही होता है ????????



इसमें कोई शक नहीं कि गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष ब्‍लागिंग की मदद से अपनी पहचान बना पाने में कामयाबी प्राप्‍त करता जा रहा है , पर कुछ दिनों से पाठकों द्वारा इसके द्वारा ज्‍योतिष के विज्ञान कहे जाने के विरोध में कुछ आवाजें भी उठ रही हैं। वैसे तो सबसे पहले मसीजीवी जी ने ज्‍योतिष को विज्ञान कहे जाने पर आपत्ति जतायी थी , पर अभी हाल में ज्ञानदत्‍त पांडेय जी के द्वारा यह प्रश्‍न उठाया गया तो मुझे काफी खुशी हुई , क्‍योंकि उनकी सकारात्‍मक टिप्‍पणियां हमेशा ही मेरा उत्‍साह बढाती आयी है। उनके बाद एक दो और पाठक भी इसी प्रकार के प्रश्‍न करते मिले हैं। आज उन सबके द्वारा उठाए गए प्रश्‍न का तर्कसंगत जवाब देना मैं उचित समझ रही हूं और शायद पहली बार हो रही इस प्रकार की सकारात्‍मक चर्चा करते हुए मुझे काफी खुशी भी हो रही है। मैं चाहूंगी कि इस प्रकार के और प्रश्‍न भी सामने आएं , मैं सबकी जिज्ञासा को शांत करने का प्रयास करूंगी।

सबसे पहले गणित विषय को ही लें। गणित में हर प्रश्‍न का जवाब ‘=’ ही नहीं होता है। इसमें किसी समीकरण का उत्‍तर ‘लगभग’ में होने के साथ ही साथ ‘>’ और ‘<’ या ‘=<’ और ‘=>’ में भी हो सकता है। कोई समीकरण ‘लिमिट’ में भी अपना जवाब देती है । सभी समीकरण एक सीधी रेखा का ही ग्राफ नहीं बनाती , पाराबोला और हाइपरबोला भी बना सकती है। गणित के संभावनावाद का सिद्धांत संभावना की भी चर्चा करता है। और चूंकि भौतिकी जैसा पूर्ण विज्ञान के भी सभी नियम गणित पर ही आधारित होते हैं , तो भला इसके भी हर प्रश्‍न का जवाब ‘=’ में कैसे दिया जा सकता है ? और बाकी विज्ञान जो भौतिकी की तरह पूर्ण विज्ञान न हो तो उसके प्रश्‍नों का जवाब ‘=’ में देना तो और भी मुश्किल है।

एलोपैथी चिकित्‍सा विज्ञान के बहुत से प्रश्‍नों का जवाब ‘=’ में दिया जा सकता है , पर सबका दे पाना असंभव है , बहुत से प्रश्‍नों का जवाब ‘लगभग’ और बहुत से प्रश्‍नों का जवाब ‘संभावनावाद’ के नियमों के अनुसार दिया जा सकता है। पहले एक ही लक्षण देखकर चार प्रकार के बीमारी की संभावना व्‍यक्‍त की जाती है , जिससे पहले डाक्‍टरों को अक्‍सर दुविधा हो जाया करती थी , आज जरूर विभिन्‍न प्रकार के टेस्‍टों ने डाक्‍टरों का काम आसान कर दिया है , तो क्‍या पहले मेडिकल साइंस विज्ञान नहीं था ? अभी तक कोई खास सफलता नहीं मिलने के बावजूद मौसम विज्ञान कहा जाता है , क्‍योंकि इस क्षेत्र में बेहतर भविष्‍यवाणी कर पाने की संभावनाएं दिखाई पड रही है। क्‍या भूगर्भ विज्ञान की भूगर्भ के बारे में की गयी गणना बिल्‍कुल सटीक रहती है ? नहीं , फिर भी उसे भूगर्भ विज्ञान कहा जाता है। संक्षेप में , हम यही कह सकते हें कि जरूरी नहीं कि वैज्ञानिक सिद्धांत हमें सत्‍य की ही जानकारी दे , जिन सिद्धांतो की सहायता से हमें सत्‍य के निकट आने में भी सहायता मिल जाए , उसे विज्ञान कहा जाता है।

यदि ज्‍योतिष शास्‍त्र के नियमों की बात करें , तो इसके कुछ नियम बिल्‍कुल सत्‍य हैं , मौसम से संबंधित जिस सिद्धांत के बारे में कल चर्चा हुई , वह बिल्‍कुल सत्‍य है। ऐसा इसलिए है , क्‍योंकि इस नियम को स्‍थापित करने में ग्रहों को छोडकर सिर्फ भौगोलिक तत्‍वों का ही प्रभाव पडता है। ग्‍लोबल वार्मिंग का ही यह असर माना जा सकता है कि आज यह योग कम काम कर रहा है और शायद आनेवाले दिनों में इतनी बरसात के लिए भी यह योग काम करना बंद कर दे। 14 – 15 जून को आप पुन: इस सिद्धांत को सत्‍यापित होते देख सकते हैं , हालांकि वह मानसून का महीना है , इसलिए स्थिति के इस बार से भी भीषण रूप में होने की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता। भारत में चारो ओर आंधी , तूफान के साथ ही साथ जोरों की बारिश भी होती रहेगी। पर ज्‍योतिष के कुछ नियम सत्‍य के निकट भी होते हैं , और कुछ के बारे में तो सिर्फ संभावना ही व्‍यक्‍त की जा सकती है , दावा नहीं किया जा सकता। ऐसा इसलिए होता है , क्‍योंकि उन नियमों पर सामाजिक , राजनीतिक , भौगोलिक या अन्‍य बहुत से कारकों का प्रभाव देखा जाता है । पर इसका अर्थ यह नहीं है कि यह एक विज्ञान नहीं है।

गुरुवार, 6 अगस्त 2015

फलित ज्योतिषःसांकेतिक विज्ञान



फलित ज्योतिष ग्रहों का मानवजीवन पर पड़नेवाले प्रभाव का अध्ययन करता है। भारत ऋषियों, मुनियों, विचारकों, गणितज्ञों और वैज्ञानिकों का देश रहा है। ज्योतिष के साथ ही साथ यहां अनेक विद्याओं का जन्म हुआ। उसके बाद पूरे विश्व में इसका प्रचार और प्रसार हुआ। पाश्चात्य देश अभी भी कई प्रकार की विद्या का जनक भारत को ही मानते हैं। ज्योतिष और गणित के क्षेत्र में विश्व को भारत का बड़ा योगदान मिला है। प्राचीन भारत में जब हर प्रकार के वैज्ञानिक साधनों का अभाव था , ज्योतिष का जितना भी विकास हुआ , हम भारतवासियों के लिए गर्व की बात है।

गणित के क्षेत्र में ब्रह्मांड का 12 भागों में विभाजन, सभी राशियों का नामकरण, नवों ग्रहों का अधिकार क्षेत्र के साथ ही साथ सौर वर्ष , चंद्रवर्ष , सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण जैसी घटनाओं का घटीपल तक ज्ञात कर लेना निस्संदेह उस युग के लिए बहुत बड़ी बात थी। फलित ज्योतिष के क्षेत्र में जन्मपत्री का निर्माण तथा अन्य ज्योतिषीय भविष्यवाणियां होती थी , जिसमें शतप्रतिशत न सही , लेकिन कुछ हद तक सत्यता अवश्य होती थी, यही कारण था कि प्राचीन राजा महाराजाओं के पास एक ज्योतिषी अवश्य रखे जाते थे , जो राजघराने में उत्पन्न बच्चों की जन्मपत्रियों का निर्माण ,अन्य भविष्यवाणियों की गणना तथा अनेक राजकार्यों के लिए मुहूर्त्त का निर्धारण करते थे।

भारतवर्ष में आज भी कुंडली बनाने , मुहूर्त्त निकालने तथा वरवधू की कुंडली मिलाने के लिए ज्योतिषियों की जरूरत पड़ती है , लेकिन आज यह विडम्बना ही है कि फलित ज्योतिष महलों से निकलकर सड़कों पर आ पड़ा है। आज अनेक ज्योतिषियों को सड़कों पर कुछ ज्योतिषीय पुस्तकों के साथ देखा जा सकता है , जो उसी के सहारे आतेजाते राहगीरों का कुछ पैसे ऐंठ लेते हैं।यही कारण है कि इतने वर्षों बाद भी इस क्षेत्र में कोई विकास नहीं हुआ। फलित ज्योतिष जैसे विषय से आज जनता का विश्वास ही उठ गया है। इसका मुख्य कारण ज्योतिष का परंपरागत व्यवसाय के रूप में सिमटकर रह जाना है। वे लम्बेलम्बे खर्चवाले अनुष्ठानों और पूजापाठ के द्वारा बिगड़े ग्रहों को तो शांत करने में असफल रहते हैं, पर इससे परेशान लोग और परेशान होते हैं।ज्योतिषी ज्योतिष की आड़ में अपने पैसे की हवस को पूरा करना चाहते हैं , इस कारण समझदार लोग अपने को ज्योतिषियों के चंगुल में फंसने से बचाना चाहते हैं।

मनुष्य का जीवन दुख और सुख से मिलकर बना है। प्राचीनकाल की अनेक कहानियों और आधुनिक जीवन के अनेक उदाहरणों से स्पष्ट है कि मनुष्य का जीवन सुख और दुख दोनों का अनुभव करने के लिए है। इसमें ग्रहों का विशेष प्रभाव पड़ता है। हमने अपने अध्ययन में पाया है कि ग्रहों के अनुसार ही मनुष्य के सामने विशेष काल में विशेष परिस्थितियां उत्पन्न होती हैं , जिसका सामना उसे करना पड़ता है। किन्तु यह नहीं कहा जा सकता कि मनुष्य की मेहनत का कोई मूल्य नहीं है। ग्रह वास्तव में मनुष्य के स्वभाव , बनावट और परिस्थितियों को नियंत्रित करता है , पर वह व्यक्ति की मेहनत , बदलते युग , बढ़ते स्तर और माहौल को नहीं नियंत्रित कर सकता , उसमें भले ही कमी और बेशी ले आवे।

विश्व में प्रति सेकण्ड एक बच्चा जन्म लेता है , इस प्रकार प्रति मिनट 60 , प्रति घंटे 3600 और एक दिन में 86400 बच्चे जन्म लेते हैं। इनमें से 7200 बच्चों की कुंडली बिल्कुल एक जैसी होती है , लेकिन उनमें से सभी बच्चे एक सी उंचाई हासिल नहीं करते। उंचाई हासिल करने के लिए मेहनत और परिस्थिति दोनो ही बड़ी चीज होती है। बहुत से ज्योतिषी किसी जन्मकुंडली में गौतम बुद्ध , राजा रामचंद्र , कृष्णजी , इंदिरा गांधी और महात्मा गांधी या किसी अन्य महान पुरूष का कोई एक योग देखकर ही कह उठते हैं-----.'अरे , तुम्हें तो राजा बनना है' या 'तुम्हारी तो 50 लाख की लाटरी लगनेवाली है' इस प्रकार की भविष्यवाणी ग्राहकों को खुश करनेवाली एक चाल है। एक योग में पैदा होनेवाले सभी बच्चों में कोई मजदूर , तो कोई कलर्क , कोई आफिसर तो कोई व्यवसायी और कोई मंत्री के घर जन्म लेता है। किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व निर्माण में आर्थिक , शैक्षणिक और अन्य वातावरण ग्रह से अधिक महत्वपूर्ण होते हैं।

बदलते युग के साथ भी ग्रहों के प्रभाव में परिवर्तन होता है। यदि किसी जन्मकुंडली में मजबूत संतान पक्ष है , तो वह मातृप्रधान युग में सामान्य व्यक्ति के लिए या किसी भी युग में एक वेश्या के लिए लड़की की अधिकता का संकेत देती है , पर पितृप्रधान युग में वही योग लड़के की अधिकता देगी। यदि किसी जन्मकुंडली में मजबूत वाहन का योग है , तो वह प्राचीनकाल में घोड़े , हाथी आदि का संकेतक था , पर आज स्कूटर मोटरसाइकिल और कार का संकेत देता है। किसी जन्मकुंडली मे असाध्य रोग से ग्रसित होने का योग हो तो वह किसी युग में व्यक्ति को टीबी का मरीज बनाती थी , उसके बाद कैंसर का और अभी वही योग उसे एड्स का मरीज बना देती है। यदि किसी व्यक्ति की जन्मकुंडली में उत्तम विद्या का योग है , तो वह प्राचीनकाल मे किसी प्रकार के विद्या की जानकारी देता था , बाद में बी ए ,एम ए की और अब वह विद्यार्थियों को प्रोफेशनल कोर्स करवा रहा है।

वातावरण में परिवर्तन भी ग्रह के प्रभाव को परिवर्तित करता है। किसी किसान या व्यवसायी का उत्तम संतान पक्ष लड़के की संख्या में बढ़ोत्तरी कर सकता है, ताकि बड़े होकर वे परिवार की आमदनी बढ़ाएं। किन्तु एक आफिसर के लिए उत्तम संतान का योग संतान के गुणात्मक पहलू की बढ़ोत्तरी करेगा। किसी जन्मपत्री में कमजोर संतान का योग एक किसान के लिए आलसी , बड़े व्यवसायी के लिए ऐय्याश और एक आफिसर के बेटे के लिए बेरोजगार बेटे का कारण बनेगा। किसी किसान के पुत्र की जन्मकुंडली में उत्तम विद्या का योग होने से वह ग्रेज्युएट हो सकता है , पर एक आफिसर के पुत्र का वही उत्तम योग उसे आई ए एस बना सकता है। किसी किसान के लिए उत्तम मकान का योग उसे पक्के का दो मंजिला मकान ही दे सकता है , पर एक बड़े व्यवसायी का वही योग उसे एक शानदार बंगला देगा। किसी कुंडली में बाहरी स्थान से संपर्क का योग किसी ग्रामीण को शहरी क्षेत्र का , शहरी व्यक्ति के लिए महानगर का , तथा महानगर के व्यक्ति के लिए विदेश का भ्रमण करवा सकता है। किसी कुंडली में ऋणग्रस्तता का योग एक साधारण व्यक्ति को 500-1000 का तथा बड़े व्यवसायी को करोड़ो का ऋणी बना सकता है।

अलग अलग देश और प्रदेश के अनुसार भी ग्रहों के प्रभाव में परिवर्तन आता है। किसी विकसित देश में किसी महिला का प्रतिष्ठा का योग उसे प्रतिष्ठित नौकरी देगा , किन्तु भारत में वही योग उस महिला को अच्छा घर वर ही प्रदान कर सकता है। इसी प्रकार किसी महिला की जन्मकुंडली में दृष्ट हल्का कमजोर पति पक्ष भारत में सिर्फ परेशानी उपस्थित करेगा , जबकि अमेरिका जैसे देश में वह तलाक देने या दिलानेवाला होगा।

इसके अतिरिक्त ग्रह मौसम से संबंधित वातावरण को भी प्रभावित करते हैं। बादल , वर्षा , बाढ़ ,तूफान या भूकम्प का आना भी ग्रह के अनुसार ही होता है। किसी दो ग्रह के विशेष संबंध के अनुसार ही किसी प्रकार के मौसमीय परिवर्तन की संभावना बनती है। ग्रह बाजार और अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित करता है। कीमतों में वृद्धि तथा मुद्रास्फिति पर भी ग्रहो का पूरा प्रभाव पड़ता है।

इस प्रकार देखा जाए , तो ग्रह सभी क्षेत्रो में अपना प्रभाव डालते हैं।आज भले ही हम अपने को विज्ञान के युग का समझकर ज्यैतिष पर हंसे या उसे नकारें , पर सत्य तो यह है कि यह पूर्ण तौर पर एक सांकेतिक विज्ञान है और यह मनुष्य के स्वभाव , बनावट और परिस्थितियों तक को बताता है।यहां तक कि ग्रह मानव मन और मस्तिष्क तक का नियंत्रक है। यह मानव मस्तिष्क को वैसा व्यवसाय , वैसी नौकरी या वैसा ही घर वर चुनने को प्ररित करता है , जैसा उसे अपनी जन्मपत्री के अनुसार मिलना चाहिए।

लेकिन यह विज्ञान 90 प्रतिशत परंपरागत और अवैज्ञानिक सिद्धांतों के जाल में फंसा हुआ है। ज्योतिषी पुराने पुराने नियमो के अनुसार ही अभी भी चल रहे हैं। उनके पास कोई नया खोज नहीं है , इसलिए इतने वर्षों बाद भी इसमें कोई नयापन नहीं आ सका है। वे एक नियम की स्थापना कर भी लें , तो उसमें अपवाद पर अपवाद जोड़ते चले जाते हैं। यह सत्य है कि फलित ज्योतिष का विकास अभी पूर्ण तौर पर नही हुआ है , इसमें शत.प्रतिशत भविष्यवाणी करना असंभव है , पर 90 प्रतिशत तो सही भविष्यवाणी की ही जा सकती है। लेकिन यह दुर्भाग्य ही है कि हम अपने को फलित ज्योतिष का जानकार बताने में शर्म का अनुभव करते हैं , क्योंकि समाज के विद्वान वर्ग इसे हेय दृष्टि से देखते है।

आज इस क्षेत्र में भी नए नए रिसर्च की आवश्यकता है। इस क्षेत्र का विकास तब ही होगा , जब पढ़े लिखे लोगों का ध्यान इस क्षेत्र में आएगा तथा वे अपना कुछ समय इस प्राचीन गौरवपूर्ण विज्ञान को समर्पित कर पाएंगे। विश्वविद्यालय को भी इस क्षेत्र में शोधकार्य करनेवालों को सम्मानित करना होगा , जिस दिन ऐसा हुआ, ज्योतिष विज्ञान की दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति शुरू हो जाएगी।

ज्योतिष का समयानुसार बदलाव आवश्यक ( Astrology)

पृथ्वी और इसमें स्थित सभी जड़-चेतन एवं जीव विकासशील है। दिन प्रतिदिन पृथ्वी के स्वरुप ,वायुमंडल ,तापमान एवं इसमें स्थित पर्वतों ,नदियों ,चट्टानों ,वनों सभी में कुछ न कुछ परिवर्तन देखा जा रहा है । मनुष्य में तो यह परिवर्तन अन्य प्राणियों की तुलना में और तेजी से हुआ है , इसलिए यह सर्वाधिक विकसित प्राणि है । पर्यावरण के हजारों , लाखों वर्ष के इतिहास के अध्ययन में यह पाया गया है कि प्रकृति में होनेवाले परिवर्तन एवं वातावरण में होनेवाले परिवर्तन के अनुरुप जो जड़-चेतन अपने स्वरुप में एवं स्वभाव में परिवर्तन ले आते हैं, उनका अस्तित्व बना रह जाता है। विपरीत स्थिति में उनका विनाश निश्चित है ।

करोड़ो वर्ष पूर्व डायनासोर के विनाश का मुख्य कारण पर्यावरणवेत्ता यह बतलातें हैं कि वे पृथ्वी के तापमान के अनुसार अपना समायोजन नहीं कर सकें। इसलिए कोई भी चीज जो अपने वातावरण के अनुरुप अपना परिवर्तन नहीं कर सके ,उसका अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है। भेड़ ठंडे प्रदेश का प्राणी है,इसलिए ठंड से बचने के लिए उसके शरीर में गर्म रोएं बन जातें हैं। यदि , उसको उस प्रदेश से लाकर गर्म प्रदेश मे रखा जाए तो रोएं बनने की मात्रा अवश्य कम हो जाएगी ,ताकि उसका शरीर और गर्म न हो जाए और उसका अस्तित्व बना रहे ,नही तो उसका विनाश निश्चित होगा।

इस प्रकार सभी शास्त्रों पर भी वातावरण का प्रभाव देखा गया है। विभिन्न भाषाओं के साहित्य पर युग का प्रभाव पड़ता देखा गया है। नीतिशास्त्र युग के साथ परिवर्तित नीतियों की चर्चा करता है । राजनीतिशास्त्र में भी अलग युग और परिस्थितियों में भिन्न-भिन्न सरकारों के महत्व की चर्चा की जाती है। औषधि-शास्त्र भी अपनी औषधियों में हमेशा परिवर्तन लाता रहा है। जमाने के साथसाथ अलग अलग पैथी लोकप्रिय होती रही । वर्तमान युग में भी हर आर्थिक और सामाजिक और मानसिक स्तर के अनुरुप इलाज की अलग-अलग पद्धतियॉ अपनायी जाती हैं। आर्थिक नीतियॉ भी समय और वातावरण के अनुरुप अपने स्वरुप को परिवर्तित करती रही ।

किन्तु आज हजारों वर्ष व्यतीत होने तथा ज्योतिष के क्षेत्र में हजारों लोगों के समर्पित होने के बावजूद ज्योतिष शास्त्र के नियमों में कोई परिवर्तन नहीं होते देखा जा रहा है। ज्योतिष शास्त्र की जितनी भी पत्रिकाएं आ रहीं हैं ,अधिकांश लेख पुराने “लोकों और उसके अनुवादों से भरे होते हैं। हजारों वर्ष पूर्व और अभी के लोगों की मानसिकता में जमीन आसमान का फर्क आया है , सामाजिक स्थितियॉ बिल्कुल भिन्न हो गयी हैं। हर क्षेत्र में लोगों का दृष्टिकोण बदला है ,तो क्या ज्योतिष के नियमों में कोई परिवर्तन नहीं होना चाहिए ?

जिस प्रकार हर विज्ञान के इतिहास का महत्व है ,उस प्रकार ज्योतिष शास्त्र के इतिहास का भी महत्व होना चाहिए ,किन्तु यदि हम सिर्फ हजारो वर्ष पूर्व के ग्रंथों के हिन्दी अनुवाद पढ़ते रहें तो आज के युग के अनुसार सही भविष्यवाणी कदापि नंहीं कर सकते। समाज और वातावरण के अनुसार अनुसार अपने को न ढ़ाल पाने से जब डायनासोर जैसे विशालकाय जीव का अस्तित्व नहीं रहा तो क्या ज्योतिष विज्ञान का रह पाएगा ?

ज्योतिष के प्राचीन ग्रंथों के अनुसार लग्न से छठे , आठवें और बारहवें भाव में ग्रहों की स्थिति को अच्छी निगाह से नहीं देखा जाता था । इसके कई कारण हो सकते हैं। सर्वप्रथम हम छठे भाव की चर्चा करें। मनुष्य का छठा भाव किसी प्रकार के झंझट से संबंधित होता है। ये झंझट कई प्रकार की हो सकतीं हैं। बचपन में शरीर में किसी प्रकार की बीमारी झंझट का अहसास देती है। बड़े होने के बाद रोग , ऋण और शत्रु -- तीन प्रकार के झंझटों से इंसान को जूझना पड़ सकता है।

इन तीनों संदभो को हम प्राचीन काल के अनुसार देखे तो हम पाएंगे कि इन तीनों ही स्थितियों में मनुष्य का जीवन बहुत ही कष्टपूर्ण हो जाता था। यदि वह किसी प्रकार के रोग से ग्रसित हो जाता था तो उसका अच्छी तरह इलाज नहीं हो पाता था। उसकी मौत लगभग निश्चित ही होती थीं। इलाज के बाद भी वह जीवनभर कमजोर ही बना होता था। स्वास्थ्य की कमजोरी उसके जीवन को विकास नहीं दे पाती थी ,क्योंकि उस समय सफलता प्राप्त करने के लिए शारीरिक मजबूती का विशेष महत्व था।

इसी प्रकार ऋणग्रस्तता प्राचीन समाज के लिए अभिशाप थी। लोग जो कुछ भी खेत में उगा लेतें , खाकर अपना भरण-पोषण करते। अन्य किसी जरुरत के लिए वे वस्तु विनिमय प्रणाली का उपयोग करते। किन्तु अन्य किसी जरुरत के लिए कभी उन्हें ऋण लेने की आवश्यकता पड़ गयी तो उन्हें महाजन के पास जाना होता था । ऐसी हालत में उनके चंगुल में इनकी कई पीढ़ियॉ फंस जाती थी , क्योंकि उस समय ऋण लेने में ब्याज की दर बहुत अधिक होती थी । चक्रवृद्धि ब्याज के रुप में मूलधन बढ़ता ही जाता था और चाहकर भी कोई इस चंगुल से निकल नहीं पाता था , कभी कभी कई पीढियां इस दलदल में फंसी रह जाती थी।

इसी प्रकार उस समय शत्रु की स्थिति भी बहुत बुरी होती थीं। आज की तरह कमाई के लिए लोग अलग-अलग साघनों पर निर्भर नहीं रहते थे। साथ ही मिल-बैठकर किसी समस्या का समाधान नहीं निकाला जाता था। किसी व्यक्ति से शत्रुता बढ़ाना गंभीर स्थिति में पहुंचना होता था। मार-पीट में लोग फंसे ही रह जाते थे और जीवनभर की कमाई मुकदमों में चल जाती थी। यही कारण हैं कि प्राचीनकाल में लोग रोग,ऋण शत्रु जैसे झंझटों में पड़ना नहीं चाहते थे। इसलिए हमारे पुराने ज्योतिषियों ने भी इन भावों में ग्रहों की स्थिति को बुरा माना होगा।

किन्तु आज समाज की स्थिति में काफी परिवर्तन आया है। काफी असाध्य रोगों पर काबू पाया जा चुका है। इन रोगों से ग्रसित होने पर झंझट भले ही बढ़े , किन्तु जान संकट में नहीं पड़ती है। इसलिए छठे भाव में ग्रहों की स्थिति अच्छी हो तो उसे बुरा नहीं समझना चाहिए। गत्यात्मक दशा पद्धति के अनुसार यदि ग्रह छठे भाव में गतिज और स्थैतिक उर्जा से संपन्न हो तो जातक किसी भी प्रकार के झंझट को सुलझाने की शक्ति रखता है। वह सफल डॉक्टर होकर रोगी का उपचार कर सकता है ,न्यायाधीश होकर झगड़ों को सुलझा सकता है और प्रभावशाली व्यक्तित्व का स्वामी हो सकता है।

आधुनिक युग में ऋणग्रस्तता की परिभाषा भी बदल गयी है। आज किसी भी व्यवसायी को उचित दर पर ऋण प्राप्त हो जाता है। यदि वह सही व्यवस्थापक हो तो अपनी पूंजी से कई गुणा अधिक पूंजी प्राप्त कर उसका प्रवाह कर सकता है। इस प्रकार उसकी कमाई ब्याज-दर से बहुत अधिक होती है और व्यवसायी अपने व्यवसाय में निरंतर वृद्धि महसूस करता है। इसलिए अभी ऋणग्रस्तता की मात्रा से व्यक्ति के स्तर की पहचान होती है। जो 50000 के ऋण से ग्रस्त है वह छोटा व्यवसायी तथा जो 5000000 के ऋण से ग्रस्त है वह बड़ा व्यवसायी है ।

इसलिए कहा जा सकता है कि छठे भाव में स्थित गत्यात्मक और स्थैतिक शक्तिसंपन्न ग्रह जातक के सफल व्यवसायी और प्रभावशाली व्यक्ति होने की सूचना देते हैं। छठा भाव प्रतियोगिता से संबंधित भी होता है इस कारण प्रतियोगिता में भी सफलता की उम्मीद ऐसे ग्रहों से की जा सकती है। हॉ यदि ग्रह गत्यात्मक या स्थैतिक दृष्टि से कमजोर हो तो अवश्य कोई बीमारी या कुछ झंझटों में फंसे होने की स्थिति बन सकती है। ऐसा केवल उस ग्रह के दशाकाल में ही होता है जो छठे भाव मे कमजोर होकर विद्यमान होते हैं।

इसी प्रकार किसी जातक का आठवॉ भाग जन्म , मृत्यु या मृत्यु तुल्य कष्‍ट का होता है। प्राचीन काल में किसी प्रकार की आकिस्मक दुर्घटना हुई , शरीर के किसी अंग में गड़बडी आई या किसी प्रकार की बीमारी का उसकी जिंदगी पर बुरा प्रभाव पड़ा तो उसकी जिंदगी किसी काम की नहीं रह जा थी। उसे अपना जीवन भार सा महसूस होता था किन्तु आज अनेक प्रकार के मृत्युतुल्य कष्टों को भी मेडिकल साइंस ने दूर कर दिया है । किसी दुर्घटना में बेकार हुए शारिरिक अंगों की जगह कृत्रिम अंगों ने ले ली है , जिससे बहुत अच्छी तरह काम लिया जा सकता है।

इसी प्रकार मृत्युतुल्य अनेक प्रकार की बीमारियों का इलाज ढूंढ़ लिया गया है , जिसके बाद आज आठवें भाव में ग्रहों की उपस्थिति मात्र को हौवा नहीं समझा जा सकता। `गत्यात्‍मक दशा पद्धति ´ के अनुसार यदि ग्रह आठवें भाव में गत्यात्मक और स्थैतिक दृष्टि से मजबूत हों तो जातक किसी मृत्युतुल्य कष्ट को दूर करने के उपाय सोंच सकता है। नया आविष्कार कर सकता है। जीवन के सुखों की खोज कर सकता है। ऐसा कुछ सोंच सकता है ,जिससे जीवन जीने की गड़बड़ी को दूर किया जा सके। वह सफल समाज सुधारक हो सकता है, समय का अच्छा उपयोग कर सकता है।

हॉ ,यदि आठवें भाव में स्थित ग्रह गत्यात्मक या स्थैतिक दृष्टि से कमजोर हों तो अवश्य मृत्युतुल्य कोई कष्ट उनके जीवन में आ सकता है , जिसके निराकरण का कोई उपाय या तो अभी नहीं सोंचा जा सका है या उस उपाय को वह मानसिक या आर्थिक तौर पर स्वीकार करने में असमर्थ है। इस प्रकार उसका जीवन बोझ बन जाता है। इस कष्ट से वह उस दशाकाल में अधिक प्रभावित होता है , जो ग्रह आठवें भाव में स्थित होता है।

इसी प्रकार किसी जातक का बारहवॉ भाव उसके खर्च और बाह्य संबंध को दर्शाता है। प्राचीन काल में सभी वस्तुओं के स्वयं उत्पादन और उपभोग करने की प्रथा थी। बाद में इन सारे उत्पादनों के बीच स्वयं को व्यवस्थित न कर पाने के कारण समाज के सभी वर्गों के मध्य श्रमविभाजन यानि हर कायो को विभिन्न लोगों के मध्य विभाजित करने की प्रथा का विकास उत्पादन में वृद्धि लाने हेतु किया गया । आपस में अदला-बदली या वस्तु-विनिमय प्रणाली द्वारा लोग सभी प्रकार की वस्तुओं का उत्पादन करते रहें, और इस तरह खर्च की आवश्यकता ही नहीं महसूस हुई।

मुद्रा के आविष्कार के बाद भी लोग उसे नही के बराबर ही खर्च करते थें। किसी विपरित स्थिति के उत्पन्न होने पर ही ,जैसे किसी बीमारी या शत्रुता के चक्कर में ही लोगों को खर्च करना पड़ता था। ऐसी परिस्थिति में उन्हें अपने खाने-पीने के खर्च को कम कर या खेत जमीन जायदाद को बेचकर खर्च करना पड़ता था , इसलिए ही पुराने ज्योतिषियों ने इस भाव में ग्रहों की स्थिति को कष्टकर समझा होगा। बाद में जब मुद्रा का प्रयोग विनिमय के लिए आरंभ भी हो गया तब भी लोगों के लिए आय से कम खर्च करना और आड़े वक्त के लिए कुछ बचाकर रखने की प्रवृत्ति थी।

पर आधुनिक युग में ` इतने पैर पसारिए जितनी लम्बी खाट ´ की जगह पॉवो की साइज के हिसाब से खाट की व्यवस्था करने की मानसिकता का विकास हुआ है , जिसके अनुसार व्यय को आय से अधिक महत्व दिया गया है। मुद्रा के निरंतर गिरते हुए मूल्य को देखते हुए जिन लोगों की बचत कम और काम अधिक होता जा रहा है , उनकी तरक्की अधिक देखी जा रही है , इसलिए खर्च के स्थान पर अघिकांश ग्रहों की उपस्थिति आज के युग के अनुरुप है।

आज किसी व्यक्ति का खर्च उसकी क्रयशक्ति और स्तर को दिखलाता है। किसी व्यक्ति का मासिक खर्च 500 रु है या 50000 रु , इससे आप उसके स्तर का अनुमान लगा सकते हैं । इसीलिए 12वें भाव में ग्रहों की स्थिति मात्र से आप उसके बुरे फल की कल्पना न करें। `गत्यात्मक दशा पद्धति ´ के अनुसार गत्यात्मक या स्थैतिक शक्ति से संपन्न ग्रह यदि 12वें भाव में हो तो जातक के पास पर्याप्त क्रय शक्ति होती है । उसका बाह्य संबंध मजबूत होता है। उस ग्रह के दशा-काल में इसका अच्छा प्रभाव देखा जा सकता है,, जो 12वें भाव में मजबूत होकर स्थित होता है। किन्तु यदि ग्रह कमजोर या वक्री होकर 12वें भाव में स्थित होते हैं तो जातक के पास खर्चशक्ति की कमी होती है। वह काफी सोंचसमझकर खर्च करने की प्रवृत्ति रखता है। इस कारण तनावग्रस्त रहता है।