मंगलवार, 7 सितंबर 2010

नास्तिक अपना मुसीबत भरा समय किसके सहारे काटें ??

पिछली पोस्‍ट में पूरी बात तो हो नहीं पायी , आज उसी प्रसंग को आगे बढाती हूं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखनेवाले और विज्ञान की मोटी मोटी पुस्‍तके पडनेवाले मेरे पापाजी और अन्‍य भाइयों के कारण हमलोगों ने बचपन से ही धर्म पर तो नहीं , पर धार्मिक क्रियाकलापों पर जरूर ऊंगली उठाते पाया था। बडे संयुक्‍त परिवार में दादाजी और उनके सभी बच्‍चे कर्म पर विश्‍वास रखनेवाले तो दादी जी और उनकी बहूएं धर्म पर आस्‍था रखनेवाली , दोनो पार्टियों के मध्‍य पुरजोर बहस होना निश्चित था।  ज्‍योतिष के अध्‍ययन के कारण पापाजी के समक्ष कुछ रहस्‍यों का पर्दाफाश हो चुका था , इसलिए तर्क करने में वो भयभीत नहीं होते थे। जबकि दूसरे भाई विज्ञान के नियमों तक की बात तो पूरे विश्‍वास से करते , पर धार्मिक या आध्‍यात्मिक बातों के लिए उनके पास तर्क नहीं होते , थोडा भय भी होता , सो चुप्‍पी साधने की मजबूरी होती। पर पापाजी के वैज्ञानिक नजरिये से हम बच्‍चों की भी तर्क शक्ति बढती गयी।

मेरे पापाजी प्रकृति के सारे नियमों को ही सर्वशक्तिमान मानते हैं , जिसके हिसाब से प्रकृति में एक एक क्रिया की प्रतिक्रिया तय है। उनके अनुसार किसी भी कर्मकांड का मुख्‍य उद्देश्‍य समाज के एक एक वर्ग और प्रकृति की एक एक वस्‍तु के महत्‍व को बढाने के लिए है , जो हमारे दूरदर्शी महापुरूषों द्वारा तय किया गया है , इनका ईश्‍वर से कोई लेना देना नहीं और इससे ईश्‍वर खुश हो जाएंगे , ऐसा नहीं है। ईश्‍वर या प्राकृतिक वातावरण को अपने पक्ष में करने के लिए हमें उन गुणों को विकसित करना होगा , जिसका प्राचुर्य हमें प्रकृति की ओर से मिला है। प्रत्‍येक व्‍यक्ति अच्‍छे या बुरे दोनो प्रकार के गुणों से युक्‍त होता है , अध्‍यवसाय द्वारा अपनी अच्‍छी आदतों को विकसित करना और संयम द्वारा बुरी आदतों को समाप्‍त करना हमारा लक्ष्‍य होना चाहिए और यही आध्‍यात्‍म तक पहुंचने का रास्‍ता है। इसके लिए कर्मकांड का सहारा भी लिया जा सकता है , पर इसे भी हर युग में परिवर्तनशील होना चाहिए।

पर धर्म के मामलों में पापाजी के इतने अच्‍छे दृष्टिकोण के बावजूद भी दादी जी और मम्‍मी के कारण हमलोगों में आस्तिकता आ ही गयी और पूजा पाठ , धर्म कर्म के मामले में हम आस्‍था अवश्‍य रखने लगे। वैसे इससे पापाजी को उतनी आपत्ति नहीं होती , सामान्‍य तौर पर व्रत वगैरह में भी नहीं , पर यदि घर पर किसी की तबियत खराब हो और व्रत करना जरूरी हो , तो इतना हल्‍ला मचाते कि व्रत करनेवाली की हालत और नाजुक हो जाती। ऐसे में व्रत की परंपरा हमारे घर से तो समाप्‍त ही हो गयी। मेरे ससुराल पहुंचने पर मेरी माताजी भी कर्मकांड को लेकर अधिक गंभीर नहीं दिखी। हालांकि वो खुद तो व्रत त्‍यौहार करती रही , पर हम बहूओं के लिए कुछ भी अनिवार्य नहीं रहने दिया , हां , पंडितों के अधिकार में अभी तक उन्‍होने कोई कटौती नहीं होने दी है। धार्मिक कर्मकांडों में कम रूचि के बावजूद भी मेरे मायके या ससुराल में कोई बडी हानि या असफलता को घटित होते नहीं देखा , जिससे इस मान्‍यता को बल मिले कि पूजा पाठ नहीं करने से कोई बडा नुकसान होता है।

मायके और ससुराल .. दोनो का मिला जुला प्रभाव ऐसा बना कि धार्मिक कर्मकांडों से तो मैं मुक्‍त ही हो गयी , पर मंदिर , मस्जिद , गुरूद्वारे या गिरजाघर को देखकर सर को झुका लेना , पर्व त्‍यौहार में पूजा पाठ में सम्मिलित होना .. ये दिलचस्‍पी तो बिल्‍कुल सहज ढंग से बनी रही । जीवन में समय समय पर उपस्थित होनेवाली ऐसी विपत्ति या परिस्थिति , जहां किसी का भी वश नहीं होता , विज्ञान के विकास के बावजूद एक संयोग या दुर्योग समस्‍या को बढा या घटा सकती है। किसी बडी शक्ति को याद करते हुए मेरा सर स्‍वयमेव झुक जाया करता है, उस समय मेरे सारे वैज्ञानिक तर्क एक ओर पडे होते हैं। पालन पोषण में ईश्‍वर के प्रति आस्‍था का ही परिणाम है कि किसी असामान्‍य परिस्थिति में मेरे साथ ईश्‍वर होते हैं , जो कुछ क्षण बाद , कुछ घंटों बाद , कुछ दिनों बाद , कुछ महीनों बाद , यहां तक कि कुछ वर्षों बाद मुझे उस मुसीबत से निकाल देते हैं , ऐसा मुझे अहसास होता रहता है , जो निर्मूल भी हो सकता है। पर ईश्‍वर की आसपास उपस्थिति को महसूस करने के कारण इतना समय व्‍यतीत कर लेने में मुझे दिक्‍कत नहीं होती।

पर हमारे व्‍यक्तित्‍व में पापाजी का कहीं न कहीं प्रभाव अवश्‍य था कि मैं इसे अपनी कमजोरी मानने लगी थी। हालांकि कर्तब्‍य पथ पर हमेशा ही चलती रही , फिर भी अपनी असफलताओं को भाग्‍यवाद से जोड दिया तथा अपने बच्‍चों को हमेशा कर्म के लिए प्रेरित करती रही । जैसे थे मेरे पापाजी , वैसे ही बच्‍चों के पापाजी , बच्‍चों के पालन पोषण के क्रम में ईश्‍वर के प्रति कोई आस्‍था ही नहीं विकसित होने दी।  घर में बडे स्‍तर पर धार्मिक क्रियाकलापों की कमी के कारण पूजा पाठ , धर्म या आस्‍था से बच्‍चों का संबंध भी नहीं रहा , जिसका बाद में मुझे अफसोस हुआ। कम उम्र में ही बडे बेटे के समक्ष एक मुसीबत आयी , मुझे प्रतिदिन ईश्‍वर की रट्ट लगाते देखा , तो वह तो मानने लगा , पर छोटा तो अभी तक ईश्‍वर के अस्तित्‍व से इंकार करता है। जीवन में उतार और चढाव आना तो तय है , आस्तिक मुसीबत का समय प्रार्थना और संतोष में गुजार देते हैं , पर नास्तिकों के लिए मुसीबत का समय काटना अधिक मुश्किल होता है ।

कर्म के अनुसार या उससे अधिक सफलता से जीवन भर संयुक्‍त होने के बाद अपनी असफलता का कोई कारण नहीं समझ पाते , तब उनका दृष्टिकोण अंधविश्‍वासी हो जाता है , पापाजी के जीवन में आनेवाले सैकडों लोग ऐसे उदाहरण हैं। छोटे छोटे लोग तो साधनहीनता के कारण अंधविश्‍वास में पडे होते हैं , एक डॉक्‍टर के यहां जाने के पैसे न हो और झाडफूंक वाले से ही इलाज करा लिया तो इसमें कैसा अंधविश्‍वास ?? उससे समाज को कोई नुकसान नहीं होता। प्रकृति तो उसकी सलामती के लिए बीमारी से लड ही रही है , अधिकांश लोगों का दो चार दिनों में स्‍वस्‍थ होना तय है। पर बडे स्‍तर पर सर्वे हो , तो आपको मिलेगा कि आज जितने भी अंधविश्‍वासी हैं , वे कभी भी धार्मिक नहीं रहें , विपत्ति में पडकर धार्मिक होने का नाटक कर रहे हैं। सही भी है , आस्तिक तो अपना समय ईश्‍वर को आसपास महसूस करते हुए काट लेती हूं , भला नास्तिक अपना मुसीबत भरा समय किसके सहारे काटें ??

25 टिप्‍पणियां:

मनोज कुमार ने कहा…

आपसे बिल्कुल सहमत हूं।
किसी चीज़ को बार-बार नकारना भी उसे स्वीकारना ही है।

VISHWA BHUSHAN ने कहा…

poorna sahamati...
Aapke tark se sada sahmat hota hoon...

डॉ महेश सिन्हा ने कहा…

ये तो कोई नास्तिक ही बता सकता है ।

निशांत मिश्र - Nishant Mishra ने कहा…

नास्तिक अपना मुसीबत भरा समय किसके सहारे काटें ??


क्या ज़रूरी है कि मुसीबत भरा समय काटने के लिए कोई सहारा ढूँढा जाए?

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

सही है विज्ञान के पास भी कहाँ है सारे सवालों का जवाब ? मै तो उस सर्वशक्तिमान में आस्था रखती हूँ तो आपके सवाल का जवाब तो नही दे सकती

संगीता पुरी ने कहा…

निशांत मिश्र जी ,

मनोविज्ञान विज्ञान के अंतर्गत आता है .. और इसका अध्‍ययन साबित करता है कि हर वक्‍त मनुष्‍य मानसिक तौर पर एक सा नहीं रह पाता .. परिस्थितियां इनके सोंचने समझने के ढंग पर प्रभाव डालती है .. आप दावे से ऐसा कैसे कह सकते हैं .. कि‍ मुसीबत भरे समय को काटने के लिए किसी सहारे की आवश्‍यकता नहीं !!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (ਦਰ. ਰੂਪ ਚੰਦ੍ਰ ਸ਼ਾਸਤਰੀ “ਮਯੰਕ”) ने कहा…

मेरे मन में तो इसका एक ही उत्तर सूझ रहा है!
--
आरोपों और प्रत्यारोपों के साथ नास्तिक अपना मुसीबतभरा समय काटते हैं!

ललित शर्मा-ললিত শর্মা ने कहा…

नास्तिक सबसे बड़ा आस्तिक है।

AlbelaKhatri.com ने कहा…

नास्तिक और आस्तिक में कोई ज़्यादा भेद नहीं है
यदि है भी तो प्रकृति को इसके लिए कोई खेद नहीं है
रब सब का राखा है.........
रब सबका राखा है .......

आपके आलेख से भीतर तक कुछ हलचल होती है

आभार !

राज भाटिय़ा ने कहा…

संगीता जी, मै नास्तिक तो नही लेकिन कभी मंदिर नही जाता जाता हुं तो मुझे वहां भगतो की दिखावटी हरकते देख कर बेचेनी सी होती है, ओर मैने आज तक सच मै एक भी सच्चा भगत नही देखा जो सच्चे मन से भगवान की पुजा करता हो, मेरी मां भी बहुत बडी भगत थी, भगवान की लेकिन पुजा करते समय उन्हे सब का ध्यान रखना पडता था, यानि मन तो दुनिया दारी मै ही होता था तो पुजा केसी....
आप के लेख से सहमत हुं, धन्य्वाद

गिरिजेश राव ने कहा…

@ आस्तिक मुसीबत का समय प्रार्थना और संतोष में गुजार देते हैं , पर नास्तिकों के लिए मुसीबत का समय काटना अधिक मुश्किल होता है ।

@ आस्तिक तो अपना समय ईश्‍वर को आसपास महसूस करते हुए काट लेती हूं , भला नास्तिक अपना मुसीबत भरा समय किसके सहारे काटें ??

आप नास्तिक नहीं हैं। फिर आप के वाक्यों में उनके बारे में इतना पुष्ट दावा कैसे और क्यों दिख रहा है?
नास्तिक मनुष्य के भीतर की जीवन शक्ति में विश्वास रखता है किसी स्वर्ग में बैठे सर्वशक्तिमान ईश्वर पर नहीं जो अपने आगे सारे कुकर्म और अनर्थ होते चुपचाप देखता रहता है। हो सकता है आप कहें कि वह जीवन शक्ति ही ईश्वर है। आप की मर्जी। आप का तर्क।
लेकिन एक तर्क यह भी तो है जो मनुष्य को ईश्वर का सर्जक मानता है।
रही बात अपने चारो ओर फैली सृष्टि की तो किसी वैयक्तिक ईश्वर द्वारा रचित मानने से बेहतर यही लगता है कि यह स्वयं चालित है। कैसे है, क्यों है - इस पर तमाम बहसें हो सकती हैं। पन्ने रंगे जा सकते हैं। लेकिन वैयक्तिक ईश्वर की अवधारणा तो हास्यास्पद लगती ही है। ईश्वर की अवधारणा के विधेयात्मक पक्ष को देखें तो मनुष्य में ही ऐश्वर्य की सम्भावनाएँ निहित हैं। सृष्टि का सिरमौर मनुष्य ही ईश्वर है। ऐसे में 'ईश्वर' की अवधारणा रिडंडेंट लगती है।

Suman ने कहा…

नास्तिक अपना मुसीबत भरा समय किसके सहारे काटें ?apnay saharay katta hai.nice

Arvind Mishra ने कहा…

भला नास्तिक अपना मुसीबत भरा समय किसके सहारे काटें ??
सचमुच एक अनुत्तरित -यक्ष प्रश्न -उदाहरण आपके सामने ही है -मैं !

ajit gupta ने कहा…

आस्तिक मुसीबत का समय प्रार्थना और संतोष में गुजार देते हैं , पर नास्तिकों के लिए मुसीबत का समय काटना अधिक मुश्किल होता है
आपकी इन पंक्तियों ने प्रभावित किया। इसलिए ही कई बार कर्म-काण्‍ड करने भी जरूरी हो जाते हैं क्‍योंकि इन्‍हीं से हम एक-दूसरे के नजदीक आते हैं। हम ऐसे कितने ही कर्म त्‍यागते जा रहे हैं जिनसे परिवार एक साथ आकर बैठता था अब तो मुसीबत में बस हम अकेले होते हैं। अच्‍छा आलेख है।

सम्वेदना के स्वर ने कहा…

एक दूसरी ही बात..
हम समय काट रहें हैं या समय हमें काट रहा है.

ab inconvenienti ने कहा…

खुद की शक्ति के सहारे कैसा भी वक्त कट जाता है, बाकि किसी काल्पनिक शक्ति की बैसाखी की दरकार नहीं है.

दुनिया में हजारो सालों से लाखों नास्तिक हैं, उनपर भी दुःख पड़ते रहे हैं. जैसे वे समय काटते रहे हैं वैसे आगे भी काटते रहेंगे.

वैसे आपको नास्तिकों की इतनी चिंता कब से हो गई?

नास्तिक विशेषण गाली जैसे प्रयोग होता है, मैं बताते हुए डरता हूँ की मैं ईश्वर की अवधारणा पर विश्वास नहीं रखता. पता नहीं नास्तिक होने के आरोप में कहाँ पीट पीट कर मार डाला जाए? कोई बचाने भी नहीं आएगा.

ललित शर्मा-ললিত শর্মা ने कहा…

@गिरिजेश राव जी

नास्तिक और आस्तिक में कोई ज्यादा फ़ेर नहीं है।
आस्तिक भी आत्मविश्वास से भरा होता है कि उसकी आस्था है, नास्तिक भी आत्म विश्वास से भरा होता है कि उसकी अनास्था है। नास्तिक भी अडिग है और आस्तिक भी अडिग है। दोनो अपनी-अपनी मान्यताओं पर अटल हैं।
अंत में यही सिद्ध होता है कि नास्तिक भी सबसे बड़ा आस्तिक है।
नास्तिक की न अस्ति में इतनी अस्ति होती है जितनी आस्तिक को अस्ति में।

वैसे निरुक्त में नास्तिक का परिचय देते हुए कहा गया की "वेद निन्दकौ नास्तिक:"

यहां मेरे मत अनुसार नास्तिक उसे कहा गया है जो वेद की श्रुति परम्परा में विश्वास नहीं रखता है। उसकी निन्दा करता है। इसमें ईश्वर को मानने और न मानने वाली बात ही नजर नहीं आती। बात श्रुति ज्ञान पर आकर सिमट जाती है। आगे विद्वान लोग इसका खुलासा कर सकते हैं।

इसलिए मैने पूर्व में कहा कि नास्तिक ही सबसे बड़ा आस्तिक है।

बस ऐसा ही कुछ बुद्धि ने प्रगट किया वह लिख दिया।

harendra singh rawat ने कहा…

aastik kaun hai aur nashik kaun hai, yeh ek vicharniya prashan hai ? nashtik kahata "hai bhagvan naheen hai", kyaa naheen hai ? "bhagvaan naheen hai". usake munh se bhee baar baar bhagvaan kaa naam nikalata hai. fir insaan chaahe koee bhee ho musibat padane par chaahe gaalee dekar hee sahee usaka naam to leta hee hai. fir bhee aapake vichaaron se main sahamat hoon.

vinay ने कहा…

बहुत ही गमभींर प्रश्न,आस्तिक हो या नास्तिक अपना बुरा समय काट ही लेतें है,आस्तिक पूजा,पाठ से थोडा़
बुरा समय काट लेतें है,पर नास्तिक के लिये थोड़ी कठनाई हो जाती है ।

ab inconvenienti ने कहा…

@ विनय

आपको कैसे पता की मुश्किल वक्त काटने में नास्तिकों को कितनी कठिनाई होती है. क्या आप खुद नास्तिक हैं या किसी नास्तिक ने आपको ऐसा बताया?

@ harendra singh रावत

जागरुक लोग कहते हैं भूत-शैतान सब काल्पनिक बातें हैं.

जवाब : जागरुक कहता "है भूत-शैतान नहीं है ", क्या नहीं है ? "भूत-शैतान नहीं है ". उसके मुंह से भी बार बार भूत शैतान का नाम निकालता है . फिर इंसान चाहे कोई भी हो इन मान्यताओं का विरोध करके ही सही दैविक-राक्षसी ताकतों नाम तो लेता ही है .

cmpershad ने कहा…

आस्था और अंधविश्वास में अंतर करनेवाला ही धर्म का सच्चा पथ पकड पायेगा।

nitin ने कहा…

निशांत मिश्र जी ,

मनोविज्ञान विज्ञान के अंतर्गत आता है .. और इसका अध्‍ययन साबित करता है कि हर वक्‍त मनुष्‍य मानसिक तौर पर एक सा नहीं रह पाता .. परिस्थितियां इनके सोंचने समझने के ढंग पर प्रभाव डालती है .. आप दावे से ऐसा कैसे कह सकते हैं .. कि‍ मुसीबत भरे समय को काटने के लिए किसी सहारे की आवश्‍यकता नहीं !!
Plz tell us the definition of "Astik"

संगीता पुरी ने कहा…

नितिन जी .. प्रकृति के नियमों पर विश्‍वास रखनेवाला आस्तिक कहलाता है !!

Udan Tashtari ने कहा…

आपसे हमेशा की तरह सहमत.

शिवम् मिश्रा ने कहा…


बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें