किसी गांव में तीन मित्र साथ साथ रहते थे, खुद ही खाना बनाते और मिलजुलकर खाते थे। बहुत दिनों से रूखा सूखा खाना खाकर वे तीनो उब चुके थे , इसलिए एक बार तीनों को कुछ बढिया खाने की इच्छा हुई। उन्होने सारी सामग्री इकट्ठा की और मिलकर खीर बनाया। खीर बहुत ही स्वादिष्ट बनी थी , तीनों ने तो जीभर खाया, पर फिर भी एक कटोरा खीर बच ही गया। इस खीर को कल खाया जाएगा , यह तो तय कर लिया गया , पर कौन खाएगा , इसका फैसला करना काफी कठिन था। बहुत देर माथापच्ची के बाद तीनो इस निर्णय पर पहुंचे कि रात में जो सबसे अच्छा सपना देखेगा , वही खीर खाएगा।
तीनो लेट गए , पर नींद आंख से कोसों दूर थी। सुंदर सपने देखने का कोई सवाल ही नहीं था , इसलिए सभी मन ही मन प्लान बना रहे थे कि सुबह उठकर कौन सा सपना सुनाया जाए कि खीर का कटोरा उसे ही खाने को मिले। दो मित्र की कल्पना शक्ति काफी तेज थी , दोनो ने सुबह सुनाने के लिए ने सुंदर सुंदर कहानियां बनायी और आराम से खर्राटे भरने लगे। तीसरे का दिमाग ही नहीं चल रहा था , नींद भी नहीं आ रही थी। सोंचते सोंचते उसे फिर से भूख लग गयी , वह आराम से उठा और सारा खीर खाकर कटोरे को पूर्ववत् ढंककर रख दिया। इसके बाद तो उसे आराम से नींद आनी ही थी।
सुबह तीनो उठे , अब हाथ मुंह धोकर एक दूसरे को कहानी सुनाने की बारी थी। पहले दोस्त ने सुनाना शुरू किया कि वह रात सपने में अयोध्या पहुंच गया था , वहां की सुंदरता के क्या कहने ! ऐसी वाटिका थी, ऐसे फल फूल थे , ऐसी सडके , ऐसी इमारतें , घूमता घूमता वह राजा के महल में भी पहुंच गया। खूबसूरत महल में राजा दशरथ और उनकी चारो रानियां मौजूद थी । राम , लक्ष्मण , भरत और शत्रुध्न बाल क्रीडा कर रहे थे। और भी न जाने क्या क्या , रातभर उसने अयोध्या में ही व्यतीत किया , वे सब तो इसकी बराबरी कर ही नहीं सकते।
अब दूसरे की बारी थी , उसने सुनाना शुरू किया कि भगवान राम की बाल लीला देखकर इतने संतुष्ट हो तुम ! कल रात सपने में मै तो गोकुल पहुंच गया था , वहां की सुंदरता के आगे अयोध्या की सुंदरता कहां टिकनेवाली ? मैं तो कृष्ण का सखा बनकर उसके साथ साथ घूम रहा था , गौएं चरा रहा था और वहां कृष्ण जी के साथ रास रचाती सुंदर सुंदर गोपियां , अरे मेरी तो वहां से आने की इच्छा ही नहीं हो रही थी। इसलिए मेरा सपना तुमसे भी अच्छा माना जाएगा।
पहले ने कहा कि हमलोग फैसला बाद में करेंगे , पहले हमारे तीसरे दोस्त से सुन तो लिया जाए कि उसने सपने में क्या देखा। दोनो के सपने को सुनकर तीसरा दोस्त तो घबडा ही गया था , क्यूंकि उसे मालूम था कि इतने सुंदर सपनों के बाद किसी भी सपने को सुनाकर वह नहीं जीत सकता था। पर यह समय घबडाने का नहीं , हिम्मत से काम लेने का था और हिम्मत जुटाने से रास्ता तो निकल ही जाता है। उसने कहा , कल रात , यहां मेरे सपने में हनुमान जी आए थे , आते ही उन्होने गदा उठाया और कहा , ' तुमने खीर को बचाकर क्यूं रखा है , जल्दी से उठकर सारे खीर खाओ , नहीं खाए तो गदा के मार से तुम्हारी पीठ ही फाड दूंगा' इसके बाद मैं क्या करता , उनकी गदा की मार के डर से मैने रात में ही उठकर सारी खीर खा ली।
दोनो दोस्त चौंके, 'अरे हनुमान जी ने खीर बचाकर नहीं रखने को कहा , तो तुमने अकेले रात में ही सारी खीर खा ली , हमें भी बुला लेते , खीर को हम सब मिलकर समाप्त कर देते।'
'तुम्हें कैसे बुलाते , तुम दोनो तो अयोध्या और गोकुल में घूम रहे थे , मजबूरीवश मुझे अकेले ही खाना पडा' तीसरे ने निश्चिंति से जबाब दिया।
रविवार, १५ नवम्बर २००९
शनिवार, १४ नवम्बर २००९
मंगल के घर में शनि बैठा है .. क्या यह खिल्ली उडानेवाली बात है ??
ज्योतिष की खिल्ली उडानेवालों के मुहं से अक्सर कुछ न कुछ ऐसी बातें सुनने को मिल जाती है , जो उनके अनुसार बिल्कुल अविश्वसनीय है....उसी में से एक है किसी ग्रह का घर। उनका मानना है कि सब सभी पिंड अपने परिभ्रमण पथ पर निश्चित रूप से चलते रहते हैं , तो उनमें से किसी का घर कहां माना जाए ? यदि वास्तव में उनका कोई घर होता , तो वे थोडी देर वहां न रूकते , आराम न करते ? उनका शक स्वाभाविक है , पर मैं आपलोगों को जानकारी देना चाहती हूं कि किसी ग्रह का खुद के घर में या अपने मित्र के घर में या अपने शत्रु के घर में होना 'फलित ज्योतिष' के क्षेत्र में नहीं , वरन् 'परंपरागत खगोल शास्त्र' के क्षेत्र में आता है और इस कारण यह किसी भी दृष्टि से हास्यास्पद नहीं। यदि आज तक वैज्ञानिकों ने खगोल शास्त्र से संबंधित अपना सूत्र न विकसित किया होता , तो आज वे ग्रहों की गति से संबंधित 'गणित ज्योतिष' के सूत्रों पर भी शक की निगाह रख सकते थे। पर इसपर किसी को संदेह नहीं होता है , क्यूंकि हजारो वर्ष बाद भी आज तक हमारी परंपरागत गणना में मामूली त्रुटि ही देखी जा सकी है।
सतही तौर पर किसी बात पर नजर डालकर उसे गलत समझा जा सकता है , पर गंभीरता से विचार करने पर ही इसके असली तथ्य पर पहुंचा जा सकता है। वैज्ञानिको को परंपरागत ज्योतिष में लिखे मंगल के लाल ग्रह होने की बात तब सही लगी होगी , जब वे मंगल ग्रह की सतह पर लाल मिट्टी होने का अनुभव कर पाए होंगे। इसी प्रकार चंद्रमा के जलतत्व होने की बात की पुष्टि तब हुई हो, जब वैज्ञानिकों को इसी वर्ष किए गए अपने परीक्षण में चंद्रमा पर पानी होने का पता चला हो। पर इन सबसे आगे आसमान के विभिन्न राशियों से अलग अलग रंगों का परावर्तन अभी तक वैज्ञानिकों की नजर में नहीं आ रहा , इसलिए इसे स्वीकार करना सचमुच आसान नहीं। ज्योतिष की पुस्तकों में विभिन्न राशियों द्वारा अलग अलग रंगों के प्रकाश के परावर्तन के बारे में लिखा गया है , पर उसे देखने के लिए जो भी साधन या दृष्टि चाहिए , उसके बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं। हो सकता है ऋषि मुनि उन्हें लिख न पाए हों या उनकी वह रचना कहीं खो गयी हो। इससे विषय तो विवादास्पद रहेगा ही , अगले अनुच्छेद में मैं अपनी बात को समझाने की कोशिश करती हूं।
जिस तरह धरती में कहीं भी कोई रेखा खींची हुई नहीं है , पर भूगोल का अध्ययन करते वक्त हम काल्पनिक आक्षांस या देशांतर रेखाएं खींचते हैं। इन रेखाओं को खींचने का एक आधार होता है यानि दोनो की 0 डिग्री किसी आधार पर पृथ्वी को दो बराबर भागों में बांटती है , और इसी के समानांतर या किसी अन्य आधार पर अन्य रेखाएं खींची गयी हैं। किसी भी जगह के सूर्योदय , सूर्यास्त, मौसम परिवर्तन या अन्य कई बातों की गणना में आक्षांस और देशांतर रेखाएं सहयोगी बनती हैं। इस बात से तो आप सभी सहमत होंगे।
भूगोल की ही तरह गणित ज्योतिष में पृथ्वी को स्थिर मानने से पूरब से पश्चिम तक जाता हुआ पूरा गोल 360 डिग्री का जो आसमान में एक वृत्त नजर आता है , उसे 30-30 डिग्री के बारह काल्पनिक भागों में बांटा गया है। इन्ही 30 डिग्री की एक एक राशि मानी गयी है यानि 0 डिग्री से 30 डिग्री तक मेष, 30 डिग्री से 60 डिग्री तक वृष, 60 डिग्री से 90 डिग्री तक मिथुन, 90 डिग्री से 120 डिग्री तक कर्क, 120 डिग्री से 150 डिग्री तक सिंह, 150 डिग्री से 180 डिग्री तक कन्या, 180 डिग्री से 210 डिग्री तक तुला, 210 डिग्री से 240 डिग्री तक वृश्चिक, 240 डिग्री से 270 डिग्री तक धनु, 270 डिग्री से 300 डिग्री तक मकर, 300 डिग्री से 330 डिग्री तक कुंभ, 330 डिग्री से 360 डिग्री तक मीन कहलाती है।
भूगोल के आक्षांस और देशांतर रेखाओं की तरह ही इन खास खास विंदुओं को भी एक महत्वपूर्ण आधार पर लिया गया है यानि आसमान के किसी भी विंदु से 0 डिग्री नहीं शुरू कर दी गयी है और कहीं भी अंत नहीं कर दिया गया है। यदि प्राचीन ऋषि मुनियों और उनके ग्रंथो की मानें , तो आसमान के मेष और वृश्चिक राशि से लाल , वृष और तुला राशि से चमकीले सफेद , मिथुन और कन्या राशि से हरे , कर्क राशि से दूधिए , सिंह राशि से तप्त लाल , मकर और कुंभ राशि से काले और धनु तथा मीन राशि से पीले रंग को परावर्तित होते देखा गया है। अभी तक विज्ञान इसे ढूंढ नहीं सका है , इसलिए इसमें संदेह रहना स्वाभाविक है।
पर जब प्राचीन ऋषियों , महर्षियों को इस बात के रहस्य का पता हुआ , उन्होने उन राशियों का संबंध वैसे ही रंगों को परावर्तित करने वाले ग्रहों के साथ जोड दिया। यही कारण है कि मेष और वृश्चिक राशि का आधिपत्य लाल रंग परावर्तित करने वाले मंगल को , वृष और तुला राशि का सफेद चमकीले रंग परावर्तित करनेवाले शुक्र को , मिथुन और कन्या राशि का हरा रंग परावर्तित करनेवाले बुध को , कर्क का दूधिया सफेद रंग परावर्तित करनेवाले चंद्रमा को , सिंह राशि का तप्त लाल रंग परावर्तित करनेवाले सूर्य को , धनु और मीन राशि का पीली किरण बिखेरनेवाले बृहस्पति को तथा मकर और कुभ राशि का काले शनि को दे दिया। अपने पथ पर चलते हुए ही कोई भी ग्रह अपनी राशि से गुजरते हैं तो स्वक्षेत्री कहलाते हैं, जबकि कभी कभी इन्हें दूसरे ग्रहों की राशि से भी गुजरना होता है, इसलिए यह मजाक उडाने वाली बात तो बिल्कुल नहीं । ज्योतिष के कई अविश्वसनीय मुद्दों पर विश्वभर के ज्योतिषियों में बहस या अलग अलग विचारधाराएं हैं , पर इस बात को लेकर किसी प्रकार का विवाद नहीं , इसलिए इसकी वैज्ञानिकता की पुष्टि तो हो ही जाती है।
फलित ज्योतिष मानता है कि ग्रह स्वक्षेत्री हों तो अधिक मजबूत होते हैं , क्यूंकि अपने क्षेत्र में कोई भी राजा ही होता है, पर दूसरों के क्षेत्र में ग्रहों के होने से कुछ समझौते की नौबत आ जाती है। ग्रंथो में वर्णित ग्रहों के स्वभाव के हिसाब से कुछ ग्रहों में आपस में मित्रता और कुछ की आपस में शत्रुता भी है। इसलिए ज्योतिष में यह भी माना जाता है कि यदि कोई ग्रह मित्र क्षेत्र से गुजरता है , तब भी उसका प्रभाव भी अच्छा ही दिखता है। लेकिन ग्रह यदि शत्रु के क्षेत्र से गुजरे , तो ग्रह लोगों के सम्मुख तरह तरह की बाधा उपस्थित करते हैं।
सतही तौर पर किसी बात पर नजर डालकर उसे गलत समझा जा सकता है , पर गंभीरता से विचार करने पर ही इसके असली तथ्य पर पहुंचा जा सकता है। वैज्ञानिको को परंपरागत ज्योतिष में लिखे मंगल के लाल ग्रह होने की बात तब सही लगी होगी , जब वे मंगल ग्रह की सतह पर लाल मिट्टी होने का अनुभव कर पाए होंगे। इसी प्रकार चंद्रमा के जलतत्व होने की बात की पुष्टि तब हुई हो, जब वैज्ञानिकों को इसी वर्ष किए गए अपने परीक्षण में चंद्रमा पर पानी होने का पता चला हो। पर इन सबसे आगे आसमान के विभिन्न राशियों से अलग अलग रंगों का परावर्तन अभी तक वैज्ञानिकों की नजर में नहीं आ रहा , इसलिए इसे स्वीकार करना सचमुच आसान नहीं। ज्योतिष की पुस्तकों में विभिन्न राशियों द्वारा अलग अलग रंगों के प्रकाश के परावर्तन के बारे में लिखा गया है , पर उसे देखने के लिए जो भी साधन या दृष्टि चाहिए , उसके बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं। हो सकता है ऋषि मुनि उन्हें लिख न पाए हों या उनकी वह रचना कहीं खो गयी हो। इससे विषय तो विवादास्पद रहेगा ही , अगले अनुच्छेद में मैं अपनी बात को समझाने की कोशिश करती हूं।
जिस तरह धरती में कहीं भी कोई रेखा खींची हुई नहीं है , पर भूगोल का अध्ययन करते वक्त हम काल्पनिक आक्षांस या देशांतर रेखाएं खींचते हैं। इन रेखाओं को खींचने का एक आधार होता है यानि दोनो की 0 डिग्री किसी आधार पर पृथ्वी को दो बराबर भागों में बांटती है , और इसी के समानांतर या किसी अन्य आधार पर अन्य रेखाएं खींची गयी हैं। किसी भी जगह के सूर्योदय , सूर्यास्त, मौसम परिवर्तन या अन्य कई बातों की गणना में आक्षांस और देशांतर रेखाएं सहयोगी बनती हैं। इस बात से तो आप सभी सहमत होंगे।
भूगोल की ही तरह गणित ज्योतिष में पृथ्वी को स्थिर मानने से पूरब से पश्चिम तक जाता हुआ पूरा गोल 360 डिग्री का जो आसमान में एक वृत्त नजर आता है , उसे 30-30 डिग्री के बारह काल्पनिक भागों में बांटा गया है। इन्ही 30 डिग्री की एक एक राशि मानी गयी है यानि 0 डिग्री से 30 डिग्री तक मेष, 30 डिग्री से 60 डिग्री तक वृष, 60 डिग्री से 90 डिग्री तक मिथुन, 90 डिग्री से 120 डिग्री तक कर्क, 120 डिग्री से 150 डिग्री तक सिंह, 150 डिग्री से 180 डिग्री तक कन्या, 180 डिग्री से 210 डिग्री तक तुला, 210 डिग्री से 240 डिग्री तक वृश्चिक, 240 डिग्री से 270 डिग्री तक धनु, 270 डिग्री से 300 डिग्री तक मकर, 300 डिग्री से 330 डिग्री तक कुंभ, 330 डिग्री से 360 डिग्री तक मीन कहलाती है।
भूगोल के आक्षांस और देशांतर रेखाओं की तरह ही इन खास खास विंदुओं को भी एक महत्वपूर्ण आधार पर लिया गया है यानि आसमान के किसी भी विंदु से 0 डिग्री नहीं शुरू कर दी गयी है और कहीं भी अंत नहीं कर दिया गया है। यदि प्राचीन ऋषि मुनियों और उनके ग्रंथो की मानें , तो आसमान के मेष और वृश्चिक राशि से लाल , वृष और तुला राशि से चमकीले सफेद , मिथुन और कन्या राशि से हरे , कर्क राशि से दूधिए , सिंह राशि से तप्त लाल , मकर और कुंभ राशि से काले और धनु तथा मीन राशि से पीले रंग को परावर्तित होते देखा गया है। अभी तक विज्ञान इसे ढूंढ नहीं सका है , इसलिए इसमें संदेह रहना स्वाभाविक है।
पर जब प्राचीन ऋषियों , महर्षियों को इस बात के रहस्य का पता हुआ , उन्होने उन राशियों का संबंध वैसे ही रंगों को परावर्तित करने वाले ग्रहों के साथ जोड दिया। यही कारण है कि मेष और वृश्चिक राशि का आधिपत्य लाल रंग परावर्तित करने वाले मंगल को , वृष और तुला राशि का सफेद चमकीले रंग परावर्तित करनेवाले शुक्र को , मिथुन और कन्या राशि का हरा रंग परावर्तित करनेवाले बुध को , कर्क का दूधिया सफेद रंग परावर्तित करनेवाले चंद्रमा को , सिंह राशि का तप्त लाल रंग परावर्तित करनेवाले सूर्य को , धनु और मीन राशि का पीली किरण बिखेरनेवाले बृहस्पति को तथा मकर और कुभ राशि का काले शनि को दे दिया। अपने पथ पर चलते हुए ही कोई भी ग्रह अपनी राशि से गुजरते हैं तो स्वक्षेत्री कहलाते हैं, जबकि कभी कभी इन्हें दूसरे ग्रहों की राशि से भी गुजरना होता है, इसलिए यह मजाक उडाने वाली बात तो बिल्कुल नहीं । ज्योतिष के कई अविश्वसनीय मुद्दों पर विश्वभर के ज्योतिषियों में बहस या अलग अलग विचारधाराएं हैं , पर इस बात को लेकर किसी प्रकार का विवाद नहीं , इसलिए इसकी वैज्ञानिकता की पुष्टि तो हो ही जाती है।
फलित ज्योतिष मानता है कि ग्रह स्वक्षेत्री हों तो अधिक मजबूत होते हैं , क्यूंकि अपने क्षेत्र में कोई भी राजा ही होता है, पर दूसरों के क्षेत्र में ग्रहों के होने से कुछ समझौते की नौबत आ जाती है। ग्रंथो में वर्णित ग्रहों के स्वभाव के हिसाब से कुछ ग्रहों में आपस में मित्रता और कुछ की आपस में शत्रुता भी है। इसलिए ज्योतिष में यह भी माना जाता है कि यदि कोई ग्रह मित्र क्षेत्र से गुजरता है , तब भी उसका प्रभाव भी अच्छा ही दिखता है। लेकिन ग्रह यदि शत्रु के क्षेत्र से गुजरे , तो ग्रह लोगों के सम्मुख तरह तरह की बाधा उपस्थित करते हैं।
शुक्रवार, १३ नवम्बर २००९
इस पूरी सदी में किन लोगों की जन्मकुंडलियों में मंगल कमजोर थे ??
अभी आसमान में मंगल की एक खास स्थिति के होने के कारण मैं इसकी चर्चा करते हुए पिछले कई दिनों से मैं मंगल से संबंधित आलेखही लिख रही हूं। इनमे मैने बताया है कि जब मंगल कमजोर हो तो उस वक्त जन्म लेनेवाले बच्चों की जन्मकुंडलियों में मंगल की स्थिति कमजोर बन जाती है और इसके कारण उनका युवावस्था का वातावरण अच्छा नहीं बन पाता है। खासकर 24 वर्ष की उम्र से शुरू होनेवाली किसी न किसी पक्ष से संबंधित उनकी समस्याएं 30 वर्ष की उम्र तक बढती ही चली जाती हैं।वैसे 30 वर्ष की उम्र के बाद थोडी राहत तो मिलती है पर पूरा सुधार 36 वर्ष की उम्र के बाद ही हो पाता है , जब युवावस्था समाप्त होने को रहता है।
आज के आलेख में हम देखेंगे कि इस सदी में किन तिथियों के मध्य जन्म लेनेवाले लोगों का जन्मकालीन मंगल कमजोर था , जिसके कारण खास 24 वर्ष से 30 वर्ष की उम्र तक उनके समक्ष किसी खास संदर्भ की समस्याएं बढते क्रम में बनी रही। इस समस्याओं के कारण इस पूरी अवधि के दौरान ये किंकर्तबय विमूढावस्था में रहें। ज्योतिष को अतिसूक्ष्म गणना मानने वाले इस सहज ज्ञान को भी गोल मोल न समझ लें। इस लिस्ट को आप भी साथ रखिए और इन जन्मतिथियों के मध्य जन्मलेनेवालों के बारे में बेखौफ ऐसी बातें कीजिए ........
1 फरवरी से 20 मार्च 1901
4 मार्च से 25 अप्रैल 1903
19 अप्रैल से 3 जून 1905
21 जून से 25 जुलाई 1907
8 सितम्बर से 9 अक्तूबर 1909
4 नवम्बर से 15 दिसम्बर 1911
12 दिसम्बर 1913 से 28 जनवरी 1914
16 जनवरी से 5 मार्च 1916
19 फरवरी से 11 अप्रैल 1918
30 मार्च से 17 जून 1920
23 मई से 6 जून 1922
8 अगस्त से 7 सितम्बर 1924
14 अक्तूबर से 22 नवम्बर 1926
27 नवम्बर 1928 से 12 जनवरी 1929
4 जनवरी से 24 फरवरी 1931
6 फरवरी से 27 मार्च 1933
12 मार्च से 3 मई 1935
30 अप्रैल से 12 जून 1937
8 जुलाई से 9 अगस्त 1939
22 सितम्बर से 25 अक्तूबर 1941
12 नवम्बर से 25 दिसम्बर 1943
1 जनवरी से 7 फरवरी 1946
24 जनवरी से 15 मार्च 1948
28 फरवरी से 20 अप्रैल 1950
10 अप्रैल से 26 मई 1952
8 जून से 14 जुलाई 1954
25 अगस्त से 24 सितम्बर 1956
26 अक्तूबर से 6 दिसम्बर 1958
6 दिसम्बर 1960 से 21 मार्च 1961
11 जनवरी से 28 फरवरी 1963
15 फरवरी से 5 अप्रैल 1965
23 मार्च से 10 मई 1967
12 मई से 23 जून 1969
24 जुलाई से 24 अगस्त 1971
15 अक्तूबर से 10 नवम्बर 1973
20 नवम्बर से 31 दिसम्बर 1975
1 जनवरी से 18 फरवरी 1978
1फरवरी से 24 मार्च 1980
7 मार्च से 27 अप्रैल 1982
22 अप्रैल से 6 जून 1984
25 जून से 29 जुलाई 1986
12 सितम्बर से 14 अक्तूबर 1988
6 नवम्बर से 18 दिसम्बर 1990
15 दिसम्बर 1992 से 2 फरवरी 1993
19 जनवरी से 11 मार्च 1995
22 फरवरी से 15 अप्रैल 1997
4 अप्रैल से 20 मई 1999
जैसा कि मैं पहले लिख ही चुकी हूं , उपरोक्त समयांतराल में जन्मलेनेवाले सारे लोगों का मंगल कमजोर होगा , यहां तक कि इन तिथियों के आसपास जन्मलेनेवाले बहुत सारे लोग भी मंगल के बुरे प्रभाव में आएंगे। इसके कारण 24 वर्ष से 36 वर्ष की उम्र तक उनके सम्मुख मुश्किले आयी होंगी या आएंगी , 30 वर्ष की उम्र के आसपास ये मुश्किल सर्वाधिक होंगी। पर किनके सम्मुख किस प्रकार की मुश्किलें , इसे जानने के लिए आपको अगली कडी का इंतजार करना होगा।
आज के आलेख में हम देखेंगे कि इस सदी में किन तिथियों के मध्य जन्म लेनेवाले लोगों का जन्मकालीन मंगल कमजोर था , जिसके कारण खास 24 वर्ष से 30 वर्ष की उम्र तक उनके समक्ष किसी खास संदर्भ की समस्याएं बढते क्रम में बनी रही। इस समस्याओं के कारण इस पूरी अवधि के दौरान ये किंकर्तबय विमूढावस्था में रहें। ज्योतिष को अतिसूक्ष्म गणना मानने वाले इस सहज ज्ञान को भी गोल मोल न समझ लें। इस लिस्ट को आप भी साथ रखिए और इन जन्मतिथियों के मध्य जन्मलेनेवालों के बारे में बेखौफ ऐसी बातें कीजिए ........
1 फरवरी से 20 मार्च 1901
4 मार्च से 25 अप्रैल 1903
19 अप्रैल से 3 जून 1905
21 जून से 25 जुलाई 1907
8 सितम्बर से 9 अक्तूबर 1909
4 नवम्बर से 15 दिसम्बर 1911
12 दिसम्बर 1913 से 28 जनवरी 1914
16 जनवरी से 5 मार्च 1916
19 फरवरी से 11 अप्रैल 1918
30 मार्च से 17 जून 1920
23 मई से 6 जून 1922
8 अगस्त से 7 सितम्बर 1924
14 अक्तूबर से 22 नवम्बर 1926
27 नवम्बर 1928 से 12 जनवरी 1929
4 जनवरी से 24 फरवरी 1931
6 फरवरी से 27 मार्च 1933
12 मार्च से 3 मई 1935
30 अप्रैल से 12 जून 1937
8 जुलाई से 9 अगस्त 1939
22 सितम्बर से 25 अक्तूबर 1941
12 नवम्बर से 25 दिसम्बर 1943
1 जनवरी से 7 फरवरी 1946
24 जनवरी से 15 मार्च 1948
28 फरवरी से 20 अप्रैल 1950
10 अप्रैल से 26 मई 1952
8 जून से 14 जुलाई 1954
25 अगस्त से 24 सितम्बर 1956
26 अक्तूबर से 6 दिसम्बर 1958
6 दिसम्बर 1960 से 21 मार्च 1961
11 जनवरी से 28 फरवरी 1963
15 फरवरी से 5 अप्रैल 1965
23 मार्च से 10 मई 1967
12 मई से 23 जून 1969
24 जुलाई से 24 अगस्त 1971
15 अक्तूबर से 10 नवम्बर 1973
20 नवम्बर से 31 दिसम्बर 1975
1 जनवरी से 18 फरवरी 1978
1फरवरी से 24 मार्च 1980
7 मार्च से 27 अप्रैल 1982
22 अप्रैल से 6 जून 1984
25 जून से 29 जुलाई 1986
12 सितम्बर से 14 अक्तूबर 1988
6 नवम्बर से 18 दिसम्बर 1990
15 दिसम्बर 1992 से 2 फरवरी 1993
19 जनवरी से 11 मार्च 1995
22 फरवरी से 15 अप्रैल 1997
4 अप्रैल से 20 मई 1999
जैसा कि मैं पहले लिख ही चुकी हूं , उपरोक्त समयांतराल में जन्मलेनेवाले सारे लोगों का मंगल कमजोर होगा , यहां तक कि इन तिथियों के आसपास जन्मलेनेवाले बहुत सारे लोग भी मंगल के बुरे प्रभाव में आएंगे। इसके कारण 24 वर्ष से 36 वर्ष की उम्र तक उनके सम्मुख मुश्किले आयी होंगी या आएंगी , 30 वर्ष की उम्र के आसपास ये मुश्किल सर्वाधिक होंगी। पर किनके सम्मुख किस प्रकार की मुश्किलें , इसे जानने के लिए आपको अगली कडी का इंतजार करना होगा।
बुधवार, ११ नवम्बर २००९
आज आपलोग मेरी कहानी 'थम गया तूफान' पढिए !!
आज साहित्य शिल्पी में मेरी एक कहानी 'थम गया तूफान' प्रकाशित की गयी है , कृपया उसे पढकर अपनी प्रतिक्रिया देने का कष्ट करें !
मंगलवार, १० नवम्बर २००९
कीडे मकोडे भी जोडा बनाकर ही रहते हैं ??
कीडो मकोडो से मुझे जितना भय है , कीडे मकोडे हमें उतना ही परेशान करते हैं। बोकारो स्टील सिटी के सेक्टर 4 के जिस क्वार्टर में हमें पहली बार ठीक बरसात में रहने की शुरूआत करनी पडी , वहां कीडे मकोडो के नई नई प्रजातियों को देखने का मौका मिला। रसोई घर के सीपेज वाली एक दीवाल में न जाने कितने छेद थे और सबों से अक्सर तरह तरह के कीडे मुझे मुंह चिढाते। कीटनाशक के छिडकाव से कोई कीडा मर जाता , तो थोडी देर बाद उसका जोडा अवश्य निकलकर कुछ समझने की कोशिश करता था। उबले आलू के चार फांक कर दें , तो जो शेप बनता है , बिल्कुल उसी शेप को वहां एक दिन चलते हुए देखा , तो मैं चौंक ही गयी थी। ऐसे भी कीडे होते हैं ? दो तीन महीने बडी मुश्किल से कीटनाशकों के बल पर मैं उस रसोई में खाना बनाने में समर्थ हो सकी थी। फिर अक्तूबर में उस दीवाल के नए सिरे से प्लास्टर हो जाने के बाद ही हमें समस्या से निजात मिल सकी थी।
बोकारो में पेड पौधो की अधिकता है , इस कारण अलग अलग डिजाइनों वाली तितली या पतंगे या कीडे मकोडे को भी रहने की जगह मिल जाती है। मेरे उसी क्वार्टर में एक कमरे में एक ही खिडकी थी, उसी से अक्सर ऐसे कीडे मकोडे उस कमरे में आ जाते , पर छोटी खिडकी होने से वे उससे बाहर नहीं निकल पाते थे। मुडे हुए अखबार की सहायता से उसे भगाने की कोशिश करती तो कभी कभी एक दो मर भी जाते। वैसे उसका जोडा कभी आए या नहीं , पर यदि किसी खास तरह का कीडा कमरे में मर जाता , तो दूसरे ही दिन उसी तरह का एक कीडा उसे ढूंढता हुआ पहुंच जाता था। उसे देखकर मैं समझ जाती थी कि उसी का जोडा किसी खास संकेत की सहायता से इसे ढूंढने आया है। ऐसी समझ आने के बाद मैं उन्हें भगाने के क्रम में उनकी सुरक्षा का भी ध्यान रखने लगी थी।
पिछले छह वर्षों से मैं बोकारो में कॉपरेटिव कालोनी में रह रही हूं। वैसे तो यह काफी साफ सुथरी जगह है , पर अगल बगल कहीं पर एक खास तरह के मकडे का बसेरा है , जिसका चित्र मैं आपको दिखा रही हूं। ये अक्सर घर में भी घुस आते हैं , सो तुरंत उनपर कीटनाशक का छिडकाव करने का विचार आ जाता है। पर इनके भागने की स्पीड इतनी अधिक होती है कि मैं शायद ही कभी छिडकाव कर पाती होउं। ये देखने में ही इतने भयानक लगते हैं कि हमेशा इनको लेकर भय बना रहता है। पर कुछ दिन पूर्व एक मकडा कई दिनों तक मेरे स्टोर के कबर्ड के रैक के छत पर पडा था। आपलोगों के लिए मैने अपने मोबाइल से कई एंगल से इसके फोटो भी लिए , पर यह इधर से उधर भी नहीं हुआ , चुपचाप पडा रहा। इसे ऐसी हालत में देखकर कीटनाशक का छिडकाव करने की मेरी हिम्मत ही नहीं हुई , नीचे दिए गए चित्र को देखकर आप मकडे के इस हालत का कारण समझ सकते हैं , जिसमें दीपावली की सफाई के क्रम में एक डब्बे से कुचलकर उसका जोडा मृत पडा हुआ है और उसी के बगल में यह तीन दिनों से भूखा प्यासा शोक मना रहा था !!
बोकारो में पेड पौधो की अधिकता है , इस कारण अलग अलग डिजाइनों वाली तितली या पतंगे या कीडे मकोडे को भी रहने की जगह मिल जाती है। मेरे उसी क्वार्टर में एक कमरे में एक ही खिडकी थी, उसी से अक्सर ऐसे कीडे मकोडे उस कमरे में आ जाते , पर छोटी खिडकी होने से वे उससे बाहर नहीं निकल पाते थे। मुडे हुए अखबार की सहायता से उसे भगाने की कोशिश करती तो कभी कभी एक दो मर भी जाते। वैसे उसका जोडा कभी आए या नहीं , पर यदि किसी खास तरह का कीडा कमरे में मर जाता , तो दूसरे ही दिन उसी तरह का एक कीडा उसे ढूंढता हुआ पहुंच जाता था। उसे देखकर मैं समझ जाती थी कि उसी का जोडा किसी खास संकेत की सहायता से इसे ढूंढने आया है। ऐसी समझ आने के बाद मैं उन्हें भगाने के क्रम में उनकी सुरक्षा का भी ध्यान रखने लगी थी।
पिछले छह वर्षों से मैं बोकारो में कॉपरेटिव कालोनी में रह रही हूं। वैसे तो यह काफी साफ सुथरी जगह है , पर अगल बगल कहीं पर एक खास तरह के मकडे का बसेरा है , जिसका चित्र मैं आपको दिखा रही हूं। ये अक्सर घर में भी घुस आते हैं , सो तुरंत उनपर कीटनाशक का छिडकाव करने का विचार आ जाता है। पर इनके भागने की स्पीड इतनी अधिक होती है कि मैं शायद ही कभी छिडकाव कर पाती होउं। ये देखने में ही इतने भयानक लगते हैं कि हमेशा इनको लेकर भय बना रहता है। पर कुछ दिन पूर्व एक मकडा कई दिनों तक मेरे स्टोर के कबर्ड के रैक के छत पर पडा था। आपलोगों के लिए मैने अपने मोबाइल से कई एंगल से इसके फोटो भी लिए , पर यह इधर से उधर भी नहीं हुआ , चुपचाप पडा रहा। इसे ऐसी हालत में देखकर कीटनाशक का छिडकाव करने की मेरी हिम्मत ही नहीं हुई , नीचे दिए गए चित्र को देखकर आप मकडे के इस हालत का कारण समझ सकते हैं , जिसमें दीपावली की सफाई के क्रम में एक डब्बे से कुचलकर उसका जोडा मृत पडा हुआ है और उसी के बगल में यह तीन दिनों से भूखा प्यासा शोक मना रहा था !!
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