मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

एक सुंदर कविता पढें ... हमारा कर्म किस तरह परिस्थितियों के नियंत्रण में होता है !!

अपने भाग्‍य पर विश्‍वास न करते हुए अक्‍सर आप सभी कर्मयोग की चर्चा करते हैं , पर क्‍या आप सबों को ऐसा नहीं लगता कि हमारा कर्म भी परिस्थितियों के नियंत्रण में होता है। काम करते वक्‍त , सोंचते वक्‍त , निर्णय लेते वक्‍त हम बहुत सी सीमाओं में बंधे होते हैं , इसी बात को समझाने के लिए बालाकृष्‍ण राव की सुंदर रचना ( नदी को रास्‍ता किसने दिखाया ?? ) आपके लिए प्रस्‍तुत है......


नदी को रास्‍ता किसने दिखाया ?
सिखाया था उसे किसने
कि अपनी भावना के वेग को
उन्‍मुक्‍त बहने दे ?
कि वह अपने लिए
खुद खोज लेगी
सिंधु की गंभीरता
स्‍वच्‍छंद बहकर ?

इसे हम पूछते आए युगों से,
और सुनते भी युगों से आ रहे उत्‍तर नदी का।
मुझे कोई कभी आया नहीं था राह दिखलाने,
बनाया मार्ग मैने आप ही अपना।
ढकेला था शिलाओं को,
गिरी निर्भिकता से मैं कई ऊंचे प्रपातों से,
वनों में , कंदराओं में,
भटकती , भूलती मैं
फूलती उत्‍साह सेप्रत्‍येक बाधा विघ्‍न को
ठोकर लगाकर , ठेलकर,
बढती गयी आगे निरंतर
एक तट को दूसरे से दूरतर करती।

बढी संपन्‍नता के
और अपने दूर दूर तक फैले साम्राज्‍य के अनुरूप
गति को मंद कर...
पहुंची जहां सागर खडा था
फेन की माला लिए
मेरी प्रतीक्षा में।
यही इतिवृत्‍त मेरा ...
मार्ग मैने आप ही बनाया।

मगर भूमि का है दावा,
कि उसने ही बनाया था नदी का मार्ग ,
उसने ही
चलाया था नदी को फिर
जहां , जैसे , जिधर चाहा,
शिलाएं सामने कर दी
जहां वह चाहती थी
रास्‍ता बदले नदी ,
जरा बाएं मुडे
या दाहिने होकर निकल जाए,
स्‍वयं नीची हुई
गति में नदी के
वेग लाने के लिए
बनी समतल
जहां चाहा कि उसकी चाल धीमी हो।
बनाती राह,
गति को तीव्र अथवा मंद करती
जंगलों में और नगरों में नचाती
ले गयी भोली भूमि को भूमि सागर तक

किधर है सत्‍य ?
मन के वेग ने
परिवेश को अपनी सबलता से झुकाकर
रास्‍ता अपना निकाला था,
कि मन के वेग को बहना पडा था बेबस
जिधर परिवेश ने झुककर
स्‍वयं ही राह दे दी थी ?
किधर है सत्‍य ????

क्‍या आप इसका जबाब देंगे ??????




9 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

बालाकृष्‍ण राव जी की सुन्दर रचना पढ़वाने का आभार!

Dr. Smt. ajit gupta ने कहा…

कर्म परिस्थितियों के और मन के नियन्‍त्रण में होता है। अच्‍छी कविता पढ़वाने के लिए धन्‍यवाद।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

बहुत ही सुन्दर कविता आपने पढ़वाई. धन्यवाद.

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

वाकई में शांत गहरी नदी जैसे भाव लिए है बालकृष्ण जी की यह सुन्दर कविता, आभार संगीता जी !

निर्मला कपिला ने कहा…

संगीता जी बहुत सुन्दर कविता है इसे पढवाने के लिये आभार्

डॉ टी एस दराल ने कहा…

सुन्दर भावपूर्ण कविता । आभार।

vinay ने कहा…

सुन्दर कविता !

योगेश स्वप्न ने कहा…

किधर है सत्‍य ?
मन के वेग ने
परिवेश को अपनी सबलता से झुकाकर
रास्‍ता अपना निकाला था,
कि मन के वेग को बहना पडा था बेबस
जिधर परिवेश ने झुककर
स्‍वयं ही राह दे दी थी ?
किधर है सत्‍य ????

satya yahi hai , bhagya bhi bahut prabal hai. aabhaar.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बालकृष्ण राव जी को बधाई!
आपका आभार!