बुधवार, 12 दिसंबर 2018

हमारे केंद्र की भविष्यवाणी पुनः सटीक निकली .....


On 1st Dec, 2018, a video was uploaded in YouTube  to bring into notice about the probable assembly election results and prospective CM,  which exactly came out to be the same as pointed out in the video (pl see the link below)

Please have a look to this interesting video and  do like, subscribe and share to bring this interesting research work into the notice of masses..🙏

 https://youtu.be/SxmzkZ43R98

कुछ दिनों पहले  यूट्यूब एक वीडियो पोस्ट किया गया था जिसमें पांच राज्यों में होनेवाले विधानसभा चुनाव का संभावित परिणाम और संभावित मुख्यमंत्री पर एक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया था॥

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि यह पूर्वानुमान शत प्रतिशत सही साबित हुआ॥  अगर आपने यह वीडियो अबतक नहीं देखा तो यह रोचक वीडियो एकबार जरूर देखें, लाइक, सब्सक्राइब एवं शेयर करें ताकि इस अद्भुत अनुसंधान कार्य की जानकारी अन्य लोगो को भी हो सके॥ धन्यवाद॥🙏

 https://youtu.be/SxmzkZ43R98

शुक्रवार, 24 अगस्त 2018

सही कहा गया है ... भगवान केवल भक्तं भाव के भूखे होते हैं !!


इस वर्ष के चारो सोमवार व्‍यतीत हो गए और मैं एक भी सोमवारी व्रत न कर सकी। इधर कुछ वर्षों से ऐसा ही हो रहा है , कभी काम की भीड और कभी तबियत के कारण सोमवारी व्रत नहीं कर पा रही हूं। हमारे धर्म में सावन महीने के सोमवार का बहुत म‍हत्‍व है। सावन के सोमवार को भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा की जाती है। भारत के सभी द्वादश शिवलिंगों पर इस दिन खास पूजा-अर्चना की जाती है. कहा जाता है सावन के सोमवार का व्रत करने से मनचाहा जीवनसाथी मिलता है और दूध की धार के साथ भगवान शिव से जो मांगो वह वर मिल जाता है. यही कारण है कि इस व्रत को कुंवारी कन्‍याएं काफी उत्‍साहित होकर करती हैं।

प्राचीन शास्त्रों के अनुसार सोमवार के व्रत तीन तरह के होते हैं। सोमवार, सोलह सोमवार और सौम्य प्रदोष। सोमवार के व्रत की चाहे जितनी भी सामग्रियां इकट्ठी कर ली जाएं , व्रत में अधिक नियम की जरूरत नहीं। भोले भाले शिव जी की पूजा का यह सोमवार व्रत भी बिल्‍कुल अपने मन मुताबिक किया जा सकता है। यही कारण है कि सावन का सोमवारी व्रत छोटी छोटी बच्चियां भी कर लेती हैं। हमारे गांव में सावन का सोमवारी व्रत लडकियों के लिए काफी उत्‍साह का त्‍यौहार होता था। गांव के पंडितों की मानने के कारण हमें काफी तैयारी करनी होती थी।

शनिवार का गांव में हाट लगता था , इसलिए इस दिन से ही तैयारी शुरू हो जाती थी। पूजा के लिए कम से कम पांच प्रकार के फल तो होने ही चाहिए , सात हो जाए तो और बढिया । एक दो घर में मिल जाते , बाकी तो हमें खरीदने ही होते थे। अपने घर में दूध का इंतजाम न हो , तो ग्‍वाले के घर जाकर गाय के कच्‍चे दूध का इंतजाम करना होता। बाजार से भांग , कपूर आदि खरीदकर लाने होते। रविवार को सुबह सुबह अच्‍छी तरह नहाकर एक लोटे में जल , दूध और पुष्‍प लेकर मंदिर जाकर भगवान शिव और पार्वती जी पर चढाना होता था। उसके बाद दिनभर बिना प्‍याज लहसुन का शुद्ध खाना खाना होता था। 

हमारे गांव में भले ही सोमवार को शिवमंदिर का कपाट दो बजे के बाद ही खुलता था , सुबह से ही हमलोग पूजा की तैयारी में लग जाते थे। पूजा में कोई कमी न रह जाए , सुबह से ही बेलपत्र , धतुरे और धतूरे के फूल और अन्‍य फूल , जो हमारे बगीचे में नहीं होती , के लिए हमलोग भूखे प्‍यासे भटकते रहते। दो बजे के बाद स्‍नान कर हम पूजा का थाल सजाते। उसके बाद नए कपडे पहनकर शिवालय जाते।

 शिव परिवार को जलधारा , दूध, दही, शहद, शक्कर, घी से स्नान कराकर, गंध, चंदन, फूल, रोली, सिंदूर के साथ साथ धूप अगरबत्‍ती दिखाते हुए फलों का भोग लगाते। मंदिर में एक बूढी ब्राह्मणी होती , जो अस्‍पष्‍ट मंत्रों का उच्‍चारण करती जाती। शिव जी को अर्पित करने से पहले वे थोडा दूध अपने घर से लाई बाल्‍टी में जमा करती जातीं। प्रसाद तो हम उनके लिए अलग से ले जाते थे। मंदिर से बाहर निकलते ही प्रसाद के आस में बहुत महिलाएं और बच्‍चे खडे मिलते। उन्‍हें प्रसाद देकर हम वापस लौटते।

दिनभर के भूखे प्‍यासे हम बच्चियों की सेवा के लिए सबकी मम्‍मी पूरी तैयारी में होती। हमारे गांव में सोमवारी व्रत में दिनभर में एक बार ही बिना नमक का शुद्ध खाना खाने का विधान है , यहां तक की चाय पानी भी एक ही बैठकी में ले लेना होता। छोटी छोटी बच्चियां भी पूजा से पहले तो नहीं, पूजा के बाद भी दुबारा पानी नहीं पीती। दूसरे दिन भी हमें सुबह सुबह खाने की आजादी नहीं थी , स्‍नानकर पहले शिव पार्वती जी की पूजा कर उनसे इजाजत लेकर ही खाने की छूट होती। इस तरह हमलोगों का तीन दिन का नियम चलता। पर तीसरे दिन हमारे लिए खाने पहने की विशेष व्‍यवस्‍था कि जाती।

एक बार सावन के महीने में मामाजी के यहां थी , तो वहां महिलाओं को इतने नियम से सोमवारी का व्रत करते नहीं पाया। वहां सालोभर बिना प्‍याज लहसून के खाना बनता था , इसलिए रविवार को नियम से खाने की कोई जरूरत नहीं होती। सोमवार को दिनभर सबका फलाहार ही चलता , बस दोनो भाइयों के लिए खाना बनाने की जरूरत होती। वहां सुबह से ही शिवमंदिरों में भीड लगती थी , इसलिए सुबह ही सब पूजा कर लेते , पूजा के बाद प्रसाद और चाय ले लेते , फिर फलाहार तैयार करते।

भाइयों का खाना निबटाकर हमलोग तीन बजे के लगभग फलाहार करते। दिनभर पानी चाय की कोई मनाही नहीं थी। सबसे छोटी बहन तो फलाहार कर टिफिन में फलाहार लेकर स्‍कूल जाती आकर फिर दो तीन बार फलाहार ही करती। यानि जिसको जैसे इच्‍छा हो , वैसे खाओ पीओ। एक बार रांची में भी एक रिश्‍तेदार के यहां रूकने का मौका मिला , वहां भी ऐसे ही व्रत होते देखा। बहुत परिवारों में तो कुट्टू के आटे और सेंधा नमक का प्रयोग करते हुए पूरा फलाहार खाना बना लिया जाता है।

ससुराल में एक बार सावन के सोमवारी व्रत को करने को पूरा घर तैयार हो गया। वहां सुबह पूजा करने के बाद चाय और पानी पीने के सहारे रहने की छूट है। दोपहर में मेरे पूछने पर कि लोग क्‍या क्‍या खाएंगे , दोनो भाइयों ने बिना प्‍याज लहसून के चावल दाल सब्‍जी बनाने को कहा। सोमवारी व्रत में चावल दाल ?? मैं तो चौंक गयी। इनलोगों ने बताया कि दिनभर के भूखे प्‍यासे इनलोगों की भूख फलाहार से शांत नहीं होती थी , इसलिए ये हॉस्‍टल में चावल दाल ही खाते आए हैं। इस रूप में सोमवारी का व्रत होते मैने पहली बार सुना। महिलाओं ने तो नहीं , पर सभी पुरूषों ने व्रत में दाल चावल खाए। भोले भाले शंकर बाबा की पूजा और व्रत हर जगह अलग अलग यानि मनमाने ढंग से ही होते आ रहे है , भोले बाबा को इससे कोई अंतर नहीं पडता। तभी तो कहा गया है , भगवान केवल भक्‍त भाव के भूखे होते हैं !!

सोमवार, 13 अगस्त 2018

कृपया एक पोल में हिस्सा लें ......

कृपया एक पोल में हिस्सा लें ......

इस पोस्ट को प्रकाशित किये जाने का पहला लक्ष्य यह है कि आपके परिवार में इस दौरान बच्चे ने जन्म लिया हो तो कृपया आप पोल में भाग लेकर हमारी पद्धति पर मोहर लगाकर गत्यात्मक पद्धति को सत्य साबित करे।
हमारा दूसरा लक्ष्य यह है कि इन बच्चों के साथ सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार हो , ताकि इनका तनाव कम हो और ये निराशाजनक परिस्थितियों में कोई गलत कदम न उठा लें।
कृपया अधिक से अधिक लोगों तक इस पोल को पहुँचाने और हमारे समाज के टीनएजर बच्चों को अनहोनी से बचाने के लिए इस पोस्ट को शेयर करते चलें।

गत्यात्मक ज्योतिष के हिसाब से ........
१८ जुलाई से ३ अगस्त १९९९ तक , १० नवम्बर से २२ नवम्बर १९९९ तक , २६ फ़रवरी से १२ मार्च २००० और २९ जून से १५ जुलाई २००० तक जन्म लेनेवाले दुनिया भर के बच्चों , चाहे वो अमीर हों या गरीब , पढ़ाकू हों या कमजोर , महत्वाकांक्षी हों या आलसी , सबके समक्ष चल रही कुल परिस्थितियाँ किन्ही कारणों से बिलकुल प्रतिकूल बनी हुई हैं।

सोमवार, 11 जून 2018

गत्‍यात्‍मक दशा पद्धति क्‍या है ?

फलित ज्‍योतिष के प्राचीन ग्रंथों में वर्णित ग्रहों की अवस्‍था और उनकी गति के अनुसार ही मनुष्‍य के जीवन में पड़नेवाले ग्रहों के प्रभाव का बारह बारी वर्षों के विभाजन को गत्‍यात्‍मक दशापद्धति कहते हैं। इसमें प्रत्‍येक ग्रहों के प्रभाव को अलग अलग 12 वर्षों के लिए निर्धारित किया गया है। जन्‍म से 12 वर्षों तक चंद्रमा , 12 से 24 वर्षों तक बुध , 24 से 36 वर्षों तक मंगल , 36 से 48 वर्षों तक शुक्र , 48 से 60 वर्षों तक सूर्य , 60 से 72 वर्षों तक बहस्‍पति , और 72 से 84 वर्ष की उम्र तक शनि का प्रभाव मानव जीवन पर पडता है। प्रत्‍येक ग्रह अपने दशाकाल में अपना फल अपने सापेक्षिक गत्‍यात्‍मक शक्ति के अनुरूप ही अच्‍छा या बुरा प्रदान करते हैं। इस दशा पद्धति में सभी ग्रहों की एक खास अवधि में निश्चित भूमिका रहती है। विंशोत्‍तरी दशा पद्धति की तरह एकमात्र चंद्रमा का नक्षत्र ही सभी ग्रहों को संचालित नहीं करता।
उन वर्षों के तुरंत बाद ही अपनी जीवनशैली में आनेवाले परिवर्तन पर गौर करें। गत्‍यात्‍मक दशा पद्धति की वैज्ञानिकता खुद ही प्रमाणित हो जाएगी।
इस पद्धति के जन्‍मदाता श्री विद्यासागर महथा , एम ए , ज्‍योतिष वाचस्‍पति , ज्‍योतिष रत्‍न , पेटरवार , बोकारो निवासी हैं , जिन्‍होने इस पद्धति की नींव सन 1975 जुलाई में रखी। इस दशा पद्धति का संपूर्ण गत्‍यात्‍मक विकास 1987 जुलाई तक होता रहा। 1987 जुलाई के बाद अब तक हजारो कुंडलियों मे इस सिद्धांत की प्रायोगिक जांच हुई और सभी जगहों पर केवल सफलताएं ही मिली। अभी गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष किसी भी कुंडली को ग्रहों की शक्ति के अनुसार लेखाचित्र में अनायास रूपांतरित कर सकता है। किसी भी व्‍यक्ति के जीवन की सफलता , असफलता , सुख , दुख , महत्‍वाकांक्षा , कार्यक्षमता और स्‍तर को लेखाचित्र में ईस्‍वी के साथ अंकित किया जा सकता है। जीवन के किस क्षेत्र में किसकी अभिरूचि अधिक है और जीवन के किस भाग में इसका प्रतिफलन होगा , इसे ग्राफ खींचने के बाद अनायास ही बतलाया जा सकता है। जीवन का कौन सा भाग स्‍वर्णिम होगा और कौन सा काफी कष्‍टप्रद , यह ग्राफ देखकर ही बुद्धिजीवी और वैज्ञानिक वर्ग आसानी से समझ सकेंगे। जीवन में अकसमात उत्‍थान और गंभीर पतन की सूचना भी इस ग्राफ से ज्ञात की जा सकती है।
इस दशापद्धति के विकास के क्रम में ही ग्रहों की शक्ति को मापने के लिए गति से संबंधित कुछ सूत्रों की खोज की गयी है , जो ग्रहों की सम्‍यक शक्ति का निरूपण करती है। ग्रहों के स्‍थान बल , दिक बल , काल बल , नैसर्गिक बल दुक बल चेष्‍टा बल और अष्‍टकवर्ग से भिन्‍न एक गत्‍यात्‍मक शक्ति को महत्‍व दिया गया है। यह हर हालत में ग्रहों की सही शक्ति का आकलन करता है। 1975 के ज्‍योतिष मार्तण्‍ड के जुलाई अंक में प्रकाशित ‘दशाकाल निरपेक्ष अनुभूत तथ्‍य’ लेख में पहली बार दर्शाया गया था कि प्रत्‍येक ग्रहों का 12 वर्ष तक मुख्‍य रूप से प्रभाव बना रहता है और चंद्र , बुध , मंगल , शुक्र , सूर्य, बुहस्‍पति , शनि , यूरेनस , नेप्‍च्‍यून और प्‍लूटो बारी बारी से संपूर्ण जीवन का प्रतिनिधित्‍व कर लेते हैं।
सन 1981 में गत्‍यात्‍मक दशा पद्धति के जन्‍मदाता श्री विद्यासागर महथा जी पहली बार यह अहसास हुआ कि प़ृथ्‍वी से निकट रहनेवाले प्रत्‍येक आकाशीय पिंड अपने दशाकाल में जातक को प्रतिकूल परिस्थितियों का बोध कराता है। विलोमत: प़ृथ्‍वी से अतिदूरस्‍थ् ग्रह जातक को अनुकूल परिस्थितियों का बोध कराते हैंा यानि इनके पास अधिक दायित्‍व नहीं होने देते। और इस तरह प़ृथ्‍वी से अतिदूरस्‍थ और निकटस्‍थ् ग्रह अपने दशाकाल में भिन्‍न भिन्‍न ही परिणाम प्रस्‍तुत करते हैं। किसी भी ग्रहों के दशाकाल के मध्‍यकाल में इस प्रभाव को स्‍पष्‍ट देखा जा सकता है। 18वे वर्ष में बुध , 30 वें वर्ष में मंगल , 42 वें वर्ष में शुक्र , 54 वें वर्ष में सूर्य , 66 वें वर्ष में बृहस्‍पति और 78 वें वर्ष में शनि अपना फल विशेष तौर पर प्रदान करते हैं। वक्र या ऋणात्‍मक ग्रहों का परिणाम दायित्‍व संयुक्‍त होता है , जबकि शीघ्री और सकारात्‍मक ग्रह उल्लिखित वर्षों में दायित्‍वहीनता का बोध कराते हैं।
ग्रहों की एक ऐसी भी स्थिति होती है , जब न तो वे पृथ्‍वी के निकट होते हैं और न ही बहुत अधिक दूरी बनाए होते हैं , बल्कि वे पृथ्‍वी से औसत दूरी पर होते हैं। बुध और शुक्र पूर्वी या पश्चिमी क्षैतिज पर सर्वोच्‍च उंचाई पर होते हुए प्रतिदिन 1 डिग्री की गति बनाते हैं । चंद्रमा , मंगल , बुहस्‍पति , शनि आदि ग्रह सूर्य से 90 डिग्री की औसत दूरी पर होते हैं। ऐसी स्थिति में इनके पास कार्यक्षमता और दायित्‍वबोध सबसे अधिक होता है। जब चंद्रमा औसत से कम प्रकाशमान हो और शेष ग्रह मार्गी या वक्र होने के आसपास हो , तो जातक को अति महत्‍वपूर्ण दायित्‍व और कर्तब्‍यबोध से अवगत कराता है। यदि सापेक्षिक ग्रह धनात्‍मक हो , तो कर्तब्‍यपरायणता के साथ उन्‍हें जबर्दस्‍त सफलता मिलती है और सापेक्षिक ऋणात्‍मक गति में होने से इन्‍हीं ग्रहों के कारण जातक को कर्तब्‍यपरायणता के बावजूद असफलता ही हाथ लगती है।
इस गत्‍यात्‍मक दशा पद्धति का जो लेखाचित्र तैयार होता है , वह वस्‍तुत: आकाश में स्थित ग्रहों की स्थिति , सूर्य और पृथ्‍वी सापेक्ष उनकी दूरियों और गतियों का सम्‍यक चित्रण है। आकाश में सूर्यतल से नीचे दिखलाई पडनेवाले ग्रह पृथ्‍वी के कम निकट और कम गतिवाले या वक्र होते हैं । इसके विपरीत आकाश में सूर्यतल से उपर दिखलाई पडनेवाले ग्रह पृथ्‍वी से अधिक दूर और अधिक गतिवाले होते हैं। एकमात्र चंद्रमा ही हर समय पृथ्‍वी से समान दूरी पर होने के बावजूद सूर्य के निकट आने पर कम प्रकाशमान और अधिक दूरी पर रहने से अधिक प्रकाशमान होता है। कम प्रकाशमान चंद्रमा को ग्राफ में मध्‍य में और अधिक प्रकाशमान चंद्रमा को ग्राफ में उपर दिखलाया जाता है। अन्य वक्री ग्रहों को ग्राफ में नीचे , सामान्‍य ग्रहों को ग्राफ में मध्‍य में और अति‍शीघ्री ग्रहों को ग्राफ में उपर दिखलाया जाता है। यह ग्राफ व्‍यक्ति की परिस्थ्तियों को दर्शाता है। जातक अपने ग्राफ के अनुसार ही अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थ्‍ितियां प्राप्‍त करते हैं। उनका ग्राफ ही उनकी कार्यक्षमता और महत्‍वाकांक्षा को निर्धारित करता है। वे जीवन के प्रत्‍येक उत्‍थान और पतन अपने ग्राफ के अनुसार हीप्राप्‍त करते हैं। यह दशापद्धति ज्‍योतिष को विज्ञान साबित करने में पूर्ण सक्षम है। पाठक अपने जन्‍म वर्ष को छ: वर्ष के अपवर्तांक से जोडते चले जाएं , इसकी वैज्ञानिकता स्‍वत: प्रमाणित हो जाएगी ।

शुक्रवार, 8 जून 2018

काश अबतक इलाज की अन्य पद्धतियों को भी विकसित किया गया होता !!

2009 की बात है , शनिवार और रविवार को बच्‍चों की छुट्टियों की वजह से नींद देर से ही खुलती है । हां , कभी कभार फोन की घंटी नींद अवश्‍य तोड दिया करती है। ऐसे ही एक शनिवार भोर की अलसायी हुई नींद के आगोश में थी कि अचानक फोन की घंटी बजी। फोन उठाकर जैसे ही मैने ‘हलो’ कहा , वैसे छोटी बहन की दर्दनाक आवाज कानों में पडी , ‘दीदी , मुझे बचा लो , ये लोग मेरी जान ले लेंगे।’ मेरे तो होश ही उड गए , विवाह के दस वर्षों तक सबकुछ सामान्‍य रहने के बाद ससुराल में इसके जीवन में कौन सा खतरा आ गया। अपने को बहुत संभालते हुए पूछा , ‘क्‍या हुआ , पूरी बात बताओ ’ तब उसने जो बताया , वह लगभग शून्‍य हुए दिमाग को काफी राहत देनेवाली थी। दरअसल गर्मी की वजह या अन्‍य किसी वजह से कई दिनों से उसके शरीर के कई जगहों पर फोडे निकल गए थे , कुछ काफी बडे भी हो गए थे। शाम को डाक्‍टर ने बडे फोडों को जल्‍द आपरेशन करा लेने की सलाह दी थी। रात में इनलोगों में लंबी बहस चली थी , बहन के पति और श्‍वसुर डाक्‍टर की सलाह मान लेने को कह रहे थे और बहन एक दो दिन इंतजार करना चाह रही थी । सुबह सुबह अपनी हार को नजदीक पाकर उसने घबडाकर मुझे फोन लगा दिया था। अपनों का कष्‍ट देखना बहुत मुश्किल होता है , उसकी समस्‍या को हल करने के लिए मैने जैसे ही अपना दिमाग खपाया , एक उपाय नजर आ ही गया।

किसी भी फोडे के लिए आयुर्वेद की एक दवा है ‘एंटीबैक्‍ट्रीन’ , मैने बहुत दिन पूर्व उसका प्रयोग किया था और उसके चार छह घंटे के अंदर उसके प्रभाव से प्रभावित होकर कई बार दूसरों को भी उसके उपयोग की सलाह दी थी , जिसमें से किसी को भी उस दवा पर संदेह नहीं रह गया था। अगर फोडा शुरूआती दौर में हो तो , यह दवा उसे दबा देती है और यदि फोडा पक चुका हो , तो यह दवा उसके मवाद को बहा देती है , यानि फोडा किसी भी हालत में हो , उसका मुंह हो या नहीं , इसका उपयोग किया जा सकता है। बाद में घाव भी इसी दवा से ठीक हो जाता है , इसलिए मैने उसके पति से एक दिन का समय मांगा और बहन को उसी दवा के प्रयोग की सलाह दी। और मेरी आशा के अनुरूप ही रात में उसकी खनकती हुई आवाज कानों में पडी। फोडा बह चुका था , पाठक कभी भी बहुत कम कीमत की इस दवा की परीक्षा ले सकते हैं। एलोपैथी की कडी दवाओं या आपरेशन से बचने के लिए इस प्रकार के बहुत उपाय आयुर्वेद में हैं , जिनके बारे में या तो लोगों को जानकारी नहीं है या फिर वे विश्‍वास नहीं कर पाते।

कई बार छोटे बच्‍चों के कब्‍ज को लेकर अभिभावक की पारेशानी को देखकर डाक्‍टर लगातार एलोपैथी की दवा चलाते हैं । मैने ऐसे कई बच्‍चों को छोटी हर्रे घिसकर पिलाने की सलाह दी है और उससे बच्‍चों को फिर एलोपैथी की दवा की जरूरत नहीं रह गयी है। तुलसी , अदरक का रस और मधु को साथ मिलाकर बच्‍चों को पिलाने से सर्दी ठीक हो जाती है , बडे भी इसका काढा पीकर सर्दी ठीक कर सकते हैं। बडे पत्‍ते वाली तुलसी , जो कि घर में नहीं लगायी जाती , वह कुछ बीमारियों में बहुत कारगर होती है। मेरी एक भांजी के पैर में घुटने के नीचे कुछ दाने हो गए , कभी कभी नोचने भी लगे , देखते ही देखते बढने भी लगे। हमने एलोपैथी के चर्मरोग विशेषज्ञ को दिखाया , उसकी कई दवाएं चली , पर कम अधिक होता रहा , जड से नहीं मिटा। हारकर हमने होम्‍योपैथी के डाक्‍टर से दिखाया। पहले सप्‍ताह की दवा से उसने बीमारी बढने की उम्‍मीद की , वह सही रहा , पर दूसरे सप्‍ताह से बीमारी में जो कमी होनी चाहिए थी , वह नहीं हुई और पहले से बडी समस्‍या देखकर हमलोग और घबडा गए। कुछ दिन बाद हमारे गांव से एक व्‍यक्ति आए , उन्‍होने देखा और अपनी दवाई सुझा दी , और उनकी दवाई से पूरा इन्‍फेक्‍शन समाप्‍त । दवाई का नाम सुनेंगे , तो आप चौंक ही जाएंगे , दवा थी , गाय के ताजे दूध का फेन। एक महीने में बीमारी समाप्‍त हो गयी। बचपन से बिल्‍कुल स्‍वस्‍थ रहे मेरे बडे बेटे को 12 वर्ष की उम्र के बाद सालोभर सर्दी खांसी रहने लगी , पांच छह वर्षों तक एलोपैथी की दवा चलाने के बाद भी कोई फायदा नहीं हुआ , डाक्‍टर कहा करते थे कि ध्‍यान दें , इसे किस चीज से एलर्जी है , उससे दूर रखें , पर इतने दिनों तक हमें कुछ भी समझ में न आया , जितनी सावधानी बरतते , सर्दी खांसी उतनी ही अधिक परेशान करती थी। अंत में हारकर हमलोगों ने होम्‍योपैथी की दवा चलायी , और छह महीने में एलर्जी जड से दूर। हर वक्‍त टोपी , मफलर , मोजे में अपने को पैक रखने वाले और हर ठंडा खाना से वंचित रहनेवाले उसी बेटे को आज कहीं भी किसी परहेज की जरूरत नहीं होती है। ऐसी अन्‍य बहुत सारी घटनाएं हैं , जिसके कारण एलोपैथी से इतर पद्धतियों पर भी मेरा भरोसा बना हुआ है।

एलोपैथी के साइड इफेक्‍ट के कारण उत्‍पन्‍न होने वाली बहुत सी सारी शारीरिक समस्‍याओं के बावजूद भी इलाज की सर्वोत्‍तम पद्धति के रूप में अभी एलोपैथी का नाम ही लिया जा सकता है । एलोपैथी की सफलता को देखते हुए मै भी इसे स्‍वीकारती हूं , वैसे इसका सबसे बडा कारण इस मद में किया जानेवाला खर्च है , इससे इंकार नहीं किया जा सकता । पर छोटी छोटी बीमारियों के लिए ही सही , जहां पर हमारी ये देशी दवाएं कारगर है , वहां एलोपैथी का प्रयोग किया जाना क्‍या उचित है ? लोग ये जानते हैं कि सरदर्द हो , तो दर्दनिवारक गोली लेनी है , पर ये क्‍यूं नहीं जानते कि फोडा होने पर ‘एंटीबैक्‍ट्रीन’ का प्रयोग करना है। ताज्‍जुब की बात है कि यहां की इतनी सटीक देशी दवाइयों की जानकारी यहीं के ही लोगों को मालूम नहीं है। शिक्षा का मतलब अपनी सभ्‍यता, संस्‍कृति और ज्ञान को भूल जाना नहीं होता , पर आजतक ऐसा ही होता आया है , जो हमारी शिक्षा व्‍यवस्‍था को दोषपूर्ण तो ठहरा ही देता है। युग बदलने के साथ ही साथ हर पद्धति का विकास किया जाना अधिक आवश्‍यक है , जब तक हर क्षेत्र का समानुपातिक विकास न हो , एक क्षेत्र की अंधी दौड में हमें शामिल नहीं होना चाहिए।

गुरुवार, 24 मई 2018

विवाह के लिए जन्‍म कुंडली मिलाना आवश्यक नहीं

आए दिन हमारी भेंट ऐसे अभिभावकों से होती है, जो अपने बेटे या बेटी के विवाह न हो पाने से बहुत परेशान हैं। उनकी विवाह योग्य संतानें पढ़ी-लिखी है ,पर पॉच-सात वर्ष से उपयुक्त वर या वधू की तलाश कर रहें हैं ,कहीं भी सफलता हाथ नहीं आ रही है। इसका सबसे बड़ा कारण किसी संतान का मंगली होना है और मंगली पार्टनर न होने से वे कई जगह बात बढ़ा भी नहीं पाते। अगर पार्टनर मंगली मिल भी जाए तो कई जगहों पर लड़के-लड़कियों के गुण न मिल पाने से भी समस्या बनी ही रह जाती है। ये समस्या समाज में बहुतायत में है और सिर्फ कन्या के ही अभिभावक नहीं , वर के अभिभावक भी ऐसी समस्याओं से समान रुप से जूझ रहे हैं । लड़का-लड़की या परिवार के पूर्ण रुप से जंचने के बावजूद भी मंगला-मंगली और गुण-मिलान के चक्कर में संबंध जोड़ना संभव नहीं हो पाता है।

पुराने युग में शादी-विवाह एक गुड्डे या गुड़िया की खेल की तरह था। सिर्फ पारिवारिक पृश्ठभूमि का ध्यान रखते हुए किसी भी लड़की का हाथ किसी भी लड़के को सौंप दिया जाता था । कम उम्र में शादी होने के कारण लड़के-लड़कियों कें व्यक्तित्व ,आचरण या व्यवहार का कोई महत्व नहीं था। इस कारण बड़े होने के बाद कभी-कभी लड़के-लड़कियों के विचारों में टकराव होने की संभावना बनी रहती थी । इसी कारण अभिभावक शादी करने से पूर्व ज्योतिषियों से सलाह लेना आवश्यक समझने लगें और इस तरह कुंडली मिलाने की प्रथा की शुरुआत हुई। कुंडली मिलाने के अवैज्ञानिक तरीके के कारण समाज में वैवाहिक मतभेदों में कोई कमी नहीं आई ,साथ ही दुर्घटनाओं के कारण भी जातक के वैवाहिक सुख में बाधाएं उपस्थित होती ही रहीं , लेकिन फिर भी कुंडली मिलाना वर्तमान युग में भी एक आवश्यक कार्य समझा जाता है यद्यपि कुंडली मिलाना आज किसी समस्या का समाधान न होकर स्वयं एक समस्या बन गया है।

ज्योतिष की पुस्तकों के अनुसार किसी भी लड़के या लड़की की जन्मकुंडली में लग्न भाव , व्यय भाव , चतुर्थ भाव , सप्तम भाव या अश्टम भाव में मंगल स्थित हो तो उन्हें मांगलीक कहा जाता है। परंपरागत ज्योतिष में ऐसे मंगल का प्रभाव बहुत ही खराब माना जाता है। यदि पति मंगला हो तो पत्नी का नाश तथा पत्नी मंगल हो तो पति का नाश होता है । संभावनावाद की दृष्टि से इस बात में कोई वैज्ञानिकता नहीं है। किसी कुंडली में बारह भाव होते हैं और पॉच भाव में मंगल की स्थिति को अनिष्‍टकर बताया गया है। इस तरह समूह का 5/12 भाग यानि लगभग 41 प्रतिशत लोग मांगलिक होते है ,लेकिन अगर समाज में ऐसे लोगों पर ध्यान दिया जाए जिनके पति या पत्नियां मर गयी हों ,तो हम पाएंगे कि उनकी संख्या हजारों में भी एक नहीं है .

मंगला-मंगली के अतिरिक्त ज्योतिष की पुस्तकों में कुंडली मिलाने के लिए एक कुंडली मेलापक सारणी का उपयोग किया जाता है। इस सारणी से केवल चंद्रमा के नक्षत्र-चरण के आधार पर लड़के और लड़कियों के मिलनेवाले गुण को निकाला जाता है। यह विधि भी पूर्णतया अवैज्ञानिक है। किसी भी लड़के या लड़की के स्वभाव , व्यक्तित्व और भविष्‍य का निर्धारण सिर्फ चंद्रमा ही नहीं ,वरन् अन्य सभी ग्रह भी करतें हैं । इसलिए दो जन्मकुंडलियों के कुंडली-मेलापक द्वारा गुण निकालने की प्रथा बिल्‍कुल गलत है।

इस संबंध में एक उदाहरण का उल्लेख किया जा सकता है। मेरे पिताजी के एक ब्राह्मण मित्र ने , जो स्वयं ज्योतिषी हैं और जिनका जन्म पुनर्वसु नक्षत्र के चतुर्थ चरण में हुआ था , पुष्‍य नक्षत्र में स्थित चंद्रमावाली लड़की को ही अपनी जीवनसंगिनी बनाया , क्योंकि ऐसा करने से कुंडली मेलापक तालिका के अनुसार उन्हें सर्वाधिक 35 अंक प्राप्त हो रहे थें । इतना करने के बावजूद उन्हें अपनी पत्नी से एक दिन भी नहीं बनी । किसी कारणवश वे तलाक तो नहीं ले पाए परंतु उनका मतभेद इतना गहरा बना रहा कि एक ही घर में रहते हुए भी आपस में बातचीत भीं बंद रहा। इसका अर्थ यह नहीं कि ज्‍योतिष विज्ञान ही झूठा है , ग्रहों का प्रभाव मनुष्‍य पर नहीं पड़ता है।दरअसल मेरे पिताजी के उस मित्र की कुंडली में स्‍त्री पक्ष या घर-गृहस्थी के सुख में कुछ कमी थी ,इसलिए विवाह के बावजूद उन्हें सुख नहीं प्राप्त हो सका।

एक सज्जन अपनी पुत्री की तुला लग्‍न की कुंडली लेकर मेरे पास आएं। सप्तम भावाधिपति मंगल अतिवक्र होकर अष्‍टमभाव में स्थित था , ऐसी स्थिति में लड़की पूरी युवावस्था यानि 24 वर्ष से 48 वर्ष तक पति के सुख में कमी और घर-गृहस्‍थी में बाधा महसूस कर सकती थी , यह सोंचकर मैने उस लड़की को नौकरी कर अपने पैरों पर खड़े होने की सलाह दी ,लेकिन अभिभावक तो लड़की की शादी करके ही निश्चिंत होना चाहते हैं ,उन्होनें दूसरे ज्योतिषी से संपर्क किया , जिसने अच्छी तरह कुंडली मिलवाकर अच्‍छे मुहूर्त में उसका विवाह करवा दिया। मात्र दो वर्ष के बाद ही एक एक्सीडेंट में उसके पति की मृत्यु हो गयी और वह लड़की अभी विधवा का जीवन व्यतीत कर रही हैं। मेरे पिताजी एक ज्योतिषी हैं पर उन्होने अपने सारे बच्चों की शादी में कुंडली मेलापक की कोई चर्चा नहीं की । क्या कोई पंडित 10 पुरुष और 10 स्त्रियो की कुंडली में से वर और कन्या की कुंडली को अलग कर सकता है , यदि नही तो वह किसी जोड़े को बनने से भी नहीं रोक सकता।

आज घर-धर में कम्प्यूटर और इंटरनेट के होने से मंगला-मंगली और कुंडली मेलापक की सुविधा घर-बैठे मिल जाने से यह और बड़ी समस्या बन गयी है। किन्ही भी दो बायोडाटा को डालकर उनका मैच देखना काफी आसान हो गया है , पर इसके चक्कर में अच्छे-अच्छे रिश्ते हाथ से निकलते देखे जाते हैं । उन दो बायोडाटा को डालकर देखने से ,जिनकी बिना कुंडली मिलाए शादी हुई है और जिनकी काफी अच्छी निभ रही है या जिनकी कुंडली मिलाकर शादी हुई है और जिनकी नहीं निभ रही है , कम्प्यूटर और उसमें डाले गए इस प्रोग्राम की पोल खोली जा सकती है। एक ज्योतिषी होने के नाते मेरा कर्तब्य है कि मै अभिभावकों को उचित राय दूं। मेरा उनसे अनुरोध हे कि वे पुरानी मान्यताओं पर ध्यान दिए बिना , कुंडली मेलापक की चर्चा किए बिना , अपने बच्चों का विवाह उपयुक्त पार्टनर ढूंढ़कर करें । किसी मंगला और मंगली की शादी भी सामान्य वर या कन्या से निश्चिंत होकर की जा सकती है।

रविवार, 13 मई 2018

दुनिया का सबसे आसान शब्‍द है मां

दुनिया का सबसे खूबसूरत शब्‍द, सबसे प्‍यारा शब्‍द है मां। किसी एक महिला के मां बनते ही पूरा घर ही रिश्‍तों से सराबोर हो जाता है। कोई नानी तो कोई दादी , कोई मौसी तो कोई बुआ , कोई चाचा तो कोई मामा , कोई भैया तो कोई दीदी , नए नए रिश्‍ते को महसूस कराती हुई पूरे घर में उत्‍सवी माहौल तैयार करती है एक मां। लेकिन इसमें सबसे बडा और बिल्‍कुल पवित्र होता है अपने बच्‍चे के साथ मां का रिश्‍ता। यह गजब का अहसास है , इसे शब्‍दों में बांध पाना बहुत ही मुश्किल है।
प्रसवपीडा से कमजोर हो चुकी एक महिला सालभर बाद ही सामान्‍य हो पाती है। मां बनने के बाद बच्‍चे की अच्‍छी देखभाल के बाद अपने लिए बिल्‍कुल ही समय नहीं निकाल पाती है। बच्‍चा स्‍वस्‍थ और सानंद हो , तब तो गनीमत है ,पर यदि कुछ गडबड हुई , जो आमतौर पर होती ही है, बच्‍चे की तबियत के अनुसार उसे खाना मिलता है , बच्‍चे की नींद के साथ ही वह सो पाती है , बच्‍चे की तबियत खराब हो , तो रातरातभर जागकर काटना पडता है , परंतु इसका उसपर कोई प्रभाव नहीं पडता , मातृत्‍व का सुखद अहसास उसके सारे दुख हर लेता है।
परंपरागत ज्‍योतिष में मां का स्‍थान चतुर्थ भाव में है। यह भाव हर प्रकार की चल और अचल संपत्ति और स्‍थायित्‍व से संबंध रखता है। यह भाव सुख शांति देने से भी संबंधित है। हर प्रकार की चल और अचल संपत्ति का अर्जन अपनी सुख सुविधा और शांति के लिए ही लोग करते हैं । भले ही उम्र के विभिन्‍न पडावों में सुख शांति के लिए लोगों को हर प्रकार की संपत्ति को अर्जित करना आवश्‍यक हो जाए , पर एक बालक के लिए तो मां की गोद में ही सर्वाधिक सुख शांति मिल सकती है , किसी प्रकार की संपत्ति का उसके लिए कोई अर्थ नहीं।
यूं तो एक बच्‍चा सबसे पहले ओठों की स‍हायता से ही उच्‍चारण करना सीखता है , इस दृष्टि से प फ ब भ और म का उच्‍चारण सबसे पहले कर सकता है। पर बाकी सभी रिश्‍तों को उच्‍चारित करने में उसे इन शब्‍दों का दो दो बार उच्‍चारण करना पडता है , जो उसके लिए थोडा कठिन होता है , जैसे पापा , बाबा , लेकिन मां शब्‍द को उच्‍चारित करने में उसे थोडी भी मेहनत नहीं होती है , एक बार में ही झटके से बच्‍चे के मुंह से मां निकल जाता है यानि मां का उच्‍चारण भी सबसे आसान।
मां शब्‍द के उच्‍चारण की ही तरह मां के साथ रिश्‍ते को निभा पाना भी बहुत ही आसान होता है। शायद ही कोई रिश्‍ता हो , जिसे निभाने में आप सतर्क न रहते हों , हिसाब किताब न रखते हों , पर मां की बात ही कुछ और है। आप अपनी ओर से बडी बडी गलती करते चले जाएं , माफी मांगने की भी दरकार नहीं , अपनी ममता का आंचल फैलाए अपने बच्‍चे की बेहतरी की कामना मन में लिए बच्‍चे के प्रति अपने कर्तब्‍य पथ पर वह आगे बढती रहेगी।
पर कभी कभी मां का एक और रूप सामने आ जाता है , बच्‍चे को मारते पीटते या डांट फटकार लगाते वक्‍त प्रेम की प्रतिमूर्ति के क्रोध को देखकर बडा अजूबा सा लगता है। पर यह एक मां की मजबूरी होती है , उसे दिल पर पत्‍थर रखकर अपना वह रोल भी अदा करना पडता है। इस रोल को अदा करने के लिए उसे अंदर काफी दर्द झेलना पडता है , पर बच्‍चे के बेहतर भविष्‍य के लिए वह यह दर्द भी पी जाती है।
पर हम उनकी इस सख्‍ती , इस कठोरता को याद रखकर अपने मन में उनके लिए गलत धारणा भी बना लेते हैं। साथ ही कर्तब्‍यों के मार्ग पर चलती आ रही मांओं को अधिकारों से वंचित कर देते हैं। जब उन्‍हें हमारी जरूरत होती है , तो हम वहां पर अनुपस्थित होते हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए। हमें याद रखना चाहिए कि कोई हमारे साथ भी यही व्‍यवहार करे तो हमें कैसा लगेगा ?



शनिवार, 5 मई 2018

गत्यात्मक ज्योतिष का संक्षिप्त परिचय और इसके जनक के बारे में जानकारी



                   भारत के बहुत सारे लोगों को शायद इस बात का ज्ञान भी न हो कि विगत कुछ वर्षों में उनके अपने देश में ज्योतिष की एक नई शाखा का विकास हुआ है,जिसके द्वारा वैज्ञानिक ढंग से की जानेवाली सटीक तिथियुक्त भविष्यवाणी जिज्ञासु बुद्धिजीवियों के मध्य चर्चा का विषय बनी हुई है। सबसे पहले दिल्ली से प्रकाशित होनेवाली पत्रिका ‘बाबाजी’ के 1994-1995-1996 के विभिन्न अंकों में तथा ज्योतिष धाम के कई अंकों में गत्यात्मक ज्योतिष के ज्योतिष के बुद्धिजीवी पाठकवर्ग के सम्मुख मेरे द्वारा ही रखा गया था ।

जनसामान्य की जिज्ञासा को देखते हुए 1997 में दिल्ली के एक प्रकाशक ‘अजय बुक सर्विस’ के द्वारा मेरी पुस्तक ‘गत्यात्मक दशा पद्धति: ग्रहों का प्रभाव’ पहले परिचय के रुप में पाठकों को पेश की गयी। इस पुस्तक का प्राक्कथन लिखते हुए रॉची कॉलेज के भूतपूर्व प्राचार्य डॉ विश्वंभर नाथ पांडेयजी ने ‘गत्यात्मक दशा पद्धति’ की प्रशंसा की और असके शीघ्र ही देश-विदेश में चर्चित होने कामना करते हुए हमें जो आशीर्वचन दिया था, वह इस पुस्तक के प्रथम और द्वितीय संस्करण के प्रकाशित होते ही पूर्ण होता दिखाई पड़ा। इस पुस्तक की लोकप्रियता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि शीघ्र ही 1999 में इस पुस्तक का द्वितीय संस्करण प्रकाशित करवाना पड़ा। पुस्तक के प्रकाशन के पश्चात् हर जगह ‘गत्यात्मक ज्योतिष चर्चा का विषय बना रहा । कादम्बिनी पत्रिका के नवम्बर 1999 के अंक में श्री महेन्द्र महर्षिजी के द्वारा इस सिद्धांत को प्रस्तुत किया गया। जैन टी वी के प्रिया गोल्ड फ्यूचर प्रोग्राम में भी इस पद्धति की चर्चा-परिचर्चा हुई। दिल्ली के बहुत से समाचार-पत्रों में इस पद्धति पर आधारित लेख प्रकाशित होते रहें।

गत्यात्मक ज्योतिष के विकास की चर्चा के आरंभ में ही इसका प्रतिपादन करनेवाले वैज्ञानिक ज्योतिषी श्री विद्यासागर महथा का परिचय आवश्यक होगा ,जिनका वैज्ञानिक दृष्टिकोण ही गत्यात्मक ज्योतिष के जन्म का कारण बना। महथाजी का जन्म 15 जुलाई 1939 को झारखंड के बोकारो जिले में स्थित पेटरवार ग्राम में हुआ। एक प्रतिभावान विद्यार्थी कें रुप में मशहूर महथाजी रॉची कॉलेज ,रॉची में बी एससी करते हुए अपने एस्‍ट्रॉनामी पेपर के ग्रह नक्षत्रों में इतने रम गए कि ग्रह-नक्षत्रों की चाल और उनका पृथ्वी के जड़-चेतन पर पड़नेवाले प्रभाव को जानने की उत्सुकता ही उनके जीवन का अंतिम लक्ष्य बन गयी। उनके मन को न कोई नौकरी ही भाई और न ही कोई व्यवसाय। इन्‍होने प्रकृति की गोद में बसे अपने पैतृक गॉव में रहकर ही प्रकृति के रहस्यों को ढूंढने का फैसला किया।


ग्रह नक्षत्रों की ओर गई उनकी उत्सुकता ने उन्हें ज्योतिष शास्त्र के अध्ययन को प्रेरित किया। गणित विषय की कुशाग्रता और साहित्य पर मजबूत पकड़ के कारण तात्कालीन ज्योतिषीय पत्रिकाओं में इनके लेखों ने धूम मचायी। 1975 में उन्हीं लेखों के आधार पर ‘ज्योतिष-मार्तण्ड’ द्वारा अखिल भारतीय ज्योतिष लेख प्रतियोगिता में इन्हें प्रथम पुरस्कार प्रदान किया गया। उसके बाद तो ज्योतिष-वाचस्पति ,ज्योतिष-रतन,ज्योतिष-मनीषी जैसी उपाधियों से अलंकृत किए जाने का सिलसिला ही चल पड़ा।1997 में भी नाभा में आयोजित सम्मेलन में देश-विदेश के ज्योतिषियों के मध्य इन्हें स्वर्ण-पदक से अलंकृत किया गया।

विभिन्न ज्योतिषियों की भविष्यवाणी में एकरुपता के अभाव के कारणों को ढूंढ़ने के क्रम में इनके वैज्ञानिक मस्तिष्क को ज्योतिष की कुछ कमजोरियॉ दृष्टिगत हुईं। फलित ज्योतिष की पहली कमजोरी ग्रहों के शक्ति-आकलन की थी।ग्रहों के शक्ति निर्धारण से संबंधित सूत्रों की अधिकता भ्रमोत्पादक थी,जिसके कारण ज्योतिषियों को एक निष्कर्ष में पहुंचने में बाधा उपस्थित होती थी। हजारो कुंडलियों का अध्ययन करने के बाद इन्होने ग्रहों की गत्यात्मक शक्ति को ढूंढ निकाला। ग्रह-गति छः प्रकार की होती है---- 

अतिशीघ्री , 2.शीघ्री , 3. सामान्य , 4. मंद , 5.वक्र , 6.अतिवक्र ।

अपने अध्ययन में इन्होनें पाया कि किसी व्यक्ति के जन्म के समय अतिशीघ्री या शीघ्री ग्रह अपने अपने भावों से संबंधित अनायास सफलता जातक को जीवन में प्रदान करते हैं। जन्म के समय के सामान्य और मंद ग्रह अपने-अपने भावों से संबंधित स्तर जातक को देते हैं। इसके विपरीत वक्री या अतिवक्री ग्रह अपने अपने भावों से संबंधित निराशाजनक वातावरण जातक को प्रदान करते हैं। 1981 में सूर्य और पृथ्वी से किसी ग्रह की कोणिक दूरी से उस ग्रह की गत्यात्मक शक्ति को प्रतिशत में निकाल पाने के सूत्र मिल जाने के बाद उन्होने परंपरागत ज्योतिष को एक कमजोरी से छुटकारा दिलाया।

फलित ज्योतिष की दूसरी कमजोरी दशाकाल-निर्धारण से संबंधित थी। दशाकाल-निर्धारण की पारंपरिक पद्धतियॉ त्रुटिपूर्ण थी। अपने अध्ययनक्रम में उन्होने पाया कि ज्योतिष के प्राचीन ग्रंथों में वर्णित ग्रहों की अवस्था के अनुसार ही मानव-जीवन पर उसका प्रभाव 12-12 वर्षों तक पड़ता है। जन्म से 12 वर्ष की उम्र तक चंद्रमा ,12 से 24 वर्ष की उम्र तक बुध ,24 से 36 वर्ष क उम्र तक मंगल ,36 से 48 वर्ष की उम्र तक शुक्र ,48 से 60 वर्ष की उम्र तक सूर्य ,60 से 72 वर्ष की उम्र तक बृहस्पति , 72 से 84 वर्ष की उम्र तक शनि,84 से 96 वर्ष की उम्र क यूरेनस ,96 से 108 वर्ष क उम्र तक नेपच्यून तथा 108 से 120 वर्ष की उम्र तक प्लूटो का प्रभाव मनुष्य पड़ता है। विभिन्न ग्रहों की एक खास अवधि में निश्चित भूमिका को देखते हुए ही ‘गत्यात्‍मक दशा पद्धति की नींव रखी गयी। अपने दशाकाल में सभी ग्रह अपने गत्यात्मक और स्थैतिक शक्ति के अनुसार ही फल दिया करते हैं।

उपरोक्त दोनो वैज्ञानिक आधार प्राप्त हो जाने के बाद भविष्यवाणी करना काफी सरल होता चला गया। ‘ गत्यात्मक दशा पद्धति ’ में नए-नए अनुभव जुडत़े चले गए और शीघ्र ही ऐसा समय आया ,जब किसी व्यक्ति की मात्र जन्मतिथि और जन्मसमय की जानकारी से उसके पूरे जीवन के सुख-दुख और स्तर के उतार-चढ़ाव का लेखाचित्र खींच पाना संभव हो गया। धनात्मक और ऋणात्मक समय की जानकारी के लिए ग्रहों की सापेक्षिक शक्ति का आकलण सहयोगी सिद्ध हुआ। भविष्यवाणियॉ सटीक होती चली गयी और जातक में समाहित विभिन्न संदर्भों की उर्जा और उसके प्रतिफलन काल का अंदाजा लगाना संभव दिखाई पड़ने लगा।

गत्यात्मक दशा पद्धति के अनुसार जन्मकुंडली में किसी भाव में किसी ग्रह की उपस्थिति महत्वपूर्ण नहीं होती , महत्वपूर्ण होती है उसकी गत्यात्मक शक्ति , जिसकी जानकारी के बिना भविष्यवाणी करने में संदेह बना रहता है। गोचर फल की गणना में भी ग्रहो की गत्यात्मक और स्थैतिक शक्ति की जानकारी आवश्यक है। इस जानकारी पश्चात् तिथियुक्त भविष्यवाणियॉ काफी आत्मविश्वास के साथ कर पाने के लिए ‘गत्यात्मक गोचर प्रणाली’ का विकास किया गया ।

गत्यात्मक दशा पद्धति एवं गत्यात्मक गोचर प्रणाली के विकास के साथ ही ज्योतिष एक वस्तुपरक विज्ञान बन गया है , जिसके आधार पर सारे प्रश्नों के उत्तर हॉ या नहीं में दिए जा सकते हैं। गत्यात्मक ज्योतिष की जानकारी के पश्चात् समाज में फैली धार्मिक एवं ज्योतिषीय भ्रांतियॉ दूर की जा सकती हैं ,साथ ही लोगों को अपने ग्रहों और समय से ताल-मेल बिठाते हुए उचित निर्णय लेने में सहायता मिल सकती है। यही नहीं, बुरे ग्रहों के प्रभाव को दूर करने के लिए किए जाने वाले उपचार भी बिल्‍कुल वैज्ञानिक और परंपरागत ज्‍योतिष से बिल्‍कुल भिन्‍न है। आनेवाले गत्यात्मक युग में निश्चय ही गत्यात्मक ज्योतिष ज्योतिष के महत्व को सिद्ध करने में कारगर होगा ,ऐसा मेरा विश्वास है और कामना भी। लेकिन सरकारी,अर्द्धसरकारी और गैरसरकारी संगठनों के ज्योतिष के प्रति उपेक्षित रवैये तथा उनसे प्राप्त हो सकनेवाली सहयोग की कमी के कारण इस लक्ष्य को प्राप्त करने में कुछ समय लगेगा , इसमें संदेह नहीं है।




बुधवार, 18 अप्रैल 2018

मुहूर्त्त का सच


कई प्रकार की व्‍यस्‍तता के कारण कुछ दिनों से अपने ब्‍लोग पर नियमित रूप से ध्‍यान नहीं दे पा रही हूं। इसी दौरान पिताजी की भी एक डायरी पढने का मौका मिला , उसमें से भी कुछ उपयोगी आलेखों को इस पुस्‍तक में सम्मिलित करने की भी इच्‍छा है। उन्‍हीं चुने हुए आलेखों में से एक आज आपके लिए प्रस्‍तुत है .....

आज के अनिश्चित और अनियमित युग में हर व्यक्ति स्वयं को असुरक्षित महसूस करता है। अपने कर्मों और कार्यक्रमों पर भरोसेवाली कोई बात नहीं रह जाती है। जैसे जैसे आत्मविश्वास में कमी होती जा रही है मुहूर्त यात्रा आदि संदर्भों की ओर लोगों का झुकाव बढ़ता जा रहा है। पत्र-पत्रिकाओं में अक्सर फिल्म-निर्माण प्रारंभ करने और उसके प्रदर्शन की शुरुआत के लिए मुहूर्त की चर्चा देखने को मिलती है। फिल्म-निर्माण करने में अधिक से अधिक खर्च-शक्ति और पूंजी की लागत होती है कामयाबी मिलने पर लागत-पूंजी न केवल सार्थक होती है वरन् प्रतिदान के रुप में कई गुणा बढ़ भी जाती है। दूसरी ओर फिल्म फलॉप होने पर फिल्म निर्माता दर-दर भटकाव की स्थिति को प्राप्त करते हैं। सचमुच फिल्म निर्माण बहुत बड़ा रिस्क होता है इसलिए फिल्मनिर्माता एक अच्छे मुहूर्त की तलाश में होते हैं ताकि काम अबाध गति से चलता रहे और प्रदर्शन के बाद भी फिल्म काफी लाभदायक सिद्ध हो। किन्तु वस्तुतः होता क्या है आज का फिल्म उद्योग काफी लाभप्रद नहीं रह गया है कुछ सफल है तो अधिकांश की स्थिति बिगड़ी हुई है। क्या सचमुच मुहूर्त काम करता है ?

पूरे देश में प्रवेशिका परीक्षा देनेवालों की संख्या करोड़ों में होती है। इस वैज्ञानिक युग में जैसे-जैसे मनोरंजन के साधन बढ़ते चले गए पढ़ाई का वातावरण धीरे-धीरे कमजोर पड़ता चला गया। आज जैसे ही परीक्षा के लिए कार्यक्रम की घोषणा होती है अधिकांश विद्यार्थी परेशान नजर आते हैं क्योंकि उनकी तैयारी संतोषजनक नहीं होती है इसलिए उनका आत्मविश्वास काम नहीं करता रहता है। प्रायः सभी विद्यार्थी और उनके अभिभावक अपने आवास से परीक्षा-स्थल पर पहुंचने के लिए मुहूर्त्‍त की तलाश में पंडितों के पास पहुंच जाते हैं। पंडितजी के पास ग्रहों नक्षत्रों के आधार पर शोध किए गए कुछ विशिष्ट शुभ समय-अंतराल की तालिका होती है।

कभी महेन्द्र योग कभी अमृत योग तो कभी सिद्धियोग से संबंधित इस प्रकार के शुभफलदायी लघुकालावधि की सूचना बारी-बारी से सभी विद्यार्थियों और अभिभावकों को दी जाती है या फिर एक ही विद्यार्थी पंडितजी से यह मुहूर्त्‍त प्राप्त कर कई विद्यार्थियों को जानकारी देते हैं। विद्यार्थी झुंड बनाकर एक ही साथ उसी शुभ मुहूर्त्‍त में अपने गांव कस्बे या क्षेत्र से परीक्षास्थल के लिए निकलते हैं। पर सोंचने की बात है कि क्या सबका परिणाम एक सा होता है नहीं विद्यार्थियों को उनकी प्रतिभा के अनुरुप ही फल प्राप्त होता है। उत्तीर्ण होने लायक विद्यार्थी सचमुच उत्तीर्ण होते हैं और जिन विद्यार्थियों के अनुत्तीर्ण होने की संभावना पहले से ही रहती है वैसे ही विद्यार्थी अनुत्तीर्ण देखे जाते हैं। विरले ही ऐसे विद्यार्थी होते हैं जिनका परीक्षा परिणाम प्रत्याशा के विरुद्ध होता है उन विद्यार्थियों ने शुभ मुहूर्त्‍त में यात्रा नहीं की इसलिए ही ऐसा हुआ यह तो कदापि नहीं कहा जा सकता। 

यहां तो मैं केवल यात्रा की बात कर रहा हूं किन्तु कल्पना करें किसी समय अमृत योग सिद्धि योग या महेन्द्र योग चल रहा हो और उसी समय किसी विषय की परीक्षा चल रही हो तो क्या लाखों की संख्या में परीक्षा दे रहे विद्यार्थी उस विषय में उत्तीर्ण हो जाएंगे कदापि नहीं सभी विद्यार्थियों को उनकी योग्यता के अनुरुप ही  परीक्षाफल की प्राप्ति होगी। अमृतयोग या सिद्धियोग कुछ काम नहीं कर पाएगा।

हर विषय की परीक्षा का समय निर्धारित होता है और लाखों की संख्या में परीक्षार्थी परीक्षा में सम्मिलित होकर भिन्न-भिन्न परीणामों को प्राप्त करते हैं। समय के छोटे से टुकड़े को ही मुहूत्र्त कहा जाता है। इस दृष्टिकोण से परीक्षा की कुल अवधि जिसमें सभी विद्यार्थी परीक्षा दे रहे हैं एक प्रकार का मुहूत्र्त ही हुआ। वह मुहूर्त्‍त अच्छा है या बुरा सभी विद्यार्थियों के लिए एक जैसा ही होना चाहिए परंतु क्या वैसा हो पाता है स्पष्ट है ऐसा कभी नहीं हो सकता ।

बहुत बार समय का एक छोटा सा अंतराल आम लोगों को प्रभावित करता है। हवाई जहाज या रेल के दुर्घटनाग्रस्त होने पर सैकड़ो लोग एक साथ मरते हैं। इसी तरह युद्ध भूकम्प या तूफान के समय मरनेवालों की संख्या हजारो में होती है। उक्त कालावधि को हम बहुत ही बुरे समय से अभिहित कर सकते हैं क्योकि इस प्रकार की घटनाएं जनमानस पर बहुत ही बुरा प्रभाव डालती है किन्तु इस प्रकार की घटनाओं को अच्छे योगों में भी घटते हुए मैंने पाया है। इसी प्रकार शुभ विवाह के लिए शुभ मुहूर्तों की एक लम्बी तालिका होती है जिन तिथियों में ही शादी-विवाह की व्यवस्था की जाती है। परंतु बहुत बार हम ऐसा सुनते हैं कि आकस्मिक दुर्घटना के कारण बरातियों की मौत हो गयी ऐसी हालत में इन योगों की कौन सी प्रासंगिकता रह जाती है क्या यह बात दावे से कही जा सकती है कि जो हवाई जहाज दुर्घटनाग्रस्त हुई उसमें हवाई यात्रा करने से पूर्व सभी यात्रियों में से किसी ने मुहूर्त्‍त नहीं देखा होगा उसमें स्थित कोई आम आदमी जो भाग्यवादी दृष्टिकोण भी रखता होगा यात्रा के विषय में अवश्य ही पंडितों से सलाह ले चुका होगा फिर भी सभी यात्रियो का परिणाम एक सा ही देखा जाता है।

जहां एक ओर  सामूहिक उत्सव एक ही मेले में लाखो लोगों का एक साथ उपस्थित होना सामूहिक विवाह सौंदर्य प्रतियोगिता आदि सुखद अहसास खास समय अंतराल के विषय वस्तु हो सकते हैं वहीं दूसरी ओर भूकम्प तूफान युद्ध और दुर्घटनाओं से लाखों लोगों का प्रभावित होना भी सच हो सकता है। इस प्रकार से अच्छे या बुरे समय को स्वीकार करना हमारी बाध्यता तो हो सकती है किन्तु इन दोनों प्रकार के समयों को अलग-अलग कर दिखाने के सूत्रों की पकड़ जब अच्छी तरह हो जाएगी तो फलित ज्योतिष के द्वारा समय और तिथियुक्त भविष्यवाणियां भी आसानी से की जा सकेगी।

अमुक दिन अमुक समय पर भूकम्प आनेवाला है तूफान आनेवाला है कहकर लोगों को सतर्क किया जा सकेगा। अगर ऐसा हो पाया तो बुरे समय का बोध स्वतः हो जाएगा। किन्तु अभी फलित ज्योतिष इतना ही विकसित है कि वह ग्रह की स्थिति अंश कला और विकला तक कर सकता है परंतु उसके फलाफल की प्राप्ति किस वर्ष होगी इसकी भी चर्चा नहीं कर पाता । दूसरी ओर फलित ज्योतिष के ज्ञाता किसी खास घंटा और मिनट को भी शुभ और अशुभ कहने में नहीं चूकते हैं। फलित कथन की यह दोहरी नीति फलित ज्योतिष में भ्रम उत्पन्न करती है।

कभी-कभी एक ही समय में एक घटना घटित होती है और उस घटना का प्रभाव दो भिन्न-भिन्न व्यक्ति और समुदाय के लिए अलग-अलग यानि एक के लिए शुभ और दूसरे के लिए अशुभ फलदायक होता है। इस प्रकार की घटनाएं अक्सर होती हैं एक हारता है तो दूसरा जीतता है। एक को हानि होती है तो दूसरा लाभान्वित होता है। वर्षों तक मुकदमा लड़ने के बाद दोनों पक्ष के मुकदमेबाज ज्योतिषी से सलाह लेने पहुंच जाते हैं। फैसले के लिए कौन सी तिथि का चुनाव किया जाए। पंचांग में एक बहुत ही शुभ समय का उल्लेख है। दोनो पक्ष भिन्न-भिन्न ज्योतिषियों से सलाह लेकर उस शुभ दिन को फैसले की सुनवाई के लिए तैयार होकर जाते हैं। पर परिणाम क्या होगा एक को जीत तो दूसरे को हार मिलनी ही है। निर्धारित शुभ समय एक के लिए शुभफलदायक तो दूसरे के लिए अशुभ फलदायक होगा।

दो देशों के मध्य क्रिकेट मैच हो रहा है।  दोनो देशों के निवासी बड़ी तल्लीनता के साथ मैच देख रहे होते हैं। कई घंटे बाद निर्णायक क्षण आता है। जीतनेवाला देश कुछ ही मिनटों में खुशी का इजहार करते हुए करोड़ो रुपए की आतिशबाजी कर लेता है किन्तु प्रतिद्वंदी देश गम में डूबा शोकाकुल मातम मनाता रहता है। ऐसे निर्णायक क्षण को बुरा कहा जाए या अच्छा निर्णय करना आसान नहीं है। इसी तरह बंगला देश के आविर्भाव के समय 1971 में दिसम्बर के पूर्वार्द्ध में एक पखवारे तक दोनो देशों के बीच युद्ध होता रहा जान-माल की हानि होती रही। बंगला देश अस्तित्व में आया। सिद्धांततः भारत की जीत हुई पाकिस्तान की पराजय। किन्तु दोनो ही देशों को भरपूर आर्थिक नुकसान हुआ। इन पंद्रह दिनों की अवघि को किस देश के लिए किस रुप में चिन्हित किया जाए। 15 दिनों के अंदर उल्लिखित अमृत महेन्द्र और सिद्धियोग का भारत और पाकिस्तान के सैनिकों के लिए और बंगला देश के नागरिकों के लिए क्या उपयोगिता रही ?

इस अवधि में बंगला देश निवासी स्त्री-पुरुषों के साथ पाकिस्तानी सैनिकों का अत्याचार अपनी पराकाष्ठा पर था। क्या फलित ज्योतिष के दैनिक मुहूर्तों का इनपर कोई प्रभाव पड़ सका मुहूर्त के रुप मे छोटे-छोटे अंतराल की चर्चा न कर स्थूल रुप से ही इस लम्बी अवधि तक की युद्ध की विभीषिका को क्या फलित ज्योतिष में एक अनिष्टकर योग के रुप में  चित्रित किया जा सकता है नहीं क्योकि इस घटना का प्रभाव सारे विश्व के लिए एक जैसा नहीं था । न्यूटन के तीसरे नियम के अनुसार प्रत्येक क्रिया के बराबर और विपरीत एक प्रतिक्रिया होती है। यदि यह प्रकृति का नियम है तो समय के छोटे से अंतराल में भी जिसे हम बुरा या अशुभ फल प्रदान करनेवाला कहते हैं किसी न किसी का कल्याण हो रहा होता है।

अतः किसी भी समय को किसी व्यक्ति विशेष के लिए अच्छा या बुरा समय कहना ज्यादा सटीक होगा। अमृत योग में भी किसी को फांसी पर लटकाया जा सकता है विषयोग में भी कल्याणकारी कार्य हो सकते हैं । किसी वर्ष मक्का-मदीना में गए हजयात्रियों की संख्या 20 लाख थी। गैस-रिसाव से अग्नि प्रज्वलित हुई तथा तेज हवा के झोकों के कारण आग की लपटे हजारो पंडालों तक फैल गयी। इससे 400 तीर्थयात्री मारे गए। शेष हजयात्रा पूरी करके सकुशल वापस आ गए। जो मारे गए वे सीधे जन्नत सिधार गए। उनका संपूर्ण परिवार पीडि़त हुआ। जो घायल हुए वे स्वयं पीडि़त हुए। शेष हादसे से प्रभावित नहीं होने के कारण हजयात्रा की सफलता को उपलब्धि के रुप में लेंगे। सभी अपने अपने दशाकाल के अनुसार फल की प्राप्ति कर रहे थे मुहूर्त के अनुसार उनका फल प्रभावित नहीं हुआ।

किसी धनाढ्य व्यक्ति के यहां लक्ष्मीपूजन किस समय किया जाए इसके लिए पंडित शुभ मुहूर्त निकाल देते हैं पूजा भी हो जाती है धन की वर्षा भी होने लगती है किन्तु एक पंडित अपने लिए वह शुभ मुहूर्त कभी नहीं निकाल पाता है । यदि पक्के विश्वास की बात होती तो पंडित उस शुभ घड़ी में स्वयं अपने यहां लक्ष्मी-पूजन करता और धन की वर्षा उसी के यहां होती उसे केवल दक्षिणा से संतुष्ट रहने की बात नहीं होती।

निष्कर्ष यह है कि हर समय का महत्व हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग होता है। पंचांग में यदि एक समय को शुभ लिख दिया जाए तो कोई समय शुभ नहीं हो जाएगा। एक समय एक व्यक्ति हॅसता है तो दूसरा रोता है। यात्रा या मुहूर्त के बल पर बुरे समय को अच्छे समय में बदलना कठिन ही नहीं असंभव कार्य है। अपने कर्मफल को भोगने के लिए हम सभी विवश हैं। किसी की यात्रा या मुहूर्त उसी दिन शुरु हो जाता है जिस दिन उसका जन्म पृथ्वी पर होता है। जबतक यह जीवन है हर व्यक्ति अपने यात्रा-पथ में है।

जन्म के अनुसार संस्कार विचारधारा कर्तब्य सुखदुख सब निर्धारित है। जन्मकालीन ग्रहों द्वारा निर्मित वातावरण इन सबके लिए काफी हद तक जिम्मेवार है। जन्म से मृत्यु तक के यात्रापथ में उसके समस्त कार्यक्रम उसकी सफलता और असफलता तक के क्षणों का निर्धारण लगभग हो चुका होता है। इस बीच यदि कोई बार-बार मुहूर्त की तलाश करता है तो क्या सचमुच अपनी प्रकृति विचारधारा कार्यप्रणाली और मंजिल को बदलने की क्षमता रखता है यदि ये सारे संदर्भ हर समय बदल दिए जाए तो व्यक्ति कहां पहुंचेगा ?

पंचांगों में शुभ विवाह के लिए बहुत सारे मुहूर्तों का उल्लेख होता है। वैवाहिक बंधनों में बॅघनेवालों के लिए शुभ तिथियां कुल मिलाकर 40 से 50 के बीच होती हैं। उनमें भी कई प्रकार के दोषों का उल्लेख रहता है। लोग भ्रमजाल में उलझे उनमें से किसी अच्छी तिथि के लिए पंडितों के पास पहुंचते हैं। अभिभावकों के पास पंचांगों में लिखी बातों को मानने के अलावा और कोई उपाय नहीं होता। वैवाहिक संस्कार जीवन का एक बहुत ही महत्वपूर्ण संस्कार है इसका बंधन बहुत ही नाजुक होता है संपूर्ण जीवन पर गहरा प्रभाव डालनेवाला।

इसलिए लोग शुभलग्न या शुभ तिथियों में ही विवाह निश्चित करते हैं। सीमित तिथियां होने से कभी-कभी एक ही तिथि में शादी की इतनी भीड़ हो जाती है कि हर प्रकार की व्यवस्था में अभिभावकों को काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उत्सवी वातावरण बोझिल बन जाता है। जिस कार्यक्रम की शुरुआत में ही कष्ट या तनाव हो जाए उसका मनोवैज्ञानिक बुरा प्रभाव भविष्य में भी देखने को मिलता है। शुभ तिथि के चयन में इस बात का सर्वाधिक महत्व होना चाहिए कि वांछित कार्यक्रम का किस प्रकार से समापन हो पर इसका सहारा न लेकर ऊबाऊ मुहूर्त की चर्चा करना समाज में व्यर्थ का बोझ देना है। 

पंचांग में शुक्र के अस्‍त होने पर शादी के लिए कोई शुभ लग्न पंचांगों में दर्ज नहीं किया जाता है। पर ज्योतिषियों को यह मालूम होना चाहिए कि शुक्र का अस्त होना हर स्थिति में कष्टकर नहीं होता। सूर्य के साथ अंतर्युति करते हुए जब शुक्र अस्त होता है तो वह आम लोगों के लिए कष्टकर हो सकता है किन्तु वही शुक्र सूर्य से बहिर्युति करते हुए जब अस्त हो तो बहुत ही अच्छा फल प्रदान करता है। जब शुक्रास्त सूर्य के साथ बहिर्युति करते होता है तो शुक्र की कमजोरी को दृष्टिकोण में रखकर वैवाहिक शुभ लग्न का उल्लेख नहीं करना अनजाने में बहुत बड़ी भूल होती है। पंचांग निर्माता या फलित ज्योतिष के विशेषज्ञ विभिन्न कारणों से शादी के लिए किसी वर्ष शुभ लग्न की कितनी भी कमी दर्ज क्यों न करें विवाह की कुछ संख्या घट सकती है परंतु होगी तो अवश्य ही और यदि वे लागातार कुछ वर्षों तक शुभ लग्न की कमी दिखलाते रहें तो विवाह बिना लग्न के ही होते देखे जाएंगे।

कहने का अभिप्राय यह है कि विधि-निषेध ओर कर्मकाण्ड से संबंधित ज्योतिषीय चर्चा जब भी हो उसका ठोस वैज्ञानिक आधार होना आवश्यक होगा अन्यथा उन नियमों की अवहेलना स्वतः युग के साथ होनी स्वाभाविक है। जब आजतक ग्रह-शक्ति निर्धारण और उनके प्रतिफलन काल से संबंधित ठोस सूत्र ज्योतिषियों को मालूम नहीं है तो मुहूर्त को लेकर तनाव में पड़ने की कोई आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। जबतक फलित ज्योतिष को विकसित स्वरुप न प्रदान कर दी जाए यानि ग्रह की इस स्थिति का यह परिणाम होगा यह बात दावे से न कही जा सके तबतक ज्योतिषियों के अधूरे ज्ञान या संशय का लाभ जनता को मिलना चाहिए। अनावश्यक विधि निषेध से संबंधित नियमावलि से आमलोगों को कदापि परेशान नहीं किया जाना चाहिए।

शादी के लिए कन्या पक्ष और वरपक्ष तैयार है सांसारिक दृष्टि से उसे अंजाम देने में सप्ताह भर का समय काफी है परंतु फिर भी विवाह नहीं हो पा रहा है इसका कारण यह है कि पंचांग में शुभ लगन का अभाव है। इस तरह सिर्फ वैवाहिक लग्न के संदर्भ में ही नहीं अपितु हर प्रकार के कार्यों में पंचांगों में दर्ज मुहूर्तों का अभाव आम जीवन में कई प्रकार की असुविधाओं को जन्म देता है जबकि विश्वासपूर्वक मुहूर्तों की उपयोगिता और प्रभाव को अभी कदापि सिद्ध नहीं किया जा सका है।

स्मरण रहे हर शुभ मुहूर्त का आधार तिथि नक्षत्र चंद्रमा की स्थिति योगिनी दिशा और ग्रहस्थिति के आधार पर किया गया है किन्तु ग्रह-शक्ति के सबसे बड़े आधार ग्रह की विभिन्न प्रकार की गतियों के आधार पर मुहूर्तों का चयन नहीं हुआ है। अतः अभी तक के मुहूर्त पूर्ण विश्वसनीय नहीं हैं। अभी यह भी अनुसंधान बाकी ही है कि एक व्यक्ति के लिए सभी शुभ मुहूर्त शुभफल ही प्रदान करते हैं अतः कर्मकाण्ड से डरने की कोई आवश्यकता नहीं। विकसित विज्ञान का काम सभी व्यक्तियों के मन से भय को दूर कर मनुष्य को निडर बनाना है। .. और हमें उसी प्रयास में बने रहना चाहिए।

न तो एक व्यस्त डॉक्टर मुहूर्त देखकर रोगी का ऑपरेशन करता है और न ही एक व्यस्त वकील मुहूर्त देखकर अपने मुकदमें की पैरवी करता है न ही एक कुशल वैज्ञानिक मुहूर्त देखकर उपग्रह या मिसाइल का प्रक्षेपण करते हैं। जो अधिक फुर्सत में होते है वे ही मुहूर्त की तलाश में होते हैं या फिर जिनके आत्मविश्वास में थोड़ी कमी होती है वे ही मुहूर्त की चर्चा करते हैं। योजनाओं के अनुरुप हर प्रकार के संसाधन उपस्थित हो तो किसी भी व्यक्ति को यह समझ लेना चाहिए कि मुहूर्त स्वयं आकर हमारे सामने खड़ा है उसे ढूंढ़ने के लिए पंडित के पास जाने की आवश्यकता नहीं। ऐसी परिस्थिति उत्पन्न होने पर किसी भी व्यक्ति को अपने काम में विलम्ब नहीं करना चाहिए। यह अलग बात हे कि जब योजना को स्वरुप देने में संसाधन की कमी हो रही हो कई तरह की बाधाएं उपस्थित हो रही हो तो ऐसी परिस्थिति में ज्योतिषी से यह सलाह लेने की बात हो सकती है कि निकट भविष्य में कोई शुभ मुहूर्त उसके जीवन में है या नहीं ?