सोमवार, 28 दिसंबर 2009

सुप्रसिद्ध गणितज्ञ और खगोलशास्‍त्री भास्‍कराचार्य और उनकी पुत्री लीलावती की कथा से हम एक बडी सीख ले सकते हैं !!

ब्‍यूटी पार्लर आरंभ करने जा रही मेरी भांजी ने शायद पंडित या ज्‍योतिषी को भगवान ही समझ लिया , तभी तो उसने अपनी दुकान खोलने के लिए मुझे एक ऐसा मुहूर्त्‍त देखने को कहा , जिसमें खोलने पर उसकी दुकान में घाटे का कोई सवाल ही नहीं हो। ज्‍योतिष की सहायता से कोई दुकान खोलने या न खोलने या देर सवेर करने की सलाह दी जा सकती है , पर शकुन और मुहूर्त्‍त पर तो गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष बिल्‍कुल विश्‍वास नहीं करता , कई दिन पूर्व इसपर पापा जी के द्वारा एक पोस्‍ट भी किया जा चुका है , मुझे इस सोंच पर अचंभा हुआ। उसने मुझे ही समझाते हुए कहा कि उसके शहर में एक पंडित है , जो ऐसा मुहूर्त्‍त निकाल‍कर देते हैं , जिससे आपके फर्म में घाटे की कोई गुंजाइश नहीं। पढे लिखे लोग भी कभी कभी ऐसे भ्रम में कैसे पड जाते हैं , जो अव्‍यवहारिक हो। ग्रहों के पृथ्‍वी पर पडनेवाले प्रभाव के रहस्‍य को हम ढूंढ भी लें , किसी के भाग्‍य को समझने में सफलता भी प्राप्‍त कर लें , पर इसे बदलने में सफलता प्राप्‍त करना संभव है भला ? इसी संदर्भ में मुझे विद्वान भास्‍कराचार्य और उनकी पुत्री लीलावती की कथा याद आ गयी , जिसे मैने उसे भी समझाया और आज आपको सुनाने जा रही हूं ...

भास्कराचार्य प्राचीन भारत के एक प्रसिद्ध गणितज्ञ एवं खगोलशास्त्री थे। उनका जन्‍म और पालन पोषण ही एक ऐसे घर में हुआ था , जहां स लोग ज्‍योतिषी थे। इनका जन्म 1114 0 में  हुआ था। भास्कराचार्य उज्जैन में स्थित वेधशाला के प्रमुख थे. यह वेधशाला प्राचीन भारत में गणित और खगोल शास्त्र का अग्रणी केंद्र था। लीलावती भास्कराचार्य की पुत्री का नाम था। जब लीलावती का जन्‍म हुआ , तो उसकी जन्‍मकुंडली देखकर या उसके जन्‍म के समय आसमान में ग्रहों की खास स्थिति देखकर भास्‍कराचार्य परेशान हो गए। उसकी कुंडली में वैधब्‍य योग था, वह योग बडा प्रबल था और उसके घटित होने की शत प्रतिशत संभावना थी। वे दिन रात किसी ऐसे उपाय की सोंच में थे जिससे कि उसके वैधब्‍य योग को काटा जा सके। देखते ही देखते लीलावती सयानी हो गयी , विवाह योग्‍य होने पर उसका विवाह आवश्‍यक था , पर पिता उसके विधवा रूप की कल्‍पना कर ही कांप जाते। अंत में चिंतन मनन कर उन्‍होने एक उपाय निकाल ही लिया।


उस वर्ष विवाह का एक ऐसा विशेष मुहूर्त्‍त आने वाला था , जहां किसी भी कन्‍या का विवाह किए जाने से उसके अखंड सौभाग्‍यवती रहने की संभावना थी।भास्‍कराचार्य ने उसी मुहूर्त्‍त में लीलावती का ब्‍याह करने का निश्‍चय किया। मुहूर्त्‍त देखने के लिए उस समय घडी तो होती नहीं थी , आकाश में ग्र्रहों नक्षत्रों की स्थिति से ही समय का आकलन किया जाता था । ब्‍याह की पूरी तैयारी की गयी , लेकिन ऐन मौके पर कोई अति आवश्‍यक कार्य निकल आया। भास्‍कराचार्य के पास हर क्षण का हिसाब किताब हुआ करता था , पर उनके जाने से शुभ मुहूर्त्‍त में ब्‍याह होना मुश्किल था। इसलिए काम पर जाने से पहले उन्‍होने एक यंत्र बनाया , एक बरतन में अपनी गणना के अनुसार जल डाला और उसके प्रवाह के लिए एक छिद्र बनाया। उस बरतन के पूरे जल के बह जाने के तुरंत बाद उस विवाह योग को शुरू होना था , परिवार के सब लोगों को समझाकर वे अपने काम पर चल पडें। पर बरतन के ढक्‍कन को उठाकर बार बार जल के स्‍तर को देखने के क्रम में लीलावती के गले के माले का एक मोती या कुछ और बरतन में गिर पडा और उससे जल का प्रवाह रूक गया। जल के प्रवाह में रूकावट आने से जल पूरा बह न सका और देखते ही देखते विवाह का मुहूर्त्‍त निकल गया। पिता के लौटने तक तो बहुत देर हो चुकी थी , मजबूरन किसी और मुहूर्त्‍त मे उसका विवाह करवाना पडा।

इस कहानी से सीख मिलती है कि सचमुच प्रकृति के नियमों को कोई नहीं बदल सकता। फिर वहीं हुआ , जो लीलावती की जन्‍मकुंडली में लिखा था, विवाह के एक वर्ष के अंदर ही उसके पति की मृत्‍यु हो गयी। लीलावती को अपने पिताजी के ज्ञान पर और ज्‍योतिष पर विश्‍वास होना ही था। वह पिता के साथ ही गणित और ज्‍योतिष के अध्‍ययन में जुट गयी। लीलावती के प्रश्‍नों का जबाब देने के क्रम में ही "सिद्धान्त शिरोमणि" नामक एक विशाल ग्रन्थ लिखा गया , जिसके चार भाग हैं  (१) लीलावती (२) बीजगणित (३) ग्रह गणिताध्याय और (४) गोलाध्याय। लीलावती में बड़े ही सरल और काव्यात्मक तरीके से गणित और खगोल शास्त्र के सूत्रों को समझाया गया है। यहां तक कि आजकल हम कहते हैं कि न्यूटन ने ही सर्वप्रथम गुरुत्वाकर्षण की खोज की, परन्तु उसके 550 वर्ष पूर्व भास्कराचार्य ने पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति को विस्तार में समझा दिया था।





22 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

अच्छा लगा पढकर.

यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि आप हिंदी में सार्थक लेखन कर रहे हैं।

हिन्दी के प्रसार एवं प्रचार में आपका योगदान सराहनीय है.

मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं.

निवेदन है कि नए लोगों को जोड़ें एवं पुरानों को प्रोत्साहित करें - यही हिंदी की सच्ची सेवा है।

एक नया हिंदी चिट्ठा किसी नए व्यक्ति से भी शुरू करवाएँ और हिंदी चिट्ठों की संख्या बढ़ाने और विविधता प्रदान करने में योगदान करें।

आपका साधुवाद!!

शुभकामनाएँ!

समीर लाल
उड़न तश्तरी

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

आप का मंतव्य स्पष्ट करने को कथा सुंदर है। हालांकि पिछले पच्चीस वर्ष से जब से लीलावती पढ़ी है। मैं जानकारी हासिल करने का प्रयत्न करता रहा और जो जानकारी मिली वह यह कि भास्कराचार्य के लीलावती नाम की कोई संतान नहीं थी। अपितु वे गणित को ही लीलावती कहते थे। गणित लीलावती है भी।

श्रीश पाठक 'प्रखर' ने कहा…

निश्चित ही कुछ सीमाएं तो हैं ही हमारी..!

सुंदर आलेख..!

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

wahwa sangeeta g...aapki yeh post bhrantiyan door karne me saksham hai...saadhuwad..

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

अच्छी और प्रेरणादायक घटना प्रस्तुत करने के लिये धन्यवाद.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

अच्छी और प्रेरणादायक घटना प्रस्तुत करने के लिये धन्यवाद.

अन्तर सोहिल ने कहा…

"सचमुच प्रकृति के नियमों को बदला नही जा सकता"
जो होना है सो होना है - यह आज आपने भी कह दिया
जब जानकर भी घटना को बदल नही सकते, तो किसलिये ज्योतिष और किसलिये भविष्य जानना

प्रणाम स्वीकार करें

अनिल कान्त : ने कहा…

आपका यह लेख कुछ सीख देता है.

संगीता पुरी ने कहा…

अंतर सोहिल जी .. प्रकृति के रहस्‍यों का जानना समझना ही ज्ञान है .. वैज्ञानिक भी इसके रहस्‍य से ही फायदा उठाकर हमारे जीने के लिए सुविधा देते हैं .. उसे बदलने की तो कोई सोंच भी नहीं सकता .. पर जानकारी बहुत बडा बल है .. इससे हमारा सारा भ्रम दूर होता है .. अधिक जानकारी के लिए हमारा ये आलेख पढें !!

Pandit Kishore Ji ने कहा…

bahut hi badiya jaankaari di hain aapne sangeeta ji.aapse ek request hain agar aap khetkautukam naamak granth ke vishay me kuchh jaankaari de sake to aapka mujh jaise jyotishi par bahut ahsaan hoga aapke jawaab ke intezar me

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत अच्छी जानकारी देता आलेख पढ़कर अच्छा लगा। बहुत-बहुत धन्यवाद
आपको नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।

राज भाटिय़ा ने कहा…

होनी तो हो कर रहे रोक सका ना कोये, बस यही बात है, आप ने बहुत सुंदर लिखा,
धन्यवाद

डॉ टी एस दराल ने कहा…

आपने सही कहा --किसी के भाग्य को कोई नहीं बदल सकता।
लेकिन इसी को लेकर कुछ ढोंगी बाबा लोगों को ठगते हैं।
और लोग भी अंध विश्वास में डूबे इन पर यकीन कर लेते हैं।
नव वर्ष की अग्रिम शुभकामनायें।

ज्ञानदत्त पाण्डेय G.D. Pandey ने कहा…

ओह! यह प्रसंग मालुम न था।

vinay ने कहा…

प्रक्रिती के नियमों को बदलना,इन्सान के वश की बात नही,संगीता जी इसी सन्दर्भ में आपसे यह पूछना चाहता हूँ,रत्नो का प्रभाव इन्सान के ग्रहो पर कम या अधिक तो पड़ता है,परन्तु क्या रत्नो का प्रभाव अबांछित प्रभाबों को समूल रूप से समाप्त कर सकता है ?

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

सार्थक और शिक्षाप्रद लेखन!
बधाई!

dhiru singh {धीरू सिंह} ने कहा…

होनी हो कर ही रहेगी मान लेना चाहिये क्या

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` ने कहा…

भारतीय प्राचीन साहित्य और वांग्मय अन्दिनाती नगीनों से भरा पडा है आप ने एक ऐसी ही कथा आज सुना दी
नव - वर्ष की अनेक शुबकामनाएं
स्नेह,
- लावण्या

Einstein ने कहा…

एक और ज्ञानवर्धक लेख पढ़ कर अपने भरोशा को बल मिला ....आभार ...

cmpershad ने कहा…

हमारे कुलपुरोहित ने अपनी पुत्री का विवाह शुभमुहुरत निकाल कर किया। भाग्य को कुछ और ही मंज़ूर था। पिता के देखते-ही देखते बेचारी विधवा हो गई :(

विष्णु बैरागी ने कहा…

चलिए। जो होना होगा, होकर रहेगा। अपन अपना काम करें। यही शिक्षा देती है आपकी यह पोस्‍ट। धन्‍यवाद।

Hriday Pandey ने कहा…

Long ago (around 600-500 BC), there lived a great scholar and astrologer by name Pani, on the banks of the river Indus. By the grace of Lord Shiva, Pani's wife delivered a healthy son. The son came to be known as Panini, the offspring of Pani.
The little boy was very active and was the apple of his parents' eyes. He grew up to be a sweet child whose smile reminded one of the moon on a full moon night.
One day, a great scholar, astrologer and palmist visited Pani. He was a great friend of Pani. Pani and his family treated the great man courteously. He was served the best food and was treated with the best services. After lunch, the great man called the child Panini and asked him to sit with him. Panini readily agreed and sat with the great man.
The great man looked at the right palm of the child. He sat there gazing at the palm for several minutes. The expression on his face changed from that of cheerfulness to that of concern. Looking at this change, Pani inquired the great man about what was bothering him.
The great man looked at Pani with pitiful eyes and said "Oh Pani! My friend! You are such a renowned scholar and people around the world come to you for advice. Alas! Fate has it that this child of yours will remain illiterate. He has no Education Line on his palm."
Pani asked his friend- "Please forgive me. I am not saying this because I doubt your expertise, but would it be possible that you haven't checked my son's palm correctly?"
The great man looked at Pani, whose eyes tried to hold their grief back, and said "My friend! I have checked the boy's palm thoroughly, not once but twice and there is no Education Line here. He is bound to remain illiterate."
Pani could no longer hold his grief. He closed his eyes and muttered under his breath "If the lord wishes it to be so, so be it!"
Panini, who was listening to the conversation, gently asked the great man "Sir, could you please tell me where on my palm would the education line be, if it had been?"
The great man showed the child the location of the education line on his own palm. He felt sympathetic towards the child, who was so well mannered and soft spoken.
The child ran out of the house and returned back in a few minutes. He held out his right palm and asked the great man "Will I be a scholar now? Will I be able to uphold my father's name?"
The great man and Pani looked at the child's hand and were shocked. Blood was oozing out of the palm and where there had to be the education line, there was a deep line which was etched with a sharp stone. The two men had no words.
As he grew up, Panini was educated by his father and Pani was astonished by his son's insatiable quest for knowledge. To attain more knowledge, Panini meditated on Lord Shiva and performed penance for many years. Impressed by the devotion he showed, Lord Shiva appeared before Panini. But Panini was so engrossed in his meditation that he did not notice the Lord's arrival. In order to wake Panini, Shiva sounded his Damaru. The Damaru beats reverberated and Panini woke up from his trance. The sound made by Shiva's Damaru kept resonating in Panini's ears. Panini bowed to the lord and the lord blessed him and disappeared.
Panini is believed to have formulated the rules of Sanskrit morphology, syntax and semantics in fourteen verses, which are believed to be the sounds of Shiva's Damaru, and called them Maheshwara Sutrani.
These Sutras are also known as Aṣṭādhyāyī, meaning eight chapters, the foundational text of the grammatical branch of the Vedanga.