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सॉफ्टवेयर को अपग्रेड करने में कल मिली एक बडी सफलता ( Astrology )

अभी तक एक स्‍वर से गणित ज्‍योतिष को विज्ञान स्‍वीकार किए जाने के बावजूद इसी पर आधारित फलित पक्ष पर हमेशा वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वालों के द्वारा सवालिया निशान लगाया जाता रहा है। 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' ने इसे चुनौतीपूर्ण ढंग से लेते हुए इस शास्‍त्र को भी वस्‍तुपरक बनाने का पूरा प्रयास किया है। इस चिट्ठे को नियमित तौर पर पढने वालों को मालूम हो ही गया होगा कि ग्रहों के प्रभाव की इस नई गत्‍यात्‍मक खोज के बाद किसी भी व्‍यक्ति के जन्‍म कालीन ग्रहों के आधार पर उसके पूरे जीवन के उतार चढाव का चिंत्र खींचा जा सकता है। लगभग 40 से 50 हजार लोगों की जन्‍मकुंडली में इस ग्राफ की सटीकता को देखा गया , इस पोस्‍ट में कुछ महत्‍वपूर्ण लोगों के जन्‍मकालीन ग्रहों पर आधारित जीवन ग्राफ की चर्चा हुई है , जिसमें देखा जा सकता है कि उनके जीवन में परिस्थितियों का उतार चढाव इस ग्राफ के सापेक्ष ही रहा। इसी तरह हमारा सॉफ्टवेयर एक पाई चार्ट भी तैयार करता है , जिससे मालूम होता है कि पूरे जीवन आपके जीवन के विभिन्‍न संदर्भों का सुख दुख किस किस अनुपात में होगा। पर इस तरह के ग्राफ को देखने से यह स्‍पष्‍ट तो होता है कि किसी के जीवन में आनेवाला समय धनात्‍मक होगा या ऋणात्‍मक , पर यह स्‍पष्‍ट नहीं हो पाता कि जीवन में उतार या चढाव किन किन संदर्भों को लेकर होगा।

वस्‍तु परक ढंग से इसे समझाने के लिए मेरे पिताजी श्री विद्या सागर महथा जी ने भी कई तरह के प्रयोग किए , जिसमें बीस पच्‍चीस वर्ष पूर्व उनके द्वारा बनायी जाने वाली हस्‍त लिखित जन्‍म कुंडली में बनाया गया एक चार्ट सबसे महत्‍वपूर्ण था ....
इस चार्ट में एक ओर जीवन के विभिन्‍न संदर्भों का उल्‍लेख है तो दूसरी ओर जीवन के विभिन्‍न आयु वर्ग का भी। किस आयु वर्ग में किसी व्‍यक्ति के जीवन का कौन सा संदर्भ किस स्थिति में रहेगा , इसको उससे संबंधित खाने में भरा गया है।  A > B > C > D का चिन्‍ह बतलाता है कि जिस खाने में D लिखा हो उसे कार्यक्षमता , महात्‍वाकांक्षा , उत्‍तरदायित्‍व का बोध और स्‍तर के हिसाब से कमजोर और जिस खाने में A लिखा हो उसे  कार्यक्षमता , महात्‍वाकांक्षा , उत्‍तरदायित्‍व का बोध और स्‍तर के हिसाब से मजबूत समझा जाना चाहिए। इसी प्रकार + ऊंचे मनोबल के लिए तथा - मनोबल की गिरावट के लिए लिखा गया है। + और - में जितना अधिक पावर है , उस उम्र और उस संदर्भ में किसी का मनोबल उतना ही बढा या घटा हुआ होगा। इसी प्रकार दो तीन और चिन्‍ह के लिए भी अलग अलग अर्थ हैं , जिन्‍हें पाठक देख सकते हैं।

पिछले दस वर्षों से मैं नियमित तौर पर अपने पिताजी के 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के सभी सिद्धांतों को कंप्‍यूटराइज्‍ड कर कंप्‍यूटर से अलग अलग प्रकार के फल लेने की कोशिश करती आ रही हूं। काफी दिनों से मेरी भी इच्‍छा एक ऐसा ही चार्ट बनाने की थी , जिसमें अलग अलग आयु में लोगों के अलग अलग प्रकार के सुख और दुख को स्‍पष्‍टत: बताया जा सके। सहारा तो हमें इसी सूत्र का लेना था , पर परिणाम शब्‍दों में निकालना था। तीन महीने तक 84 खानों में अलग अलग सटीक परिणाम लाने के प्रयास में गंभीर मशक्‍कत होनी ही थी , पर इसके बाद कल मिली सफलता से मैं खुद ही चौंक गयी, जब मेरे सॉफ्टवेयर ने एक जन्‍मविवरण से इस तरह का पन्‍ना निकाला ........

उम्र के जिस जिस भाग में उन्‍हें जिस जिस प्रकार की सफलताएं और असफलताएं मिली , इसका सटीक उल्‍लेख इस एक पन्‍ने में मिल जाता है , वैसे तो इस खोज का सारा श्रेय मेरे पिताजी को ही जाता है , पर मैं कंप्‍यूटर की थोडी जानकारी रखते हुए अपने सॉफ्टवेयर में सटीक परिणाम ले आती हूं तो वह भी कम बडी उपलब्धि नहीं। 

हमारे सॉफ्टवेयर के आधार पर बने कुछ महत्‍वपूर्ण लोगों के जीवनग्राफ



मेरे ब्‍लॉग में और फेसबुक में अनेक बार जीवन ग्राफ शब्‍द की चर्चा हुई है .. शायद ही लोग जानते होंगे कि 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के सूत्रों के आधार पर किसी के जन्‍मकालीन ग्रहों को देखकर किसी के पूरे के उतार चढाव का लेखा चित्र ख्‍ींचा जा सकता है ... जीवन ग्राफ के अनुसार ही या तो हम आराम से सफलता प्राप्‍त करते हैं या कठिन श्रम से सफलता या कठिन श्रम के बाद भी असफलता या फिर निराशाजनक वातावरण में जीने को बाध्‍य होते हैं .... कभी परिस्थितियां हमारे नियंत्रण में होती हैं तो कभी हम परिस्थितियों के नियंत्रण में ... मेरे सॉफ्टवेयर ने कुछ महत्‍वपूर्ण लोगों का जीवन ग्राफ निकाला है ... इस लेख में कुछ उदाहरणों द्वारा स्‍पष्‍ट किया जा रहा है ...

यह फिल्‍म स्‍टार संजय दत्‍त का जीवन ग्राफ है ... बचपन में मां की मृत्‍यु के उपरांत इनका 1983 तक का समय बहुत कठिनाईपूर्ण व्‍यतीत हुआ , उसके बाद 1989 तक आरामदायक जीवन था , पर 1989 के बाद से ही ग्राफ ने मोड लिया , 1995 के बाद किए जाने वाले मेहनत के बाद भी 2001 के आसपास का समय असफलतापूर्ण बना रहा , पर उसके बाद कानूनी शिकंजे में कुछ ढील मिली , इन्‍हें काम करने का वातावरण और 2007 से 2013 तक का समय तो जीवन के सर्वाधिक सफलता का समय बना रहा।। 2013 में अचानक कानूनी शिकंजा कुछ तेज हो गया है , ग्राफ के हिसाब से भी आगे समय सही नहीं दिखता।








यह फिल्‍म स्‍टार अमिताभ बच्‍चन का जीवन ग्राफ है .. ये भी 1966 तक के जीवन को काफी सुखद नहीं मानते , परिस्थितियों की कुछ कठिनाई हो न हो स्‍वभाव के अतर्मुखी थे और उनके बाद में इतने बडे स्‍टार बन जाने की बात कोई नहीं सोंच सकता था , पर हम देख सकते हैं कि उसके बाद इनका पूरे जीवन ग्राफ सकारात्‍मक रहा और 2014 तक निरंतर काम का वातावरण और सफलता मिलती गई , 2006 से स्‍वास्‍थ्‍य को लेकर यदा कदा परेशानी आती रही है वो 2014 के बाद बढ सकती है , क्‍योंकि 2014 के बाद इनके जीवन ग्राफ में ऋणात्‍मकता है।











यह बिहार के मुख्‍य मंत्री लालू प्रसाद यादव का जीवन ग्राफ है .. बचपन से कमजोर परिस्थितियों के साथ आरंभ होने वाली जीवन यात्रा 1978 तक बहुत ही अच्‍छी बन गयी , जहां छात्र नेता के रूप में इनका व्‍यक्तित्‍व महत्‍वपूर्ण था , पर उसके बाद काम का वातावरण मिलने के बावजूद स्‍तर के बावजूद 1990 तक बडी सफलता नहीं दिख सकी , 1990 से 2002 तक ग्राफ के उत्‍तरोत्‍तर विकास के साथ मुख्‍यमंत्री के तौर पर ये महत्‍वपूर्ण बने रहें , 2002 के बाद ग्राफ में गिरावट के साथ ही इन्के सम्‍मुख कुछ न कुछ कठिनाई उपस्थित होनी आरंभ हुई और 2008 के बाद असफलता का क्रम 2014 तक किसी न किसी रूप में मौजूद रहा । 2014 में पुन: परिस्थितियों में कुछ सुधार की गुंजाइश है।










यह मेनका गांधी का जीवन ग्राफ है .... जन्‍म से 1974 तक सुखद माहौल में पालन पोषण और व्‍यक्तित्‍व का संपूर्ण विकास प्राप्‍त करने के बाद इनका परिस्थितियों से नियंत्रण कमजोर दिखने लगा है , किस तरह की ऋणात्‍मक वातावरण को झेल रही थी , उनकी मन:स्थिति के बारे में तो मैं नहीं बता सकती , पर 1980 के बाद की परिस्थिति तो उनके ग्राफ के सत्‍य को बयान कर ही देती है। उनके साथ जो हुआ वह 1986 तक उन्‍हें निराश करने के लिए काफी था। 1986 के बाद वो निरंतर काम कर अपने महत्‍व को स्‍थापित करती जा रही है , पर 2010 तक का समय बडी सफलता का नहीं दिख रहा। 2016 के बाद कुछ अच्‍छी उम्‍मीद रखी जा सकती है।










यह फिल्‍म स्‍टार सलमान खान का जीवन ग्राफ है , 2007 के आसपास के कुछ वर्षों को छोड दिया जाए तो 1989 से 2019 तक ग्राफ सकारात्‍मक ही दिख रहा है , निरंतर सफलता की सीढियां चढते जा रहे हैं , 2019 के बाद ही इनके जीवन में कुछ बाधाएं आ सकती हैं , जो 2025 के बाद बडा रूप ले लें।












यह गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष के जनक मेरे पिताजी श्री विद्या सागर महथा जी का जीवन ग्राफ है .. जैसा कि ग्राफ की शुरूआत निम्‍न स्‍तर से हुई है , बचपन में हुए चेचक ने न सिर्फ छह महीने बिस्‍तर पर रहने मजबूर और शरीर को कुछ दिनों के लिए कमजोर किया , वरन् पूरे जीवन के लिए चेहरे पर चेचक के दाग दे दिया , पर क्रमश: बढते हुए ग्राफ ने इन्‍हें समाज में मेधावी छात्र के तौर पर स्‍थापित किया और 1963 तक की जीवनयात्रा एक विद्यार्थी के तौर पर बहुत अच्‍छी रही। पर 1963 के बाद जैसे ही ग्राफ में गिरावट आरंभ हुई , कैरियर में हर जगह असफलता ही हाथ आयी , 1969 तक निराशा के भंवर में डूबने उतराने के बाद उन्‍होने गंभीरता से प्रकृति के उस रहस्‍य को समझने की चेष्‍टा की , जिसके कारण इतने प्रतिभाशाली होते हुए भी वे ढंग की नौकरी न प्राप्‍त कर सके। छह वर्षों तक तरह तरह की ज्‍योतिष की पुस्‍तकों में बिखरे पडे ज्‍योतिषीय तथ्‍यों के परत दर परत खोलते हुए उनके सामने 1975 तक सचमुच एक रहस्‍य सामने आया , उसके बाद तो ग्रहों के प्रभाव के एक एक रहस्‍य की गुत्‍थी सुलझती चली गई। 1981 के बाद प्रायोगिक तौर पर काम आरंभ हुआ और निरंतर चल रहा है।







यह ग्राफ उ० प० के मुख्य मंत्री अखिलेश यादव की है, २०१५ तक अनायास सफलता प्राप्ति का ग्राफ दिख रहा है , ....






यह ग्राफ क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी का है , २०११ तक आसान सफलता के बाद गंभीरता बढ़ी है ……










यह ग्राफ बॉलीवुड की महान अदाकारा हेमा मालिनी जी का है .......






यह ग्राफ जैकी श्रॉफ को तब दिया गया था , जब लगातार उनकी हर फिल्म हिट हो रही थी ....






यह ग्राफ संसद मनोज तिवारी का है....









यह ग्राफ शबाना आजमी जी का है .......









यह ग्राफ वरुण गांधी का है ...................










यह ग्राफ पूरे आसमान में मौजूद सारे ग्रहों के चित्र को देखकर बनाया जाता है , अबतक 40,000 से ऊपर कुंडलियों में इसकी जांच हो चुकी है , विरले ही कहीं अपवाद नजर आया हो। इस खोज के बाद एक बात स्‍पष्‍ट हुई है कि आज के समाज की जो जीवनशैली है , वह प्राकृतिक तौर पर सही नहीं है , हमें अपनी जीवनशैली अपनी सोंच बदलनी होगी।








डॉ बी एन पांडेय जी के द्वारा लिखा गया प्राक्‍कथन



सूर्यादि ग्रहों तथा अश्विन्‍यादि नक्षत्रों के गणित तथा फलित का वर्णन विवेचन करने वाले शास्‍त्र की अभिद्दा ज्‍योतिष है। वेद के छठे अंग ( अनुक्रमत शिक्षा , कल्‍प , व्‍याकरण , तिरूक्‍त , छंद और ज्‍योतिष ) के रूप में ज्‍योतिष विद्या की प्राचीनता एवं महत्‍व निर्विवाद है। वेदांगों के बिना वेदों का सम्‍यक अध्‍ययन तथा उनके द्वारा अनुदेशित आचरणों के अनुरूप जीवनचर्या ढालकर ऊर्घ्‍वगामिता सिद्ध नहीं हो सकती। वेदांगों में ज्‍योतिष को वेदों का साक्षात नेत्र (वेदस्‍य चक्षु o) कहा गया है। हमारा जीवन श्रोताश्रित यानि  वंदाधारित हो अथवा स्‍मार्त्‍ताश्रित यानि परंपरावादी धर्मशास्‍त्रानुरूप ज्‍योतिष विज्ञान दोनो का अधिष्‍ठान है। प्रारंभ में वैदिक कर्मकांड की तिथियों तथा उससे संबंधित मांगलिक मुहूर्त्‍तों को जानने के लिए ज्‍योतिष विद्या का चिंतन एवं आविर्भाव किया गया। पर कालक्रम से इसके आयाम उपवृंहित होकर भविष्‍य का पूर्वज्ञान करने तथा जीवन जातक के भावी शुभाशुभ घटनाओं के पूर्व कथन करने तक विस्‍तीर्ण हो गया। विष्‍णुधर्मोत्‍तरपुराण के एक श्‍लोक से सिद्ध होता है कि ज्‍योतिष विद्या या ज्‍योतिर्विज्ञान का दूसरा नाम काल विधान शास्‍त्र भी है ..
वेदास्‍तु यज्ञार्थमभिप्रवृत्‍ता: कालानुपूर्वा विहिताश्र्च यज्ञा:।
तस्‍मादिदं कालविधान शास्‍त्र, यो ज्‍योतिषं वेद स वेद सर्वम् ।।

अर्थात् वेद तो यज्ञों के अनुष्‍ठान के लिए प्रवृत्‍त हुए हैं और सभी यज्ञ कालानुपूर्व ( क्रमबद्ध रूप से निर्धारित यानि निर्णित काल से पहले ही बंधे हुए हैं ) हैं , इसलिए जो विद्वान कालविधानशास्‍त्र यानि ज्‍योतिष विद्या का ज्ञाता है वही सर्वज्ञाता है ।
इससे यह भी सिद्ध होता है कि ज्‍योतिर्विज्ञान के और चाहे जितने उद्देश्‍य हों , इसका मुख्‍य प्रयोजन काल विधान ही है। इसके बिना षोडष संस्‍कार , तिथि , वार , योग , नक्षत्रों की स्थिति इसके अनुरूप व्रत निर्देश , जातक एवं होरा विषयक मुहूर्त्‍तादि विचार संभव ही नहीं है। समासत: सकल ज्ञान का आधार ज्‍योतिष विद्या ही है तथा यही इसका मुख्‍य उद्देश्‍य भी है।

अर्थात यह ज्‍योतिष शास्‍त्र वेदो का नेत्र है , अतएव उसकी प्रधानता अन्‍य वेदांगों के बीच स्‍वत: प्रमाणित है , क्‍योंकि अन्‍य सभी अंगों से परिपूर्ण व्‍यक्ति नेत्रहीन होने से नहीं के बराबर है।
वेदस्‍य चक्षु किल शास्‍त्रमेतत्‍प्रधानतांगेषु ततोर्थजाता।
अंगैर्युतोन्‍ये: परिपूर्णमूर्तिश्र्चक्षुर्विहीन: पुसषों न किंचित्।। 

यह ज्‍योतिष शास्‍त्र स्‍कंध त्रियात्‍मक है , इसका प्रथम स्‍कंध ( शाखा अथवा विभाग ) सिद्धांत स्‍कंध , दूसरा संहिता स्‍कंध और तीसरा होरा स्‍कंध कहा जाता है। त्रुटि ( समय का अत्‍यंत सूक्ष्‍म भाग ) से लेकर प्रलय के अंत तक के काल और सूर्यादि ग्रहों से संबंधित कालमान की गणना की गणित विद्या को सिद्धांत स्‍कंध कहते हैं।

सूर्यदि ग्रहों , विविध केतुओं , तारामंडलों , नक्षत्रों , ताराओं , तारामंडलों के स्‍थान , योग , उनकी गति संबंधी शुभाशुभ फलों के विचार , शास्‍त्र को संहिता स्‍कंध कहते हैं। तथा ज्‍योतिष के जिस अंग के द्वारा जन्‍म , वर्ष , इष्‍ट काल पर ग्रहादि के प्रभाव , दृष्टि , बल , दशा एवं अंतर्दशादि की गणना और फलाफल का र्नि‍णय किया जाता है , उसे होरा स्‍कंध कहते हैं। होरा , जातक तथा हायन इसी के पर्यावाची नाम हैं। विद्वानों के मतानुसार अहोरात्र शब्‍द के आदि और अंत के वर्णों का लोप होकर ही होरा शब्‍द निर्मित हुआ है , जिसका अर्थ लग्‍न अथवा लग्‍नार्थ होता है , जिसके द्वारा जातक अर्थात जन्‍म और नवजात शिशु संबंधी सभी घटना फलों का विचार किया जाता है।

‘चतुर्लक्षं च ज्‍योतिषं’ सूत्र के अनुसार मूल ज्‍योतिर्विज्ञान 400000 श्‍लोकों से समृद्ध है। नारदसंहिता , कश्‍यपसंहिता और पराशरसंहिता के साक्ष्‍य से इस विज्ञान के 18 प्रवर्तक माने जाते हैं। यथा ब्रह्मा , सूर्य , वशिष्‍ठ , अवि , मनु , सोम या पौल्‍स्‍त्‍य , लोमश , मरीच , अंगिरा , व्‍यास , नारद , शौनक , भृगु , च्‍यवन , यवन , गर्ग , कश्‍यप तथा पराशर । ( कुछ पश्चिम भक्‍त लेखकों ने यवनाचार्य को म्‍लेच्‍छ के रूप में यूनानी लोमश को रोमश बताकर रोम का तथा पौल्‍स्‍त्‍य को एलेक्‍जेन्ड्रिया का पॉल नाम से विदेशी निर्धारित करने की चेष्‍टा की है। दृष्‍टब्‍य अद्भुत भारत ( वंडर दैट वाज इंडिया ) लेखक ए एल बाशम पृष्‍ठ 492 )

उत्‍तर वैदिक काल के ज्‍योतिषियों में आर्यभट्ट (पांचवी शताब्‍दी) , वराहमिहिर (छठी शताब्‍दी) , लल्‍लू ब्रह्मगुप्‍त (सातवीं शताब्‍दी) तथा भास्‍कराचार्य के नाम से प्रख्‍यात है। ज्ञातब्‍य है कि पश्चिम जगत को ज्ञात होने से काफी पहले आर्यभट्ट ने यह सिद्धांत स्‍थापित किया था कि सूर्य स्थिर है तथा पृथ्‍वी ही उसकी परिक्रमा करती है। यद्पि सिद्धांत , संहिता और होरा स्‍कंध के अंतर्गत शतश: उपविषय सिन्‍नविष्‍ट है , पर स्‍थूल रूप से इसके ही दो भाग प्रमुख हैं..
1. गणित तथा 2. फलित , जो गिरा ( वाणी ) और अर्थ अथवा जल और वीचि यानि लहर के समान परस्‍पर अभिन्‍न रूप से जुडे है , जिस प्रकार अर्थरहित शब्‍द बेकार होता है , उसी प्रकार फलित पक्ष विहीन गणित ज्‍योतिष भी व्‍यर्थ होता है। तदापि इन दोनो में ज्‍योतिष प्रधन्‍तर है , क्‍योंकि गणित के बिना फलित ज्‍योतिष किसी निष्‍कर्ष पर नहीं पहुंच सकता। वह सर्वथा परतंत्र और गणित ज्‍योतिष के अधीन है।

पूर्वोक्‍त प्राचीन 18 प्राचीन आचार्यों के सिद्धांतों में संप्रति जो सिद्धांत सर्वाधिक मान्‍य है , वह है सूर्य सिद्धांत। वैसे वराह मिहिर ने अपनी पुस्‍तक पंच सिद्धांतिका में पांच , नृसिंह दैवज्ञ ने हिल्‍लाजदीपिका में छह , दैवज्ञ पुंजराज ने अपने ग्रंथ शंभुहोरा प्रकाश में सात तथा शाकल्‍य संहिता के ब्रह्म सिद्धांत में आठ सिद्धांतों के होने की चर्चा मिलती है।  किंतु सभी ने सूर्य सिद्धांत को ही सबसे अधिक मान्‍य प्रामाणिक और शुद्ध माना है। ज्‍योतिर्विज्ञान की प्राचीनता के अतिरिक्‍त यह निर्विवाद है कि गणित और ज्‍योतिष शास्‍त्र सारे संसार में भारत से ही फैले हैं। खगोल और भूगोल विद्या भी ज्‍योतिष के अंग हैं। सामान्‍य भाषा में शून्‍य का अर्थ आकाश होता है। पर ज्‍योतिष के अनुसार आकाश शून्‍य ( खाली ) नहीं है। इसमें अनेक ग्रहों , नक्षत्रों और तारामंडल की अवस्थिति है। आकाश को प्राचीन ऋषियों ने तीन भागों में विभक्‍त किया है ...
क. पृथ्‍वी ख. अंतरिक्ष और ग. द्यूलोक । नक्षत्र मंडल को भी राशिचक्रों में विभाजित किया गया है और प्रत्‍येक राशि के साथ सूर्य के संक्रमण को देखकर 12 राशियों के नाम पर 12 सोर मास तथा पूर्णिमा की रात में नक्षत्र विशेष के साथ चंद्रमा की सन्निकटता के आधार पर चांद्रमासों का विधान किया गया। जिस मास की पूर्णिमा चित्रा नक्षत्र से युक्‍त थी , उसे चैत , विशाखा से युक्‍त को बैशाख , ज्‍येष्‍ठा से ज्‍येष्‍ठ , पूर्वाषाढ या उत्‍तराषाढ से आषाढ , श्रवण से श्रावण , पूर्व एवं उत्‍तर भाद्रपद से भाद्रपद ( भादो ) , अश्विनी से आश्विन , कृतिका से कात्रिक , मृगशिरा से मार्गशीर्ष ( अगहन  , पुष्‍य से पौष , मघा से माघ तथा पूर्वा और उत्‍तरा फाल्‍गुनी नक्षत्र से फाल्‍गुन महीने का नामकरण हुआ। इसी तरह वारों या दिनों के नाम भी ग्रहों के प्रात:कालीन स्थिति के आधार पर हैं और इनका क्रम पूर्णत: वैज्ञानिक है।

भारतीय ज्‍योतिष में चिंतन और प्रयोग का बराबर महत्‍वपूर्ण स्‍थान रहा है। जयपुर और दिल्‍ली की वेधशालाएं इनकी प्रयोग धर्मिता के प्रमाण हैं,  केवल बंधे बंधाए सूत्रों पर यह नहीं चलता रहा है , अन्‍यथा आर्यभट्ट वराहमिहिर , ब्रह्मगुप्‍त का कोई स्‍थान नहीं होता। वशिष्‍ठ , लोमश , अत्रि , आर्यभट्ट एवं ब्रह्मगुप्‍त से लेकर कृष्‍णमूर्ति तक भारतीय ज्‍योतिष को नया आयाम देने की परेपरा चलती आ रही है , चाहे वह गणित के क्षेत्र में हो या फलित के क्षेत्र में। ज्‍योतिष में व्‍यास , वशिष्‍ठ , मृग , पराशर के बाद , सत्‍याचार्य और उसके बाद प्रसिद्ध वैज्ञानिक ज्‍योतिषाचार्य वाराह मिहिर हुए , जिन्‍होने इस विद्या को व्‍यवस्थित किया। 20वीं सदी में उल्‍लेखनीय स्‍वर्गीय सूर्य नारायण राव , श्री लक्ष्‍मण दास मदान , डॉ वी भी रमण , डॉ कृष्‍णमूर्ति और भगवान दास मित्‍तल रहें। डॉ रमण की अंग्रेजी की पत्रिका ‘द एस्‍ट्रोलोजिकल मैगजीन’ ने देश विदेश में भारतीय ज्‍योतिष की महानता को उजागर किया है। उनके संपादकीय देश विदेश के राजनीतिक उतार चढाव के लिए काफी चर्चित रहे हैं। नवीनता के संदर्भ में श्री भगवान दास मित्‍तल का बहुत बडा योगदान रहा , जिन्‍होने राशि से अधिक महत्‍वपूर्ण लग्‍न को समझा और इनकी सारी विवेचनाएं इसी पर आधारित रही हैं। श्री कृष्‍णमूर्ति भी ज्‍योतिष को पूर्ण विज्ञान का दर्जा दिलाने में अग्रसर रहे हैं। उनका ज्‍योतिष पंचांग एवं अयनांश शत प्रतिशत शुद्ध है। इसी प्रकार पत्रिका बाबाजी राजनैतिक और व्‍यक्तिगत भविष्‍यवाणी , भूकम्‍प , भ्रष्‍टाचार , सनसनीखेज हत्‍याएं और दुर्घटनाओं की शत प्रतिशत भविष्‍यवाणियों के लिए नाम कमा चुकी है। इसके संपादक श्री मदान जी इस प्रकार की घटनाओं का अंदाजा ग्रहों की चाल से लगाते हैं। इसी प्रकार ‘ज्‍योतिष तंत्र विज्ञान’ , ‘तंत्र मंत्र यंत्र विज्ञान’ ‘ज्‍योतिष्‍मती’ , ज्‍योतिष धाम’ आदि पत्रिकाओं के संपादक अपनी अपनी पत्रिका के माध्‍यम से ज्‍योतिष विज्ञान का प्रचार प्रसार करते आ रहे हैं।

ज्‍योतिष के क्षेत्र में पिता से शिक्षा ग्रहण करने और पुत्री से सहयोग प्राप्‍त करने की परंपरा भी प्राचीन काल से ही चली आ रही है। लीलावती ने अपने पिता से ही ज्‍योतिष का ज्ञान प्राप्‍त किया था। अपने पिता के मरणोपरांत उनकी पुत्री श्रीमती सुप्रिया जगदीश ही ‘ज्‍योतिष्‍मती’ का संपादनभार संभाल रही है। श्रीमती गायत्री देवी वासुदेवन ‘द एस्‍ट्रोलोजिकल मैगजीन’ के संपादन में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इसी ज्‍योतिष विज्ञान की विकास दशा एवं नव्‍य दिशा बुद्धि की परंपरा में प्रस्‍तुत पुस्‍तक ‘गत्‍यात्‍मक दशा पद्धति: एक परिचय’ का प्रणयण गणित विषय में कुशाग्र प्रज्ञा समृद्ध लेखिका श्रीमती संगीता पुरी ने किया है। यह विद्या उन्‍हें स्‍वनाम धन्‍य तेजस्‍वी ज्‍योतिषी पिता श्री विद्या सागर महथा , ज्‍योतिष वाचस्‍पति , ज्‍योतिष रत्‍न से प्राप्‍त हुई है , जिन्‍होने लगभग पूरी आयु ज्‍योतिष के अध्‍ययन मनन और चिंतन में लगायी है। दशा पद्धति की गत्‍यात्‍मक पद्धति उनके चिंतन और अन्‍वेषण का परिणाम हैं, जिसे विरासत के रूप में उनकी पुत्री ने उनसे पूरी अर्हता के साथ ग्रहण किया है। पुस्‍तक की विषय वस्‍तु , प्रमेयों , प्रतिपत्तियों , निष्‍कर्षों और तार्किक विश्‍लेषणों से यह सहज ही विश्‍वास होता है कि इस पुस्‍तक से फलित ज्‍योतिष को एक नई और मौलिक चिंतन दिशा मिलेगी। फलित ज्‍योतिष के क्षेत्र में गत्‍यात्‍मक दशा पद्धति की यह पहली कृति है , जिसका श्रेय लेखिका को मिलेगा। फलित ज्‍योतिष की पिटी पिटायी परंपराओं के यांत्रिक विवेचन से हटकर वैज्ञानिक ज्‍योति‍षीय तथ्‍यों का प्रादुष विवेचन इस पुस्‍तक की विशेषता है , जो अभी तक फलित ज्‍योतिष के एकमेव आश्रय विंशोत्‍तरी पद्धति की शरणागति की अनिवार्यता को अस्‍वीकार करती है।

विंशोत्‍तरी पद्धति के स्‍थान पर ज्‍योतिष में वर्णित ग्रहों की अवस्‍था को क्रमानुसार स्‍थान पुस्‍तक की विवेच्‍य प्रणाली में दिया गया है , लेखिका की मान्‍यता है कि बाल्‍यावस्‍था में प्रभावित करनेवाला उपग्रह चंद्रमा है , भले ही जातक का जन्‍म किसी भी नक्षत्र में हुआ हो। इसी तरह वृद्धावस्‍था को प्रभावित करने वाले ग्रह बृहस्‍पति और शनि हैं। इसका कारण यह है कि फलित ज्‍योतिष में वृद्धावस्‍था का ज्ञानी ग्रह बृहस्‍पति माना गया है , उत्‍तर वृद्धावस्‍था के प्रतीक ग्रह के रूप में शनि की मान्‍यता है। इस दशा पद्धति में ग्रहों का कालक्रम क्रमश: चंद्र , बुध , मंगल , शुक्र , सूर्य , बृहस्‍पति , शनि , यूरेनस , नेप्‍च्‍यून और प्‍लूटो को रखा गया है। जन्‍म नक्षत्र पर इस दशाकाल की कोई आश्रिति नहीं है। इस मौलिक दशा पद्धति के जन्‍म दाता श्री विद्या सागर महथा की मान्‍यता है कि सभी ग्रहों के दशाकाल को संचालित करने का अधिकार मात्र चंद्रमा को देना सर्वथा अवैज्ञानिक है। अपने दशाकाल में सभी ग्रह अपनी बल स्थिति अपनी गत्‍यात्‍मकता के अनुसार संभालेंगे , यह सहज वैज्ञानिक बुद्धि से समर्थित और पुष्‍ट होता है।

इस दशा पद्धति में राहू और केतु कोई आकाशीय पिंड नहीं है ,  भौतिक विज्ञान के अनुसार पदार्थ की अनुपस्थिति में शक्ति या ऊर्जा की परिकल्‍पना नहीं की जा सकती। प्रस्‍तुत दशा पद्धति में एक ओर ग्रहों के दशा काल में निश्चित कालक्रम को स्‍थान दिया गया है , तो उसी वैज्ञानिकता से ग्रहों में बलाबल की परंपरागत रीति से हटकर विचार किया गया है। इसमें चेष्‍टा बल , दिकबल , स्‍थानबल , अष्‍टकवर्ग बल आदि से भिन्‍न ग्रहों के गत्‍यात्‍मक और स्‍थैतिक बल को तथा ग्रहों की गमता को ग्रह बल का मुख्‍य आधार माना गया है। जो हो , यह तो सभी मानेंगे कि जिस विधि से संपूर्ण जीवन की तिथियुक्‍त भविष्‍यवाणी बहुत ही आत्‍मविशवास के साथ और सही सही की जा सके , वही विधि अंतत: लोकग्राह्य होगी।

यूरेनस, नेप्‍च्‍यून तथा प्‍लूटो आदि पाश्‍चात्‍य मान्‍यता के ग्रहों की स्‍वीकृति तथा भारतीय फलित ज्‍योतिष में उसका सन्निवेश भी इस बात का प्रमाण है कि लेखिका अबतक की रूढ परंपराओं में बंधी नहीं होकर प्राच्‍य और पाश्‍चात्‍य पुरातन और अर्वाचीन दोनो की उपयोगी ज्‍योतिषीय पद्धतियों का स्‍वीकार करने में कोई संकोच नहीं किया है। ‘ या नो भद्रा तत्‍वो यन्‍तु विश्‍वस्‍त:’ ( सारे विश्‍व से भद्र विचार हमारे पास आवें) के आर्ष वाक्‍य के अनुदेश के सर्वथा अनुकूल हैं। नए रास्‍ते पर चलनेवाले पहले व्‍यक्ति को बहुत सी कठिनाइयों का सामना करना पडता है। उसके लिए सारस्‍वत स्‍वीकृति सहज नहीं होती। ऐसी ही परिस्थिति में महाकवि कालिदास ने कहा था ....
पुराणमित्‍येव न साधु सर्वं , न चापि सर्व नवमित्‍यवद्यम ।
सन्‍त: परिक्ष्‍याण्‍यतरद् भजन्‍त , मूढ: पर प्रत्‍ययनेय बुद्धि ।।

‘जो पुराना है , वह न तो सबका सब ठीक है और न जो नया है वह सभी केवल नया होने के कारण अग्राह्य है। साधु बुद्धि के लोग दोनो की परीक्षा करके स्‍वीकार और अस्‍वीकार करते हैं , दूसरों के कहने पर तो मूढ ही राय बनाते हैं’
मेरा विश्‍वास है कि प्रस्‍तुत पुस्‍तक अपनी मौलिकता और विवेचन बल पर ज्‍योतिषीय जगत में अपने आदर का स्‍थान स्‍वयमेव बना लेगी और इसकी प्रतिभापूर्ण लेखिका एक नए हस्‍ताक्षर के रूप में सम्‍मान अर्जित करेंगी , ऐसा ही हो , यह मेरा आशीर्वचन तथा शुभांशसा दोनो है। राष्‍ट्रीय एवं अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर के नक्षत्र शास्‍त्रीय पत्र पत्रिकाओं में लेखिका की जो रचनाएं स्‍वागत पा रही हैं , उससे मेरी इन आशाओं और विश्‍वासों को मूर्त्‍त होने की आश्‍वस्ति मिलती है।

इत्‍यलम् इतिशुभम
डॉ विश्‍वंभर नाथ पांडेय
एम ए , एल एल बी, पी एच डी
निदेशक , भारतीय संस्‍कृति एवं लोक सेवा संस्‍थान
भूतपूर्व प्राचार्य , रांची कॉलेज , रोची , झारखंड 

ज्‍योतिष के उज्‍जवल पक्ष की खोज


‘ज्‍योतिष : सच या झूठ’ नामक अपने ब्‍लॉग में जहां एक ओर ज्‍योतिष की समस्‍त कमजोरियों को स्‍वीकार किया है , वहीं दूसरी ओर इसके उज्‍जवल पक्ष की मैने वकालत भी की है। मैं इस विद्या का अंध भक्‍त नहीं हूं , फिर भी मैने पाया कि इस विद्या में वैज्ञानिकता की कोई कमी नहीं। यह वैदिककालीन विद्या है और हजारो वर्षों के बाद भी इसका अस्तित्‍व ज्‍यों का त्‍यों बना हुआ है। अत: इसमें अंतर्निहित सत्‍य को अस्‍वीकार करना अपनी अपरिपक्‍वता का परिचय देना है। 

ज्‍योतिष विद्या मुझे काफी रूचिकर , आत्‍मज्ञान प्रदान करनेवाली लगी और मैने अपना संपूर्ण जीवन इसी में समर्पित कर दिया। मुझे प्रथम दृष्टि में ही महसूस हुआ कि इस विद्या में वैज्ञानिक विकास की अपरिमित बहुआयामी संभावनाएं हैं। गाणितिक संभावनावाद का उपयोग करके राजयोगों को विरल और चुस्‍त दुरूस्‍त किया जा सकता है और विरामावस्‍था के ग्रहों को सम्मिलित करके राजयोगों की सार्थकता को सिद्ध की जा सकती है। ग्रह शक्ति से संबंधित रहस्‍य ग्रहों की गति में छिपा हुआ है , इसलिए गतिज और स्‍थैतिज ऊर्जा को निर्धारित करने वाले सूत्रों की खोज की जा सकती है। पुन: फलित ज्‍योतिष में काल निर्धारण के लिए जितनी भी पद्धतियां प्रचलित हैं , सभी की गणना चंद्र नक्षत्र से की जाती हैं और शेष ग्रहों को अपना फल प्रदान करने के लिए पंक्तियों में खडा कर दिया जाता है। 

सभी ग्रहों या आकाशीय पिंडों का परिभ्रमण पथ अप्रत्‍यक्षत: पृथ्‍वी के सापेक्ष भी निश्चित दूरी पर है। अगर सचमुच शरीर ब्रह्मांड का प्रतिनिधित्‍व करता है , तो शरीर के ग्रंथियों को प्रतिनिधित्‍व इन ग्रहों को करना चाहिए। बाल्‍य काल की ग्रंथि से बाल्‍य काल की गतिविधि , किशोरावस्‍था की ग्रंथि से किशोरावस्‍था की गतिविधि , युवावस्‍था की ग्रंथि से युवावस्‍था की गतिविधि को जोडा जाना चाहिए। इसी तरह हर काल के लिए जिम्‍मेदार एक ग्रंथि होगी और मानव जीवन के हर काल की एक ग्रंथि का प्रतिनिधित्‍व एक निश्चित आकाशीय पिंड करेगा। उल्लिखित सारे संदर्भ मेरे चिंतन मनन के विषय अनवरत बने रहे। इस कारण आज मैं फलित ज्‍योतिष की वैज्ञानिकता को सिद्ध करने की स्थिति में हूं।

परंपरागत फलित ज्‍योतिष का जिस ढंग से विकास हुआ , जहां पर आकर इसकी विकास गति अवरूद्ध हो गयी है , वहां से इसे दावापूर्वक विज्ञान सिद्ध करना कठिन है। किसी विशेष ग्रह के विशेष भाव स्थिति में एक परिणाम को सिद्ध नहीं किया जा सकता। एक ग्रह ,एक भाव के फलाफल की परिवर्तनशीलता को अन्‍य ग्रह स्थिति से जोडा जाता रहा है , जो सर्वथा उचित नहीं है , वरन् फलाफल परिवर्तनशीलता का कारण ग्रह की विभिन्‍न गतियां हैं। परंपरागत ज्‍योतिष में ग्रहों की राशि और भाव स्थिति का फल वर्णित है , वहां ग्रह की स्‍थैतिक शक्ति का प्रतिशत क्‍या है , उस भाव में किस हैसियत से काम कर रहा है , इसे समझाने की बहुविध कोशिश होती रही और आम ज्‍योतिषी इस प्रयास में अनुमान के जंगल में भटक गए। एक ही ग्रह के विभिन्‍न गतियों में उसके भिन्‍न भिन्‍न फलाफल का गहरा संबंध है। इन खोजों के पश्‍चात फलित ज्‍योतिष को अनायास विज्ञान सिद्ध किया जा सकता है।

मुझे अब इस बात में किसी प्रकार का संशय नहीं रह गया कि ग्रहों का जड चेतन , वनस्‍पति , जीव जंतु और मानव जीवन पर प्रभाव है। अब किस दिन भूकम्‍प हो सकता है , किस दिन वर्षा हो सकती है , किस दिन समुद्री तूफान आ सकता है , किस दिन संसद में पक्ष विपक्ष में गर्मागर्म बहस होगी और लोग उनकी बातों को सांसे थाम सुन रहे होंगे , अभिप्राय सरकार के टूटने और बनने की स्थिति कब आएगी , किस विशेष तिथि को शिखर सम्‍मेलन होगा , कब कोई आंदोलन या हडताल निर्णायक मोड पर होगी। कोई व्‍यक्ति अपने जीवन के किस भाग में अपने सर्वोच्‍च मंजिल को प्राप्‍त कर सकता है, किस तिथि या काल में महत्‍वपूर्ण व्‍यक्ति कुंठित जीवन जी सकता है , इन प्रश्‍नों का उत्‍तर फलित ज्‍योतिषी आसानी से दे सकता है। 

अब उस युग का शीघ्र ही अंत होनेवाला है , जब कोई ज्‍योतिषी किसी व्‍यक्ति के मनोभाव को समझकर तद्नुरूप अनुमानित भविष्‍यवाणी किया करते थे और सभी ज्‍योतिषियों की भविष्‍यवाणियां भिन्‍न भिन्‍न हुआ करती थी। मेरे शोधपूर्ण लेखों के पठन पाठन , अध्‍ययन मनन के पश्‍चात् अति दूरस्‍थ अपरिचित व्‍यक्ति की कुंडली देखकर उसके भूत , वर्तमान और भविष्‍य की जानकारी आसानी से दी जा सकती है। इन सिद्धांतों पर की गयी सभी ज्‍योतिषियों की भविष्‍यवाणियां एक जैसी होंगी। इस पुस्‍तक में ग्रह गति को ग्रह शक्ति का आधार मानते हुए ग्रह शक्ति निर्धारण का सूत्र दिया गया है तथा एक नई दशा पद्धति का उल्‍लेख है , जिसमें मानव जीवन के निश्चित उम्र अवधि में ग्रहों के फलाफल की चर्चा है। अत: अब ग्रहों के प्रभाव को लेखाचित्र में प्रस्‍तुत किया जा सकता है। इन नए सूत्रों और सिद्धांतों के प्रयोग से फलित ज्‍योतिष का कायाकल्‍प हो गया है।

आकाश में ग्रह की गति में जैसे ही बदलाव आता है , पृथ्‍वी पर प्रभाव डालनेवाले , मानव जीवन पर प्रभाव डालने वाले परिवेश में द्रुत गति से परिवर्तन होता है। ग्रहों की गति के सापेक्षा संसार में घटित होने वाली घटनाओं को देखकर पृथ्‍वी की समस्‍त घटनाओं को नियंत्रित करने वाली उस महाशक्ति और उसकी यांत्रिकी का बोध हो जाता है। इस तरह फलित ज्‍योतिष न अनुमान और अनिश्चितता की बात करेगा और न ज्‍योतिषियों के समक्ष ऐसी नौबत आएगी कि उन्‍हें बार बार अपनी भविष्‍यवाणियों के लिए पश्‍चाताप करना पडेगा। बुद्धिजीवी और वैज्ञानिक भी ग्रह गति के नियमों और उससे उत्‍पन्‍न शक्ति की जानकारी प्राप्‍त करके तद्नुरूप फल प्राप्ति के पश्‍चात् इसकी वैज्ञानिकता को स्‍वीकार करेंगे। उन्‍हें यह महसूस होगा कि इतने दिनों तक इस महानतम ब्रह्म विद्या की व्‍यर्थ ही उपेक्षा हो गयी। इस ज्‍योतिष विज्ञान के वि‍कसित हो जाने पर ज्ञान और आत्‍म ज्ञान का अद्भुत प्रकाश संपूर्ण धरा को आलोकित करेगा। उपग्रह प्रक्षेपण जैसे कार्य में सुविधाएं होंगी , किसी देश के करोडों अरबों रूपए को नष्‍ट होने से बचाया जा सकेगा। इस विद्या को सरकारी संरक्षण और विश्‍वविद्यालयों में प्रवेश दिलाकर ही लाखों लोगों को रूचि लेने में प्रोत्‍साहित तथा सर्वोच्‍च विज्ञान को विकसित किया जा सकेगा। मेरे सिद्धांतों को समझने के बाद मुझे विश्‍वास है कि इस दिशा में वैज्ञानिक, सरकारी तंत्र , बुद्धिजीवी भी रूचि लेने लगेंगे तथा इस स्‍वदेशी प्राचीन विद्या के विकास की अनिवार्यता महसूस की जाने लगेगी।

समाज से अंधविश्‍वास को दूर करने का है हमारा कार्यक्रम

हमारे देश में तरह तरह के अंधविश्‍वास फैले हुए हैं , ताज्‍जुब है कि अंधविश्‍वासों के चक्‍कर में सिर्फ अनपढ , गरीब निम्‍न स्‍तरीय जीवन जीनेवाले ही नहीं हैं , बल्कि पढे लिखे और अमीर लोगों का तबका भी अंधविश्‍वासों से बाहर नहीं है। इसके चक्‍कर में कभी नवजात की बलि चढ़ जाती है , कभी बेबस स्‍त्री डायन बन जाती है , तो कभी सामान्‍य पुरूष महापुरूष। अक्‍सर पत्र पत्रिकाओं में हम इनके विरोध में खबरें प्रकाशित होती हैं , सरकारी और स्‍वयंसेवी संस्‍थाओं द्वारा विज्ञान के प्रचार प्रसार के कार्यक्रम चलते रहते हैं , पर सुधार की गति बहुत धीमी है। अर्थप्रधान युग में भविष्‍य के प्रति आशंका से अंधविश्‍वास और बढता जा रहा है। अंधविश्‍वास का मूल कारण अज्ञानता है , आग , वर्षा, बाढ , बिजली, रोग, भूकंप, चंद्रग्रहण , सूर्यग्रहण आदि घटनाओं के बारे में पर्याप्‍त जानकारी न होने से आदिम मानव के मध्‍य इन्‍हें लेकर अंधविश्‍वास था। पर जैसे जैसे रहस्‍यों का पर्दाफाश होता गया , अंधविश्‍वास समाप्‍त होता गया। देवी-देवता और आस्था से जुड़े कर्मकाण्डों मे भागीदारी गलत नहीं , पर समाज का अंध्‍विश्‍वासी होना इसके विकास में एक रूकावट है।

प्रकृति के सभी प्राणियों की तुलना में व्‍यक्ति की बनावट अलग होती है , इसलिए उसे जरूरत, सुरक्षा और सुविधा के लिए परिवार और समाज की जरूरत होती है , समाज को शक्ति देने के लिए समय समय पर उपलब्ध जानकारियों और तजुर्बों के आधार पर कुछ नियम बनाए जाते हैं। सामाजिक आचार संहिता व्यक्ति के स्वार्थ में कमी लाती है और व्‍यक्ति को संस्‍कारित करने में मदद करती है। पर ऐसा नहीं है कि इन संस्कारों को अपरिवर्तनशील मान लिया जाए। समाज में हो रहे परिवर्तनों के साथ पुराने नियम प्रासंगिक न होकर विकृतियाँ फैलाने वाले हो जाते हैं , ये नियम व्‍यक्ति को अंधविश्‍वासी बनाते हैं। तर्कशीलता का कवच पहनकर नए नियमों को समाविष्‍ट करके ही परम्परा को जीवंत रखा जा सकता है। नए विचार को प्रारम्भ में कड़ी भर्त्सना की जाती है , पर गहरे तर्क वितर्क के बाद इसे सार्वभौम सत्य समझ लिया जाता है और यह अंधविश्‍वास के खात्‍में की राह प्रशस्‍त करता है।

प्रकृति के रहस्‍यों की जानकारी के बाद बहुत सारे अंधविश्‍वास समाप्‍त होते चले गए , यदि आज समाज में कुछ अंधविश्‍वास प्रचलित हैं , तो इसकी वजह कुछ ऐसे रहस्‍य हैं , जिनका पता विज्ञान नहीं लगा सका है। बीमारी का इलाज भले ही मेडिकल साइंस के पास हैं , पर वह यह नहीं बता सकता कि कोई व्‍यक्ति बीमारी से ग्रस्‍त या अस्‍वस्‍थ क्‍यों है ? अधिकांश परिवार को परिवार नियोजन के कार्यक्रम का सहारा लेना पडता है , वहीं कुछ दंपत्ति डॉक्‍टरों के निरंतर इलाज के बावजूद बच्‍चे को जन्‍म देने में बाधाएं उपस्थित पा रहे हैं। कुछ आर्थिक मामले में स्‍वतंत्र हैं तो कुछ को जीवन में कठिन परीक्षा से गुजरना पड रहा है। किसी के बच्‍चे पढाई लिखाई में माता पिता का नाम रोशन कर रहे हैं , तो कुछ उनके लिए बोझ बने हुए हैं। सामान्‍य विद्यार्थी कैरियर में हर तरह से सफल हैं, तो मेधावी और सफल रहे विद्यार्थी दर दर की ठोकर खाने को मजबूर। इसी प्रकार कभी अच्‍छा भला चल रहा व्‍यवसाय अचानक दम तोडने लगता है , तो कभी साधारण व्‍यवसाय अचानक पनप जाता है। कभी अच्‍छे भले बच्‍चे आत्‍म हत्‍या को मजबूर हो जाते हैं , अच्‍छी भली बच्चियां दहेज लोभियों के चंगुल में फंस जाती है। भले ही विज्ञान इसके पीछे किसी नियम के होने की वास्‍तविकता से इंकार करे , पर 1981 से अबतक पच्‍चीस तीस हजार जन्‍मकुंडलियों के विश्‍लेषण के बाद ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ का दावा है कि समय समय पर आनेवाली मनुष्‍य की हर अच्‍छी भली परिस्थिति के पीछे उसके जन्‍मकालीन और गोचर के ग्रहों का हाथ होता है और इसे समझा और समझाया जा सकता है।

चिन्तनशील विचारक पाठकों, आपके मन में ज्योतिष से सम्बंधित कोई भी प्रश्न उपस्थित हो , सकारात्मक तार्किक बहस के लिए हमारे व्हाट्सप्प ग्रुप में आपका स्वागत है , क्लिक करें !


प्राचीन काल से ही फलित ज्योतिष को काल गणना का विज्ञान माना जाता रहा है। काफी ठोस नियमों के नहीं होने के बावजूद भी समाज में इसे कभी अंधविश्‍वास नहीं माना गया , क्‍योंकि इसका आधार ग्रहों नक्षत्रों के गणित पर आधारित है। पर इसमें कुछ कमजोरियां थी , जिसका निदान करने के बाद मनुष्‍य के जीवन में आनेवाली परिस्स्थितियों के बारे में जानकारी प्राप्‍त की जा सकती है। ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के सारे सिद्धांतों की चर्चा एक बार में संभव नहीं है , पर इसके कुछ फार्मूले को डालकर मैने एक सॉफ्टवेयर विकसित किया है जिससे इस तरह के दो तरह के ग्राफ निकलते हैं ,
पहला ग्राफ आपके जीवन के उतार चढाव को समझाने में समर्थ है , ग्राफ काफी ऊपर हो तो मनमौजी वातावरण , मध्‍य में हो तो काम करने का वातावरण तथा नीचे हो तो निराशाजनक वातावरण देता है। हरा ग्राफ आपके परिस्थितियों की सूचना देता है , लाल यदि हरे से ऊपर हो तो प‍रिस्थितियों आपके नियंत्रण में होंगी , विपरीत स्थिति में आपको परिस्थितियों के हिसाब से चलना होता है।

दूसरा ग्राफ आपके जीवन के विभिन्‍न संदर्भों के बारे में प्रकृति से मिलनेवाले सहयोग की सूचना देता है। जिन संदर्भों का प्रतिशत बीस प्रतिशत के आसपास होगा , उससे संबंधित सुख प्राप्‍त करेंगे , दस प्रतिशत के आसपास होगा , तो उन संदर्भों में महत्‍वाकांक्षी होंगे , दो तीन प्रतिशत के आसपास होगा तो किसी न किसी कारण से उन संदर्भों से कष्‍ट प्राप्‍त करेंगे। इसके अलावे इस ग्राफ से विभिन्‍न संदर्भों से संतुष्टि और असंतुष्टि की जानकारी भी आपको मिल सकती है।



इसके अलावे छोटी छोटी अवधि में आने वाली खुशियों और कष्‍ट का आकलन भी गोचर के ग्रहों द्वारा संभव है , पर उसका प्रोग्रामिंग नहीं हो पाने से उसके आकलन में समय लगता है। सॉफ्टवेयर में अभी कुछ दिनों तक नियमित तौर पर काम चलता रहेगा और इस वर्ष के अंत तक हम बहुत हद तक अभी तक प्राप्‍त जानकारी को समाहित करने में कामयाब हो जाएंगे , पर अभी सिर्फ इन्‍हीं दो ग्राफों से किसी को भी उनकी प्रकृति और जीवनयात्रा के बारे में जानकारी दी जा सकती है, जो उन्‍हें खुद को समझने और अंधविश्‍वास से बचाने में मदद कर सकती है।  'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' भी समाज से अंधविश्‍वास को दूर करने के लिए पिछले चालीस वर्षों से सक्रिय है , विवाह के लिए जन्‍मकुंडली मिलाना आवश्‍यक नहीं , सूर्य और चंद्रग्रहण के प्रभाव का क्‍या है सच ? , मुहूर्त्‍त को लेकर लोगों के भ्रम  जैसी पोसट इसका प्रमाण हैं।

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ज्‍योतिष के विकास के लिए इसका विकसित विज्ञान के साथ सहसंबंध बनाना आवश्‍यक ...

पृथ्‍वी की निरंतर गतिशीलता के कारण प्रत्‍येक दो घंअे में विभिन्‍न लग्‍नों का उदय है। इसकी दैनिक गति के कारण दिन और रात का अस्तित्‍व है, वार्षिक गति के कारण इसके ऋतु परिवर्तन का चक्र। गति के कारण ही चंद्रमा का बढता घटता स्‍वरूप है , गति के कारण विशिष्‍ट ग्रहों की पहचान है। सूर्य और चंद्र की गति के कारण ही नक्षत्रों का वर्गीकरण है , सूर्य और चंद्र का ग्रहण है। ग्रहों की गति के कारण ही संसार का नित नूतन पिरवेश है और इसी परिवर्तनशीलता के कारण इसका नाम जगत है। न्‍यूटन ने गति के सिद्धांत को समझा, तो भौतिक विज्ञान में क्रांति आ गयी। आज उन्‍ही सिद्धांतों को अधिक विकसित कर वैज्ञानिक अंतरिक्ष में अरबों मील की यात्रा करके तरह तरह की खोज करके सकुशल पृथ्‍वी पर लौट आते हैं।

सृष्टि काल के आरंभ से ही सूर्य , चंद्र और सभी ग्रहों की गति हमारे लिए आकर्शण का केन्‍द्र बने रहें। वैदिककालीन विद्याओं में यह प्रमुख विद्या थी , इसलिए इसे वेद का नेत्र कहा जाता था। उस समय से आजतक आकाशीय पिंडों की गति और स्थिति के विषय में बहुत जानकारी प्राप्‍त कर ली गयी है , सभी पिंडों की गति और परिभ्रमण पथ की इतनी सूक्ष्‍म जानकारी आज है कि आज से सैकडों वर्ष बाद के सभी ग्रहों की स्थिति , सूर्य और चंद्र ग्रहण की जानकारी मिनट सेकण्‍ड की शुद्धता के साथ दी जा सकती है। सूर्य चंद्र परिभ्रमण पथ की सम्‍यक जानकारी के कारण यह भी बताया जा सकता है कि पृथ्‍वी के किस भाग में यह ग्रहण दिखाई पडेगा। यही कारण है कि गणित ज्‍योतिष की पढाई संपूर्ण विश्‍व में हो रही है। गति की सम्‍यक जानकारी के कारण ही पंचांग में तिथि , नक्षत्र , योग , करण आदि का समुचित उल्‍लेख किया जाता है , पर फलित के मामलों में गहों की गति की उपेक्षा की गयी है। फलित ज्‍योतिष में ग्रहों की सिर्फ स्थिति पर ही विचार किया गया है , इसलिए आज तक इसके द्वारा कहा जाने वाला फल अधूरा और अनिश्चित रह गया है।

पृथ्‍वी स्‍वयं गतिशील है , दैनिक और वार्षिक गति के कारण अपने अक्ष और कक्षा में सदैव अपने को हजारो मील दूर ले जाती है। किंतु पृथ्‍वी वासी होने के कारण हमें इसकी गति का आभास भी नहीं हो पाता है , क्‍यूंकि पृथ्‍वी पर स्थित हर जड चेतन की गति पृथ्‍वी की गति के बराबर हो जाती है। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार ट्रेन पर सवार सभी व्‍यक्ति विरामावस्‍था में होते हुए भी लंबी दूरी तय कर लेते हैं। फलित ज्‍योतिष के अध्‍येता अपने को ब्रह्मांड का केन्‍द्र विंदू मानकर इसे स्थिरावस्‍था में समझते हुए ही संपूर्ण ब्रह्मांड और आकाशीय पिंडों का अध्‍ययन करता है। ब्रह्मांड में दरअसल पृथ्‍वी के साथ शेष ग्रह भी सूर्य की परिक्रमा कर रहे हैं। अत: पृथ्‍वी को विरामावस्‍था में मानने से इसके सापेक्ष सभी ग्रहों की सापेक्षिक गति की जानकारी होती है।

पृथ्‍वी सूर्य की प्रत्‍यक्ष परिक्रमा करता है , इस कारण उसके सापेक्ष सूर्य की समरूप गति को हम देख पाते हैं , चंद्रमा को भी पृथ्‍वी की प्रत्‍यक्ष परिक्रमा करते हुए देखा जा सकता है। भचक्र में ये दोनो ग्रह लगभग समरूप गति में होते हैं। सूर्य कभी उत्‍तरायण तो कभी दक्षिणायण होता है , उसके हिसाब से विभिन्‍न ऋतुएं होती हैं , विभिन्‍न नक्षत्रों से गुजरता है तो उसके अनुरूप उसका फल होता है। चंद्रमा के प्रकाशमान भाग के अनुरूप ही जातक की मनोवैज्ञानिक शक्ति होती है । किसी निश्चित तिथि को सूर्य आकाश के एक निश्चित भाग में ही होता है , पर उस दिन जन्‍म लेने वाले समस्‍त जातकों की कुंडली में विभिन्‍न भावों में दर्ज किया जाता है। उसका फल भी भिन्‍न भिन्‍न जातकों के लिए अलग अलग होता है।

आकाश में शेष ग्रहों का पृथ्‍वी से अप्रत्‍यक्ष गत्‍यात्‍मक संबंध है। यानि की सौरमंडल में अन्‍य सभी ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हुए कभी पृथ्‍वी की ओर आ जाते हैं , तो कभी पृथ्‍वी के विपरीत दिशा में। इसके कारण पृथ्‍वी से विभिन्‍न ग्रहों की दूरी और सापेक्षिक गति बढती घटती है। पृथ्‍वी के सापेक्ष कभी कभी ग्रहों की गति ऋणात्‍मक भी हो जाती है। ‘गणित ज्‍योतिष’ में इसकी विशद चर्चा है , पर ‘फलित ज्‍योतिष’ का अध्‍ययन करते वक्‍त आज तक ग्रहों की इस गति को नजरअंदाज कर दिय गया , जो ग्रहों के बलाबल का सही आधार है। यह विडंबना ही है कि बंदूक की छोटी सी गोली में उसकी शक्ति का अनुमान उसकी गति के कारण हम सहज ही कर लेते हैं। हथेली पर एक छोटा सा पत्‍थर का टुकडा रखकर अपने को बलवान समझते हैं , क्‍यंकि उसे गति देकर शक्ति उत्‍सर्जित की जा सकती है , पर हजारो मील प्रतिघंटा की गति वाले भीमकाय ग्रहों की शक्ति को आज तक ज्‍योतिषी इसकी स्थिति में ढूंढते आ रहे हें। जाने अनजाने ग्रहों की गति के रहस्‍य को नहीं समझ पाने से फलित ज्‍योतिष की गति स्‍वत: अवरूद्ध हो गयी। यही करण है कि हजारो वर्षों से इसकी स्थिति यथावत बनी हुई है और लोग इसे अनुमान शास्‍त्र कहने लगे हैं।

प्रकृति के नियम बहुत ही सरल होते हैं , एक दो प्रतिशत ही अपवाद होते हैं,पर इसे समझने में हमें बहुत समय लग जाता है। फलित ज्‍योतिष की पुस्‍तकों में ग्रह शक्ति के निर्धारण के लिए बहुत सारे नियम हैं। स्‍थान बल , काल बल , दिक बल , नैसर्गिक बल , चेष्‍टा बल , अंश बल , योग कारक बल , पक्ष बल , अयन बल , स्‍थान बल के अलावे भी ष्‍डवर्ग अष्‍टकवर्ग आदि आदि। इसका अभिप्राय यह है कि हमारे .षि मुनि पूर्व ज्‍योतिषियों ने ग्रह शक्ति को समझने की चुनौती को स्‍वीकार किया था। इस परिप्रेक्ष्‍य में उनके द्वारा बहुआयामी प्रयास किया गया , इस लिए ग्रहशक्ति से संबंधित इतने नियम हैं , किंतु व्‍यवहारिक दृष्टि से एक ज्‍योतिषी इतने नियमों को आतमसात करते हुए तल्‍लीन रहकर भविष्‍य कथन नहीं कर सकता। इतने नियमों के मध्‍य विभिन्‍न ज्‍योतिषियों के फलकथन में एकरूपता की बात हो ही नहीं सकती। ज्‍योतिष के इन जटिल सूत्रों ने ग्रह फल कथन में ज्‍योतिषियों के निष्‍कर्ष में विरूपता पैदा कर इसके वैज्ञानिक स्‍वरूप को नष्‍ट करते हुए इसे अनुमान शास्‍त्र बना दिया है। इन उलझनों से बचने के लिए एकमात्र उपाय ग्रहों की गतिज और स्‍थैतिज ऊर्जा का सहरा लेना समीचीन सिद्ध हुआ है। फलित ज्‍योतिष में अन्‍य नियमों की तरह ये नियम भी ग्रह शक्ति निर्धारण के लिए एक नया प्रयोग नहीं है। सन् 1981 से अबतक पच्‍चीस तीस हजार कुंडलियों में किए गए प्रयोग का निचोड निष्‍कर्ष है।

फलित ज्‍योतिष सबसे पुरानी विधाओं में एक वैदिककालीन विद्या है। किंतु भौतिक विज्ञान में वर्णित न्‍यूटन के गति के सिद्धांत का आविष्‍कार सन् 1887 में हुआ , इससे पूर्व ज्‍योतिष में इसका उपयोग संभव नहीं था। पर उसके बाद इसका उपयोग फलित ज्‍योतिष के क्षेत्र में भी होना चाहिए था , क्‍यूंकि किसी भी विज्ञान का विकास विकसित विज्ञान के साथ सहसंबंध बनाकर ही होता है। अगर हम फलित ज्‍योतिष को विज्ञान बनाना चाहते हैं तो हमें भौतिक विज्ञान में वर्णित गतिज और स्‍थैतिज ऊर्जा का सहारा लेना , उसका उपयोग करना एक स्‍वस्‍थ दृष्टिकोण होगा। ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ में ग्रहों की गति की विशद व्‍याख्‍या करते हुए इसकी विभिन्‍न प्रकार की गतियों का सपष्‍ट भिन्‍न भिन्‍न प्रभाव मानव जाति पर कैसे पडता है , का अध्‍ययन किया गया है।


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