बुधवार, 28 अप्रैल 2010

हमारी प्रार्थना का वास्‍तविक स्‍वरूप क्‍या हो ??

जब भी हमें किसी ऐसे वस्‍तु की आवश्‍यकता होती है , जिसे हम खुद नहीं प्राप्‍त कर सकते , तो इसके लिए समर्थ व्‍यक्ति से निवेदन करते हैं। निवेदन किए जाते वक्‍त हमें अपने मन का अहंकार समाप्‍त करना पडता है । यदि हम ऐसा न करें और अपने अहंकार में बने रहें तो हमारा निवेदन स्‍वीकार्य नहीं हो सकता। इस समय हम अपनी कमजोरी को स्‍वीकार करने के साथ ही साथ सामने वाले की महत्‍ता को भी स्‍वीकार करते हैं , मन की यही निर्मलता हमें कुछ प्राप्‍त करने के लायक बनाती है। इतने बडे जीवन में हर कोई किसी न किसी स्‍थान पर एक दूसरे से महान होता है और एक दूसरे की मदद करते हुए दुनिया को आगे बढाने में समर्थ होता है। विनम्रता का अभाव और अहंकार की कमी होने से हम आगे बढने में कामयाब नहीं हो सकते हैं।


कभी कभी हमारे सामने ऐसी समस्‍याएं आ जाती है , जिसे हम न तो खुद और न ही दूसरों से हल करवा पाते हैं , उस समय एक सर्वशक्तिमान की याद अवश्‍य आ जाती है , जिसके सामने हम प्रार्थना करने लगते हैं। इस सर्वशक्तिमान का स्‍वरूप भिन्‍न भिन्‍न दृष्टिकोण वालों का भिन्‍न भिन्‍न होता है। ऐसा माना जाता है कि प्रार्थना में अद्भुत शक्ति होती है और इसके जरिए हम प्रभु या प्रकृति से संबंध बना लेते हैं। जहां धार्मिक और आध्‍यात्मिक रूचि रखने वाले व्‍यक्ति प्रतिदिन प्रार्थना करते हैं , वहीं सांसारिक या व्‍यस्‍त रहने वाले व्‍यक्ति‍ विपत्ति के उपस्थित होने पर अवश्‍य ईश्‍वर की प्रार्थना किया करते हैं। अधिकांश जगहों पर विपत्ति आते ही नास्तिकों को भी ईश्‍वर याद आ जाते हैं। प्रत्‍येक व्‍यक्ति के समक्ष ईश्‍वर का अलग अलग रूप होता है , पर प्रार्थना के सफल होने के लिए ईश्‍वर के प्रति समर्पित होने के साथ साथ अपने अहंकार का त्‍याग और मन की निश्‍छलता की आवश्‍यकता होती है। 


भले ही पूजा करने के वक्‍त हमारा स्‍नान करना , साफ सुथरा वस्‍त्र पहनना आवश्‍यक है , प्रार्थना करते वक्‍त ऐसा नहीं होता , इस समय मन का निर्मल रहना ही अधिक आवश्‍यक है। जीवन में हमारे समक्ष जो भी परिस्थितियां उत्‍पन्‍न होती हैं , वे प्रकृति के द्वारा निश्चित होती हैं। पर हम उन परिस्थितियों से लडते हुए अपने कर्म के द्वारा जीवन में आगे बढते जाते हैं। कभी कभी अचानक उपस्थित कोई विपत्ति हमें बहुत भारी लगने लगती है और उस विपत्ति को तुरंत दूर करने के लिए हम प्रार्थना करते हैं। कभी कभी हमारी प्रार्थना से समय से पहले विपत्ति दूर हो जाती है , तो उसके बदले हमें अपना कोई सुख भी छोडना पड सकता है, क्‍यूंकि प्रकृति में हमेशा किसी लेने के बदले देने का नियम होता है। भले ही इसे सामान्‍य ढंग से समझ पाना कठिन हो। इसलिए हमें उस विपत्ति को सहने की शक्ति को बढाने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। इसके अलावे अधिकांश समय लोग सांसारिक सुख के लिए ही प्रार्थना करते हैं,यह भी बिल्‍कुल गलत है।


निर्मल मन से  अहंकार को त्‍याग देने के बाद की गयी प्रार्थना से हमारे मन की मुराद अवश्‍य  पूरी होती है , पर कभी कभी इसमें बडी गडबडी आती है। बाबर और हूमायूं की कहानी आपने सुनी होगी। हुमायूं जब मृत्युशय्या पर पड़ा था, बाबर ने उसकी तीन बार परिक्रमा की और अल्लाह से प्रार्थना की के वह हुमायूं की ज़िन्दगी बख्स दे चाहे बदले में उसकी ज़िन्दगी ले ले। फिर ऐसा ही हुआ, हुमायूं तो ठीक हो गया लेकिन बाबर शीघ्र ही बीमार हो कर चल बसा। इसलिए किसी मनोकामना के पूरी होने के लिए प्रार्थना करते वक्‍त कभी भी उसके बदले में कुछ ले लेने की बात मुंह से न निकाले। यह समझते हुए कि अभी आयी समस्‍या के अतिरिक्‍त अन्‍य बातों का कोई महत्‍व नहीं , लोग अक्‍सर भावावेश में कह बैठते हैं ' मेरा यह काम कर दो , चाहे बदले में कुछ भी ले लो' ऐसे में कभी कभी उस सफलता की बडी कीमत चुकानी पडती है। इसलिए प्रार्थना करते वक्‍त सांसारिक सुख और सफलता न मांगते हुए मानसिक सुख और शांति की इच्‍छा रखनी चाहिए। 

27 टिप्‍पणियां:

दिलीप ने कहा…

magar aajkal to bhagwan ko bas kaam padne par yaad karte hain wo bhi jab koi bhautik cheez chahiye ho...aapke lekh se achchi seekh mili...

मनोज कुमार ने कहा…

पूरा आलेख पढ़ते वक़्त मन में यह गूंज रहा था दुख में सुमिरन सब करे सुख में करे न कोय।
और हुमाय़ूं-बबर वले किस्से के मध्यम से दिया गया संदेश लाजवाब है।
"प्रार्थना करते वक्‍त सांसारिक सुख और सफलता न मांगते हुए मानसिक सुख और शांति की इच्‍छा रखनी चाहिए। "

honesty project democracy ने कहा…

कोई न कोई एक अदृश्य शक्ति है जो हमें नियंत्रित करती है / हमें अपनी भावना को हमेशा पवित्र रखना चाहिए / अच्छी प्रस्तुती के लिए धन्यवाद /

अजय कुमार ने कहा…

आस्था की बात है
अच्छा लेख , शुक्रिया ।

vikas ने कहा…

बहुत ही बढियां ठंग से आपने पूजा पाठ के विषय में बोध कराया,,नयी चीजों से भी अवगत हुए,आभार.

विकास पाण्डेय

www.vichrokadarpan.blogspot.com

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

इस नजरिये से भी प्रार्थना करना एक अच्छी चीज लगती है...

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

प्रार्थना करते वक्‍त सांसारिक सुख और सफलता न मांगते हुए मानसिक सुख और शांति की इच्‍छा रखनी चाहिए।
....sahee बात.

डॉ टी एस दराल ने कहा…

बहुत सार्थक लेख है संगीता जी ।
अहंकार को त्याग कर ही इंसान निश्छल होता है।
भगवान भी तभी मदद करते हैं।

tulsibhai ने कहा…

pura aalekh aapne is tarha se pesh kiya hai ki mann mai koi sanka ka sthan hi nahi raheta "

" koi adarshy shakti jaroor hai ..."

----- eksacchai { AAWAZ }

http://eksacchai.blogspot.com

राज भाटिय़ा ने कहा…

संगीता जी बहुत सुंदर बात कही आप ने सच मै प्राथना मै बहुत शक्ति होती है, मै मंदिर तो बहुत कम जाता हुं लेकिन भगवान मै मेरा विश्वास है, ओर चलता भी उसी के कहने मै हुं.
धन्यवाद

sangeeta swarup ने कहा…

शिक्षाप्रद लेख....ये सच है की कुछ भी मांगते वक्त या प्रार्थना करते वक्त अहंकार के लिए कोई स्थान नहीं होता....अच्छी पोस्ट के लिए आभार

sangeeta swarup ने कहा…

शिक्षाप्रद लेख....ये सच है की कुछ भी मांगते वक्त या प्रार्थना करते वक्त अहंकार के लिए कोई स्थान नहीं होता....अच्छी पोस्ट के लिए आभार

महफूज़ अली ने कहा…

सम्पूर्ण लेख बहुत अच्छा लगा....

महफूज़ अली ने कहा…

सम्पूर्ण लेख बहुत अच्छा लगा....

रोहित ने कहा…

bahut hi accha laga yeh lekh padhkar...
jiske paas maanshik sukh-shanti hai wahi sabse sukhi hai.
rahi baat ishwar ko yaad karne ki to unme humari aastha honi chahiye bas!!

Vivek Rastogi ने कहा…

"मन का निर्मल रहना" बहुत जरुरी है, एकदम सटीक बात

विष्णु बैरागी ने कहा…

निष्‍काम भाव से तो अपवादस्‍वरूप ही प्रार्थना की जाती है। सुनिश्चित लक्ष्‍य प्राप्ति हेतु की गई प्रार्थनाऍं भला निर्मल मन से कैसे की जा सकती हैं।

वन्दना ने कहा…

शिक्षाप्रद लेख…………आभार्।

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

शुभ विचार।
--------
गुफा में रहते हैं आज भी इंसान।
ए0एम0यू0 तक पहुंची ब्लॉगिंग की धमक।

Akanksha~आकांक्षा ने कहा…

प्रार्थना करते वक्‍त सांसारिक सुख और सफलता न मांगते हुए मानसिक सुख और शांति की इच्‍छा रखनी चाहिए। ....Bahut sahi kaha apne !!

नवीन प्रकाश ने कहा…

कर तरह से करके देख ली शायाद "वो" ज्यादा ही व्यस्त हैं

अन्तर सोहिल ने कहा…

मैं तो धन्यवाद को प्रार्थना समझता हूं जी
और जो मिला, जो उसने दिया उसके लिये धन्यवाद देता रहता हूं।

प्रणाम

जी.के. अवधिया ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति!

ईश्वर की प्रार्थना स्वयं के आत्मविश्वास को बढ़ाने का सर्वश्रेष्ठ साधन है।

अल्पना वर्मा ने कहा…

अक्सर भावावेश में व्यक्ति प्रार्थना में ऐसा भी कह जाता है जो कहना नहीं चाहिये..आप ने भी एक उदाहरण बाबर का दिया.
मैं प्रार्थना में अटूट विश्वास रखती हूँ और सभी से कहती भी हूँ व्रत /उपवास आदि से भी अधिक क्षमता और शक्ति निर्मल मन से की गयी प्रार्थना में होती है.
यह लेख बहुत ही अच्छा लगा.आभार

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर और शिक्षाप्रद आलेख!
बधाई!

स्वप्निल कुमार 'आतिश' ने कहा…

lekh padhte waqt mann me sarswati vandna goonjne lagi ..

yakunden dutu sarhaar dhawala.. :

aur uske baad..

aisi shakti hume dena data..

behad acfhha lekh aapka..jagrukta badhane wala ..

shuqriya

योगेश स्वप्न ने कहा…

shat pratishat sahmati.