गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

पूर्णिमा और कई ग्रहों की अनुकूलता नववर्ष के कार्यक्रमों को आनंददायक बनाएगी !!

दिसंबर 2012 में माया पंचांग के समाप्‍त होने के कारण विश्‍व में प्रलय आने की संभावना को काटती हुई मेरे आलेखों की श्रृंखला अभी पूरी भी नहीं हुई और कल से ही मेरे पास चंद्रग्रहण से शुरू होनेवाले इस वर्ष में ग्रहों के अच्‍छे या बुरे प्रभाव की जिज्ञासा को लेकर फोन आ रहे हैं। एक ब्‍लॉगर महेश कुमार वर्मा जी के अनुरोध पर विशेष रूप से समय निकालकर मै इस आलेख को लिखकर पोस्‍ट कर रही हूं। 20 जुलाई को सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण के जड चेतन पर पडने वाले प्रभाव को काटते हुए अपने एक आलेख में मैने इस बात को स्‍पष्‍टत: समझाया था कि ऋषि, महर्षियों ने जन्‍मकुंडली निर्माण से लेकर भविष्‍य कथन तक के सिद्धांतों में कहीं भी आसमान के त्रिआयामी स्थिति को ध्‍यान में नहीं रखा है । इसका अर्थ यह है कि फलित ज्‍योतिष में आसमान के द्विआयामी स्थिति भर का ही महत्‍व है। शायद यही कारण है कि पंचांग में प्रतिदिन के ग्रहों की द्विआयामी स्थिति ही दी होती है। ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ भी ग्रहों के पृथ्‍वी के जड चेतन पर पडने वाले प्रभाव में ग्रहों की द्विआयामी स्थिति को ही स्‍वीकार करता है। इस कारण सूर्यग्रहण या चंद्रग्रहण से प्रभावित होने का कोई प्रश्‍न कैसा ?


हममें से अधिकांश लोगों को यह जानकारी नहीं होगी कि हिन्‍दी तिथि या संक्रांति के अनुसार वर्ष के शुरूआत का कोई आकाशीय आधार होता है और उसकी गणना के अनुसार वर्ष के शुरूआत को पूरे वर्ष का प्रतिनिधित्‍व करनेवाला समय माना जा सकता है , यानि सूर्य और चंद्र की स्थिति या आसमान के 360 डिग्री के बारह भागों में बंटवारा, जो 0 डिग्री से शुरू किया जाता है ,उसका पर्याप्‍त आधार है और उसे किसी भी युग में 15 डिग्री से शुरू नहीं किया जा सकता। पर अंग्रेजी कैलेण्‍डर बनाए जाने के क्रम में आसमान में स्थिर सूर्य की परिक्रमा करते हुए पृथ्‍वी की 1 जनवरी की स्थिति का कोई ऐसा महत्‍वपूर्ण आधार नहीं , जिसके कारण 1 जनवरी के 12 बजकर 1 मिनट को ही पूरे वर्ष का प्रतिनिधित्‍व करनेवाला समय माना जाए। किसी भी युग में अंग्रेजी कैलेण्‍डर को 1 जनवरी से बदलकर 15, 16, 20 जनवरी या वर्ष के किसी भी अन्‍य दिन से शुरू किया जा सकता है। फिर इस समय के चंद्रग्रहण के शुरूआत से वर्षभर का भय कैसा ?


यदि 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के हिसाब से देखा जाए तो 2009 का अंत और 2010 के शुरूआत के वक्‍त ग्रहों की स्थिति बहुत ही अच्‍छी दिख रही है, पूर्ण चंद्र तो वैसे ही मनोनुकूल कार्यों को संपन्‍न कराने में मदद करता है , उसके साथ अन्‍य कई ग्रहों की अनुकूलता के कारण नववर्ष के कार्यक्रमों का लोग सही ढंग से आनंद ले पाएंगे। यदि वर्षभर में कहीं कोई गडबडी आएगी , तो तात्‍कालीन ग्रहों का प्रभाव होगा , न कि वर्ष की श्‍ुरूआत में होनेवाले ग्रहण के कारण का। वर्ष 2010 आपके , आपके परिवार के लिए बहुत खुशियां लेकर आए , आपकी मनोकामना पूरी हो , आप बहुत बहुत नाम यश प्राप्‍त करें , इन्‍हीं शुभकामनाओं के साथ .....




2010 ही क्‍या .. उसके बाद भी आनेवाला हर वर्ष आपके लिए मंगलमय हो !!

इस दुनिया में आने के बाद हमारी इच्‍छा हो या न हो , हम अपने काल , स्‍थान और परिस्थिति के अनुसार स्‍वयमेव काम करने को बाध्‍य होते हैं। सिर्फ इतना ही नहीं , अपने काल , स्‍थान और परिस्थिति  के अनुरूप ही हमें फल प्राप्‍त करने की लालसा भी होती है। पर हमेशा अपने मन के अनुरूप ही प्राप्ति नहीं हो पाती , जीवन का कोई पक्ष बहुत मनोनुकूल होता है , तो कोई पक्ष हमें समझौता करने को मजबूर भी करता र‍हता है। पर यही जीवन है , इसे मानते हुए , जीवन के लंबे अंतराल में कभी थोडा अधिक , तो कभी थोडा कम पाकर भी हम अपने जीवन से लगभग संतुष्‍ट ही रहते हैं। यदि संतुष्‍ट न भी हों , तो आवश्‍यकताओं की पूर्ति हेतु इतनी भागदौड करनी पडती है और हमारे पास समय की इतनी कमी होती है कि तनाव झेलने का प्रश्‍न ही नहीं उपस्थि‍त होता।

पर समय समय पर छोटी बडी अच्‍छी या बुरी घटनाएं आ आकर कभी हमारा उत्‍साह बढाती है , तो कभी हमें अपने कर्तब्‍यों के प्रति सचेत भी करती है। यदि हमें सर्दी जुकाम हो , तो इसका अर्थ यह है कि प्रकृति के द्वारा अगली बार ठंड से बचने के लिए हमें आगाह किया जाता है। इसी प्रकार पेट की गडबडी हो तो हम संयम से खाने पीने की सीख लेते हैं। ऐसी घटनाओं में कभी भी अनर्थ नहीं हुआ करता। पर इस दुनिया के लाखों लोगों में से कभी कभी किसी एक के साथ कोई बडी सुख भरी या कोई दुखभरी घटना घट जाया करती है , जो सिर्फ उसके लिए ही नहीं , पूरे समाज और देश तक के लिए आनंददायक या कष्‍टकर हो जाती है। प्रकृति में ये घटनाएं सामूहिक रूप से हमारा उत्‍साह बढाने या हमें सावधान करने के लिए होती रहती है। कहीं ठीक से पालन पोषण होने से किसी का बच्‍चा 'बडा आदमी' बन जाता है तो कहीं ठीक से न होने से किसी का बच्‍चा 'चोर डाकू' भी बन जाता है। कहीं पर रिश्‍तो की मजबूती हमारे जीवन को स्‍वर्ग बनाने में सक्षम है तो कहीं ढंग से रिश्‍तो को नहीं निभाए जाने से पति पत्‍नी के मध्‍य तलाक तक की नौबत आती है। कहीं ढंग से काम न करने से किसी प्रकार की दुर्घटना होती है , तो कहीं सही देखभाल न होने से किसी की मौत। यदि सामूहिक तौर पर देखा जाए एक लाख से भी अधिक लोगों में से  किसी एक व्‍यक्ति के साथ हुई इस प्रकार की घटना से बाकी 99,999 से भी अधिक लोग सावधानी से जीना सीख जाते हैं।

पर सावधान बने रहने की इस सीख को भयावह रूप में देखकर हम अक्‍सर अपने तनाव को बढा लेते हैं। प्रकृति में अति दुखद घटनाओं की संख्‍या बहुत ही विरल होती है। ऐसी समस्‍याएं अक्‍सर नहीं आती, कभी कभार ही लोगों को इस प्रकार की समस्‍या में जीना पडता है। पर प्रकृति के इस नियम को हम बिल्‍कुल नहीं समझ पाते। सबसे पहले तो अपने धन , पद और आत्‍मविश्‍वास में हम किसी प्रकार की अनहोनी की संभावना को ही नकार देते हैं। प्रकृति के महत्‍व को ही स्‍वीकार नहीं करते और जब कोई छोटी समस्‍या भी आए तो उसे छोटे रूप में स्‍वीकार ही नहीं कर पाते। मामूली बातों को भी वे भयावह रूप में देखने लगते हैं।  जैसे किसी अच्‍छे स्‍कूल या कॉलेज में बच्‍चे का दाखिला न हो सका , तो हमें बच्‍चे का पूरा जीवन व्‍यर्थ नजर आने लगता है। बच्‍चे को कहीं थोडी सी चोट लग गयी हो तो भयावह कल्‍पना करते हुए हमारा मन घबराने लगता है , बेटे का पढाई में मन नहीं लग रहा तो भविष्‍य में उसके रोजी रोटी की समस्‍या दिखने लगती है। बच्‍ची का विवाह नहीं हो रहा हो , तो उसके जीवनभर अविवाहित बने रहने की चिंता सताने लगती है। लेकिन ऐसा नहीं होता , देश , काल और परिस्थिति के अनुसार सभी के काम होने ही हैं , इसलिए अपने परिवार के कर्तब्‍यों का पालन करते हुए इसकी छोटी छोटी चिंता को छोड हमें अपने कर्तब्‍यों के द्वारा देश और समाज को मजबूत बनाने के प्रयास करने चाहिए।

अपने अनुभव में मैंने पाया है कि चिंता में घिरे अधिकांश लोग सिर्फ शक या संदेह में अपना समय बर्वाद करते हैं। इस दुनिया में सारे लोगों का काम एक साथ होना संभव नहीं , यह जानते हुए भी लोग बेवजह चिंता करते हैं। हमारे धर्मग्रंथ 'गीता' का सार यही है कि हमारा सिर्फ कर्म पर अधिकार है , फल पर नहीं। इसका अर्थ यही है कि फल की प्राप्ति में देर सवेर संभव है।  इस बात को समझते हुए हम कर्तब्‍य के पथ पर अविराम यात्रा करते रहें , तो 2010 ही क्‍या , उसके बाद भी आनेवाला हर वर्ष हमारे लिए मंगलमय होगा। मैं कामना करती हूं कि आनेवाले वर्ष आपके लिए हर प्रकार की सुख और सफलता लेकर आए !!




बुधवार, 30 दिसंबर 2009

2012 में इस दुनिया के अंत की संभावना हकीकत है या भ्रम ? (दूसरी कडी)

2012 में इस दुनिया के अंत की संभावना हकीकत है या भ्रम ? इसकी पहली कडी को लिखने के बाद दूसरे कार्यों में व्‍यस्‍तता ऐसी बढी कि आगे लिखना संभव ही न पाया। 2012 दिसंबर को दुनिया के समाप्‍त होने के पक्ष में जो सबसे बडी दलील दी जा रही है , वो इस वक्‍त माया कैलेण्‍डर का समाप्‍त होना है। माया सभ्यता 300 से 900 ई. के बीच मेक्सिको, पश्चिमी होंडूरास और अल सल्वाडोर आदि इलाकों में फल फूल रही थी , इस सभ्यता के कुछ अवशेष खोजकर्ताओं ने भी ढूंढे हैं। माना जाता है कि माया सभ्यता के लोगों को गणित, ज्‍योतिष और लेखन के क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल थी। माया सभ्यता के लोग मानते थे कि जब इस कैलिंडर की तारीखें खत्म होती हैं, तो धरती पर प्रलय आता है और नए युग की शुरुआत होती है। इसका कैलिंडर ई. पू. 3114 से शुरू हो रहा है, जो बक्तूनों में बंटा है। इस कैलिंडर के हिसाब से 394 साल का एक बक्तून होता है और पूरा कैलिंडर 13 बक्तूनों में बंटा है, जो 21 दिसंबर 2012 को खत्म हो रहा है।


वैसे तो माया कैलेण्‍डर के आधार के बारे में मुझे पूरी पूरी जानकारी नहीं , फिर भी माया कलेंडर में एक साथ दो दो साल , पहला 260 दिनों का और दूसरा 365 दिनों के चलते थे। मैं समझती हूं कि 365 दिन का साल तो निश्चित तौर पर सौर गति पर आधारित होता होगा , जबकि 260 दिनों का साल संभवत: 9 चंद्रमास का होता हो। इस तरह इसके 4 चंद्रवर्ष पूरे होने पर 3 सौरवर्ष ही पूरे होते होंगे , जिसका सटीक तालमेल करते हुए वर्ष के आकलन के साथ ही साथ ग्रह नक्षत्रों और सूर्यग्रहण , चंद्रग्रहण तक के आकलन का उन्‍हें विशिष्‍ट ज्ञान था। इससे उनके गणित ज्‍योतिष के विशेषज्ञ होने का पता तो चजता है , पर फलित ज्‍योतिष की विशेषज्ञता की पुष्टि नहीं होती है। कोर्नल विश्वविद्यालय में खगोलविद ऐन मार्टिन का भी कहना है कि माया कैलेंडर का डिजायन आवर्ती है। ऐसे में कहना कि दीर्घ गणना दिसंबर 2012 को समाप्त हो रही है, सही नहीं है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे हमारी सभ्यता ने नई सहस्त्राब्दी का स्वागत किया था। इस प्रकार यह माना जा सकता है कि माया कैलेण्‍डर के वर्ष का समाप्‍त होना बिल्‍कुल सामान्‍य घटना है।

हम सभी जानते हैं कि घडी या कैलेण्‍डर समय को याद रखने का एक माध्‍यम भर है , यह अपने में बिल्‍कुल तटस्‍थ है और हरेक व्‍यक्ति को अपनी सुविधानुसार इसका उपयोग करना होता है। न तो किसी प्रकार की खुशी और न ही किसी प्रकार के गम से इसका कोई लेना देना होता है। अपनी सुविधा के लिए हम घडी और कैलेण्‍डर की तरह अन्‍य साधनों का निर्माण करते हैं। किसी न किसी दिन सबका अंत होना ही है , कंप्‍यूटर इंजीनियरों द्वारा कंप्‍यूटर के सॉफ्टवेयर की प्रोग्रामिंग 2000 तक के लिए की गयी थी। 2000 के एक दो वर्ष पूर्व से ही इस बात को लेकर हंगामा मचा हुआ था कि Y2K की समस्‍या के कारण हमारे सारे कंप्‍यूटर बेकार हो जाएंगे , पर ऐसा नहीं हुआ। उस समस्‍या को दूर किया गया और आज भी हम उसका उपयोग कर रहे हैं। पिछले लेख में आपने पढा कि 2010 तक ही अपने सॉफ्टवेयर की प्रोग्रामिंग किए होने से 2012 दिसंबर की ग्रहीय गणना में मेरे समक्ष भी बाधा आयी। अब यदि इस मध्‍य मैं दुनिया में न होती , तो मेरे किसी शिष्‍य के द्वारा इस बात का भयावह अर्थ लगाना भी संभव था। किसी असामान्‍य परिस्थिति में इस प्रकार का भ्रम पैदा हो जाना बिल्‍कुल स्‍वाभाविक है , पर हर वक्‍त हमें अपने विवेक से काम लेना चाहिए। सिर्फ माया कैलेण्‍डर की चर्चा में ही पोस्‍ट की लंबाई बढ गयी है , जबकि 2012 के प्रलय की संभावना के बारे में बहुत सारे सबूत जुटाए गए हैं , सबकी चर्चा के लिए फिर अगली कडी का इंतजार करवाने को बाध्‍य हूं।






मंगलवार, 29 दिसंबर 2009

अंधकार युग से निकलकर भारत के युवाओं का स्‍वर्णयुग में प्रवेश

आज आप किसी भी मध्‍यमवर्गीय परिवार में पहुंच जाएं , उसके युवा पुत्र या पुत्री मल्‍टीनेशनल कंपनी में लाखों के पैकेज वाली नौकरी कर रहे हैं , कितने की तो विदेशों से ऐसी आवाजाही है मानों भारत घर है और विदेश आंगन। उच्‍च वर्गीय लोगों के लिए ही विदेशों की यात्रा होती है ,यह संशय मध्‍यम वर्गीय परिवारों में मिट चुका है  और अनेक माता-पिता भी अपने बच्‍चों के कारण विदेश यात्रा का आनंद ले चुके हैं। इसी प्रकार प्रत्‍येक परिवार का किशोर वर्ग , चाहे वो बेटा हो या बिटिया , बडे या छोटे किसी न किसी संस्‍था से इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट की पढाई कर रहे है और आनेवाले समय में उसके लिए भी नौकरी की पूरी संभावना दिख रही है। जो विद्यार्थी जीवन में बिल्‍कुल सामान्‍य स्‍तर के थे , उनके कैरियर की मजबूती भी देखकर आश्‍चर्य होता है। महंगे पढाई करवा पाना किसी अभिभावक के लिए कठिन हो , तो बैंक भी कर्ज देने को तैयार होती है और किशोरों की पढाई में कोई बाधा नहीं आने देती।  प्राइवेटाइजेशन के इस युग में तकनीकी ज्ञान रखनेवालों लाखों विद्यार्थियों के रोजगार की व्‍यवस्‍था से आज के युवा वर्ग की स्थिति स्‍वर्णिम दिख रही है। वे पूरी मेहनत करना पसंद करते हैं , पर अपने जीवन में थोडा भी समझौता करना नहीं चाहते , उनकी पसंद सिर्फ ब्रांडेड सामान हैं, रईसी का जीवन है। इसका भविष्‍य पर क्‍या प्रभाव पडेगा , यह तो देखने वाली बात होगी , पर यदि 20 वी सदी के अंत से इसकी तुलना की जाए तो 21 सदी के आरंभ में आया यह परिवर्तन सामान्‍य नहीं माना जा सकता।

यदि हम पीछे मुडकर देखें , तो1990 तक यत्र तत्र सरकारी नौकरियों में जगह खाली हुआ करती थी , भ्रष्‍टाचार भी एक सीमा के अंदर था , प्रतिभासंपन्‍न युवाओं को कहीं न कहीं नौकरी मिल जाया करती थी। अपने स्‍तर के अनुरूप सरकारी सेवा में सीमित तनख्‍वाह में रहते हुए भी जहां युवा वर्ग निराश नहीं था, वहीं अभिभावक भी प्रतिभा के अनुरूप अपने संतान की स्थिति को देखकर संतुष्‍ट रहा करते थे। पर 1990 के बाद सरकारी संस्‍थाओं में भी छंटनी का दौर शुरू हुआ , जब पुराने कर्मचारियों को नौकरी से निकाला जा रहा हो , तो नए लोगों को रखने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता ? 2000 के दशक में कहीं कोई रिक्‍त पद नहीं , यदि कहीं से दो चार पदों पर नियुक्ति की कोई संभावना भी दिखी तो पद या पैसे वालों को उसपर कब्‍जा करने में देर नहीं होती थी। एक से एक मेधावी बच्‍चे , जिन्‍होने 1990 से 2000 के मध्‍य अपनी पढाई समाप्‍त की , एक ऐसे अंधकार युग में अपने कैरियर चुनने को विवश हुए , जहां विकल्‍प के नाम पर अपने परंपरागत व्‍यवसाय या फिर समय काटने के लिए कोई प्राइवेट नौकरी करनी थी। कोई अमीर अभिभावक पैसे खर्च कर अपने बेटों को इंजीनियरिंग या मेडिकल की प्राइवेट डिग्री दिलवा भी देता था , तो नौकरी के बाजार में उसकी कोई इज्‍जत नहीं थी। वह नाम के लिए ही डॉक्‍टर या इंजीनियर हो जाता था और पूरे जीवन कोई व्‍यसाय के सहारे ही चलाने को बाध्‍य होते थे।  बिना तकनीकी ज्ञान के अपने काम और अनुभव के सहारे कोई अपना कैरियर बनाने में सक्षम हुए , तो कोई अपनी रूचि न होने के बावजूद किसी व्‍यवसाय में लगकर अपनी जीवन नैया को खींचने को समझौता करने को तैयार हुए। संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि उस दशक में सभी युवा भाग्‍य भरोसे जीने को बाध्‍य हुए । मात्र दस वर्ष में हुए इस परिवर्तन को देखते हुए ही मैं अक्‍सर कहा करती हूं कि युवा वर्ग ने अंधकार युग से निकलकर स्‍वर्णिम युग में प्रवेश किया है !!




सोमवार, 28 दिसंबर 2009

सुप्रसिद्ध गणितज्ञ और खगोलशास्‍त्री भास्‍कराचार्य और उनकी पुत्री लीलावती की कथा से हम एक बडी सीख ले सकते हैं !!

ब्‍यूटी पार्लर आरंभ करने जा रही मेरी भांजी ने शायद पंडित या ज्‍योतिषी को भगवान ही समझ लिया , तभी तो उसने अपनी दुकान खोलने के लिए मुझे एक ऐसा मुहूर्त्‍त देखने को कहा , जिसमें खोलने पर उसकी दुकान में घाटे का कोई सवाल ही नहीं हो। ज्‍योतिष की सहायता से कोई दुकान खोलने या न खोलने या देर सवेर करने की सलाह दी जा सकती है , पर शकुन और मुहूर्त्‍त पर तो गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष बिल्‍कुल विश्‍वास नहीं करता , कई दिन पूर्व इसपर पापा जी के द्वारा एक पोस्‍ट भी किया जा चुका है , मुझे इस सोंच पर अचंभा हुआ। उसने मुझे ही समझाते हुए कहा कि उसके शहर में एक पंडित है , जो ऐसा मुहूर्त्‍त निकाल‍कर देते हैं , जिससे आपके फर्म में घाटे की कोई गुंजाइश नहीं। पढे लिखे लोग भी कभी कभी ऐसे भ्रम में कैसे पड जाते हैं , जो अव्‍यवहारिक हो। ग्रहों के पृथ्‍वी पर पडनेवाले प्रभाव के रहस्‍य को हम ढूंढ भी लें , किसी के भाग्‍य को समझने में सफलता भी प्राप्‍त कर लें , पर इसे बदलने में सफलता प्राप्‍त करना संभव है भला ? इसी संदर्भ में मुझे विद्वान भास्‍कराचार्य और उनकी पुत्री लीलावती की कथा याद आ गयी , जिसे मैने उसे भी समझाया और आज आपको सुनाने जा रही हूं ...

भास्कराचार्य प्राचीन भारत के एक प्रसिद्ध गणितज्ञ एवं खगोलशास्त्री थे। उनका जन्‍म और पालन पोषण ही एक ऐसे घर में हुआ था , जहां स लोग ज्‍योतिषी थे। इनका जन्म 1114 0 में  हुआ था। भास्कराचार्य उज्जैन में स्थित वेधशाला के प्रमुख थे. यह वेधशाला प्राचीन भारत में गणित और खगोल शास्त्र का अग्रणी केंद्र था। लीलावती भास्कराचार्य की पुत्री का नाम था। जब लीलावती का जन्‍म हुआ , तो उसकी जन्‍मकुंडली देखकर या उसके जन्‍म के समय आसमान में ग्रहों की खास स्थिति देखकर भास्‍कराचार्य परेशान हो गए। उसकी कुंडली में वैधब्‍य योग था, वह योग बडा प्रबल था और उसके घटित होने की शत प्रतिशत संभावना थी। वे दिन रात किसी ऐसे उपाय की सोंच में थे जिससे कि उसके वैधब्‍य योग को काटा जा सके। देखते ही देखते लीलावती सयानी हो गयी , विवाह योग्‍य होने पर उसका विवाह आवश्‍यक था , पर पिता उसके विधवा रूप की कल्‍पना कर ही कांप जाते। अंत में चिंतन मनन कर उन्‍होने एक उपाय निकाल ही लिया।


उस वर्ष विवाह का एक ऐसा विशेष मुहूर्त्‍त आने वाला था , जहां किसी भी कन्‍या का विवाह किए जाने से उसके अखंड सौभाग्‍यवती रहने की संभावना थी।भास्‍कराचार्य ने उसी मुहूर्त्‍त में लीलावती का ब्‍याह करने का निश्‍चय किया। मुहूर्त्‍त देखने के लिए उस समय घडी तो होती नहीं थी , आकाश में ग्र्रहों नक्षत्रों की स्थिति से ही समय का आकलन किया जाता था । ब्‍याह की पूरी तैयारी की गयी , लेकिन ऐन मौके पर कोई अति आवश्‍यक कार्य निकल आया। भास्‍कराचार्य के पास हर क्षण का हिसाब किताब हुआ करता था , पर उनके जाने से शुभ मुहूर्त्‍त में ब्‍याह होना मुश्किल था। इसलिए काम पर जाने से पहले उन्‍होने एक यंत्र बनाया , एक बरतन में अपनी गणना के अनुसार जल डाला और उसके प्रवाह के लिए एक छिद्र बनाया। उस बरतन के पूरे जल के बह जाने के तुरंत बाद उस विवाह योग को शुरू होना था , परिवार के सब लोगों को समझाकर वे अपने काम पर चल पडें। पर बरतन के ढक्‍कन को उठाकर बार बार जल के स्‍तर को देखने के क्रम में लीलावती के गले के माले का एक मोती या कुछ और बरतन में गिर पडा और उससे जल का प्रवाह रूक गया। जल के प्रवाह में रूकावट आने से जल पूरा बह न सका और देखते ही देखते विवाह का मुहूर्त्‍त निकल गया। पिता के लौटने तक तो बहुत देर हो चुकी थी , मजबूरन किसी और मुहूर्त्‍त मे उसका विवाह करवाना पडा।

इस कहानी से सीख मिलती है कि सचमुच प्रकृति के नियमों को कोई नहीं बदल सकता। फिर वहीं हुआ , जो लीलावती की जन्‍मकुंडली में लिखा था, विवाह के एक वर्ष के अंदर ही उसके पति की मृत्‍यु हो गयी। लीलावती को अपने पिताजी के ज्ञान पर और ज्‍योतिष पर विश्‍वास होना ही था। वह पिता के साथ ही गणित और ज्‍योतिष के अध्‍ययन में जुट गयी। लीलावती के प्रश्‍नों का जबाब देने के क्रम में ही "सिद्धान्त शिरोमणि" नामक एक विशाल ग्रन्थ लिखा गया , जिसके चार भाग हैं  (१) लीलावती (२) बीजगणित (३) ग्रह गणिताध्याय और (४) गोलाध्याय। लीलावती में बड़े ही सरल और काव्यात्मक तरीके से गणित और खगोल शास्त्र के सूत्रों को समझाया गया है। यहां तक कि आजकल हम कहते हैं कि न्यूटन ने ही सर्वप्रथम गुरुत्वाकर्षण की खोज की, परन्तु उसके 550 वर्ष पूर्व भास्कराचार्य ने पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति को विस्तार में समझा दिया था।





रविवार, 27 दिसंबर 2009

दो दिन पूर्व धर्म और ईश्‍वर के विरोध में लिखे गए एक आलेख में मैने ये कमेंट कर दिया है !!

पता नही क्‍यूं , अंधविश्‍वासी स्‍वभाव नहीं होने के बावजूद प्राचीन परंपराएं मुझे बुरी नहीं लगती , धर्म मुझे बुरा नहीं लगता । क्‍यूंकि मैं मानती हूं कि विदेशी आक्रमणों के दौरान हमारी सभ्‍यता और संस्‍कृति का जितना विनाश हुआ , उससे कहीं कम इस स्‍वतंत्र भारत में धर्म के क्षेत्र में घुसकर कमाने खाने वाले चोर डाकुओं ने नहीं किया। इस कारण धर्म का जो भी रूप हमारे सामने है , हम जैसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखनेवालों को पच ही नहीं सकता। पर धर्म तो धारण करने योग्‍य व्‍यवहार होता है , उससे हम कब तक दूर रह सकते हैं , आज हमें धर्म के पालन के लिए नए नियम बनाने की आवश्‍यकता है। आज हर क्षेत्र में झूठ और अन्‍याय का बोलबाला है , क्‍या हम हर क्षेत्र को ही समाप्‍त कर सकते हैं ? सबमें सुधार की आवश्‍यकता है , पर बस  हम सिर्फ दोषारोपण करते रहें , तो बात सुधरनेवाली नहीं। यही कारण है कि जब भी मैं धर्म विरोधियों के आलेख देखती हूं , मैं उसमें कमेंट दिए बिना नहीं रह पाती , दो दिन पूर्व भी धर्म और ईश्‍वर के विरोध में लिखे गए एक आलेख में मैने ये कमेंट कर दिया है .............

ईश्‍वर को किसी ने देखा नहीं .. इसलिए इसे मानने की जबरदस्‍ती किसी पर नहीं की जा सकती .. पर हजारो हजार वर्षों से बिना संविधान के .. बिना सरकार के यदि यह समाज व्‍यवस्थित ढंग से चल रहा है .. तो वह धर्म के सहारे से ही .. यदि भाग्‍य, भगवान और स्‍वर्ग नरक का भय या लालच न होता .. तो समर्थों के द्वारा असमर्थों को कब का समाप्‍त कर दिया जाता .. शरीर और दिल दोनो से कमजोर नारियों की रक्षा अभी तक धर्म के कारण ही हो सकी है .. बुद्धि , बल और व्‍यवसायिक योग्‍यता में से कुछ भी न रखनेवालों को भी रोजगार के उपाय निकालकर उनके रोजी रोटी की व्‍यवस्‍था भी धर्म के द्वारा ही की गयी थी .. गृहस्‍थों को इतने कर्मकांडों में उलझाया जाता रहा कि दीन हीनों को कभी रोजगार की कमी न हो .. दूनिया के हर धर्म में समय समय पर साफ सफाई की आवश्‍यकता रहती थी .. पर इसका परिशोधन न कर हम अपनी परंपराओं को , अपने धर्म को गलत मानते रहे .. तो आनेवाले युग में भयंकर मार काट मचेगी .. आज ही पैसे कमाने के लिए कोई भी रास्‍ता अख्तियार करना हमें गलत नहीं लगता .. क्‍यूंकि किसी को भगवान का भय नहीं रह गया है .. जो बहुत बडे वैज्ञानिक हैं .. क्‍या उनके वश में सबकुछ है .. वे भगवान को माने न माने पकृति के नियमों को मानना ही होगा .. और मैं दावे से कहती हूं कि इस प्रकृति में कुछ भी संयोग या दुर्योग नहीं होता है .. हमारे एक एक काम का लेखा जोखा है प्रकृति के पास .. और जब हर व्‍यक्ति इस बात को समझ जाएंगे .. ये दुनिया स्‍वर्ग हो जाएगी .. मेरा दावा है !!





शनिवार, 26 दिसंबर 2009

क्‍या आप इन दिनों बुध ग्रह के प्रभाव को महसूस कर रहे हैं ??

17 दिसंबर 2009 से ही आसमान में पृथ्‍वी से खास कोणिक दूरी बनाता बुध ग्रह बहुत ही प्रभावी हो गया है। चूंकि ज्‍योतिष में बुध ग्रह बुद्धि , ज्ञान का ग्रह माना जाता है , इसलिए यह विद्यार्थियों और बौद्धिक श्रम करनेवाले लोगों को ही अधिक प्रभावित करता है। इसकी यह स्थिति 31 जनवरी तक बनीं रहेगी , जिसके कारण बुद्धिजीवी वर्ग खास सकारात्‍मक कार्यों में उलझे रह सकते हैं। वैसे 29 दिसंबर से 12 जनवरी तक का समय इनके कार्यक्रम में थोडी सुस्‍ती लानेवाला होगा। वैसे तो अधिकांश लोगों पर इसका अच्‍छा ही प्रभाव देखा जाएगा , पर कुछ विद्यार्थी , जिनकी  जन्‍मकुंडली में बुध ग्रह कमजोर होकर स्थित है , और इसके कारण वे विद्यार्थी जीवन में मनोनुकूल वातावरण का अभाव पा रहे हैं , की समस्‍या इस वक्‍त थोडी और गहरा सकती है। ऐसे विद्यार्थियों , जिनका जन्‍म निम्‍न तिथियों में हुआ है , अपने कार्यक्रम में बाधा महसूस कर सकते हैं ....

  • 1986 में 12 मार्च से 17 मार्च , 15 जुलाई से 31 जुलाई , 7 नवंबर से 19 नवंबर , 
  • 1987 में 24 फरवरी से 11 मार्च , 26 जून से 12 जुलाई , 22 अक्‍तूबर से 3 नवम्‍बर , 
  • 1988 में 7 फरवरी से 21 फरवरी , 6 जून से 22 जून, 4 अक्‍तूबर से 17 अक्‍तूबर, 
  • 1989 में 21 जनवरी से 3 फरवरी , 18 मई से 2 जून , 17 सितंबर से 1 अक्‍तूबर, 
  • 1990 में 6 जनवरी से 17 जनवरी , 28 अप्रैल से 14 मई , 31 अगस्‍त से 15 सितंबर , 20 दिसंबर से 31 दिसंबर, 
  • 1991 में 10 अप्रैल से 25 अप्रैल , 13 अगस्‍त से 29 अगस्‍त , 4 दिसंबर से 9 दिसंबर ,
  • 1992 में 22 मार्च से 6 अप्रैल , 25 जुलाई से 10 अगस्‍त , 16 नवंबर से 28 नवंबर, 
  • 1993 में 6 मार्च से 20 मार्च , 7 जुलाई से 23 जुलाई , 1 नवंबर से 12 नवंबर, 
  • 1994 में 16 फरवरी से 2 मार्च , 18 जून से 4 जुलाई , 14 अक्‍तूबर से 27 अक्‍तूबर , 
  • 1995 में 31 जनवरी से 13 फरवरी , 29 मई से 14 जून , 27 सितंबर से 11 अक्‍तूबर, 
  • 1996 में 15 जनवरी से 27 जनवरी , 9 मई से 25 मई , 9 सितंबर से 21 सितंबर, 
  • 1997 में 1 जनवरी से 10 जनवरी , 20 अप्रैल से 6 मई , 23 अगस्‍त से 6 सितंबर, 13 दिसंबर से 24 दिसंबर,   

कुछ लोगों के लिए यह ग्रह स्थिति विशेष तौर पर फलदायक भी हो सकती है। किसी संयोग के काम करने से वे किसी महत्‍वपूर्ण कार्यक्रम से जुड सकते हैं । 1926 , 1933 , 1939 , 1946 , 1952 , 1953 , 1959 , 1966 , 1972 , 1979 , 1985 , 1986 , 1992 , 1998 , 1999 और 2005 के जुलाई और अगस्‍त में जन्‍म लेनेवाले इन दिनों में किसी मामले में मनोनुकूल माहौल में रहेंगे। इसके साथ ही कर्क राशि में जन्‍म लेनेवालों के लिए भी बुध ग्रह की यह स्थिति किसी संदर्भ में मनोनुकूल होगी।

पर कुछ लोगों के लिए  यह ग्रह स्थिति विशेष तौर पर कष्‍टदायक भी हो सकती है। किसी दुर्योग से उनका जीवन बाधित हो सकता है। 1923 , 1929 , 1930 , 1936 , 1942 , 1949 , 1956 , 1962 , 1969 , 1975 , 1982 , 1988 , 1989 , 1995 , 2001 और 2008 के मई जून में जन्‍म लेने वालों के समक्ष इन दिनों में किसी मामले में मनोनुकूल स्थिति का अभाव हो सकता है। इसके साथ ही वृष राशि में जन्‍म लेनेवालों के लिए भी बुध ग्रह की यह स्थिति किसी संदर्भ में परेशानी उपस्थि‍त कर सकती है।

वैसे इस 'अच्‍छे' या 'बुरे' समय को आप किसी बडी उपलब्धि या बडे नुकसान से न जोड लें , क्‍यूंकि ये अस्‍थायी तौर पर आनेवाला ग्रहयोग है और कोई अच्‍छा या बुरा बडा निर्णय तभी होगा , जब आपकी जन्‍मकुंडली के हिसाब से स्‍थायी तौर पर कोई बडी सफलता या असफलता इस समय मिलनी होगी। पर यदि जन्‍मकुंडली के हिसाब से आपका कोई बडा अच्‍छा या बुरा योग न हो , तो इस ग्रहयोग के कारण डेढ महीने'अच्‍छा' होने के किसी भ्रम में या 'बुरा' होने के संशय में गुजार देंगे।









शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

समाज में लिंग परीक्षण कर कन्‍या भ्रूण की हत्‍या की गलत परंपरा का फल भुगतना होगा हमें !!

ज्‍योतिष जैसे विषय से मेरे संबंधित होने के कारण मेरे समक्ष परेशान लोगों की भीड लगनी ही है। तब मुझे महसूस होता है कि इस दुनिया में समस्‍याओं की कमी नहीं , सारे लोग किसी न किसी प्रकार के दुख से परेशान हैं। इसमें वैसे अभिभावकों की संख्‍या भी कम नहीं , जो अपने पुत्र या पुत्रियों के विवाह के लिए कई कई वर्षों से परेशान हैं। प्रतिवर्ष मेरे पास आनेवाले परेशान अभिभावकों को मदद करने के क्रम में एक दो विवाह मेरे द्वारा भी हो जाया करते हैं। पर इधर कुछ वर्षों से मैं महसूस कर रही हूं कि हमारे पास आनेवाले परेशान अभिभावकों में बेटियों के माता पिता कम हैं और बेटों के अधिक। इससे स्‍पष्‍ट है कि वर की तुलना में विवाह के लिए वधूओं की संख्‍या कम है।

कन्‍या भ्रूण हत्‍या के फलस्‍वरूप भविष्‍य में इस प्रकार की स्थिति के बनने की आशंका तो सबों को है , पर इसके इतनी जल्‍दी उपस्थि‍त हो जाने से मुझे बडी चिंता हो रही है। आज विवाह के लिए जो भी वर और कन्‍या तैयार दिख रहे हैं , उनका जन्‍म 1975 से 1985 के मध्‍य का माना जा सकता है। उस समय शायद भ्रूण हत्‍या को तो कानूनी मान्‍यता मिल गयी थी , पर इतनी जल्‍दी गर्भ में लिंग परीक्षण होने की विधि विकसित नहीं हुई थी कि परीक्षण करने के बाद उसकी हत्‍या की जा सके। उस वक्‍त भ्रूण हत्‍या के द्वारा अनचाही संतान को ही दुनिया में आने से रोका जाता था। पर इससे भी लिंग असंतुलन हो ही गया , वो इस कारण कि जिस दंपत्ति के दो या तीन बेटे हो गए , उन्‍होने तीसरे या चौथे संतान को ही आने से रोक दिया , जबकि जिस दंपत्ति की दो या तीन बेटियां थी , उन्‍होने लडके को जन्‍म देने के लिए चौथे या पांचवे संतान का भी इंतजार किया। इससे कन्‍याओं की संख्‍या मामूली घटी और इसका ही प्रभाव हम आज पा रहे हैं ।

तीसरी संतान न होने देना कोई गुनाह नहीं था , पर जब इसका इतनी छोटी सी बात का इतना भयावह प्रभाव सामने नजर आ रहा है , तो मात्र 15 वर्षों के बाद समाज में लिंग परीक्षण कर कन्‍या भ्रूण की हत्‍या की जो गलत परंपरा शुरू हुई है , उसका असर भी मात्र 15 वर्षों में क्‍या होगा , ये चिंता करने वाली बात है। पर अभी तक समाज को कुछ भी अनुभव नहीं हो रहा , अभी भी निरंतर कन्‍याओं की भ्रूण हत्‍या हो रही है और बालिकाओं की संख्‍या में कमी होती जा रही है। सारे अस्‍पताल तो सेवा के अपने धर्म को भूलकर पैसे कमाने की एक बडी कंपनी बन चुके हैं। स्‍वयंसेवी संस्‍थाएं बेकार रह गयी है। सरकारी कार्यक्रम फाइलों की शोभा बढा रहे हैं। यदि कन्‍या भ्रूण हत्‍या के विरोध में कडे कानून भी बनें तो भी कोई उपाय नहीं दिखता है। आवश्‍यकता है लोगों में स्‍वयं की जागरूकता के आने की। तभी आनेवाले दिनों में कन्‍या की संख्‍या को बढाया जा सकता है , अन्‍यथा बहुत ही भयावह स्थिति के उपस्थित होने की आशंका दिख रही है, और जब ये समय आएगा , हमारे सम्‍मुख कोई उपाय नहीं होगा।


विद्यार्थी अधिक से अधिक फॉर्म भरे और अपने लिए कोई न कोई सीट सुरक्षित रखने की कोशिश करें!!

मनुष्‍य के शारीरिक मानसिक विकास की चर्चा करने के क्रम में एक 'टीन एजर' बात अवश्‍य आ जाती है। यह शब्‍द 13 से 19 वर्ष तक के किशोरों के लिए प्रयुक्‍त किया जाता है। शारीरिक विकास के मामले में यह उम्र तो विशेष है ही , मानसिक संतुलन बनाए रखने में भी इस उम्र की बडी भूमिका होती है। इसी उम्र में जब कोई बच्‍चे सा काम करे , तो तुरंत फटकार मिलती है कि वे अब बच्‍चे नहीं रहे और जब बडे जैसा व्‍यवहार करते करने जा रहे होते , उन्‍हें टोका जाता है कि वे अभी बच्‍चे हैं।यदि अभिभावक समझदार हों और उनके साथ उनका दोस्‍ताना व्‍यवहार हो , तो भी इस समय बच्‍चों का व्‍यवहार सचमुच अजीब सा हो जाता है। कभी कभी तो अपनी पढाई लिखाई सबकुछ भूलकर वे ऐसी संगति में आ जाते हैं , बुरी आदतें अपना लेते हैं कि बच्‍चों को देखकर भी ताज्‍जुब हो सकता है।

 एक मनोचिकित्‍सक उम्र के इस दौर को किसी भी प्रभाव से जोड सकता है। पर सिर्फ शारीरिक और मानसिक परिवर्तन की दौर से गुजरने के कारण  ही  किशोरों का16 से 20 वर्ष की उम्र तक  यह व्‍यवहार अपनी चरम सीमा पर नहीं होता , हमारा अध्‍ययन इस बात की पुष्टि करता है कि इस वक्‍त शनि के खास ज्‍योतिषीय प्रभाव के कारण जातक के समक्ष एक अलग प्रकार की परिस्थिति उपस्थित होती है। यदि आप अपनी जन्‍मतिथि में 16 और 20 वर्ष जोड दें , तो बहुत कम ही लोग ऐसे होंगे , जो ऐसा नहीं पाएंगे कि कोई गल्‍ती न करने के बावजूद इन चार वर्षों के मध्‍य का कोई ढाई वर्ष खासकर 17 वां , 18 वां या 19 वां वर्ष आपने किसी खास तरह की गडबड परिस्थिति में गुजारे हैं। लगातार किसी परीक्षा में मन मुताबिक परिणाम न आना , शारीरिक अस्‍वस्‍थता का बने रहना या पिता या माता से किसी विचारों का विरोध जैसी कुछ बातों के निरंतर बने रहने के कारण अधिकांश जगहों पर शनि के प्रभाव की पुष्टि इस तरह हो जाएगी।

जो बच्‍चे पढाई लिखाई के क्षेत्र में नहीं हैं , उनसे कोई बडा अपराध इन्‍हीं दिनों में हो जाता है , जिसके कारण उनका पूरा जीवन बेकार हो जाता है। इसके अलावे आज के बच्‍चों और अभिभावकों की पढाई लिखाई के प्रति मानसिकता के कारण विद्यार्थियों के लिए यह उम्र तो और भी कष्‍टकर हो गया है। इसी उम्र के दौरान के कोई तीन वर्ष दसवीं , ग्‍यारहवी और बारहवीं की पढाई के साथ ही साथ किसी अच्‍छे कॉलेज में नामांकण कराने के भी होते हैं , इसलिए उनका दबाब भी बहुत अधिक होता है। वैसे तो हर कॉलेज में सीट कम होने के कारण किशोरों के समक्ष मनोनुकूल परिणाम की संभावना कम ही रहती है और अधिकांश को समझौता करते हुए ही अपनी पढाई को आगे ले जाना होता है। पर इस दौरान कुछ छात्र ऐसे होते हैं , जिनको बहुत बडा समझौता करना पडता है। हमेशा से अच्‍छे अच्‍छे स्‍कूलों और विभिन्‍न कोचिंग सेंटरों में टॉपर रहे किशोरों को अपनी आशा के विपरीत छोटे छोटे कॉलेजों मे दाखिला लेने को विवश होना पडता है।

व्‍यवहारिक कारण से ऐसा क्‍यूं होता है , इसे मैं परिभाषित नहीं कर सकती। लाखों की संख्‍या में परीक्षा दे रहे विद्यार्थियों में से किस अव्‍यवस्‍था के कारण ऐसे परिणाम आ जाते हैं , प्रतियोगिता की परीक्षाओं में पारदर्शिता न होने के कारण कह पाना मुश्किल है ।अब पहले वाली बात तो रही नहीं ,पिछले वर्ष छत्‍तीसगढ के मेडिकल इंटरेंस की परीक्षा में टॉप करने वाले विद्यार्थी ने परीक्षा ही नहीं दी थी , पिछले वर्ष ही होहल्‍ले के कारण झारखंड इंजीनियरिंग की परीक्षा का परिणाम भी दुबारा निकालना पडा, इन सब बातों को देखते हुए कुछ प्रतिशत खामियों से इंकार नहीं किया जा सकता। सामान्‍य बच्‍चे थोडी कमी बेशी के साथ आगे बढ भी जाएं , पर बहुत ही परेशान हालत में अधिकांश प्रति‍भा संपन्‍न किशोरों को ही दंश झेलते हुए मैने अपने पास आते देखा है।

अभी फिर से सभी कॉलेजों के लिए इंटरेंस की परीक्षाओं के फॉर्म भरे जा रहे हैं। अपने अनुभव के आधार पर मेरा विद्यार्थियों से अनुरोध है कि वे अधिक से अधिक जगहों पर फॉर्म भरे और अपने लिए कोई न कोई सीट सुरक्षित रखने का प्रयास करें। कौन सी परीक्षा देते वक्‍त आपकी मन:स्थिति कैसी रहेगी और परीक्षा अच्‍छी हो जाने के बाद भी कौन सा परिणाम कितना अच्‍छा या बुरा होगा , इसकी कोई गारंटी नहीं होती। यदि आप सामान्‍य विद्यार्थी हैं , तो आप कुछ निश्चिंत रह भी सकते हैं , पर असाधारण प्रतिभा है आपमें तो आपको और सतर्क रहने की आवश्‍यकता है। अधिक से अधिक फॉर्म भरें और कहीं भी दाखिला लेकर अपनी पढाई पूरी करें। प्रतिभा किसी का मुहंताज नहीं होती , समय आने पर अपनी प्रतिभा से आप अपनी जगह बना ही लेंगे , समय एक जैसा नहीं होता , आशा है मेरे संकेत को आप समझ चुके होंगे।

रिजल्‍ट होने के बाद विकल्‍पों का चुनाव करते वक्‍त भी किशोरों को बहुत सावधानी रखनी चाहिए , जिसकी जानकारी देते हुए मैं एक पोस्‍ट परीक्षा परिणामों के बाद लिखूंगी !!




विद्यार्थी अधिक से अधिक फॉर्म भरे और अपने लिए कोई न कोई सीट सुरक्षित रखने की कोशिश करें!!

मनुष्‍य के शारीरिक मानसिक विकास की चर्चा करने के क्रम में एक 'टीन एजर' बात अवश्‍य आ जाती है। यह शब्‍द 13 से 19 वर्ष तक के किशोरों के लिए प्रयुक्‍त किया जाता है। शारीरिक विकास के मामले में यह उम्र तो विशेष है ही , मानसिक संतुलन बनाए रखने में भी इस उम्र की बडी भूमिका होती है। इसी उम्र में जब कोई बच्‍चे सा काम करे , तो तुरंत फटकार मिलती है कि वे अब बच्‍चे नहीं रहे और जब बडे जैसा व्‍यवहार करते करने जा रहे होते , उन्‍हें टोका जाता है कि वे अभी बच्‍चे हैं।यदि अभिभावक समझदार हों और उनके साथ उनका दोस्‍ताना व्‍यवहार हो , तो भी इस समय बच्‍चों का व्‍यवहार सचमुच अजीब सा हो जाता है। कभी कभी तो अपनी पढाई लिखाई सबकुछ भूलकर वे ऐसी संगति में आ जाते हैं , बुरी आदतें अपना लेते हैं कि बच्‍चों को देखकर भी ताज्‍जुब हो सकता है।

 एक मनोचिकित्‍सक उम्र के इस दौर को किसी भी प्रभाव से जोड सकता है। पर सिर्फ शारीरिक और मानसिक परिवर्तन की दौर से गुजरने के कारण  ही  किशोरों का16 से 20 वर्ष की उम्र तक  यह व्‍यवहार अपनी चरम सीमा पर नहीं होता , हमारा अध्‍ययन इस बात की पुष्टि करता है कि इस वक्‍त शनि के खास ज्‍योतिषीय प्रभाव के कारण जातक के समक्ष एक अलग प्रकार की परिस्थिति उपस्थित होती है। यदि आप अपनी जन्‍मतिथि में 16 और 20 वर्ष जोड दें , तो बहुत कम ही लोग ऐसे होंगे , जो ऐसा नहीं पाएंगे कि कोई गल्‍ती न करने के बावजूद इन चार वर्षों के मध्‍य का कोई ढाई वर्ष खासकर 17 वां , 18 वां या 19 वां वर्ष आपने किसी खास तरह की गडबड परिस्थिति में गुजारे हैं। लगातार किसी परीक्षा में मन मुताबिक परिणाम न आना , शारीरिक अस्‍वस्‍थता का बने रहना या पिता या माता से किसी विचारों का विरोध जैसी कुछ बातों के निरंतर बने रहने के कारण अधिकांश जगहों पर शनि के प्रभाव की पुष्टि इस तरह हो जाएगी।

जो बच्‍चे पढाई लिखाई के क्षेत्र में नहीं हैं , उनसे कोई बडा अपराध इन्‍हीं दिनों में हो जाता है , जिसके कारण उनका पूरा जीवन बेकार हो जाता है। इसके अलावे आज के बच्‍चों और अभिभावकों की पढाई लिखाई के प्रति मानसिकता के कारण विद्यार्थियों के लिए यह उम्र तो और भी कष्‍टकर हो गया है। इसी उम्र के दौरान के कोई तीन वर्ष दसवीं , ग्‍यारहवी और बारहवीं की पढाई के साथ ही साथ किसी अच्‍छे कॉलेज में नामांकण कराने के भी होते हैं , इसलिए उनका दबाब भी बहुत अधिक होता है। वैसे तो हर कॉलेज में सीट कम होने के कारण किशोरों के समक्ष मनोनुकूल परिणाम की संभावना कम ही रहती है और अधिकांश को समझौता करते हुए ही अपनी पढाई को आगे ले जाना होता है। पर इस दौरान कुछ छात्र ऐसे होते हैं , जिनको बहुत बडा समझौता करना पडता है। हमेशा से अच्‍छे अच्‍छे स्‍कूलों और विभिन्‍न कोचिंग सेंटरों में टॉपर रहे किशोरों को अपनी आशा के विपरीत छोटे छोटे कॉलेजों मे दाखिला लेने को विवश होना पडता है।

व्‍यवहारिक कारण से ऐसा क्‍यूं होता है , इसे मैं परिभाषित नहीं कर सकती। लाखों की संख्‍या में परीक्षा दे रहे विद्यार्थियों में से किस अव्‍यवस्‍था के कारण ऐसे परिणाम आ जाते हैं , प्रतियोगिता की परीक्षाओं में पारदर्शिता न होने के कारण कह पाना मुश्किल है ।अब पहले वाली बात तो रही नहीं ,पिछले वर्ष छत्‍तीसगढ के मेडिकल इंटरेंस की परीक्षा में टॉप करने वाले विद्यार्थी ने परीक्षा ही नहीं दी थी , पिछले वर्ष ही होहल्‍ले के कारण झारखंड इंजीनियरिंग की परीक्षा का परिणाम भी दुबारा निकालना पडा, इन सब बातों को देखते हुए कुछ प्रतिशत खामियों से इंकार नहीं किया जा सकता। सामान्‍य बच्‍चे थोडी कमी बेशी के साथ आगे बढ भी जाएं , पर बहुत ही परेशान हालत में अधिकांश प्रति‍भा संपन्‍न किशोरों को ही दंश झेलते हुए मैने अपने पास आते देखा है।

अभी फिर से सभी कॉलेजों के लिए इंटरेंस की परीक्षाओं के फॉर्म भरे जा रहे हैं। अपने अनुभव के आधार पर मेरा विद्यार्थियों से अनुरोध है कि वे अधिक से अधिक जगहों पर फॉर्म भरे और अपने लिए कोई न कोई सीट सुरक्षित रखने का प्रयास करें। कौन सी परीक्षा देते वक्‍त आपकी मन:स्थिति कैसी रहेगी और परीक्षा अच्‍छी हो जाने के बाद भी कौन सा परिणाम कितना अच्‍छा या बुरा होगा , इसकी कोई गारंटी नहीं होती। यदि आप सामान्‍य विद्यार्थी हैं , तो आप कुछ निश्चिंत रह भी सकते हैं , पर असाधारण प्रतिभा है आपमें तो आपको और सतर्क रहने की आवश्‍यकता है। अधिक से अधिक फॉर्म भरें और कहीं भी दाखिला लेकर अपनी पढाई पूरी करें। प्रतिभा किसी का मुहंताज नहीं होती , समय आने पर अपनी प्रतिभा से आप अपनी जगह बना ही लेंगे , समय एक जैसा नहीं होता , आशा है मेरे संकेत को आप समझ चुके होंगे।

रिजल्‍ट होने के बाद विकल्‍पों का चुनाव करते वक्‍त भी किशोरों को बहुत सावधानी रखनी चाहिए , जिसकी जानकारी देते हुए मैं एक पोस्‍ट परीक्षा परिणामों के बाद लिखूंगी !!




गुरुवार, 24 दिसंबर 2009

लोकतंत्र मूर्खों का ही शासन तो है .. चुनाव परिणाम से अचंभा कैसा ??

कुछ दिनों से झारखंड में सारे नेता , उनके भाई बंधु और चुनाव के बहाने कुछ कमाई कर लेने वाले लोग विधान सभा चुनाव की गहमा गहमी में  जितना व्‍यस्‍त थे , बुद्धि जीवी वर्ग उतना ही चिंतन में उलझे थे। झारखंड को समृद्ध समझते हुए बिहार से अलग करने के बाद इतने दिनों की शासन व्‍यवस्‍था में इस प्रदेश में आम जन तो समृद्ध नहीं हो सके थे , इस कारण उनकी चिंता जायज थी। कम से कम चुनाव परिणाम तो उनके पक्ष में आना ही नहीं चाहिए था , जिनकी बदौलत राज्‍य की स्थिति इतनी खराब हुई थी। हालांकि विकल्‍प का खास अभाव सारे देश में मौजूद है , तो झारखंड में कोई सशक्‍त विकल्‍प की संभावना का कोई सवाल ही नहीं , फिर भी चुनाव परिणाम को देखकर कुछ अचंभा हो ही जाता है।

वैसे यदि पूरी कहानी समझ में आए , तो अचंभे वाली कोई बात नहीं है। यूं भी लोकतंत्र को मूर्खों का शासन ही कहा गया है। जिस देश में जनता मूर्ख हो उस देश में तो खासकर लोकतंत्र मूर्खों का ही शासन बन जाता है। अधिकांश अनपढ और राजनीति से बेखबर रहनेवाले लोग भला मतदान का महत्‍व क्‍या समझेंगे ? विभिन्‍न समाजसेवियों का काम राजनीतिक सही ढंग से जनता को आगाह कर जनता के मध्‍य राजनीतिक चेतना को बनाए रखना होता था , पर न तो सच्‍चे समाजसेवी रह गए हैं और न ही प्रचारक । हमलोग भी सामाजिक या राजनीतिक रूप से कोई जबाबदेही न लेकर सिर्फ कलम चलाना जानते हैं । विभिन्‍न एन जी ओ भी अपने मुख्‍य उद्देश्‍य से कोसों दूर है। चुनाव के वक्‍त नेता और उसके प्रचारक घूम घूम कर उन्‍हें गुमराह करते हैं और जिस राजनीतिक पार्टी का मार्केटिंग जितना अच्‍छा होता है , वे उतने वोट प्राप्‍त कर लेते हैं।

अभी भी झारखंड में अधिक आबादी गरीबों और अशिक्षितों की ही है। मैने दो चार मुहल्‍ले में मतदान के बारे में जानकारी लेने की कोशिश की। कहीं भी कोई मुद्दा नहीं मिला , जिन्‍होने आकर मीठी मीठी बातें की , दुख सुख में साथ निभाने का वादा भर किया , कुछ नोट हाथ में दिए , पूरे मुहल्‍ले के वोट उसी को मिल गए। बिना जाने बूझे कि वो जिसे वोट दे रहे हैं , वो कौन है , किस चरित्र का है , किस पार्टी का है और उनके लिए क्‍या करेगा ? उनके मुहल्‍ले में न तो पढाई लिखाई की कोई व्‍यवस्‍था है और न ही कोई किसी प्रकार का ज्ञान देनेवाला है , बेचारे आराम से पैसों के बदले वोट गिरा आते हैं। जहां दस रूपए प्राप्‍त करने के लिए उन्‍हें एक घंटे की जी तोड मेहनत करनी पडती हो , वहां एक वोट गिराने में मुफ्त के एक समय खाने का प्रबंध भी हो जाए तो कम तो नहीं । इसके साथ मुहल्‍ले के एक दो लागों को कुछ काम के लिए भी पैसे मिल जाते हैं , गरीबों को और क्‍या चाहिए ,
जय लोकतंत्र !!




क्‍या कंप्‍यूटर और इंटरनेट के जानकार मेरी कुछ मदद कर सकते हैं ??

'ज्‍योतिष' विषय पर लिखे जा रहे मेरे इस ब्‍लॉग पर ज्‍योतिष के अलावे भी बहुत सामग्रियां पोस्‍ट की जा चुकी हैं , जो मिल जुलकर खिचडी हो गयी हैं।चूंकि उस समय मेरा और कोई दूसरा ब्‍लॉग नहीं था, मेरी मजबूरी थी कि मैने सारे आलेखों को यहीं पोस्‍ट कर दिया। पर अब मैने अपना एक और ब्‍लॉग बना लिया है , इसमें मौजूद ज्‍योतिष से इतर आलेखों को नए ब्‍लॉग पर टिप्‍पणियों सहित ले जाना चाहती हूं। क्‍या यह संभव हो सकता है , कृपया कंप्‍यूटर और इंटरनेट के जानकार इसकी जानकारी देने का कष्‍ट करें।




क्‍या कंप्‍यूटर और इंटरनेट के जानकार मेरी कुछ मदद कर सकते हैं ??

'ज्‍योतिष' विषय पर लिखे जा रहे मेरे इस ब्‍लॉग पर ज्‍योतिष के अलावे भी बहुत सामग्रियां पोस्‍ट की जा चुकी हैं , जो मिल जुलकर खिचडी हो गयी हैं।चूंकि उस समय मेरा और कोई दूसरा ब्‍लॉग नहीं था, मेरी मजबूरी थी कि मैने सारे आलेखों को यहीं पोस्‍ट कर दिया। पर अब मैने अपना एक और ब्‍लॉग बना लिया है , इसमें मौजूद ज्‍योतिष से इतर आलेखों को नए ब्‍लॉग पर टिप्‍पणियों सहित ले जाना चाहती हूं। क्‍या यह संभव हो सकता है , कृपया कंप्‍यूटर और इंटरनेट के जानकार इसकी जानकारी देने का कष्‍ट करें।




मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

नई पीढी करोडों को एक एक सिक्‍के देती हुई अपने लिए करोड की व्‍यवस्‍था नहीं कर सकती ??

इस पृथ्‍वी पर मनुष्‍य का अवतरण भी तो अन्‍य जीवों की तरह ही हुआ होगा , जहां प्रकृति ने सभी पशु पक्षियों को सिर्फ अपनी आवश्‍यकता को पूरा करने के लिए आवश्‍यक दिमाग प्रदान किया है , वहीं मनुष्‍य को ऐसी विलक्षण मस्तिष्‍क भेंट की है, जिसके कारण वह प्रकृति में मौजूद सारे रहस्‍यों को समझने और उनका सहारा लेकर अपने जीवन को सहज बनाने में प्रयासरत रहा। एक एक पशु पक्षी के कमजोरियों का पता कर उन्‍हें वश में करने और उनकी मजबूती से अपने जीवन को मजबूत बनाने का क्रम निरंतर चलता रहा। हजारों वर्षों के नियमित अध्‍ययन और मनन का परिणाम है हमारी ये जीवन शैली , जिसपर आज हम नाज करते हैं। प्राचीन भारत में कला और विज्ञान तथा गणित के हर क्षेत्र का इतना विकास हमारे पूर्वजों की महत्‍वाकांक्षाओं का ही परिणाम है ।

अन्‍य जीव जंतुओं की तरह ही आदिम मानव रहे हमारे पूर्वजों का क्रमश: सभ्‍य होते हुए इतने संगठित होकर जीवन यापन करने को देखते हुए एक बात तो साबित होती है कि मनुष्‍य स्‍वभावत: बहुत ही महत्‍वाकांक्षी होता है। वह अपनी वर्तमान स्थिति से संतुष्‍ट नहीं रहना चाहता और अपने को , अपने समाज को बेहतर बनाने के लिए प्रयास जारी रखता है। वैसे अलग अलग व्‍यक्ति उम्र के अलग अलग भाग में और जीवन के अलग अलग पक्ष को लेकर महत्‍वाकांक्षी होते हैं। व्‍यक्ति के महत्‍वाकांक्षा के जन्‍म लेने के पीछे भी कोई बडी वजह होती है। यदि सबकुछ कमजोर होते हुए भी सामान्‍य ढंग से चलता रहे , तो व्‍यक्ति महत्‍वाकांक्षी नहीं बन पाते हैं , पर किसी भी क्षेत्र में असामान्‍य परिस्थितियों के उपस्थित होने से जीवन बुरे ढंग से प्रभावित होता है , तो व्‍यक्ति उस संदर्भ में महत्‍वाकांक्षी बन जाता है। व्‍यक्ति उस खामी को समाप्‍त कर सबके जीवन को आसान बनाने की कोशिश में जुट जाता है।

इस प्रकार आजतक महत्‍वाकांक्षी व्‍यक्ति समाज के लिए वरदान बनकर सामने आते रहे हैं , पर आज अन्‍य शब्‍दों के साथ ही साथ महत्‍वाकांक्षा की भी परिभाषा बदल गयी है। आज का महत्‍वाकांक्षी व्‍यक्ति बहुत स्‍वार्थी होता जा रहा है , जो समाज के लिए घातक है। प्राचीन काल में प्रकृति के असीमित संसाधनों की रक्षा करते हुए और अतिरिक्‍त सामग्रियों का प्रयोग करते हुए , सभी जीव जंतुओं की रक्षा करते हुए और उसके गुणों से फायदा उठाते हुए और संपूर्ण मानव जाति के कल्‍याण की कामना से महत्‍वाकांक्षी व्‍यक्ति कार्यक्रम बनाते थे। हालांकि मध्‍ययुग में विदेशियों के आक्रमण के फलस्‍वरूप  उनके शासन काल के दौरान हमारा संपूर्ण ज्ञान , हमारी संपूर्ण व्‍यवस्‍था छिन्‍न भिन्‍न हो गयी , पर आजादी के समय महत्‍वाकांक्षी व्‍यक्तियों ने पुन: अपने स्‍वार्थों का त्‍याग कर , जीवन हथेली पर रखते हुए , मौत को आगोश में लेते हुए देश को आजादी दिलाने में बडी भूमिका निभायी।

संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि हमारी महत्‍वाकांक्षा ऐसी होनी चाहिए , जिससे प्रकृति की सुरक्षा को ध्‍यान में रखते हुए , इसके सारे जीव जंतुओं का कल्‍याण करते हुए मनुष्‍य के जीवन को अधिक से अधिक सुख सुविधा संपन्‍न बनाए , महत्‍वाकांक्षा ऐसी कभी नहीं होनी चाहिए , जो प्रकृति को तहस नहस करते हुए , सारे जीव जंतुओं का विनाश करते हुए अपनी मानव जाति के हित तक की चिंता न करते हुए सिर्फ अपने जीवन को अधिक सुख सुविधा संपन्‍न बनाएं । पर यह दुर्भाग्‍यपूर्ण है कि आज महत्‍वाकांक्षा का यही रूप देखने को मिल रहा है , पढाई भी इसी की हो रही है , करोडों लोगों की जेब से एक एक सिक्‍के निकालकर अपने लिए एक करोड बना लेने की शिक्षा तक आज  नई पीढी को दी जा रही है , जबकि उन्‍हें यह शिक्षा दिए जाने की आवश्‍यकता है कि कि वे करोडों के जेब में एक एक सिक्‍के डालते हुए अपने लिए करोड की व्‍यवस्‍था भी कर सकें।

पूरे एक महीने मिला मुझे अपने गुरू का सान्निध्‍य : धन्‍य धन्‍य हो गयी मैं !!

भारतीय संस्‍कृति में प्राचीन काल से ही पिता का विशेष महत्व है। वाल्मीकि(रामायण, अयोध्या काण्ड) में कहा गया है ... 





न तो धर्मचरणं किंचिदस्ति महत्तरम्‌।
यथा पितरि शुश्रूषा तस्य वा वचनक्रिपा॥
(यानि पिता की सेवा अथवा उनकी आज्ञा का पालन करने से बढ़कर कोई धर्माचरण नहीं है।)
दूसरी ओर यहां गुरू की महिमा भी कम नहीं आंकी गयी है ...
गुरू गोविन्‍द दोऊ खडे काके लागूं पायं।
बलिहारी गुरू आपनो गोविंद दियों बताए।।
यानि गुरू के पद को ईश्‍वर के बराबर महत्‍व दिया गया है। 

जब पिता और गुरू दोनों का अलग अलग इतना महत्‍व हो , उनकी तुलना बडे बडे धर्म और ईश्‍वर से की जाती हो और जब पिता ही किसी के गुरू बन जाएं, तो उसका स्‍थान स्‍वयमेव सबसे ऊंचा हो जाता है। इस दृष्टि से मेरे पिता श्री विद्या सागर महथा जी मेरे लिए ईश्‍वर से कम नहीं। मेरा रोम रोम उनका ऋणी माना जा सकता है, पर समाज की ऐसी व्‍यवस्‍था में मात्र पुत्री होने के कारण मैं इस कर्ज को किसी तरह नहीं उतार सकती। इसके अतिरिक्‍त ज्‍योतिष के क्षेत्र में किए गए उनके अध्‍ययन के कारण उनके चरित्र के सैकडों पहलुओं में से किसी एक का भी चित्रण ब्‍लॉग जगत में मौजूद बहुतों को नहीं पच पाएगा और मैं इस पवित्र पोस्‍ट को विवादास्‍पद नहीं बनाना चाहती। इसलिए चाहते हुए भी एक शिष्‍य के रूप में उनकी प्रतिभा, उनके संयमित जीवन, उनके सीख और उनके ज्ञान की चर्चा यहां नहीं करना चाहूंगी। समय आने पर सबके गुण अवगुण सामने आ ही जाते हैं। पर इतना अवश्‍य कहना चाहूंगी कि छह माह की उम्र में हुए चेचक से इनका स्‍वास्‍थ्‍य इतना बुरा हो गया था , इनके शरीर को इतना कष्‍ट था कि इनकी मुक्ति के लिए मेरी दादी जी इन्‍हें खुशी से बारंबार देवी मां को सौंपती थी कि वे इसे ले जाएं। पर देवी मां ने दादी जी की बात न मानकर हमारा बडा कल्‍याण किया, क्‍यूंकि इन्‍होने प्रकृति के एक बडे रहस्‍य को उजागर किया है , जिसे मैं 2011 के शुरूआत में दुनिया के सामने रखूंगी।
पूरे एक महीने के झारखंड प्रवास के बाद पिताजी वापस कल लौट गए , इस दौरान अधिकांश समय उन्‍होने बोकारो में ही व्‍यतीत किया , कहीं भी जाते , दो चार दिनों में पुन: मेरे यहां वापस हो जाते। विवाह के बाद मायके जाने पर ही कभी मुझे इतने दिनों तक साथ रहने का मौका मिला हो , पर इस बार मेरे घर पर उन्‍होने इतना समय दिया , वो मेरे जीवन में पहली बार हुआ। अपनी छह संतान में जितना स्‍नेह उन्‍होने मुझे दिया है , शायद ही किसी को मिला हो। मुझे तो यह देखकर ताज्‍जुब होता है कि सांसारिक सफलता की ओर कम ध्‍यान रहने के बावजूद बचपन से अभी तक की मेरी एक एक बात उन्‍हें याद रहती है। 

सात महीने की उम्र में पेट के बल चलती हुई साफ सुथरे घर में एक सरसों के दाने पर मेरी न सिर्फ दृष्टि ही गयी थी , उसे मैंने अपनी उंगलियों से पकड भी लिया था। डेढ वर्ष की उम्र में पलंग से अपने पैरों को नीचे कर तुतलाते हुए 'दिल' 'दिल' कहकर स्‍वयं के गिर जाने की उन्‍हें धमकी दिया करती थी। तीन वर्ष की उम्र में मैने हिंदी अक्षरों को पहचानना शुरू कर दिया था और 'फ' 'ल' 'फल' , 'च' 'ल' 'चल' पढना शुरू कर दिया था। चार वर्ष की उम्र में न सिर्फ 'ताली ताली तू तू तलती , दो हल डाली डाली फिरती' जैसी तुतलाती जुबान से 'कोयल रानी' की पूरी कविता सुनाया करती थी , वरन् 'छोटी चिडियां' नाम की कहानी को कंठस्‍थ कर लिया था और एक एक अर्द्धविराम , पूर्ण विराम पर जरूरत के अनुसार ठहराव के साथ लोगों को सुनाया करती थी। एक मां के लिए ये सब यादें स्‍वाभाविक है , पर पहली बार अपने पिता को मैने अपने जीवन की इतनी बातें याद रखते देखा है। मेरे मानसिक विकास पर कितनी पैनी निगाह थी उनकी ??

अध्‍यापन के अतिरिक्‍त भी मेरे पीछे उन्‍होने जितनी मेहनत की , अन्‍य भाई बहनों पर कभी उतना ध्‍यान नहीं दिया। अपने मामाजी के यहां से ग्रेज्‍युएशन करने के बाद मुझे बी एड कर लेने की सलाह दी गयी , पर मैने अर्थशास्‍त्र में स्‍नातकोत्‍तर की पढाई करने का फैसला किया। मेरे परिवार‍ में पहले किसी बहन ने गांव के स्‍कूल से मैट्रिक करने से अधिक पढाई नहीं की थी। पहली बार मेरे दादा जी और दादी जी मुझे हॉस्‍टल में डालने को तैयार नहीं थे। सो मैने एडमिशन लेकर घर में ही एम ए की पढाई करने का निश्‍चय किया। घर में ही दो वर्षों तक तैयारी की और फार्म भी भर लिया। एक एक पेपर की परीक्षा हर पांचवें दिन होनी थी। प्रत्‍येक परीक्षा से एक दिन पहले दोपहर के बाद वे मेरे साथ रांची के लिए निकलते , रातभर वहां कहीं ठहरते , सुबह परीक्षा देने के बाद अपने गांव वापस लौटते। यहां तक कि मैं चार घंटे परीक्षा भवन में होती , तो शहर में कई रिश्‍तेदार होने के बाद भी वे कहीं न जाते। उतनी देर भी वे गेट के बाहर ही टहलते रहते , इस भय से कि कहीं लडकों ने वॉक आउट किया तो ये कहां जाएगी। अन्‍य भाई बहनों पर इतना ध्‍यान देते मैने उन्‍हें कभी नहीं देखा।

अध्‍ययन मनन में विश्‍वास रखने वाले पिता जी का पद या अर्थोपार्जन के लिए पढाई लिखाई करने पर विश्‍वास नहीं था और यही कारण है कि सिर्फ अध्‍ययन मनन नहीं , वरन्  मौलिक चिंतन में मेरे लगे होने से वे अपनी परंपरा को जीवित देखकर मुझसे खुश बने रहें। वैसे तो ज्ञान का खजाना ही है उनके पास , जब भी मिलना होता है , उनकी उपस्थिति में सिर्फ कुछ न कुछ जानने और सीखने में ही मेरा ध्‍यान लगा होता है। 
ज्‍योतिष के बारे में तो उनसे चर्चा होनी ही थी , पर इस बार ज्‍योतिष के अलावे ब्‍लॉग जगत के बारे में भी बहुत बातें हुईं। मेरे आलेखों को पढकर, मेरे विचारों को समझकर और भविष्‍य के मेरे कार्यक्रमों को सुनकर काफी खुश और संतुष्‍ट होकर उन्‍होने यहां से विदाई ली। इस दुनिया से वे काफी निराश है , जो आर्थिक और सामाजिक उपलब्धियों को ही महत्‍व देते हें और किसी ज्ञान पिपासु , कलाकार और मेहनतकशों को भी बेकार समझते हैं।  वे एक बेहतर दुनिया का स्‍वप्‍न देखते हैं , पर सैद्धांतिक रूप से मजबूत होने के बावजूद अत्‍यधिक भावुकता होने तथा व्‍यवहारिकता की कमी से अपने सपने को पूरा नहीं कर पाते। वे मुझमें बडी उम्‍मीद देखते हैं , शायद मैं उनका सपना पूरा कर सकूं। 70 वर्ष की उम्र पार कर चुके पापा जी अभी पूर्ण रूप से स्‍वस्‍थ है और अभी भी दिन रात चिंतन में लगे हैं। मैं उनके स्‍वस्‍थ और दीर्घजीवी होने की कामना करती हूं !!




पूरे एक महीने मिला मुझे अपने गुरू का सान्निध्‍य : धन्‍य धन्‍य हो गयी मैं !!

भारतीय संस्‍कृति में प्राचीन काल से ही पिता का विशेष महत्व है। वाल्मीकि(रामायण, अयोध्या काण्ड) में कहा गया है ... 





न तो धर्मचरणं किंचिदस्ति महत्तरम्‌।
यथा पितरि शुश्रूषा तस्य वा वचनक्रिपा॥
(यानि पिता की सेवा अथवा उनकी आज्ञा का पालन करने से बढ़कर कोई धर्माचरण नहीं है।)
दूसरी ओर यहां गुरू की महिमा भी कम नहीं आंकी गयी है ...
गुरू गोविन्‍द दोऊ खडे काके लागूं पायं।
बलिहारी गुरू आपनो गोविंद दियों बताए।।
यानि गुरू के पद को ईश्‍वर के बराबर महत्‍व दिया गया है। 

जब पिता और गुरू दोनों का अलग अलग इतना महत्‍व हो , उनकी तुलना बडे बडे धर्म और ईश्‍वर से की जाती हो और जब पिता ही किसी के गुरू बन जाएं, तो उसका स्‍थान स्‍वयमेव सबसे ऊंचा हो जाता है। इस दृष्टि से मेरे पिता श्री विद्या सागर महथा जी मेरे लिए ईश्‍वर से कम नहीं। मेरा रोम रोम उनका ऋणी माना जा सकता है, पर समाज की ऐसी व्‍यवस्‍था में मात्र पुत्री होने के कारण मैं इस कर्ज को किसी तरह नहीं उतार सकती। इसके अतिरिक्‍त ज्‍योतिष के क्षेत्र में किए गए उनके अध्‍ययन के कारण उनके चरित्र के सैकडों पहलुओं में से किसी एक का भी चित्रण ब्‍लॉग जगत में मौजूद बहुतों को नहीं पच पाएगा और मैं इस पवित्र पोस्‍ट को विवादास्‍पद नहीं बनाना चाहती। इसलिए चाहते हुए भी एक शिष्‍य के रूप में उनकी प्रतिभा, उनके संयमित जीवन, उनके सीख और उनके ज्ञान की चर्चा यहां नहीं करना चाहूंगी। समय आने पर सबके गुण अवगुण सामने आ ही जाते हैं। पर इतना अवश्‍य कहना चाहूंगी कि छह माह की उम्र में हुए चेचक से इनका स्‍वास्‍थ्‍य इतना बुरा हो गया था , इनके शरीर को इतना कष्‍ट था कि इनकी मुक्ति के लिए मेरी दादी जी इन्‍हें खुशी से बारंबार देवी मां को सौंपती थी कि वे इसे ले जाएं। पर देवी मां ने दादी जी की बात न मानकर हमारा बडा कल्‍याण किया, क्‍यूंकि इन्‍होने प्रकृति के एक बडे रहस्‍य को उजागर किया है , जिसे मैं 2011 के शुरूआत में दुनिया के सामने रखूंगी।
पूरे एक महीने के झारखंड प्रवास के बाद पिताजी वापस कल लौट गए , इस दौरान अधिकांश समय उन्‍होने बोकारो में ही व्‍यतीत किया , कहीं भी जाते , दो चार दिनों में पुन: मेरे यहां वापस हो जाते। विवाह के बाद मायके जाने पर ही कभी मुझे इतने दिनों तक साथ रहने का मौका मिला हो , पर इस बार मेरे घर पर उन्‍होने इतना समय दिया , वो मेरे जीवन में पहली बार हुआ। अपनी छह संतान में जितना स्‍नेह उन्‍होने मुझे दिया है , शायद ही किसी को मिला हो। मुझे तो यह देखकर ताज्‍जुब होता है कि सांसारिक सफलता की ओर कम ध्‍यान रहने के बावजूद बचपन से अभी तक की मेरी एक एक बात उन्‍हें याद रहती है। 


सात महीने की उम्र में पेट के बल चलती हुई साफ सुथरे घर में एक सरसों के दाने पर मेरी न सिर्फ दृष्टि ही गयी थी , उसे मैंने अपनी उंगलियों से पकड भी लिया था। डेढ वर्ष की उम्र में पलंग से अपने पैरों को नीचे कर तुतलाते हुए 'दिल' 'दिल' कहकर स्‍वयं के गिर जाने की उन्‍हें धमकी दिया करती थी। तीन वर्ष की उम्र में मैने हिंदी अक्षरों को पहचानना शुरू कर दिया था और 'फ' 'ल' 'फल' , 'च' 'ल' 'चल' पढना शुरू कर दिया था। चार वर्ष की उम्र में न सिर्फ 'ताली ताली तू तू तलती , दो हल डाली डाली फिरती' जैसी तुतलाती जुबान से 'कोयल रानी' की पूरी कविता सुनाया करती थी , वरन् 'छोटी चिडियां' नाम की कहानी को कंठस्‍थ कर लिया था और एक एक अर्द्धविराम , पूर्ण विराम पर जरूरत के अनुसार ठहराव के साथ लोगों को सुनाया करती थी। एक मां के लिए ये सब यादें स्‍वाभाविक है , पर पहली बार अपने पिता को मैने अपने जीवन की इतनी बातें याद रखते देखा है। मेरे मानसिक विकास पर कितनी पैनी निगाह थी उनकी ??


अध्‍यापन के अतिरिक्‍त भी मेरे पीछे उन्‍होने जितनी मेहनत की , अन्‍य भाई बहनों पर कभी उतना ध्‍यान नहीं दिया। अपने मामाजी के यहां से ग्रेज्‍युएशन करने के बाद मुझे बी एड कर लेने की सलाह दी गयी , पर मैने अर्थशास्‍त्र में स्‍नातकोत्‍तर की पढाई करने का फैसला किया। मेरे परिवार‍ में पहले किसी बहन ने गांव के स्‍कूल से मैट्रिक करने से अधिक पढाई नहीं की थी। पहली बार मेरे दादा जी और दादी जी मुझे हॉस्‍टल में डालने को तैयार नहीं थे। सो मैने एडमिशन लेकर घर में ही एम ए की पढाई करने का निश्‍चय किया। घर में ही दो वर्षों तक तैयारी की और फार्म भी भर लिया। एक एक पेपर की परीक्षा हर पांचवें दिन होनी थी। प्रत्‍येक परीक्षा से एक दिन पहले दोपहर के बाद वे मेरे साथ रांची के लिए निकलते , रातभर वहां कहीं ठहरते , सुबह परीक्षा देने के बाद अपने गांव वापस लौटते। यहां तक कि मैं चार घंटे परीक्षा भवन में होती , तो शहर में कई रिश्‍तेदार होने के बाद भी वे कहीं न जाते। उतनी देर भी वे गेट के बाहर ही टहलते रहते , इस भय से कि कहीं लडकों ने वॉक आउट किया तो ये कहां जाएगी। अन्‍य भाई बहनों पर इतना ध्‍यान देते मैने उन्‍हें कभी नहीं देखा।


अध्‍ययन मनन में विश्‍वास रखने वाले पिता जी का पद या अर्थोपार्जन के लिए पढाई लिखाई करने पर विश्‍वास नहीं था और यही कारण है कि सिर्फ अध्‍ययन मनन नहीं , वरन्  मौलिक चिंतन में मेरे लगे होने से वे अपनी परंपरा को जीवित देखकर मुझसे खुश बने रहें। वैसे तो ज्ञान का खजाना ही है उनके पास , जब भी मिलना होता है , उनकी उपस्थिति में सिर्फ कुछ न कुछ जानने और सीखने में ही मेरा ध्‍यान लगा होता है। 
ज्‍योतिष के बारे में तो उनसे चर्चा होनी ही थी , पर इस बार ज्‍योतिष के अलावे ब्‍लॉग जगत के बारे में भी बहुत बातें हुईं। मेरे आलेखों को पढकर, मेरे विचारों को समझकर और भविष्‍य के मेरे कार्यक्रमों को सुनकर काफी खुश और संतुष्‍ट होकर उन्‍होने यहां से विदाई ली। इस दुनिया से वे काफी निराश है , जो आर्थिक और सामाजिक उपलब्धियों को ही महत्‍व देते हें और किसी ज्ञान पिपासु , कलाकार और मेहनतकशों को भी बेकार समझते हैं।  वे एक बेहतर दुनिया का स्‍वप्‍न देखते हैं , पर सैद्धांतिक रूप से मजबूत होने के बावजूद अत्‍यधिक भावुकता होने तथा व्‍यवहारिकता की कमी से अपने सपने को पूरा नहीं कर पाते। वे मुझमें बडी उम्‍मीद देखते हैं , शायद मैं उनका सपना पूरा कर सकूं। 70 वर्ष की उम्र पार कर चुके पापा जी अभी पूर्ण रूप से स्‍वस्‍थ है और अभी भी दिन रात चिंतन में लगे हैं। मैं उनके स्‍वस्‍थ और दीर्घजीवी होने की कामना करती हूं !!




रविवार, 20 दिसंबर 2009

एक ही दिन विज्ञान और ज्‍योतिष में दिलचस्‍पी रखने वाले दो लोग कैसे जन्‍म ले सकते हैं ??

भिन्‍न भिन्‍न वर्षों में भी किसी खास तिथि को जन्‍मलेने वालों की कुंडली में सूर्य की स्थिति बिल्‍कुल उसी स्‍थान पर होती है। इस एकमात्र सूर्य की स्थिति को ध्‍यान में रखते हुए ग्रंथों में जातक के फलाफल के बारे में बहुत कुछ लिखा मिलता है , जिसकी चर्चा ज्‍योतिषी बहुत दावे से किया करते हैं। इस आधार पर , चाहे वो ज्‍योतिषी हो या न्‍यूमरोलोजिस्‍ट और वे जिस भी विधा से भविष्‍यवाणी किया करते हों , यह पोस्‍ट उनकी विधा को विवादास्‍पद अवश्‍य बना रही है , जिसमें अलग अलग वर्षों में ही सही ,अरविंद मिश्रा जी के और मेरे एक ही दिन जन्‍म लेने की सूचना सारे ब्‍लॉग जगत को दी गयी है। पाठकों की जिज्ञासा स्‍वाभाविक है कि एक ही दिन विज्ञान और ज्‍योतिष जैसे विरोधाभासी विषय में जुनून से हद तक की दिलचस्‍पी रखने वाले यानि भिन्‍न भिन्‍न स्‍वभाव के दो लोग कैसे जन्‍म ले सकते हैं ?

मनुष्‍य मूलत: बहुत ही स्‍वार्थी होता है और किसी ऐसी व्‍यवस्‍था को पसंद नहीं करता , जिससे उसे अधिक समझौता करना पडे। इस कारण वह अपने जैसे स्‍वभाव के लोगों से मित्रता , संबंध और रिश्‍ते रखना चाहता है। कभी कभी वह इतना समर्थ होता है या उसके संयोग इतना काम करते हैं कि वह ऐसा करने में सफल हो जाता है , पर यदि शत प्रतिशत मामलों में यही प्रवृत्ति रहे , तो कुछ ही दिनों में विचारों के आधार पर ही तरह तरह के गुट बनेंगे , पारस्‍परिक मित्रता से लेकर , विवाह शादी तक अपने ही गुटों में होंगी और उसमें आनेवाली अगली पीढी भी उन्‍हीं विचारों को पसंद करेगी। इस हालत में विचारों से विरोध रखनेवाले बिल्‍कुल गैर हो जाएंगे और   अधिक शक्तिमान की मनमानी चलेगी। पर प्रकृति हमेशा एक औसत व्‍यवस्‍था में सबों को ले जाने की प्रवृत्ति रखती है , ताकि हर प्रकार के लोगों का एक दूसरों के विचारों से जोर शोर से टकराव हो और परिणामत: एक समन्‍वयवादी विचारधारा का जन्‍म हो, जिसके बल पर आगे का युग और प्रगतिशील बन सके। एक ही दिन में दो भिन्‍न विचारों वाले व्‍यक्ति का जन्‍म प्रकृति की ऐसी ही व्‍यवस्‍था में से एक हो सकती है।

यदि एक ज्‍योति‍षी की हैसियत से इस प्रश्‍न का जबाब दिया जाए तो यह बात कही जा सकती है कि विभिन्‍न कुंडलियों में सूर्य अलग अलग भाव का स्‍वामी होता है , इस कारण अलग अलग लग्‍न के अनुसार जातक पर सूर्य के प्रभाव का संदर्भ बदल जाता है , इस कारण आवश्‍यक नहीं कि दोनो का सूर्य एक हो तो दोनो के अध्‍ययन का विषय भी एक ही हो। सूर्य किसी के अध्‍ययन को प्रभावित कर सकता है , तो किसी के पद प्रतिष्‍ठा के माहौल को और किसी के घर गृहस्‍थी को। इसलिए इसके एक जैसे फल नहीं दिखाई पड सकते हैं। यदि ऐसा भी मान लिया जाए कि एक ही तिथि को जन्‍म लेनेवाले दो व्‍यक्ति एक ही लग्‍न के हों और सूर्य का प्रभाव दोनो के अध्‍ययन के विषय पर ही पडता हो , तो यह आवश्‍यक है कि दोनो में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और ऐसी रूचियां रहेंगी। ऐसी स्थिति में एक के विज्ञान के विषयों और एक के ज्‍योतिष पढने की संभावना तभी बन सकती है , जब ज्‍योतिष को भी विज्ञान का ही एक विषय मान लिया जाए।

पर अभी ज्‍योतिष को विज्ञान मानने में बडी बडी बाधाएं हैं । और इस कारण पाठकों के मन में यह भ्रांति है कि ज्‍योतिष को पढनेवाले अंधविश्‍वासी ही हैं , तभी मन में ऐसे प्रश्‍न जन्‍म लेते हैं। भले ही ज्‍योतिष इस स्थिति में नहीं पहुंच सका है कि इसे पूर्ण विज्ञान मान लिया जाए , पर वैज्ञानिक रूचि रखनेवाले जातक भी इसमें हमेशा से रहे हैं। इसमें से अंधविश्‍वासों को ढूंढ ढूंढकर अलग करने और इसके वैज्ञानिक पक्ष को इकट्ठे करने का काम करते जाया जाए , तो ज्‍योतिष को विज्ञान में बदलते देर नहीं लगेगी। पापा जी के 40 वर्षों के नियमित रिसर्च के बाद मैं भी इसी दिशा में प्रयासरत हूं और बहुत जल्‍द समाज के समक्ष ज्‍योतिष को विज्ञान के रूप में मान्‍यता दिलवाना मेरा लक्ष्‍य हैं। अरविंद मिश्रा जी ने नियंता के इस संकेत को स्‍वीकार कर लिया है कि विज्ञान और ज्योतिष का सहिष्णु साहचर्य रहे , आप सभी भी स्‍वीकार करेंगे , ऐसा मुझे विश्‍वास है।




एक ही दिन विज्ञान और ज्‍योतिष में दिलचस्‍पी रखने वाले दो लोग कैसे जन्‍म ले सकते हैं ??

भिन्‍न भिन्‍न वर्षों में भी किसी खास तिथि को जन्‍मलेने वालों की कुंडली में सूर्य की स्थिति बिल्‍कुल उसी स्‍थान पर होती है। इस एकमात्र सूर्य की स्थिति को ध्‍यान में रखते हुए ग्रंथों में जातक के फलाफल के बारे में बहुत कुछ लिखा मिलता है , जिसकी चर्चा ज्‍योतिषी बहुत दावे से किया करते हैं। इस आधार पर , चाहे वो ज्‍योतिषी हो या न्‍यूमरोलोजिस्‍ट और वे जिस भी विधा से भविष्‍यवाणी किया करते हों , यह पोस्‍ट उनकी विधा को विवादास्‍पद अवश्‍य बना रही है , जिसमें अलग अलग वर्षों में ही सही ,अरविंद मिश्रा जी के और मेरे एक ही दिन जन्‍म लेने की सूचना सारे ब्‍लॉग जगत को दी गयी है। पाठकों की जिज्ञासा स्‍वाभाविक है कि एक ही दिन विज्ञान और ज्‍योतिष जैसे विरोधाभासी विषय में जुनून से हद तक की दिलचस्‍पी रखने वाले यानि भिन्‍न भिन्‍न स्‍वभाव के दो लोग कैसे जन्‍म ले सकते हैं ?

मनुष्‍य मूलत: बहुत ही स्‍वार्थी होता है और किसी ऐसी व्‍यवस्‍था को पसंद नहीं करता , जिससे उसे अधिक समझौता करना पडे। इस कारण वह अपने जैसे स्‍वभाव के लोगों से मित्रता , संबंध और रिश्‍ते रखना चाहता है। कभी कभी वह इतना समर्थ होता है या उसके संयोग इतना काम करते हैं कि वह ऐसा करने में सफल हो जाता है , पर यदि शत प्रतिशत मामलों में यही प्रवृत्ति रहे , तो कुछ ही दिनों में विचारों के आधार पर ही तरह तरह के गुट बनेंगे , पारस्‍परिक मित्रता से लेकर , विवाह शादी तक अपने ही गुटों में होंगी और उसमें आनेवाली अगली पीढी भी उन्‍हीं विचारों को पसंद करेगी। इस हालत में विचारों से विरोध रखनेवाले बिल्‍कुल गैर हो जाएंगे और   अधिक शक्तिमान की मनमानी चलेगी। पर प्रकृति हमेशा एक औसत व्‍यवस्‍था में सबों को ले जाने की प्रवृत्ति रखती है , ताकि हर प्रकार के लोगों का एक दूसरों के विचारों से जोर शोर से टकराव हो और परिणामत: एक समन्‍वयवादी विचारधारा का जन्‍म हो, जिसके बल पर आगे का युग और प्रगतिशील बन सके। एक ही दिन में दो भिन्‍न विचारों वाले व्‍यक्ति का जन्‍म प्रकृति की ऐसी ही व्‍यवस्‍था में से एक हो सकती है।

यदि एक ज्‍योति‍षी की हैसियत से इस प्रश्‍न का जबाब दिया जाए तो यह बात कही जा सकती है कि विभिन्‍न कुंडलियों में सूर्य अलग अलग भाव का स्‍वामी होता है , इस कारण अलग अलग लग्‍न के अनुसार जातक पर सूर्य के प्रभाव का संदर्भ बदल जाता है , इस कारण आवश्‍यक नहीं कि दोनो का सूर्य एक हो तो दोनो के अध्‍ययन का विषय भी एक ही हो। सूर्य किसी के अध्‍ययन को प्रभावित कर सकता है , तो किसी के पद प्रतिष्‍ठा के माहौल को और किसी के घर गृहस्‍थी को। इसलिए इसके एक जैसे फल नहीं दिखाई पड सकते हैं। यदि ऐसा भी मान लिया जाए कि एक ही तिथि को जन्‍म लेनेवाले दो व्‍यक्ति एक ही लग्‍न के हों और सूर्य का प्रभाव दोनो के अध्‍ययन के विषय पर ही पडता हो , तो यह आवश्‍यक है कि दोनो में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और ऐसी रूचियां रहेंगी। ऐसी स्थिति में एक के विज्ञान के विषयों और एक के ज्‍योतिष पढने की संभावना तभी बन सकती है , जब ज्‍योतिष को भी विज्ञान का ही एक विषय मान लिया जाए।

पर अभी ज्‍योतिष को विज्ञान मानने में बडी बडी बाधाएं हैं । और इस कारण पाठकों के मन में यह भ्रांति है कि ज्‍योतिष को पढनेवाले अंधविश्‍वासी ही हैं , तभी मन में ऐसे प्रश्‍न जन्‍म लेते हैं। भले ही ज्‍योतिष इस स्थिति में नहीं पहुंच सका है कि इसे पूर्ण विज्ञान मान लिया जाए , पर वैज्ञानिक रूचि रखनेवाले जातक भी इसमें हमेशा से रहे हैं। इसमें से अंधविश्‍वासों को ढूंढ ढूंढकर अलग करने और इसके वैज्ञानिक पक्ष को इकट्ठे करने का काम करते जाया जाए , तो ज्‍योतिष को विज्ञान में बदलते देर नहीं लगेगी। पापा जी के 40 वर्षों के नियमित रिसर्च के बाद मैं भी इसी दिशा में प्रयासरत हूं और बहुत जल्‍द समाज के समक्ष ज्‍योतिष को विज्ञान के रूप में मान्‍यता दिलवाना मेरा लक्ष्‍य हैं। अरविंद मिश्रा जी ने नियंता के इस संकेत को स्‍वीकार कर लिया है कि विज्ञान और ज्योतिष का सहिष्णु साहचर्य रहे , आप सभी भी स्‍वीकार करेंगे , ऐसा मुझे विश्‍वास है।




शनिवार, 19 दिसंबर 2009

क्‍या सिर्फ टी वी , फ्रिज , वाशिंग मशीन , कार और ए सी ही सुख का अहसास करा सकते हैं ??

आज सरकारी विद्यालयों और महाविद्यालयों में अच्‍छी पढाई न होने से समाज के मध्‍यम वर्ग की जीवनशैली पर बहुत ही बुरा असर पड रहा है। चार वर्ष के अपने बच्‍चे का नामांकण किसी अच्‍छे विद्यालय में लिखाने के लिए हम परेशान रहते हैं , क्‍यूंकि उसके बाद 12 वीं तक की उसकी पढाई का सारा तनाव समाप्‍त हो जाता है। यदि उस बच्‍चे का उस विद्यालय के के जी या नर्सरी में नाम नहीं लिखा सका तो बाद में उस विद्यालय में नाम लिखाना मुश्किल है। जिनकी सिर्फ खेलने कूदने की उम्र होती है , उनका कई कई कि मी दूर के उस विद्यालय में नामांकण से अभिभावक भले ही निश्चिंत हो जाते हों , पर उस दिन से बच्‍चों का बचपन ही समाप्‍त हो जाता है। विद्यालय के अंदर पढाई का वातावरण अच्‍छा भी हो , पर वहां आने और जाने में बच्‍चों को जो व्‍यर्थ का समय लगता है , उससे उनके खाने पीने पर अच्‍छा खासा असर पडता है। यहीं से उसके शारिरीक तौर पर कमजोरी की शुरूआत हो जाती है। देश में सबसे पहले ऐसी व्‍यवस्‍था होनी चाहिए कि पांचवी कक्षा तक की पढाई के लिए हर बच्‍चे के अपने मुहल्‍ले में ही व्‍यवस्‍था हो और पांचवीं के बाद ही मुहल्‍ले के बाहर जाना पडे । दस वर्ष तक के बच्‍चों को मामूली पढाई के लिए इतनी दूर भेजा जाना क्‍या उचित है ??

बारहवीं के बाद बच्‍चे कॉलेज की पढाई के लिए परिवार से कितने दूर चले जाएंगे , वे खुद भी नहीं जानते। देश में हर क्षेत्र और हर विषय में कॉलेजों का रैंकिंग हैं। प्रतिभा के अनुसार बच्‍चों के नामांकण होते हैं । अच्‍छे कॉलेजों से पढाई करने के बाद बच्‍चों का कैरियर अपेक्षाकृत अधिक उज्‍जवल दिखता है , इसलिए उसमें पढाने के लिए बच्‍चे मां बाप से दूर देश के किसी कोने में चले जाते हैं। कम प्रतिभावाले बच्‍चे को भी जुगाड लगाकर या ऊंची फी के साथ दूर दराज के कॉलेजों में नामांकण करा दिया जाता है। हम सभी जानते हैं कि किशोरावस्‍था और युवावस्‍था के मध्‍य के इस समयांतराल में बच्‍चों को परिवार या सच्‍चे गुरू  के साथ की आवश्‍यकता होती है , पर ऐसे समय में अकेलापन कभी कभी उन्‍हें गुमराह कर देता है और जीवनभर उन्‍हें भटकने से नहीं बचा पाता। वास्‍तव में सरकार की यह जिम्‍मेदारी होनी चाहिए कि हर जिले में हर क्षेत्र और हर विषय के हर स्‍तर के कॉलेज हों और प्रतिभा के अनुसार उनका अपने जिले के कॉलेजों में ही नाम लिखा जाए , ताकि वे सप्‍ताहांत या माहांत में परिवार से मिलकर अपने सुख दुख शेयर कर सकें। पर  ऐसा नहीं होने से क्‍या हमारे किशोरों को भटकने को बाध्‍य नहीं किया जा रहा ??

हमारी पूरी कॉलोनी में 60 प्रतिशत किराएदार परिवार ऐसे होंगे , जिनके पति नौकरी में तीन तीन वर्षों  में स्‍थानांतरण का दर्द खुद झेलते हुए अपने पढाई लिखाई कर रहे बच्‍चों को कोई तकलीफ नहीं देना चाहते और बोकारो के अच्‍छे विद्यालय में अपने बच्‍चों का नामांकण करवाकर पत्‍नी को बच्‍चों की देखभाल के लिए साथ छोड देते हैं। झारखंड में रांची और जमशेदपुर में भी बहुत मांएं बच्‍चों को अच्‍छे स्‍कूलों में पढाने के लिए अकेले रहने को विवश हैं। जबतक बच्‍चे बारहवीं से नहीं निकलते , पूरा परिवार पर्व त्‍यौहारों में भी मुश्किल से साथ रह पाता है। अनियमित रूटीन से पति के स्‍वास्‍थ्‍य पर असर पडता है , पति की अनुपस्थिति में पत्‍नी पर पडी जिम्‍मेदारी भी कम नहीं होती । घर में पापा के न होने से बच्‍चें की उच्‍छृंखलता भी बढती है। वास्‍तव में सरकार की यह जिम्‍मेदारी होनी चाहिए कि अपने कर्मचारियों का जहां स्‍थानांतरण करवाए , वहां उसके बच्‍चों के लिए पढाई की सुविधा हो। इसके अभाव में क्‍या कोई परिवार सही जीवन जी पा रहा है ??

परिवार का एक एक सदस्‍य बिखरा रहे , हर उम्र के हर व्‍यक्ति कष्‍ट में हों तो हमारी समझ में यह नहीं आता कि हम सुखी कैसे हैं ? क्‍या सिर्फ टी वी , फ्रिज , वाशिंग मशीन , कार , ए सी ही सुख का अहसास करा सकते हैं ??




इस खास जन्‍मदिन पर कुछ पुरानी यादें .....

चाहे सुखभरी हों या दुखभरी , बचपन की यादें कभी हमारा पीछा नहीं छोडती। खासकर जब भी कोई विशेष मौका आता है , पुरानी यादें अवश्‍य ताजी हो जाती हैं। जिस संयुक्‍त परिवार में मेरा जन्‍म हुआ, उसमें उस समय दादा जी , दादी जी के अलावे उनके पांच बेटों के साथ साथ दो बेटों का परिवार भी था, दो चाचाजी उस समय अविवाहित ही थे। पर मेरे बडे होने तक दो और के विवाह हो गए थे और कुछ नौकरों चाकरों को लेकर 35 लोगों का परिवार था। पांच बेटे में इकलौती प्‍यारी बिटिया से दूर होना दादा जी और दादी जी के लिए बहुत कठिन था , सो उनका विवाह भी गांव में ही किया गया था। पर्व, त्‍यौहार या जन्‍मदिन वगैरह किसी कार्यक्रम में अपने पांच बच्‍चों सहित बुआ और फूफा जी की उपस्थिति हमारे यहां अनिवार्य थी , जिसके कारण बिना किसी को निमंत्रित किए हमलोगों की संख्‍या 45 तक पहुंच जाती थी।

हमारे घर में हिन्‍दी पत्रक से ही बच्‍चे-बडे सबका जन्‍मदिन मनाया जाता था। उस समय केक काटने की तो कोई प्रथा ही नहीं थी, नए कपडे भी नहीं बनते थे। सिर्फ खीर पूडी या अन्‍य कोई पकवान बनता , भगवान जी को भोग लगाया जाता और सारे लोग मिलजुलकर खुशी खुशी खाते पीते। हर महीने में दो तीन लोगों के जन्‍मदिन तो निकलने ही थे। कम से कम 3-4 किलो चावल के खीर के लिए 15 किलो से अधिक ही दूध की व्‍यवस्‍था होती , पीत्‍तल की एक खास बडी सी कडाही को निकाला जाता , खीर बनते ही दादी जी 40 से अधिक कटोरे में उसे ठंडा होने को रखती , फिर उसमें से एक कटोरे के खीर का बच्‍चे द्वारा भगवान जी को भोग लगाया जाता। कई अन्‍य व्‍यंजन बनते , उसके बाद खाना पीना शुरू किया जाता।

पर 1963 के दिसंबर में एक बडी समस्‍या उपस्थित हो गयी थी। 27 नवम्‍बर 1954 को पौष शुक्‍ल पक्ष की द्वितीया को जन्‍म लेनेवाले छोटे चाचा जी का जन्‍मदिन मनाने के लिए तिथि निश्चित करने की समस्‍या खडी हो गयी थी। ऐसा इसलिए क्‍यूंकि उस वर्ष के पंचांग में 15 दिनों का मार्गशीर्ष और पंद्रह दिनों का पौष ही था। आखिरकार 18 दिसम्‍बर को पौष महीने की शुक्‍ल पक्ष की तिथि को देखते हुए उनका जन्‍मदिन मनाने का निश्‍चय किया गया। रात 11 बजे तक घर में उत्‍सवी वातावरण में व्‍यस्‍त रही मम्‍मी की 11 बजे के बाद तबियत खराब हो गयी और वे 19 दिसंबर की सुबह मेरे जन्‍म के बाद ही सामान्‍य हो सकी। इस तरह हिन्‍दी पंचांग के अनुसार मेरा जन्‍म ऐसे पौष महीने के शुक्‍ल पक्ष की तृतीया तिथि में हुआ है , जो एक ही पक्ष का यानि 15 दिनों का ही था। सौरवर्ष के साथ चंद्र वर्ष का तालमेल करने के क्रम में बहुत वर्षों बाद ही पंचांग में इस तरह का समायोजन किया जाता है।

यूं तो परिवार में हर महीने कई जन्‍मदिन मनाए जाते थे , पर ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था कि एक जन्‍मदिन के दूसरे ही दिन दूसरा जन्‍मदिन हो , जैसा कि दूसरे वर्ष मेरे पहले जन्‍मदिन में आया,चाचा जी के जन्‍मदिन के बाद दूसरे ही दिन मेरा। लगातार एक जैसा कार्यक्रम तो निराश करता है , पहले वर्ष तो सबने विधि अनुसार ही किया , पर दूसरे वर्ष से मेरे जन्‍मदिन में भगवान जी को मिठाई का भोग लगने लगा , मुझे चाचाजी के जन्‍मदिन का बचा खीर चखाया जाता रहा और अन्‍य लोगों के लिए अलग पकवान की व्‍यवस्‍था की जाने लगी। जब मैं बडी हुई तो मैने अपना जन्‍मदिन अन्‍य लोगों से भिन्‍न तरीके से मनता पाया , तब मुझे सारी बाते बतायी गयी । मुझे मीठा अधिक पसंद भी नहीं , इसलिए कभी भी खीर बनाने की जिद नहीं की और अपेक्षाकृत कम मीठे पुए से ही खुश होती रही।

पर विवाह के बाद आजतक मेरा जन्‍मदिन अंग्रेजी तिथि के अनुसार ही मनाया जाता रहा। वर्ष 2009 का मेरा यह जन्‍मदिन इसलिए बहुत ही खास हो गया है , क्‍यूंकि जहां आज एक ओर दिसम्‍बर की 19 तारीख है , वहीं दूसरी ओर पौष महीने के शुक्‍ल पक्ष की तृतीया भी , यानि इस जन्‍मदिन मे सूर्य के साथ साथ चंद्रमा की स्थिति भी उसी जगह है , जहां मेरे जनम के समय थी। इसके अलावे इस जन्‍मदिन पर मेरे खुश रहने का एक और भी वजह है कि बहुत दिनों बाद मेरे यहां जन्‍मदिन पर पापा जी की उपस्थिति का संयोग भी इसी बार बना है। इसलिए बचपन की यादें और ताजी हो गयी हैं। मेरे जन्‍मदिन में बनाए जानेवाले हमारे क्षेत्र के परंपरागत व्‍यंजनों में से दो का मजा आप भी लें .....

1. पुआ .. एक कप सुगंधित महीन चावल को आधा भीगने के बाद छानकर एक कप खौलते दूध मे डालकर व खौलाकर आधे घंटे छोड दें। उसके बाद उसे पीसकर उसमें स्‍वादानुसार शक्‍कर , कटी हुई गरी , किशमिश , इलायची वगैरह डालकर बिल्‍कुल गाढे घोल को ही रिफाइंड में तलें , स्‍वादिष्‍ट चावल के पुए तैयार मिलेंगे। दूध और शक्‍कर कुछ कम ही डालें , नहीं तो घोल रिफाइंड में ही रह जाएगा।

2. धुसका .. दो कप चावल और एक कप चने के दाल को अच्‍छी तरह भीगने दें , फिर उसे पीसते वक्‍त उसमें थोडी प्‍याज , हरी मिर्च और अदरक डालें , पुए की अपेक्षा थोडे ढीले घोल में नमक , धनिया तथा जीरा का पाउडर डालकर उसे रिफाइंड में तले , यह नमकीन पुआ हमारे यहां 'धुसका' कहा जाता है , जिसे देशी चने के गरमागरम छोले के साथ खाएं !!

दो तीन दिनों से मुझे निरंतर जन्‍मदिन की बधाई और शुभकामनाएं मिल रही हैं, सबों को बहुत बहुत धन्‍यवाद।  उम्‍मीद रखती हूं , आप सबो का स्‍नेह इसी प्रकार बना रहेगा !!




इस खास जन्‍मदिन पर कुछ पुरानी यादें .....

चाहे सुखभरी हों या दुखभरी , बचपन की यादें कभी हमारा पीछा नहीं छोडती। खासकर जब भी कोई विशेष मौका आता है , पुरानी यादें अवश्‍य ताजी हो जाती हैं। जिस संयुक्‍त परिवार में मेरा जन्‍म हुआ, उसमें उस समय दादा जी , दादी जी के अलावे उनके पांच बेटों के साथ साथ दो बेटों का परिवार भी था, दो चाचाजी उस समय अविवाहित ही थे। पर मेरे बडे होने तक दो और के विवाह हो गए थे और कुछ नौकरों चाकरों को लेकर 35 लोगों का परिवार था। पांच बेटे में इकलौती प्‍यारी बिटिया से दूर होना दादा जी और दादी जी के लिए बहुत कठिन था , सो उनका विवाह भी गांव में ही किया गया था। पर्व, त्‍यौहार या जन्‍मदिन वगैरह किसी कार्यक्रम में अपने पांच बच्‍चों सहित बुआ और फूफा जी की उपस्थिति हमारे यहां अनिवार्य थी , जिसके कारण बिना किसी को निमंत्रित किए हमलोगों की संख्‍या 45 तक पहुंच जाती थी।

हमारे घर में हिन्‍दी पत्रक से ही बच्‍चे-बडे सबका जन्‍मदिन मनाया जाता था। उस समय केक काटने की तो कोई प्रथा ही नहीं थी, नए कपडे भी नहीं बनते थे। सिर्फ खीर पूडी या अन्‍य कोई पकवान बनता , भगवान जी को भोग लगाया जाता और सारे लोग मिलजुलकर खुशी खुशी खाते पीते। हर महीने में दो तीन लोगों के जन्‍मदिन तो निकलने ही थे। कम से कम 3-4 किलो चावल के खीर के लिए 15 किलो से अधिक ही दूध की व्‍यवस्‍था होती , पीत्‍तल की एक खास बडी सी कडाही को निकाला जाता , खीर बनते ही दादी जी 40 से अधिक कटोरे में उसे ठंडा होने को रखती , फिर उसमें से एक कटोरे के खीर का बच्‍चे द्वारा भगवान जी को भोग लगाया जाता। कई अन्‍य व्‍यंजन बनते , उसके बाद खाना पीना शुरू किया जाता।

पर 1963 के दिसंबर में एक बडी समस्‍या उपस्थित हो गयी थी। 27 नवम्‍बर 1954 को पौष शुक्‍ल पक्ष की द्वितीया को जन्‍म लेनेवाले छोटे चाचा जी का जन्‍मदिन मनाने के लिए तिथि निश्चित करने की समस्‍या खडी हो गयी थी। ऐसा इसलिए क्‍यूंकि उस वर्ष के पंचांग में 15 दिनों का मार्गशीर्ष और पंद्रह दिनों का पौष ही था। आखिरकार 18 दिसम्‍बर को पौष महीने की शुक्‍ल पक्ष की तिथि को देखते हुए उनका जन्‍मदिन मनाने का निश्‍चय किया गया। रात 11 बजे तक घर में उत्‍सवी वातावरण में व्‍यस्‍त रही मम्‍मी की 11 बजे के बाद तबियत खराब हो गयी और वे 19 दिसंबर की सुबह मेरे जन्‍म के बाद ही सामान्‍य हो सकी। इस तरह हिन्‍दी पंचांग के अनुसार मेरा जन्‍म ऐसे पौष महीने के शुक्‍ल पक्ष की तृतीया तिथि में हुआ है , जो एक ही पक्ष का यानि 15 दिनों का ही था। सौरवर्ष के साथ चंद्र वर्ष का तालमेल करने के क्रम में बहुत वर्षों बाद ही पंचांग में इस तरह का समायोजन किया जाता है।

यूं तो परिवार में हर महीने कई जन्‍मदिन मनाए जाते थे , पर ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था कि एक जन्‍मदिन के दूसरे ही दिन दूसरा जन्‍मदिन हो , जैसा कि दूसरे वर्ष मेरे पहले जन्‍मदिन में आया,चाचा जी के जन्‍मदिन के बाद दूसरे ही दिन मेरा। लगातार एक जैसा कार्यक्रम तो निराश करता है , पहले वर्ष तो सबने विधि अनुसार ही किया , पर दूसरे वर्ष से मेरे जन्‍मदिन में भगवान जी को मिठाई का भोग लगने लगा , मुझे चाचाजी के जन्‍मदिन का बचा खीर चखाया जाता रहा और अन्‍य लोगों के लिए अलग पकवान की व्‍यवस्‍था की जाने लगी। जब मैं बडी हुई तो मैने अपना जन्‍मदिन अन्‍य लोगों से भिन्‍न तरीके से मनता पाया , तब मुझे सारी बाते बतायी गयी । मुझे मीठा अधिक पसंद भी नहीं , इसलिए कभी भी खीर बनाने की जिद नहीं की और अपेक्षाकृत कम मीठे पुए से ही खुश होती रही।

पर विवाह के बाद आजतक मेरा जन्‍मदिन अंग्रेजी तिथि के अनुसार ही मनाया जाता रहा। वर्ष 2009 का मेरा यह जन्‍मदिन इसलिए बहुत ही खास हो गया है , क्‍यूंकि जहां आज एक ओर दिसम्‍बर की 19 तारीख है , वहीं दूसरी ओर पौष महीने के शुक्‍ल पक्ष की तृतीया भी , यानि इस जन्‍मदिन मे सूर्य के साथ साथ चंद्रमा की स्थिति भी उसी जगह है , जहां मेरे जनम के समय थी। इसके अलावे इस जन्‍मदिन पर मेरे खुश रहने का एक और भी वजह है कि बहुत दिनों बाद मेरे यहां जन्‍मदिन पर पापा जी की उपस्थिति का संयोग भी इसी बार बना है। इसलिए बचपन की यादें और ताजी हो गयी हैं। मेरे जन्‍मदिन में बनाए जानेवाले हमारे क्षेत्र के परंपरागत व्‍यंजनों में से दो का मजा आप भी लें .....

1. पुआ .. एक कप सुगंधित महीन चावल को आधा भीगने के बाद छानकर एक कप खौलते दूध मे डालकर व खौलाकर आधे घंटे छोड दें। उसके बाद उसे पीसकर उसमें स्‍वादानुसार शक्‍कर , कटी हुई गरी , किशमिश , इलायची वगैरह डालकर बिल्‍कुल गाढे घोल को ही रिफाइंड में तलें , स्‍वादिष्‍ट चावल के पुए तैयार मिलेंगे। दूध और शक्‍कर कुछ कम ही डालें , नहीं तो घोल रिफाइंड में ही रह जाएगा।

2. धुसका .. दो कप चावल और एक कप चने के दाल को अच्‍छी तरह भीगने दें , फिर उसे पीसते वक्‍त उसमें थोडी प्‍याज , हरी मिर्च और अदरक डालें , पुए की अपेक्षा थोडे ढीले घोल में नमक , धनिया तथा जीरा का पाउडर डालकर उसे रिफाइंड में तले , यह नमकीन पुआ हमारे यहां 'धुसका' कहा जाता है , जिसे देशी चने के गरमागरम छोले के साथ खाएं !!

दो तीन दिनों से मुझे निरंतर जन्‍मदिन की बधाई और शुभकामनाएं मिल रही हैं, सबों को बहुत बहुत धन्‍यवाद।  उम्‍मीद रखती हूं , आप सबो का स्‍नेह इसी प्रकार बना रहेगा !!





शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

ये रही मेरी 250 वीं पोस्‍ट .. आप सभी पाठकों का बहुत बहुत शुक्रिया !!

यदि आप अभी मेरी प्रोफाइल खोलकर देखे , तो आपको 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' में कुल 279 पोस्‍ट दिखाई पडेंगे , पर सही समय या संपादन के अभाव में सारी पोस्‍टें प्राकशित नहीं की जा सकी है और आज मै इसमें 250वां आलेख ही पोस्‍ट कर रही हूं। इसलिए मेरे इस ब्‍लॉग में कुल प्रविष्टियां 250 ही दिखाई पडेंगी। इसके अलावे अन्‍य जगहों पर लिखी गयी सारी पोस्‍टों को सम्मिलित कर दिया जाए , तो मेरे आलेखों की संख्‍या बहुत ऊपर चली जाएगी। वर्डप्रेस के अपने पुराने ब्‍लॉग पर मैं सौ से ऊपर पोस्‍ट लिख चुकी हूं, 'फलित ज्‍योतिष : सच या झूठ' में मैं दो पोस्‍ट लिख चुकी , साहित्‍य शिल्‍पी में पांच कहानियां छप चुकी , नुक्‍कड में दस पोस्‍ट कर चुकी , मां पर दो आलेख पोस्‍ट किए । इसके अलावे मोल तोल डॉट इन पर पिछले नवम्‍बर से हर सप्‍ताह एक आलेख पोस्‍ट कर रही हूं। इस उपलब्धि पर मुझे खुद आश्‍चर्य हो रहा है। 

बचपन से ही पढाई लिखाई और अन्‍य मामलों में हर बात को गहराई में जाकर देखने की आदत से मैं अनुभव तो रखती थी ,  पर उन्‍हें कलम की सहायता से पन्‍नों में सटीक अभिव्‍यक्ति दे सकती हूं , इसपर मुझे खुद ही विश्‍वास नहीं था। यही कारण था कि 1990 के आसपास हमारे कॉलोनी के 'हिन्‍दी साहित्‍य परिषद' की 25वीं सालगिरह पर प्रकाशित हो रहे स्‍मारिका में मुझसे एक रचना मांगी गयी , तो मैं 'ना' तो नहीं कर सकी थी , पर इस फिराक में थी कि पापाजी के ढेरो रचनाओं में से , जो कि यूं ही कबाड की तरह पडी हुई हैं , एक अपने नाम से प्रकाशित कर दूं।  पर मुझे इतना समय ही नहीं दिया गया कि मैं उन्‍हें मंगवा सकती और दबाब में कुछ लिखने बैठ गयी। कुछ दिन पूर्व मेरे पति के हाथ में ज्‍योतिष की एक पत्रिका , जो वे मेरे लिए ला रहे थे , को देखकर एक व्‍यक्ति ने उनसे कुछ प्रश्‍न पूछे थे , उन्‍हीं का जबाब देने में मैने एक आलेख 'फलित ज्‍योतिष : सांकेतिक विज्ञान' लिखकर उन्‍हें सौंप दिया , इस तरह मेरी पहली रचना उसी स्‍मारिका में छप सकी।

इस तरह मेरी जन्‍मकुंडली में चौथे भाव में स्थित स्‍वक्षेत्री बृहस्‍पति ने दूसरे की लिखी रचना का श्रेय मुझे न देकर मुझे एक पाप से भी बचा लिया था। भले ही मांगे जाने पर मेरे पिताजी अपनी रचना मुझे सहर्ष सौंप देते , पर आज मुझे महसूस होता है कि कोई भी रचनाकार या तो अपने व्‍यवसाय या फिर मजबूरी के कारण ही रचना का श्रेय किसी और को  देता है। माता पिता बच्‍चों के लिए तन, मन और धन ही नहीं , जीवन भी समर्पित कर देते हैं , ऐसी घटना इतिहास में मिल जाएगी , पर कहीं भी ऐसा पढने को नहीं मिला कि अपनी कृति को किसी ने अपनी संतान के नाम कर दिया। इससे यह भी स्‍पष्‍ट है कि किसी की रचना को चुराकर अपने नाम से प्रकाशित करना एक जुर्म ही है , यदि किसी के विचारों का प्रचार प्रसार करना है तो लेखक को सहयोग की जा सकती है , पर कभी भी रचना के मालिक बनने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए। 

इस रचना के बाद ही अपने भावों को अभिव्‍यक्ति देने की मेरी हिम्‍मत बढ गयी थी। मैने कई ज्‍योतिषीय पत्रिकाओं , खासकर  'बाबाजी' के लिए लिखना शुरू कर दिया था , पापाजी द्वारा प्रदान किए गए ज्‍योतिषीय ज्ञान के कारण विषयवस्‍तु की प्रचुरता से लेखों को तैयार करने में भले ही मुझे कामयाबी मिलती गयी और इसी कारण उन्‍हें प्रकाशित भी कर दिया जाता रहा , पर उस वक्‍त का लेखन भाषा की दृष्टि से आज भी मुझे काफी कमजोर दिखता है। फिर भी यह भाग्‍य की ही बात रही कि सिर्फ फोन पर हुए बातचीत के बाद ही बाबाजी में प्रकाशित किए गए आलेखों के संकलन के रूप में तैयार मुझ जैसी नई और अनुभवहीन लेखिका की पुस्‍तक को छापने के लिए दिल्‍ली का एक प्रकाशन 'अजय बुक सर्विस' तैयार हो गया और इस तरह मेरी पहली पुस्‍तक न सिर्फ  बाजार में आ गयी, बल्कि डेढ वर्ष के अंदर बाजार में धडाधड उसकी प्रतियां भी बिकी और तुरंत इसका दूसरा संस्‍करण भी प्रकाशित करवाना पडा।

यहां तक की यात्रा में मैने सिर्फ ज्‍योतिष पर ही लिखा। हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत में आने के बाद भी काफी दिनों तक मैं ज्‍योतिष पर ही लिखती रही , क्‍यूंकि मुझे विश्‍वास ही नहीं था कि मैं किसी अन्‍य विषय पर भी कुछ लिख सकती हूं। पर धीरे धीरे अंधविश्‍वास को दूर करने वाली कुछ घटनाओं , कई संस्‍मरण , मनोविज्ञान , धर्म आदि के मामलों में दखल देते हुए हर मामले पर कुछ न कुछ लिखने का प्रयास करती जा रही हूं। आप पाठकों की स्‍नेह भरी प्रतिक्रियाओं ने मुझे हर विषय पर कलम चलाने की शक्ति दी है और इसके लिए आपका जितना भी आभार व्‍यक्‍त करूं कम ही होगा। आगे भी आप सबों का स्‍नेह इसी प्रकार बना रहेगा , ऐसी आशा और विश्‍वास के साथ यह पोस्‍ट समाप्‍त करती हूं।