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हाल फिलहाल की मेरी प्रविष्टियां

शुक्रवार, २० नवम्बर २००९

15 घंटे के अंदर किसी सपने का हकीकत में बदलना मात्र संयोग नहीं हो सकता !!

ग्रहों के जनसामान्‍य पर पडनेवाले प्रभाव की जानकारी के लिए ज्‍योतिषियों को पंचांग की आवश्‍यकता पडती है। पंचांग में आसमान के ग्रहों नक्षत्रों और अन्‍य योगों के अलावा और बहुत प्रकार की जानकारी दी होती है, उनमें शरीर के भिन्‍न भिन्‍न अंगों में गिरगिट चढने से लेकर विभिन्‍न प्रकार के स्‍वप्‍न को भी किसी न किसी प्रकार की घटना से जोडने की कोशिश की जाती है। पिताजी के द्वारा ज्‍योतिष के अध्‍ययन किए जाने के कारण बचपन से ही हमारे घर पर पंचांग हुआ करता था , बचपन से ही मुझमें पढने की बुरी आदत भी अधिक ही है , घर पर पंचांग पलटकर देखा करती , स्‍वप्‍न फल को पढने और उसके प्रभाव को गांववालों के समक्ष रोचक ढंग से प्रस्‍तुत करने में आनंद आता।


वैज्ञानिक दृष्टिकोणयुक्‍त पिताजी से गांव में अंधविश्‍वास फैलाने के लिए मुझे हमेशा फटकार लगती थी और वे विभिन्‍न प्रकार के सपनों का अवचेतन मन में बैठी धारणा या परिस्थिति से संबंध बतलाया करते। इस कारण बाद में मैने सपने की सत्‍यता को अंधविश्‍वास से या अवचेतन मन से ही जोड लिया था। पर चूंकि एक ज्‍योतिषी को लोग हर चीज का विशेषज्ञ मान लेते हैं और विज्ञान से परे की किसी भी बात की चर्चा करने से परहेज नहीं करते , इस कारण कभी कभी ऐसी एक दो ऐसी घटनाएं सुनने को अवश्‍य मिली , जिससे सपने के सच होने की पुष्टि मिलती थी। पर जबतक व्‍यक्ति स्‍वयं किसी बात को महसूस नहीं करता , दूसरों पर सहज विश्‍वास मुश्किल होता है और इसकी अपवाद मैं भी नहीं। पर पिछले सप्‍ताह मेरे साथ घटी एक घटना ने अब मुझे विश्‍वास दिला दिया कि सपने भी सच होते हैं।

पिछले शनिवार की रात मैने स्‍वप्‍न में देखा कि मेरे सामने धुलनेवाले कपडों का ढेर रखा है, जिन्‍हें धोती धोती मैं बिल्‍कुल थक गयी हूं। पर धोने को और कपडे बचे ही हैं , इसलिए फ्रेश होने के लिए चाय बनवा रही हूं। इसके बाद मेरी नींद टूट गयी। वैसे मैं हमेशा चिंतित रहती हूं कि वाशिंग मशीन वगैरह के कारण हमारी आदत खराब हो गयी है और कहीं हाथ से कपडे धोने पडे , तो अब दिक्‍कत आ जाएगी , अवचेतन मन में बैठा यही भय स्‍वप्‍न में दिख गया। यही सोंचकर थोडी ही देर में इस बात को मैं भूल गयी। रविवार के दिन ऐसे ही काम अधिक होता है। बेटे का यूनिफार्म धोना था , सफेद कपडे को धोने के लिए उसमें सर्फ बहुत अधिक ही डालनी पडती है । उसे धोने के बाद वाशिंग मशीन के उस सर्फ के पानी का सदुपयोग करने के लिए घरभर से परदे , चादर या अन्‍य गंदे कपडे वगैरह ढूंढ ढूंढकर धोया करती हूं।

इस तरह जब तीन चार ट्रिप यानि 15 किलो से उपर कपडे धोने के बाद वाशटब से पानी को निकालने की कोशिश की तो ड्रेन में कुछ खराबी निकली , पानी ड्रेन ही नहीं हुआ। चूंकि श्रीमान जी घर पर ही थे , उन्‍होने तुरंत पीछे का भाग खोलकर पानी को ड्रेन कर दिया, पर उन्‍हें सिस्‍टम में कुछ गडबडी नजर आयी , जिसे हमेशा की तरह ठीक करने की कोशिश की। अब मशीन में दुबारा पानी भरकर चारो ट्रिप कपडे को खंगालना और सुखाना बाकी था , जिसे मशीन को सुधारे बिना भी किया जा सकता था , पर मशीनरी और इलेक्ट्रिक सामानों को बनाने में खास दिलचस्‍पी रखनेवाले ये भला वाशिंग मशीन के कंट्रोल पैनल को खोलकर ठीक करने की कोशिश कैसे न करते ? वैसे तो हमेशा ही ये इस तरह के कामों में कामयाब ही होते हैं , पर इसमें ये असफल रहें। साथ ही इस चक्‍कर में कौन सा तार इधर उधर हुआ कि मशीन में करेंट पहुंचना ही बंद , तुरंत मिस्‍त्री को बुला पाना भी संभव न था। अब निर्जीव वाशिंग मशीन हमारे सामने पडा था और मैं उतने गीले कपडों को देखकर परेशान थी। कामवाली भी चली गयी थी कि मैं उससे मदद ले सकूं।

इतने गीले कपडों को झुककर हाथ से खंगालना जितना कठिन था , उतना ही निचोडकर फैलाना भी। उनमें से आधे कपडों को अच्‍छी तरह निचोड न सकने के बावजूद मैं काफी थक गयी थी। इतने दिनों से कपडे निचोडने की आदत जो छूट गयी थी ,कपडों के ठीक से न निचोडे जाने के कारण बरामदा कपडों से निकले पानी से भरा पडा था। थकावट को दूर करने के लिए चाय बनाते हुए अचानक मुझे अपने सपने की याद आ गयी, 15 घंटे के अंदर सपने को हकीकत में बदलते देख मैं आश्‍चर्यित थी। इतने सारे देखे गए सपनों में से अचानक कौन से सपने सच हो जाते हैं , यह जानने की जिज्ञासा बन गयी है। वैसे तुरंत किसी सपने के हूबहू सच होने का जीवन यह मेरा पहला अनुभव है, पर मुझे यह संयोग नहीं लगता। वैसे तो कोई विशेषज्ञ इस बात की जानकारी दे पाएं तो उनकी मुझपर बडी कृपा होगी , पर इसके बावजूद मैं खुद भी इससे संबंधित अध्‍ययन करना चाहती हूं। यदि आपके पास भी ऐसे कुछ अनुभव हों तो इसी ब्‍लाग पर टिप्‍पणी के रूप में मुझसे अवश्‍य शेयर करें , ताकि मुझे इस बात का रिसर्च करने में मदद मिले।

गुरुवार, १९ नवम्बर २००९

टोर्च , घड़ी , कैलेंडर की तरह ही उपयोगी है गत्‍यात्‍मक ज्योतिष !!

दो दिन पूर्व मेरे पिताजी ने अपने ब्‍लाग में 'घड़ी की तरह ही समय की जानकारी मनुष्‍य के लिए बहुत उपयोगी है' पोस्‍ट किया है , जिससे ज्‍योतिष के ज्ञान के फायदे बताए गए हैं , आप उसे पढकर इसे समझ सकते हैं , पर  इस बारे में संक्षेप में मैं जानकारी दे रही हूं। अंधेरे में चलनेवाले लगभग सभी राहगीर अपने गंतब्य पर पहुंच ही जाते हैं। बिना घड़ी पहने परीक्षार्थी परीक्षा दे ही सकते हैं। बिना कैलेण्डर के लोग वर्ष पूरा कर ही लेते हैं। किन्तु टॉर्च , घड़ी और कैलेण्डर के साथ चलनेवाले लोगों को ही यह अहसास हो सकता है कि उनका रास्ता कितना आसान रहा।वे पूरी अवधि में चिंतामुक्त रहें। इसी प्रकार का सहयोग गत्यात्मक ज्योतिष आपको प्रदान कर सकता है।


अतिसामान्य व्यक्ति के लिए घड़ी , कैलेण्डर या ज्योतिष शौक का विषय हो सकता है , किन्तु जीवन के किसी क्षेत्र में उंचाई पर रहनेवाले व्यक्ति के लिए घड़ी और कैलेण्डर की तरह ही भविष्य की सही जानकारी की जरुरत अधिक से अधिक है। यह बात अलग है कि सही मायने में भविष्यद्रष्टा की कमी अभी भी बनीं हुई है। गत्यात्मक दशा पद्धति संपूर्ण जीवन के तस्वीर को घड़ी की तरह स्प्ष्ट बतलाने की कोशिश करती है।ग्रह उर्जा लेखाचित्र से यह स्पष्ट किया जा सकता है कि कब कौन सा काम किया जाना चाहिए। एक घड़ी की तरह ही फलित ज्योतिष की जानकारी भी समय की सही जानकारी प्राप्त करने का साधन मात्र नहीं , वरन् अप्रत्यक्षत: बहुत सारी सूचनाएं प्रदान करके समुचित कार्य करने की दिशा में बड़ी प्रेरणास्रोत है। लोगों को यह भ्रम हटाना चाहिए कि फलित ज्योतिष की आवश्यकता विपत्ति या मुसीबत में पड़े लोगों के लिए ही है।

जीवन के किसी क्षेत्र में उंचाई पर रहनेवाला हर व्यक्ति यह महसूस करता है कि महज संयोग के कारण ही वह इतनी उंचाई हासिल कर सका है , अन्यथा उससे भी अधिक परिश्रमी और विद्वान व्यक्ति संसार में भरे पड़े हैं , जिनकी पहचान भी नहीं बन सकी है। उस बड़ी चमत्कारी शक्ति के लिए फुरसत के समय में उनका प्रयास बना होता है। ऐसे लोगों को फलित ज्योतिष की जानकारी से कई समस्याओं को सुलझा पाने में मदद मिलती है, किन्तु इसके लिए अपने उत्तरदायित्व को समझते हुए समय निकालने की जरुरत है। अपने कीमती जीवनशैली में से समय निकालकर इस विद्या के अनुसार लिखे गए इस ब्‍लाग में प्रकाशित लेखों को पढ़कर ज्ञान प्राप्त करें .

बुधवार, १८ नवम्बर २००९

हमारे धार्मिक ग्रंथों के पात्र और घटनाएं वास्‍तविक हैं या फिर काल्‍पनिक ??

हमारे धार्मिक ग्रंथों के प्रति हिन्‍दुओं में अटूट श्रद्धा है, पर इसके बावजूद कुछ बातें अक्‍सर विवादास्‍पद बनी रहती हैं। वेदों और पुराणों में लिखी ऋचाएं तो सामान्‍य लोगों को पूरी तरह समझ में आने से ही रही , इसलिए वे बहस का मुद्दा नहीं बन पाती , पर 'रामायण' और 'महाभारत' जैसे ग्रंथ या अन्‍य धार्मिक पुस्‍तकें अपनी सहज भाषा और सुलभता के कारण हमेशा ही किसी न किसी प्रकार के विवाद में बने होते हैं। कभी इन ग्रंथों के पात्रों और घटनाओं के काल्‍पनिक और वास्‍तविक होने को लेकर विवाद बनता है , तो कभी इनमें सीमा से अधिक अतिशयोक्ति भी लोगों का विश्‍वास डिगाने में महत्‍वपूर्ण भूमिका अदा करती है। घटनाओं का क्रम देखकर ही 'रामायण' और 'महाभारत' की कहानी मुझे कभी भी काल्‍पनिक नहीं लगी , साथ ही घटनाओं के साथ साथ ग्रहों नक्षत्रों की स्थिति का सटीक विवरण और रामचंद्र जी और कृष्‍ण जी की जन्‍मकुंडली इस घटना के पात्रों के वास्‍तविक होने की पुष्टि कर देती है। पर इन ग्रंथों में कहीं कहीं पर वर्णन सहज विश्‍वास के लायक नहीं है , यह मैं भी मानती हूं।

पर इसे एक अलग कोण से भी देखा और समझा जा सकता है , जिसकी प्रेरणा मुझे
हमारे पडोसी श्री श्रद्धानंद पांडेय जी के द्वारा लिखा गया एक आलेख 'क्‍या हनुमान जी एक बंदर थे ?' से मिली। वैसे तो वे साइंस के ही विद्यार्थी रहे हैं , पर जाति से ब्राह्मण होने या फिर अपने शौक के कारण, विज्ञान के अलावे हर तरह के ग्रंथों को पढना भी उनसे नहीं छूटता। प्राचीन ग्रंथों को सीधा न नकारते हुए वे तर्क से उन खामियों का कारण ढूंढते हैं , जो अक्‍सर एक वैज्ञानिक मस्तिष्‍क में कौंधते हैं । एक घटना का उदाहरण देते हुए उन्‍होने इस आलेख की शुरूआत की है , जिसमें उनका चार वर्ष का पुत्र कई दिनों से 'सिंह अंकल' के आने की सूचना सुनकर अपने पापा के जंगल वाले सिंह दोस्‍त का इंतजार कर रहा था और 'सिंह अंकल' के आने पर उन्‍हें अपनी कल्‍पना के अनुरूप न पाकर उनके मिलकर भी असंतुष्‍ट था। उनका कहना था कि इस प्रकार की गलतफहमी कई पीढीयों तक कहानी सुनते सुनते आराम से हो सकती है।

उनके आलेख को पढने के बाद उनकी बातों से असहमत हुआ ही नहीं जा सकता। हो सकता है , प्राचीन काल में शब्‍द कम रहे हों , क्‍यूंकि ग्रहों को जो नाम दिया गया , वही सप्‍ताह के दिनों का भी दिया गया है। नक्षत्रों का जो नाम है , वहीं हिन्‍दी के महीनों का नाम है। जानवरों को जो नाम दिए गए , वही मनुष्‍य की विभिन्‍न जातियों को दिए गए थे। खासकर अभी भी आदिवासियों की जाति तो पशुओं के नाम पर देखी जाती है। उनका कहना है हनुमान मनुष्‍य ही रहे होंगे , पर जाति के कारण हनुमान के रूप में ऐसे प्रसिद्ध हो गए हों कि बाद में उनकी कल्‍पना हनुमान के रूप में ही कर ली गयी हो। इसी तरह 'देव' 'मनुष्‍य' और 'दैत्‍य' के रूप में वर्णित सारे चरित्र मनुष्‍य हो सकते हैं। रामायण में वर्णित अन्‍य लोगों को भी पशु ही समझ लिया गया हो , तो वर्णन में गलतफहमी होना स्‍वाभाविक है।

मैने पहले भी सुना है कि यदि दस बीस लोगों का एक घेरा बना लिया जाए और किसी के कान में फुसफुसाकर एक कोई बात सुनाए , वह दूसरे को और दूसरा तीसरे को सुनाता चला जाए , तो दसवें या बीसवें व्‍यक्ति के पास पहुंचने पर उस बात के अर्थ का अनर्थ होना तय है। महाभारत की कहानी में धृतराष्‍ट्र को अंधा बताया गया है , पर इस दृष्टि से सोंचती हूं तो मुझे नहीं लगता है कि वे अंधे रहे होंगे। मेरे विचार से किसी चीज का अधिक मोह लोगों को अंधा बना देता है। महाभारत की पूरी कहानी में धृतराष्‍ट्र का चरित्र पुत्रमोह में अंधा दिखता है , जनता को उससे नाराजगी रही होगी , इसी कारण कहानी में अंधा अंधा कहते सुनते लोगों ने उसे अंधा मान लिया होगा।  धृतराष्‍ट्र तो मोह में अंधे थे ही , लेकिन राजमहल में इतनी घटनाएं घटती रहीं और उनकी रानी गांधारी को भी कुछ नजर नहीं आया। अब कहानी में एक वाक्‍य जोड दें कि धृतराष्‍ट्र तो अंधा था ही , गांधारी ने भी आंख में पट्टी बांध रखी थी। इस प्रकार से कई पीढी चलने पर कहानी को एक अलग मोड लेना ही था , क्‍यूंकि प्रश्‍न उठना ही है , दोनो अंधे कैसे ? औरतों के पतिप्रेम और त्‍याग की भावना को देखते हुए कारण बताया जाएगा , 'गांधारी ने जब देखा कि उसके पति 'कुछ नहीं' देख सकते हैं , तो उसने भी 'कुछ नहीं' देखने के लिए आंखो पर पट्टी बांध ली। बस इसी तरह पीढी दर पीढी एक के बाद एक कुछ गलत तथ्‍य जुटते चले गए होंगे, जिनपर हम आज विश्‍वास नहीं कर पाते। पर इसमें कुछ न कुछ वास्‍तविकता होने से तो इंकार नहीं किया जा सकता है।

मंगलवार, १७ नवम्बर २००९

....... और इस तरह राजा को भी विश्‍वास हो गया कि भूत होते हैं !!

एक गांव में दो गरीब पति पत्‍नी रहा करते थे , किसी तरह दो जून का रूखा सूखा खाना जुटा पाते। पर्व त्‍यौहारों में भी पकवान बना पाना मुश्किल होता। अगल बगल के घरों से कभी कुछ मिल जाता तो खाकर संतोष कर लेते थे। पर एक दिन किसी के घर से मिले पुए को खाकर उनका लालच काफी बढ गया, इसलिए उन्‍होने घर पर ही पुए बनाने की सोंची। सामग्री की व्‍यवस्‍था में कई दिनों तक दोनो ने पूरी ताकत झोंकी , तब जाकर पुए के लिए चावल , दूध और घी जुटा पाए। पत्‍नी पुए बनाने की तैयारी में जुट गयी।

तभी पति को कोई काम याद आ गया और वह उस सिलसिले में घर से निकल पडा। पर थोडी दूर जाने के बाद ही उसे अपनी गल्‍ती का अहसास हुआ , अभी घर से निकलने की क्‍या जरूरत थी ? घर पर होता तो चखने के बहाने ही एक दो पुए अधिक मिल जाते। यह सोंचते ही वह काम छोडकर वापस घर लौटा, घर पहुंचा तो दूर से ही पत्‍नी पुए बनाती मिली। उसके मन में पत्‍नी के लालच की परीक्षा लेने की बात आ गयी , इसलिए वह दूर से ही छुपकर अपनी पत्‍नी की गतिविधियों पर नजर डालने लगा।

उतनी सामग्री से पत्‍नी ने बडे बडे पांच पुए बनाए , बनाते वक्‍त एक भी पुए नहीं खाया , देखकर उसे ताज्‍जुब हुआ। फिर धीरे से वहां से निकलकर वह पत्‍नी के सामने आया। पत्‍नी ने खाना निकाला , सामने चार ही पुए थे , दो उसे दिया और दो खुद खाने बैठ गयी। उसे शंका होनी ही थी , कमरे में चारों ओर देखते हुए उसने कुछ अनुमान लगाया।

फिर उठकर छुपाए हुए पांचवे पुए को निकालकर पूछा 'यह क्‍या है ?'
पत्‍नी ने कहा 'वह आखिरी पुआ है , इसमें कंकड वगैरह होते हैं और इसलिए घर के मर्द इसे नहीं खाते'
पति ने कहा 'ठीक है तुम ही इसे खाओ , पर अपनी थाली में से एक पुआ मुझे दे दो'
'यह कैसे हो सकता है , उस कंकड वाले पुए के बदले तुम्‍हे अच्‍छा पुआ दे दूं'

कोई मानने को तैयार नहीं , बढते बढते बात बहुत बढ गयी , कौन तीन खाए और कौन दो । अंत में पति ने फैसला किया कि दोनो में से जो पहले बोलगा , पहले खाएगा , पहले उठेगा या पहले सोने जाएगा , उसकी हार होगी और उसे दो पुए खाने को मिलेंगे , जबकि जीतनेवाले को तीन। इस फैसले पर दोनो राजी हो गए। इसके बाद मिनट बीतते गए , फिर घंटे और फिर पूरी रात बीत गयी , दोनो में से हारने को कोई तैयार नहीं। सुबह काफी देर तक उनका दरवाजा नहीं खुला , तो पडोसियों को संदेह हुआ। उनलोगों ने दरवाजे को जोर जोर से पीटा , पर दरवाजा नहीं खुला । किसी अनहोनी की आशंका से पडोसी भयभीत हुए , छप्‍पर फाडकर घर के अंदर घुसे। देखा कि दोनो पति पत्‍नी दीवार के सहारे बैठे मु्द्रा में थाली में रखे पुए पर टकटकी लगाए हुए हैं।

सबने समझ लिया कि ये पुआ जहरीला था , जिसे खाने से दोनो पति पत्‍नी की मौत हो गयी है। पूरे गांव में कोहराम मच गया , सब इनकी अंतिम विदाई की तैयारी करने लगे। औरत को सती मानते हुए सारे गांववाले दर्शन को पहुंचने लगे। एक ही साथ दोनो की चिता बनायी गयी , दोनो को उसपर रखकर श्‍मशान पहुंचा दिया गया। पांच रिश्‍तेदार आगे बढे , अब आग लगाने की बारी भी आ गयी थी। पति ने सोंचा कि एक पुए के लालच में मौत को गले लगाना बेवकूफी ही होगी। वह बोल उठा 'चलो , अब उठो भी , तुम तीन खाओ , मैं ही दो खाउंगा'  उन्‍हें उठते देखकर सबने सोंचा कि इनके दाह संस्‍कार में देर हो गयी है , इसलिए ये भूत बन गए। यह सुनते ही जिसके हाथ में आग थी और उसके चार साथी सिर पर पैर रखकर भागे। उन्‍होने सोंचा कि भूत उन पांचों को खाने के बारे में ही बात कर रहे थे , जो उनके क्रिया कर्म में आगे आगे हैं। गांववाले भी पीछे पीछे भागे।
 
उनके पीछे पीछे पति पत्‍नी गांव में जाकर सब बातें समझाना चाहते थे , पर गांववाले दूर से ही भूत समझकर उन्‍हें ढेला पत्‍थर मारकर भगा देते। उनके भूत बनने की कहानी पूरे राज्‍य में फैल गयी। धीरे धीरे राजा के कानों तक भी पहुंची। राजा को भूत प्रेत की कहानियों पर विश्‍वास नहीं था, इसलिए उसे अपनी आंखों से सत्‍य देखने की इच्‍छा हुई। उसने अपना घोडा निकाला और श्‍मशान की ओर दौडा दी। श्‍मशान से कुछ पहले ही उन्‍होने एक खूंटी गाडकर अपने घोडे को बांध दिया और पैदल ही आगे बढे। अभी श्‍मशान पहुंचे भी नहीं थे कि सचमुच पति पत्‍नी को अपनी ओर आते पाया। राजा को आते देख वे उनसे गांव में रहने देने की प्रार्थना के लिए आगे बढे जा रहे थे।
 
पर उन्‍हें देखकर राजा उल्‍टा भागा। वो अपने कदम जितने तेज करता , दोनो उतनी ही तेजी से उसकी ओर आते । उनकी गति देखकर राजा की सारी शक्ति जबाब दे रही थी। घबडाकर उन्‍होने घोडे को खोला भी नहीं और उसपर बैठकर घोडे को दौडा दिया। घोडा भागा जा रहा था और साथ ही साथ उखडा हुआ खूंटा राजा के पैरों से टकरा टकराकर उसे चोटिल करता जा रहा था , जिसे वे भूत की चोट समझ रहे थे। वे घोडे को जितना ही तेज दौडाते , खूंटा उतनी ही तेजी से उनके पैरों पर वार करता। अब ऐसी हालत में राजा को भला कैसे विश्‍वास न हो कि भूत नहीं होते।

सोमवार, १६ नवम्बर २००९

मंगल ग्रह की वर्तमान स्थिति के कारण विभिन्‍न लग्‍नवाले भिन्‍न भिन्‍न संदर्भों को लेकर प्रभावित होंगे !!

आसमान में मंगल की खास स्थिति के कारण कई दिनों से चल रही आलेखोंके कई और आयाम बाकी ही रह गए हैं। खास 12 - 13 अक्‍तूबर 2009 से चल रही इस खास ग्रह स्थिति के कारण युवा वर्ग के सम्‍मुख नई नई चुनौतियां , नए नए कार्यक्रम और नई नई संभावनाओं के दिखाई पडने की शुरूआत हो चुकी है। चारो ओर से हमें किसी न किसी प्रकार की सूचना प्राप्‍त हो रही है। कोई नई नौकरी , नए प्रोमोशन या नए प्रोजेक्‍ट का लेकर उत्‍साहित है , तो कोई घर बसाने , मकान बदलने या लेने की तैयारी में जुट गए हैं । कुल मिलाकर अधिकांश युवाओं की ओर से खुशियों भरी , तो कुछ की ओर से कष्‍टपूर्ण माहौल की भी घटना उपस्थित हुई है।

कुछ युवाओं की ओर से मुझे यह भी सूचना मिली कि उनका जन्‍म मेरे लिखे गए समयांतराल में नहीं हुआ है , फिर भी मेरे लिखे अनुसार ही मंगल के प्रभाव से वे प्रभावित हैं। वैसे पाठको को यह जानकारी देना चाहूंगी कि आसमान में खास ग्रह स्थिति के अनुसार जिन लोगों पर स्‍पष्‍टत: मंगल प्रभावी रहेगी , उन्‍हीं के जन्‍मतिथियों की बात मैने की है , पर इसके अलावे बहुत से ऐसे व्‍यक्ति हो सकते हैं , जिनकी कुंडली में मंगल कमजोर या मजबूत हो सकता है। यदि वैसा हुआ , तो उनके सामने मंगल का अच्‍छा बुरा प्रभाव उसी तरह ही पडेगा यानि 24 वर्ष की उम्र के बाद उनकी सफलता या समस्‍या की शुरूआत होगी और 30 वें वर्ष तक सफलता या समस्‍या अपनी चरम सीमा पर होगी। पर मंगल बुरा होने के बावजूद वे उनलोगों की तुलना में कुछ कम कठिनाई और कष्‍ट झेलेंगे , जिनके मंगल के बुरे प्रभाव के बारे में मैने स्‍पष्‍टत: लिखा है।

इस आलेख में जिस खास बात की चर्चा करनी थी , वह यह कि मंगल के अच्‍छे या बुरे रहने से युवावस्‍था में व्‍यक्ति सामान्‍य तौर पर अच्‍छा या बुरा प्रभाव तो प्राप्‍त करता ही है और उसकी जीवन यात्रा कठिन हो ही जाती है , पर आवश्‍यक नहीं कि वो हर मामले में सुखी या दुखी ही हो । किसी किसी मामले में वो मंगल के विपरीत सफलता या असफलता प्राप्‍त कर सकता है। पर व्‍यक्ति की जन्‍मकुंडली में मंगल जातक के जिन जिन संदर्भों का स्‍वामी होता है , उससे संबंधित सुख या कष्‍ट झेलना अवश्‍यंभावी होता है , इस प्रकार विभिन्‍न लग्‍नवाले मंगल की शक्ति में कमी या बेशी के अनुरूप युवावस्‍था में भिन्‍न भिन्‍न प्रकार के सुख या कष्‍ट झेला करते हैं , जो निम्‍न प्रकार हैं .....

मेष लग्‍नवाले ... अपने स्‍वास्‍थ्‍य या जीवनशैली से संबंधित ,
वृष लग्‍नवाले ... अपनी घर गृहस्‍थी, खर्च या विदेश यात्रा से संबंधित,
मिथुन लग्‍नवाले ... लाभ में कमी और किसी प्रकार के झंझट से संबंधित,
कर्क लग्‍नवाले ... बुद्धि , ज्ञान , संतान , पद और प्रतिष्‍ठा से संबंधित,
सिंह लग्‍नवाले ... भाग्‍य की मजबूती और हर प्रकार की छोटी बडी संपत्ति से संबंधित ,
कन्‍या लग्‍नवाले ... भाई बहन बंधु बांधव और जीवनशैली से संबंधित ,
तुला लग्‍नवाले ... धन संपत्ति और घर गृहस्‍थी से संबंधित ,
वृश्चिक लग्‍नवाले ... स्‍वास्‍थ्‍य और प्रभाव से संबंधित ,
धनु लग्‍नवाले ... बुद्धि , ज्ञान , संतान , खर्च और विदेश यात्रा से संबंधित,
मकर लग्‍नवाले ... हर प्रकार की छोटी बडी संपत्ति , लाभ और स्‍थायित्‍व से संबंधित,
कुंभ लग्‍नवाले ... भाई बहन , बंधु बांधव , सहयोगी , पिता और पद प्रतिष्‍ठा से संबंधित ,
मीन लग्‍नवाले ... भाग्‍य और धन से संबंधित ,

इसके अलावे मंगल जिस राशि में होता है , उससे संबंधित सफलता या समस्‍या भी युवावस्‍था में दिखाई पडती है। आनेवाले छह महीने में खासकर उपरोक्‍त लग्‍नवाले मंगल से संबंधित इन खुशियों या कष्‍ट को प्राप्‍त करेंगे ।