मंगलवार, 10 नवंबर 2009

कीडे मकोडे भी जोडा बनाकर ही रहते हैं ??

कीडो मकोडो से मुझे जितना भय है , कीडे मकोडे हमें उतना ही परेशान करते हैं। बोकारो स्‍टील सिटी के सेक्‍टर 4 के जिस क्‍वार्टर में हमें पहली बार ठीक बरसात में रहने की शुरूआत करनी पडी , वहां कीडे मकोडो के नई नई प्रजातियों को देखने का मौका मिला। रसोई घर के सीपेज वाली एक दीवाल में न जाने कितने छेद थे और सबों से अक्‍सर तरह तरह के कीडे मुझे मुंह चिढाते। कीटनाशक के छिडकाव से कोई कीडा मर जाता , तो थोडी देर बाद उसका जोडा अवश्‍य निकलकर कुछ समझने की कोशिश करता था। उबले आलू के चार फांक कर दें , तो जो शेप बनता है , बिल्‍कुल उसी शेप को वहां एक दिन चलते हुए देखा , तो मैं चौंक ही गयी थी। ऐसे भी कीडे होते हैं ? दो तीन महीने बडी मुश्किल से कीटनाशकों के बल पर मैं उस रसोई में खाना बनाने में समर्थ हो सकी थी। फिर अक्‍तूबर में उस दीवाल के नए सिरे से प्‍लास्‍टर हो जाने के बाद ही हमें समस्‍या से निजात मिल सकी थी।

बोकारो में पेड पौधो की अधिकता है , इस कारण अलग अलग डिजाइनों वाली तितली या पतंगे या कीडे मकोडे को भी रहने की जगह मिल जाती है। मेरे उसी क्‍वार्टर में एक कमरे में एक ही खिडकी थी, उसी से अक्‍सर ऐसे कीडे मकोडे उस कमरे में आ जाते , पर छोटी खिडकी होने से वे उससे बाहर नहीं निकल पाते थे। मुडे हुए अखबार की सहायता से उसे भगाने की कोशिश करती तो कभी कभी एक दो मर भी जाते। वैसे उसका जोडा कभी आए या नहीं , पर यदि किसी खास तरह का कीडा कमरे में मर जाता , तो दूसरे ही दिन उसी तरह का एक कीडा उसे ढूंढता हुआ पहुंच जाता था। उसे देखकर मैं समझ जाती थी कि उसी का जोडा किसी खास संकेत की सहायता से इसे ढूंढने आया है। ऐसी समझ आने के बाद मैं उन्‍हें भगाने के क्रम में उनकी सुरक्षा का भी ध्‍यान रखने लगी थी।

पिछले छह वर्षों से मैं बोकारो में कॉपरेटिव कालोनी में रह रही हूं। वैसे तो यह काफी साफ सुथरी जगह है , पर अगल बगल कहीं पर एक खास तरह के मकडे का बसेरा है , जिसका चित्र मैं आपको दिखा रही हूं। ये अक्‍सर घर में भी घुस आते हैं , सो तुरंत उनपर कीटनाशक का छिडकाव करने का विचार आ जाता है। पर इनके भागने की स्‍पीड इतनी अधिक होती है कि मैं शायद ही कभी छिडकाव कर पाती होउं। ये देखने में ही इतने भयानक लगते हैं कि हमेशा इनको लेकर भय बना रहता है। पर कुछ दिन पूर्व एक मकडा कई दिनों तक मेरे स्‍टोर के कबर्ड के रैक के छत पर पडा था। आपलोगों के लिए मैने अपने मोबाइल से कई एंगल से इसके फोटो भी लिए , पर यह इधर से उधर भी नहीं हुआ , चुपचाप पडा रहा। इसे ऐसी हालत में देखकर कीटनाशक का छिडकाव करने की मेरी हिम्‍मत ही नहीं हुई , नीचे दिए गए चित्र को देखकर आप मकडे के इस हालत का कारण समझ सकते हैं , जिसमें दीपावली की सफाई के क्रम में एक डब्‍बे से कुचलकर उसका जोडा मृत पडा हुआ है और उसी के बगल में यह तीन दिनों से भूखा प्‍यासा शोक मना रहा था !!





14 टिप्‍पणियां:

कमल शर्मा ने कहा…

रोचक जानकारी।

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

रोचक लगा यह ..चलिए कहीं तो प्रेम बचा है अभी :) अदभुत है यह दुनिया भी

महफूज़ अली ने कहा…

bahut hi rochak laga padh kar.........

par makdion ko dekh kar dar gaya.....hahahaa.....

mujhe chipkali aur makdi se bahut dar lagta hai.....

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

अंहं ! ऐसा तो पहले कभी नहीं पढ़ा था. नई जानकारी
. आभार.

M VERMA ने कहा…

अत्यंत रोचक --
प्रेम तो सुरक्षित है ब्रह्मांड के हर कण कण मे बस देखने का नज़रिया चाहिये.

vinay ने कहा…

नयी जानकारी ।

vinay ने कहा…

नयी जानकारी ।

POTPOURRI ने कहा…

रोचक, aur aapka ye observation sarahneey hai, padh kar aisa laga mano aapki autobiography ka ek panna ho.

MANOJ KUMAR ने कहा…

आप बहुत सूक्ष्मता से एक अलग धरातल पर चीज़ों को देखती हैं।

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत सुंदर जानकारी दी आप ने,हमारे यहा मक्खी मच्छर वेसे तो मिलते नही, लेकिन जितने मिलते है, वो बहुत मोटे होते है, ओर मकडो की तो बात ना पुछो, देख कर डर लगता है, धन्यवाद

Nirmla Kapila ने कहा…

रोचक जानकारी है। रंजू जी ने सही कहा कम से कम कीट पतंगों मे तो प्यार बचा है । अच्छी पोस्ट है शुभकामनायें । कुछ दिन अनुपस्थित रहने के लिये क्षमा चाहती हूँ

सुलभ सतरंगी ने कहा…

बहुत रोचक दास्तान!

Murari Pareek ने कहा…

bahut badhiyaa sangeetaji yahi insaaniyat hain ki har jeev ka dhyaan rakhe aur unke barey me jaane!!!

Vinod Ranka ने कहा…

Bahoot achhi jankari lagi sangita didi badhai ki patra hain jinhone ye jan kari di